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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में से श्री केदारनाथ का ज्योतिर्लिंग हिमाच्छादित प्रदेश का एक दिव्य ज्योतिर्लिंग है। पुराणों एवं शास्त्रोंमें श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमाका वर्णन बारम्बार किया गया है।

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के इस लेख में

  • श्री केदारनाथ की कथा – पांडवों को शिवजी के दर्शन,
  • नर और नारायण की तपस्या और उनको भगवान् शिव के दर्शन,
  • श्री केदारनाथ शिवलिंग का त्रिकोणीय आकार
  • केदारनाथ यात्रा का संक्षिप्त विवरण
  • श्री केदारनाथ की महिमा
  • आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ महिमा का वर्णन

यह ज्योतिर्लिंग पर्वतराज हिमालयकी केदार नामक चोटीपर स्थित है। यहाँकी प्राकृतिक शोभा देखते ही बनती है। इस चोटीके पश्चिम भागमें पुण्यमती मन्दाकिनी नदीके तटपर स्थित केदारेश्वर महादेवका मन्दिर अपने स्वरूपसे ही हमें धर्म और अध्यात्मकी ओर बढ़नेका सन्देश देता है।


हिमालय की देवभूमि में केदारनाथ

हिमालय की देवभूमि में बसे इस देवस्थान के दर्शन केवल छह माह के काल में ही होते हैं। वैशाख से लेकर अश्विन महीने तक के कालावधि में इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा लोग कर सकते हैं।

वर्ष के अन्य महीनों में कड़ी सर्दी होने से हिमालय पर्वत का प्रदेश बर्फ से ढका रहने के कारण श्रीकेदारनाथ का मंदिर भक्तों के लिए बंद रहता है।

कार्तिक महीने में बर्फ वृष्टि तेज होने पर इस मंदिर में घी का नंदा दीप जलाकर श्री केदारेश्वर का भोग सिंहासन बाहर लाया जाता है। और मंदिर के द्वार बंद किए जाते हैं।

कार्तिक से चैत्र तक श्री केदारेश्वर जी का निवास नीचे जोशीमठ में रहता है। वैशाख में जब बर्फ पिघल जाती है तब केदारधाम फिर से खोल दिया जाता है।


हरिद्वार से केदारनाथ तक यात्रा

हरिद्वार को मोक्षदायिनी मायापुरी मानते हैं। हरिद्वार के आगे ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, सोनप्रयाग और त्रियुगी नारायण, गौरीकुंड इस मार्ग से केदारनाथ जा सकते हैं। कुछ प्रवास मोटर से और कुछ पैदल से करना पड़ता है।

हिमालय का यह रास्ता काफी कठिन होता है। परंतु अटल श्रद्धा के कारण यह कठिन रास्ता भक्त यात्री पार करते हैं। श्रद्धा के बल पर इस प्रकार संकटों पर मात की जाती है।

चढान का मार्ग कुछ लोग घोड़े पर बैठकर, टोकरी में बैठ कर या झोली की सहायता से पार करते हैं। इस तरह का प्रबंध वहां किया जाता है।

विश्राम के लिए बीच-बीच में धर्मशालाएं, मठ तथा आश्रम खोले गए हैं। यात्री गौरीकुंड स्थान पर पहुंचने के बाद वहां के गर्म कुंड के पानी से स्नान करते हैं और मस्तकहीन गणेश जी के दर्शन करते हैं।


गौरीकुंड – श्री गणेशजी

गौरीकुंड का स्थान गणेश जी का जन्म स्थान माना गया है।

इस स्थान पर पार्वती पुत्र गणेश जी को शंकर जी ने त्रिशूल के प्रहार से मस्तकहीन बनाया था, और बाद में गजमुख लगा कर जिंदा किया था।


केदारनाथ का शिवलिंग

गौरीकुंड से दो चार कोस की दूरी पर ऊंची हिम शिखरों के परिसर में, मंदाकिनी नदी की घाटी में भगवान शंकर जी का दिव्य ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ का मंदिर दिखाई देता है। यही कैलाश है, जो भगवान शंकर जी का आद्य निवास स्थान है।

