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ओम जय शिव ओंकारा – शिव आरती

1.

ओम जय शिव ओंकारा।
प्रभु हर शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


2.

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
स्वामी (शिव) पंचानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


3.

दोभुज चार चतुर्भुज, दशभुज अति सोहे।
स्वामी दशभुज अति सोहे।
तीनो रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


4.

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी।
स्वामी मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी॥
Or
(चन्दन मृगमद सोहे, भाले शशि धारी॥)
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


5.

श्वेतांबर पीतांबर, बाघंबर अंगे।
स्वामी बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुडादिक, भूतादिक संगे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


6.

करमध्येन कमंडलु, चक्र त्रिशूलधारी।
स्वामी चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकर्ता दुखहर्ता, जग-पालन करता॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


7.

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।
स्वामी जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर ओम मध्ये, ये तीनों एका॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


8.

काशी में विश्वनाथ विराजत, नन्दो ब्रह्मचारी।
स्वामी नन्दो ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


9.

त्रिगुण स्वामीजी की आरती, जो कोइ नर गावे।
स्वामी जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी , मन वांछित फल पावे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


1.

ओम जय शिव ओंकारा।
प्रभु हर शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥

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Om Jai Shiv Omkara – Shiv Aarti
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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में से श्री केदारनाथ का ज्योतिर्लिंग हिमाच्छादित प्रदेश का एक दिव्य ज्योतिर्लिंग है। पुराणों एवं शास्त्रोंमें श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमाका वर्णन बारम्बार किया गया है।

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के इस लेख में

  • श्री केदारनाथ की कथा – पांडवों को शिवजी के दर्शन,
  • नर और नारायण की तपस्या और उनको भगवान् शिव के दर्शन,
  • श्री केदारनाथ शिवलिंग का त्रिकोणीय आकार
  • केदारनाथ यात्रा का संक्षिप्त विवरण
  • श्री केदारनाथ की महिमा
  • आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ महिमा का वर्णन

यह ज्योतिर्लिंग पर्वतराज हिमालयकी केदार नामक चोटीपर स्थित है। यहाँकी प्राकृतिक शोभा देखते ही बनती है। इस चोटीके पश्चिम भागमें पुण्यमती मन्दाकिनी नदीके तटपर स्थित केदारेश्वर महादेवका मन्दिर अपने स्वरूपसे ही हमें धर्म और अध्यात्मकी ओर बढ़नेका सन्देश देता है।


हिमालय की देवभूमि में केदारनाथ

हिमालय की देवभूमि में बसे इस देवस्थान के दर्शन केवल छह माह के काल में ही होते हैं। वैशाख से लेकर अश्विन महीने तक के कालावधि में इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा लोग कर सकते हैं।

वर्ष के अन्य महीनों में कड़ी सर्दी होने से हिमालय पर्वत का प्रदेश बर्फ से ढका रहने के कारण श्रीकेदारनाथ का मंदिर भक्तों के लिए बंद रहता है।

कार्तिक महीने में बर्फ वृष्टि तेज होने पर इस मंदिर में घी का नंदा दीप जलाकर श्री केदारेश्वर का भोग सिंहासन बाहर लाया जाता है। और मंदिर के द्वार बंद किए जाते हैं।

कार्तिक से चैत्र तक श्री केदारेश्वर जी का निवास नीचे जोशीमठ में रहता है। वैशाख में जब बर्फ पिघल जाती है तब केदारधाम फिर से खोल दिया जाता है।


हरिद्वार से केदारनाथ तक यात्रा

हरिद्वार को मोक्षदायिनी मायापुरी मानते हैं। हरिद्वार के आगे ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, सोनप्रयाग और त्रियुगी नारायण, गौरीकुंड इस मार्ग से केदारनाथ जा सकते हैं। कुछ प्रवास मोटर से और कुछ पैदल से करना पड़ता है।

हिमालय का यह रास्ता काफी कठिन होता है। परंतु अटल श्रद्धा के कारण यह कठिन रास्ता भक्त यात्री पार करते हैं। श्रद्धा के बल पर इस प्रकार संकटों पर मात की जाती है।

