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अम्बे तू है जगदम्बे काली

1.

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गायें भारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


2.

तेरे भक्त जनों पे माता,
भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पडो माँ,
करके सिंह सवारी॥

सौ सौ सिंहों से तु बलशाली,
अष्ट भुजाओं वाली।
दुष्टों को पल में संहारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


3.

माँ बेटे का है इस जग में,
बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सूने हैं पर,
ना माता सुनी कुमाता॥

सब पे करुणा बरसाने वाली,
अमृत बरसाने वाली।
दुखियों के दुखडे निवारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


4.

नहीं मांगते धन और दौलत,
ना चाँदी, ना सोना।
हम तो मांगे माँ तेरे मन में,
इक छोटा सा कोना॥

सबकी बिगडी बनाने वाली,
लाज बचाने वाली।
सतियों के सत को संवारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


1.

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गायें भारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥

ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥

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Ambe Tu Hai Jagdambe Kali
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जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी

1.

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिव री॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


2.

मांग सिंदूर बिराजत,
टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना,
चंद्रवदन नीको॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


3.

कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजै।
रक्त-पुष्प गल माला,
कंठन पर साजै॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


4.

केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर मुनि-जन सेवत,
तिनके दुःखहारी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


5.

कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर,
राजत सम ज्योति॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


6.

शुम्भ निशुम्भ बिदारे,
महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना,
निशिदिन मदमाती॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


7.

चण्ड मुण्ड संहारे,
शोणितबीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे,
सुर भयहीन करे॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


8.

ब्रम्हाणी रुद्राणी,
तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


9.

चौंसठ योगिनि गावत,
नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा,
औ बाजत डमरू॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


10.

तुम ही जगकी माता,
तुम ही हो भरता।
भक्तनकी दुःख हरता,
सुख सम्पति करता॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


11.

भुजा चार अति शोभित,
खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत,
सेवत नर नारी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


12.

कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती।
(श्री) मालकेतुमें राजत,
कोटिरतन ज्योति॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


13.

(श्री) अम्बेजी की आरती,
जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी,
सुख सम्पत्ति पावै॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


1.

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिव री॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥

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Jai Ambe Gauri – Ambe Maa Ki Aarti
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ॐ जय लक्ष्मी माता – लक्ष्मी जी की आरती

1.

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम को निश दिन सेवत,
मैय्याजी को निस दिन सेवत,
हर-विष्णु-धाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


2.

उमा, रमा, ब्रह्माणी,
तुम ही जग-माता,
मैया, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता॥
॥ओम जय लक्ष्मी माता॥


3.

दुर्गा रूप निरंजनि,
सुख-सम्पति दाता,
मैया, सुख-सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्याता,
ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
॥ओम जय लक्ष्मी माता॥


4.

तुम पाताल निवासिनी,
तुम ही शुभ दाता,
मैया, तुम ही शुभ दाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी,
भव निधि की त्राता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


5.

जिस घर तुम रहती,
सब सद्‍गुण आता,
मैया, सब सद्‍गुण आता।
सब संभव हो जाता,
मन नहीं घबराता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


6.

तुम बिन यज्ञ न होवे (होते) ,
वस्त्र न कोई पाता,
मैया, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव,
सब तुमसे आता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


7.

शुभ गुण मंदिर सुंदर,
क्षीरोदधि जाता,
मैया, क्षीरोदधि जाता।
रत्न-चतुर्दश तुम बिन,
कोई नहीं पाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


8.

महालक्ष्मी(जी) की आरती,
जो कोई नर गाता,
मैया, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता,
पाप उतर जाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


1.

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम को निश दिन सेवत,
हर-विष्णु-धाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥

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Om Jai Laxmi Mata – Laxmi Aarti
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जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय

1.

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


2.

तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


3.

आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


4.

अविकारी, अघहारी, सकल कलाधारी।
कर्ता विधि भर्ता हरि हर संहारकारी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


5.

तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


6.

राम, कृष्ण, तू सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वाँछा कल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


7.

दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


8.

तू परधाम निवासिनि, महा-विलासिनि तू।
तू ही शमशान विहारिणि, ताण्डव लासिनि तू॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


9.

सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी धारा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


10.

तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


11.

मूलाधार निवासिनि, इहपर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वर दे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


12.

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले वेदत्रयी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


13.

हम अति दीन दुखी माँ, विपट जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


14.

निज स्वभाववश जननी, दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी, चरण शरण दीजै॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


15.

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

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Jag Janani Jai Jai Maa - Maa Durga Aarti
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दुर्गा सप्तशती अध्याय लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती के अध्याय की लिस्ट

  • दुर्गा सप्तशती
  • सात सौ श्वोकोंका संग्रह है, और
  • उन सात सौ श्लोकों को
  • तेरह अध्यायों में बांटा गया है।

दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों की लिंक निचे दी गयी है –


देवी माहात्म्य



देवी माँ की आरती


दुर्गा सप्तशती में कितने अध्याय और चरित है?

  • शक्तिकी उपासनाके सम्बन्धमें जितने ग्रन्थ प्रचलित है,
  • उनमे सप्तशतीका बहुत विशेष महत्त्व है।
  • आस्तिक हिन्दू बड़ी श्रद्धासे इसका पाठ किया करते है, और
  • उनमेंसे अधिकांशका यह विश्वास है कि,
  • सप्तशतीका पाठ प्रत्यक्ष फलदायक हुआ करता है।
  • कुछ लोगोंका कहना है –
  • कली चण्डिविनायकौ अथवा कली चण्डिमहेश्वरौ।
  • इस कथनसे भी विदित होता है कि,
  • कलियुगमें चण्डीजीका विशेष महत्व है।
  • और चण्डीजीके कृत्योंका उल्लेख,
  • सप्तशती में विशेष सुन्दरताके साथ मिलता है।
  • इस दृष्टिसे भी इस ग्रन्थकी महत्ता सिद्ध होती है।
  • यह तीन भागोंमें अथवा चरितोंमें विभक्त है।
  • प्रथम चरितमें
  • ब्रम्हाने योगनिद्राकी स्तुति करके विष्णुको जाग्रत कराया है और
  • इस प्रकार जागृत होनेपर उनके द्वारा
  • मधु-कैटभका नाश हुआ है।
  • द्वितीय चरितमें
  • महिषासुर वधके लिये सब देवताओंकी शक्ति एकत्र हुई है और
  • उस एकत्रित शक्तिके द्वारा महिषासुरका वध हुआ है।
  • तृतीय चरितमें
  • शुम्भ-निशुम्भ वधके लिये देवताओंने प्रार्थना की, तब पार्वतीजीके शरीरसे शक्तिका प्रादुर्भाव हुआ अरि
  • क्रमश: धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीजका वध होकर
  • शुम्भ-निशुम्भका संहार हुआ है।

Saptashati

Durga

दुर्गा सप्तशती अध्याय लिस्ट – Index
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 – अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index


दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 के मुख्य प्रसंग

  1. विनियोग और ध्यान
  2. राजा सुरथ का प्रसंग
  3. वैश्य समाधि (धनी व्यापारी) का प्रसंग
  4. राजा और वैश्य का,
    • समस्या के समाधान के लिए,
    • मेधा मुनि के पास जाना
  5. मेधा मुनि द्वारा राजा को,
    • माया, बंधन और
    • मोक्ष का कारण बताना
  6. भगवती महामाया की महिमा
  7. मधु और कैटभ से बचने के लिए,
    • ब्रम्हाजी का,
    • भगवान् विष्णु के पास जाना
  8. ब्रम्हाजी का माँ भगवती की स्तुति करना
  9. देवी भगवती की महिमा,
    • और उनके स्वरुप
  10. राक्षसों के संहार के लिए,
    • देवी का प्रादुर्भाव
    • अर्थात, प्रकट होना
  11. मधु और कैटभ का,
    • भगवान् विष्णु के साथ युद्ध
  12. मधु और कैटभ का संहार

1. दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 का, विनियोग और ध्यान

श्रीमहाकाली देवी की प्रसत्रताके लिये, पहले अध्याय का विनियोग

॥विनियोगः॥
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,
नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्,
ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – प्रथम चरित्रके
  • ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता,
  • गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति,
  • रक्तदन्तिका बीज, अग्रि तत्त्व और
  • ऋग्वेद स्वरूप है।
  • श्रीमहाकाली देवताकी प्रसत्रताके लिये,
  • प्रथम चरित्रके जपमें,
  • विनियोग किया जाता है ।

महाकाली देवी का, पहले अध्याय का, ध्यान मन्त्र

॥ध्यानम्॥
ॐ खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्‍तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ नमश्चण्डिकायै

ध्यान

  • भगवान् विष्णुके सो जानेपर,
  • मधु और कैटभको मारनेके लिये,
  • कमलजन्मा ब्रह्माजीने,
  • जिनका स्तवन किया था,
  • उन महाकाली देवीका,
  • मैं ध्यान करता (करती) हूँ ।
  • वे अपने दस हाथोंमें,
  • खड़ग, चक्र, गदा, बाण,
  • धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि,
  • मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं।
  • उनके तीन नेत्र हैं।
  • वे समस्त अंगो मे,
  • दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं।
  • उनके शरीरकी कान्ति,
  • नीलमणिके समान है तथा
  • वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।
  • ॐ चण्डीदेवीको नमस्कार है।

2. मार्कण्डेयजी, राजा सुरथ और समाधि की कथा बताते है

मार्कण्डेयजी, पहले, राजा सुरथ की कथा सुनाते है

ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच॥१॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम॥२॥

  • मार्कण्डेय जी बोले –
  • सूर्य के पुत्र साविर्णि,
  • जो आठवें मनु कहे जाते हैं,
  • उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो।

इस कथा में, भगवती महामाया की कृपा का प्रसंग

महामायानुभावेन यथा मन्वन्‍तराधिपः।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः॥३॥

  • सूर्यकुमार महाभाग सवर्णि,
  • भगवती महामाया के अनुग्रह से,
  • जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए,
  • वही प्रसंग सुनाता हूँ।

राजा सुरथ धार्मिक राजा थे

स्वारोचिषेऽन्‍तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥४॥

  • पूर्वकाल की बात है,
  • सुरथ नाम के एक राजा थे,
  • जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे।
  • उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था ।

राजा सुरथ, धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥५॥

  • वे प्रजा का अपने पुत्रों की भाँति,
  • धर्मपूर्वक पालन करते थे।
  • फिर भी उस समय,
  • कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय,
  • उनके शत्रु हो गये।

राजा सुरथ की एक बार, युद्ध में हार हुई

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥६॥

  • राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी।
  • उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ।
  • यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे,
  • तो भी राजा सुरथ,
  • युद्ध में उनसे परास्त हो गये।

राजा सुरथ का राज्य, सीमित हो गया

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्।
आक्रान्‍तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः॥७॥

  • तब वे युद्ध भूमि से,
  • अपने नगर को लौट आये, और
  • केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे।
  • समूची पृथ्वी से,
  • अब उनका अधिकार जाता रहा।
  • किंतु वहाँ भी, उन प्रबल शत्रुओं ने,
  • महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।

मंत्रियों ने, सेना और खजाने को, हथिया लिया

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८॥

  • राजा का बल क्षीण हो चला था,
  • इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मंत्रियों ने,
  • वहाँ उनकी राजधानी में भी,
  • राजकीय सेना और खजाने को वहाँ से हथिया लिया।

राजा सुरथ, अकेले जंगल की ओर चले गए

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्॥९॥

  • सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था।
  • इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने,
  • घोड़े पर सवार हो,
  • वहाँ से अकेले ही,
  • एक घने जंगल में चले गये।

राजा सुरथ, मेधा मुनि के आश्रम पहुंचे

स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः।
प्रशान्‍तश्‍वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्॥१०॥

  • वहाँ उन्होंने,
  • विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा।
  • जहाँ कितने ही हिंसक जीव,
  • अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर,
  • परम शान्त भाव से रह रहे थे।

मेधा मुनि के आश्रम का शांत वातावरण

तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः।
इतश्‍चेतश्‍च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥११॥

  • मुनि के बहुत से शिष्य,
  • उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे।
  • वहां जाने पर मुनि ने,
  • उनका सत्कार किया।
  • उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर राजा सुरथ,
  • इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक वहां रहे।

राजा सुरथ को, राज्य के बारे में चिंता होने लगी

सोऽचिन्‍तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्॥१२॥

  • फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर,
  • उस आश्रम में इस प्रकार चिंता करने लगे –
  • पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने,
  • जिसका पालन किया था,
  • वहीं नगर आज मुझसे रहित है।
  • पता नहीं, मेरे दुराचारी मंत्रीगण ,
  • उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं।

राजा सुरथ को, हाथी की चिंता

मद्‌भृत्यैस्तैरसद्‌वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः॥१३॥

  • जो सदा मद की वर्षा करने वाला और
  • शूरवीर था,
  • वह मेरा प्रधान हाथी,
  • अब शत्रुओं के अधीन होकर,
  • न जाने किन भोगों को भोगता होगा?

राजा सुरथ को, लोगों की चिंता

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः॥१४॥

  • जो लोग,
  • मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से,
  • सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे,
  • वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं को,
  • अनुसरण करते होंगे।

राजा सुरथ को, धन की चिंता

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम्।
असम्यग्व्यशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्॥१५॥
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः॥१६॥

  • उन अपव्ययी लोगों के द्वारा,
  • खर्च होते रहने के कारण,
  • अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ,
  • मेरा वह खजाना भी खाली हो जायेगा।
  • ये तथा और भी कई बातें,
  • राजा सुरथ निरंतर सोचते रहते थे।

अब, वैश्य समाधि (धनी व्यापारी) का प्रसंग

राजा सुरथ की, वैश्य समाधि से भेंट

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्‍चागमनेऽत्र कः॥१७॥

  • एक दिन उन्होंने वहाँ
  • मेधा मुनि के आश्रम के निकट
  • एक वैश्य को देखा, और
  • उससे पूछा –
  • भाई, तुम कौन हो?
    • वैश्य अर्थात –
    • व्यापारी समुदाय, व्यापार करनेवाला

राजा सुरथ, वैश्य से, उसके दु:ख का कारण पूछते है

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥१८॥
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥१९॥

  • यहां तुम्हारे आने का क्या कारण है?
  • तुम क्यों शोकग्रस्त और
  • अनमने से दिखायी देते हो?
  • राजा सुरथ का,
  • यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर,
  • वैश्य ने विनीत भाव से,
  • उन्हें प्रणाम करके कहा –

समाधि, एक धनि वैश्य, अर्थात व्यापारी था

वैश्‍य उवाच॥२०॥
समाधिर्नाम वैश्‍योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले॥२१॥

  • वैश्य बोला – राजन्!
  • मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ।
  • मेरा नाम समाधि है।

वैश्य समाधि, अपने दुःख का कारण बताते है

लोभी पत्नी और पुत्रों ने, वैश्य को, घर से निकाल दिया

पुत्रदारैर्निरस्तश्‍च धनलोभादसाधुभिः।
विहीनश्‍च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥२२॥

  • मेरे दुष्ट स्त्री और पुत्रों ने,
  • धन के लोभ से,
  • मुझे घर से बाहर निकाल दिया है।
  • मैं इस समय,
  • धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हूँ।
  • मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा ही धन लेकर,
  • मुझे दूर कर दिया है,

दुःखी वैश्य, आश्रम में आ गया

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्॥२३॥

  • इसलिये दुखी होकर,
  • मैं वन में चला आया हँ।
  • यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि,
  • मेरे पुत्रों की, स्त्री की और
  • स्वजनों का कुशल है या नहीं।

वैश्य को, पत्नी और पुत्रों की चिंता

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्॥२४॥

  • इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं,
  • अथवा उन्हें कोई कष्ट है?

क्या पुत्र सदाचारी है या नहीं?

कथं ते किं नु सद्‌वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥२५॥

  • वे मेरे पुत्र कैसे हैं?
  • क्या वे सदाचारी हैं,
  • अथवा दुराचारी हो गये हैं?

वैश्य को, लोभी रिश्तेदारों की चिंता करते देख, राजा को अचम्भा हुआ

राजोवाच॥२६॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः॥२७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्॥२८॥

  • राजा ने पूछा –
  • जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण,
  • तुम्हें घर से निकाल दिया,
  • उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह क्यों है?

वैश्य भी, राजा की बात से, सहमत होता है

वैश्य उवाच॥२९॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्‌गतं वचः॥३०॥

  • वैश्य बोला –
  • आप मेरे विषय में जो बात कहते हैं,
  • वह सब ठीक है।
  • अर्थात,
  • जिन लोभी रिश्तेदारों ने,
  • वैश्य को,
  • धन के लोभ में,
  • घर से निकाल दिया,
  • उनके प्रति,
  • मन में स्नेह के विचार,
  • क्यों आ रहे है।

वैश्य के, धन के लोभी पुत्र, पत्नी और रिश्तेदार

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः॥३१॥
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते॥३२॥

  • किंतु क्या करूँ,
  • मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता।
  • जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर,
  • पिता के प्रति स्नेह,
  • पति के प्रति प्रेम तथा
  • आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे,
  • मुझे घर से निकाल दिया है,
  • उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है।

लोभी परिजनों के लिए, मन में, स्नेह के विचार आते देख, वैश्य को भी हैरानी

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।
तेषां कृते मे निःश्‍वासो दौर्मनस्यं च जायते॥३३॥

  • महामते,
  • गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी,
  • जो मेरा चित्त,
  • इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है,
  • यह क्या है –
  • इस बात को,
  • मैं जानकर भी नहीं जान पाता।
  • उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हँ और
  • मेरा हृदय अत्यन्त दु:खित हो रहा है।

लोभी स्वजनों के लिए स्नेह क्यों?

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्॥३४॥

  • उन लोगों में,
  • प्रेम का सर्वथा अभाव है,
  • तो भी,
  • उनके प्रति,
  • जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता,
  • इसके लिये क्या करुँ।

राजा और वैश्य द्वारा, मेधा मुनि से, मोह का कारण पूछना

राजा सुरथ और समाधि, मेधा मुनि के पास गए

मार्कण्डेय उवाच॥३५॥
तस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ॥३६॥

  • मार्कण्डेयजी कहते हैं –
  • तदन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और
  • वह समाधि नामक वैश्य,
  • दोनों साथ-साथ,
  • मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए, और

राजा और वैश्य मुनि को प्रणाम करते है

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्॥३७॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्‍यपार्थिवौ॥३८॥

  • उन्हें प्रणाम करके उनके सामने बैठ गए।
  • तत्पश्चात वैश्य और राजा ने,
  • कुछ वार्तालाप आरंभ किया।

राजा और वैश्य, अपनी चिंता, मेधा मुनि को बताते है

राजोवाच॥३९॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्॥४०॥

  • राजा ने कहा –
  • भगवन् मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ,
  • उसे बताइये।

राजा पूछते है – जो राज्य चला गया, उसके प्रति चिंता क्यों हो रही है?

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि॥४१॥

  • मेरा चित्त,
  • अपने अधीन न होने के कारण,
  • वह बात,
  • मेरे मन को बहुत दु:ख देती है।
  • मुनिश्रेष्ठ,
  • जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है,
  • उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में,
  • मेरी ममता बनी हुई है।

और, वैश्य को, लोभी रिश्तेदारों के लिए, स्नेह क्यों?

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः॥४२॥

  • यह जानते हुए भी कि
  • वह अब मेरा नहीं है,
  • अज्ञानी की भाँति,
  • मुझे उसके लिये दु:ख होता है,
  • यह क्या है?
  • इधर यह वैश्य भी,
  • घर से अपमानित होकर आया है।
  • इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने,
  • इसको छोड़ दिया है।

लोभी परिजनों के लिए, मन में चिंता क्यों?

स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥४३॥

  • स्वजनों ने भी,
  • इसका परित्याग कर दिया है,
  • तो भी इसके हृदय में,
  • उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है।
  • इस प्रकार,
  • यह तथा मैं,
  • दोनों ही बहुत दुखी हैं।

राजा और वैश्य, मुनि से, मोह का कारण पूछते है

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥४४॥

  • जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है,
  • उस विषय के लिये भी,
  • हमारे मन में,
  • ममता जनित आकर्षण,
  • पैदा हो रहा है।
  • महाभाग, हम दोनों समझदार है,
  • तो भी,
  • हममें जो मोह पैदा हुआ है,
  • यह क्या है?

लोभी स्वजनों के प्रति स्नेह, अर्थात विवेकशून्य मनुष्य

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥४५॥

  • विवेकशून्य पुरुष की भाँति,
  • मुझमें और इसमें भी
  • यह मूढ़ता,
  • प्रत्यक्ष दिखायी देती है।

3. भगवती महामाया की महिमा

मेधा मुनि, राजा को, मनुष्यों और प्राणियों के मोह के बारे में बताते है

ऋषिरुवाच॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥४७॥

  • ऋषि बोले – महाभाग,
  • विषय मार्ग का ज्ञान,
  • सब जीवों को है।

प्राणियों के विषय अलग अलग

विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥४८॥

  • इसी प्रकार विषय भी,
  • सबके लिये अलग-अलग हैं।
  • कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और
  • दूसरे रात में ही नहीं देखते।

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥४९॥

  • तथा कुछ जीव ऐसे हैं,
  • जो दिन और रात्रि में भी,
  • बराबर ही देखते हैं।
  • यह ठीक है कि,
  • मनुष्य समझदार होते हैं,
  • किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते।

प्राणी भी, मनुष्य की तरह समझदार होते है

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥५०॥

  • पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी,
  • समझदार होते हैं।
  • मनुष्यों की समझ भी,
  • वैसी ही होती है,
  • जैसी,
  • उन मृग और पक्षियों की होती है

प्राणियों की भी समझ, मनुष्यों जैसी होती है

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥५१॥

  • तथा जैसी मनुष्यों की होती है,
  • वैसी ही,
  • उन मृग-पक्षी आदि की होती है।
  • यह तथा अन्य बातें भी,
  • प्राय: दोनों में समान ही हैं।

प्राणी और मनुष्य, दोनों में, बच्चों के लिए मोह होता है

कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥५२॥

  • समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो,
  • यह स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी,
  • मोहवश बच्चों की चोंच में,
  • कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं।
  • नरश्रेष्ठ, क्या तुम नहीं देखते कि,
  • ये मनुष्य समझदार होते हुए भी,
  • लोभवश,
  • अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये,
  • पुत्रों की अभिलाषा करते हैं?

जग में मोह माया का कारण – भगवती महामाया का प्रभाव

लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्‍यसि।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥५३॥
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥५४॥

  • यद्यपि, उन सबमें,
  • समझ की कमी नहीं है,
  • तथापि वे संसार की स्थिति,
    • अर्थात जन्म-मरण की परम्परा,
  • बनाये रखने वाले,
  • भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा,
  • ममतामय भँवर से युक्त,
  • मोह के गहरे गर्त में,
  • गिराये जाते हैं।
  • इसलिये,
  • इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये।

विष्णु भगवान की भगवती महामाया

महामाया हरेश्‍चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥५५॥

  • जगदीश्वर भगवान विष्णु की,
  • योगनिद्रारूपा,
  • जो भगवती महामाया हैं,
  • उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है।

भगवती देवी से ही – मोह के बंधन और बंधनो से मुक्ति, दोनों बातें

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
तया विसृज्यते विश्‍वं जगदेतच्चराचरम्॥५६॥

  • वे भगवती महामाया देवी,
  • ज्ञानियों के भी चित्त को,
  • बलपूर्वक खींचकर,
  • मोह में डाल देती हैं।
  • वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की,
  • सृष्टि करती हैं, तथा
  • वे ही प्रसन्न होने पर,
  • मनुष्यों को मुक्ति के लिये,
  • वरदान देती हैं।

संसार बंधन और मोक्ष, दोनों अवस्थाएं, भगवती महामाया के कारण

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्‍च सैव सर्वेश्‍वरेश्‍वरी॥५८॥

  • वे ही पराविद्या,
  • संसार-बंधन और
  • मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी, तथा
  • संपूर्ण ईश्वरों की भी,
  • अधीश्वरी हैं।

राजा, मेधा मुनि को, देवी महामाया के बारे में विस्तार से बताने के लिए कहते है

राजोवाच॥५९॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥६०॥

  • राजा ने पूछा –
  • भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं,
  • वे देवी कौन हैं?

देवी महामाया का स्वरुप, प्रभाव और प्रादुर्भाव कैसे हुआ?

ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा॥६१॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर॥६२॥

  • ब्रह्मन्! उनका अविर्भाव कैसे हुआ?
  • तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं।
  • ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे,
  • उन देवी का जैसा प्रभाव हो,
  • जैसा स्वरूप हो और
  • जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो,
  • वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।

भगवती महामाया का स्वरुप – नित्यस्वरूपा है

ऋषिरुवाच॥६३॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥६४॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा॥६५॥

  • ऋषि बोले – राजन्!
  • वास्तव मे तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं।
  • सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा,
  • उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है,
  • तथापि उनका प्राकटय,
  • अनेक प्रकार से होता है।
  • वह मुझ से सुनो।
  • यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं,
  • तथापि जब देवताओं को,
  • कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं,
  • उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं।

4. मधु और कैटभ के संहार का प्रसंग

ब्रह्माजी, मधु और कैटभ से बचने के लिए, भगवान् विष्णु के पास जाते है

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥६६॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्‍ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ॥६७॥

  • कल्प (प्रलय) के अन्त में,
  • सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।
  • सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर,
  • योगनिद्रा का आश्रय ले शयन कर रहे थे।
  • उस समय उनके कानों की मैल से,
  • दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए,
  • जो मुध और कैटभ के नाम से विख्यात थे।

ब्रह्माजी, विष्णु भगवान् को, सोया हुआ देखते है

विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्‍तुं ब्रह्माणमुद्यतौ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥

  • वे दोनों,
  • ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गये।
  • प्रजापति ब्रह्माजी ने,
  • जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया, और
  • भगवान को सोया हुआ देखा,
  • तो सोचा की,
  • मुझे कौन बचाएगा।

भगवान् विष्णु को जगाने के लिए, ब्रम्हाजी, देवी महामाया की स्तुति करने लगते है

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥६९॥

  • एकाग्रचित्त होकर ब्रम्हाजी,
  • भगवान विष्णु को जगाने के लिए,
  • उनके नेत्रों में निवास करने वाली,
  • योगनिद्रा की स्तुति करने लगे,
  • जो विष्णु भगवान को सुला रही थी।

5. देवी भगवती की महिमा, उनका प्रभाव और उनके स्वरुप

ब्रह्माजी, भगवती की स्तुति करते है

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम्।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्॥७०॥

  • जो इस विश्व की अधीश्वरी,
  • जगत को धारण करने वाली,
  • संसार का पालन और संहार करने वाली, तथा
  • तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं,
  • उन्हीं भगवती निद्रादेवी की,
  • भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।

स्वाहा, स्वधा और स्वर – देवी के स्वरुप

ब्रह्मोवाच॥७२॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधां त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥७३॥

  • ब्रह्मा जी ने कहा –
  • देवि तुम्हीं स्वाहा,
  • तुम्हीं स्वधा और
  • तम्ही वषट्कार हो।
  • स्वर भी,
  • तुम्हारे ही स्वरूप हैं।

ॐ कार की, तीनो मात्राओं में, देवी का स्वरुप

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥७४॥

  • तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो।
  • नित्य अक्षर प्रणव में,
  • अकार, उकार, मकार –
  • इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो, तथा
  • इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त
  • जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है,
  • जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता,
  • वह भी तुम्हीं हो।

देवी भगवती – जगत जननी और सृष्टि की रचना

त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥७५॥

  • देवि!
  • तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा
  • परम जननी हो।
  • देवि!
  • तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्ड को,
  • धारण करती हो।
  • तुम से ही इस जगत की,
  • सृष्टि होती है।

देवी माँ – जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार

त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्‍ते च सर्वदा।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥७६॥

  • तुम्हीं से इसका पालन होता है और
  • सदा तुम्ही कल्प के अंत में,
  • सबको अपना ग्रास बना लेती हो।
  • जगन्मयी देवि!
  • इस जगत की उत्पप्ति के समय तुम,
    • सृष्टिरूपा हो,
  • पालन-काल में,
    • स्थितिरूपा हो तथा
  • कल्पान्त के समय,
    • संहाररूप
  • धारण करने वाली हो।

तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली – माँ भगवती

तथा संहृतिरूपान्‍ते जगतोऽस्य जगन्मये।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥७७॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी॥७८॥

  • तुम्हीं महाविद्या, महामाया,
  • महामेधा, महास्मृति,
  • महामोह रूपा, महादेवी और महासुरी हो।
  • तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली,
  • सबकी प्रकृति हो।

श्री, ईश्वरी, ह्रीं और बुद्धि स्वरुप

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्‍च दारुणा।
त्वं श्रीस्त्वमीश्‍वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥७९॥

  • भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और
  • मोहरात्रि भी तुम्हीं हो।
  • तुम्हीं श्री,
  • तुम्हीं ईश्वरी,
  • तुम्हीं ह्रीं और
  • तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो।

शांति, क्षमा, तुष्टि स्वरुप

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा॥८०॥

  • लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और
  • क्षमा भी तुम्हीं हो।
  • तुम खङ्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा
  • गदा, चक्र, शंख और
  • धनुष धारण करने वाली हो।

देवी के अस्त्र और सौम्य स्वरुप

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी॥८१॥

  • बाण, भुशुण्डी और परिघ –
  • ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं।
  • तुम सौम्य और सौम्यतर हो –
  • इतना ही नहीं,
    • सौम्य अर्थात विनम्रता, शीतलता,
    • सुशीलता, कोमलता
  • जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं,
  • उन सबकी अपेक्षा,
  • तुम अत्याधिक सुन्दरी हो।

सत-असत सभी चीजों की शक्ति

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्‍वरी।
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥८२॥

  • पर और अपर – सबसे परे रहने वाली
  • परमेश्वरी तुम्हीं हो।
  • सर्वस्वरूपे देवि!
  • कहीं भी सत्-असत् रूप,
  • जो कुछ वस्तुएँ हैं और
  • उन सबकी जो शक्ति है,
  • वह तुम्हीं हो।

देवी की माया की शक्ति – भगवान् भी निद्रा में

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्॥८३॥

  • ऐसी अवस्था में,
  • तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है।
  • जो इस जगत की सृष्टि, पालन और
  • संहार करते हैं,
  • उन भगवान को भी,
  • जब तुमने,
  • निद्रा के अधीन कर दिया है,
  • तो तुम्हारी स्तुति करने में,
  • यहाँ कौन समर्थ हो सकता है।

