सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 01



<< सुंदरकांड की लिस्ट (Sunderkand – Index)

सुन्दरकांड में 526 चौपाइयाँ, 60 दोहे, 6 छंद और 3 श्लोक है। सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।


इस लेख में सुंदरकांड की सभी चौपाइयां अर्थसहित दी गयी हैं।

सुंदरकांड सिर्फ हिन्दी में

सम्पूर्ण सुंदरकांड सिर्फ हिंदी में पढ़ने के लिए, अर्थात सभी चौपाइयां हाईड (hide) करने के लिए क्लिक करें –

सिर्फ हिंदी में (Hide Chaupai)


चौपाइयां अर्थसहित

सुंदरकांड की सभी चौपाइयां अर्थसहित पढ़ने के लिए (यानी की सभी चौपाइयां unhide या show करने के लिए) क्लिक करें  –

सभी चौपाइयां देखें (Show Chaupai)

साथ ही साथ हर चौपाई के स्थान पर एक छोटा सा arrow है, जिसे क्लिक करने पर, वह चौपाई दिखाई देगी। 


सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ के लिए

इस पोस्ट में सुंदरकांड के दोहे और चौपाई अर्थसहित दिए गए है।

लेकिन यदि आपको सिर्फ सुंदरकांड पाठ करना है, तो उसके लिए अलग पेज दिया गया है, जिसमें –

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ के लिए सभी दोहे और चौपाइयां सिर्फ एक पेज में दी गयी है।

उस सुंदरकांड पाठ के पेज को देखने के लिए, निचे दी गयी लिंक को क्लिक करें –

सपूर्ण सुंदरकांड पाठ – एक पेज में


1. हनुमानजी लंका जाने के लिए चले

हनुमानजी वानरों को समझाते है

जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥

जामवंत के बचन सुहाए – जाम्बवान् के सुन्दर वचन

सुनि हनुमंत हृदय अति भाए – सुनकर हनुमान् जी के हृदय को बहुत ही भाए

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई – हनुमान् जी बोले- हे भाइयो! तुम लोग तब तक मेरी राह देखना

सहि दुख कंद मूल फल खाई – दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर

भावार्थः-
जाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर हनुमानजी को अपने मन में वे वचन बहुत अच्छे लगे॥
और हनुमानजी ने कहा की – हे भाइयो!
आप लोग कन्द, मूल व फल खा, दुःख सह कर तब तक मेरी राह देखना (जब तक मै सीताजी को देखकर लौट न आऊँ) ॥1॥


श्रीराम का कार्य करने पर, मन को, ख़ुशी मिलती है

जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥

जब लगि आवौं सीतहि देखी – जब तक मै सीताजी को देखकर लौट न आऊँ

होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी – काम अवश्य होगा, क्योकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा – यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा

चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा – हृदय मे श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमान जी हर्षित होकर चले

भावार्थः-
जब मै सीताजीको देखकर लौट आऊंगा,
तब कार्य सिद्ध होने पर मन को बड़ा हर्ष होगा॥
ऐसे कह, सबको नमस्कार करके,
रामचन्द्रजी का ह्रदय में ध्यान धरकर,
प्रसन्न होकर हनुमानजी लंका जाने के लिए चले॥2॥


हनुमानजी ने एक पहाड़ पर, भगवान् श्रीराम का स्मरण किया

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी।
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥3॥

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर – समुन्द्र के तीर पर एक सुन्दर पर्वत था

कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर – हनुमान् जी खेल से ही (अनायास ही, कौतुकी से) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और

बार बार रघुबीर सँभारी – बार-बार श्री रघुवीर का स्मरण करके

तरकेउ पवनतनय बल भारी – अत्यंत बलवान् हनुमान जी उस पर से बड़े वेग से उछले

भावार्थः-
समुद्र के तीर पर, एक सुन्दर पहाड़ था।
उसपर कूदकर हनुमानजी कौतुकी से चढ़ गए॥
फिर वारंवार रामचन्द्रजी का स्मरण करके,
बड़े पराक्रम के साथ हनुमानजी ने गर्जना की॥


हनुमानजी, श्रीराम के बाण जैसे तेज़ गति से, लंका की ओर जाते है

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता – जिस पर्वत पर हनुमान् जी पैर रखकर चले (जिस पर से वे उछले)