चढान का मार्ग कुछ लोग घोड़े पर बैठकर, टोकरी में बैठ कर या झोली की सहायता से पार करते हैं। इस तरह का प्रबंध वहां किया जाता है।

विश्राम के लिए बीच-बीच में धर्मशालाएं, मठ तथा आश्रम खोले गए हैं। यात्री गौरीकुंड स्थान पर पहुंचने के बाद वहां के गर्म कुंड के पानी से स्नान करते हैं और मस्तकहीन गणेश जी के दर्शन करते हैं।


गौरीकुंड – श्री गणेशजी

गौरीकुंड का स्थान गणेश जी का जन्म स्थान माना गया है।

इस स्थान पर पार्वती पुत्र गणेश जी को शंकर जी ने त्रिशूल के प्रहार से मस्तकहीन बनाया था, और बाद में गजमुख लगा कर जिंदा किया था।


केदारनाथ का शिवलिंग

गौरीकुंड से दो चार कोस की दूरी पर ऊंची हिम शिखरों के परिसर में, मंदाकिनी नदी की घाटी में भगवान शंकर जी का दिव्य ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ का मंदिर दिखाई देता है। यही कैलाश है, जो भगवान शंकर जी का आद्य निवास स्थान है।

लेकिन यहां शंकर जी की मूर्ति और लिंग भी नहीं है। केवल एक त्रिकोण के आकार का ऊंचाई वाला स्थान है। कहते हैं वह महेश का, भैंसे का, पृष्ठ भाग है।


केदारनाथ की कथा – पांडवो को भगवान् शिव के दर्शन

इस ज्योतिर्लिंग का जो इस तरह का आकार बना है, उसकी अनोखी कथा इस प्रकार है –

कौरव और पांडव के युद्ध में अपने ही लोगों की हत्या हुई थी। इसलिए मोक्ष पाने के लिए पांडव तीर्थ स्थान काशी पहुंचे। परंतु भगवान शंकर जी उस समय हिमालय की कैलाश पर गए हुए हैं, यह समाचार मिला।

पांडव काशी से निकले और हरिद्वार होकर हिमालय की गोद में पहुंची। दूर से ही उन्हें भगवान शंकर जी के दर्शन हुए। लेकिन पांडव को देखकर शंकर भगवान लुप्त हो गए।

यह देखकर धर्मराज ने कहा –
हे देव, हम पापियों को देखकर आप लुप्त हो गए। ठीक है, हम आपको ढूंढ निकालेंगे। आपके दर्शन से हमारे सारे पाप धुल जाने वाले हैं। जहां आप लुप्त हुए हैं, वह स्थान अब गुप्तकाशी के रूप में पवित्र तीर्थ बनेगा।

गुप्तकाशी, रुद्रप्रयाग से पांडव आगे निकलकर हिमालय के कैलाश, गौरीकुंड के प्रदेश में घूमते रहे। शंकर भगवान को ढूंढते रहे।

इतने में नकुल और सहदेव को एक भैंसा दिखाई दिया। उसका अनोखा रूप देखकर धर्मराज ने कहा, भगवान शंकर जी ने ही यह भैंसे का अवतार धारण किया है। वह हमें परख रहे हैं।

फिर क्या। गदाधारी भीम उस भैंसे के पीछे लगे। भैंसा उछल पड़ा और भीम के हाथ नहीं आया। आखिर भीम थक गया। फिर भी भीम ने गदा प्रहार से भैंसे को घायल किया।

फिर वह भैंसा एक दर्रे के पास जमीन में मुंह दबा कर बैठ गया। भीम ने उसकी पूंछ पकड़कर खींचा। भैंसे का मुँह इस खिंचाव से सीधे नेपाल में जा पहुंचा। भैंसे का पार्श्व भाग केदार धाम में ही रहा। नेपाल में वह पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाने लगा।

महेश के उस पार्श्व भाग से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। दिव्य ज्योति में से शंकर भगवान प्रकट हुए। पांडवों को उन्होंने दर्शन दिए। शंकर भगवान के दर्शन से पांडवों के पाप नष्ट हो गए।