लेकिन यहां शंकर जी की मूर्ति और लिंग भी नहीं है। केवल एक त्रिकोण के आकार का ऊंचाई वाला स्थान है। कहते हैं वह महेश का, भैंसे का, पृष्ठ भाग है।


केदारनाथ की कथा – पांडवो को भगवान् शिव के दर्शन

इस ज्योतिर्लिंग का जो इस तरह का आकार बना है, उसकी अनोखी कथा इस प्रकार है –

कौरव और पांडव के युद्ध में अपने ही लोगों की हत्या हुई थी। इसलिए मोक्ष पाने के लिए पांडव तीर्थ स्थान काशी पहुंचे। परंतु भगवान शंकर जी उस समय हिमालय की कैलाश पर गए हुए हैं, यह समाचार मिला।

पांडव काशी से निकले और हरिद्वार होकर हिमालय की गोद में पहुंची। दूर से ही उन्हें भगवान शंकर जी के दर्शन हुए। लेकिन पांडव को देखकर शंकर भगवान लुप्त हो गए।

यह देखकर धर्मराज ने कहा –
हे देव, हम पापियों को देखकर आप लुप्त हो गए। ठीक है, हम आपको ढूंढ निकालेंगे। आपके दर्शन से हमारे सारे पाप धुल जाने वाले हैं। जहां आप लुप्त हुए हैं, वह स्थान अब गुप्तकाशी के रूप में पवित्र तीर्थ बनेगा।

गुप्तकाशी, रुद्रप्रयाग से पांडव आगे निकलकर हिमालय के कैलाश, गौरीकुंड के प्रदेश में घूमते रहे। शंकर भगवान को ढूंढते रहे।

इतने में नकुल और सहदेव को एक भैंसा दिखाई दिया। उसका अनोखा रूप देखकर धर्मराज ने कहा, भगवान शंकर जी ने ही यह भैंसे का अवतार धारण किया है। वह हमें परख रहे हैं।

फिर क्या। गदाधारी भीम उस भैंसे के पीछे लगे। भैंसा उछल पड़ा और भीम के हाथ नहीं आया। आखिर भीम थक गया। फिर भी भीम ने गदा प्रहार से भैंसे को घायल किया।

फिर वह भैंसा एक दर्रे के पास जमीन में मुंह दबा कर बैठ गया। भीम ने उसकी पूंछ पकड़कर खींचा। भैंसे का मुँह इस खिंचाव से सीधे नेपाल में जा पहुंचा। भैंसे का पार्श्व भाग केदार धाम में ही रहा। नेपाल में वह पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाने लगा।

महेश के उस पार्श्व भाग से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। दिव्य ज्योति में से शंकर भगवान प्रकट हुए। पांडवों को उन्होंने दर्शन दिए। शंकर भगवान के दर्शन से पांडवों के पाप नष्ट हो गए।

भगवान शंकर जी ने पांडव से कहा – मैं अभी यहां इसी त्रिकोण आकार में ज्योतिर्लिंग के रूप में हमेशा के लिए रहूंगा। केदारनाथ के दर्शन से भक्तगण पावन होंगे।

महेशरूप लिए हुए शिवजी को भीम ने गदा का प्रहार किया था। इसलिए भीम को बहुत पछतावा हुआ, बुरा लगा। वह महेश का शरीर घी से मलने लगा। उस बात की यादगार के रूप में आज भी उस त्रिकोण आकार दिव्य ज्योतिर्लिंग केदारनाथ को घी से मलते हैं। इस स्थान पर शंकर भगवान की इसी तरह से पूजा की जाती है।


केदारनाथ कथा – नर और नारायण की तपस्या

इस अतीव पवित्र पुण्यफलदायी ज्योतिर्लिक्की स्थापनाके विषयमें पुराणोंमें यह कथा दी गयी है –

अतिशय पवित्र, तपस्वियों, ऋषियों और देवताओंकी निवास-भूमि हिमालयके केदार नामक अत्यन्त शोभाशाली शिखरपर महातपस्वी श्रीनर और नारायणने बहुत वर्षों तक भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये बड़ी कठिन तपस्या की।