चलेउ सो गा पाताल तुरंता – वह तुरन्त ही पाताल मे धँस गया

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना – जैसे श्री रघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है,

एही भाँति चलेउ हनुमाना – उसी तरह हनुमान् जी चले

भावार्थः-
जिस पहाड़ पर हनुमानजी ने पाँव रखे थे,
वह पहाड़ तुरंत पाताल के अन्दर चला गया॥
और जैसे श्रीरामचंद्रजी का अमोघ बाण जाता है,
ऐसे हनुमानजी वहा से चले॥


समुद्र ने मैनाक पर्वत को हनुमानजी की सेवा के लिए भेजा

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥5॥

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी – समुन्द्र ने उन्हे श्री रघुनाथ जी का दूत समझकर

तैं मैनाक होहि श्रमहारी – मैनाक पर्वत से कहा कि है मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करने वाला हो (अर्थात् अपने ऊपर इन्हे विश्राम दे)

भावार्थः-
समुद्र ने हनुमानजी को श्रीराम का दूत जानकर मैनाक नाम पर्वत से कहा की –
हे मैनाक, तू जा, और इनको ठहरा कर श्रम मिटानेवाला हो॥


मैनाक पर्वत हनुमानजी से विश्राम करने के लिए कहता है

सिन्धुवचन सुनी कान, तुरत उठेउ मैनाक तब।
कपिकहँ कीन्ह प्रणाम, बार बार कर जोरिकै॥

भावार्थः-
समुद्रके वचन कानो में पड़तेही मैनाक पर्वत वहांसे तुरंत उठा,
और हनुमानजीके पास आकर, वारंवार हाथ जोड़कर, उसने हनुमानजीको प्रणाम किया॥


दोहा 1

प्रभु राम का कार्य पूरा किये बिना विश्राम नही

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥1॥

हनूमान तेहि परसा कर – हनुमान् जी ने उसे हाथ से छू दिया,

पुनि कीन्ह प्रनाम – फिर प्रणाम करके कहा – भाई!

राम काजु कीन्हें बिनु – श्री रामचन्द्र जी का काम किए बिना

मोहि कहाँ बिश्राम – मुझे विश्राम कहाँ?

भावार्थः-
हनुमानजी ने उसको अपने हाथसे छूकर, फिर उसको प्रणाम किया,
और कहा की – रामचन्द्रजीका का कार्य किये बिना मुझको विश्राम कहा है? ॥1॥


श्री राम, जय राम, जय जय राम


2. हनुमानजी की सुरसा से भेंट

देवताओं ने नागमाता सुरसा को भेजा

जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥1॥

जात पवनसुत देवन्ह देखा – देवताओ ने पवनपुत्र हनुमान् जी को जाते हुए देखा

जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा – उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिए (परीक्षार्थ)

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता – उन्होने सुरसा नामक सर्पो की माता को भेजा,

पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता – उसने आकर हनुमान् जी से यह बात कही

भावार्थः-
हनुमानजी को जाते देखकर उनके बल और बुद्धि के वैभव को जानने के लिए देवताओं ने नाग माता सुरसा को भेजा।
उस नागमाताने आकर हनुमानजी से यह बात कही॥


सुरसा ने हनुमानजी का रास्ता रोका

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥2॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा – आज देवताओ ने मुझे भोजन दिया है

सुनत बचन कह पवनकुमारा – यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान् जी ने कहा –

राम काजु करि फिरि मैं आवौं – श्री राम जी का कार्य करके मै लौट आऊँ और

सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं – सीताजी की खबर प्रभु को सुना दूँ

भावार्थः-
“आज तो मुझको, देवताओं ने यह अच्छा आहार दिया।
” यह बात सुन, हँस कर हनुमानजी बोले॥
“मैं रामचन्द्रजी का काम करके लौट आऊ और सीताजी की खबर रामचन्द्रजी को सुना दूं॥”


हनुमानजी ने सुरसा को समझाया कि वह उनको नहीं खा सकती

तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥3॥

तब तव बदन पैठिहउँ आई – तब मै आकर तुम्हारे मुँह मे घुस जाऊँगा (तुम मुझे खा लेना)