भगवान शंकर जी ने पांडव से कहा – मैं अभी यहां इसी त्रिकोण आकार में ज्योतिर्लिंग के रूप में हमेशा के लिए रहूंगा। केदारनाथ के दर्शन से भक्तगण पावन होंगे।

महेशरूप लिए हुए शिवजी को भीम ने गदा का प्रहार किया था। इसलिए भीम को बहुत पछतावा हुआ, बुरा लगा। वह महेश का शरीर घी से मलने लगा। उस बात की यादगार के रूप में आज भी उस त्रिकोण आकार दिव्य ज्योतिर्लिंग केदारनाथ को घी से मलते हैं। इस स्थान पर शंकर भगवान की इसी तरह से पूजा की जाती है।


केदारनाथ कथा – नर और नारायण की तपस्या

इस अतीव पवित्र पुण्यफलदायी ज्योतिर्लिक्की स्थापनाके विषयमें पुराणोंमें यह कथा दी गयी है –

अतिशय पवित्र, तपस्वियों, ऋषियों और देवताओंकी निवास-भूमि हिमालयके केदार नामक अत्यन्त शोभाशाली शिखरपर महातपस्वी श्रीनर और नारायणने बहुत वर्षों तक भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये बड़ी कठिन तपस्या की।

कई वर्षोंतक वे निराहार रहकर शिवनामका जप करते रहे।

इस तपस्यासे सारे लोकोंमें उनकी चर्चा होने लगी। देवता, ऋषि-मुनि, यक्ष, गन्धर्व सभी उनकी साधना और संयमकी प्रशंसा करने लगे। चराचरके पितामह ब्रह्माजी और सबका पालन-पोषण करनेवाले भगवान् विष्णु भी महातपस्वी नर-नारायणके तपकी प्रशंसा करने लगे।

अन्तमें भगवान् शंकरजी भी उनकी उस कठिन साधनासे प्रसत्र हो उठे। उन्होंने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन दोनों ऋषियोंको दर्शन दिया। नर और नारायणने भगवान् भोलेनाथके दर्शनसे भाव-विह्वल और आनन्द-विभोर होकर बहुत प्रकारकी पवित्र स्तुतियों और मन्त्रोंसे उनकी पूजा-अर्चना की।

भगवान् शिवजीने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा।

भगवान् शिवकी यह बात सुनकर उन दोनों ऋषियोंने उनसे कहा –
देवाधिदेव महादेव! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो भक्तोंके कल्याणहेतु आप सदा-सर्वदाके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी कृपा करें। आपके यहाँ निवास करनेसे यह स्थान सभी प्रकारसे अत्यन्त पवित्र हो उठेगा। यहाँ आकर आपका दर्शन-पूजन करनेवाले मनुष्योंको आपकी अविनाशिनी भक्ति प्राप्त हुआ करेगी। प्रभो! आप मनुष्योंके कल्याण और उनके उद्धारके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी हमारी प्रार्थना अवश्य ही स्वीकार करें।

उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शिवने ज्योतिर्लिंग के रूपमें वहाँ वास करना स्वीकार किया। केदार नामक हिमालय-शिखर पर स्थित होनेके कारण इस ज्योतिर्लिंग को श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूपमें जाना जाता है।

भगवान् शिवसे वर माँगते हुए नर और नारायणने इस ज्योतिर्लिङ्ग और इस पवित्र स्थानके विषयमें जो कुछ कहा है, वह अक्षरश: सत्य है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन तथा यहाँ स्नान करनेसे भक्तोंको लौकिक फलोंकी प्राप्ति होनेके साथ-साथ अचल शिवभक्ति तथा मोक्षकी प्राप्ति भी हो जाती है।


केदारनाथ में पांडवों की स्मृतियाँ

केदारनाथ के परिसर में पांडवों की कई स्मृतियां जागृत रही है। राजा पांडु इसी वन में माद्री के साथ विहार करते समय मर गए थे। वह स्थान पांडुकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। वहां आदिवासी लोग पांडव नृत्य प्रस्तुत करते रहते हैं।