कई वर्षोंतक वे निराहार रहकर शिवनामका जप करते रहे।

इस तपस्यासे सारे लोकोंमें उनकी चर्चा होने लगी। देवता, ऋषि-मुनि, यक्ष, गन्धर्व सभी उनकी साधना और संयमकी प्रशंसा करने लगे। चराचरके पितामह ब्रह्माजी और सबका पालन-पोषण करनेवाले भगवान् विष्णु भी महातपस्वी नर-नारायणके तपकी प्रशंसा करने लगे।

अन्तमें भगवान् शंकरजी भी उनकी उस कठिन साधनासे प्रसत्र हो उठे। उन्होंने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन दोनों ऋषियोंको दर्शन दिया। नर और नारायणने भगवान् भोलेनाथके दर्शनसे भाव-विह्वल और आनन्द-विभोर होकर बहुत प्रकारकी पवित्र स्तुतियों और मन्त्रोंसे उनकी पूजा-अर्चना की।

भगवान् शिवजीने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा।

भगवान् शिवकी यह बात सुनकर उन दोनों ऋषियोंने उनसे कहा –
देवाधिदेव महादेव! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो भक्तोंके कल्याणहेतु आप सदा-सर्वदाके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी कृपा करें। आपके यहाँ निवास करनेसे यह स्थान सभी प्रकारसे अत्यन्त पवित्र हो उठेगा। यहाँ आकर आपका दर्शन-पूजन करनेवाले मनुष्योंको आपकी अविनाशिनी भक्ति प्राप्त हुआ करेगी। प्रभो! आप मनुष्योंके कल्याण और उनके उद्धारके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी हमारी प्रार्थना अवश्य ही स्वीकार करें।

उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शिवने ज्योतिर्लिंग के रूपमें वहाँ वास करना स्वीकार किया। केदार नामक हिमालय-शिखर पर स्थित होनेके कारण इस ज्योतिर्लिंग को श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूपमें जाना जाता है।

भगवान् शिवसे वर माँगते हुए नर और नारायणने इस ज्योतिर्लिङ्ग और इस पवित्र स्थानके विषयमें जो कुछ कहा है, वह अक्षरश: सत्य है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन तथा यहाँ स्नान करनेसे भक्तोंको लौकिक फलोंकी प्राप्ति होनेके साथ-साथ अचल शिवभक्ति तथा मोक्षकी प्राप्ति भी हो जाती है।


केदारनाथ में पांडवों की स्मृतियाँ

केदारनाथ के परिसर में पांडवों की कई स्मृतियां जागृत रही है। राजा पांडु इसी वन में माद्री के साथ विहार करते समय मर गए थे। वह स्थान पांडुकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। वहां आदिवासी लोग पांडव नृत्य प्रस्तुत करते रहते हैं।

जिस स्थान से पांडव स्वर्ग सिधारे ऊंची चोटी को स्वर्ग रोहिणी कहते हैं। धर्मराज जब स्वर्ग सिधार रहे थे, तब उनका एक अंगूठा निकल कर जमीन पर पड़ा था। उस स्थान पर धर्मराज ने अंगुष्ठमात्र शिवलिंग की स्थापना की।


केदारनाथ की महिमा

केदारेश्वर के दर्शन से स्वप्न में भी दुख प्राप्त नहीं होता। शंकर केदारेश्वर का पूजन कर पांडव का सब दुख जाता रहा।

बद्रीकेश्वर का दर्शन पूजन आवागमन के बंधन से मुक्ति दिलाता है। केदारेश्वर में दान करके शिवजी के समीप जाकर उनके रूप हो जाते हैं।

मुख्य केदारनाथ मंदिर के परिसर में अनेक पवित्र स्थान हैं। मंदिर के पिछवाड़े में आदि शंकराचार्य जी की समाधि है। दूर की ऊंचाई पर भृगुपतन नाम की एक कठिन कगार है।

मंदिर की आठ दिशाओं में अष्टतीर्थ हैं।

तात्पर्य है कि श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए अति कठिन और दुर्गम मार्ग से होकर जाना पड़ता है। लेकिन इरादे बुलंद हो और मन में श्रद्धा हो तो चलते समय थकान बिल्कुल नहीं आती। सबकी जुबान पर एक ही घोष रहता है – जय केदारनाथ, जय केदारनाथ।


आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ का वर्णन

आदि शंकराचार्यजी ने कहा है –

महाद्रिपार्श्वेच तटे रमन्तं,
सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै:,
केदारमीशं शिवमेकमीडे॥

अर्थात महान हिमालय के प्रदेश में रम जाने वाले, ऋषि मुनियों द्वारा और सुर, असुर, यक्ष तथा महानाग आदि के द्वारा जिन की निरंतर पूजा होती आई है, ऐसे श्री केदारेश्वर महादेव जी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
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श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे
तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं
नमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥
जय मल्लिकार्जुन, जय मल्लिकार्जुन॥

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – द्वितीय ज्योतिर्लिंग

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – द्वितीय ज्योतिर्लिंग

  • शिवपुराण के अनुसार,
  • श्रीमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग,
  • 12 ज्योतिर्लिंगों में से द्वितीय ज्योतिर्लिंग है।
  • मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग,
  • आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में,
  • कृष्णा नदी के तट पर,
  • श्री शैल पर्वत पर स्थित हैं।
  • इसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं।
  • प्राचीन समय में इसी प्रदेश में,
  • भगवान श्रीशंकर आते थे।
  • इसी स्थान पर उन्हानें,
  • दिव्य ज्योतिर्लिग के रूप में,
  • स्थायी निवास किया।
  • इस स्थान को,
  • कैलाश निवास कहते हैं।
Mallikarjuna Jyotirling Temple

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा – 1

  • शिव पार्वती के पुत्र,
  • स्वामी कार्तिकेय और गणेश,
  • दोनों भाई विवाह के लिए,
  • आपस में कलह करने लगे।
  • कार्तिकेय का कहना था कि वे बड़े हैं,
  • इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए,
  • किन्तु श्री गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे।
  • इस झगड़े पर फैसला देने के लिए,
  • दोनों अपने माता-पिता,
  • भवानी और शंकर के पास पहुँचे।
  • उनके माता-पिता ने कहा कि,
  • तुम दोनों में जो कोई,
  • इस पृथ्वी की परिक्रमा करके,
  • पहले यहाँ आ जाएगा,
  • उसी का विवाह पहले होगा।
  • शर्त सुनते ही,
  • कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए दौड़ पड़े।
  • इधर स्थूलकाय श्री गणेश जी और
  • उनका वाहन भी चूहा,
  • भला इतनी शीघ्रता से वे परिक्रमा कैसे कर सकते थे।
  • गणेश जी के सामने भारी समस्या उपस्थित थी।
  • श्रीगणेश जी, शरीर से ज़रूर स्थूल हैं,
  • किन्तु वे बुद्धि के सागर हैं।
  • उन्होंने कुछ सोच-विचार किया और
  • अपनी माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर से,
  • एक आसन पर बैठने का आग्रह किया।
  • उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद,
  • श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की,
  • फिर विधिवत् पूजन किया।
  • इस प्रकार श्रीगणेश,
  • माता-पिता की परिक्रमा करके,
  • पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये।
  • उनकी चतुर बुद्धि को देख कर,
  • शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और
  • उन्होंने श्रीगणेश का विवाह भी करा दिया।
  • कुमार कार्तिकेय,
  • पृथ्वी की परिक्रमा करके कैलाश पर लौटे,
  • तो नारदजी से,
  • गणेश के विवाह का,
  • वृतांत सुनकर रूष्ट हो गए,
  • और माता पिता के मना करने पर भी,
  • उन्हें प्रणाम कर क्रोच पर्वत पर चले गए।
  • पार्वती के दुखित होने पर, और
  • समझाने पर भी धैर्य न धारण करने पर,
  • शंकर जी ने देवर्षियो को,
  • कुमार को समझाने के लिए भेजा,
  • परंतु वे निराश हो लौट आए।
  • इस पर पुत्र वियोग से व्याकुल पार्वती के अनुरोध पर,
  • पार्वती के साथ, शिवजी स्वयं वहां गए।
  • पंरतु वह, अपने माता पिता का आगमन सुनकर,
  • क्रोच पर्वत को छोडकर,
  • तीन योजन और दूर चले गये।
  • वहा पुत्र के न मिलने पर,
  • वात्सल्य से व्याकुल शिव-पार्वती ने,
  • उसकी खोज में अन्य पर्वतों पर जाने से पहले,
  • उन्होनें वहां अपनी ज्योति स्थापित कर दी।
  • उसी दिन से मल्लिकार्जुन क्षेत्र के नाम से,
  • यह ज्योतिलिंग मल्लिकार्जुन कहलाया।
  • मल्लिकार्जुन – मल्लिका – माता पार्वती,
  • अर्जुन – भगवान शंकर
  • मल्लिका, माता पार्वती का नाम है, जबकि,
  • अर्जुन, भगवान शंकर को कहा जाता है।
  • इस प्रकार सम्मिलित रूप से,
  • मल्लिकार्जुन नाम जगत् में प्रसिद्ध हुआ।
  • अमावस्या के दिन शिवजी और
  • पूर्णिमा के दिन पार्वतीजी,
  • आज भी वहां आते रहते है।
  • इस ज्योतिर्लिग के दर्शन से,
  • धन-धान्य की वृद्धि के साथ,
  • प्रतिष्ठा आारोग्य और अन्य मनोरथों की भी प्राप्ति होती है।
मल्लिकार्जुन – मल्लिका – माता पार्वती, अर्जुन – भगवान शंकर