सत्य कहउँ मोहि जान दे माई – हे माता! मै सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना – जब किसी भी उपाय से उसने जाने नही दिया,

ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना – तब हनुमान् जी ने कहा – तू मुझको खा नही सकती

भावार्थः-
फिर हे माता! मै आकर आपके मुँह में, प्रवेश करूंगा।
अभी तू मुझे जाने दे। इसमें कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा।
मै तुझे सत्य कहता हूँ॥
जब सुरसा ने, किसी उपायसे उनको जाने नहीं दिया,
तब हनुमानजी ने कहा कि, तू क्यों देरी करती है? तू मुझको नही खा सकती॥


सुरसा ने कई योजन मुंह फैलाया, तो हनुमानजी ने भी शरीर फैलाया

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥4॥

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा – उसने योजनभर (चार कोस मे) मुँह फैलाया

कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा – तब हनुमान् जी ने अपने शरीर को उससे दूना बढ़ा लिया

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ – उसने सोलह योजन का मुख किया,

तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ – हनुमान् जी तुरन्त ही बत्तीस योजन के हो गए

भावार्थः-
सुरसाने अपना मुंह, एक योजनभरमें फैलाया।
हनुमानजी ने अपना शरीर, दो योजन विस्तारवाला किया॥
सुरसा ने अपना मुँह, सोलह (१६) योजनमें फैलाया।
हनुमानजीने अपना शरीर तुरंत, बत्तीस (३२) योजन बड़ा किया॥


सुरसा ने मुंह सौ योजन फैलाया, तो हनुमानजी ने छोटा सा रूप धारण किया

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥5॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा – जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी,

तासु दून कपि रूप देखावा – हनुमान् जी उसका दूना रूप दिखलाते थे

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा – उसने सौ योजन (चार सो कोस) का मुख किया

अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा – तब हनुमान् जी ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया

भावार्थः-
सुरसा ने जैसा जैसा मुंह फैलाया,
हनुमानजी ने वैसे ही अपना स्वरुप, उससे दुगना दिखाया॥
जब सुरसा ने अपना मुंह, सौ योजन (चार सौ कोस का) में फैलाया,
तब हनुमानजी तुरंत बहुत छोटा स्वरुप धारण कर लिया॥


सुरसा को हनुमानजी की शक्ति का पता चला

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥6॥

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा – और उसके मुख मे घुसकर (तुरन्त) फिर बाहर निकल आए और

मागा बिदा ताहि सिरु नावा – उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा – (उसने कहा –) मैने तुम्हारे बुद्धि-बल का भेद पा लिया,

बुधि बल मरमु तोर मै पावा – जिसके लिए देवताओ ने मुझे भेजा था

भावार्थः-
छोटा स्वरुप धारण कर हनुमानजी,
सुरसाके मुंहमें पैठ कर (घुसकर) झट बाहर चले आए।
फिर सुरसा से विदा मांग कर हनुमानजी ने प्रणाम किया॥
उस वक़्त सुरसा ने हनुमानजी से कहा की –
हे हनुमान! देवताओंने मुझको जिसके लिए भेजा था,
वह तेरा बल और बुद्धि का भेद, मैंने अच्छी तरह पा लिया है॥


दोहा 2

सुरसा, हनुमानजी को प्रणाम करके, चली जाती है

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥2॥

राम काजु सबु करिहहु – तुम श्री रामचन्द्र जी का सब कार्य करोगे

तुम्ह बल बुद्धि निधान – क्योकि तुम बल-बुद्धि के भंडार हो

आसिष देह गई – यह आशीर्वाद देकर वह चली गई

सो हरषि चलेउ हनुमान – तब हनुमान् जी हर्षित होकर चले

भावार्थः-
तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो,
सो श्रीरामचंद्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे।
ऐसे आशीर्वाद देकर, सुरसा तो अपने घर को चली,
और हनुमानजी प्रसन्न होकर, लंकाकी ओर चले ॥2॥


श्री राम, जय राम, जय जय राम


3. हनुमानजी, लंका की ओर चले

समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥1॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई – समुन्द्र मे एक राक्षसी रहती थी