जिस स्थान से पांडव स्वर्ग सिधारे ऊंची चोटी को स्वर्ग रोहिणी कहते हैं। धर्मराज जब स्वर्ग सिधार रहे थे, तब उनका एक अंगूठा निकल कर जमीन पर पड़ा था। उस स्थान पर धर्मराज ने अंगुष्ठमात्र शिवलिंग की स्थापना की।


केदारनाथ की महिमा

केदारेश्वर के दर्शन से स्वप्न में भी दुख प्राप्त नहीं होता। शंकर केदारेश्वर का पूजन कर पांडव का सब दुख जाता रहा।

बद्रीकेश्वर का दर्शन पूजन आवागमन के बंधन से मुक्ति दिलाता है। केदारेश्वर में दान करके शिवजी के समीप जाकर उनके रूप हो जाते हैं।

मुख्य केदारनाथ मंदिर के परिसर में अनेक पवित्र स्थान हैं। मंदिर के पिछवाड़े में आदि शंकराचार्य जी की समाधि है। दूर की ऊंचाई पर भृगुपतन नाम की एक कठिन कगार है।

मंदिर की आठ दिशाओं में अष्टतीर्थ हैं।

तात्पर्य है कि श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए अति कठिन और दुर्गम मार्ग से होकर जाना पड़ता है। लेकिन इरादे बुलंद हो और मन में श्रद्धा हो तो चलते समय थकान बिल्कुल नहीं आती। सबकी जुबान पर एक ही घोष रहता है – जय केदारनाथ, जय केदारनाथ।


आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ का वर्णन

आदि शंकराचार्यजी ने कहा है –

महाद्रिपार्श्वेच तटे रमन्तं,
सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै:,
केदारमीशं शिवमेकमीडे॥

अर्थात महान हिमालय के प्रदेश में रम जाने वाले, ऋषि मुनियों द्वारा और सुर, असुर, यक्ष तथा महानाग आदि के द्वारा जिन की निरंतर पूजा होती आई है, ऐसे श्री केदारेश्वर महादेव जी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
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श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे
तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं
नमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥
जय मल्लिकार्जुन, जय मल्लिकार्जुन॥

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – द्वितीय ज्योतिर्लिंग

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – द्वितीय ज्योतिर्लिंग

  • शिवपुराण के अनुसार,
  • श्रीमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग,
  • 12 ज्योतिर्लिंगों में से द्वितीय ज्योतिर्लिंग है।
  • मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग,
  • आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में,
  • कृष्णा नदी के तट पर,
  • श्री शैल पर्वत पर स्थित हैं।
  • इसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं।
  • प्राचीन समय में इसी प्रदेश में,
  • भगवान श्रीशंकर आते थे।
  • इसी स्थान पर उन्हानें,
  • दिव्य ज्योतिर्लिग के रूप में,
  • स्थायी निवास किया।
  • इस स्थान को,
  • कैलाश निवास कहते हैं।
Mallikarjuna Jyotirling Temple