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा – 2

  • चंद्रावती नाम की एक राजकन्या,
  • वन-निवासी बनकर,
  • इस कदली वन में तप कर रही थी।
  • एक दिन उसने एक चमत्कार देखा की,
  • एक कपिला गाय,
  • बिल्व वृक्ष के नीचे खडी होकर,
  • अपने चारों स्तनों से दूध की धाराएँ,
  • जमीन पर गिरा रही है।
  • गाय का यह नित्यक्रम था।
  • चंद्रवती ने उस स्थान पर खोदा,
  • तो आश्चर्य से दंग रह गई।
  • वही एक स्वयंभू शिवलिंग दिखाई दिया।
  • वह सूर्य जैसा प्रकाशमान दिखाई दिया,
  • जिससे अग्निज्वालाएँ निकलती थी।
  • भगवान शंकर के उस दिव्य ज्योतिर्लिंग की,
  • चंद्रावती ने आराधना की।
  • उसने वहाँ अतिविशाल शिमंदिर का निर्माण किया।
श्री शैल मल्लिकार्जुन
  • भगवान शंकर चंद्रावती पर प्रसन्न हुए।
  • वायुयान में बैठकर,
  • वह कैलाश पहुंची और उसे मुक्ति मिली।
  • मंदिर की एक शिल्पपट्टी पर,
  • चंद्रावती की कथा खोदकर रखी है।
  • शैल मल्लिकार्जुन के,
  • इस पवित्र स्थान की तलहटी में,
  • कृष्णा नदी ने,
  • पाताल गंगा का रूप लिया है।
  • लाखों भक्तगण यहाँ पवित्र स्नान करके,
  • ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए जाते है।
  • अनेक धर्मग्रन्थों में,
  • इस स्थान की महिमा बतायी गई है।
  • महाभारत के अनुसार,
  • श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव का पूजन करने से,
  • अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है।
  • कुछ ग्रन्थों में तो यहाँ तक लिखा है कि,
  • श्रीशैल के शिखर के दर्शन मात्र करने से,
  • दर्शको के सभी प्रकार के कष्ट दूर भाग जाते हैं,
  • उसे अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है और
  • आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाता है।

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Shri Mallikarjuna Jyotirling
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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं
सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥
जय सोमनाथ, जय सोमनाथ॥


श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग – आद्य ज्योतिर्लिंग

शंकरजी के बारह ज्योतिर्लिंग में से सोमनाथ को आद्य ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह स्वयंभू देवस्थान होने के कारण और हमेशा जागृत होने के कारण लाखों भक्तगण यहाँ आकर पवित्र-पावन बन जाते है।

श्री सोमनाथ सौराष्ट्र (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है।

सौराष्ट्र के श्रीसोमनाथ का यह शिवतीर्थ, अग्नितीर्थ और सूर्यतीर्थ सर्वप्रथम चंद्रमा को प्रसन्न हुए। तब उसने भारत में सबसे पहले श्रीशंकरजी के दिव्य ज्योतिर्लिग की स्थापना करके उस पर अतिसुंदर स्वर्णमंदिर बाँधा।