देवी की, सृष्टि की रचना की शक्ति

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्‍वरः।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥

  • मुझको, भगवान शंकर को तथा
  • भगवान विष्णु को भी,
  • तुमने ही शरीर धारण कराया है।

देवी का उदार प्रभाव

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता॥८५॥

  • अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है।
  • देवि!
  • तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो।

देवता, भगवान् विष्णु को जगाने के लिए, माँ भगवती से, विनती करते है

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
बोधश्‍च क्रियतामस्य हन्‍तुमेतौ महासुरौ॥८७॥

  • ये जो दोनों दुर्घर्ष असुर मधु और कैटभ हैं,
  • इनको मोह में डाल दो, और
  • जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो।
  • साथ ही इनके भीतर,
  • इन दोनों असुरों को
    • मधु और कैटभ को
  • मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।

मधु और कैटभ के संहार के लिए, देवी महामाया का प्रादुर्भाव

ऋषिरुवाच॥८८॥
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा॥८९॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः॥९०॥

  • ऋषि कहते हैं – राजन्!
  • जब ब्रह्मा जी ने वहाँ,
  • मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से,
  • भगवान विष्णु को जगाने के लिए
  • तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी, योगनिद्रा की,
  • इस प्रकार स्तुति की,
  • तब वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका,
  • बाहु, हृदय और वक्ष स्थल से निकलकर,
  • अव्यक्तजन्मा
  • ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खडी हो गयी।

भगवान् विष्णु, योगनिद्रा से जागते है

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥

  • योगनिद्रा से मुक्त होने पर,
  • जगत के स्वामी भगवान जनार्दन,
  • उस एकार्णव के जल में,
  • शेषनाग की शय्या से जाग उठे।

भगवान् विष्णु, असुरों को देखते है

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ।
मधुकैटभो दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥९२॥

  • फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा।
  • वे दुरात्मा मधु और कैटभ,
  • अत्यन्त बलवान तथा परक्रमी थे और

क्रोधरक्‍तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः॥९३॥

  • क्रोध से ऑंखें लाल किये,
  • ब्रह्माजी को खा जाने के लिये,
  • उद्योग कर रहे थे।

मधु और कैटभ का, भगवान् विष्णु के साथ युद्ध

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ॥९४॥
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥९५॥

  • तब भगवान श्री हरि ने उठकर,
  • उन दोनों के साथ,
  • पाँच हजार वर्षों तक,
  • केवल बाहु युद्ध किया।
  • वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण,
  • उन्मत्त हो रहे थे।
  • तब महामाया ने उन्हें मोह में डाल दिया।
  • और वे भगवान विष्णु से कहने लगे –
  • हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं।
  • तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।

भगवती महामाया का, मधु और कैटभ पर, माया का प्रभाव

श्रीभगवानुवाच॥९६॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥९७॥

  • श्री भगवान् बोले –
  • यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो,
  • तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ।

भगवान् विष्णु, दैत्यों को, उनके हाथ से मरने के लिए कहते है

किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम॥९८॥

  • बस, इतना सा ही मैंने वर माँगा है।
  • यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।

असुरों को, गलती का अहसास होता है

ऋषिरुवाच॥९९॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्॥१००॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इस दैत्योको को,
  • अब अपनी भूल मालूम पड़ी।
  • उन्होंने देखा की,
  • सब जगह पानी ही पानी है, और
  • कही भी,
  • सुखा स्थान नहीं दिखाई दे रहा है।
  • कल्प –
    • प्रलय के अन्त में,
    • सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।

मधु और कैटभ का संहार, कौन सी जगह पर

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता॥१०१॥

  • तब कमलनयन भगवान से कहा –
  • जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो,
  • जहाँ सूखा स्थान हो,
  • वही हमारा वध करो।

भगवान्, मधु और कैटभ का वध करते है

ऋषिरुवाच॥१०२॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः॥१०३॥

  • ऋषि कहते हैं-
  • तब तथास्तु कहकर,
  • शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने,
  • उन दोनों के मस्तक, अपनी जाँघ पर रखकर,
  • चक्रसे काट डाले।

असुरों के संहार के लिए, देवी महामाया प्रकट हुई थी

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥१०४॥

  • इस प्रकार,
  • ये देवी महामाया,
  • ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं।
  • अब पुनः तुम से,
  • उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ,
  • सो सुनो।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥


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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 2

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Durga Saptashati – 2

दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 में –

  • देवताओं के तेज से,
  • देवी दुर्गा का प्रादुर्भाव, और
  • महिषासुर की सेना का वध

दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 का विनियोग और ध्यान

॥विनियोगः॥

ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः,
शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्,
श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – मध्यम चरित्रके विष्णु ऋषि,
  • महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द,
  • शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज,
  • वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है।
  • श्रीमहालक्ष्मीकी प्रसत्रताके लिये,
  • मध्यम चरित्रके पाठमें इसका विनियोग है।

॥ध्यानम्॥

महिषासुर-मर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका का ध्यान मन्त्र इस प्रकार है:
ॐ अक्षस्रक्‌परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥

ध्यान

  • मैं कमलके आसनपर बैठी हुई,
  • प्रसत्र मुखवाली महिषासुर-मर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका,
  • भजन करता ( करती) हूँ,
  • जो अपने हाथोंमें अक्षमाला,
  • फरसा, गदा, बाण, वज्र,
  • पद्य, धनुष, कुण्डिका, दण्ड,
  • शक्ति, खड़ग, ढाल, शुद्ध,
  • घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और
  • चक्र धारण करती हैं।

ऊँ नमश्चंडिकायैः नमः


दुर्गा सप्तशती अध्याय 2

महिषासुर युद्ध में देवताओं से जीत जाता है

ॐ ह्रीं ऋषिरुवाच॥१॥
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे॥२॥

  • मार्केंडेय ऋषि कहते हैं –
  • पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में,
  • सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था।
  • उसमें असुरोंका स्वामी महिषासुर था, और
  • देवताओंके नायक इंद्र थे।

तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम्।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः॥३॥

  • उस युद्धमें देवताओं की सेना
  • महाबली असुरों से परास्त हो गयी।
  • सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर,
  • महिषासुर इंद्र बन बैठा।

देवता, भगवान विष्णु और शंकरजी के पास जाते है

ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ॥४॥

  • तब पराजित देवता
  • प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके
  • उस स्थान पर गये,
  • जहाँ भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान थे।

यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम्।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्॥५॥

  • देवताओं ने महिषासुर के पराक्रम तथा
  • अपनी पराजय का पूरा वृतांत
  • उन दोनों देवेश्वरों से कह सुनाया।

देवता भगवान् को महिषासुर के आतंक के बताते है

सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च।
अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति॥६॥

  • वे बोले – भगवन्!
  • महिषासुर
  • सूर्य, इद्र, अग्रि, वायु,
  • चद्रमा, यम, वरुण तथा
  • अन्य देवताओं के भी अधिकार छीनकर,
  • स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बना बैठा है।

स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना॥७॥

  • उस दुरात्मा महिष ने
  • समस्त देवताओं को
  • स्वर्ग से निकाल दिया है।
  • अब वे मनुष्यों की भाँति
  • पृथ्वी पर विचरते हैं।

एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम्।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम्॥८॥

  • दैत्यों की यह सारी करतूत
  • हमने आपसे कह सुनाई।
  • अब हम आपकी ही शरण में हैं।
  • उसके वध का कोई उपाय सोचिए।

इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ॥९॥

  • देवताओं के वचन सुनकर,
  • भगवान विष्णु और शिव,
  • अत्यंत क्रोध से भर गये।

भगवान और देवताओं के तेज से देवी का प्रगट होना

ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः।
निश्‍चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च॥१०॥
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥११॥

  • कोप में भरे चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से,
  • एक महान तेज प्रकट हुआ।
  • इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर तथा
  • इंद्र आदि अन्य देवताओं के शरीर से भी,
  • बड़ा भारी तेज निकला।
  • वह सब तेज़ मिलकर एक हो गया।

अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्॥१२॥

  • वह तेज पुंज
  • जलते पर्वत सा जान पड़ा।
  • उसकी ज्वालाएं,
  • सभी दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं।
  • समस्त देवताओं के शरीर से प्रकट हुए,
  • उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी।

अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥१३॥

  • एकत्रित होने पर,
  • वह नारीरूप में परिणत हो गया और
  • अपने प्रकाश से
  • तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा।

यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम्।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा॥१४॥

  • भगवान शंकर का जो तेज़ था,
  • उससे देवी का मुख प्रकट हुआ।
  • यमराज के तेज से,
  • सिर के बाल निकल आए।
  • श्रीविष्णु के तेज से,
  • भुजाएं उत्पन्न हुईं।

सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्।
वारुणेन च जङ्‍घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः॥१५॥

  • चंद्रमा के तेज़ से,
  • वक्षस्थल का और
  • इंद्र के तेज़ से,
  • मध्यभाग (कटिप्रदेश) का प्रादुर्भाव हुआ।
  • वरुण के तेज से,
  • जंघा और पिंडली तथा
  • पृथ्वी के तेज से,
  • नितम्ब भाग प्रकट हुआ।

ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्‌गुल्योऽर्कतेजसा।
वसूनां च कराङ्‌गुल्यः कौबेरेण च नासिका॥१६॥

  • ब्रह्मा के तेज से,
  • दोनों चरण और
  • सूर्य के तेज से,
  • उनकी अंगुलियां हुईं।
  • वसुओं के तेज से,
  • हाथों की अँगुलियां और
  • कुबेर के तेज से,
  • नासिका प्रकट हुई।

तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा॥१७॥

  • उस देवी के दाँत,
  • प्रजापति के तेज से और
  • तीनों नेत्र,
  • अग्नि के तेज़ से प्रकट हुए।

भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा॥१८॥

  • उनकी भौंहें,
  • संध्या के और
  • कान,
  • वायु के तेज से उत्पन्न हुए थे।
  • उसी प्रकार,
  • अन्यान्य देवताओं के तेज से भी,
  • उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ।

ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः॥१९॥

  • समस्त देवताओं के तेजपुंज से,
  • प्रकट हुई देवी को देखकर,
  • महिषासुर के सताए देवता बहुत प्रसन्न हुए।

शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक्।
चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः॥२०॥

  • पिनाकधारी भगवान शंकर ने,
  • अपने शूल से एक शूल निकालकर उन्हें दिया।
  • फिर भगवान विष्णु ने भी,
  • अपने चक्रसे चक्र उत्पन्न करके,
  • भगवती को अर्पण किया।

शङ्‌खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः।
मारुतो दत्तवांश्‍चापं बाणपूर्णे तथेषुधी॥२१॥

  • वरुण ने शंख भेंट किया,
  • अग्नि ने शक्ति दी और
  • वायु ने धनुष तथा बाण से भरे हुए दो तरकस प्रदान किए।

वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात्॥२२॥

  • सहस्र नेत्रों वाले देवराज इंद्र ने,
  • अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और
  • ऐरावत हाथी से उतारकर एक घंटा भी प्रदान किया।

कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ।
प्रजापतिश्‍चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम्॥२३॥

  • यमराज ने कालदंड से दंड,
  • वरूण ने पाश,
  • प्रजापति ने स्फटिक की माला दी।
  • ब्रह्माजी ने कमंडलु भेंट किया।

समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः।
कालश्‍च दत्तवान् खड्‌गं तस्याश्‍चर्म च निर्मलम्॥२४॥

  • सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में,
  • अपनी किरणों का तेज भर दिया।
  • काल ने चमकती ढाल और तलवार दी।

क्षीरोदश्‍चामलं हारमजरे च तथाम्बरे।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च॥२५॥

  • क्षीरसागर ने
  • धवल हार तथा
  • कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये।

अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम्॥२६॥
अङ्‌गुलीयकरत्‍नानि समस्तास्वङ्‌गुलीषु च।
विश्‍वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम्॥२७॥

  • साथ ही उन्होंने,
  • दिव्य चूडामणि, दो कुंडल,
  • कड़े, उज्जवल अर्धचंद्र,
  • सब बाहुओं के लिए केयूर, दोनों चरणों के लिए निर्मल नूपुर,
  • गले की हंसली और सब अंगुलियों के लिए रत्नों की अंगूठियां भी दीं।
  • विश्वकर्मा ने उन्हें फरसा भेंट किया।

अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।
अम्लानपङ्‌कजां मालां शिरस्युरसि चापराम्॥२८॥

  • साथ ही अनेक प्रकार के,
  • अस्त्र और अभेद्य कवच दिए।
  • इनके अलावा,
  • मस्तक और वक्ष:स्थल पर धारण करने के लिए,
  • कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएं दीं।

अददज्जलधिस्तस्यै पङ्‌कजं चातिशोभनम्।
हिमवा‍न् वाहनं सिंहं रत्‍नानि विविधानि च॥२९॥

  • जलधि ने
  • उन्हें सुंदर कमल का फूल भेंट किया।
  • हिमालय ने
  • सवारी के लिए सिंह तथा
  • भांति-भांति के रत्न समर्पित किए।

ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः।
शेषश्‍च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम्॥३०॥
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्॥

  • धनाध्यक्ष कुबेर ने,
  • मधु से भरा पानपात्र दिया तथा
  • सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने,
  • जो इस पृथ्वी का धारण करते हैं,
  • उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट किया।

अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा॥३१॥

  • इसी प्रकार,
  • अन्य देवताओं ने भी,
  • आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर,
  • देवी का सम्मान किया।

सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः॥३२॥

  • इसके पश्चात देवी ने,
  • अट्ठासपूर्वक उच्च स्वर से गर्जना की।
  • उस भयंकर नाद से,
  • संपूर्ण आकाश गूंज उठा।

अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत्।
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्‍च चकम्पिरे॥३३॥

  • देवी का वह अत्यंत उच्च स्वरसे किया हुआ सिंहनाद,
  • कहीं समा ना सका,
  • आकाश में बड़ी ज़ोर की प्रतिध्वनि हुई,
  • जिससे सम्पूर्ण विश्व में हलचल मच गयी और
  • समुद्र क़ांप उठे।

चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्‍च महीधराः।
जयेति देवाश्‍च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्॥३४॥

  • पृथ्वी डोलने लगी और
  • समस्त पर्वत हिलने लगे।
  • उस समय देवताओं ने,
  • अत्यंत प्रसन्नता के साथ,
  • सिंहवाहिनी भवानी से कहा-
  • देवि! तुम्हारी जय हो।

तुष्टुवुर्मुनयश्‍चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः।
दृष्ट्‌वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः॥३५॥

  • महर्षियों ने
  • भक्तिभाव से विनम्र होकर,
  • उन्हे नमस्कार किया।

सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः।
आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः॥३६॥

  • संपूर्ण त्रिलोकी को,
  • क्षोभग्रस्त देख,
  • दैत्य अपनी समस्त सेना को,
  • कवच आदि से सुसज्जित कर,
  • हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गए।
  • महिषासुर ने बड़े क्रोध में आकर कहा –
  • यह क्या हो रहा है?

अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः।
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा॥३७॥

  • फिर वह (महिषासुर),
  • असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और
  • आगे पहुंचकर उसने देवी को देखा,
  • जो अपनी प्रभा से,
  • तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं।

पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम्।
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम्॥३८॥

  • उनके चरणों के भार से,
  • पृथ्वी दबी जा रही थी।
  • माथे के मुकुट से,
  • आकाश में रेखा सी खिंच रही थी।
  • अपने धनुष की टंकार से,
  • वह सातों पातालों को क्षुब्ध कर देती थीं।

दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्।
ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम्॥३९॥

  • देवी अपनी हजारों भुजाओं से,
  • सभी दिशाओं को आच्छादित करके खड़ी थीं।
  • उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया।

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम्।
महिषासुरसेनानीश्‍चिक्षुराख्यो महासुरः॥४०॥

  • नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से,
  • दिशाएं उद्भासित होने लगीं।
  • चिक्षुर नामक असुर,
  • महिषासुर का सेनानायक था।

युयुधे चामरश्‍चान्यैश्‍चतुरङ्‌गबलान्वितः।
रथानामयुतैः षड्‌भिरुदग्राख्यो महासुरः॥४१॥

  • वह देवी के साथ युद्ध करने लगा।
  • चतुरंगिनी सेना लेकर चामर भी लडऩे लगा।
  • साठ हजार रथियों के साथ आकर,
  • उदग्र नामक महादैत्य ने लोहा लिया।

अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः।
पञ्चाशद्‌भिश्‍च नियुतैरसिलोमा महासुरः॥४२॥

  • एक करोड़ रथियों को साथ लेकर,
  • महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा।
  • तलवार के समान तीखे रोएं वाला,
  • असिलोमा नामक असुर,
  • पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा।
  • साठ लाख रथियों से घिरा,
  • बाष्कल नामक दैत्य भी,
  • उस युद्धभूमि में लडऩे लगा।

अयुतानां शतैः षड्‌भिर्बाष्कलो युयुधे रणे।
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः॥४३॥

  • परिवारित नामक राक्षस,
  • हाथीसवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा
  • एक करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा।
  • बिडाल नामक दैत्य,
  • पांच अरब रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा।
  • इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य,
  • रथ, हाथी और करोड़ों की सेना साथ लेकर,
  • देवी के साथ युद्ध करने लगे।

वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत।
बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः॥४४॥
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः।
अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः॥४५॥
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा॥४६॥
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः।
तोमरैर्भिन्दिपालैश्‍च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा॥४७॥
युयुधुः संयुगे देव्या खड्‌गैः परशुपट्टिशैः।
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे॥४८॥
देवीं खड्‍गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः।
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका॥४९॥

  • स्वयं महिषासुर रणभूमि में,
  • सहस्र रथ, हाथी और करोड़ों की सेना से घिरा हुआ खड़ा था।
  • वे दैत्य देवी के साथ
  • तोमर, भिदिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और
  • पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए,
  • युद्ध कर रहे थे।

लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी।
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः॥५०॥

  • देवी ने क्रोध में भरकर,
  • खेल-खेलमें ही अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके,
  • दैत्यों के समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले।
  • उनके मुख पर परिश्रम या
  • थकावट का लेशमात्र भी चिह्न नहीं था।

मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्‍वरी।
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी॥५१॥

  • देवता और ऋषि,
  • उनकी स्तुति करते थे और
  • वे भगवती परमेश्वरी,
  • दैत्यों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करती रहीं।
  • देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भरकर,
  • गर्दन के बालों को हिलाता हुआ,
  • असुरों की सेना में इस प्रकार विचरने लगा,
  • मानो वनों में दावानल फैल रहा हो।

चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः।
निःश्‍वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका॥५२॥

  • रणभूमि में दैत्यों के साथ युद्ध करती हुई अम्बिका देवी ने,
  • जितने नि:श्वास छोड़े,
  • वे तत्काल सैकड़ों-हजारों गणों के रूप में प्रकट हो गए और
  • परशु, भिदिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रों द्वारा,
  • सुरों का सामना करने लगे।

त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः॥५३॥
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्‍त्युपबृंहिताः।
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्‌खांस्तथापरे॥५४॥

  • देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे गण,
  • असुरों का नाश करते हुए,
  • नगाड़ा और शंख आदि बाजे बजाने लगे।

मृदङ्‌गांश्‍च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे।
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः॥५५॥

  • उस संग्राम-महोत्सव में,
  • कितने ही गण मृदंग बजा रहे थे।
  • तदंतर देवी ने,
  • त्रिशूल से, गदा से,
  • शक्ति की वर्षासे और खड्ग आदि से,
  • सैकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला।

खड्‌गादिभिश्‍च शतशो निजघान महासुरान्।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्॥५६॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्‌ध्वा चान्यानकर्षयत्।
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्‌गपातैस्तथापरे॥५७॥

  • कितनों को कांटे के भयंकर नाद से,
  • मूर्च्छित करके मारा।
  • बहुतेरो को पाश से बांधकर धरती पर घसीटा।
  • अनगिनत दैत्य उनकी तलवार की मार से टुकड़े हो गए।

विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते।
वेमुश्‍च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः॥५८॥

  • कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गए।
  • कितने ही मूसल की मार से रक्त वमन करने लगे।

केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि।
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे॥५९॥
श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः।
केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे॥६०॥

  • बाज की तरह झपटने वाले दैत्य,
  • अपने प्राणों से हाथ धोने लगे।
  • कुछ की बांहें छिन्न-भिन्न हो गईं।
  • कितनों के गर्दन, मस्तक कटकर गिरे।

शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः।
विच्छिन्नजङ्‌घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः॥६१॥
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः।
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः॥६२॥
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः।
ननृतुश्‍चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः॥६३॥

  • मस्तक कट जाने पर भी फिर उठ जाते और
  • केवल धड़ के ही रूप में ही युद्ध करने लगते।
  • दूसरे कबध युद्ध के बाजों की लय पर नाचते।

कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्‌गशक्त्यृष्टिपाणयः।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः॥६४॥

  • कितने ही बिना सिर के धड़,
  • हाथों में खड्ग और शक्ति लिए,
  • दौड़ते थे तथा
  • दूसरे-दूसरे महादैत्य ‘ठहरो! ठहरो!! यह कहते हुए देवी को,
  • युद्ध के लिये ललकारते थे।

पातितै रथनागाश्‍वैरसुरैश्‍च वसुन्धरा।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः॥६५॥

  • जहां संग्राम हुआ, वहां की धरती,
  • देवी के गिराए हुए,
  • रथ, हाथी, धोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गयी थी कि,
  • वहां चलना-फिरना असम्भव हो गया था।

शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम्॥६६॥

  • दैत्यों की सेना में,
  • हाथी, घोड़े और असुरों के शरीरों से,
  • इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ था कि,
  • थोड़ी ही देर में वहां खून की बड़ी-बड़ी नदियां बहने लगीं।

क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम्॥६७॥

  • जगदम्बा ने,
  • असुरों की विशाल सेना को,
  • क्षणभर में नष्ट कर दिया।
  • ठीक उसी तरह,
  • जैसे तृण और काठ के भारी ढेर को
  • आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है।

स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति॥६८॥

  • वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिलाकर,
  • जोर-जोर से गर्जना करता हुआ,
  • दैत्यों के शरीरों से मानों उनके प्राण चुन लेता था।

देव्या गणैश्‍च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः।
यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि॥ॐ॥६९॥

  • वहां देवीके गणों ने भी,
  • उन महादैत्यों के साथ ऐसा युद्ध किया,
  • जिससे आकाश में खड़े देवतागण,
  • उन पर बहुत संतुष्ट हुए और
  • फूल बरसाने लगे।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णक मन्वतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में महिषासुर की सेना का वध,
  • नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 3

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Durga Saptashati – 3

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 में –

  • सेनापतियोंसहित महिषासुर का वध

दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 का ध्यान

॥ध्यानम्॥

ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्‍नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥

ध्यान

  • जगदम्बाके श्रीअंगोकी कान्ति उदयकालके सहस्रों सूर्योंके समान है।
  • वे लाल रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए हैं।
  • उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही है।
  • दोनों स्तनोंपर रक्त चन्दनका लेप लगा है।
  • वे अपने कर-कमलोंमें,
  • जपमालिका, विद्या और अभय तथा
  • वर नामक मुद्राएँ धारण किये हुए हैं।
  • तीन नेत्रोंसे सुशोभित,
  • मुखार विन्दकी बड़ी शोभा हो रही है।
  • उनके मस्तकपर,
  • चन्द्रमाके साथ ही,
  • रत्नमय मुकुट बँधा है तथा
  • वे कमलके आसन पर विराजमान हैं।
  • ऐसी देवीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता (करती) हूँ।

सेनापति चिक्षुर का संहार

सेनापति चिक्षुर, अम्बिका देवी से युद्ध करने के लिए आया

ॐ ऋषिररुवाच॥१॥
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः।
सेनानीश्‍चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्‍धुमथाम्बिकाम्॥२॥

  • ऋषि कहते है –
  • दैत्यों की सेना को इस प्रकार तहस-नहस होते देख,
  • महादैत्य सेनापति चिक्षुर क्रोध में भरकर,
  • अम्बिका देवीसे युद्ध करने के लिये आगे बढ़ा।

स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः।
यथा मेरुगिरेः श्रृङ्‌गं तोयवर्षेण तोयदः॥३॥

  • वह असुर,
  • रणभूमि में देवी के ऊपर,
  • इस प्रकार बाणवर्षा करने लगा,
  • जैसे बादल,
  • मेरुगिरि के शिखर पर,
  • पानी की धार बरसा रहा हो।

अम्बिका देवी ने, सेनापति चिक्षुर के, बाणों को और शस्त्रों को काट डाला

तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्।
जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम्॥४॥
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः॥५॥

  • तब देवी ने,
  • अपने बाणों से उसके बाण समूह को,
  • अनायास ही काटकर,
  • उसके घोड़ों और सारथि को भी मार डाला।
  • साथ ही उसके धनुष तथा
  • अत्यंत ऊंची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया।
  • धनुष कट जाने पर,
  • उसके अंगों को,
  • अपने बाणों से बींध डाला।

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्‍वो हतसारथिः।
अभ्यधावत तां देवीं खड्‌गचर्मधरोऽसुरः॥६॥

  • धनुष, रथ, घोड़े और सारथि के नष्ट हो जाने पर,
  • वह असुर,
  • ढाल और तलवार लेकर,
  • देवी की ऒर दौड़ा।

सिंहमाहत्य खड्‌गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान्॥७॥

  • उसने तीखी धार वाली तलवार से,
  • सिंह के मस्तक पर चोट करके,
  • देवी की भी बायीं भुजा में,
  • बड़े वेग से प्रहार किया।

तस्याः खड्‌गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः॥८॥

  • राजन्! देवी की बांह पर पहुंचते ही,
  • वह तलवार टूट गयी।
  • फिर तो क्रोध से लाल आंखें करके,
  • उस राक्षस ने शूल हाथ में लिया।

माँ अम्बिका ने, सेनापति चिक्षुर का संहार किया

चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात्॥९॥

  • उसे, उस महादैत्य ने,
  • भगवती भद्रकाली के ऊपर चलाया।
  • वह शूल आकाश से गिरते हुए,
  • सूर्यमंडल की भाँति,
  • अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा।

दृष्ट्‍वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत।
तच्छूलं* शतधा तेन नीतं स च महासुरः॥१०॥

  • उस शूल को,
  • अपनी ऒर आते देख,
  • देवी ने भी शूल का प्रहार किया।
  • उससे राक्षस के शूल के,
  • सैकड़ों टुकड़े हो गए,
  • साथ ही महादैत्य चिक्षुर की भी धज्जियां उड़ गईं।
  • वह प्राणों से हाथ धो बैठा।

चामर का वध

चामर, माँ जगदम्बा से युद्ध करने के लिए आया

हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्‍चामरस्त्रिदशार्दनः॥११॥

  • महिषासुर के सेनापति,
  • उस महापराक्रमी चिक्षुर के मारे जाने पर,
  • देवताऒं को पीड़ा देनेवाला चामर,
  • हाथी पर चढ़कर आया।

सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।
हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम्॥१२॥

  • उसने भी देवी के ऊपर शक्ति का प्रहार किया,
  • किंतु जगदम्बा ने उसे,
  • अपने हुंकार से ही,
  • आहत एवं निष्प्रभ करके,
  • पृथ्वी पर गिरा दिया।

भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्‌वा क्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत्॥१३॥

  • शक्ति टूटकर गिरी हुई देख,
  • चामर को बड़ा क्रोध हुआ।
  • अब उसने शूल चलाया,
  • किंतु देवी ने उसे भी,
  • अपने बाणों द्वारा काट डाला।

देवी माँ के सिंह ने, चामर का वध किया

ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा॥१४॥

  • इतने में ही देवी का सिंह उछलकर,
  • हाथी के मस्तकपर चढ़ बैठा और
  • उस दैत्य के साथ,
  • खूब जोर लगाकर बाहुयुद्ध करने लगा।

युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः॥१५॥

  • वे दोनों लड़ते-लड़ते,
  • हाथी से पृथ्वीपर आ गए और
  • क्रोध में भरकर एक-दूसरे पर,
  • बड़े भयंकर प्रहार करते हुए लडऩे लगे।

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्‍चामरस्य पृथक्कृतम्॥१६॥

  • उसके बाद सिंह,
  • बड़े वेग से आकाश की ऒर उछला और
  • उधर से गिरते समय उसने पंजों की मार से,
  • चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।

माँ जगदम्बा ने, उदग्र, कराल आदि दूसरे राक्षसों का संहार किया

उदग्रश्‍च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।
दन्तमुष्टितलैश्‍चैव करालश्‍च निपातितः॥१७॥

  • इसी प्रकार उदग्र भी,
  • शिला और वृक्ष आदि की मार खाकर,
  • रणभूमि में देवी के हाथसे मारा गया तथा
  • कराल भी,
  • दाँतों, मुक्कों और थपड़ों की चोट से धराशायी हो गया।

देवी क्रुद्धा गदापातैश्‍चूर्णयामास चोद्धतम्।
बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम्॥१८॥

  • क्रोध में भरी हुई देवी ने,
  • गदा की चोट से,
  • उद्धत का कचूमर निकाल डाला।
  • भिदिपाल से वाष्कल को तथा
  • बाणों से ताम्र और अधक को,
  • मौत के घाट उतार दिया।

उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी॥१९॥

  • तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने,
  • त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा
  • महाहनु नामक दैत्य को मार डाला।

बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्*॥२०॥

  • तलवार की चोट से,
  • विडाल के मस्तक को धड़ से काट गिराया।
  • दुर्धर और दुर्मुख इन दोनों को भी,
  • अपने बाणों से यमलोक भेज दिया।

महिषासुर का वध

महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण किया

एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान्॥२१॥

  • इस प्रकार अपनी सेना का संहार होता देख,
  • महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके,
  • देवी के गणों पर प्रहार आरम्भ किया।

कांश्‍चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।
लाङ्‌गूलताडितांश्‍चान्याञ्छृङ्‌गाभ्यां च विदारितान्॥२२॥
वेगेन कांश्‍चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।
निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले॥२३॥

  • महिषासुर थूथुन से मारकर, खुरों का प्रहार करके,
  • पूंछ से चोट पहुंचाकर, सींगों से विदीर्ण करके,
  • कुछ को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और
  • नि:श्वास-वायु के झोंके से,
  • देवी के गणों को धराशायी कर दिया।

निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका॥२४॥

  • इस प्रकार गणों की सेना को गिराकर,
  • वह असुर,
  • महादेवी के सिंह को मारने के लिए झपटा।
  • इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ।

सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।
श्रृङ्‌गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च॥२५॥

  • उधर महापराक्रमी महिषासुर भी,
  • क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा।
  • अपने सींगों से ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को,
  • उठाकर फेंकने और गर्जने लगा।

वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।
लाङ्‌गूलेनाहतश्‍चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः॥२६॥

  • उसके वेग से चक्कर देने के कारण,
  • पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी।
  • उसकी पूंछ से टकराकर समुद्र,
  • सब ऒर से धरती को डुबोने लगा।

धुतश्रृङ्‌गविभिन्नाश्‍च खण्डं* खण्डं ययुर्घनाः।
श्‍वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः॥२७॥

  • हिलते हुए सींगों के आघात से विदीर्ण होकर,
  • बादलों के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
  • उसके श्वास की प्रचंड वायु के वेग से,
  • उड़े हुए सैकड़ों पर्वत,
  • आकाश से गिरने लगे।

महिषासुर ने सिंह का रूप धारण किया

इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।
दृष्ट्‌वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत्॥२८॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे॥२९॥

  • इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य को,
  • अपनी ऒर आते देख,
  • चंडिका ने,
  • उसका वध करने के लिए,
  • महान क्रोध किया।
  • उन्होंने पाश फेंककर,
  • उस महान असुर को बांध लिया।
  • उस महासंग्राम में बँध जाने पर,
  • उसने भैंसे का रूप त्यागकर,
  • तत्काल सिंह के रूप में प्रकट हो गया।

महिषासुर खड्गधारी पुरुष के रूप में

ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।
छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्‌गपाणिरदृश्यत॥३०॥

  • उस अवस्था में जगदम्बा,
  • ज्योंही उसका मस्तक काटने के लिए उद्दत हुईं,
  • त्योंही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखायी देने लगा।

महिषासुर हाथी के रूप में

तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।
तं खड्‌गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः॥३१॥

  • तब देवी ने तुरंत ही बाणों की वर्षा करके,
  • ढाल और तलवार के साथ,
  • उस पुरुष को भी बींध डाला।
  • इतने में ही वह महान गजराज के रूप में परिणत हो गया।

करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।
कर्षतस्तु करं देवी खड्‌गेन निरकृन्तत॥३२॥

  • वह अपनी सूंड़ से,
  • देवी के विशाल सिंह को खींचने और गर्जने लगा।
  • खींचते समय देवी ने तलवार से,
  • उसकी सूँड़ काट डाली।

महिषासुर फिर से भैंसे के रूप में

ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम्॥३३॥

  • तब उस महादैत्य ने,
  • पुन: भैंसे का शरीर धारण कर लिया और
  • पहले की ही भांति,
  • चराचर प्राणियों सहित,
  • तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा।

ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।
पपौ पुनः पुनश्‍चैव जहासारुणलोचना॥३४॥

  • तब क्रोध में भरी हुई जगत माता चंडिका,
  • बारंबार उत्तम मधु का पान करने और
  • लाल आंखें करके हंसने लगीं।

ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्‌धतः।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान्॥३५॥

  • उधर वह बल और पराक्रम के मद से,
  • उमड़ा हुआ राक्षस गर्जने लगा और
  • अपने सींगों से,
  • चंडी के ऊपर,
  • पर्वतों को फेंकने लगा।

सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।
उवाच तं मदोद्‌धूतमुखरागाकुलाक्षरम्॥३६॥

  • उस समय देवी अपने बाणों के समूहों से,
  • उसके फेंके हुए पर्वतों को,
  • चूर्ण करती हुई बोलीं।
  • बोलते समय उनका मुख,
  • मधु के मद से लाल हो रहा था और
  • वाणी लडख़ड़ा रही थी।

देव्युवाच॥३७॥
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥३८॥

  • देवीने कहा –
  • ऒ मूढ़! मैं जब तक मधु पीती हं,
  • तब तक तू क्षणभर के लिए खूब गर्जना कर ले।
  • मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर
  • अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे।

ऋषिरुवाच॥३९॥
एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्॥४०॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इतना कहकर देवी उछलीं और
  • उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गईं।
  • फिर अपने पैर से उसे दबाकर,
  • उन्होंने शूल से उसके कंठ में आघात किया।

ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्* देव्या वीर्येण संवृतः॥४१॥

  • उनके पैर से दबा होने पर भी,
  • महिषासुर अपने मुख से,
  • दूसरे रूपमें बाहर होने लगा।
  • अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकलने पाया था कि,
  • देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया।

अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः*॥४२॥

  • आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य,
  • देवी से युद्ध करने लगा।
  • तब देवी ने बहुत बड़ी तलवार से,
  • उसका मस्तक काट गिराया।

ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्।
प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः॥४३॥

  • फिर तो हाहाकार करती हुई,
  • दैत्यों की सारी सेना भाग गई तथा
  • देवता अत्यंत प्रसन्न हो गए।

तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्‍चाप्सरोगणाः॥ॐ॥४४॥

  • देवताऒंने दिव्य महर्षियों के साथ,
  • दुर्गा देवी की स्तुति की।
  • गंधर्वराज गाने लगे तथा
  • असराएं नृत्य करने लगीं।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवी माहाम्य में, – महिषासुरवध नामक,
  • तीसरा अध्याय संपन्न हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 4

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Durga Saptashati – 4

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 में –

  • इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 का ध्यान

॥ध्यानम्॥

ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शड्‌खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥

ध्यान

  • सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले पुरुष,
  • जिनकी सेवा करते हैं तथा
  • देवता जिन्हें सब ओरसे घेरे रहते हैं,
  • उन – जया – नामवाली दुर्गा देवीका ध्यान करे।
  • उनके श्रीअंगोकी आभा,
  • काले मेघके समान श्याम है।
  • वे अपने कटाक्षोंसे,
  • शत्रुसमूहको भय प्रदान करती हैं।
  • उनके मस्तकपर,
  • आबद्ध चन्द्रमाकी रेखा शोभा पाती है।
  • वे अपने हाथोंमें,
  • शुद्ध, चक्र, कृपाण और
  • त्रिशूल धारण करती हैं।
  • उनके तीन नेत्र हैं।
  • वे सिंहके कंधेपर चढ़ी हुई हैं और
  • अपने तेजसे,
  • तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं।

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये
तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्‌गमचारुदेहाः॥२॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • अत्यन्त पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा
  • उसकी दैत्य-सेनाके,
  • देवीके हाथसे मारे जानेपर,
  • इन्द्र आदि देवता प्रणामके लिये,
  • गर्दन तथा कंधे झुकाकर,
  • उन भगवती दुर्गा की उत्तम वचनोंद्वारा,
  • स्तुति करने लगे।
  • उस समय उनके सुन्दर अंगोमे,
  • अत्यन्त हर्षके कारण रोमांच हो आया था।

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निश्‍शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥३॥

  • देवता बोले –
  • संपूर्ण देवताओंकी शक्तिका समुदाय ही,
  • जिनका स्वरूप है तथा
  • जिन देवीने अपनी शक्तिसे,
  • संपूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है,
  • समस्त देवताओं और महर्षियोंकी पूजनीया
  • उन जगदम्बाको,
  • हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं।
  • वे हम लोगोंका कल्याण करें।।३।।

यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्‍च न हि वक्तुमलं बलं च।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥४॥

  • जिनके अनुपम प्रभाव और
  • बलका वर्णन करनेमें,
  • भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा
  • महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं,
  • वे भगवती चण्डिका,
  • सम्पूर्ण जगत्‌का पालन एवं
  • अशुभ भयका नाश,
  • करनेका विचार करें।

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्‍वम्॥५॥

  • जो पुण्यात्माओंके घरोंमें,
    • स्वयं ही लक्ष्मीरूपसे,
  • पापियोंके यहाँ,
    • दरिद्रतारूपसे,
  • शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरूषोंके हृदयमें,
    • बुद्धिरूपसे,
  • सतपुरुषोंमें
    • श्रद्धारूपसे तथा
  • कुलीन मनुष्यमें,
    • लज्जारूपसे निवास करती हैं,
  • उन आप भगवती दुर्गाको,
  • हम नमस्कार करते हैं।
  • देवि! आप संपूर्ण विश्वका पालन कीजिये।

किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत्
किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि।
किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि
सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु॥६॥

  • देवि! आपके इस अचिन्त्य रूपका,
  • असुरोंका नाश करनेवाले भारी पराक्रमका तथा
  • समस्त देवताओं और दैत्योंके समक्ष,
  • युद्धमें प्रकट किये हुए,
  • आपके अद्भुत चरित्रोंका,
  • हम किस प्रकार वर्णन करें।

हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषैर्न
ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा।
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-
मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या॥७॥

  • आप संपूर्ण जगत्‌की उत्पत्तिमें कारण हैं।
  • आपमें सत्त्वगुण, रजोगुण और
  • तमोगुण – ये तीनों गुण मौजूद हैं;
  • तो भी दोषोंके साथ,
  • आपका संसर्ग नहीं जान पड़ता।
  • भगवान् विष्णु और महादेवजी आदि देवता भी,
  • आपका पार नहीं पाते।
  • आप ही सबका आश्रय हैं।
  • यह समस्त जगत् आपका अंशभूत है;
  • क्योंकि आप सबकी आदिभूत अव्याकृता परा प्रकृति हैं।

यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन
तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि।
स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-
रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च॥८॥

  • देवि! संपूर्ण यज्ञोंमें जिसके उच्चारणसे,
  • सब देवता तृप्ति लाभ करते हैं,
  • वह स्वाहा आप ही हैं।
  • इसके अतिरिक्त आप पितरोंकी भी,
  • तृप्तिका कारण हैं,
  • अतएव सब लोग आपको,
  • स्वधा भी कहते हैं।

या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्व*-
मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः।
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-
र्विर्द्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥९॥

  • देवि! जो मोक्षकी प्राप्तिका साधन है,
  • अचित्य महाव्रत स्वरूपा है,
  • समस्त दोषोंसे रहित, जितेन्द्रिय,
  • तत्त्वको ही सार वस्तु माननेवाले तथा
  • मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मुनिजन,
  • जिसका अभ्यास करते हैं,
  • वह भगवती परा विद्या आप ही हैं।

शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान-
मुद्‌गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम्।
देवी त्रयी भगवती भवभावनाय
वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री॥१०॥

  • आप शब्दस्वरूपा हैं,
  • अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा
  • उद्‌गीथके मनोहर पदोंके पाठसे युक्त,
  • सामवेदका भी आधार आप ही हैं।
  • आप देवी, त्रयी (तीनों वेद) और
  • भगवती (छहों ऐश्वर्योंसे युक्त) हैं।
  • इस विश्वकी उत्पत्ति एवं पालनके लिये,
  • आप ही वार्ता (खेती एवं आजीविका) के रूप में,
  • प्रकट हुई हैं।
  • आप सम्यूर्ण जगत्‌की घोर पीड़ाका,
  • नाश करनेवाली हैं।

मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा
दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्‌गा।
श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा
गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा॥११॥

  • देवि! जिससे समस्त शास्त्रोंके सारका ज्ञान होता है,
  • वह मेधाशक्ति आप ही हैं।
  • दुर्गम भवसागरसे पार उतारनेवाली,
  • नौकारूप दुर्गादेवी भी आप ही हैं।
  • आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है।
  • कैटभके शत्रु,
  • भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें,
  • एकमात्र निवास करनेवाली भगवती लक्ष्मी तथा
  • भगवान् चन्द्रशेखर द्वारा सम्मानित,
  • गौरी देवी भी आप ही हैं।

ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र-
बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम्।
अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि
वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण॥१२॥

  • आपका मुख,
  • मन्द मुसकानसे सुशोभित,
  • निर्मल, पूर्ण चन्द्रमाके बिम्बका अनुकरण करनेवाला और
  • उत्तम सुवर्णकी मनोहर कान्तिसे कमनीय है;
  • तो भी उसे देखकर महिषासुरको क्रोध हुआ और
  • सहसा उसने उसपर प्रहार कर दिया,
  • यह बड़े आश्चर्यकी बात है।

दृष्ट्‌वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल-
मुद्यच्छशाङ्‌कसदृशच्छवि यन्न सद्यः।
प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं
कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन॥१३॥

  • देवि! वही मुख जब क्रोधसे युक्त होनेपर,
  • उदयकालके चन्द्रमाकी भांति लाल और
  • तनी हुई भौंहोंके कारण विकराल हो उठा,
  • तब उसे देखकर,
  • जो महिषासुरके प्राण,
  • तुरंत नहीं निकल गये,
  • यह उससे भी बढ़कर आश्चर्यकी बात है;
  • क्योंकि क्रोधमें भरे हुए यमराजको देखकर
  • भला कौन जीवित रह सकता है?।

देवि प्रसीद परमा भवती भवाय
सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि।
विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत-
न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य॥१४॥

  • देवि! आप प्रसन्न हों।
  • परमात्मस्वरूपा, आपके प्रसत्र होनेपर,
  • जगत्‌का अभुदय होता है और
  • क्रोधमें भर जानेपर आप,
  • तत्काल ही कितने कुलोंका,
  • सर्वनाश कर डालती हैं,
  • यह बात अभी अनुभवमें आयी है;
  • क्योंकि महिषासुरकी यह विशाल सेना,
  • क्षणभरमें आपके कोपसे नष्ट हो गयी है।

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां
तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥१५॥

  • सदा अभ्युदय प्रदान करनेवाली,
  • आप जिनपर प्रसन्न रहती हैं,
  • वे ही देशमें सम्मानित हैं,
  • उन्हींको धन और यशकी प्राप्ति होती है,
  • उन्हींका धर्म कभी शिथिल नहीं होता तथा
  • वे ही अपने हृष्ट-पुष्ट स्त्री, पुत्र और
  • भाईयोके साथ धन्य माने जाते हैं।

धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा-
ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति।
स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा-
ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन॥१६॥

  • देवि! आपकी ही कृपासे पुण्यात्मा पुरुष,
  • प्रतिदिन अत्यन्त श्रद्धापूर्वक,
  • सदा सब प्रकारके धर्मानुकूल कर्म करता है और
  • उसके प्रभावसे स्वर्गलोकमें जाता है;
  • इसलिये,
  • आप तीनों लोकोंमें,
  • निश्चय ही मनोवांछित फल देनेवाली हैं।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥१७॥

  • माँ दुर्गे! आप स्मरण करनेपर,
  • सब प्राणियोंका भय हर लेती हैं और
  • स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन करनेपर,
  • उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं।
  • दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि!
  • आपके सिवा दूसरी कौन है,
  • जिसका चित्त सबका उपकार करनेके लिये,
  • सदा ही दयार्द्र रहता हो।

एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते
कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम्।
संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु
मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि॥१८॥

  • देवि! इन राक्षसोंके मारनेसे,
  • संसारको सुख मिले तथा
  • ये राक्षस चिरकालतक नरकमें रहनेके लिये भले ही पाप करते रहे हों,
  • इस समय संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर,
  • स्वर्गलोकमें जाये –
  • निश्चय ही यही सोचकर,
  • आप शत्रुओंका वध करती हैं।

दृष्ट्‌वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म
सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम्।
लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता
इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी॥१९॥

  • आप शत्रुओंपर शस्त्रोंका प्रहार क्यों करती हैं?
  • समस्त असुरोंको,
  • दृष्टिपात मात्रसे ही भस्म क्यों नहीं कर देतीं?
  • इसमें एक रहस्य है।
  • ये शत्रु भी हमारे शस्त्रोंसे पवित्र होकर,
  • उत्तम लोकोंमें जाये,
  • इस प्रकार उनके प्रति भी आपका विचार अत्यन्त उत्तम रहता है।

खड्‌गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः
शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम्।
यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड-
योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत्॥२०॥

  • खड्‌गके तेज-पूंजकी भयंकर दीप्तिसे तथा
  • आपके त्रिशूलके अग्रभागकी घनीभूत प्रभासे चौंधियाकर,
  • जो असुरोंकी आँखे फूट नहीं गयीं,
  • उसमें कारण यही था कि
  • वे मनोहर रश्मियोंसे युक्त,
  • चन्द्रमाके समान आनन्द प्रदान करनेवाले,
  • आपके इस सुन्दर मुखका दर्शन करते थे।

दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं
रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः।
वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां
वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम्॥२१॥

  • देवि! आपका शील,
  • दुराचारियोंके बुरे बर्तावको दूर करनेवाला है।
  • साथ ही यह रूप ऐसा है,
  • जो कभी चिन्तनमें भी नहीं आ सकता और
  • जिसकी कभी दूसरोंसे तुलना भी नहीं हो सकती;
  • तथा आपका बल और पराक्रम तो,
  • उन दैत्योंका भी नाश करनेवाला है,
  • जो कभी देवताओंके पराक्रमको भी नष्ट कर चुके थे।
  • इस प्रकार आपने शत्रुओंपर भी,
  • अपनी दया ही प्रकट की है।

केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य
रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र।
चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा
त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि॥२२॥

  • वरदायिनी देवि!
  • आपके इस पराक्रमकी,
  • किसके साथ तुलना हो सकती है तथा
  • शत्रुओंको भय देनेवाला एवं
  • अत्यन्त मनोहर ऐसा रूप भी,
  • आपके सिवा और कहाँ है?
  • हृदयमें कृपा और
  • युद्धमें निष्ठुरता,
  • ये दोनों बातें, तीनों लोकोंके भीतर,
  • केवल आपमें ही देखी गयी हैं।

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन
त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त-
मस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते॥२३॥

  • मात:! आपने शत्रुओंका नाश करके,
  • इस समस्त त्रिलोकीकी रक्षा की है।
  • उन शत्रुओंको भी युद्धभूमिमें मारकर,
  • स्वर्गलोकमें पहुँचाया है तथा
  • उन्मत्त दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले,
  • हम लोगोंके भयको भी दूर कर दिया है,
  • आपको हमारा नमस्कार है।

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्‌गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥२४॥

  • देवि!
  • आप शूलसे हमारी रक्षा करें।
  • अम्बिके!
  • आप खड़गसे भी हमारी रक्षा करें तथा
  • घण्टाकी ध्वनि और धनुषकी टंकारसे भी,
  • हम लोगोंकी रक्षा करें।

प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥२५॥

  • चण्डिके!
  • पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशामें,
  • आप हमारी रक्षा करें तथा
  • ईश्वरि!
  • अपने त्रिशूलको घुमाकर,
  • आप उत्तर दिशामें भी हमारी रक्षा करें।

सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥२६॥

  • तीनों लोकोंमें आपके जो परम सुन्दर एवं
  • अत्यन्त भयंकर रूप विचरते रहते हैं,
  • उनके द्वारा भी आप,
  • हमारी तथा इस भूलोककी रक्षा करें।

खड्‌गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणी तेऽम्बिके।
करपल्लवसङ्‌गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥२७॥

  • अम्बिके!
  • आपके करमें शोभा पानेवाले,
  • खड़ग, शूल और गदा आदि जो-जो अस्त्र हों,
  • उन सबके द्वारा आप,
  • सब ओरसे हमलोगोंकी रक्षा करें।

ऋषिरुवाच॥२८॥
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः।
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः॥२९॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इस प्रकार जब देवताओंने,
  • जगन्माता दुर्गाकी स्तुति की और
  • नन्दनवनके दिव्य पुष्पों एवं गन्ध-चन्दन आदिके द्वारा
  • उनका पूजन किया,

भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु* धूपिता।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान्॥३०॥

  • फिर सबने मिलकर जब भक्तिपूर्वक,
  • दिव्य धूपोंकी सुगन्ध निवेदन की,
  • तब देवीने प्रसत्रवदन होकर,
  • प्रणाम करते हुए सब देवताओंसे कहा।

देव्युवाच॥३१॥
व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम्*॥३२॥

  • देवी बोलीं – देवताओ!
  • तुम सब लोग,
  • मुझसे जिस वस्तुकी अभिलाषा रखते हो, उसे माँगो।

देवा ऊचुः॥३३॥
भगवत्या कृतं सर्वं न किंचिदवशिष्यते॥३४॥

  • देवता बोले –
  • भगवतीने हमारी सब इच्छा पूर्ण कर दी,
  • अब कुछ भी बाकी नहीं है।

यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः।
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्‍वरि॥३५॥

  • क्योंकि हमारा यह शत्रु,
  • महिषासुर मारा गया।
  • महेश्वरि!
  • इतनेपर भी यदि आप हमें और वर देना चाहती हैं।

संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः।
यश्‍च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने॥३६॥

  • तो हम जब-जब आपका स्मरण करें,
  • तब-तब आप दर्शन देकर,
  • हम लोगोंके महान् संकट दूर कर दिया करें तथा

तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्।
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके॥३७॥

  • प्रसत्रमुखी अम्बिके!
  • जो मनुष्य इन स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करे,
  • उसे वित्त, समृद्धि और वैभव देनेके साथ ही,
  • उसकी धन आदि सम्पत्तिको भी बढ़ानेके लिये,
  • आप सदा हमपर प्रसत्र रहें।

ऋषिरुवाच॥३८॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः।
तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप॥३९॥

  • ऋषि कहते हैं – राजन्!
  • देवताओंने जब अपने तथा जगत्‌के कल्याणके लिये,
  • भद्रकाली देवीको इस प्रकार प्रसन्न किया,
  • तब वे “तथास्तु” कहकर वहीं अन्तर्धान हो गयीं।

इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा।
देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी॥४०॥

  • भूपाल! इस प्रकार पूर्वकालमें,
  • तीनों लोकोंका हित चाहनेवाली देवी,
  • जिस प्रकार देवताओंके शरीरोंसे प्रकट हुई थीं,
  • वह सब कथा मैंने कह सुनायी।

पुनश्‍च गौरीदेहात्सा* समुद्भूता यथाभवत्।
वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः॥४१॥

  • अब पुन: देवताओंका उपकार करनेवाली वे देवी,
  • दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध करने एवं

रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी।
तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते॥ह्रीं ॐ॥४२॥

  • सब लोकोंकी रक्षा करनेके लिये,
  • गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट हुई थीं,
  • वह सब प्रसंग मेरे मुँहसे सुनो।
  • मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता हूँ।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवी-महात्म्य में चौथा अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 5

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Durga Saptashati – 5

Saptashati

Durga

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 – अर्थ सहित
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Devi Mahatmya

दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 में –

  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति,
  • या देवी सर्वभूतेषु मंत्र
  • चण्ड-मुण्डके मुखसे अम्बिकाके रूपकी प्रशंसा सुनकर,
    • शुम्भका उनके पास दूत भेजना और
  • दूतका निराश लौटना

दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 का विनियोग और ध्यान

॥विनियोगः॥

ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रूद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्
छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्,
महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – इस उत्तर चरित्रके रुद्र ऋषि हैं,
  • महासरस्वती देवता हैं,
  • अनुष्टप छन्द है,
  • भीमा शक्ति है,
  • भ्रामरी बीज है,
  • सूर्य तत्त्व है और
  • सामवेद स्वरूप है।
  • महासरस्वतीकी प्रसत्रताके लिये,
  • उत्तर चरित्रके पाठमें,
  • इसका विनियोग किया जाता है।

॥ध्यानम्॥

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

ध्यान

  • जो अपने करकमलोंमें,
  • घण्टा, शूल, हल, शंख,
  • मूसल, चक्र, धनुष और
  • बाण धारण करती हैं।
  • शरद-ऋतुके शोभासम्पत्र चन्द्रमाके समान,
  • जिनकी मनोहर कान्ति है,
  • जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा
  • गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है,
  • उन महासरस्वती देवीका,
  • मैं निरन्तर भजन करता (करती) हूँ।

ऊं नमश्चंडिकायैः नमो नमः


दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 – देवीकी स्तुति – या देवी सर्वभूतेषु

शुम्भ और निशुम्भ असुरों को बल का घमंड

ॐ क्लीं ऋषिरुवाच॥१॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्‍च हृता मदबलाश्रयात्॥२॥

  • महर्षि मेधा कहते हैं –
  • पूर्वकाल में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने,
  • अपने बल के घमंड में आकर,
  • शचीपति इंद्र के हाथ से,
  • तीनों लोकों का राज्य और
  • यज्ञभाग छीन लिए।

तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥३॥

  • वे दोनों,
  • सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, यम और
  • वरुण के अधिकार का भी,
  • उपयोग करने लगे।
  • वायु और अग्नि का कार्य भी,
  • वे ही करने लगे।

तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः॥४॥

  • उन दोनों ने सब देवताऒं को,
  • अपमानित, राज्यभ्रष्ट,
  • पराजित तथा अधिकारहीन करके,
  • स्वर्ग से निकाल दिया।

इंद्र आदि देवता, माँ जगदम्बा की शरण में जाते है

हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥५॥

  • उन दोनों असुरों से,
  • तिरस्कृत देवताऒं ने,
  • अपराजिता देवी का स्मरण किया और सोचा –

तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः॥६॥

  • “जगदम्बा ने वर दिया था कि
  • आपत्ति काल में स्मरण करने पर,
  • मैं तुम्हारी आपत्तियों का नाश कर दूंगी।”

देवताओं द्वारा माँ भगवती की स्तुति

इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्‍वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः॥७॥

  • यह विचारकर देवता गिरिराज हिमालयपर गए और
  • वहां भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे।

जगदम्बा देवी को नमस्कार

देवा ऊचुः॥८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्॥९॥

  • देवता बोले – देवी को नमस्कार है,
  • महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है।
  • प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है।
  • हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बाको
  • नमस्कार करते हैं।

माँ गौरी को नमस्कार

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्ये धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥१०॥

  • रौद्रा को
  • नमस्कार है।
  • नित्या, गौरी एवं धात्री को
  • बारम्बार नमस्कार है।
  • ज्योत्सनामयी, चद्ररूपिणी एवं
  • सुख स्वरूपा देवी को
  • सतत प्रणाम है।

लक्ष्मी माता को नमस्कार

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥११॥

  • शरणागतों का कल्याण करने वाली,
  • वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवी को
  • हम बारम्बार नमस्कार करते हैं।
  • नैर्ऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाऒं की लक्ष्मी तथा
  • शर्वाणी (शिवपत्नी)-स्वरूपा,
  • आप जगदम्बा को
  • बार-बार नमस्कार है।

माँ दुर्गा को नमस्कार

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥१२॥

  • दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकट से पार उतारनेवाली),
  • सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी,
  • ख्याति, कृष्णा और धूम्रा देवी को
  • सर्वदा नमस्कार है।

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥१३॥

  • अत्यंत सौम्य तथा
  • अत्यंत रौद्ररूपा देवी को
  • हम नमस्कार करते हैं,
  • उन्हें हमारा बारम्बार प्रणाम है।

जगत की आधार, विष्णु माया को नमस्कार

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै॥१४॥
नमस्तस्यै॥१५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१६॥

  • जगत की आधारभूता कृति देवी को
  • बारम्बार नमस्कार है।
  • जो देवी सब प्राणियों में,
  • विष्णु माया के नाम से कही जाती हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

सब प्राणियों में चेतना स्वरूप

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै॥१७॥
नमस्तस्यै॥१८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१९॥

  • जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

बुद्धिरूप

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२०॥
नमस्तस्यै॥२१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२२॥

  • जो देवी सब प्राणियों में बुद्धिरूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

निद्रा रूप

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२३॥
नमस्तस्यै॥२४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२५॥

  • जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

क्षुधा रूप

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२६॥
नमस्तस्यै॥२७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२८॥

  • जो देवी सब प्राणियों में क्षुधा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।
  • क्षुधा अर्थात
    • भूख,
    • भोजन करने की इच्छा

छाया रूप

या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥२९॥
नमस्तस्यै॥३०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३१॥

  • जो देवी सब प्राणियों में छाया रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

शक्ति रूप

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३२॥
नमस्तस्यै॥३३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३४॥

  • जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

तृष्णा रूप

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३५॥
नमस्तस्यै॥३६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३७॥

  • जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

क्षान्ति, क्षमा रूप

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३८॥
नमस्तस्यै॥३९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४०॥

  • जो देवी सब प्राणियों में क्षमा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

जाती अर्थात जन्म रूप

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४१॥
नमस्तस्यै॥४२॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४३॥

  • जो देवी सब प्राणियों में जातिरूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।
  • जाति अर्थात : जन्म, सभी वस्तुओ का मूल कारण
    • जातिरूपेण अर्थात जो देवी सभी प्राणियों का मूल कारण है

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४४॥
नमस्तस्यै॥४५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४६॥

  • जो देवी सब प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४७॥
नमस्तस्यै॥४८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४९॥

  • जो देवी सब प्राणियों में शान्ति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५०॥
नमस्तस्यै॥५१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५२॥

  • जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५३॥
नमस्तस्यै॥५४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५५॥

  • जो देवी सब प्राणियों में कांति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५६॥
नमस्तस्यै॥५७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५८॥

  • जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५९॥
नमस्तस्यै॥६०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६१॥

  • जो देवी सब प्राणियों में वृत्ति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६२॥
नमस्तस्यै॥६३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६४॥

  • जो देवी सब प्राणियों में स्मृति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६५॥
नमस्तस्यै॥६६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६७॥

  • जो देवी सब प्राणियों में दया रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६८॥
नमस्तस्यै॥६९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७०॥

  • जो देवी सब प्राणियों में तुष्टि रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७१॥
नमस्तस्यै॥७२॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७३॥

  • जो देवी सब प्राणियों में मातारूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७४॥
नमस्तस्यै॥७५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७६॥

  • जो देवी सब प्राणियों में भ्रांति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः॥७७॥

  • जो जीवों के इंद्रिय वर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं
  • सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं,
  • उन व्याप्ति देवी को बारम्बार नमस्कार है।

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै॥७८॥
नमस्तस्यै॥७९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥८०॥

  • जो देवी चैतन्य रूप से,
  • इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्‍वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥८१॥

  • पूर्वकाल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से,
  • देवताऒं ने जिनकी स्तुति की तथा
  • देवराज इंद्र ने बहुत दिनोंतक जिनका ध्यान किया,
  • वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी,
  • हमारा कल्याण और मंगल करें तथा
  • सारी आपत्तियों का नाश कर डाले।