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा – 1

  • शिव पार्वती के पुत्र,
  • स्वामी कार्तिकेय और गणेश,
  • दोनों भाई विवाह के लिए,
  • आपस में कलह करने लगे।
  • कार्तिकेय का कहना था कि वे बड़े हैं,
  • इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए,
  • किन्तु श्री गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे।
  • इस झगड़े पर फैसला देने के लिए,
  • दोनों अपने माता-पिता,
  • भवानी और शंकर के पास पहुँचे।
  • उनके माता-पिता ने कहा कि,
  • तुम दोनों में जो कोई,
  • इस पृथ्वी की परिक्रमा करके,
  • पहले यहाँ आ जाएगा,
  • उसी का विवाह पहले होगा।
  • शर्त सुनते ही,
  • कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए दौड़ पड़े।
  • इधर स्थूलकाय श्री गणेश जी और
  • उनका वाहन भी चूहा,
  • भला इतनी शीघ्रता से वे परिक्रमा कैसे कर सकते थे।
  • गणेश जी के सामने भारी समस्या उपस्थित थी।
  • श्रीगणेश जी, शरीर से ज़रूर स्थूल हैं,
  • किन्तु वे बुद्धि के सागर हैं।
  • उन्होंने कुछ सोच-विचार किया और
  • अपनी माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर से,
  • एक आसन पर बैठने का आग्रह किया।
  • उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद,
  • श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की,
  • फिर विधिवत् पूजन किया।
  • इस प्रकार श्रीगणेश,
  • माता-पिता की परिक्रमा करके,
  • पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये।
  • उनकी चतुर बुद्धि को देख कर,
  • शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और
  • उन्होंने श्रीगणेश का विवाह भी करा दिया।
  • कुमार कार्तिकेय,
  • पृथ्वी की परिक्रमा करके कैलाश पर लौटे,
  • तो नारदजी से,
  • गणेश के विवाह का,
  • वृतांत सुनकर रूष्ट हो गए,
  • और माता पिता के मना करने पर भी,
  • उन्हें प्रणाम कर क्रोच पर्वत पर चले गए।
  • पार्वती के दुखित होने पर, और
  • समझाने पर भी धैर्य न धारण करने पर,
  • शंकर जी ने देवर्षियो को,
  • कुमार को समझाने के लिए भेजा,
  • परंतु वे निराश हो लौट आए।
  • इस पर पुत्र वियोग से व्याकुल पार्वती के अनुरोध पर,
  • पार्वती के साथ, शिवजी स्वयं वहां गए।
  • पंरतु वह, अपने माता पिता का आगमन सुनकर,
  • क्रोच पर्वत को छोडकर,
  • तीन योजन और दूर चले गये।
  • वहा पुत्र के न मिलने पर,
  • वात्सल्य से व्याकुल शिव-पार्वती ने,
  • उसकी खोज में अन्य पर्वतों पर जाने से पहले,
  • उन्होनें वहां अपनी ज्योति स्थापित कर दी।
  • उसी दिन से मल्लिकार्जुन क्षेत्र के नाम से,
  • यह ज्योतिलिंग मल्लिकार्जुन कहलाया।
  • मल्लिकार्जुन – मल्लिका – माता पार्वती,
  • अर्जुन – भगवान शंकर
  • मल्लिका, माता पार्वती का नाम है, जबकि,
  • अर्जुन, भगवान शंकर को कहा जाता है।
  • इस प्रकार सम्मिलित रूप से,
  • मल्लिकार्जुन नाम जगत् में प्रसिद्ध हुआ।
  • अमावस्या के दिन शिवजी और
  • पूर्णिमा के दिन पार्वतीजी,
  • आज भी वहां आते रहते है।
  • इस ज्योतिर्लिग के दर्शन से,
  • धन-धान्य की वृद्धि के साथ,
  • प्रतिष्ठा आारोग्य और अन्य मनोरथों की भी प्राप्ति होती है।
मल्लिकार्जुन – मल्लिका – माता पार्वती, अर्जुन – भगवान शंकर