करि माया नभु के खग गहई – वह माया करके आकाश मे उड़ते हुए पक्षियो को पकड़ लेती थी

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं – आकाश मे जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे,

जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं – वह जल मे उनकी परछाई देखकर

भावार्थः-
समुद्र के अन्दर एक राक्षस रहता था।
सो वह माया करके आकाशचारी पक्षी और जंतुओको पकड़ लिया करता था॥
जो जीवजन्तु आकाश में उड़कर जाता,
उसकी परछाई जल में देखकर परछाई को जल में पकड़ लेता॥


हनुमानजी ने मायावी राक्षस के छल को पहचाना

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥2

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई – उस परछाई को पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नही सकते थे (और जल मे गिर पड़ते थे)

एहि बिधि सदा गगनचर खाई – इस प्रकार वह सदा आकाश मे उड़ने वाले जीवो को खाया करती थी

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा – उसने वही छल हनुमान् जी से भी किया

तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा – हनुमान् जी ने तुरन्त ही उसका कपट पहचान लिया

भावार्थः-
परछाई को जल में पकड़ लेता, जिससे वह जिव जंतु फिर वहा से सरक नहीं सकता।
इस तरह वह हमेशा, आकाशचारी जिवजन्तुओ को खाया करता था॥
उसने वही कपट हनुमानसे किया।
हनुमान ने उसका वह छल, तुरंत पहचान लिया॥


हनुमानजी समुद्र के पार पहुंचे

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥3॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा – पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्री हनुमान् जी उसको मारकर

बारिधि पार गयउ मतिधीरा – समुन्द्र के पार गए

तहाँ जाइ देखी बन सोभा – वहाँ जाकर उन्होने वन की शोभा देखी

गुंजत चंचरीक मधु लोभा – मधु (पुष्प रस) के लोभ से भौरे गुंजार कर रहे थे

भावार्थः-
धीर बुद्धिवाले पवनपुत्र वीर हनुमानजी उसे मारकर समुद्र के पार उतर गए॥
वहा जाकर हनुमानजी वन की शोभा देखते है कि भ्रमर मकरंद के लोभसे गुँजाहट कर रहे है॥


लंका का वर्णन

हनुमानजी लंका पहुंचे

नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥4॥

नाना तरु फल फूल सुहाए – अनेको प्रकार के वृक्ष फल-फूल से शोभित है

खग मृग बृंद देखि मन भाए – पक्षी और पशुओ के समूह को देखकर तो वे मन मे (बहुत ही) प्रसन्न हुए

सैल बिसाल देखि एक आगें – सामने एक विशाल पर्वत देखकर

ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें – हनुमान् जी भय त्यागकर उस पर दौड़कर जा चढ़े

भावार्थः-
अनेक प्रकार के वृक्ष, फल और फूलोसे शोभायमान हो रहे है।
पक्षी और हिरणोंका झुंड देखकर, मन मोहित हुआ जाता है॥
वहा सामने हनुमानजी एक बड़ा विशाल पर्वत देखकर, निर्भय होकर उस पहाड़पर कूदकर चढ़ बैठे॥


भगवान् शंकर पार्वतीजी को श्रीराम की महिमा बताते है

उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥5॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई – (शिवजी कहते है) हे उमा! इसमे वानर हनुमान् की कुछ बड़ाई नहीं है

प्रभु प्रताप जो कालहि खाई – यह प्रभु का प्रताप है, जो काल को भी खा जाता है

गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी – पर्वत पर चढ़कर उन्होने लंका देखी

कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी – वह ऐसी बड़ी दुर्गम है, कुछ कहा नही जाता

भावार्थः-
महदेव जी कहते है कि
हे पार्वती! इसमें हनुमान की कुछ भी अधिकता नहीं है।
यह तो केवल रामचन्द्रजीके ही प्रताप का प्रभाव है कि, जो काल को भी खा जाता है॥
पर्वत पर चढ़कर हनुमानजी ने लंका को देखा, तो वह ऐसी बड़ी दुर्गम है की, जिसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता॥