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥८२॥

  • उद्दंड दैत्यों से सताए हुए हम सभी देवता,
  • जिन परमेश्वरी को इस समय नमस्कार करते हैं तथा
  • जो भक्ति से, विनम्र पुरुषों द्वारा,
  • स्मरण की जाने पर,
  • तत्काल ही सभी संकटों का नाश कर देती हैं,
  • वे जगदम्बा हमारा संकट दूर करें।

देवी पार्वती, अम्बिका, कौशिकी और कालिका

ऋषिरुवाच॥८३॥
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन॥८४॥

  • मेधा ऋषि कहते हैं – राजन!
  • इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे,
  • उस समय पार्वती देवी,
  • गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहां आईं।

साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्‍चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा॥८५॥

  • उन सुंदर भौंहों वाली भगवती ने देवताऒं से पूछा –
  • “आपलोग यहां किसकी स्तुति करते हैं?”
  • तब उन्हीं के शरीर कोश से प्रकट हुई शिवा देवी बोलीं –

स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः॥८६॥

  • “शुम्भ दैत्य से तिरस्कृत और
  • युद्ध में निशुम्भ से पराजित हो,
  • यहाँ एकत्रित हुए ये समस्त देवता मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।”

शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥८७॥

  • पार्वतीजी के शरीर कोश से,
  • अम्बिका का प्रादुर्भाव हुआ था,
  • इसलिए वे समस्त लोकों में “कौशिकी” कही जाती हैं।

तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥८८॥

  • कौशिकी के प्रकट होने के बाद,
  • पार्वती देवी का शरीर काले रंग का हो गया,
  • अत: वे हिमालयपर रहनेवाली,
  • कालिका देवीके नामसे विख्यात हुईं।

चंड-मुंड ने माँ अम्बिका को हिमालय पर्वत पर देखा

ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्‍च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः॥८९॥

  • तदनंतर, शुम्भ-निशुम्भ के भृत्य,
  • चंड-मुंड वहां आए और
  • उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करने वाली,
  • अम्बिका देवी को देखा।

चंड-मुंड, शुम्भ राक्षस को माँ अम्बिका के बारे में बताते है

ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम्॥९०॥

  • वे शुम्भ के पास जाकर बोले –
  • “महाराज! एक अत्यंत मनोहर स्त्री है,
  • जो अपनी दिव्य कांति से,
  • हिमालय को प्रकाशित कर रही है।”

नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्‍वर॥९१॥

  • वैसा उत्तम रूप,
  • कहीं किसी ने भी नहीं देखा होगा।
  • असुरेश्वर! पता लगाइए,
  • वह देवी कौन है और उसे ले लीजिये।

स्त्रीरत्‍नमतिचार्वङ्‌गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति॥९२॥

  • स्त्रियों में तो वह रत्न है,
  • उसका प्रत्येक अंग बहुत ही सुंदर तथा
  • वह अपनी प्रभा से संपूर्ण दिशाऒं में प्रकाश फैला रही है।
  • दैत्यराज! अभी वह हिमालय पर ही मौजूद है।
  • आप उसे देख सकते हैं।

चंड-मुंड द्वारा असुर शुम्भ और निशुम्भ की प्रशंसा

यानि रत्‍नानि मणयो गजाश्‍वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे॥९३॥

  • हे प्रभो! तीनों लोकों में मणि, हाथी और
  • घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं,
  • वे सब इस समय आपके चरणों में शोभा पाते हैं।

ऐरावतः समानीतो गजरत्‍नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्‍चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः॥९४॥

  • हाथियों में रत्नभूत ऐरावत,
  • यह पारिजात का वृक्ष और
  • यह उच्चैश्रवा घोड़ा –
  • यह सब आपने इंद्र से ले लिया है।

विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्‌गणे।
रत्‍नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम्॥९५॥

  • हंसों से जुता हुआ यह विमान भी,
  • आपके आंगन में शोभा पाता है।
  • यह रत्नभूत अद्भुत विमान,
  • जो पहले ब्रह्माजी के पास था,
  • अब आपके यहां लाया गया है।
  • यह महापद्म नामक निधि,
  • आप कुबेर से छीन लाए हैं।

निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्‍वरात्।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्‌कजाम्॥९६॥

  • समुद्रने भी,
  • आपको किंजल्किनी नाम की माला भेंट की है,
  • जो केसरों से सुशोभित है और
  • जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं।

छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति।
तथायं स्यन्दनवरो यः पुराऽऽसीत्प्रजापतेः॥९७॥

  • सुवर्ण की वर्षा करनेवाला,
  • वरुण का छत्र भी
  • आपके घर में शोभा पाता है।
  • तथा यह श्रेष्ठ रथ,
  • जो पहले प्रजा पतीके अधिकार में था,
  • अब आपके पास मौजूद है।

मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे॥९८॥
निशुम्भस्याब्धिजाताश्‍च समस्ता रत्‍नजातयः।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी॥९९॥

  • दैत्येश्वर!
  • मृत्यु की उत्क्रांतिदा नामक शक्ति भी,
  • आपने छीन ली है तथा
  • वरुण का पाश और
  • समुद्र में होने वाले सब प्रकार के रत्न,
  • आपके भाई निशुम्भके अधिकारमें हैं।
  • अग्नि ने भी स्वत: शुद्ध किए हुए,
  • दो वस्त्र आपकी सेवामें अर्पित किए हैं।

एवं दैत्येन्द्र रत्‍नानि समस्तान्याहृतानि ते।
स्त्रीरत्‍नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते॥१००॥

  • है दैत्यराज! इस प्रकार सभी रत्न आपने एकत्र कर लिए हैं।
  • फिर जो यह स्त्रियों में रत्नरूप कल्याणमयी देवी हैं,
  • इसे आप क्यों नहीं अपने अधिकारमें कर लेते?

ऋषिरुवाच॥१०१॥
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः।
प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम्॥१०२॥

  • मेधा ऋषि कहते हैं – चंड-मुंड का यह वचन सुनकर,
  • शुम्भ ने महादैत्य सुग्रीव को,
  • दूत बनाकर देवी के पास भेजा और कहा –

इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु॥१०३॥

  • – तुम मेरी ये-ये बातें कहना और
  • ऐसा उपाय करना,
  • जिससे प्रसन्न होकर,
  • वह शीघ्र ही यहां आ जाए।

स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने।
सा देवी तां ततः प्राहश्‍लक्ष्णं मधुरया गिरा॥१०४॥

  • वह दूत,
  • पर्वत के रमणीय प्रदेश में जहां देवी मौजूद थीं,
  • वहां गया और
  • मधुर वाणी में कोमल वचन बोला।

दूत उवाच॥१०५॥
देवि दैत्येश्‍वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्‍वरः।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः॥१०६॥

  • दूत बोला –
  • “देवि! दैत्यराज शुम्भ इस समय तीनों लोकों के परमेश्वर हैं।
  • मैं उन्हीं का भेजा दूत हूं और
  • यहां तुम्हारे पास आया हूं।”

अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह श्रृणुष्व तत्॥१०७॥

  • उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक स्वर से मानते हैं।
  • कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता।
  • वे सम्पूर्ण देवताऒं को परास्त कर चुके हैं।
  • उन्होंने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया है, उसे सुनो –

मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः।
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्‍नामि पृथक् पृथक्॥१०८॥

  • “सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकार में है।
  • देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं।
  • सभी यज्ञों के भागों को मैं ही पृथक-पृथक भोगता हूं।

त्रैलोक्ये वररत्‍नानि मम वश्‍यान्यशेषतः।
तथैव गजरत्‍नं च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम्॥१०९॥

  • तीनों लोकों में जितने श्रेष्ठ रत्न हैं,
  • वे सब मेरे अधिकार में हैं।
  • देवराज इंद्र का वाहन ऐरावत,
  • जो हाथियों में रत्नके समान है,
  • मैंने छीन लिया है।

क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्‍नं ममामरैः।
उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्॥११०॥

  • क्षीर सागर का मंथन करने से जो अश्वरत्न उच्चैश्रवा प्रकट हुआ था,
  • उसे देवताऒं ने मेरे पैरों पर पड़कर समर्पित किया है।

यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च।
रत्‍नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥

  • सुंदरी! उनके सिवा और भी जितने रत्नभूत पदार्थ,
  • देवताऒं, गधर्वों और नागों के पास थे,
  • वे सब मेरे ही पास आ गए हैं।

स्त्रीरत्‍नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्।
सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्‍नभुजो वयम्॥११२॥

  • देवि! हम लोग तुम्हें संसार की स्त्रियों में रत्न मानते हैं,
  • अत: तुम हमारे पास आ जाऒ,
  • क्योंकि रत्नों का उपभोग करनेवाले हम ही हैं।

मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्।
भज त्वं च चञ्चलापाङ्‌गि रत्‍नभूतासि वै यतः॥११३॥

  • चंचल कटाक्षों वाली सुंदरी!
  • तुम मेरी या मेरे भाई महापराक्रमी निशुम्भ की सेवा में आ जाऒ,
  • क्योंकि तुम रत्न स्वरूपा हो।

परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात्।
एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज॥११४॥

  • मेरा वरण करने से तुम्हें तुलनारहित महान ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी।
  • अपनी बुद्धि से यह विचारकर तुम मेरी पत्नी बन जाऒ।

ऋषिरुवाच॥११५॥
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ।
दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्॥११६॥

  • मेधा ऋषि कहते हैं – दूत के यों कहने पर कल्याणमयी भगवती दुर्गादेवी,
  • जो इस जगत को धारण करती हैं,
  • मन-ही-मन गम्भीर भाव से मुस्कराई और
  • इस प्रकार बोलीं –

देव्युवाच॥११७॥
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्‍चापि तादृशः॥११८॥

  • देवी ने कहा – दूत! तुमने सत्य कहा है,
  • इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है।
  • शुम्भ तीनों लोकों का स्वामी है और
  • निशुम्भ भी उसी के समान पराक्रमी है

किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा॥११९॥

  • किंतु इस विषयमें मैंने जो प्रतिज्ञा कर ली है,
  • उसे मिथ्या कैसे करूँ?
  • मैंने अपनी अल्पबुद्धि के कारण,
  • पहले से जो प्रतिज्ञा कर रखी है उसे सुनो।

यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥

  • “जो मुझे संग्राम में जीत लेगा,
  • जो मेरे अभिमान को चूर कर देगा तथा
  • संसार में जो मेरे समान बलवान होगा,
  • वही मेरा स्वामी होगा।”

तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः।
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥१२१॥

  • “इसलिए शुम्भ अथवा निशुम्भ स्वयं ही यहां पधारें और
  • मुझे जीतकर मेरा पाणिग्रहण कर लें,
  • इसमें विलम्ब की क्या आवश्यकता?”

दूत उवाच॥१२२॥
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः॥१२३॥

  • दूत बोला – देवि! तुम घमंड में भरी,
  • मेरे सामने ऐसी बातें न करो।
  • तीनों लोकों में कौन ऐसा पुरुष है,
  • जो शुम्भ-निशुम्भके सामने खड़ा हो सके।

अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका॥१२४॥

  • देवि! अन्य दैत्यों के सामने भी सारे देवता युद्ध में नहीं ठहर सकते,
  • फिर तुम अकेली स्त्री होकर कैसे ठहर सकती हो।

इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे।
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम्॥१२५॥

  • जिन शुम्भ आदि दैत्यों के सामने,
  • इंद्र आदि सब देवता भी युद्ध में खड़े नहीं हुए,
  • उनके सामने तुम स्त्री होकर कैसे जाऒगी।

सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्‍वं शुम्भनिशुम्भयोः।
केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि॥१२६॥

  • इसलिए तुम मेरे ही कहने से शुम्भ-निशुम्भ के पास चलो।
  • ऐसा करने से तुम्हारे गौरवकी रक्षा होगी,
  • अन्यथा जब वे केश पकड़कर घसीटेंगे,
  • तब तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा खोकर जाना पड़ेगा।

देव्युवाच॥१२७॥
एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्‍चातिवीर्यवान्।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा॥१२८॥

  • देवी ने कहा – तुम्हारा कहना ठीक है,
  • शुम्भ बलवान हैं।
  • निशुम्भ भी पराक्रमी है;
  • किंतु मैंने पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है।

स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत्॥ॐ॥१२९॥

  • अत: अब तुम जाऒ।
  • मैंने तुमसे जो कुछ कहा है,
  • वह सब अपने स्वामी से कहना।
  • वे जो उचित जान पड़े, करें।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या
दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में
  • “देवी-दूत-संवाद नामक”
  • पांचवां अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 6

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Durga Saptashati – 6

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 6 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 6 में –
धूम्रलोचन-वध


दुर्गा सप्तशती अध्याय 6 का ध्यान

॥ध्यानम्॥

ॐ नागाधीश्‍वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्‍नावली-
भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां
सर्वज्ञेश्‍वरभैरवाङ्‌कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥

ध्यान

  • मैं सर्वज्ञेश्वर भैरवके अंगमें निवास करनेवाली,
  • परमोत्कृष्ट पद्मावती देवीका चिन्तन करता (करती) हूँ।
  • वे नागराजके आसनपर बैठी हैं,
  • नागोंके फणोंमें सुशोभित होनेवाली मणियोंकी,
  • विशाल मालासे उनकी देहलता सुशोभित हो रही है।
  • सूर्यके समान उनका तेज है,
  • तीन नेत्र उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं।
  • वे हाथोंमें,
  • माला, कुम्भ, कपाल और
  • कमल लिये हुए हैं तथा
  • उनके मस्तकमें,
  • अर्धचन्द्रका मुकुट सुशोभित है।

दैत्य धूम्रलोचन का संहार

शुम्भ, धूम्रलोचन को, देवी माँ के पास भेजता है

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः।
समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात्॥२॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • देवीका यह कथन सुनकर,
  • दूतको बड़ा अमर्ष हुआ और
  • उसने दैत्यराजके पास जाकर,
  • सब समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया।

तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः।
सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम्॥३॥

  • दूतके उस वचनको सुनकर,
  • दैत्यराज कुपित हो उठा और
  • दैत्यसेनापति धूम्रलोचनसे बोला।

हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः।
तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्॥४॥

  • धूम्रलोचन!
  • तुम शीघ्र अपनी सेना साथ लेकर जाओ और
  • उसके केश पकड़कर घसीटते हुए,
  • उसे बलपूर्वक यहाँ ले आओ।

तत्परित्राणदः कश्‍चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः।
स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा॥५॥

  • उसकी रक्षा करनेके लिये,
  • यदि कोई दूसरा खड़ा हो,
  • तो वह देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व ही क्यों न हो,
  • उसे अवश्य मार डालना।

धूम्रलोचन सेनाके साथ माँ अम्बिका के पास जाता है

ऋषिरुवाच॥६॥
तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः।
वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ॥७॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • शुम्भके इस प्रकार आज्ञा देनेपर,
  • वह धूम्रलोचन दैत्य,
  • साठ हजार असुरोंकी सेनाको साथ लेकर,
  • वहाँसे तुरंत चल दिया।

स दृष्ट्‌वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्।
जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः॥८॥

  • वहाँ पहुँचकर उसने हिमालयपर रहनेवाली देवीको देखा और
  • ललकारकर कहा –
  • अरी! तू शम्भ-निश्स्म्भके पास चल।

न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति।
ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम्॥९॥

  • यदि इस समय प्रसत्रतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं चलेगी,
  • तो मैं बलपूर्वक पकड़कर घसीटते हुए,
  • तुझे ले चलूँगा।

देव्युवाच॥१०॥
दैत्येश्‍वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः।
बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम्॥११॥

  • देवी बोलीं –
  • तुम्हें दैत्योंके राजाने भेजा है,
  • तुम स्वयं भी बलवान् हो और
  • तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है;
  • ऐसी दशामें,
  • यदि मुझे बलपूर्वक ले चलोगे,
  • तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ?।

देवी माँ ने, धूम्रलोचन को भस्म कर दिया

ऋषिरुवाच॥१२॥
इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः।
हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः॥१३॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • देवीके यों कहनेपर,
  • असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा,
  • तब अम्बिकाने “हुं” शब्दके उच्चारणमात्रसे,
  • उसे भस्म कर दिया।

अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्‍वधैः॥१४॥

  • फिर तो क्रोधमें भरी हुई दैत्योंकी विशाल सेना और
  • अम्बिकाने एक-दूसरेपर तीखे शस्त्रों,
  • शक्तियों तथा फरसोंकी वर्षा आरम्भ की।

देवीके वाहन सिंह ने, असुरों की सेना का संहार किया

ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम्।
पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः॥१५॥

  • इतनेमें ही देवीका वाहन सिंह,
  • क्रोधमें भरकर, भयंकर गर्जना करके,
  • गर्दनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें कूद पड़ा।

कांश्‍चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान्।
आक्रम्य चाधरेणान्यान्‌ स जघान महासुरान्॥१६॥

  • उसने कुछ दैत्योंको पंजोंकी मारसे,
  • कितनोंको अपने जबड़ोंसे और
  • कितने ही महादैत्योंको पटककर,
  • ओठकी दाढोसे घायल करके मार डाला।

केषांचित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी।
तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक्॥१७॥

  • उस सिंहने,
  • अपने नखोंसे कितनोंके पेट फाड़ डाले और
  • थप्पड मारकर, कितनोंके सिर,
  • धडसे अलग कर दिये।

विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे।
पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः॥१८॥

  • और कितनोंकी भुजाएँ और मस्तक काट डाले तथा
  • अपनी गर्दनके बाल हिलाते हुए,
  • उसने दूसरे दैत्योंके पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया।

क्षणेन तद्‌बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना।
तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना॥१९॥

  • अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए,
  • देवीके वाहन, उस महाबली सिंहने,
  • क्षणभरमें ही,
  • असुरोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला।

शुम्भ को, धूम्रलोचन के वध का पता चलता है

श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम्।
बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः॥२०॥

  • शुम्भने जब सुना कि
  • देवीने धूम्रलोचन असुरको मार डाला तथा
  • उसके सिंहने सारी सेनाका सफाया कर डाला,

चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः।
आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥२१॥

  • तब उस दैत्यराजको बड़ा क्रोध हुआ।
  • उसका ओठ काँपने लगा।
  • उसने चण्ड और मुण्ड नामक,
  • दो महादैत्योंको आज्ञा दी।

हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ।
तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु॥२२॥

  • “हे चण्ड! और हे मुण्ड!
  • तुम लोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ,
  • उस देवीको पकड़कर अथवा,
  • उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ।

केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि।
तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्॥२३॥

  • यदि इस प्रकार उसको लानेमें संदेह हो तो,
  • युद्धमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों तथा
  • समस्त आसुरी सेनाका प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना।

तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते।
शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ॐ॥२४॥

  • उसकी हत्या होने तथा
  • सिंहके भी मारे जानेपर,
  • उस अम्बिकाको बाँधकर साथ ले,
  • शीघ्र ही लौट आना।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवधो नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में छठा अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 7

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 6 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 7 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 7 में –

  • चण्ड और मुण्डका वध

॥ध्यानम्॥

ॐ ध्यायेयं रत्‍नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्‌गीं
न्यस्तैकाङ्‌घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्‌गीं शङ्‍खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥

ध्यान

  • मैं मातङ्गीदेवीका ध्यान करता (करती) हूँ।
  • वे रत्नमय सिंहासनपर बैठकर,
  • पढ़ते हुए तोतेका मधुर शब्द सुन रही हैं।
  • उनके शरीरका वर्ण श्याम है।
  • वे अपना एक पैर कमलपर रखे हुए हैं और
  • मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करती हैं तथा
  • पुष्पोंकी माला धारण किये वीणा बजाती हैं।
  • वे लाल रंगकी साड़ी पहने,
  • हाथमें शंखमय पात्र लिये हुए हैं।
  • उनके वदनपर,
  • मधुका हलका-हलका प्रभाव जान पड़ता है और
  • ललाटमें बिंदी शोभा दे रही है।
    • वदन अर्थात
    • मुख, मुँह, चेहरा, मुखड़ा
    • कथन, भाषण

दुर्गा सप्तशती अध्याय 7

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्‍चण्डमुण्डपुरोगमाः।
चतुरङ्‍गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः॥२॥

  • ऋषि कहते हैं-
  • तदनंतर शुम्भ की आज्ञा पाकर,
  • वे चंड-मुंड आदि दैत्य,
  • चतुरंगिनी सेना के साथ,
  • अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो चल दिए।

ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम्।
सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्‌गे महति काञ्चने॥३॥

  • फिर गिरिराज हिमालय के सुवर्णमय ऊंचे शिखर पर पहुंचकर,
  • उन्होंने सिंह पर बैठी देवी को देखा।
  • वे मंद-मंद मुस्करा रही थीं।

ते दृष्ट्‌वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः।
आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः॥४॥

  • उन्हें देखकर दैत्य लोग,
  • तत्परता से पकडने का उद्योग करने लगे।
  • किसी ने धनुष तान लिया,
  • किसी ने तलवार संभाली और
  • कुछ लोग देवी के पास आकर खड़े हो गए।

ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति।
कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा॥५॥

  • तब अम्बिका ने,
  • उन शत्रुऒं के प्रति बड़ा क्रोध किया।
  • उस समय क्रोध के कारण,
  • उनका मुख काला पड़ गया।

भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।
काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी॥६॥

  • ललाटमें भौंहें टेढ़ी हो गयीं और
  • वहां से तुरंत विकरालमुखी काली प्रकट हुईं,
  • जो तलवार और पाश लिए हुए थीं।

विचित्रखट्‌वाङ्‌गधरा नरमालाविभूषणा।
द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा॥७॥

  • वे विचित्र खट्वाङ्ग धारण किए और
  • चीते के चर्म की साड़ी पहने,
  • नर-मुंडो की मालासे विभूषित थीं।
  • उनके शरीर का मांस सूख गया था,
  • केवल हड्डियों का ढांचा था,
  • जिससे वे अयत भयंकर जान पड़ती थीं।

अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा।
निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्‌मुखा॥८॥

  • उनका मुख बहुत विशाल था,
  • जीभ लपलपाने के कारण,
  • वे और भी डरावनी प्रतीत होती थीं।
  • उनकी आंखें भीतर को धंसी हुई और कुछ लाल थीं,
  • वे अपनी भयंकर गर्जना से,
  • सम्पूर्ण दिशाऒं को गुंजा रही थीं।

सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान्।
सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्‌बलम्॥९॥

  • बड़े-बड़े दैत्यों का वध करती हुई,
  • वे कालिका देवी,
  • बड़े वेग से दैत्यों की उस सेना पर टूट पड़ीं और
  • उन सबका भक्षण करने लगीं।

पार्ष्णिग्राहाङ्‌कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान्।
समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान्॥१०॥

  • वे पार्श्व रक्षकों, अंकुशधारी महावतों,
  • योद्धाऒं और घंटा सहित कितने ही हाथियोंको,
  • एक ही हाथ से पकड़कर मुंह में डाल लेती थीं।

तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह।
निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्‍चर्वयन्त्य*तिभैरवम्॥११॥

  • इसी प्रकार,
  • घोड़े, रथ और सारथि के साथ,
  • रथी सैनिकों को
  • मुंह में डालकर वे उन्हें बड़े भयानक रूप से चबा डालती थीं।

एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्।
पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत्॥१२॥

  • किसी के बाल पकड़ लेतीं,
  • किसी का गला दबा देतीं,
  • किसी को पैरों से कुचल डालतीं और
  • किसी को छाती के धक्के से गिराकर मार डालती थीं।

तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः।
मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि॥१३॥

  • वे असुरों के छोड़े हुए,
  • बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र मुंह से पकड़ लेतीं और
  • रोष में भरकर उनको दांतों से पीस डालती थीं।

बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम्।
ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्‍चाताडयत्तथा॥१४॥

  • काली ने,
  • बलवान एवं दुरात्मा दैत्यों की वह सारी सेना,
  • रौंद डाली,
  • खा डाली और
  • कितनों को मार भगाया।

असिना निहताः केचित्केचित्खट्‌वाङ्‌गताडिताः*।
जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा॥१५॥

  • कोई तलवार के घाट उतारे गए,
  • कोई खट्वांग से पीटे गए और
  • कितने ही असुर दांतों के अग्रभाग से कुचले जाकर मृत्यु को प्राप्त हुए।

क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम्।
दृष्ट्‌वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम्॥१६॥

  • इस प्रकार देवी ने,
  • असुरों की उस सारी सेनाको,
  • क्षणभर में मार गिराया।
  • यह देख चंड,
  • उन अत्यंत भयानक काली देवी की ऒर दौड़ा।

शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः।
छादयामास चक्रैश्‍च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः॥१७॥

  • महादैत्य मुंड ने भी,
  • अत्यंत भयंकर बाणों की वर्षा से तथा
  • हजारों बार चलाए हुए चक्रों से,
  • उन भयानक नेत्रों वाली देवी को आच्छादित कर दिया।

तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्।
बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम्॥१८॥

  • वे अनेकों चक्र,
  • देवी के मुख में समाते हुए ऐसे जान पड़े,
  • मानो सूर्य के बहुतेरे मंडल,
  • बादलों के उदर में प्रवेश कर रहे हों।

ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी।
कालीकरालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला॥१९॥

  • तब भयंकर गर्जना करने वाली काली ने,
  • अत्यंत रोष में भरकर,
  • विकट अट्टाहास किया।
  • उस समय उनके विकराल बदन के भीतर,
  • कठिनता से देखे जा सकने वाले दांतों की प्रभा से,
  • वे अत्यंत उज्वल दिखायी देती थीं।

उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत।
गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्*॥२०॥

  • देवी ने बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर
  • – हं – का उच्चारण करके चंड पर धावा किया और
  • उसके केश पकड़कर,
  • उसी तलवार से उसका मस्तक काट डाला।

अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्‌वा चण्डं निपातितम्।
तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा॥२१॥

  • चंड को मारा गया देखकर,
  • मुंड भी देवी की ऒर दौड़ा।
  • तब देवी ने रोष में भरकर,
  • उसे भी तलवार से घायल करके,
  • धरती पर सुला दिया।

हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्‌वा चण्डं निपातितम्।
मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम्॥२२॥

  • महापराक्रमी चंड और मुंड को मारा गया देख,
  • मरने से बची हुई बाकी सेना,
  • भय से व्याकुल हो चारों ऒर भाग गयी।

शिरश्‍चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च।
प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्॥२३॥

  • तदनंतर काली ने,
  • चंड और मुंड का मस्तक हाथ में ले,
  • चंडिका के पास जाकर,
  • प्रचंड अट्टाहास करते हुए कहा –

मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू।
युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि॥२४॥

  • देवि!
  • मैंने चंड और मुंड नामक इन दो महापशुऒं को तुम्हें भेंट किया है।
  • अब युद्ध में तुम,
  • शुम्भ और निशुम्भ का,
  • स्वयं ही वध करना।”

ऋषिरुवाच॥२५॥
तावानीतौ ततो दृष्ट्‌वा चण्डमुण्डौ महासुरौ।
उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः॥२६॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • वहां लाए हुए उन चंड-मुंड नामक महादैत्यों को देखकर,
  • कल्याणमयी चंडी ने काली से मधुर वाणी में कहा।

यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ॐ॥२७॥

  • देवि!
  • तुम चंड और मुंड को लेकर मेरे पास आयी हो,
  • इसलिए संसार में चांमुडा के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी।

    चंडिका देवी को नमस्कार है।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥

  • इस प्रकार,
  • श्री मार्कंडेयपुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में,
  • ‘चंड-मुंड-वध’ नामक,
  • सातवां अध्याय पूरा हुआ।

Next.. (आगे पढें ..) – Durga Saptashati – 8

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 8

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Durga Saptashati – 8

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 7 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 8 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 8 में –

  • रक्तबीज-वध

॥ध्यानम्॥

ॐ अरुणां करुणातरङ्‌गिताक्षीं
धृतपाशाङ्‌कुशबाणचापहस्ताम्।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम्॥

ध्यान

  • मैं अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणोंसे सुशोभित,
  • भवानीका ध्यान करता (करती) हूँ।
  • उनके शरीरका रंग लाल है,
  • नेत्रोंमें करुणा लहरा रही है तथा
  • हाथोंमें पाश, अंकुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं।

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते।
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्‍वरः॥२॥

  • मेधा ऋषि कहते हैं –
  • चंड और मुंड नामक असुरों के मारे जाने तथा
  • बहुत-सी सेना का संहार हो जाने पर

ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान्।
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह॥३॥

  • असुरराज शुम्भ के मन में बड़ा क्रोध हुआ।
  • उसने दैत्यों की पूरी सेना को,
  • युद्ध के लिए कूच करने की आज्ञा दी।

अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः।
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः॥४॥

  • शुंभ बोला – आज उदायुध नामक छियासी दैत्य-सेनापति,
  • अपनी सेनाऒं के साथ युद्ध के लिए प्रस्थान करें।
  • कम्बु नाम वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक,
  • अपनी वाहिनीसे घिरे हुए यात्रा करें।

कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै।
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया॥५॥

  • पचास कोटि वीर्य कुल के और सौ धौम्र-कुल के असुर सेनापति,
  • मेरी आज्ञा से सेना सहित कूच करें।

कालका दौर्हृद मौर्याः कालकेयास्तथासुराः।
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम॥६॥

  • कालक, दौहृद, मौर्य और कालकेय असुर भी,
  • युद्ध के लिए तैयार हो,
  • मेरी आज्ञा से तुरंत प्रस्थान करें।

इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः।
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः॥७॥

  • भयानक शासन करने वाला असुरराज शुम्भ,
  • इस प्रकार आज्ञा दे,
  • सहस्त्रों बड़ी-बड़ी सेनाऒं के साथ,
  • युद्धके लिए चला।

आयान्तं चण्डिका दृष्ट्‌वा तत्सैन्यमतिभीषणम्।
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम्॥८॥

  • उसकी अत्यंत भयंकर सेना को आती देख,
  • चण्डिका ने,
  • अपने धनुष की टंकार से,
  • पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गुंजा दिया।

ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप।
घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चोपबृंहयत्॥९॥

  • राजन! तदनंतर देवी के सिंह ने भी,
  • बड़े जोर-जोर से दहाडऩा आरम्भ किया,
  • फिर अम्बिका के घंटे के शब्दों ने,
  • उस ध्वनि को और भी बढ़ा दिया।

धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्‌मुखा।
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना॥१०॥

  • धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और
  • घंटे की ध्वनि से संपूर्ण दिशाएं गूंज उठीं।
  • उस भयंकर शब्द से काली ने,
  • अपने विकराल मुख को और भी बढ़ा लिया तथा
  • इस प्रकार वे विजयिनी हुईं।

तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्‍चतुर्दिशम्।
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः॥११॥

  • उस तुमुल नाद को सुनकर,
  • दैत्यों की सेनाऒं ने चारों ऒर से आकर,
  • चंडिका देवी, सिंह तथा काली देवी को,
  • क्रोधपूर्वक घेर लिया।

एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्।
भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः॥१२॥

  • राजन! इसी बीच में असुरों के विनाश तथा
  • देवताऒं के अभ्युदय के लिए –

ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः।
शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्‍चण्डिकां ययुः॥१३॥

  • ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा
  • इंद्र आदि देवों की शक्तियां,
  • जो अत्यंत पराक्रम और बल से सम्पन्न थीं,
  • उनके शरीरों से निकलकर,
  • उन्हीं के रूप में चंडिका देवी के पास गयीं।

यस्य देवस्य यद्रूपं यथाभूषणवाहनम्।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धुमाययौ॥१४॥

  • जिस देवता का जैसा रूप,
  • जैसी वेश-भूषा और जैसा वाहन है,
  • ठीक वैसे ही साधनों से सम्पन्न हो,
  • उनकी शक्ति,
  • असुरों से युद्ध करने के लिए आई।

हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः।
आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणी साभिधीयते॥१५॥

  • सबसे पहले हंसयुक्त विमानपर बैठी हुई,
  • अक्षसूत्र और कमंडलु से सुशोभित,
  • ब्रह्माजी की शक्ति उपस्थित हुई,
  • जिसे ब्रह्माणी कहते हैं।

माहेश्‍वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी।
महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा॥१६॥

  • महादेवजी की शक्ति,
  • वृषभ पर आरूढ़ हो,
  • हाथों में त्रिशूल धारण किए,
  • महानाग का कंकण पहने,
  • मस्तक में चंद्ररेखा से विभूषित हो वहां आ पहुंची।

कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना।
योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी॥१७॥

  • कार्तिकेयजी की शक्तिरूपा जगदम्बिका,
  • उन्हीं का रूप धारण किए,
  • श्रेष्ठ मयूर पर आरूढ़ हो,
  • हाथ में शक्ति लिए,
  • दैत्यों से युद्ध करने के लिए आयीं।

तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता।
शङ्‌खचक्रगदाशाङ्‌र्गखड्‌गहस्ताभ्युपाययौ॥१८॥

  • इसी प्रकार भगवान विष्णु की शक्ति,
  • गरुड़ पर विराजमान हो,
  • शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष तथा
  • खड्ग हाथ में लिए वहां आयी।

यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः।
शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम्॥१९॥

  • अनुपम वाराह का रूप धारण करने वाले,
  • श्रीहरि की जो शक्ति है,
  • वह भी वाराह-शरीर धारण करके,
  • वहां उपस्थित हुई।

नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।
प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः॥२०॥

  • नारसिंही शक्ति भी,
  • नृसिंहके समान शरीर धारण करके वहां आईं।
  • उसकी गर्दन के बालों के झटके से,
  • आकाश के तारे बिखर पड़ते थे।

वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता।
प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा॥२१॥

  • इसी प्रकार इंद्र की शक्ति,
  • वज्र हाथ में लिए,
  • गजराज ऐरावत पर बैठकर आईं।
  • उसके भी सहस्त्र नेत्र थे।
  • इन्द्रका जैसा रूप है, वैसा ही उसका भी था।

ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः।
हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याऽऽहचण्डिकाम्॥२२॥

  • तदनंतर उन देव-शक्तियोंसे घिरे हुए महादेवजी ने,
  • चंडिका से कहा –
  • मेरी प्रसन्नता के लिए,
  • तुम शीघ्र ही इन असुरों का संहार करो।

ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा।
चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी॥२३॥

  • तब देवी के शरीर से अत्यंत भयानक और
  • परम उग्र चंडिका-शक्ति प्रकट हुई,
  • जो सैकड़ों गीदडिय़ों की भांति आवाज करनेवाली थी।

सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता।
दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्‍वं शुम्भनिशुम्भयोः॥२४॥

  • उस अपराजिता देवी ने,
  • धूमिल जटावाले महादेवजी से कहा –
  • भगवन्! आप शुम्भ-निशुम्भ के पास दूत बनकर जाइए।

ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ।
ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः॥२५॥

  • – और उन अत्यंत गर्वीले दानव शुम्भ एवं निशुम्भ दोनों से कहिये।
  • साथ ही उनके अतिरिक्त भी जो दानव युद्ध के लिए वहां उपस्थित हों,
  • उनको भी यह संदेश दीजिए।

त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ॥२६॥

  • – दैत्यों!
  • यदि तुम जीवित रहना चाहते हो,
  • तो पाताल को लौट जाऒ।
  • इंद्र को त्रिलोकी का राज्य मिल जाय और
  • देवता यज्ञ भाग का उपभोग करें।

बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्‌क्षिणः।
तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः॥२७॥

  • यदि बल के घमंड में आकर,
  • तुम युद्ध की अभिलाषा रखते हो,
  • तो आऒ।
  • मेरी शिवाएं (योगिनियाँ),
  • तुम्हारे कच्चे मांस से तृप्त हों।”

यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम्।
शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता॥२८॥

  • चूंकि उस देवीने,
  • भगवान शिव को दूत के कार्य में नियुक्त किया था,
  • इसलिए वह, शिवदूती, के नाम से,
  • संसार में प्रसिद्ध हुईं।

तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः।
अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता॥२९॥

  • वे दैत्य (दानव) भी,
  • भगवान शिव के मुंह से,
  • देवी के वचन सुनकर,
  • क्रोध में भर गए और
  • जहां कात्यायनी विराजमान थीं,
  • उस ऒर बढ़े।

ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः।
ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः॥३०॥

  • तदनतर वे दैत्य पहले ही देवी के ऊपर,
  • बाण, शक्ति और
  • ऋष्टि आदि अस्त्रों की वृष्टि करने लगे।

सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्‍वधान्।
चिच्छेद लीलयाऽऽध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः॥३१॥

  • तब देवी ने भी खेल-खेल में ही धनुष की टंकार की और
  • उससे छोड़े हुए बड़े-बड़े बाणों द्वारा दैत्यों के चलाए हुए,
  • बाण, शूल, शक्ति और फरसों को काट डाला।

तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान्।
खट्‌वाङ्‌गपोथितांश्‍चारीन् कुर्वती व्यचरत्तदा॥३२॥

  • फिर काली उनके आगे होकर,
  • शत्रुऒं को शूल के प्रहार से विदीर्ण करने लगी और
  • खट्वांग से उनका कचूमर निकालती हुई,
  • रणभूमि में विचरने लगीं।

कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः।
ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति॥३३॥

  • ब्रह्माणी भी जिस-जिस ऒर दौड़ती,
  • उस ऒर अपने कमंडलु का जल छिड़ककर,
  • शत्रुऒं का ऒज और पराक्रम नष्ट कर देती थीं।

माहेश्‍वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी।
दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना॥३४॥

  • माहेश्वरी ने त्रिशूल से तथा
  • वैष्णवी ने चक्र से और
  • अत्यंत क्रोध में भरी हुई कुमार कार्तिकेय की शक्तिने, शक्तिसे,
  • दैत्यों का संहार आरम्भ किया।

ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः।
पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः॥३५॥

  • इंद्र शक्ति के वज्र प्रहार से विदीर्ण हो,
  • सैकड़ों दानव रक्त की धारा बहाते हुए,
  • पृथ्वी पर सो गए।

तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः।
वाराहमूर्त्या न्यपतंश्‍चक्रेण च विदारिताः॥३६॥

  • वाराही शक्ति ने,
  • कितनों को अपनी थूथुन की मार से नष्ट किया,
  • दाढ़ों के अग्रभाग से कितनों की छाती छेद डाली तथा
  • कितने ही दैत्य चक्र की चोट से विदीर्ण होकर गिर पड़े।

नखैर्विदारितांश्‍चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान्।
नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगम्बरा॥३७॥

  • नारसिंही भी,
  • दूसरे-दूसरे महा दैत्यों को अपने नखों से विदीर्ण करके खाती और
  • सिंहनाद से दिशाऒं एवं आकाश को गुंजाती हुई
  • युद्ध-क्षेत्र में विचरने लगीं।

चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः।
पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्‍चखादाथ सा तदा॥३८॥

  • कितने ही असुर,
  • शिवदूती के प्रचंड अट्टाहास से,
  • भयभीत हो पृथ्वी पर गिर पड़े और गिरने पर उन्हें,
  • शिवदूती ने अपना ग्रास बना लिया।

इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्।
दृष्ट्‌वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः॥३९॥

  • इस प्रकार क्रोध में भरे हुए मातृगणों को,
  • नाना प्रकार के उपायों से,
  • बड़े-बड़े असुरों का मर्दन करते देख,
  • दैत्य सैनिक भाग खड़े हुए।

पलायनपरान् दृष्ट्‌वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्।
योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः॥४०॥

  • मातृगणो से पीडि़त दैत्यों को युद्ध से भागते देख,
  • रक्तबीज नामक महादैत्य,
  • क्रोध में भरकर युद्ध करने के लिए आया।

रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः।
समुत्पतति मेदिन्यां तत्प्रमाणस्तदासुरः॥४१॥

  • उसके शरीर से,
  • जब रक्त की बूंद पृथ्वी पर गिरती,
  • तब उसी के समान शक्तिशाली,
  • एक दूसरा महादैत्य पृथ्वी पर पैदा हो जाता।

युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः।
ततश्‍चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत्॥४२॥

  • महाअसुर रक्तबीज,
  • हाथ में गदा लेकर इंद्रशक्ति के साथ युद्ध करने लगा।
  • तब ऐंद्री ने अपने वज्र से रक्तबीज को मारा।

कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम्।
समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥४३॥

  • वज्र से घायल होनेपर,
  • उसके शरीर से बहुत रक्त बहने लगा और
  • उससे उसी के समान,
  • रूप तथा पराक्रम वाले योद्धा उत्पन्न होने लगे।

यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः॥४४॥

  • उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें गिरीं,
  • उतने ही पुरुष उपन्न हो गए।
  • वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान,
  • बलवान् तथा पराक्रमी थे।

ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम्॥४५॥

  • वे रक्त से उपन्न होने वाले पुरुष भी,
  • भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए,
  • वहां मातृगणों के साथ घोर युद्ध करने लगे।

पुनश्‍च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा।
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः॥४६॥

  • पुन: वज्र के प्रहार से,
  • जब उसका मस्तक घायल हुआ,
  • तब रक्त बहने लगा और
  • उससे हजारों पुरुष उपन्न हो गए।

वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह।
गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्‍वरम्॥४७॥

  • वैष्णवी ने युद्ध में,
  • रक्तबीज पर चक्र का प्रहार किया तथा
  • ऐंद्री ने उस दैत्य सेनापति को
  • गदा से चोट पहुंचायी।

वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः।
सहस्रशो जगद्‌व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः॥४८॥

  • वैष्णवी के चक्र से घायल होने पर,
  • उसके शरीर से जो रक्त बहा और
  • उससे जो उसी के बराबर आकार वाले,
  • सहस्रों महादैत्य प्रकट हुए,
  • उनके द्वारा संपूर्ण जगत व्याप्त हो गया।

शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना।
माहेश्‍वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम्॥४९॥

  • कौमारी ने शक्ति से,
  • वाराही ने खड्ग से और
  • माहेश्वरी ने त्रिशूल से,
  • महादैत्य रक्तबीज को घायल किया।

स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक्।
मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः॥५०॥

  • क्रोध में भरे हुए रक्तबीज ने भी,
  • गदा से सभी मातृ-शक्तियों पर,
  • पृथक्-पृथक् प्रहार किया।

तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः॥५१॥

  • शक्ति और शूल आदि से,
  • अनेक बार घायल होने पर,
  • जो उसके शरीर से रक्त की धारा धरती पर गिरी,
  • उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए।

तैश्‍चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्।
व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम्॥५२॥

  • इस प्रकार उस महादैत्य के रक्त से प्रकट हुए,
  • असुरों द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया।
  • इससे उन देवताऒं को बड़ा भय हुआ।

तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्‌वा चण्डिका प्राह सत्वरा।
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु॥५३॥

  • देवताऒं को उदास देख चंडिका ने,
  • काली से शीघ्रतापूर्वक कहा –
  • “चांमुडे! तुम अपना मुख और भी फैलाऒ तथा –

मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान्।
रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना॥५४॥

  • मेरे शस्त्रपात से गिरने वाले रक्त बिदुऒं और
  • उनसे उपन्न होने वाले महादैत्यों को,
  • तुम अपने इस उतावले मुख से खा जाऒ।

भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान्।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति॥५५॥

  • इस प्रकार,
  • रक्त से उपन्न होने वाले महादैत्यों का भक्षण करती हुई,
  • तुम रण में विचरती रहो।
  • ऐसा करने से,
  • उस दैत्य का सारा रक्त क्षीण हो जाने पर,
  • वह स्वयं भी नष्ट हो जाएगा।

भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे।
इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम्॥५६॥

  • उन भयंकर दैत्यों को जब तुम खा जाऒगी,
  • तब दूसरे नये दैत्य उपन्न नहीं हो सकेंगे।”
  • काली से यों कहकर,
  • चंडिका देवीने,
  • शूल से रक्तबीज को मारा और

मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्।
ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम्॥५७॥

  • कालीने अपने मुख में उसका रक्त ले लिया।
  • तब उसने,
  • वहां चंडिकापर गदा से प्रहार किया।

न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि।
तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम्॥५८॥

  • किंतु उस गदापात ने,
  • देवी को तनिक भी वेदना नहीं पहुंचाई।
  • रक्तबीज के घायल शरीर से,
  • बहुत-सा रक्त गिरा।

यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति।
मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः॥५९॥

  • किंतु ज्यों ही वह गिरा,
  • त्यो ही चामुंडा ने उसे अपने मुख में ले लिया।
  • रक्त गिरने से काली के मुख में,
  • जो महादैत्य पैदा हुए,
  • उन्हें भी वह चट कर गयी और

तांश्‍चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम्।
देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः॥६०॥

  • उसने रक्तबीज का रक्त भी पी लिया।
  • तदनंतर देवी ने,
  • रक्तबीज को,
  • जिसका रक्त चामुंडा ने पी लिया था,
  • वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदि से मार डाला।

जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम्।
स पपात महीपृष्ठे शस्‍त्रसङ्घसमाहतः॥६१॥
नीरक्तश्‍च महीपाल रक्तबीजो महासुरः।
ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप॥६२॥

  • राजन्! इस प्रकार शस्त्रों के समुदाय से,
  • आहत और रक्तहीन हुआ,
  • महादैत्य रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा।
  • नरेश्वर! इससे देवताऒं को अनुपम हर्ष की प्राप्ति हुई और

तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्‌मदोद्धतः॥ॐ॥६३॥

  • मातृगण उन असुरों के रक्तपान के मद से,
  • उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगे।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवी माहाम्य में,
  • रक्तबीज-वध नामक,
  • आठवां अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 9

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Durga Saptashati – 9

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 8 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 9 में –

  • निशुंभ का वध

॥ध्यानम्॥

ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां
पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः।
बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र-
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि॥

ध्यान

  • मैं अर्धनारीश्वरके श्रीविग्रहकी,
  • निरन्तर शरण लेता (लेती) हूँ।
  • उसका वर्ण बन्धूकपुष्प और
  • सुवर्णके समान रक्तपतिमिश्रित है।
  • वह अपनी भुजाओंमें सुन्दर अक्षमाला,
  • पाश और वरद-मुद्रा धारण करता है;
  • अर्धचन्द्र उसका आभूषण तथा
  • वह तीन नेत्रोंसे सुशोभित है।

ॐ राजोवाच॥१॥
विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम।
देव्याश्‍चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम्॥२॥

  • राजा सुरथ ने कहा – भगवन्!
  • आपने रक्तबीज के वध से सम्बन्ध रखने वाला,
  • देवी-चरित्र का यह अद्भुत माहाम्य मुझे बतलाया।

भूयश्‍चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते।
चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्‍चातिकोपनः॥३॥

  • अब रक्तबीज के मारे जाने पर,
  • क्रोध में भरे हुए शुम्भ और निशुम्भ ने,
  • जो कर्म किया,
  • उसे मैं सुनना चाहता हूं।

ऋषिरुवाच॥४॥
चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते।
शुम्भासुरो निशुम्भश्‍च हतेष्वन्येषु चाहवे॥५॥

  • मेधा ऋषि कहते हैं – राजन्!
  • युद्ध में रक्तबीज तथा अन्य दैत्यों के मारे जाने पर,
  • शुम्भ और निशुम्भ के क्रोध की सीमा न रही।

हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन्।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया॥६॥

  • अपनी विशाल सेना इस प्रकार मारी जाती देख,
  • निशुम्भ अमर्ष (क्रोध) में भरकर,
  • देवी की ऒर दौड़ा।
  • उसके साथ असुरों की प्रधान सेना थी।

तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्‍वयोश्‍च महासुराः।
संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः॥७॥

  • उसके आगे, पीछे तथा पार्श्व भाग में बड़े-बड़े असुर थे,
  • जो क्रोध से ऒठ चबाते हुए,
  • देवी को मार डालने के लिए आए।

आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः।
निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः॥८॥

  • महापराक्रमी शुम्भ भी,
  • अपनी सेना के साथ,
  • मातृगणों से युद्ध करके क्रोधवश,
  • चंडिका को मारने के लिए आ पहुंचा।

ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः।
शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः॥९॥

  • तब देवी के साथ,
  • शुम्भ और निशुम्भ का घोर संग्राम छिड़ गया।
  • वे दोनों दैत्य,
  • मेघों की भांति,
  • बाणों की भयंकर वृष्टि कर रहे थे।

चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः।
ताडयामास चाङ्‌गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्‍वरौ॥१०॥

  • उन दोनों के चलाए हुए बाणों को,
  • चंडिका ने अपने बाणों के समूह से,
  • तुरंत काट डाला और
  • शस्त्र समूहों की वर्षा करके,
  • उन दोनों दैत्यपतियों के अंगों में भी चोट पहुंचाई।

निशुम्भो निशितं खड्‌गं चर्म चादाय सुप्रभम्।
अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्॥११॥

  • निशुम्भ ने तीखी तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर,
  • देवी के वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया।

ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्।
निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम्॥१२॥

  • अपने वाहन को चोट पहुंचने पर,
  • देवी ने,
  • क्षुरप्र नामक बाण से,
  • निशुम्भ की तलवार तुरंत ही काट डाली और
  • उसकी ढाल को भी,
  • जिसमें आठ चांद जड़े थे,
  • खंड-खंड कर दिया।

छिन्ने चर्मणि खड्‌गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः।
तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम्॥१३॥

  • ढाल और तलवार के कट जाने पर,
  • उस असुर ने शक्ति चलायी।
  • देवी ने चक्र से,
  • उसके भी दो टुकड़े कर दिए।

कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः।
आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत्॥१४॥

  • अब तो निशुम्भ क्रोध से जल उठा और
  • उस दानव ने देवी को मारने के लिए शूल उठाया।
  • किंतु देवी ने समीप आने पर,
  • उसे भी मुक्के से मारकर चूर कर दिया।

आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति।
सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता॥१५॥

  • तब उसने गदा घुमाकर,
  • चंडी के ऊपर चलायी,
  • परंतु वह भी देवीके त्रिशूल से कटकर भस्म हो गयी।

ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्‌गवम्।
आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले॥१६॥

  • तदनंतर दैत्यराज निशुम्भ को फरसा हाथ में लेकर आते देख,
  • देवी ने, बाण समूहों से घायल कर,
  • उसे धरती पर सुला दिया।

तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे।
भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम्॥१७॥

  • उस भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भ के,
  • धराशायी हो जाने पर,
  • शुम्भ को बड़ा क्रोध हुआ और
  • अम्बिका का वध करने के लिए वह आगे बढ़ा।

स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः।
भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः॥१८॥

  • रथ पर बैठे-बैठे ही,
  • उत्तम आयुधों से सुशोभित,
  • अपनी बड़ी-बड़ी आठ अनुपम भुजाऒं से,
  • समूचे आकाश को ढंककर,
  • वह अद्भुत शोभा पाने लगा।

तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्‌खमवादयत्।
ज्याशब्दं चापि धनुषश्‍चकारातीव दुःसहम्॥१९॥

  • उसे आते देख देवी ने शंख बजाया और
  • धनुष की प्रत्यंचा खींचकर गर्जना की।

पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च।
समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना॥२०॥

  • साथ ही अपने घंटे के शब्द से,
  • जो समस्त असुर-सैनिकों का तेज नष्ट करने वाला था,
  • संपूर्ण दिशाऒं को व्याप्त कर दिया।

ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः।
पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश॥२१॥

  • तदन्तर सिंह ने भी अपनी दहाड़ से,
  • जिसे सुनकर बड़े-बड़े गजराजों का महान मद दूर हो जाता था,
  • आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाऒं को गुंजा दिया।

ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्।
कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः॥२२॥

  • फिर काली ने आकाश में उछलकर,
  • अपने दोनों हाथों से पृथ्वी पर आघात किया।
  • उससे ऐसा भयंकर शब्द हुआ,
  • जिससे पहले के सभी शब्द शांत हो गए।

अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह।
तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ॥२३॥

  • तत्पश्चात् शिवदूती ने,
  • दैत्यों के लिए अमङ्गलजनक अट्टहास किया।
  • इन शब्दों को सुनकर,
  • समस्त असुर थर्रा उठे;
  • किंतु शुम्भ को बड़ा क्रोध हुआ।

दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा।
तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः॥२४॥

  • उस समय देवी ने जब शुम्भ को लक्ष्य करके कहा –
  • “ऒ दुरात्मन! खड़ा रह, खड़ा रह”,
  • तभी आकाश में खड़े हुए देवता बोल उठे –
  • “जय हो, जय हो”।

शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा।
आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया॥२५॥

  • शुम्भ ने वहां आकर,
  • ज्वालाऒं से युक्त,
  • अत्यंत भयानक शक्ति चलाई।
  • अग्निमय पर्वत के समान आती हुई उस शक्ति को,
  • देवी ने काट दिया।

सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्।
निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते॥२६॥

  • उस समय शुम्भ के सिंहनाद से,
  • तीनों लोक गूंज उठे।
  • राजन्! उसकी प्रतिध्वनि से,
  • वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ।

शुम्भमुक्ताञ्छरान्‍देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्।
चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः॥२७॥

  • शुम्भ के चलाए हुए बाणों को देवी ने और
  • देवीके चलाए हुए बाणों को शुम्भ ने,
  • सैकड़ों टुकड़े कर दिए।

ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्।
स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह॥२८॥

  • तब क्रोध में भरी हुई चंडिका ने,
  • शुम्भ को शूल से मारा।
  • उसके आघात से मूर्च्छित हो,
  • वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।

ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः।
आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा॥२९॥

  • इतने में ही निशुम्भ को चेतना हुई और
  • उसने धनुष हाथ में लेकर,
  • बाणों से देवी काली तथा
  • सिंह को घायल कर डाला।

पुनश्‍च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्‍वरः।
चक्रायुधेन दितिजश्‍छादयामास चण्डिकाम्॥३०॥

  • फिर उस दैत्यराज ने दस हजार बांहें बनाकर,
  • चक्रों के प्रहार से,
  • चंडिका को आच्छादित कर दिया।

ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी।
चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्‍च तान्॥३१॥

  • तब दुर्गम पीड़ा का नाश करने वाली,
  • भगवती दुर्गा ने,
  • कुपित होकर अपने बाणों से,
  • उन चक्रों तथा बाणों को काट गिराया।

ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम्।
अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः॥३२॥

  • यह देख निशुम्भ दैत्य सेना के साथ,
  • चंडिका का वध करने के लिए,
  • हाथ में गदा ले बड़े वेग से दौड़ा।

तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका।
खड्‌गेन शितधारेण स च शूलं समाददे॥३३॥

  • उसके आते ही चंडी ने,
  • तीखी धारवाली तलवार से,
  • उसकी गदा को शीघ्र ही काट डाला।
  • तब उसने शूल हाथ में ले लिया।

शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम्।
हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका॥३४॥

  • देवताऒं को पीड़ा देने वाले निशुम्भ को,
  • शूल हाथ में लिए आते देख,
  • चंडिका ने,
  • वेग से चलाए हुए अपने शूल से,
  • उसकी छाती छेद डाली।

भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः।
महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन्॥३५॥

  • शूलसे विदीर्ण हो जाने पर,
  • उसकी छाती से एक दूसरा महाबली एवं महापराक्रमी पुरुष
  • “खड़ी रह, खड़ी रह”
  • कहता हुआ निकला।

तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः।
शिरश्चिच्छेद खड्‌‍गेन ततोऽसावपतद्भुवि॥३६॥

  • उस निकलते हुए पुरुष की बात सुनकर,
  • देवी ठठाकर हँस पड़ीं और
  • खड्ग से उन्होंने उसका मस्तक काट डाला।
  • फिर तो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।

ततः सिंहश्‍चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान्।
असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान्॥३७॥

  • तदनतर सिंह अपनी दाढ़ों से,
  • असुरों की गर्दन कुचलकर खाने लगा।
  • यह बड़ा भयंकर दृश्य था।
  • उधर काली तथा शिवदूती ने भी,
  • अन्यान्य दैत्यों का भक्षण आरम्भ किया।

कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः।
ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः॥३८॥

  • कौमारी की शक्ति से विदीर्ण होकर,
  • कितने ही महादैत्य नष्ट हो गए।
  • ब्रह्माणी के मंत्रयुक्त जल से,
  • निस्तेज होकर कितने ही भाग खड़े हुए।

माहेश्‍वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे।
वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि॥३९॥

  • कितने ही दैत्य माहेश्वरी के त्रिशूल से,
  • छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गए।
  • वाराही के थूथुन के आघात से,
  • कितनों का पृथ्वी पर कचूमर निकल गया।

खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः।
वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे॥४०॥

  • वैष्णवी ने भी अपने चक्र से,
  • दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर डाले।
  • ऐंद्री के हाथ से छूटे हुए वज्र से भी,
  • कितने ही प्राणों से हाथ धो बैठे।

केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात्।
भक्षिताश्‍चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः॥ॐ॥४१॥

  • कुछ असुर नष्ट हो गए,
  • कुछ उस महायुद्ध से भाग गए तथा
  • कितने ही काली, शिवदूती तथा सिंह के ग्रास बन गए।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कडेयपुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में,
  • निशुम्भ-वध नामक,
  • नवां अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 10

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 9 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 10 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 10 में –

  • निशुंभ का वध

॥ध्यानम्॥

ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-
नेत्रां धनुश्शरयुताङ्‌कुशपाशशूलम्।
रम्यैर्भुजैश्‍च दधतीं शिवशक्तिरूपां
कामेश्‍वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम्॥

ध्यान

  • मैं मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाली,
  • शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरीका,
  • हृदयमें चिन्तन करता (करती) हूँ।
  • वे तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर हैं।
  • सूर्य, चन्द्रमा और अग्रि-ये ही तीन उनके नेत्र हैं तथा
  • वे अपने मनोहर हाथोंमें,
  • धनुष-बाण, अंकुश, पाश और,
  • शूल धारण किये हुए हैं।

ऊं नमश्चंडिकायैः नमः


दुर्गा सप्तशती अध्याय 10

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
निशुम्भं निहतं दृष्ट्‌वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥२॥

  • ऋषि कहते हैं- हे राजन्!
  • अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा
  • सारी सेना का संहार होता जान
  • शुम्भ ने कुपित होकर कहा –

बलावलेपाद्दुष्टे* त्वं मा दुर्गे गर्वमावह।
अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी॥३॥

  • “दुष्ट दुर्गे! तू बल के अभिमान में आकर,
  • झूठ-मूठ का घमंड न दिखा।
  • तू बड़ी मानिनी बनी हुई है,
  • किंतु दूसरी स्त्रियोंके बल का सहारा लेकर लड़ती है।”

देव्युवाच॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः*॥५॥

  • देवी बोलीं –
  • “ऒ दुष्ट! मैं अकेली ही हूं।
  • इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है?
  • देख, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं,
  • अत: मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं।

ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका॥६॥

  • तदनंतर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियां,
  • अंबिका देवी के शरीर में लीन हो गईं।
  • उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गयीं।

देव्युवाच॥७॥
अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता।
तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव॥८॥

  • देवी बोलीं – मैं अपनी ऐश्वर्य शक्ति से,
  • अनेक रूपों में यहां उपस्थित हुई थी।
  • उन सब रूपों को मैंने समेट लिया।
  • अब अकेली ही युद्ध में खड़ी हूं।
  • तुम भी स्थिर हो जाऒ।

ऋषिरुवाच।।९॥
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम्॥१०॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • तदनंतर देवी और शुम्भ दोनों में,
  • सब देवताऒं तथा दानवों के देखते-देखते,
  • भयंकर युद्ध छिड़ गया।

शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्‍चैव दारुणैः।
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम्॥११॥

  • बाणों की वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रों के प्रहार के कारण,
  • उन दोनों का युद्ध,
  • सब लोगों के लिये बड़ा भयानक प्रतीत हुआ।

दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः॥१२॥

  • उस समय अम्बिका देवी ने,
  • जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े,
  • उसे दैत्यराज शुम्भ ने,
  • उनके निवारक अस्त्रों द्वारा काट डाला।

मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्‍वरी।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहु*ङ्‌कारोच्चारणादिभिः॥१३॥

  • इसी प्रकार शुम्भ ने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये;
  • उन्हें परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार शब्दके उच्चारण अदिद्वारा,
  • खेल-खेल में ही नष्ट कर डाला।

ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः।
सापि* तत्कुपिता देवी धनुश्‍चिच्छेद चेषुभिः॥१४॥

  • तब उस असुर ने,
  • सैकड़ों बाणों से देवी को आच्छादित कर दिया।
  • यह देख क्रोध में भरी हुई उन देवीने भी,
  • बाण मारकर उसका धनुष काट डाला।

छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम्॥१५॥

  • धनुष कट जाने पर फिर दैत्यराज ने,
  • शक्ति हाथ में ली,
  • किंतु देवी ने चक्र से,
  • उसके हाथ की शक्ति को भी काट गिराया।

ततः खड्‌गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत्।
अभ्यधावत्तदा* देवीं दैत्यानामधिपेश्‍वरः॥१६॥

