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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में से श्री केदारनाथ का ज्योतिर्लिंग हिमाच्छादित प्रदेश का एक दिव्य ज्योतिर्लिंग है। पुराणों एवं शास्त्रोंमें श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमाका वर्णन बारम्बार किया गया है।

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के इस लेख में

  • श्री केदारनाथ की कथा – पांडवों को शिवजी के दर्शन,
  • नर और नारायण की तपस्या और उनको भगवान् शिव के दर्शन,
  • श्री केदारनाथ शिवलिंग का त्रिकोणीय आकार
  • केदारनाथ यात्रा का संक्षिप्त विवरण
  • श्री केदारनाथ की महिमा
  • आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ महिमा का वर्णन

यह ज्योतिर्लिंग पर्वतराज हिमालयकी केदार नामक चोटीपर स्थित है। यहाँकी प्राकृतिक शोभा देखते ही बनती है। इस चोटीके पश्चिम भागमें पुण्यमती मन्दाकिनी नदीके तटपर स्थित केदारेश्वर महादेवका मन्दिर अपने स्वरूपसे ही हमें धर्म और अध्यात्मकी ओर बढ़नेका सन्देश देता है।


हिमालय की देवभूमि में केदारनाथ

हिमालय की देवभूमि में बसे इस देवस्थान के दर्शन केवल छह माह के काल में ही होते हैं। वैशाख से लेकर अश्विन महीने तक के कालावधि में इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा लोग कर सकते हैं।

वर्ष के अन्य महीनों में कड़ी सर्दी होने से हिमालय पर्वत का प्रदेश बर्फ से ढका रहने के कारण श्रीकेदारनाथ का मंदिर भक्तों के लिए बंद रहता है।

कार्तिक महीने में बर्फ वृष्टि तेज होने पर इस मंदिर में घी का नंदा दीप जलाकर श्री केदारेश्वर का भोग सिंहासन बाहर लाया जाता है। और मंदिर के द्वार बंद किए जाते हैं।

कार्तिक से चैत्र तक श्री केदारेश्वर जी का निवास नीचे जोशीमठ में रहता है। वैशाख में जब बर्फ पिघल जाती है तब केदारधाम फिर से खोल दिया जाता है।


हरिद्वार से केदारनाथ तक यात्रा

हरिद्वार को मोक्षदायिनी मायापुरी मानते हैं। हरिद्वार के आगे ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, सोनप्रयाग और त्रियुगी नारायण, गौरीकुंड इस मार्ग से केदारनाथ जा सकते हैं। कुछ प्रवास मोटर से और कुछ पैदल से करना पड़ता है।

हिमालय का यह रास्ता काफी कठिन होता है। परंतु अटल श्रद्धा के कारण यह कठिन रास्ता भक्त यात्री पार करते हैं। श्रद्धा के बल पर इस प्रकार संकटों पर मात की जाती है।

चढान का मार्ग कुछ लोग घोड़े पर बैठकर, टोकरी में बैठ कर या झोली की सहायता से पार करते हैं। इस तरह का प्रबंध वहां किया जाता है।

विश्राम के लिए बीच-बीच में धर्मशालाएं, मठ तथा आश्रम खोले गए हैं। यात्री गौरीकुंड स्थान पर पहुंचने के बाद वहां के गर्म कुंड के पानी से स्नान करते हैं और मस्तकहीन गणेश जी के दर्शन करते हैं।


गौरीकुंड – श्री गणेशजी

गौरीकुंड का स्थान गणेश जी का जन्म स्थान माना गया है।

इस स्थान पर पार्वती पुत्र गणेश जी को शंकर जी ने त्रिशूल के प्रहार से मस्तकहीन बनाया था, और बाद में गजमुख लगा कर जिंदा किया था।


केदारनाथ का शिवलिंग

गौरीकुंड से दो चार कोस की दूरी पर ऊंची हिम शिखरों के परिसर में, मंदाकिनी नदी की घाटी में भगवान शंकर जी का दिव्य ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ का मंदिर दिखाई देता है। यही कैलाश है, जो भगवान शंकर जी का आद्य निवास स्थान है।

लेकिन यहां शंकर जी की मूर्ति और लिंग भी नहीं है। केवल एक त्रिकोण के आकार का ऊंचाई वाला स्थान है। कहते हैं वह महेश का, भैंसे का, पृष्ठ भाग है।


केदारनाथ की कथा – पांडवो को भगवान् शिव के दर्शन

इस ज्योतिर्लिंग का जो इस तरह का आकार बना है, उसकी अनोखी कथा इस प्रकार है –

कौरव और पांडव के युद्ध में अपने ही लोगों की हत्या हुई थी। इसलिए मोक्ष पाने के लिए पांडव तीर्थ स्थान काशी पहुंचे। परंतु भगवान शंकर जी उस समय हिमालय की कैलाश पर गए हुए हैं, यह समाचार मिला।

पांडव काशी से निकले और हरिद्वार होकर हिमालय की गोद में पहुंची। दूर से ही उन्हें भगवान शंकर जी के दर्शन हुए। लेकिन पांडव को देखकर शंकर भगवान लुप्त हो गए।

यह देखकर धर्मराज ने कहा –
हे देव, हम पापियों को देखकर आप लुप्त हो गए। ठीक है, हम आपको ढूंढ निकालेंगे। आपके दर्शन से हमारे सारे पाप धुल जाने वाले हैं। जहां आप लुप्त हुए हैं, वह स्थान अब गुप्तकाशी के रूप में पवित्र तीर्थ बनेगा।

गुप्तकाशी, रुद्रप्रयाग से पांडव आगे निकलकर हिमालय के कैलाश, गौरीकुंड के प्रदेश में घूमते रहे। शंकर भगवान को ढूंढते रहे।

इतने में नकुल और सहदेव को एक भैंसा दिखाई दिया। उसका अनोखा रूप देखकर धर्मराज ने कहा, भगवान शंकर जी ने ही यह भैंसे का अवतार धारण किया है। वह हमें परख रहे हैं।

फिर क्या। गदाधारी भीम उस भैंसे के पीछे लगे। भैंसा उछल पड़ा और भीम के हाथ नहीं आया। आखिर भीम थक गया। फिर भी भीम ने गदा प्रहार से भैंसे को घायल किया।

फिर वह भैंसा एक दर्रे के पास जमीन में मुंह दबा कर बैठ गया। भीम ने उसकी पूंछ पकड़कर खींचा। भैंसे का मुँह इस खिंचाव से सीधे नेपाल में जा पहुंचा। भैंसे का पार्श्व भाग केदार धाम में ही रहा। नेपाल में वह पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाने लगा।

महेश के उस पार्श्व भाग से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। दिव्य ज्योति में से शंकर भगवान प्रकट हुए। पांडवों को उन्होंने दर्शन दिए। शंकर भगवान के दर्शन से पांडवों के पाप नष्ट हो गए।

भगवान शंकर जी ने पांडव से कहा – मैं अभी यहां इसी त्रिकोण आकार में ज्योतिर्लिंग के रूप में हमेशा के लिए रहूंगा। केदारनाथ के दर्शन से भक्तगण पावन होंगे।

महेशरूप लिए हुए शिवजी को भीम ने गदा का प्रहार किया था। इसलिए भीम को बहुत पछतावा हुआ, बुरा लगा। वह महेश का शरीर घी से मलने लगा। उस बात की यादगार के रूप में आज भी उस त्रिकोण आकार दिव्य ज्योतिर्लिंग केदारनाथ को घी से मलते हैं। इस स्थान पर शंकर भगवान की इसी तरह से पूजा की जाती है।


केदारनाथ कथा – नर और नारायण की तपस्या

इस अतीव पवित्र पुण्यफलदायी ज्योतिर्लिक्की स्थापनाके विषयमें पुराणोंमें यह कथा दी गयी है –

अतिशय पवित्र, तपस्वियों, ऋषियों और देवताओंकी निवास-भूमि हिमालयके केदार नामक अत्यन्त शोभाशाली शिखरपर महातपस्वी श्रीनर और नारायणने बहुत वर्षों तक भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये बड़ी कठिन तपस्या की।

कई वर्षोंतक वे निराहार रहकर शिवनामका जप करते रहे।

इस तपस्यासे सारे लोकोंमें उनकी चर्चा होने लगी। देवता, ऋषि-मुनि, यक्ष, गन्धर्व सभी उनकी साधना और संयमकी प्रशंसा करने लगे। चराचरके पितामह ब्रह्माजी और सबका पालन-पोषण करनेवाले भगवान् विष्णु भी महातपस्वी नर-नारायणके तपकी प्रशंसा करने लगे।

अन्तमें भगवान् शंकरजी भी उनकी उस कठिन साधनासे प्रसत्र हो उठे। उन्होंने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन दोनों ऋषियोंको दर्शन दिया। नर और नारायणने भगवान् भोलेनाथके दर्शनसे भाव-विह्वल और आनन्द-विभोर होकर बहुत प्रकारकी पवित्र स्तुतियों और मन्त्रोंसे उनकी पूजा-अर्चना की।

भगवान् शिवजीने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा।

भगवान् शिवकी यह बात सुनकर उन दोनों ऋषियोंने उनसे कहा –
देवाधिदेव महादेव! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो भक्तोंके कल्याणहेतु आप सदा-सर्वदाके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी कृपा करें। आपके यहाँ निवास करनेसे यह स्थान सभी प्रकारसे अत्यन्त पवित्र हो उठेगा। यहाँ आकर आपका दर्शन-पूजन करनेवाले मनुष्योंको आपकी अविनाशिनी भक्ति प्राप्त हुआ करेगी। प्रभो! आप मनुष्योंके कल्याण और उनके उद्धारके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी हमारी प्रार्थना अवश्य ही स्वीकार करें।

उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शिवने ज्योतिर्लिंग के रूपमें वहाँ वास करना स्वीकार किया। केदार नामक हिमालय-शिखर पर स्थित होनेके कारण इस ज्योतिर्लिंग को श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूपमें जाना जाता है।

भगवान् शिवसे वर माँगते हुए नर और नारायणने इस ज्योतिर्लिङ्ग और इस पवित्र स्थानके विषयमें जो कुछ कहा है, वह अक्षरश: सत्य है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन तथा यहाँ स्नान करनेसे भक्तोंको लौकिक फलोंकी प्राप्ति होनेके साथ-साथ अचल शिवभक्ति तथा मोक्षकी प्राप्ति भी हो जाती है।


केदारनाथ में पांडवों की स्मृतियाँ

केदारनाथ के परिसर में पांडवों की कई स्मृतियां जागृत रही है। राजा पांडु इसी वन में माद्री के साथ विहार करते समय मर गए थे। वह स्थान पांडुकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। वहां आदिवासी लोग पांडव नृत्य प्रस्तुत करते रहते हैं।

जिस स्थान से पांडव स्वर्ग सिधारे ऊंची चोटी को स्वर्ग रोहिणी कहते हैं। धर्मराज जब स्वर्ग सिधार रहे थे, तब उनका एक अंगूठा निकल कर जमीन पर पड़ा था। उस स्थान पर धर्मराज ने अंगुष्ठमात्र शिवलिंग की स्थापना की।


केदारनाथ की महिमा

केदारेश्वर के दर्शन से स्वप्न में भी दुख प्राप्त नहीं होता। शंकर केदारेश्वर का पूजन कर पांडव का सब दुख जाता रहा।

बद्रीकेश्वर का दर्शन पूजन आवागमन के बंधन से मुक्ति दिलाता है। केदारेश्वर में दान करके शिवजी के समीप जाकर उनके रूप हो जाते हैं।

मुख्य केदारनाथ मंदिर के परिसर में अनेक पवित्र स्थान हैं। मंदिर के पिछवाड़े में आदि शंकराचार्य जी की समाधि है। दूर की ऊंचाई पर भृगुपतन नाम की एक कठिन कगार है।

मंदिर की आठ दिशाओं में अष्टतीर्थ हैं।

तात्पर्य है कि श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए अति कठिन और दुर्गम मार्ग से होकर जाना पड़ता है। लेकिन इरादे बुलंद हो और मन में श्रद्धा हो तो चलते समय थकान बिल्कुल नहीं आती। सबकी जुबान पर एक ही घोष रहता है – जय केदारनाथ, जय केदारनाथ।


आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ का वर्णन

आदि शंकराचार्यजी ने कहा है –

महाद्रिपार्श्वेच तटे रमन्तं,
सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै:,
केदारमीशं शिवमेकमीडे॥

अर्थात महान हिमालय के प्रदेश में रम जाने वाले, ऋषि मुनियों द्वारा और सुर, असुर, यक्ष तथा महानाग आदि के द्वारा जिन की निरंतर पूजा होती आई है, ऐसे श्री केदारेश्वर महादेव जी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

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