लंका नगरी और उसके सुवर्ण कोट का वर्णन

अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥6॥

अति उतंग जलनिधि चहु पासा – वह अत्यंत ऊँचा है, उसके चारो ओर समुन्द्र है

कनक कोट कर परम प्रकासा – सोने के परकोटे (चहार दीवारी) का परम प्रकाश हो रहा है

भावार्थः-
पहले तो वह पुरी बहुत ऊँची, फिर उसके चारो ओर समुद्र की खाई।
उसपर भी सुवर्णके कोटका महाप्रकाश कि जिससे नेत्र चकाचौंध हो जावे॥


छन्द 1

लंका नगरी और उसके महाबली राक्षसों का वर्णन

कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना – विचित्र मणियो से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है, उसके अंदर बहुत से सुन्दर-सुन्दर घर है

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना – चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ है, सुन्दर नगर बहुत प्रकार से सजा हुआ है

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै – हाथी, घोड़े, खच्चरो के समूह तथा पैदल और रथो के समूहो को कौन गिन सकता है!

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै – अनेक रूपो के राक्षसो के दल है, उनकी अत्यंत बलवती सेना वर्णन करते नही बनती

भावार्थः-
उस नगरीका रत्नों से जड़ा हुआ, सुवर्ण का कोट, अतिव सुन्दर बना हुआ है।
चौहटे, दुकाने व सुन्दर गलियों के बहार, उस सुन्दर नगरी के अन्दर बनी है॥
जहा हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल व रथोकी गिनती कोई नहीं कर सकता।
और जहा महाबली, अद्भुत रूपवाले राक्षसोके सेनाके झुंड इतने है कि जिसका वर्णन किया नहीं जा सकता॥


छन्द 2

लंका के बाग-बगीचों का वर्णन

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं – वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित है

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं – मनुष्य, नाग, देवताओ और गंधर्वो की कन्याएँ अपने सौंदर्य से मुनियो के भी मन को मोहे लेती है

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं – कही पर्वत के समान विशाल शरीर वाले बड़े ही बलवान् मल्ल (पहलवान्) गरज रहे है

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं – वे अनेको अखाड़ो मे बहुत प्रकार से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते है

भावार्थः-
जहा वन, बाग़, बागीचे, बावडिया, तालाब, कुएँ, बावलिया शोभायमान हो रही है।
जहां मनुष्यकन्या, नागकन्या, देवकन्या और गन्धर्वकन्याये विराजमान हो रही है – जिनका रूप देखकर, मुनिलोगोका मन मोहित हुआ जाता है॥
कही पर्वत के समान बड़े विशाल देहवाले महाबलिष्ट, मल्ल गर्जना करते है
और अनेक अखाड़ों में अनेक प्रकारसे भिड रहे है और एक एकको आपस में पटक पटक कर गर्जना कर रहे है॥


छन्द 3

लंका के राक्षसों का बुरा आचरण

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं – भयंकर शरीर वाले करोड़ो योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानी से) नगर की चारो दिशाओ मे (सब ओर से) रखवाली करते है

कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं – कहीं दुष्ट राक्षस भैसो, मनुष्यो, गायो, गदहो और बकरो को खा रहे है

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही – तुलसीदास ने इनकी कथा इसीलिए कुछ थोड़ी सी कही है कि

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही – वे निश्चय ही श्री रामचन्द्रजी के बाण रूपी तीर्थ मे शरीरो को त्यागकर परमगति पावेगे

भावार्थः-
जहां कही विकट शरीर वाले करोडो भट, चारो तरफसे नगरकी रक्षा करते है
और कही वे राक्षस लोग, भैंसे, मनुष्य, गौ, गधे, बकरे और पक्षीयोंको खा रहे है॥
राक्षस लोगो का आचरण बहुत बुरा है।
इसीलिए तुलसीदासजी कहते है कि मैंने इनकी कथा बहुत संक्षेपसे कही है।
ये महादुष्ट है, परन्तु, रामचन्द्रजीके बानरूप पवित्र तीर्थनदीके अन्दर, अपना शरीर त्यागकर, गति अर्थात मोक्षको प्राप्त होंगे॥


दोहा 3

हनुमानजी छोटा सा रूप धरकर लंका में प्रवेश करने का सोचते है

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार ॥3॥

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार – नगर के बहुसंख्यक रखवालो को देखकर हनुमान् जी ने मन विचार किया कि