  • तपश्चात दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने,
  • सौ चांद वाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथ में ले,
  • उस समय देवी पर धावा किया।

तस्यापतत एवाशु खड्‌गं चिच्छेद चण्डिका।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्‍चर्म चार्ककरामलम्*॥१७॥

  • उसके आते ही चंडिका ने,
  • अपने धनुष से छोड़े हुए तीखे बाणों द्वारा,
  • उसकी सूर्य किरणों के समान उज्वल ढाल और तलवार को,
  • तुरंत काट दिया।

हताश्‍वः स तदा दैत्यश्‍छिन्नधन्वा विसारथिः।
जग्राह मुद्‌गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः॥१८॥

  • फिर उस दैत्य के,
  • घोड़े और सारथि मारे गए।
  • धनुष तो पहले ही कट चुका था,
  • अब उसने अम्बिका को मारने के लिये,
  • उद्यत हो भयंकर मुदगर हाथ में लिया।

चिच्छेदापततस्तस्य मुद्‌गरं निशितैः शरैः।
तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान्॥१९॥

  • उसे आते देख देवी ने,
  • अपने तीक्ष्ण बाणों से,
  • उसका मुद्गर भी काट डाला।
  • तिस पर भी वह असुर,
  • मुक्का तानकर बड़े वेग से,
  • देवी की ऒर झपटा।

स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्‌गवः।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत्॥२०॥

  • उस दैत्यराज ने,
  • देवी की छाती में मुक्का मारा,
  • तब उन देवी ने भी,
  • उसकी छाती में एक चांटा जड़ दिया।

तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः॥२१॥

  • देवी का थप्पड़ खाकर,
  • दैत्यराज शुम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा,
  • किंतु पुन: सहसा पूर्ववत उठकर खड़ा हो गया।

उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका॥२२॥

  • फिर वह उछला और देवी को ऊपर ले जाकर,
  • आकाश में खड़ा हो गया।
  • तब चंडिका आकाश में भी,
  • बिना किसी आधार के ही,
  • शुम्भ के साथ युद्ध करने लगीं।

नियुद्धं खे तदा दैत्यश्‍चण्डिका च परस्परम्।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम्॥२३॥

  • उस समय दैत्य और चंडिका,
  • आकाश में एक-दूसरे से लडऩे लगे।
  • उनका वह युद्ध,
  • सिद्ध और मुनियों को,
  • विस्मय में डालनेवाला हुआ।

ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह।
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले॥२४॥

  • फिर अम्बिका ने शुम्भ के साथ,
  • बहुत देर तक युद्ध करने के पश्चात,
  • उसे उठाकर घुमाया और
  • पृथ्वी पर पटक दिया।

स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः*।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया॥२५॥

  • पटके जाने पर पृथ्वी पर आने के बाद,
  • वह दुष्टत्मा दैत्य,
  • पुन: चंडिका का वध करने के लिए,
  • उनकी ऒर बड़े वेग से दौड़ा।

तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्‍वरम्।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि॥२६॥

  • तब समस्त दैत्यों के राजा शुम्भ को,
  • अपनी ऒर आते देख,
  • देवी ने,
  • त्रिशूल से उसकी छाती छेदकर,
  • उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।

स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम्॥२७॥

  • देवी के शूल की धार से घायल होने पर,
  • उसके प्राण-पखेरू उड़ गए और
  • वह समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित,
  • समूची पृथ्वी को कंपाता हुआ,
  • भूमि पर गिर पड़ा।

ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि।
जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः॥२८॥

  • उस दुरात्मा के मारे जाने पर,
  • सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया तथा
  • आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा।

उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते॥२९॥

  • पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे,
  • वे सब शांत हो गए तथा
  • उस दैत्य के मारे जाने पर
  • नदियाँ भी ठीक मार्ग से बहने लगीं।

ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः॥३०॥

  • उस समय शुम्भ की मृत्यु के बाद
  • सम्पूर्ण देवताऒं का हृदय हर्ष से भर गया और
  • गंधर्वगण मधुर गीत गाने लगे।

अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्‍चाप्सरोगणाः।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः॥३१॥

  • दूसरे गंधर्व बाजे बजाने लगे और
  • अप्सराएँ नाचने लगीं।
  • पवित्र वायु बहने लगी।
  • सूर्य की प्रभा उत्तम हो गई।

जज्वलुश्‍चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः॥ॐ॥३२॥

  • अग्निशाला की बुझी हुई आग,
  • अपने-आप प्रज्वलित हो उठी तथा
  • सम्पूर्ण दिशाऒं के भयंकर शब्द शांत हो गए।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥

  • इस प्रकार,
  • श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में,
  • शुम्भ-वध नामक,
  • दसवां अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 11 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index


दुर्गा सप्तशती अध्याय 11 के मुख्य प्रसंग

  1. भुवनेश्वरी देवी का ध्यान मंत्र
  2. माँ दुर्गा की शक्तियों का वर्णन
  3. माँ जगदम्बा के स्वरूपों का वर्णन
  4. सभी विपदाओं से रक्षा के लिए, देवी माँ से प्रार्थना
  5. देवी माँ का, देवताओं से, वर मांगने के लिए कहना
  6. देवी माँ ने, भविष्य में होने वाले, कुछ अवतारों के बारें में बताया

1. दुर्गा सप्तशती अध्याय ग्यारह का ध्यान

भुवनेश्वरी देवी का, ग्यारहवे अध्याय का, ध्यान मन्त्र

॥ध्यानम्॥
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्‌गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्‌कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥

ध्यान

  • मैं भुवनेश्वरी देवीका,
  • ध्यान करता (करती) हूँ ।
  • उनके श्रीअंगोकी आभा,
  • प्रभातकालके सूर्यके समान है और
  • मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट है और
  • तीन नेत्रोंसे युक्त हैं।
  • उनके मुखपर मुस्कानकी छटा छायी रहती है, और
  • हाथोंमें वरद, अंकुश, पाश एवं
  • अभय-मुद्रा शोभा पाते हैं।

ऊं नमश्चंडिकायैः नमः


देवताओं द्वारा, माँ दुर्गा की शक्तियों का वर्णन

1 – 2.

इंद्र आदि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे
सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्।
कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्
विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः॥२॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • देवी के द्वारा,
  • महादैत्यपति शुम्भ के मारे जाने पर,
  • इंद्र आदि देवता अग्नि को आगे करके,
  • उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे।
  • उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से,
  • उनके मुखकमल दमक उठे थे और
  • उनके प्रकाश से,
  • दिशाएं भी जगमगा उठी थीं।

3.

जगत की माता, सृष्टि की रचना और रक्षा करने वाली माँ जगदम्बा

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्‍वेश्‍वरि पाहि विश्‍वं
त्वमीश्‍वरी देवि चराचरस्य॥३॥

  • देवता बोले –
  • शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि!
  • हम पर प्रसन्न हो।
  • सम्पूर्ण जगत की माता!
  • प्रसन्न होऒ।
  • विश्वेश्वरि!
  • विश्व की रक्षा करो।
  • देवि!
  • तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो।

4.

जगत का आधार, पृथ्वीरूप, जलरूप

आधारभूता जगतस्त्वमेका
महीस्वरूपेण यतः स्थितासि।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत-
दाप्यायते कृत्स्नमलङ्‌घ्यवीर्ये॥४॥

  • तुम इस जगत का एकमात्र आधार हो,
  • क्योंकि पृथ्वी रूप में तुम्हारी ही स्थिति है।
  • देवि!
  • तुम्हारा पराक्रम अलंघनीय है।
  • तुम्हीं जलरूप में स्थित होकर,
  • सम्पूर्ण जगत को तृप्त करती हो।

5.

मोक्ष प्रदान करने वाली, वैष्णवी शक्ति

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्‍वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥५॥

  • तुम अनंत बल सम्पन्न,
  • वैष्णवी शक्ति हो।
  • इस विश्व की कारण,
  • भूता, परा माया हो।
  • देवि!
  • तुमने इस समस्त जगत को,
  • मोहित कर रखा है।
  • तुम्हीं प्रसन्न होने पर,
  • इस पृथ्वी को मोक्ष की प्राप्ति कराती हो।

6.

विश्व की कारण और परमबुद्धि स्वरूप

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥६॥

  • देवि!
  • सम्पूर्ण विद्याएं,
  • तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं।
  • जगत में जितनी स्त्रियां हैं,
  • वे सब तुम्हारी ही मूतियां हैं।
  • जगदम्बा!
  • एकमात्र तुमने ही,
  • इस विश्व को व्याप्त कर रखा है।
  • तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है?
  • तुम तो स्तुति करने योग्य पदार्थों से परे एवं,
  • परा वाणी (परमबुद्धि स्वरूपा) हो।

7.

मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करने वाली सर्वस्वरूपा देवी

सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥७॥

  • जब तुम सर्वस्वरूपा देवी,
  • स्वर्ग तथा मोक्ष,
  • प्रदान करने वाली हो,
  • तब इसी रूप में,
  • तुम्हारी स्तुति हो गई।
  • तुम्हारी स्तुति के लिए,
  • इससे अच्छी उक्तियां,
  • और क्या हो सकती हैं?

8.

सभी जीवों के हृदय में, बुद्धि स्वरूप नारायणी देवी

सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥८॥

  • बुद्धिरूप से,
  • सब लोगों के हृदय में,
  • विराजमान रहने वाली तथा
  • स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली,
  • नारायणी देवि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

9.

सृष्टि की रचना, परिवर्तन और उपसंहार करने वाली

कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि।
विश्‍वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते॥९॥

  • कला, काष्ठा आदि के रूप से,
  • क्रमश: परिणाम अर्थात
  • अवस्था परिवर्तन की ऒर,
  • ले जाने वाली तथा
  • विश्व का,
  • उपसंहार करने में समर्थ नारायणी!
  • तुम्हें नमस्कार है।
  • उपसंहार अर्थात
    • समापन,
    • समाप्ति, अंत
    • किसी रचना या कृति का अंतिम निष्कर्ष

10.

मंगलमयी और शरणागत भक्तों पर दया करने वाली

सर्वमङ्‌गलमंङ्‌गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१०॥

  • नारायणी!
  • तुम सब प्रकार का,
  • मंगल प्रदान करने वाली,
  • मंगलमयी हो।
  • कल्याणदायिनी शिवा हो,
  • सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली,
  • शरणागत वत्सला,
  • तीन नेत्रों वाली एवं
  • गौरी हो।
  • तुम्हें नमस्कार है।

11.

सर्वगुणमयी – सृष्टि की रचना, पालन और संहार की शक्ति

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥११॥

  • तुम सृष्टि, पालन और
  • संहार की शक्तिभूता,
  • सनातनी देवी,
  • गुणोंका आधार तथा
  • सर्वगुणमयी हो।
  • नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।

12.

भक्तों के दुःख और पीड़ा दूर करने वाली

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१२॥

  • शरण में आए हुए,
  • दीनों एवं पीडि़तों की रक्षा में,
  • संलग्न रहने वाली तथा
  • सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवी!
  • तुम्हें नमस्कार है।

अब देवताओं द्वारा, माँ जगदम्बा के स्वरुप का वर्णन

13.

ब्रम्हाणी रूप में – हंसों के विमान पर बैठी हुई

हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि।
कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१३॥

  • नारायणि!
  • तुम ब्रह्माणी का रूप धारण करके,
  • हंसों से जुते हुए विमान पर बैठती तथा
  • कुश-मिश्रित जल छिड़कती रहती हो।
  • तुम्हें नमस्कार है।

14.

माहेश्वरी रूप में – त्रिशूल और चंद्रमा धारण करने वाली

त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि।
माहेश्‍वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते॥१४॥

  • माहेश्वरी रूप से त्रिशूल, चंद्रमा एवं
  • सर्प को धारण करने वाली तथा
  • महान वृषभ की पीठ पर बैठने वाली नारायणी देवी!
  • तुम्हें नमस्कार है।

15.

महाशक्ति धारण करने वाली नारायणी देवी

मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते॥१५॥

  • मोरों से घिरी रहने वाली तथा
  • महाशक्ति धारण करने वाली,
  • कौमारी रूपधारिणी,
  • निष्पापे नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

16.

वैष्णवी रूप में – शंख, चक्र, गदा और धनुष धारण करने वाली

शङ्‌खचक्रगदाशाङ्‌र्गगृहीतपरमायुधे।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१६॥

  • शङ्ख, चक्र, गदा और
  • धनुषरूप उत्तम आयुधों को धारण करने वाली,
  • वैष्णवी शक्ति रूपा नारायणि!
  • तुम प्रसन्न होऒ। तुम्हें नमस्कार है।

17.

वाराही रूप में – महाचक्र धारण करने वाली

गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१७॥

  • हाथ में भयानक महाचक्र लिए और
  • दाढ़ों पर धरती को उठाए,
  • वाराही रूपधारिणी
  • कल्याणमयी नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

18.

नृसिंह रूप में – दैत्यों का संहार करके जगत की रक्षा करने वाली

नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते॥१८॥

  • भयंकर नृसिंहरूप से,
  • दैत्यों के वध के लिए,
  • उद्योग करने वाली तथा
  • त्रिभुवन की रक्षा में,
  • संलग्न रहने वाली नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

19.

शक्ति स्वरूप – हाथ में महावज्र, माथे पर किरीट और सहस्त्र नेत्र

किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले।
वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१९॥

  • किरीट अर्थात
    • मुकुट के रूप में धारण किया जाने वाला अलंकार
    • मुकुट, अर्धचंद्र के आकार का
  • मस्तक पर किरीट और
  • हाथ में महावज्र धारण करने वाली,
  • सहस्र नेत्रों के कारण,
  • उद्दीप्त दिखायी देने वाली और
  • वृत्रासुरके प्राण हरने वाली
  • इंद्रशक्तिस्वरूपा नारायणी देवि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

20.

शिवदूती रूप में – राक्षसों के संहार के लिए भयंकर रूप धारण करने वाली

शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले।
घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२०॥

  • शिवदूती रूपसे,
  • दैत्यों की सेना का संहार करनेवाली,
  • भयंकर रूप धारण तथा
  • विकट गर्जना करनेवाली नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

21.

चामुण्डा रूप में – चण्ड, मुण्ड राक्षसों का वध करने वाली

दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥२१॥

  • दाढ़ों के कारण विकराल मुखवाली,
  • मुंडमाला से विभूषित,
  • मुंडमर्दिनी चामुंडारूपा नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।

22.

महाविद्या, लक्ष्मी, पुष्टि और श्रद्धा स्वरुप

लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे।
महारात्रि महाऽविद्ये नारायणि नमोऽस्तु ते॥२२॥

  • लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या,
  • श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा तथा
  • महारात्रि नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।
  • पुष्टि अर्थात
    • दृढ़ता, मजबूती
    • पोषण।

23.

अधीश्वरी रूप में – महाकाली, पार्वती, सरस्वती, ऐश्वर्य स्वरुप

मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२३॥

  • मेधा, सरस्वती, श्रेष्ठा, ऐश्वर्यरूपा,
  • पार्वती, महाकाली, नियता तथा
  • ईशा – सबकी अधीश्वरी रूपिणी नारायणि!
  • तुम्हें नमस्कार है।
  • अधीश्वर – अधीश्वरी अर्थात
    • मालिक
    • स्वामी

सभी विपदाओं से रक्षा के लिए, देवी माँ से प्रार्थना

24.

माँ दुर्गा – सब प्रकारके भयों से, हमारी रक्षा करों

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥२४॥

  • सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा
  • सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न,
  • दिव्यरूपा दुर्गे देवि!
  • सब भयों से हमारी रक्षा करो।
  • तुम्हें नमस्कार है।

25.

कात्यायनी देवी – भय से, हमारी रक्षा करों

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥२५॥

  • हे कात्यायनी!
  • यह तीन लोचनों से विभूषित,
  • तुम्हारा सौम्य मुख,
  • सब प्रकारके भयों से,
  • हमारी रक्षा करे।
  • तुम्हें नमस्कार है।

26.

माँ भद्रकाली – आपका त्रिशूल, हमें भय से बचाएं

ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥२६॥

  • भद्रकाली!
  • ज्वालाऒंके कारण,
  • विकराल प्रतीत होने वाला,
  • अत्यंत भयंकर और
  • समस्त असुरों का संहार करने वाला,
  • तुम्हारा त्रिशूल,
  • भयसे हमें बचाए।
  • तुम्हें नमस्कार है।

27.

दैत्यों का तेज़ नष्ट करने वाला घंटा, पापों से, हमारी रक्षा करें

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव॥२७॥

  • देवि!
  • तुम्हारा घंटा,
  • जो अपनी ध्वनि से,
  • समूचे जगत को व्याप्त करके,
  • दैत्यों के तेज नष्ट करता है,
  • हम लोगों की पापों से,
  • उसी प्रकार रक्षा करे,
  • जैसे, माता अपने पुत्रों की,
  • बुरे कर्मों से रक्षा करती है।

28.

चंडिका देवी – आपके हाथ का खडग, हमारी रक्षा करें

असुरासृग्वसापङ्‌कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः।
शुभाय खड्‌गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्॥२८॥

  • चंडिके!
  • तुम्हारे हाथों में सुशोभित खड्ग,
  • जो असुरों के रक्त और
  • चर्बीसे चर्चित है,
  • हमारा मंगल करे।
  • हम तुम्हें नमस्कार करते हैं।

29.

माँ जगदम्बा – सब प्रकार के रोगों से, हमारी रक्षा करों

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥२९॥

  • देवि!
  • तुम प्रसन्न होनेपर,
  • सब रोगों को,
  • नष्ट कर देती हो और
  • कुपित होने पर,
  • मनोवांछित सभी कामनाऒं का,
  • नाश कर देती हो।

देवी माँ की शरण में जाने का फायदा

  • जो लोग,
  • तुम्हारी शरण में जा चुके हैं,
  • उन पर,
  • विपत्ति तो आती ही नहीं।
  • तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य,
  • दूसरों को,
  • शरण देने वाले हो जाते हैं।

30.

माँ अम्बिका – आपके विभिन्न रूपों ने, दैत्यों से, हमारी रक्षा की है

एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य
धर्मद्विषां देवि महासुराणाम्।
रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्तिं
कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या॥३०॥

  • देवि! अम्बिके!
  • तुमने अपने स्वरूप को,
  • अनेक भागों में विभक्त करके,
  • नाना प्रकार के रूपों से,
  • जो इस समय,
  • इन धर्मद्रोही महादैत्यों का,
  • संहार किया है,
  • वह सब,
  • और दुसरा कौन कर सकता था?

31.

वेदों में, शास्त्रों में, सभी विद्याओं में, देवी माँ का ही वर्णन

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे-
ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या।
ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे
विभ्रामयत्येतदतीव विश्‍वम्॥३१॥

  • विद्यओंमें,
  • ज्ञानको प्रकाशित करने वाले शास्त्रोंमें तथा
  • अदिवाक्यों में (वेदों में),
  • तुम्हारे सिवा,
  • और किसका वर्णन है?

32.

शत्रु, राक्षस और दानवों से विश्व की रक्षा करने वाली

रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्‍च नागा
यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये
तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्‍वम्॥३२॥

  • जहां राक्षस, भयंकर विषैले सर्प,
  • शत्रुगण, लुटेरों की सेना और
  • दावानल हो वहां, तथा
  • समुद्र के बीच में भी साथ रहकर,
  • तुम विश्व की रक्षा करती हो।

33.

विश्वरूपा, विश्वेश्वरि, विश्व का पालन करने वाली

विश्‍वेश्‍वरि त्वं परिपासि विश्‍वं
विश्‍वात्मिका धारयसीति विश्‍वम्।
विश्‍वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्‍वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥३३॥

  • विश्वेश्वरि!
  • तुम विश्व का पालन करती हो।
  • विश्वरूपा हो,
  • इसलिए संपूर्ण विश्व को धारण करती हो।
  • तुम भगवान विश्वनाथ की भी वंदनीया हो।
  • जो लोग भक्तिपूर्वक,
  • तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं,
  • वे सम्पूर्ण विश्व को,
  • आश्रय देने वाले होते हैं।

34.

देवी माँ – शत्रुओं के भय से हमें बचाओं

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्‍च महोपसर्गान्॥३४॥

  • देवि! प्रसन्न होओ।
  • जैसे इस समय,
  • असुरों का वध करके,
  • तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है,
  • उसी प्रकार,
  • सदा हमें शत्रुऒं के भय से बचाऒ।

हे देवी माँ, हमारे सब पाप नष्ट कर दो

  • सम्पूर्ण जगत का पाप,
  • नष्ट कर दो।
  • पापों के फलस्वरूप,
  • प्राप्त होने वाले,
  • महामारी आदि,
  • बड़े-बड़े उपद्रवों को,
  • शीघ्र दूर करो।

35.

देवी माँ – विश्व की पीड़ा हरने वाली

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्‍वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीड्‍ये लोकानां वरदा भव॥३५॥

  • विश्व की पीड़ा दूर करने वाली देवि!
  • हम तुम्हारे चरणों पर पड़े हैं,
  • हम पर प्रसन्न होओ।
  • त्रिलोक निवासियों की पूजनीया परमेश्वरि!
  • सब लोगों को वरदान दो।

देवी माँ ने, भविष्य में होने वाले, कुछ अवतारों के बारें में बताया

36 – 37.

देवी माँ ने, देवताओं से, संसार के लिए उपकारक वर, मांगने के लिए कहा

देव्युवाच॥३६॥
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम्॥३७॥

  • देवी बोलीं – देवताऒ!
  • मैं वर देने को तैयार हूं।
  • तुम्हारे मन में,
  • जिसकी इच्छा हो,
  • वह वर मांग लो।
  • संसार के लिए,
  • उस उपकारक वर को,
  • मैं अवश्य दूंगी।

38 – 39.

देवता, माँ भवानी से, जगतकी सभी बाधाएं दूर करने की विनती करते है

देवा ऊचुः॥३८॥
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥३९॥

  • देवता बोले- सर्वेश्वरि!
  • तुम इसी प्रकार,
  • तीनों लोकों की,
  • समस्त बाधाऒं को शांत करो और
  • हमारे शत्रुऒं का नाश करती रहो।

40 – 41.

अठाईसवें युग में शुम्भ – निशुम्भ राक्षस

देव्युवाच॥४०॥
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे।
शुम्भो निशुम्भश्‍चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ॥४१॥

  • देवी बोलीं – देवताऒ!
  • वैवस्वत मन्वंतर के अठाईसवें युग में,
  • शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो अन्य,
  • महादैत्य उत्पन्न होंगे।

42.

शुम्भ – निशुम्भ राक्षसों के वध के लिए देवी का अवतार

नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥४२॥

  • तब मैं नंदगोपके घर में,
  • उनकी पत्नी यशोदाके गर्भ से अवतीर्ण हो,
  • विंध्यांचल में जाकर रहूंगी और
  • उक्त दोनों असुरों का नाश करूंगी।

43.

वैप्रचिति असुर के संहार के लिए देवी का अवतार

पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्॥४३॥

  • फिर अत्यंत भयंकर रूप से,
  • पृथ्वी पर अवतार लेकर,
  • मैं वैप्रचिति नामक दानवों का वध करूंगी।

44.

भयंकर राक्षसों का संहार और उनका भक्षण

भक्षयन्त्याश्‍च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान्।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः॥४४॥

  • उन भयंकर महादैत्यों को,
  • भक्षण करते समय,
  • मेरे दांत अनारके फूल की भांति,
  • लाल हो जाएंगे।

45.

देवी का रक्तदंतिका नाम

ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्॥४५॥

  • तब स्वर्ग में देवता और
  • मर्त्यलोक में मनुष्य,
  • सदा मेरी स्तुति करते हुए,
  • मुझे “रक्तदंतिका” कहेंगे।

46.

पृथ्वी पर वर्षा और जल के अभाव के समय – अयोनिजारूप

भूयश्‍च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि।
मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥

  • फिर जब पृथ्वी पर,
  • सौ वर्षों के लिए वर्षा रुक जाएगी और
  • पानी का अभाव हो जाएगा,
  • उस समय मुनियों के स्तवन करने पर,
  • मैं पृथ्वी पर,
  • अयोनिजारूप में प्रकट होऊंगी।

47.

देवी का शताक्षी नाम

ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन्।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥

  • और सौ नेत्रों से मुनियों को देखूंगी।
  • अत: मनुष्य “शताक्षी” नाम से,
  • मेरा कीर्तन करेंगे।

48.

जल के अभाव के समय, देवी द्वारा, सबका भरण पोषण और प्राणों की रक्षा

ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥

  • देवताऒ!
  • उस समय मैं अपने शरीर से,
  • उपन्न हुए शाकों द्वारा,
  • समस्त संसार का,
  • भरण-पोषण करूंगी।
  • जब तक वर्षा नहीं होगी,
  • तब तक वे शाक ही,
  • सबके प्राणों की रक्षा करेंगे।

49.

देवी का शाकम्भरी नाम

शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥

  • ऐसा करने के कारण पृथ्वी पर,
  • “शाकम्भरी” के नाम से मेरी ख्याति होगी।
  • उसी अवतार में मैं,
  • दुर्गम नामक महादैत्य का,
  • वध भी करूंगी।

50 – 51.

दुर्गम नामक महादैत्य का वध करने के कारण, देवी का दुर्गा देवी नाम

दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।
पुनश्‍चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले॥५०॥
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्।
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥५१॥

  • इससे मेरा नाम,
  • “दुर्गा देवी” के रूप से प्रसिद्ध होगा।
  • फिर मैं जब भीम रूप धारण करके,
  • मुनियों की रक्षाके लिए,
  • हिमालय पर रहने वाले,
  • राक्षसों का भक्षण करूंगी,
  • उस समय सब मुनि,
  • भक्ति से नतमस्तक होकर,
  • मेरी स्तुति करेंगे।

52.

हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का संहार करने के कारण, देवी का भीमादेवी नाम

भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति॥५२॥

  • तब मेरा नाम,
  • “भीमादेवी” के रूप में विख्यात होगा।
  • जब अरुण नामक दैत्य,
  • तीनों लोकों में भारी उपद्रव मचाएगा,

53.

अरुण नामक दैत्य का वध

तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्‌पदम्।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्॥५३॥

  • तब मैं तीनों लोकों का हित करने के लिए,
  • छ: पैरोंवाले असंख्य भ्रमरोंका रूप धारण करके,
  • उस महादैत्य का वध करूंगी।

54.

देवी का भ्रामरी नाम

भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः।
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति॥५४॥

  • उस समय सब लोग,
  • “भ्रामरी” के नाम से मेरी स्तुति करेंगे।
  • इस प्रकार जब-जब संसार में,
  • दानवी बाधा उपस्थित होगी –

55.

दुष्टों के संहार, और संसार की रक्षा के लिए, देवी का बार बार अवतार

तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ॐ॥५५॥

  • तब-तब अवतार लेकर,
  • मैं दुष्टोंका संहार करूंगी।

देवी स्तुति नामक – दुर्गा सप्तशती का, ग्यारहवां अध्याय

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
देव्याः स्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः॥११॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतरकी कथा के अंतर्गत,
  • देवी माहाम्य में,
  • देवी स्तुति नामक,
  • ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 12

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Durga Saptashati – 12

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 11 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 12 – अर्थ सहित – सप्तशती पाठ के लाभ

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 12 में –

  • देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य

दुर्गा सप्तशती अध्याय 12 का ध्यान

॥ध्यानम्॥

ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्‍चक्रगदासिखेटविशिखांश्‍चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

ध्यान

  • मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवीका
  • ध्यान करता (करती) हूँ।
  • उनके श्रीअंगोकी प्रभा बिजलीके समान है।
  • हाथोंमें तलवार और ढाल लिये,
  • अनेक कन्याएँ उनकी सेवामें खड़ी हैं।
  • वे अपने हाथोंमें,
  • चक्र, गदा, तलवार,
  • ढाल, बाण, धनुष, पाश और
  • तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए हैं।
  • उनका स्वरूप अग्रिमय है तथा
  • वे माथेपर,
  • चन्द्रमाका मुकुट धारण करती हैं।

माँ दुर्गा, देवताओं को, सप्तशती पाठ के लाभ बताती है

1 – 2.

देवी स्तुति और देवी के ध्यान से, सब बाधाएं दूर होती है

ॐ देव्युवाच॥१॥
एभिः स्तवैश्‍च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्॥२॥

  • देवी बोलीं- देवताऒं!
  • जो एकाग्रचित होकर,
  • प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा ध्यान करेगा,
  • उसकी सारी बाधा,
  • मैं निश्चय ही दूर कर दूंगी।

3.

मधु-कैटभ, महिषासुर और शुम्भ-निशुम्भ के संहार के प्रसंग

मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥

  • जो मनुष्य,
  • मधु-कैटभका नाश,
    • दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 में
    • मधु-कैटभका नाश,
  • महिषासुरका वध,
    • दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 में
    • महिषासुर का वध
  • शुम्भ-निशुम्भके संहार के प्रसंग का,
    • दुर्गा सप्तशती अध्याय 9 और 10 में
    • शुम्भ और निशुंभ का वध
  • पाठ करेंगे,

4.

देवी माहात्म्य और सप्तशती का श्रवण

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः।
श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम्॥४॥

  • तथा
  • अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को,
  • जो एकाग्रचित भक्तिपूर्वक,
  • मेरा माहात्म्य का श्रवण करेंगे –

5.

सप्तशती के श्रवण से, आपत्तियां और दरिद्रता नहीं आती है

न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम्॥५॥

  • उन्हें,
  • कोई पाप नहीं छू सकेगा।
  • उन पर,
  • पापजनित आपत्तियां भी नहीं आएंगी।
  • उनके घर में,
  • दरिद्रता नहीं होगी तथा
  • उनको,
  • कभी प्रेमीजनों के विछोह का
  • कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा।

6.

लुटेरों से, शत्रु से और शस्त्र से भय नहीं होता

शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः।
न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति॥६॥

  • इतना ही नहीं,
  • उन्हें शत्रु से, लुटेरों से,
  • राजा से, शस्त्र से, अग्नि से तथा
  • जलराशि से भी कभी भय नहीं होगा।

7.

भक्तिपूर्वक और एकग्रचित्त से, देवी माहात्म्य सुनना और पढ़ना चाहिए

तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत्॥७॥

  • इसलिए,
  • सबको एकाग्रचित होकर,
  • भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य को,
  • सदा पढना और सुनना चाहिए।
  • यह परम कल्याणकारक है।

8.

कल्याणकारक देवी माहात्म्य, सभी मुश्किलों और आपत्तियों को दूर करता है

उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम॥८॥

  • मेरा महात्म्य,
  • महामारीजनित समस्त उपद्रवों एवं
  • तीनों प्रकार के उत्पातोंको,
  • शांत करने वाला है।

9.

सप्तशती का पाठ, जिस जगह होता है, वहां देवी की कृपा, सदा बनी रहती है

यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्‌नित्यमायतने मम।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम्॥९॥

  • मेरे जिस मंदिर में,
  • प्रतिदिन विधिपूर्वक,
  • मेरे इस माहात्म्य का पाठ किया जाता है,
  • उस स्थान को,
  • मैं कभी नहीं छोड़ती।
  • वहां सदा ही मेरा सन्निधान बना रहता है,
  • अर्थात निवास रहता है।

10.

पूजा और उत्सव के समय, देवी माहात्म्य का पाठ

बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च॥१०॥

  • पूजा, होम तथा
  • महोत्सव के अवसरों पर,
  • मेरे इस चरित्र का,
  • पूरा-पूरा पाठ और
  • हवन करना चाहिए।

11.

माँ दुर्गा की प्रसन्नता के लिए, देवी माहत्म्य और सप्तशती का पाठ

जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम्॥११॥

  • ऐसा करने पर,
  • मनुष्य विधि को जानकर या
  • बिना जाने भी,
  • मेरे लिए जो पूजा या
  • होम आदि करेगा,
  • उसे मैं,
  • बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण करूंगी।

12.

भक्तिपूर्वक सुनने से, सब बाधाऒं से मुक्ति

शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥१२॥

  • शरद काल में,
  • जो वार्षिक महापूजा की जाती है,
  • उस अवसर पर,
  • जो मेरे इस माहात्म्य को,
  • भक्तिपूर्वक सुनेगा,

13.

भक्तिपूर्वक सुनने से, धन धान्य में वृद्धि होती है

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥१३॥

  • वह मनुष्य,
  • मेरे प्रसाद से सब बाधाऒं से मुक्त तथा
  • धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा।
  • इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

14.

देवी के पराक्रम की कथाएं सुनने से, मनुष्य निर्भय होता है

श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान्॥१४॥

  • मेरे इस माहात्म्य,
  • मेरे प्रादुर्भाव की सुंदर कथाएं तथा
  • युद्ध में किए हुए मेरे पराक्रम सुनने से,
  • मनुष्य निर्भय हो जाता है।

15.

रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम्॥१५॥

  • मेरे माहात्म्य का श्रवण करने वाले पुरुषों के,
  • शत्रु नष्ट हो जाते हैं,
  • उहें कल्याण की प्राप्ति होती तथा,
  • उनका कुल आनंदित रहता है।

16.

देवी माहात्म्य का पाठ, जीवन में शांति लाता है

शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम॥१६॥

  • सर्वत्र शांति-कर्म में,
  • बुरे स्वप्न दिखायी देने पर तथा
  • ग्रहजनित भयंकर पीड़ा उपस्थित होने पर,
  • मेरा माहात्म्य श्रवण करना चाहिए।

17.

सब विघ्न दूर हो जाते है

उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्‍च दारुणाः।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते॥१७॥

  • इससे सब विघ्न तथा
  • भयंकर ग्रह-पीड़ाएं शांत हो जाती हैं और
  • मनुष्यों द्वारा देखा हुआ दु:स्वप्र,
    • शुभ स्वप्न में परिवर्तित हो जाता है।

18.

देवी माहात्म्य का पाठ शांतिकारक है

बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्।
संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम्॥१८॥

  • बालग्रहों से आक्रांत हुए बालकों के लिए,
  • यह माहात्म्य शांतिकारक है।
  • मनुष्योंके संगठन में फूट होने पर,
  • यह मित्रता कराने वाला होता है।

19.

सप्तशती का पाठ – दुराचारियों, दुष्टों और राक्षसों से रक्षा करता है

दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम्॥१९॥

  • यह माहात्म्य,
  • समस्त दुराचारियों के बल का,
  • नाश कराने वाला है।
  • इसके पाठमात्र से,
  • राक्षसों, भूतों और पिशाचों का,
  • नाश हो जाता है।

20.

एक बार सप्तशती श्रवण, कई आराधनाओं से बढ़कर है

सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्।
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्‍च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः॥२०॥

  • मेरा यह सब माहात्म्य,
  • मेरे सामीप्य की प्राप्ति कराने वाला है।
  • पशु, पुष्प, अर्घ्य,
  • धूप, दीप, गंध आदि से पूजन करने से,

21.

विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्।
अन्यैश्‍च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या॥२१॥

  • ब्राह्मण भोज से, होम से,
  • प्रतिदिन अभिषेक करने से,
  • नाना प्रकार के भोगों के अर्पण से तथा
  • दान आदि से,
  • एक वर्ष तक मेरी आराधना से,
  • मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, –

22.

प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते।
श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति॥२२॥

  • उतनी प्रसन्नता,
  • मेरे इस उत्तम चरित्रका,
  • एक बार श्रवण करनेमात्रसे हो जाती है।
  • यह माहात्म्य श्रवण करने पर,
  • पापोंको हर लेता और
  • आरोग्य प्रदान करता है।

23.

देवी द्वारा, राक्षसों के संहार की कथाएं सुनने से, शत्रु का भय नहीं रहता

रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम।
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम्॥२३॥

  • मेरे प्रादुर्भाव का कीर्तन,
  • समस्त भूतों से रक्षा करता है तथा
  • मेरा युद्धविषयक चरित्र,
  • दुष्ट दैत्यों का संहार करने वाला है।

24.

तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते।
युष्माभिः स्तुतयो याश्‍च याश्‍च ब्रह्मर्षिभिःकृताः॥२४॥

  • इसके श्रवण करनेपर,
  • मनुष्यों को शत्रु का भय नहीं रहता।
  • देवताऒं!
  • तुमने और ब्रह्मर्षियों ने जो मेरी स्तुतियां की हैं।

25.

देवी चरित्र का स्मरण, स्थान स्थान पर, कैसे रक्षा करता है

सुनसान मार्ग में बुरे लोगों से रक्षा

ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्।
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः॥२५॥

  • तथा ब्रह्माजी ने जो स्तुतियां की हैं,
  • वे सभी कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं।
  • वन में, सुने मार्ग में (वीरान मार्ग में),
  • दावानल से घिर जाने पर,

26.

जंगल में, लूटेरों और जंगली जानवरों से रक्षा

दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः॥२६॥

  • निर्जन स्थान में, लुटेरों के दांव में पड़ जाने पर या
  • शत्रुऒं से पकड़े जाने पर, अथवा
  • जंगल में सिंह, बाघ या
  • जंगली हाथियों के पीछा करने पर,
  • मेरे चरित्र का स्मरण करने से,
  • कष्टों से रक्षा होती है

27.

महासागर में तूफ़ान और बुरे राजा से रक्षा

राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे॥२७॥

  • कुपित राजा के आदेशसे,
  • वध या बंधन के स्थान में ले जाए जाने पर,
  • महासागरमें नावपर बैठनेके बाद,
  • भारी तूफान से नाव के डगमग होने पर,

28.

पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे।
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा॥२८॥

  • और अत्यंत भयंकर युद्ध में,
  • शस्त्रों का प्रहार होनेपर,
  • वेदना से पीडि़त होने पर, अथवा
  • सभी भयानक बाधाओं के उपस्थित होने पर

29 – 30.

शत्रुओं से और हिंसक पशुओं से रक्षा

स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत संकटात्।
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा॥२९॥
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्‍चरितं मम॥३०॥

  • जो मेरे चरित्र का स्मरण करता है,
  • वह संकटमुक्त हो जाता है।
  • मेरे प्रभाव से,
  • सिंह आदि हिंसक जंतु,
  • नष्ट हो जाते हैं तथा
  • लुटेरे और शत्रु भी,
  • मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले पुरुष से,
  • दूर भागते हैं।

31 – 32.

भगवती देवी की कृपा से, देवता निर्भय हो गए

ऋषिरुवाच॥३१॥
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा॥३२॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • ऐसा कहकर,
  • प्रचंड पराक्रम वाली भगवती चंडिका

33.

पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत।
तेऽपि देवा निरातङ्‌काः स्वाधिकारान् यथा पुरा॥३३॥

  • सब देवताऒं के देखते-देखते,
  • अंतर्धान हो गईं।
  • फिर समस्त देवता भी,
  • शत्रुऒं के मारे जाने से निर्भय हो

34.

यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः।
दैत्याश्‍च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि॥३४॥

  • पहले की ही भांति,
  • यज्ञभागका उपभोग करते हुए,
  • अपने-अपने अधिकार का पालन करने लगे।
  • संसार का विध्वंस करने वाले,
  • महाभयंकर पराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा

35.

जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे।
निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः॥३५॥

  • महाबली निशुम्भ के युद्ध में,
  • देवी द्वारा मारे जाने पर,
  • शेष दैत्य पाताल लोक में चले आए।

36.

माँ भगवती कैसे जगत का संचालन करती है

एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः।
सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम्॥३६॥

  • राजन्! इस प्रकार भगवती अम्बिका देवी,
  • नित्य होती हुई भी,
  • पुन:-पुन: प्रकट होकर,
  • जगत की रक्षा करती हैं।

37.

तयैतन्मोह्यते विश्‍वं सैव विश्‍वं प्रसूयते।
सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति॥३७॥

  • वे ही इस विश्व को मोहित करतीं,
  • वे ही जगत को जन्म देतीं तथा
  • वे ही प्रार्थना करने पर संतुष्ट हो,
  • समृद्धि प्रदान करती हैं।

38.

व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्‍वर।
महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया॥३८॥

  • राजन! महाप्रलय के समय,
  • महामारी का स्वरूप धारण करने वाली,
  • वे महाकाली ही,
  • इस समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।

39.

सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी॥३९॥

  • वे ही समय-समय पर
  • महामारी का रूप बनाती हैं और
  • वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी,
  • सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं।
  • वे सनातनी देवी ही,
  • समयानुसार सम्पूर्ण भूतों की रक्षा करती हैं।

40.

भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे।
सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते॥४०॥

  • मनुष्यों के अभ्युदयके समय,
  • वे ही घर में लक्ष्मी के रूप में स्थित हो,
  • उन्नति प्रदान करती हैं और
  • वे ही अभाव के समय,
  • दरिद्रता बनकर विनाश का कारण होती हैं।

41.

स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्‍च मतिं धर्मे गतिं शुभाम्॥ॐ॥४१॥

  • पुष्प, धूप और गंध आदि से पूजन करके,
  • उनकी स्तुति करने पर,
  • वे धन, पुत्र, धार्मिक बुद्धि तथा
  • उत्तम गति प्रदान करती हैं।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेयपुराण में
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत
  • देवीमाहाम्य में
  • फलस्तुति नामक
  • बारहवां अध्याय पूरा हुआ।

1.

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 13

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Durga Saptashati – 13

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 12 – अर्थ सहित – सप्तशती पाठ के लाभ
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 13 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 13 में –
सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान


॥ध्यानम्॥

ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्।
पाशाङ्‌कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥

ध्यान
जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, वर एवं अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवादेवीका मैं ध्यान करता (करती) हूँ।


ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।
एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत्॥२॥

मेधा ऋषि कहते हैं- राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया जो इस जगत को धारण करती हैं उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है।


विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया।
तया त्वमेष वैश्‍यश्‍च तथैवान्ये विवेकिनः॥३॥
मोह्यन्ते मोहिताश्‍चैव मोहमेष्यन्ति चापरे।
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्‍वरीम्॥४॥

वे ही विद्या, उत्पन्न करती है। भगवान विष्णु की मायास्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाऒ।


आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥५॥

आराधना करने पर वे ही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं।


मार्कण्डेय उवाच॥६॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः॥७॥
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्।
निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च॥८॥

मार्कंडेयजी कहते हैं – मेधा मुनि के ये वचन सुनकर राजा सुरथ ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग महर्षि को प्रणाम किया। वे अत्यंत ममता और राज्य के छिन जाने से बहुत खिन्न हो चुके थे।


जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने।
संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः॥९॥

महामुने! इसलिए विरक्त होकर राजा तथा वैश्य तत्काल तपस्या को चले गए और वे जगदम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर रहकर तपस्या करने लगे।


स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्।
तौ तस्मिन पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्॥१०॥

वे वैश्य उत्तम देवीसूक्त का जप करते हुए तपस्या में प्रवृत हुए। वे दोनों नदी के तटपर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और हवन आदि के द्वारा उनकी आराधना करने लगे।


अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।
निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ॥११॥

उन्होंने पहले तो आहार को धीरे-धीरे कम किया। फिर बिलकुल निराहार रहकर देवी में ही मन लगाए एकाग्रता पूर्वक उनका चिंतन आरम्भ किया।


ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्।
एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः॥१२॥

वे दोनों लगातार तीन वर्ष तक संयमपूर्वक आराधना करते रहे।


परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका॥१३॥

इसपर प्रसन्न होकर जगतको धारण करनेवाली चंडिका देवी ने दर्शन देकर कहा –


देव्युवाच॥१४॥
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत्॥१५॥

देवी बोली – “राजन्! तथा अपने कुल को आनंदित करने वाले वैश्य! तुम लोग जिस वस्तु की अभिलाषा रखते हो, वह मुझसे मांगो। मैं संतुष्ट हूं, अत: तुम्हें वह सब कुछ दूंगी।


मार्कण्डेय उवाच॥१६॥
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्‍यन्यजन्मनि।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥१७॥

मार्कंडेयजी कहते हैं – तब राजा ने दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य मांगा तथा इस जन्म में भी शत्रुऒं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके पुन: अपना राज्य प्राप्त कर लेने का वरदान मांगा।


सोऽपि वैश्‍यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्‌गविच्युतिकारकम्॥१८॥

वैश्य का चित्त संसार की ऒर से खिन्न एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान थे अत: उस समय उन्होंने तो ममता और अहंता रूप आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान मांगा।


देव्युवाच॥१९॥
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान्॥२०॥

देवी बोलीं – राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुऒं को मारकर अपना राज्य प्राप्त कर लोगे।


हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति॥२१॥

अब वहां तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।


मृतश्‍च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः॥२२॥
सावर्णिको नाम* मनुर्भवान् भुवि भविष्यति॥२३॥

फिर मृत्यु के पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान (सूर्य) के अंश से जन्म लेकर इस पृथ्वी पर सावर्णिक मनु के नाम से विख्यात होऒगे।


वैश्‍यवर्य त्वया यश्‍च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः॥२४॥

वैश्यवर्य! तुमने भी जिस वर को मुझसे प्राप्त करने की इच्छा की है, उसे देती हूं। तुम्हें मोक्ष के लिए ज्ञान प्राप्त होगा।


मार्कण्डेय उवाच॥२६॥
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम्॥२७॥
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता।
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः॥२८॥

मार्कंडेयजी कहते हैं – इस प्रकार उन दोनों को मनोवांछित वरदान देकर तथा
उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अंतर्धान हो गईं।


सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥२९॥
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥क्लीं ॐ॥

इस तरह देवी से वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्य से जन्म ले सावर्णिक नामक मनु होंगे।


इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवी माहाम्य में सुरथ और वैश्य को वरदान नामक तेरहवां अध्याय पूरा हुआ।

Saptashati

Durga

दुर्गा सप्तशती अध्याय 13 – अर्थ सहित
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सप्तश्लोकी दुर्गा

Saptashloki Durga Stotra – Hindi Meaning

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

शिवजी, देवी माँ से, कलियुगमें भक्तोंके कामनाओंकी सिद्धि के लिए, उपाय पूछते है

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव उवाच –
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ हि कार्यसिद्ध‍यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥

  • शिवजी बोले – हे देवि!
  • तुम भक्तोंके लिये सुलभ हो और
  • समस्त कर्मोंका विधान करनेवाली हो।
  • कलियुगमें कामनाओंकी सिद्धि-हेतु,
  • यदि कोई उपाय हो,
  • तो उसे अपनी वाणीद्वारा,
  • सम्यक्-रूपसे व्यक्त करो।

माँ दुर्गा, शिवजी को, अम्बास्तुति के बारे में बताती है

देव्युवाच –
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

  • देवीने कहा –
  • हे देव! आपका मेरे ऊपर बहुत स्नेह है।
  • कलियुगमें,
  • समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला,
  • जो साधन है,
  • वह बतलाऊँगी, सुनो!
  • उसका नाम है – अम्बास्तुति

सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ का विनियोग

ॐ अस्य श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मन्त्रस्य नारायण ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः,
श्रीदुर्गा प्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः।

  • ॐ इस दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्रमन्त्रके,
  • नारायण ऋषि हैं,
  • अनुष्टुप् छन्द है,
  • श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और
  • महासरस्वती देवता हैं,
  • श्रीदुर्गाकी प्रसन्नताके लिये,
  • सप्तश्लोकी दुर्गापाठमें इसका विनियोग किया जाता है।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥१॥

  • वे भगवती महामाया देवी,
  • ज्ञानियोंके भी चित्तको,
  • बलपूर्वक खींचकर,
  • मोहमें डाल देती हैं॥१॥

माँ दुर्गा – दुःख और भय हरनेवाली

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र‍य दुःखभय हारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥२॥

  • माँ दुर्गे!
  • आप स्मरण करनेपर,
  • सब प्राणियोंका भय हर लेती हैं और
  • स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन करनेपर,
  • उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं।
  • दुःख, दरिद्रता और
  • भय हरनेवाली देवि!
  • आपके सिवा दूसरी कौन है,
  • जिसका चित्त,
  • सबका उपकार करनेके लिये,
  • सदा ही दयार्द्र रहता हो॥२॥

माँ भगवती – कल्याणदायिनी, मंगलमयी

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥३॥

  • नारायणी!
  • तुम सब प्रकारका,
  • मंगल प्रदान करनेवाली, मंगलमयी हो।
  • कल्याणदायिनी शिवा हो।
  • सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाली,
  • शरणागत वत्सला,
  • तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो।
  • तुम्हें नमस्कार है॥३॥

शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

  • शरणमें आये हुए दीनों एवं
  • पीड़ितोंकी रक्षामें संलग्न रहनेवाली तथा
  • सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवि!
  • तुम्हें नमस्कार है॥४॥

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥५॥

  • सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा
  • सब प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न
  • दिव्यरूपा दुर्गे देवि!
  • सब भयोंसे हमारी रक्षा करो;
  • तुम्हें नमस्कार है॥५॥

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥६॥

  • देवि! तुम प्रसन्न होनेपर,
  • सब रोगोंको नष्ट कर देती हो और
  • कुपित होनेपर,
  • मनोवांछित सभी कामनाओंका,
  • नाश कर देती हो।
  • जो लोग तुम्हारी शरणमें जा चुके हैं,
  • उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं।
  • तुम्हारी शरणमें गये हुए मनुष्य,
  • दूसरोंको शरण देनेवाले हो जाते हैं॥६॥

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥७॥

  • सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार,
  • तीनों लोकोंकी समस्त बाधाओंको शान्त करो और
  • हमारे शत्रुओंका नाश करती रहो॥७॥

॥इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा॥

॥श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण॥

Saptashati

Durga

सप्तश्लोकी दुर्गा
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दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – अर्थसहित – माँ दुर्गा के 108 नाम

॥ईश्वर उवाच॥
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने॥
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

  • शंकरजी, पार्वतीजी से कहते हैं –
  • कमलानने,
  • अब मैं अष्टोत्तरशत (108) नाम का,
  • वर्णन करता हूँ, सुनो;
  • जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्र से,
  • भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

  • सती – अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली,
    • दक्ष की बेटी –
    • माँ दुर्गा का पहला स्वरूप –
    • माँ शैलपुत्री
  • साध्वी – आशावादी
  • भवप्रीता – भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली
  • भवानी – ब्रह्मांड की निवास
  • भवमोचनी – संसार बंधनों से मुक्त करने वाली
  • आर्या – देवी
  • दुर्गा – अपराजेय
  • जया – विजयी
  • आद्य – शुरूआत की वास्तविकता
  • त्रिनेत्र – तीन आँखों वाली
  • शूलधारिणी – शूल धारण करने वाली

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

  • पिनाकधारिणी – शिव का त्रिशूल धारण करने वाली
  • चित्रा – सुरम्य, सुंदर
  • चण्डघण्टा – चंद्रघंटा
    • प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली
    • माँ दुर्गा का तीसरा स्वरूप
  • महातपा – भारी तपस्या करने वाली
  • मन – मनन- शक्ति
  • बुद्धि – बोधशक्ति, सर्वज्ञाता
  • अहंकारा – अहंताका आश्रय, अभिमान करने वाली
  • चित्तरूपा – वह जो सोच की अवस्था में है
  • चिता – मृत्युशय्या
  • चिति – चेतना

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

  • सर्वमन्त्रमयी – सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली
  • सत्ता – सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है
  • सत्यानन्दस्वरूपिणी – अनन्त आनंद का रूप
  • अनन्ता – जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं
  • भाविनी – सबको उत्पन्न करने वाली
  • भाव्या – भावना एवं ध्यान करने योग्य
  • भव्या – भव्यता के साथ, कल्याणस्वरूपा
  • अभव्या – जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं
  • सदागति – हमेशा गति में, मोक्ष दान

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥५॥

  • शाम्भवी – शिवप्रिया, शंभू की पत्नी
  • देवमाता – देवगण की माता
  • चिन्ता – चिन्ता
  • रत्नप्रिया – गहने से प्यार
  • सर्वविद्या – ज्ञान का निवास
  • दक्षकन्या – दक्ष की बेटी
  • दक्षयज्ञविनाशिनी – दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥६॥

  • अपर्णा – तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली
  • अनेकवर्णा – अनेक रंगों वाली
  • पाटला – लाल रंग वाली
  • पाटलावती – गुलाब के फूल या लाल परिधान या
    • फूल धारण करने वाली
  • पट्टाम्बरपरीधाना – रेशमी वस्त्र पहनने वाली
  • कलमंजीररंजिनी (कलमञ्जररञ्जिनी) – पायल (मधुर ध्वनि करने वाले मञ्जीर/पायल) को धारण करके प्रसन्न रहने वाली

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

  • अमेय – जिसकी कोई सीमा नहीं
  • विक्रमा – असीम पराक्रमी
  • क्रूरा – दैत्यों के प्रति कठोर
  • सुन्दरी – सुंदर रूप वाली
  • सुरसुन्दरी – अत्यंत सुंदर
  • वनदुर्गा – जंगलों की देवी
  • मातंगी – मतंगा की देवी
  • मातंगमुनि-पूजिता – बाबा मातंग द्वारा पूजनीय

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥८॥

  • ब्राह्मी – भगवान ब्रह्मा की शक्ति
  • माहेश्वरी – प्रभु शिव की शक्ति
  • इंद्री – इन्द्र की शक्ति
  • कौमारी – किशोरी
  • वैष्णवी – अजेय
  • चामुण्डा – चंड और मुंड का नाश करने वाली
  • वाराही – वराह पर सवार होने वाली
  • लक्ष्मी – सौभाग्य की देवी
  • पुरुषाकृति – वह जो पुरुष धारण कर ले

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥९॥

  • विमिलौत्त्कार्शिनी (विमला उत्कर्षिणी) – आनन्द प्रदान करने वाली
  • ज्ञाना – ज्ञान से भरी हुई
  • क्रिया – हर कार्य में होने वाली
  • नित्या – अनन्त
  • बुद्धिदा – ज्ञान देने वाली
  • बहुला – विभिन्न रूपों वाली
  • बहुलप्रेमा – सर्व प्रिय
  • सर्ववाहन-वाहना – सभी वाहन पर विराजमान होने वाली

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥१०॥

  • निशुम्भशुम्भ-हननी – शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली
  • महिषासुर-मर्दिनि – महिषासुर का वध करने वाली
  • मधुकैटभहंत्री – मधु व कैटभ का नाश करने वाली
  • चण्डमुण्ड-विनाशिनि – चंड और मुंड का नाश करने वाली

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

  • सर्वासुरविनाशा – सभी राक्षसों का नाश करने वाली
  • सर्वदानवघातिनी – संहार के लिए शक्ति रखने वाली
  • सर्वशास्त्रमयी – सभी सिद्धांतों में निपुण
  • सत्या – सच्चाई
  • सर्वास्त्रधारिणी – सभी हथियारों धारण करने वाली

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२॥

  • अनेकशस्त्रहस्ता – हाथों में कई हथियार धारण करने वाली
  • अनेकास्त्रधारिणी – अनेक हथियारों को धारण करने वाली
  • कुमारी – सुंदर किशोरी
  • एककन्या – कन्या
  • कैशोरी – जवान लड़की
  • युवती – नारी
  • यति – तपस्वी

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥१३॥

  • अप्रौढा – जो कभी पुराना ना हो
  • प्रौढा – जो पुराना है
  • वृद्धमाता – शिथिल
  • बलप्रदा – शक्ति देने वाली
  • महोदरी – ब्रह्मांड को संभालने वाली
  • मुक्तकेशी – खुले बाल वाली
  • घोररूपा – एक भयंकर दृष्टिकोण वाली
  • महाबला – अपार शक्ति वाली

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

  • अग्निज्वाला – मार्मिक आग की तरह
  • रौद्रमुखी – विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा
  • कालरात्रि – काले रंग वाली (माँ दुर्गा का सातवां रूप)
  • तपस्विनी – तपस्या में लगे हुए (माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप – माँ ब्रह्मचारिणी)
  • नारायणी – भगवान नारायण की विनाशकारी रूप
  • भद्रकाली – काली का भयंकर रूप
  • विष्णुमाया – भगवान विष्णु का जादू
  • जलोदरी – ब्रह्मांड में निवास करने वाली

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥

  • शिवदूती – भगवान शिव की राजदूत
  • करली – हिंसक
  • अनन्ता – विनाश रहित
  • परमेश्वरी – प्रथम देवी
  • कात्यायनी – ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय
    • माँ दुर्गा का छठवां रूप – कात्यायनी देवी
  • सावित्री – सूर्य की बेटी
  • प्रत्यक्षा – वास्तविक
  • ब्रह्मवादिनी – वर्तमान में हर जगह वास करने वाली

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥१६॥

  • देवी पार्वती!
  • जो प्रतिदिन,
  • दुर्गाजी के इस अष्टोत्तरशतनाम का,
  • पाठ करता है,
  • उसके लिये तीनों लोकों में,
  • कुछ भी असाध्य नहीं है।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥१७॥

  • वह धन, धान्य,
  • पुत्र, स्त्री,
  • घोड़ा, हाथी,
  • धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा
  • अन्तमें सनातन मुक्ति भी,
  • प्राप्त कर लेता है।

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्॥
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥

  • कुमारीका पूजन और देवी सुरेश्वरीका ध्यान करके,
  • पराभक्तिके साथ उनका पूजन करे,
  • फिर अष्टोत्तरशत-नामका पाठ आरम्भ करे।

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्॥१९॥

  • देवि! जो ऐसा करता है,
  • उसे, सब श्रेष्ठ देवताओंसे भी,
  • सिद्धि प्राप्त होती है॥
  • राजा उसके दास हो जाते हैं।
  • वह राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है।

गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः॥२०॥

  • गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिन्दूर,
  • कपूर, घी (अथवा दूध), चीनी और मधु –
  • इन वस्तुओंको एकत्र करके,
  • इनसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर,
  • जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्रको धारण करता है,
  • वह शिवके तुल्य (मोक्षरूप) हो जाता है।

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥

  • भौमवती अमावास्याकी आधी रातमें,
  • जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्रपर हों,
  • उस समय इस स्तोत्रको लिखकर,
  • जो इसका पाठ करता है,
  • वह सम्पत्तिशाली होता है।

इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं समाप्तम्।

Saptashati

Durga

दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – अर्थसहित – माँ दुर्गा के 108 नाम
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Devi Mahatmya

दुर्गा कवच – देवी कवच – अर्थसहित

Devi Kavach – Durga Kavach – Meaning in Hindi

देवी कवच अध्याय के मुख्य प्रसंग

  1. देवी कवच विनियोग
  2. दुर्गा कवच का पाठ क्यों करना चाहिए
  3. देवियोंके के विभिन्न वाहन और देवीके स्वरुप

  4. देवी कवच आरम्भ करने से पहले प्रार्थना
  5. देवी कवच आरम्भ
  6. देवी कवच पाठ के लाभ

देवी कवच विनियोग

अथ देवी कवच
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता,
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्,
दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

  • ॐ इस श्रीचण्डीकवचके,
  • ब्रह्मा ऋषि,
  • अनुष्टुप् छन्द,
  • चामुण्डा देवता,
  • अङ्गन्यासमें कही गई माताएं बीज,
  • दिग्बन्ध देवता तत्व है,
  • श्रीजगदम्बाजी की कृपा के लिए
  • सप्तशती के पाठ के जपमें,
  • इसका विनियोग किया जाता है।

ॐ चण्डिका देवीको नमस्कार है।


देवी कवच का पाठ क्यों करना चाहिए

1.

मनुष्योंकी सब प्रकारसे, रक्षा करनेवाला, दुर्गा कवच

मार्कण्डेय उवाच –
ॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥

  • मार्कण्डेयजीने कहा – पितामह!
  • जो इस संसारमें परम गोपनीय तथा
  • मनुष्योंकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और
  • जो अबतक आपने,
  • दूसरे किसीके सामने प्रकट नहीं किया हो,
  • ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥१॥

2.

सभी प्राणियोंका का उपकार करनेवाला, और पवित्र, देवी कवच

ब्रह्मोवाच –
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥

  • ब्रह्माजी बोले – ब्रह्मन्!
  • ऐसा साधन तो,
  • एक देवीका कवच ही है,
  • जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय,
  • पवित्र तथा
  • सम्पूर्ण प्राणियोंका उपकार करनेवाला है।
  • महामुने! उसे श्रवण करो॥२॥

3.

1. शैलपुत्री, 2. ब्रह्मचारिणी, 3. चन्द्रघण्टा, 4. कूष्माण्डा

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥

  • देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं,
  • जिन्हें – नवदुर्गा – कहते हैं।
  • उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैं।
  • प्रथम नाम
    • शैलपुत्री है।
  • दूसरी मूर्तिका नाम
    • ब्रह्मचारिणी है।
  • तीसरा स्वरूप
    • चन्द्रघण्टा के नामसे प्रसिद्ध है।
  • चौथी मूर्तिको
    • कूष्माण्डा कहते हैं।

4.