श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा

स्कंद-पुराण के प्रभासखंड में श्रीसोमनाथ की कथा का संदर्भ मिलता है। कथा इस प्रकार है:-

चन्द्र अर्थात् सोम ने, दक्षप्रजापति राजा की २७ पुत्रियों से विवाह किया था। किंतु एक मात्र रोहिणी में इतनी आसक्ति और इतना अनुराग दिखाया कि अन्य छब्बीस अपने को उपेक्षित और अपमानित अनुभव करने लगी।

उन्होंने अपने पति से निराश होकर अपने पिता से शिकायत की तो पुत्रियों की वेदना से पीड़ित दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को दो बार समझाने का प्रयास किया।

परन्तु विफल हो जाने पर उसने चन्द्रमा को “क्षयी” होने का शाप दिया और कहा की अब से हर दिन तुम्हारा तेज (काँति, चमक) क्षीण होता रहेगा।

फलस्वरूप हर दूसरे दिन चंद्र का तेज घटने लगा।

देवता लोग चन्द्रमा की व्यथा से व्यथित होकर ब्रह्माजी के पास जाकर उनसे शाप निवारण का उपाय पूछने लगे।

ब्रह्माजी ने प्रभासक्षेत्र में महामृत्युंजय से शंकरजी की उपासना करना एकमात्र उपाय बताया।

चन्द्रमा के छ: मास तक शिव पूजा करने पर शंकर जी प्रकट हुए और चन्द्रमा को एक पक्ष में प्रतिदिन उसकी एक-एक कला नष्ट होने और दूसरे पक्ष में प्रतिदिन बढने का उन्होने वर दिया।

देवताओं पर प्रसन्न होकर उस क्षेत्र की महिमा बढ़ाने के लिए और चन्द्रमा (सोम) के यश के लिए सोमेश्वर नाम से शिवजी वहां अवस्थित हो गए।

देवताओं ने उस स्थान पर सोमेश्वर कुण्ड की स्थापना की। इस कुण्ड में स्नान कर सोमेश्वर ज्योर्तिलिग के दर्शन पूजा से सब पापों से निस्तार और मुक्ति की प्राप्ति हो जातीं है।

चन्द्रमा को सोम नाम से भी पहचाना जाता है। इसलिए यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के नाम से मशहूर है।

चंद्रमा को इस स्थान पर तेज प्राप्त हुआ। अत: इस स्थान को प्रभासपट्टण इस नाम से भी जाना जाता है।

भारत का यह आद्य ज्योतिर्लिंग करोड़ों भक्तों का श्रद्धास्थान है। लाखों यात्रियों की भीड यहाँ सदा लगी रहती है। अनेक सिद्ध-सत्पुरुषों का सत्संग लोगों को प्राप्त होता है। समुद्रतटपर कठियावाड़ के प्रदेश में. प्रभासपट्टण के आसपास मंदिर. स्मारक और पौराणिक स्थान है।

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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकालमहासुरेशम्॥


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – महाकालमहासुरेशम्

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, मध्यप्रदेश के, मालवा क्षेत्र में, क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैन नगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।

महाभारत, पुराणों में और महाकवि कालिदास की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

स्वयंभू और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। ऐसी मान्यता है की इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा – 1

अवलीवासी एक ब्राह्मण के शिवोपासक चार पुत्र थे।

ब्रह्मा से वर प्राप्त दुष्ट दैत्यराज दूषण ने, अवंती मे आकर, वहां के निवासी वेदज्ञ ब्राह्मण को बडा कष्ट दिया। परन्तु शिवजी के ध्यान में लीन ब्राह्मण तनिक भी खिन्न नहीं हुए।

दैत्यराज ने अपने चारो अनुचर दैत्यों को नगरी मे घेर कर वैदिक धर्मानुष्ठान ने होने देने का आदेश दिया।