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार – अत्यंत छोटा रूप धरूँ और रात के समय नगर मे प्रवेश कँरू

भावार्थः-
हनुमानजी ने बहुत से रखवालो को देखकर, मन में विचार किया की, मै छोटा रूप धारण करके नगर में प्रवेश करूँ ॥3॥


श्री राम, जय राम, जय जय राम


4. हनुमानजी की लंकिनी से भेंट

हनुमानजी राम नामका स्मरण करते हुए लंका में प्रवेश करते है

मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥1॥

मसक समान रूप कपि धरी – हनुमान् जी मच्छर के समान (छोटा सा) रूप धारण कर

लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी – नर रूप से लीला करने वाले भगवान् श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके लंका को चले

नाम लंकिनी एक निसिचरी – लंका के द्वार पर लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी

सो कह चलेसि मोहि निंदरी – वह बोली – मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है ?

भावार्थः-
हनुमानजी, मच्छर के समान, छोटा-सा रूप धारण कर,
प्रभु श्री रामचन्द्रजी के नाम का सुमिरन करते हुए, लंका में प्रवेश करते है॥

लंकिनी, हनुमानजी का रास्ता रोकती है

लंका के द्वार पर, हनुमानजी की भेंट, लंकिनी नाम की एक राक्षसी से होती है॥
वह पूछती है कि, मेरा निरादर करके कहा जा रहे हो?


हनुमानजी लंकिनी को घूँसा मारते है

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥2॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा – हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नही जाना

मोर अहार जहाँ लगि चोरा – जहाँ तक (जितने) चोर है, वे सब मेरे आहार है

मुठिका एक महा कपि हनी – महाकपि हनुमान् जी ने उसे एक घूँसा मारा,

रुधिर बमत धरनीं ढनमनी – जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर लुढक पड़ी

भावार्थः-
तूने मेरा भेद नहीं जाना?
जहाँ तक चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं।
महाकपि हनुमानजी उसे एक घूँसा मारते है, जिससे वह पृथ्वी पर लुढक पड़ती है।


लंकिनी हनुमानजी को प्रणाम करती है

पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥3॥

पुनि संभारि उठि सो लंका – वह लंकिनी फिर अपने को संभालकर उठी और

जोरि पानि कर बिनय संसका – डर के मार हाथ जोड़कर विनती करने लगी

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा – वह बोली – रावण को जब ब्रह्माजी ने वर दिया था,

चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा – तब चलते समय उन्होने मुझे राक्षसो के विनाश की यह पहचान बता दी थी कि

भावार्थः-
वह राक्षसी लंकिनी, अपने को सँभालकर फिर उठती है।
और डर के मारे हाथ जोड़कर, हनुमानजी से कहती है॥

लंकिनी, हनुमानजी को, ब्रह्माजी के वरदान के बारे में बताती है

जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था,
तब चलते समय उन्होंने राक्षसों के विनाश की यह पहचान मुझे बता दी थी कि॥


ब्रह्माजी के वरदान में राक्षसों के संहार का संकेत

बिकल होसि तैं कपि कें मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥4॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे – जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाए,

तब जानेसु निसिचर संघारे – तब तू राक्षसो का संहार हुआ जान लेना

तात मोर अति पुन्य बहूता – है तात! मेरे बड़े पुण्य है,

देखेउँ नयन राम कर दूता – जो मै श्री रामचंद्रजी के दूत (आप) को नेत्रो से देख पाई

भावार्थः-
जब तू बंदर के मारने से, व्याकुल हो जाए, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना।

हनुमानजी के दर्शन होने के कारण, लंकिनी खुदको भाग्यशाली समझती है

हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्री रामजी के दूत को अपनी आँखों से देख पाई।


दोहा 4

थोड़े समय का सत्संग – स्वर्ग के सुख से बढ़कर है

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥4॥

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग – हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखो को तराजू के एक पलड़े मे रखा जाए,

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग – तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नही हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है

भावार्थः-
हे तात!, स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को, तराजू के एक पलड़े में रखा जाए,
तो भी, वे सब मिलकर, उस सुख के बराबर नहीं हो सकते,
जो क्षण मात्र के सत्संग से होता है ॥4॥


श्री राम, जय राम, जय जय राम


प्रभु श्रीराम को निरंतर स्मरण करने के फायदे

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥1॥

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा – नगर मे प्रवेश करके सब काम कीजिए,

हृदयँ राखि कौसलपुर राजा – अयोध्यापुरी के राजा श्री रधुनाथ जी को हृदय मे रखे हुए

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई – उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते है,

गोपद सिंधु अनल सितलाई – समुन्द्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि मे शीतलता आ जाती है

भावार्थः-
अयोध्यापुरी के राजा रघुनाथ को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए।
उसके लिए, अर्थात, जिसके मन में श्री राम का स्मरण रहता है,
विष अमृत हो जाता है,
शत्रु मित्रता करने लगते हैं,
समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।


हनुमानजी, छोटा सा रूप धरकर, लंका में प्रवेश करते है

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥2॥

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही – और हे गरूड़जी! सुमेरू पर्वत उसके लिए रज के समान हो जाता है,

राम कृपा करि चितवा जाही – जिसे श्री रामचन्द्रजी ने एक बार कृपा करके देख लिया

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना – तब हनुमान् जी ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और

पैठा नगर सुमिरि भगवाना – भगवान् का स्मरण करके नगर मे प्रवेश किया

भावार्थः-
और हे गरुड़! जिसे राम ने एक बार कृपा करके देख लिया, उसके लिए सुमेरु पर्वत रज के समान हो जाता है।
तब हनुमानजी ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया,
और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।


हनुमानजी, रावण के महल तक पहुंचे

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥3॥

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा – उन्होने एक-एक (प्रत्येक) महल की खोज की

देखे जहँ तहँ अगनित जोधा – जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे

गयउ दसानन मंदिर माहीं – फिर वे रावण के महल मे गए

अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं – वह अत्यंत विचित्र था, जिसका वर्णन नही हो सकता

भावार्थः-
उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महल की खोज की। जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे।
फिर वे रावण के महल में गए।
वह अत्यंत विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता।


हनुमानजी, सीताजी की खोज करते करते, विभीषण के महल तक पहुंचे

सयन किएँ देखा कपि तेही।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥4॥

सयन किए देखा कपि तेही – हनुमान् जी ने उस (रावण) को शयन किए देखा,

मंदिर महुँ न दीखि बैदेही – परन्तु महल मे जानकीजी नही दिखाई दी

भवन एक पुनि दीख सुहावा – फिर एक सुन्दर महल दिखाई दिया

हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा – वहाँ (उसमे) भगवान् का एक अलग मन्दिर बना हुआ था

भावार्थः-
हनुमानजी ने, महल में रावण को सोया हुआ देखा।
वहां भी हनुमानजी ने सीताजी की खोज की,
परन्तु सीताजी उस महल में कही भी दिखाई नहीं दीं।
फिर उन्हें एक सुंदर भवन दिखाई दिया।
उस महल में भगवान का एक मंदिर बना हुआ था।


दोहा

विभीषण के महल का वर्णन – श्रीराम के चिन्ह और तुलसी के पौधे

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई ॥5॥

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ – वह महल श्री राम जी के आयुध (धनुष-बाण) के चिन्हो से अंकित थे, उसकी शोभा वर्णन नही की जा सकती

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ – वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहो को देखकर कपिराज श्री हनुमान् जी हर्षित हुए

भावार्थः-
वह महल श्री राम के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था,
उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती।
वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर कपिराज हनुमान हर्षित हुए॥ 5॥


श्री राम, जय राम, जय जय राम


6. हनुमानजी की विभीषण से भेंट

राक्षसों की नगरी में, सत-पुरुष को देखकर, हनुमानजी को आश्चर्य हुआ

लंका निसिचर निकर निवासा।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषनु जागा॥1॥

लंका निसिचर निकर निवासा – लंका तो राक्षसो के समूह का निवास स्थान है

इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा – यहाँ सज्जन (साधु पुरूष) का निवास कहाँ?

मन महुँ तरक करै कपि लागा – हनुमान् जी मन मे इस प्रकार तर्क करने लगे

तेहीं समय बिभीषनु जागा – उसी समय विभीषण जी जागे

भावार्थः-
और उन्हीने सोचा की यह लंका नगरी तो राक्षसोंके कुलकी निवासभूमी है।
यहाँ सत्पुरुषो के रहने का क्या काम॥
इस तरह हनुमानजी मन ही मन में विचार करने लगे।
इतने में विभीषण की आँख खुली॥


हनुमानजी, विभीषण को, राम नाम का जप करते देखते है

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा – उन्होने (विभीषण ने) राम नाम का स्मरण (उच्चारण) किया

हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा – हनुमान् जी ने उन्हे सज्जन जाना और हृदय मे हर्षित हुए

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी – (हनुमान् जी ने विचार किया कि) इनसे हठ करके (अपनी ओर से ही) परिचय करूँगा,

साधु ते होइ न कारज हानी – क्योकि साधू से कार्य की हानि नही होती, प्रस्तुत लाभ ही होता है

भावार्थः-
और जागते ही उन्होंने – राम! राम! – ऐसा स्मरण किया,
तो हनुमानजीने जाना की यह कोई सत्पुरुष है।
इस बात से हनुमानजीको बड़ा आनंद हुआ॥

सत्पुरुषों से क्यों पहचान करनी चाहिये?

हनुमानजीने विचार किया कि इनसे जरूर पहचान करनी चहिये,
क्योंकि सत्पुरुषोके हाथ कभी कार्यकी हानि नहीं होती॥


हनुमानजी ब्राह्मण का रूप धारण करते है

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥3॥

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए – ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान् जी ने उन्हे वचन सुनाए

सुनत बिभीषण उठि तहँ आए – सुनते ही विभीषण जी उठकर वहाँ आए

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई – प्रणाम करके कुशल पूछी

बिप्र कहहु निज कथा बुझाई – और कहा कि, हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिए

भावार्थः-
फिर हनुमानजीने ब्राम्हणका रूप धरकर वचन सुनाया,
तो वह वचन सुनतेही विभीषण उठकर उनके पास आया॥
और प्रणाम करके कुशल पूँछा कि,
हे विप्र (ब्राह्मणदेव)!, जो आपकी बात हो सो हमें समझाकर कहो॥


विभीषण हनुमानजी से उनके बारे में पूछते है

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी॥4॥

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई – क्या आप हरिभक्तो मे से कोई है?

मोरें हृदय प्रीति अति होई – क्योकि आपको देखकर मेरे हृदय मे अत्यंत प्रेम उमड़ रहा है

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी – अथवा क्या आप दीनो से प्रेम करने वाले स्वयं श्री राम जी ही है

आयहु मोहि करन बड़भागी – जो मुझे बड़भागी बनाने, घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने आए है ?

भावार्थः-
विभीषणने कहा कि, शायद आप कोई भगवन्तोमेंसे तो नहीं हो!
क्योंकि मेरे मनमें आपकी ओर बहुत प्रीती बढती जाती है॥
अथवा मुझको बडभागी करने के वास्ते,
भक्तोपर अनुराग रखनेवाले आप साक्षात दिनबन्धु ही तो नहीं पधार गए हो॥


दोहा 6

हनुमानजी विभीषण को श्री राम कथा सुनाते है

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥6॥

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम – तब हनुमान् जी ने श्री रामचंद्रजी की सारी कथा कहकर अपना नाम बताया

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम – सुनते ही दोनो के शरीर पुलकित हो गए और श्री राम जी के गुण समूहो का स्मरण करके दोनो के मन (प्रेम और आनन्द) मग्न हो गए

भावार्थः-
विभिषणके ये वचन सुनकर हनुमानजीने रामचन्द्रजीकी सब कथा विभीषणसे कही, और अपना नाम बताया।

प्रभु राम के नाम स्मरण से, दोनों के मन आनंदित हो जाते है

परस्परकी बाते सुनतेही दोनोंके शरीर रोमांचित हो गए
और श्री रामचन्द्रजीका स्मरण आ जानेसे दोनों आनंदमग्न हो गए ॥6॥


श्री राम, जय राम, जय जय राम




Next.. (आगे पढें ..) – Sunderkand – 02

सुंदरकांड का अगला पेज, सुंदरकांड – ०२ पढ़ने के लिए क्लिक करें >>

सुंदरकांड – 02