5. स्कन्दमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥

  • पाँचवीं दुर्गाका नाम
    • स्कन्दमाता है।
  • देवीके छठे रूपको
    • कात्यायनी कहते हैं।
  • सातवाँ
    • कालरात्रि और
  • आठवाँ स्वरूप
    • महागौरी के नामसे
  • प्रसिद्ध है।

5.

9. सिद्धिदात्री

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥

  • नवीं दुर्गाका नाम
    • सिद्धिदात्री है।
  • ये सब नाम,
  • सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान्‌के द्वारा ही,
  • प्रतिपादित हुए हैं॥५॥

6 – 7.

देवीकी कृपा से, सारे दुःख और संकट, दूर हो जाते है, और, भय नहीं लगता

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥

  • जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो,
  • रणभूमिमें शत्रुओंसे घिर गया हो,
  • विषम संकटमें फँस गया हो तथा
  • इस प्रकार भयसे आतुर होकर
  • जो भगवती दुर्गाकी शरणमें प्राप्त हुए हों,
  • उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता॥६॥
  • युद्धके समय संकटमें पड़नेपर भी,
  • उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं आती और
  • उन्हें शोक, दुःख और
  • भयकी प्राप्ति नहीं होती॥७॥

8.

देवी का चिंतन करनेवालों की, देवी सदैव रक्षा करती है

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥

  • जिन्होंने,
  • भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है,
  • उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है।
  • देवेश्वरि!
  • जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं,
  • उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती हो॥८॥

देवियोंके के विभिन्न वाहन और देवीके स्वरुप

9.

चामुण्डादेवी, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवीदेवी

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥

  • चामुण्डादेवी,
    • प्रेतपर आरूढ़ होती हैं।
  • वाराही,
    • भैंसेपर सवारी करती हैं।
  • ऐन्द्री का वाहन,
    • ऐरावत हाथी है।
  • वैष्णवीदेवी,
    • गरुडपर ही आसन जमाती हैं॥९॥

10.

माहेश्वरी, कौमारीका, लक्ष्मीदेवी

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥

  • माहेश्वरी,
    • वृषभपर आरूढ़ होती हैं।
  • कौमारी का वाहन,
    • मयूर है।
  • भगवान् विष्णुकी प्रियतमा लक्ष्मीदेवी,
    • कमलके आसनपर विराजमान हैं और
    • हाथोंमें कमल धारण किये हुए हैं॥१०॥

11.

ईश्वरीदेवी, ब्राह्मीदेवी

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११॥

  • वृषभपर आरूढ़ ईश्वरीदेवीने,
    • श्वेत रूप धारण कर रखा है।
  • ब्राह्मीदेवी,
    • हंसपर बैठी हुई हैं और
    • सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं॥११॥

12.

योगशक्तियोंसे सम्पन्न सभी देवी के रूप

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२॥

  • इस प्रकार ये सभी माताएँ,
  • सब प्रकारकी योगशक्तियोंसे सम्पन्न हैं।
  • इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं,
  • जो अनेक प्रकारके आभूषणोंकी शोभासे युक्त तथा
  • नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं॥१२॥

13.

देवियोंके शस्त्र-धारण करने का उद्देश्य

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥

  • (देवियोंके शस्त्र-धारणका उद्देश्य श्लोक 13 – 15 में)
  • ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोधमें भरी हुई हैं और
  • भक्तोंकी रक्षाके लिये,
  • रथपर बैठी दिखायी देती हैं।
  • ये शंख, चक्र,
  • गदा, शक्ति,
  • हल और मुसल, और …

14.

भक्तों की रक्षा के लिए, देवी माँ के हाथों में, विभिन्न अस्त्र-शस्त्र

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥

  • खेटक और तोमर,
  • परशु तथा पाश,
  • कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम
  • शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र,
  • अपने हाथोंमें धारण करती हैं।

15.

देवी के अस्त्र शस्त्रों से, राक्षसों का संहार और, भक्तों की रक्षा

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥

  • दैत्योंके शरीरका नाश करना,
  • भक्तोंको अभयदान देना और
  • देवताओंका कल्याण करना –
  • यही उनके शस्त्र-धारणका,
  • उद्देश्य है॥१३-१५॥

16.

देवी कवच आरम्भ करने से पहले प्रार्थना

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥१६॥

  • कवच आरम्भ करनेके पहले,
  • इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये –
  • महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम,
  • महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि!
  • तुम महान् भयका नाश करनेवाली हो,
  • तुम्हें नमस्कार है॥१६॥

देवी कवच आरम्भ

17.

माँ जगदम्बा, ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति), अग्निशक्ति

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥

  • तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है।
  • शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके!
    • मेरी रक्षा करो।
  • पूर्व दिशामें,
    • ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति),
    • मेरी रक्षा करे।
  • अग्निकोणमें,
    • अग्निशक्ति, और… ॥१७॥

18.

वाराही, खड्गधारिणी, वारुणी और मृगवाहिनी

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्‌गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥

  • दक्षिण दिशामें,
    • वाराही तथा
  • नैर्ऋत्यकोणमें,
    • खड्गधारिणी,
    • मेरी रक्षा करे।
  • पश्चिम दिशामें,
    • वारुणी और
  • वायव्यकोणमें,
    • मृगपर सवारी करनेवाली देवी,
    • मेरी रक्षा करे॥१८॥

19.

कौमारी, शूलधारिणीदेवी, ब्रह्माणि, वैष्णवीदेवी

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥

  • उत्तर दिशामें,
    • कौमारी और
  • ईशान-कोणमें,
    • शूलधारिणीदेवी,
    • रक्षा करे।
  • ब्रह्माणि,
    • तुम ऊपरकी ओरसे मेरी रक्षा करो और
  • वैष्णवीदेवी,
    • नीचेकी ओरसे,
    • मेरी रक्षा करे॥१९॥

20.

चामुण्डादेवी, जया, विजया

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥

  • इसी प्रकार शवको अपना वाहन बनानेवाली,
  • चामुण्डादेवी,
    • दसों दिशाओंमें,
    • मेरी रक्षा करे।
  • जया,
    • आगेसे और
  • विजया,
    • पीछेकी ओरसे,
    • मेरी रक्षा करे॥२०॥

21.

अजिता, अपराजिता, उद्योतिनी

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥

  • वामभागमें,
    • अजिता और
  • दक्षिणभागमें,
    • अपराजिता,
    • रक्षा करे।
  • वामभाग अर्थात
    • बाई ओर, बाएं तरफ
  • उद्योतिनी,
    • शिखाकी रक्षा करे।
  • उमा,
    • मेरे मस्तकपर विराजमान होकर,
    • रक्षा करे॥२१॥

22.

मालाधरी, यशस्विनी देवी, त्रिनेत्रा, यमघण्टा देवी

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥

  • ललाटमें,
    • मालाधरी रक्षा करे और
  • यशस्विनीदेवी,
    • मेरी भौंहोंका,
    • संरक्षण करे।
  • भौंहोंके मध्यभागमें,
    • त्रिनेत्रा और
  • नथुनोंकी,
    • यमघण्टादेवी,
    • रक्षा करे॥२२॥

23.

शंखिनी, द्वारवासिनी, कालिकादेवी, भगवती शांकरी

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥

  • दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें,
    • शंखिनी और
  • कानोंमें,
    • द्वारवासिनी रक्षा करे।
  • कालिकादेवी,
    • कपोलोंकी तथा
  • भगवती शांकरी,
    • कानोंके मूलभागकी,
    • रक्षा करे॥२३॥

24.

सुगन्धा, चर्चिका देवी, अमृतकला, सरस्वतीदेवी

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥

  • नासिकामें,
    • सुगन्धा और
  • ऊपरके ओठमें,
    • चर्चिकादेवी रक्षा करे।
  • नीचेके ओठमें,
    • अमृतकला तथा
  • जिह्वामें,
    • सरस्वतीदेवी,
    • रक्षा करे॥२४॥

25.

कौमारी, चण्डिका, चित्रघण्टा, महामाया

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥

  • कौमारी,
    • दाँतोंकी और
  • चण्डिका,
    • कण्ठप्रदेशकी रक्षा करे।
  • चित्रघण्टा,
    • गलेकी घाँटीकी और
  • महामाया,
    • तालुमें रहकर,
  • रक्षा करे॥२५॥

26.

कामाक्षी, सर्वमंगला, भद्रकाली, धनुर्धरी

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥

  • कामाक्षी,
    • ठोढ़ीकी और
  • सर्वमंगला,
    • मेरी वाणीकी रक्षा करे।
  • भद्रकाली,
    • ग्रीवामें (गलेमें) और
  • धनुर्धरी,
    • मेरुदण्ड (पृष्ठवंश) में रहकर,
  • रक्षा करे॥२६॥

27.

नीलग्रीवा, नलकूबरी, खड्गिनी, वज्रधारिणी

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥

  • कण्ठके बाहरी भागमें,
    • नीलग्रीवा और
  • कण्ठकी नलीमें,
    • नलकूबरी रक्षा करे।
  • दोनों कंधोंमें,
    • खड्गिनी और
  • मेरी दोनों भुजाओंकी,
    • वज्रधारिणी,
  • रक्षा करे॥२७॥

28.

दण्डिनी, अम्बिका, शूलेश्वरी, कुलेश्वरी

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्‌गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥२८॥

  • दोनों हाथोंमें,
    • दण्डिनी और
  • अंगुलियोंमें,
    • अम्बिका रक्षा करे।
  • शूलेश्वरी,
    • नखोंकी रक्षा करे।
  • कुलेश्वरी,
    • कुक्षि (पेट) में रहकर,
  • रक्षा करे॥२८॥

29.

महादेवी, शोकविनाशिनी देवी, ललितादेवी, शूलधारिणी

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥

  • महादेवी,
    • दोनों स्तनोंकी और
  • शोकविनाशिनीदेवी,
    • मनकी रक्षा करे।
  • ललितादेवी,
    • हृदयमें और
  • शूलधारिणी,
    • उदरमें रहकर,
  • रक्षा करे॥२९॥

30.

कामिनी, गुह्येश्वरी, पूतना और कामिका, महिषवाहिनी

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥

  • नाभिमें,
    • कामिनी और
  • गुह्यभागकी,
    • गुह्येश्वरी रक्षा करे।
  • पूतना और कामिका,
    • लिंगकी और
  • महिषवाहिनी,
    • गुदाकी रक्षा करे॥३०॥

31.

भगवती, विन्ध्यवासिनी, महाबलादेवी

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥

  • भगवती,
    • कटिभागमें और
  • विन्ध्यवासिनी,
    • घुटनोंकी रक्षा करे।
  • सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली महाबलादेवी
    • दोनों पिण्डलियोंकी,
  • रक्षा करे॥३१॥

32.

नारसिंही, तैजसीदेवी, श्रीदेवी, तलवासिनी

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्‌गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥३२॥

  • नारसिंही,
    • दोनों घुट्ठियोंकी और
  • तैजसीदेवी,
    • दोनों चरणोंके पृष्ठभागकी रक्षा करे।
  • श्रीदेवी,
    • पैरोंकी अंगुलियोंमें और
  • तलवासिनी,
    • पैरोंके तलुओंमें रहकर रक्षा करे॥३२॥

33.

दंष्ट्राकराली देवी, ऊर्ध्वकेशिनी देवी, कौबेरी, वागीश्वरी देवी

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥

  • अपनी दाढ़ोंके कारण,
  • भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकरालीदेवी,
    • नखोंकी और
  • ऊर्ध्वकेशिनीदेवी,
    • केशोंकी रक्षा करे।
  • रोमावलियोंके छिद्रोंमें,
    • कौबेरी और
  • त्वचाकी,
    • वागीश्वरीदेवी रक्षा करे॥३३॥

34.

पार्वतीदेवी, कालरात्रि, मुकुटेश्वरी

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥

  • पार्वतीदेवी,
    • रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और
    • मेदकी रक्षा करे।
  • आँतोंकी,
    • कालरात्रि और
  • पित्तकी,
    • मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥३४॥

35.

पद्मावतीदेवी, चूडामणिदेवी, ज्वालामुखी, अभेद्यादेवी

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ॥३५॥

  • मूलाधार आदि कमल-कोशोंमें,
    • पद्मावतीदेवी और
  • कफमें,
    • चूडामणिदेवी स्थित होकर रक्षा करे।
  • नखके तेजकी,
    • ज्वालामुखी रक्षा करे।
  • जिसका किसी भी अस्त्रसे,
  • भेदन नहीं हो सकता,
  • वह अभेद्यादेवी,
    • शरीरकी समस्त संधियोंमें रहकर रक्षा करे॥३५॥

36.

ब्रह्माणि!, छत्रेश्वरी, धर्मधारिणी देवी

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥

  • ब्रह्माणि,
    • आप मेरे वीर्यकी रक्षा करें।
  • छत्रेश्वरी,
    • छायाकी तथा
  • धर्मधारिणी-देवी,
    • मेरे अहंकार, मन और
    • बुद्धिकी रक्षा करे॥३६॥

37.

वज्रहस्तादेवी, भगवती कल्याणशोभना

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥

  • हाथमें वज्र धारण करनेवाली,
  • वज्रहस्तादेवी,
    • मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायुकी रक्षा करे।
  • कल्याणसे शोभित होनेवाली,
  • भगवती कल्याणशोभना,
    • मेरे प्राणकी रक्षा करे॥३७॥

38.

योगिनीदेवी, नारायणीदेवी

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥

  • रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श – इन विषयोंका अनुभव करते समय,
    • योगिनीदेवी रक्षा करे तथा
  • सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी रक्षा सदा,
    • नारायणीदेवी करे॥३८॥

39.

वाराही, वैष्णवी, लक्ष्मी

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥

  • वाराही,
    • आयुकी रक्षा करे।
  • वैष्णवी,
    • धर्मकी रक्षा करे तथा
  • चक्रिणी (चक्र धारण करनेवाली) देवी,
    • यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा
    • विद्याकी रक्षा करे॥३९॥

40.

इन्द्राणि, चंडिका, महालक्ष्मी, भैरवी

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥

  • इन्द्राणि,
    • आप मेरे गोत्रकी रक्षा करें।
  • चण्डिके!,
    • तुम मेरे पशुओंकी रक्षा करो।
  • महालक्ष्मी,
    • पुत्रोंकी रक्षा करे और
  • भैरवी,
    • पत्नीकी रक्षा करे॥४०॥

41.

सुपथा, क्षेमकरी, महालक्ष्मी, विजयादेवी

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥

  • मेरे पथकी,
    • सुपथा तथा
  • मार्गकी,
    • क्षेमकरी रक्षा करे।
  • राजाके दरबारमें,
    • महालक्ष्मी रक्षा करे तथा
  • सब ओर व्याप्त रहनेवाली,
  • विजयादेवी,
    • सम्पूर्ण भयोंसे,
  • मेरी रक्षा करे॥४१॥

42.

पापनाशिनी देवी, मेरी सब ओर से रक्षा करों

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥

  • देवि! जो स्थान कवचमें नहीं कहा गया है,
  • अतएव रक्षासे रहित है,
  • वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो;
  • क्योंकि तुम विजयशालिनी और
  • पापनाशिनी हो॥४२॥

देवी कवच पाठ के लाभ

43.

यात्रा के पहले दुर्गा कवच का पाठ

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥

  • यदि अपने शरीरका भला चाहे तो,
  • मनुष्य बिना कवचके कहीं एक पग भी न जाय –
  • कवचका पाठ करके ही यात्रा करे॥४३॥
  • क्योंकि…

44.

धन लाभ, विजय और इच्छाओं की पूर्ति

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥

  • कवचके द्वारा,
  • सब ओरसे सुरक्षित मनुष्य,
  • जहाँ-जहाँ भी जाता है,
  • वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा
  • सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाली,
  • विजयकी प्राप्ति होती है।
  • वह जिस-जिस वस्तुका चिन्तन करता है,
  • उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है।
  • वह पुरुष,
  • इस पृथ्वीपर तुलनारहित,
  • महान् ऐश्वर्यका भागी होता है॥४४॥

45.

पराजय, शोक और भय से मुक्ति

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥

  • कवचसे सुरक्षित मनुष्य,
    • निर्भय हो जाता है।
  • युद्धमें उसकी,
  • पराजय नहीं होती तथा
  • वह तीनों लोकोंमें,
  • पूजनीय होता है॥४५॥

46 – 47.

नियमित, श्रद्धापूर्वक देवी कवच का पाठ

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥४७॥

  • देवीका यह कवच,
  • देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।
  • जो प्रतिदिन नियमपूर्वक,
  • तीनों संध्याओंके समय,
  • श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता है,
  • उसे…॥४६॥
  • दैवी कला प्राप्त होती है तथा
  • वह तीनों लोकोंमें,
  • कहीं भी पराजित नहीं होता।
  • इतना ही नहीं, वह अपमृत्युसे रहित हो,
  • सौ से भी अधिक वर्षोंतक जीवित रहता है॥४७॥

48.

सभी व्याधियों और रोगों से मुक्ति

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥

  • उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ,
  • नष्ट हो जाती हैं।
  • सभी प्रकारके विष,
  • दूर हो जाते हैं, और
  • उनका कोई असर नहीं होता॥४८॥

49 – 50 – 51 – 52.

देवी कवच, सभी बुरी चीजों से रक्षा करता है

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ॥४९॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥५२॥

  • इस पृथ्वीपर,
  • मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा
  • इस प्रकारके जितने मन्त्र-यन्त्र होते हैं,
  • वे सब इस कवचको हृदयमें धारण कर लेनेपर,
  • उस मनुष्यको देखते ही नष्ट हो जाते हैं।
  • ये ही नहीं,
  • पृथ्वीपर विचरनेवाले ग्रामदेवता,
  • आकाशचारी देवविशेष,
  • जलके सम्बन्धसे प्रकट होनेवाले गण,
  • उपदेशमात्रसे सिद्ध होनेवाले निम्नकोटिके देवता,
  • अपने जन्मके साथ प्रकट होनेवाले देवता,
  • कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि),
  • डाकिनी, शाकिनी,
  • अन्तरिक्षमें विचरनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,
  • ग्रह, भूत, पिशाच,
  • यक्ष, गन्धर्व, राक्षस,
  • ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और
  • अनिष्टकारक देवता भी,
  • हृदयमें कवच धारण किये रहनेपर,
  • उस मनुष्यको देखते ही भाग जाते हैं।
  • कवचधारी पुरुषको,
  • राजासे सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है।
  • यह कवच,
  • मनुष्यके तेजकी वृद्धि करनेवाला और
  • उत्तम है॥४९-५२॥

53 – 54.

सुयश, वृद्धि और परिवार के लिए देवी माँ का कवच

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥

  • कवचका पाठ करनेवाला पुरुष,
  • अपनी कीर्तिसे विभूषित भूतलपर,
  • अपने सुयशके साथ-साथ,
  • वृद्धिको प्राप्त होता है।
  • जो पहले कवचका पाठ करके,
  • उसके बाद,
  • सप्तशती चण्डीका पाठ करता है,
  • उसकी जबतक,
  • वन, पर्वत और काननों सहित,
  • यह पृथ्वी टिकी रहती है,
  • तबतक यहाँ,
  • पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा,
  • बनी रहती है॥५३-५४॥

55.

परमपद की प्राप्ति

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥

  • फिर देहका अन्त होनेपर,
  • वह पुरुष,
  • भगवती महामायाके प्रसादसे,
  • उस नित्य परमपदको प्राप्त होता है,
  • जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥५५॥

56.

भगवान् शिव के चरणों में जगह

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥

  • वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और
  • कल्याणमय शिवके साथ,
  • आनन्दका भागी होता है॥५६॥

  • इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

Saptashati

Durga

दुर्गा कवच – देवी कवच – अर्थसहित
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Devi Mahatmya

अर्गला स्तोत्रम् अर्थसहित

अर्गला स्तोत्र का विनियोग

॥अथ अर्गला स्तोत्रम्॥
ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः,
अनुष्टुप छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती
पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥

ॐ नमश्चण्डिकायै

  • ॐ, इस श्री अर्गलास्तोत्र मंत्रके
  • विष्णु ऋषि,
  • अनुष्टुप छन्द,
  • श्रीमहालक्ष्मी देवता है,
  • श्री जगदम्बा की कृपा के लिए
  • सप्तशती पाठ के पहले इसका विनियोग किया जाता है।
  • ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।

माँ जगदम्बा के सभी रूपों को नमस्कार

मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥१॥

  • मार्कण्डेय जी कहते हैं –
  • जयन्ती, मंगला, काली,
  • भद्रकाली, कपालिनी,
  • दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री,
  • स्वाहा और स्वधा –
  • इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके!
  • तुम्हें मेरा नमस्कार है।

जय त्वं देवी चामुण्डे जय भूतार्ति-हारिणि।
जय सर्वगते देवी कालरात्रि नमोऽस्तुते॥२॥

  • देवी चामुण्डे!
  • तुम्हारी जय हो।
  • सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवी!
  • तुम्हारी जय हो।
  • सब में व्याप्त रहने वाली देवी!
  • तुम्हारी जय हो।
  • कालरात्रि!
  • तुम्हें नमस्कार है॥

मधुकैटभविद्रावि-विधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥

  • मधु और कैटभ को मारने वाली तथा
  • ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवी!
  • तुम्हे नमस्कार है।
  • तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो,
  • जय (मोह पर विजय) दो,
  • यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

रूप – आत्मस्वरूप का ज्ञान
जय – मोह पर विजय
यश – मोह पर विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश


महिषासुर-निर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ४॥

  • महिषासुर का नाश करने वाली तथा
  • भक्तों को सुख देने वाली देवी!
  • तुम्हें नमस्कार है।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

रक्तबीज-वधे देवी चण्डमुण्ड-विनाशिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥

  • रक्तबीज का वध और
  • चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ६॥

  • शुम्भ और निशुम्भ तथा
  • धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

वन्दिताङ्घ्रि-युगे देवी सर्वसौभाग्य-दायिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ७॥

  • सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा
  • सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

अचिन्त्यरूप-चरिते सर्वशत्रु-विनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ८॥

  • देवी! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं।
  • तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ९॥

  • पापों को दूर करने वाली चण्डिके!
  • जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में
  • सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं,
  • उन्हें ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

स्तुवद्भ्यो (स्तु-वद भ्यो) भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधि-नाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥

  • रोगों का नाश करने वाली चण्डिके!
  • जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं,
  • उन्हें तुम ज्ञान दो, विजय दो, यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह (त्वाम-अर्चयन्तीह) भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ११॥

  • चण्डिके!
  • इस संसार में,
  • जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं
  • उन्हें ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं (सौभाग्यम-आरोग्यं) देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १२॥

  • मुझे सौभाग्य और
  • आरोग्य (स्वास्थ्य) दो।
  • परम सुख दो।
  • मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १३॥

  • जो मुझसे द्वेष करते हों, उनका नाश और
  • मेरे बल की वृद्धि करो।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

विधेहि देवी कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १४॥

  • देवी! मेरा कल्याण करो।
  • मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

सुरसुर-शिरोरत्न-निघृष्ट-चरणेम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १५॥

  • अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही,
  • अपने माथे के मुकुट की मणियों को,
  • तुम्हारे चरणों पर रखते हैं।
  • तुम रूप, जय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १६॥

  • तुम अपने भक्तजन को,
  • विद्वान, यशस्वी, और
  • लक्ष्मीवान बनाओ तथा
  • ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

प्रचण्ड-दैत्य-दर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १७॥

  • प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके!
  • मुझ शरणागत को,
  • ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १८॥

  • चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित,
  • चार भुजाधारिणी परमेश्वरि!
  • तुम ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

कृष्णेन संस्तुते देवी शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १९॥

  • देवी अम्बिके!
  • भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक,
  • तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं।
  • तुम रूप दो, जय दो, यश दो और
  • काम-क्रोध का नाश करो॥

हिमाचल-सुतानाथ-संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २०॥

  • हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा,
  • प्रशंसित होने वाली परमेश्वरि!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध का नाश करो॥

इन्द्राणीपति-सद्भाव-पूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २१॥

शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥


देवी प्रचण्डदो-र्दण्ड दैत्यदर्प विनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २२॥

  • प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का,
  • घमंड चूर करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

देवी भक्तजनोद्दाम-दत्तानन्दोदये अम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २३॥

  • देवी! अम्बिके,
  • तुम अपने भक्तजनों को,
  • सदा असीम आनंद प्रदान करती हो।
  • मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानु-सारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥

  • मनोहर पत्नी प्रदान करो,
  • जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा
  • उत्तम कुल में जन्मी हो॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ॥२५॥

  • जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके,
  • सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है,
  • वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले,
  • श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है।
  • साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है॥

॥इति देव्या अर्गला स्तोत्रं सम्पूर्णम॥

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥

Saptashati

Durga

Argala Stotram - Meaning in Hindi
Categories
Devi Mahatmya

कीलक स्तोत्र

अथ कीलकम्

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य
शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहासरस्वती देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥


मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥१॥

ॐ चण्डिकादेवीको नमस्कार है।

  • मार्कण्डेयजी कहते हैं –
  • विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है,
  • तीनों वेद ही जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं,
  • जो कल्याण-प्राप्तिके हेतु हैं तथा
  • अपने मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण करते हैं,
  • उन भगवान् शिवको नमस्कार है ॥१॥

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम्।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥२॥

  • मन्त्रोंका जो अभिकीलक है,
  • अर्थात् मन्त्रोंकी सिद्धिमें विघ्न उपस्थित करनेवाले शापरूपी कीलकका जो निवारण करनेवाला है,
  • उस सप्तशतीस्तोत्रको सम्पूर्णरूपसे जानना चाहिये
  • (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये),
  • यद्यपि सप्तशतीके अतिरिक्त,
  • अन्य मन्त्रोंके जपमें भी जो निरन्तर लगा रहता है,
  • वह भी कल्याणका भागी होता है ॥२॥

सिद्ध्‍यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्‍यति ॥३॥

  • उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं तथा
  • उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्ति हो जाती है;
  • तथापि जो अन्य मन्त्रोंका जप न करके,
  • केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्रसे ही देवीकी स्तुति करते हैं,
  • उन्हें स्तुतिमात्रसे ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणीदेवी सिद्ध हो जाती हैं ॥३॥

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्‍येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥४॥

  • उन्हें अपने कार्यकी सिद्धिके लिये मन्त्र, ओषधि तथा
  • अन्य किसी साधनके उपयोगकी आवश्यकता नहीं रहती।
  • बिना जपके ही उनके उच्चाटन आदि समस्त आभिचारिक कर्म,
  • सिद्ध हो जाते हैं ॥४॥

समग्राण्यपि सिद्ध्‍यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥५॥

  • इतना ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती हैं।
  • लोगोंके मनमें यह शंका थी कि ‘जब केवल सप्तशतीकी उपासनासे अथवा सप्तशतीको छोड़कर अन्य मन्त्रोंकी उपासनासे भी समानरूपसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, तब इनमें श्रेष्ठ कौन-सा साधन है?’ लोगोंकी इस शंकाको सामने रखकर भगवान् शंकरने अपने पास आये हुए जिज्ञासुओंको समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है ॥५॥

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥६॥

  • तदनन्तर भगवती चण्डिकाके सप्तशती नामक स्तोत्रको महादेवजीने गुप्त कर दिया।
  • सप्तशतीके पाठसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मन्त्रोंके जपजन्य पुण्यकी समाप्ति हो जाती है।
  • अतः भगवान् शिवने अन्य मन्त्रोंकी अपेक्षा जो सप्तशतीकी ही श्रेष्ठताका निर्णय किया, उसे यथार्थ ही जानना चाहिये ॥६॥

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥७॥


ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥८॥

  • अन्य मन्त्रोंका जप करनेवाला पुरुष भी यदि सप्तशतीके स्तोत्र और जपका अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूपसे ही कल्याणका भागी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
  • जो साधक कृष्णपक्षकी चतुर्दशी अथवा अष्टमीको एकाग्रचित्त होकर भगवतीकी सेवामें अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसादरूपसे ग्रहण करता है, उसीपर भगवती प्रसन्न होती हैं; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।
  • इस प्रकार सिद्धिके प्रतिबन्धकरूप कीलके द्वारा महादेवजीने इस स्तोत्रको कीलित कर रखा है ॥७-८॥

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥९॥

  • जो पूर्वोक्त रीतिसे निष्कीलन करके इस सप्तशतीस्तोत्रका प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है, वही देवीका पार्षद होता है और वही गन्धर्व भी होता है ॥९॥

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०॥

  • सर्वत्र विचरते रहनेपर भी इस संसारमें उसे कहीं भी भय नहीं होता।
    वह अपमृत्युके वशमें नहीं पड़ता तथा देह त्यागनेके अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥१०॥

ज्ञात्वा प्रारथ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११॥

  • अतः कीलनको जानकर उसका परिहार करके ही सप्तशतीका पाठ आरम्भ करे।
  • जो ऐसा नहीं करता, उसका नाश हो जाता है।
  • इसलिये कीलक और निष्कीलनका ज्ञान प्राप्त करनेपर ही यह स्तोत्र निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्रका ही पाठ आरम्भ करते हैं ॥११॥

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद्‌ दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२॥

  • स्त्रियोंमें जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है, वह सब देवीके प्रसादका ही फल है।
    अतः इस कल्याणमय स्तोत्रका सदा जप करना चाहिये ॥१२॥

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्त्रोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३॥

  • इस स्तोत्रका मन्दस्वरसे पाठ करनेपर स्वल्प फलकी प्राप्ति होती है और उच्चस्वरसे पाठ करनेपर पूर्ण फलकी सिद्धि होती है।
    अतः उच्चस्वरसे ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥१३॥

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥ॐ॥१४॥

  • जिनके प्रसादसे ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्षकी भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बाकी स्तुति मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥१४॥
  • इति देव्याः कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम्।

Saptashati

Durga

Kilak Stotra - Arth Sahit - Meaning in Hindi
Categories
Chalisa

दुर्गा चालीसा – नमो नमो दुर्गे सुख करनी

1.

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

2.

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥


3.

शशि ललाट, मुख महाविशाला।
नेत्र लाल, भृकुटि विकराला॥

4.

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥


5.

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥

6.

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥


7.

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

8.

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥


9.

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥


10.

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥

11.

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥


12.

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥

13.

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥


14.

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥

15.

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

16.

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥


17.

केहरि वाहन सोहे भवानी।
लंगुर वीर चलत अगवानी॥

18.

कर में खप्पर खड्ग विराजे।
जाको देख काल डर भाजे॥


19.

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

20.

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत॥


21.

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥

22.

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥


23.

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

24.

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥


25.

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥

26.

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥


27.

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

28.

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥


29.

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

30.

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