दैत्यों के उत्पात से पीडित प्रजा ब्राह्मणो के पास आई।

बाह्मण प्रजाजनो को धीरज बंधा कर शिवजी की पूजा में तत्पर हुए।

इसी समय ज्योहिं दूषण दैत्य अपनी सेना सहित उन ब्राह्मणों पर झपटा, त्योहि पार्थिव मूर्ति के स्थान पर एक भयानक शब्द के साथ धरती फटी और वहां पर गड्डा हो गया। उसी गर्त में शिवजी एक विराट रूपधारी महाकाल के रूप में प्रकट हुए।

शिवजी ने उस दुष्ट को ब्राह्मणो के निकट न आने को कहा, परन्तु उस दुष्ट दैत्य ने शिवजी की आज्ञा न मानी।

फलत: शिवजी ने अपनी एक ही हुंकार से उस दैत्य को भस्म कर दिया।

शिवजी को इस रूप मे प्रकट हुआ देखकर ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रादि देवों ने आकर भगवान शंकर की स्तुति वन्दना की।


श्री महाकालेश्वर की कथा – 2

राजा चन्द्रसेन और गोपीपुत्र
महाकालेश्वर की महिमा अवर्णनीय हे। उज्जयिनी नरेश चन्द्रसेन शास्त्रज्ञ होने के साथ साथ पक्का शिवभक्त भी था। उसके मित्र महेश्वरजी के गण मणिभद्र ने उसे एक सुन्दर चिंतामणि प्रदान की।

चन्द्रसेन जब उस मणि को कण्ठ में धारण करता तो इतना अधिक तेजस्वी दीखता कि देवताओं को भी ईर्ष्या होती।

कुछ राजाओं के मांगने पर मणि देने से इकार करने पर उन्होंने चन्द्रसेन पर चढाई कर दी।

अपने को घिरा देख चंद्रसेन महाकाल की शरण में आ गया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसकी रक्षा का उपाय किया।

संयोगवश अपने बालक को गोद में लिए हुए एक ब्राह्मणी भ्रमण करती हुए महाकाल के समीप पहुंची।

अबोध बालक ने महाकालेश्वर मंदिर में राजा को शिव पूजन करते देखा तो उसके मन में भी भक्ति भाव उत्पन्न हुआ।

उसने एक रमणीय पत्थर को लाकर अपने सूने घर में स्थापित किया और उसे शिवरूप मान उसकी पूजा करने लगा।

भजन में लीन बालक को भोजन की सुधि ही न रही।

उसकी माता उसे बुलाने गई, परन्तु माता के बार बार बुलाने पर भी बालक ध्यान मगन मौन बैठा रहा।

इस पर उसकी माया विमोहित माता ने, शिवलिंग को दूर फ़ेंक कर उसकी पूजा नष्ट कर दी।

माता के इस कृत्य पर दुखी होकर वह शिवजी का स्मरण करने लगा।

शिवजी की कृपा होते देर न लगी, और पुत्र द्वारा पूजित पाषाण रत्नजड़ित ज्योतिर्लिंग के रूप में आविर्भूत हो गया।

शिवजी की स्तुति वन्दना के उपरान्त जब बालक घर को गया तो उसने देखा कि उसकी कुटिया का स्थान सुविशाल भवन ने ले लिया है।

इस प्रकार शिवजी की कृपा से वह बालक विपुल धन धान्य से समृद्ध होकर सुखी जीवन बिताने लगा।

इधर विरोधी राजाओं ने जब चन्द्रसेन के नगर पर अभियान किया तो वे आपस में ही एक दूसरे से कहने लगे कि राजा चद्रसेन तो शिवभक्त है, और उज्जैयिनी महाकाल की नगरी हैं, जिसे जीतना असम्भव है।

यह विचार कर राजाओं ने चंद्रसेन से मित्रता कर ली और सबने मिलकर महाकाल का पूजा कि।

इस समय वहां वानराधीश हनुमान जी प्रकट हुए और उन्होनें राजाओं को बताया कि शिवजी के बिना मनुष्यों को गति देने वाला अन्य कोई नहीं है।

शिवजी तो बिना मंत्रों से की गई पूजा से भी प्रसन्न हो जाते है। गोपीपुत्र का उदाहरण तुम्हारे सामने ही है। इसके पश्चात् हनुमान जी चंद्रसेन को स्नेह और कृपा पूर्ण दृष्टि से देखकर वही अन्तर्धान हो गए।

Temple

Shiv

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग