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Ramayan

सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 01

हनुमानजी का सीता शोध के लिए लंका प्रस्थान – जाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमानजी को अपने मन में वे वचन बहुत अच्छे लगे॥ और हनुमानजी ने कहा की..

सुंदरकांड की लिस्ट (Sunderkand – Index)

  • सुन्दरकांड में
  • 526 चौपाइयाँ,
  • 60 दोहे,
  • 6 छंद और 3 श्लोक है।

सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।


सुन्दरकांड के पहले भाग के मुख्य प्रसंग

  1. हनुमानजी का वानरों को समझाकर,
    • लंका की और जाना

  2. मैनाक पर्वत से भेंट
  3. सुरसा से भेंट
  4. सुरसा को, हनुमानजी की शक्ति और बुद्धि का पता चलना
  5. समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

  6. हनुमानजी का लंका पहुंचना

  7. लंका का वर्णन
  8. लंका के बग़ीचों, रास्तों और राक्षसों का वर्णन

  9. हनुमानजी का लंका में प्रवेश

1. हनुमानजी लंका जाने के लिए चले

1.1

हनुमानजी वानरों को समझाते है

जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

  • जाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर
  • हनुमानजी को अपने मन में,
  • वे वचन बहुत अच्छे लगे॥
  • और हनुमानजी ने कहा की हे भाइयो!
  • आप लोग कन्द, मूल व फल खा,
  • दुःख सह कर मेरी राह देखना॥

1.2

श्रीराम का कार्य करने पर, मन को, ख़ुशी मिलती है

जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

  • जब मै,
  • सीताजीको देखकर लौट आऊंगा,
  • तब कार्य सिद्ध होने पर,
  • मन को बड़ा हर्ष होगा॥
  • ऐसे कह, सबको नमस्कार करके,
  • रामचन्द्रजी का ह्रदय में ध्यान धरकर,
  • प्रसन्न होकर,
  • हनुमानजी लंका जाने के लिए चले॥

1.3

हनुमानजी ने, एक पहाड़ पर, भगवान् श्रीराम का स्मरण किया

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी।
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

  • समुद्र के तीर पर,
  • एक सुन्दर पहाड़ था।
  • उसपर कूदकर,
  • हनुमानजी कौतुकी से चढ़ गए॥
  • फिर वारंवार,
  • रामचन्द्रजी का स्मरण करके,
  • बड़े पराक्रम के साथ,
  • हनुमानजी ने गर्जना की॥

1.4

हनुमानजी, श्रीराम के बाण जैसे तेज़ गति से, लंका की ओर जाते है

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

  • जिस पहाड़ पर,
  • हनुमानजी ने पाँव रखे थे,
  • वह पहाड़,
  • तुरंत पाताल के अन्दर चला गया॥
  • और जैसे,
  • श्रीरामचंद्रजी का अमोघ बाण जाता है,
  • ऐसे हनुमानजी वहा से चले॥

सोरठा

समुद्र ने, मैनाक पर्वत को, हनुमानजी की सेवा के लिए भेजा

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

  • समुद्र ने हनुमानजी को,
  • श्रीराम का दूत जानकर,
  • मैनाक नाम पर्वत से कहा की,
  • हे मैनाक,
  • तू जा, और इनको ठहरा कर,
  • श्रम मिटानेवाला हो॥

मैनाक पर्वत, हनुमानजी से, विश्राम करने के लिए कहता है

सिन्धुवचन सुनी कान, तुरत उठेउ मैनाक तब।
कपिकहँ कीन्ह प्रणाम, बार बार कर जोरिकै॥

  • समुद्रके वचन,
  • कानो में पड़तेही
  • मैनाक पर्वत वहांसे तुरंत उठा, और
  • हनुमानजीके पास आकर,
  • वारंवार हाथ जोड़कर
  • उसने हनुमानजीको प्रणाम किया॥

1. दोहा

प्रभु राम का कार्य, पूरा किये बिना, विश्राम नही

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥1॥

  • हनुमानजी ने,
  • उसको अपने हाथसे छूकर,
  • फिर उसको प्रणाम किया,
  • और कहा की,
  • रामचन्द्रजीका का कार्य किये बिना,
  • मुझको विश्राम कहा है? ॥1॥

2. हनुमानजी की सुरसा से भेंट

2.1

देवताओं ने नागमाता सुरसा को भेजा

जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

  • हनुमानजी को जाते देखकर
  • उनके बल और
  • बुद्धि के वैभव को जानने के लिए
  • देवताओं ने,
  • नाग माता सुरसा को भेजा।
  • उस नागमाताने आकर,
  • हनुमानजी से यह बात कही॥

2.2

सुरसा ने हनुमानजी का रास्ता रोका

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

  • “आज तो मुझको,
  • देवताओं ने यह अच्छा आहार दिया।”
  • यह बात सुन हँस कर,
  • हनुमानजी बोले॥
  • “मैं रामचन्द्रजी का काम करके लौट आऊ और
  • सीताजी की खबर,
  • रामचन्द्रजी को सुना दूं॥”

2.3

हनुमानजी ने, सुरसा को समझाया कि, वह उनको नहीं खा सकती

तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

  • फिर हे माता!
  • मै आकर आपके मुँह में,
  • प्रवेश करूंगा।
  • अभी तू मुझे जाने दे।
  • इसमें कुछभी फर्क नहीं पड़ेगा।
  • मै तुझे सत्य कहता हूँ॥
  • जब सुरसा ने,
  • किसी उपायसे उनको जाने नहीं दिया,
  • तब हनुमानजी ने कहा कि,
  • तू क्यों देरी करती है?
  • तू मुझको नही खा सकती॥

2.4

सुरसा ने, कई योजन मुंह फैलाया, तो हनुमानजी ने भी, शरीर फैलाया

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

  • सुरसाने अपना मुंह,
  • एक योजनभरमें फैलाया।
  • हनुमानजी ने अपना शरीर,
  • दो योजन विस्तारवाला किया॥
  • सुरसा ने अपना मुँह,
  • सोलह (१६) योजनमें फैलाया।
  • हनुमानजीने अपना शरीर तुरंत,
  • बत्तीस (३२) योजन बड़ा किया॥

2.5

सुरसा ने, मुंह सौ योजन फैलाया, तो हनुमानजी ने, छोटा सा रूप धारण किया

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

  • सुरसा ने जैसा जैसा मुंह फैलाया,
  • हनुमानजीने वैसे ही अपना स्वरुप,
  • उससे दुगना दिखाया॥
  • जब सुरसा ने अपना मुंह,
  • सौ योजन (चार सौ कोस का) में फैलाया,
  • तब हनुमानजी तुरंत,
  • बहुत छोटा स्वरुप धारण कर॥

2.6

सुरसा को, हनुमानजी की शक्ति का पता चला

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

  • उसके मुंहमें पैठ कर (घुसकर),
  • झट बाहर चले आए।
  • फिर सुरसा से विदा मांग कर,
  • हनुमानजी ने प्रणाम किया॥
  • उस वक़्त सुरसा ने हनुमानजी से कहा की –
  • हे हनुमान!
  • देवताओंने मुझको जिसके लिए भेजा था,
  • वह तेरा बल और बुद्धि का भेद,
  • मैंने अच्छी तरह पा लिया है॥

2. दोहा

सुरसा, हनुमानजी को प्रणाम करके, चली जाती है

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥2॥

  • तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो,
  • सो श्रीरामचंद्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे।
  • ऐसे आशीर्वाद देकर,
  • सुरसा तो अपने घर को चली,
  • और हनुमानजी प्रसन्न होकर,
  • लंकाकी ओर चले ॥2॥

3. हनुमानजी, लंका की ओर चले

3.1

समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

  • समुद्र के अन्दर एक राक्षस रहता था।
  • सो वह माया करके,
  • आकाशचारी पक्षी और जंतुओको,
  • पकड़ लिया करता था॥
  • जो जीवजन्तु आकाश में उड़कर जाता,
  • उसकी परछाई जल में देखकर,
  • परछाई को जल में पकड़ लेता॥

3.2

हनुमानजी ने, मायावी राक्षस के छल को पहचाना

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥

  • परछाई को जल में पकड़ लेता,
  • जिससे वह जिव जंतु फिर वहा से सरक नहीं सकता।
  • इस तरह वह हमेशा,
  • आकाशचारी जिवजन्तुओ को खाया करता था॥
  • उसने वही कपट हनुमानसे किया।
  • हनुमान ने उसका वह छल,
  • तुरंत पहचान लिया॥

3.4

हनुमानजी समुद्र के पार पहुंचे

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

  • धीर बुद्धिवाले पवनपुत्र वीर हनुमानजी
  • उसे मारकर समुद्र के पार उतर गए॥
  • वहा जाकर हनुमानजी वन की शोभा देखते है कि,
  • भ्रमर मकरंद के लोभसे गुँजाहट कर रहे है॥

लंका का वर्णन

3.5

हनुमानजी लंका पहुंचे

नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

  • अनेक प्रकार के वृक्ष,
  • फल और फूलोसे शोभायमान हो रहे है।
  • पक्षी और हिरणोंका झुंड देखकर,
  • मन मोहित हुआ जाता है॥
  • वहा सामने हनुमानजी एक बड़ा विशाल पर्वत देखकर,
  • निर्भय होकर,
  • उस पहाड़पर कूदकर चढ़ बैठे॥

3.6

भगवान् शंकर, पार्वतीजी को, श्रीराम की महिमा बताते है

उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥

  • महदेव जी कहते है कि
  • हे पार्वती!
  • इसमें हनुमान की कुछ भी अधिकता नहीं है।
  • यह तो केवल रामचन्द्रजीके ही
  • प्रताप का प्रभाव है कि,
  • जो काल को भी खा जाता है॥
  • पर्वत पर चढ़कर हनुमानजी ने लंका को देखा,
  • तो वह ऐसी बड़ी दुर्गम है की,
  • जिसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता॥

3.7

लंका नगरी और उसके सुवर्ण कोट का वर्णन

अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥

  • पहले तो वह पुरी बहुत ऊँची,
  • फिर उसके चारो ओर समुद्र की खाई।
  • उसपर भी सुवर्णके कोटका महाप्रकाश कि,
  • जिससे नेत्र चकाचौंध हो जावे॥

छंद

लंका नगरी और उसके महाबली राक्षसों का वर्णन

कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

  • उस नगरीका रत्नों से जड़ा हुआ,
  • सुवर्ण का कोट,
  • अतिव सुन्दर बना हुआ है।
  • चौहटे, दुकाने व सुन्दर गलियों के बहार,
  • उस सुन्दर नगरी के अन्दर बनी है॥
  • जहा हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल व
  • रथोकी गिनती कोई नहीं कर सकता।
  • और जहा महाबली,
  • अद्भुत रूपवाले राक्षसोके सेनाके झुंड इतने है कि
  • जिसका वर्णन किया नहीं जा सकता॥

लंका के बाग-बगीचों का वर्णन

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥

  • जहा वन, बाग़, बागीचे,
  • बावडिया, तालाब, कुएँ,
  • बावलिया शोभायमान हो रही है।
  • जहां मनुष्यकन्या, नागकन्या,
  • देवकन्या और गन्धर्वकन्याये विराजमान हो रही है –
  • जिनका रूप देखकर,
  • मुनिलोगोका मन मोहित हुआ जाता है॥
  • कही पर्वत के समान बड़े विशाल देहवाले महाबलिष्ट,
  • मल्ल गर्जना करते है और
  • अनेक अखाड़ों में अनेक प्रकारसे भिड रहे है और
  • एक एकको आपस में पटक पटक कर गर्जना कर रहे है॥

लंका के राक्षसों का बुरा आचरण

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

  • जहा कही विकट शरीर वाले करोडो भट,
  • चारो तरफसे नगरकी रक्षा करते है और
  • कही वे राक्षस लोग,
  • भैंसे, मनुष्य, गौ, गधे, बकरे और
  • पक्षीयोंको खा रहे है॥
  • राक्षस लोगो का आचरण बहुत बुरा है।
  • इसीलिए तुलसीदासजी कहते है कि
  • मैंने इनकी कथा बहुत संक्षेपसे कही है।
  • ये महादुष्ट है, परन्तु,
  • रामचन्द्रजीके बानरूप पवित्र तीर्थनदीके अन्दर,
  • अपना शरीर त्यागकर,
  • गति अर्थात मोक्षको प्राप्त होंगे॥

3. दोहा

हनुमानजी, छोटा सा रूप धरकर, लंका में प्रवेश करने का सोचते है

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार ॥3॥

  • हनुमानजी ने बहुत से रखवालो को देखकर,
  • मन में विचार किया की,
  • मै छोटा रूप धारण करके नगर में प्रवेश करूँ ॥3॥

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