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा – 2

  • चंद्रावती नाम की एक राजकन्या,
  • वन-निवासी बनकर,
  • इस कदली वन में तप कर रही थी।
  • एक दिन उसने एक चमत्कार देखा की,
  • एक कपिला गाय,
  • बिल्व वृक्ष के नीचे खडी होकर,
  • अपने चारों स्तनों से दूध की धाराएँ,
  • जमीन पर गिरा रही है।
  • गाय का यह नित्यक्रम था।
  • चंद्रवती ने उस स्थान पर खोदा,
  • तो आश्चर्य से दंग रह गई।
  • वही एक स्वयंभू शिवलिंग दिखाई दिया।
  • वह सूर्य जैसा प्रकाशमान दिखाई दिया,
  • जिससे अग्निज्वालाएँ निकलती थी।
  • भगवान शंकर के उस दिव्य ज्योतिर्लिंग की,
  • चंद्रावती ने आराधना की।
  • उसने वहाँ अतिविशाल शिमंदिर का निर्माण किया।
श्री शैल मल्लिकार्जुन
  • भगवान शंकर चंद्रावती पर प्रसन्न हुए।
  • वायुयान में बैठकर,
  • वह कैलाश पहुंची और उसे मुक्ति मिली।
  • मंदिर की एक शिल्पपट्टी पर,
  • चंद्रावती की कथा खोदकर रखी है।
  • शैल मल्लिकार्जुन के,
  • इस पवित्र स्थान की तलहटी में,
  • कृष्णा नदी ने,
  • पाताल गंगा का रूप लिया है।
  • लाखों भक्तगण यहाँ पवित्र स्नान करके,
  • ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए जाते है।
  • अनेक धर्मग्रन्थों में,
  • इस स्थान की महिमा बतायी गई है।
  • महाभारत के अनुसार,
  • श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव का पूजन करने से,
  • अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है।
  • कुछ ग्रन्थों में तो यहाँ तक लिखा है कि,
  • श्रीशैल के शिखर के दर्शन मात्र करने से,
  • दर्शको के सभी प्रकार के कष्ट दूर भाग जाते हैं,
  • उसे अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है और
  • आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाता है।

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Shri Mallikarjuna Jyotirling
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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं
सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥
जय सोमनाथ, जय सोमनाथ॥


श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग – आद्य ज्योतिर्लिंग

शंकरजी के बारह ज्योतिर्लिंग में से सोमनाथ को आद्य ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह स्वयंभू देवस्थान होने के कारण और हमेशा जागृत होने के कारण लाखों भक्तगण यहाँ आकर पवित्र-पावन बन जाते है।

श्री सोमनाथ सौराष्ट्र (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है।

सौराष्ट्र के श्रीसोमनाथ का यह शिवतीर्थ, अग्नितीर्थ और सूर्यतीर्थ सर्वप्रथम चंद्रमा को प्रसन्न हुए। तब उसने भारत में सबसे पहले श्रीशंकरजी के दिव्य ज्योतिर्लिग की स्थापना करके उस पर अतिसुंदर स्वर्णमंदिर बाँधा।


श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा

स्कंद-पुराण के प्रभासखंड में श्रीसोमनाथ की कथा का संदर्भ मिलता है। कथा इस प्रकार है:-

चन्द्र अर्थात् सोम ने, दक्षप्रजापति राजा की २७ पुत्रियों से विवाह किया था। किंतु एक मात्र रोहिणी में इतनी आसक्ति और इतना अनुराग दिखाया कि अन्य छब्बीस अपने को उपेक्षित और अपमानित अनुभव करने लगी।

उन्होंने अपने पति से निराश होकर अपने पिता से शिकायत की तो पुत्रियों की वेदना से पीड़ित दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को दो बार समझाने का प्रयास किया।

परन्तु विफल हो जाने पर उसने चन्द्रमा को “क्षयी” होने का शाप दिया और कहा की अब से हर दिन तुम्हारा तेज (काँति, चमक) क्षीण होता रहेगा।

फलस्वरूप हर दूसरे दिन चंद्र का तेज घटने लगा।

देवता लोग चन्द्रमा की व्यथा से व्यथित होकर ब्रह्माजी के पास जाकर उनसे शाप निवारण का उपाय पूछने लगे।

ब्रह्माजी ने प्रभासक्षेत्र में महामृत्युंजय से शंकरजी की उपासना करना एकमात्र उपाय बताया।

चन्द्रमा के छ: मास तक शिव पूजा करने पर शंकर जी प्रकट हुए और चन्द्रमा को एक पक्ष में प्रतिदिन उसकी एक-एक कला नष्ट होने और दूसरे पक्ष में प्रतिदिन बढने का उन्होने वर दिया।

देवताओं पर प्रसन्न होकर उस क्षेत्र की महिमा बढ़ाने के लिए और चन्द्रमा (सोम) के यश के लिए सोमेश्वर नाम से शिवजी वहां अवस्थित हो गए।

देवताओं ने उस स्थान पर सोमेश्वर कुण्ड की स्थापना की। इस कुण्ड में स्नान कर सोमेश्वर ज्योर्तिलिग के दर्शन पूजा से सब पापों से निस्तार और मुक्ति की प्राप्ति हो जातीं है।

चन्द्रमा को सोम नाम से भी पहचाना जाता है। इसलिए यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के नाम से मशहूर है।

चंद्रमा को इस स्थान पर तेज प्राप्त हुआ। अत: इस स्थान को प्रभासपट्टण इस नाम से भी जाना जाता है।

भारत का यह आद्य ज्योतिर्लिंग करोड़ों भक्तों का श्रद्धास्थान है। लाखों यात्रियों की भीड यहाँ सदा लगी रहती है। अनेक सिद्ध-सत्पुरुषों का सत्संग लोगों को प्राप्त होता है। समुद्रतटपर कठियावाड़ के प्रदेश में. प्रभासपट्टण के आसपास मंदिर. स्मारक और पौराणिक स्थान है।

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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकालमहासुरेशम्॥


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – महाकालमहासुरेशम्

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, मध्यप्रदेश के, मालवा क्षेत्र में, क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैन नगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।

महाभारत, पुराणों में और महाकवि कालिदास की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

स्वयंभू और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। ऐसी मान्यता है की इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा – 1

अवलीवासी एक ब्राह्मण के शिवोपासक चार पुत्र थे।

ब्रह्मा से वर प्राप्त दुष्ट दैत्यराज दूषण ने, अवंती मे आकर, वहां के निवासी वेदज्ञ ब्राह्मण को बडा कष्ट दिया। परन्तु शिवजी के ध्यान में लीन ब्राह्मण तनिक भी खिन्न नहीं हुए।

दैत्यराज ने अपने चारो अनुचर दैत्यों को नगरी मे घेर कर वैदिक धर्मानुष्ठान ने होने देने का आदेश दिया।

दैत्यों के उत्पात से पीडित प्रजा ब्राह्मणो के पास आई।

बाह्मण प्रजाजनो को धीरज बंधा कर शिवजी की पूजा में तत्पर हुए।

इसी समय ज्योहिं दूषण दैत्य अपनी सेना सहित उन ब्राह्मणों पर झपटा, त्योहि पार्थिव मूर्ति के स्थान पर एक भयानक शब्द के साथ धरती फटी और वहां पर गड्डा हो गया। उसी गर्त में शिवजी एक विराट रूपधारी महाकाल के रूप में प्रकट हुए।

शिवजी ने उस दुष्ट को ब्राह्मणो के निकट न आने को कहा, परन्तु उस दुष्ट दैत्य ने शिवजी की आज्ञा न मानी।

फलत: शिवजी ने अपनी एक ही हुंकार से उस दैत्य को भस्म कर दिया।

शिवजी को इस रूप मे प्रकट हुआ देखकर ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रादि देवों ने आकर भगवान शंकर की स्तुति वन्दना की।


श्री महाकालेश्वर की कथा – 2

राजा चन्द्रसेन और गोपीपुत्र
महाकालेश्वर की महिमा अवर्णनीय हे। उज्जयिनी नरेश चन्द्रसेन शास्त्रज्ञ होने के साथ साथ पक्का शिवभक्त भी था। उसके मित्र महेश्वरजी के गण मणिभद्र ने उसे एक सुन्दर चिंतामणि प्रदान की।

चन्द्रसेन जब उस मणि को कण्ठ में धारण करता तो इतना अधिक तेजस्वी दीखता कि देवताओं को भी ईर्ष्या होती।

कुछ राजाओं के मांगने पर मणि देने से इकार करने पर उन्होंने चन्द्रसेन पर चढाई कर दी।

अपने को घिरा देख चंद्रसेन महाकाल की शरण में आ गया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसकी रक्षा का उपाय किया।

संयोगवश अपने बालक को गोद में लिए हुए एक ब्राह्मणी भ्रमण करती हुए महाकाल के समीप पहुंची।

अबोध बालक ने महाकालेश्वर मंदिर में राजा को शिव पूजन करते देखा तो उसके मन में भी भक्ति भाव उत्पन्न हुआ।

उसने एक रमणीय पत्थर को लाकर अपने सूने घर में स्थापित किया और उसे शिवरूप मान उसकी पूजा करने लगा।

भजन में लीन बालक को भोजन की सुधि ही न रही।

उसकी माता उसे बुलाने गई, परन्तु माता के बार बार बुलाने पर भी बालक ध्यान मगन मौन बैठा रहा।

इस पर उसकी माया विमोहित माता ने, शिवलिंग को दूर फ़ेंक कर उसकी पूजा नष्ट कर दी।

माता के इस कृत्य पर दुखी होकर वह शिवजी का स्मरण करने लगा।

शिवजी की कृपा होते देर न लगी, और पुत्र द्वारा पूजित पाषाण रत्नजड़ित ज्योतिर्लिंग के रूप में आविर्भूत हो गया।

शिवजी की स्तुति वन्दना के उपरान्त जब बालक घर को गया तो उसने देखा कि उसकी कुटिया का स्थान सुविशाल भवन ने ले लिया है।

इस प्रकार शिवजी की कृपा से वह बालक विपुल धन धान्य से समृद्ध होकर सुखी जीवन बिताने लगा।

इधर विरोधी राजाओं ने जब चन्द्रसेन के नगर पर अभियान किया तो वे आपस में ही एक दूसरे से कहने लगे कि राजा चद्रसेन तो शिवभक्त है, और उज्जैयिनी महाकाल की नगरी हैं, जिसे जीतना असम्भव है।

यह विचार कर राजाओं ने चंद्रसेन से मित्रता कर ली और सबने मिलकर महाकाल का पूजा कि।

इस समय वहां वानराधीश हनुमान जी प्रकट हुए और उन्होनें राजाओं को बताया कि शिवजी के बिना मनुष्यों को गति देने वाला अन्य कोई नहीं है।

शिवजी तो बिना मंत्रों से की गई पूजा से भी प्रसन्न हो जाते है। गोपीपुत्र का उदाहरण तुम्हारे सामने ही है। इसके पश्चात् हनुमान जी चंद्रसेन को स्नेह और कृपा पूर्ण दृष्टि से देखकर वही अन्तर्धान हो गए।

Temple

Shiv

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
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श्री बद्रीनाथजी की आरती – बद्रीनाथ स्तुति

1.

पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मन्दिर शोभितम्।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥


2.

शेष सुमिरन, करत निशदिन,
धरत ध्यान महेश्वरम्।
वेद ब्रह्मा करत स्तुति
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥


3.

इन्द्र चन्द्र कुबेर दिनकर,
धूप दीप निवेदितम्।
सिद्ध मुनिजन करत जय जय
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥


4.

शक्ति गौरी गणेश शारद,
नारद मुनि उच्चारणम्।
योग ध्यान अपार लीला
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥


5.

यक्ष किन्नर करत कौतुक,
गान गंधर्व प्रकाशितम्।
लक्ष्मी देवी चंवर डोले
(श्री भूमि लक्ष्मी चँवर डोले)
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥


6.

कैलाशमे एक देव निरंजन,
शैल शिखर महेश्वरम।
राजा युधिष्टिर करत स्तुती,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम्॥


7.

यह बद्रीनाथ पंच रत्न,
पठन पाप विनाशनम्।
नरनारायण तप निरत
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥
Or
(श्री बद्रीनाथ (जी) की परम स्तुति,
यह पढत पाप विनाशनम्।
कोटि-तीर्थ सुपुण्य सुन्दर,
सहज अति फलदायकम्॥)


1.

पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मन्दिर शोभितम्।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥

Aarti

Chalisa

श्री बद्रीनाथजी की आरती – बद्रीनाथ स्तुति
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Stotra

शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र अर्थ सहित

Shiva Pratah Smaran Stotra Meaning in Hindi

सुबह की जाने वाली, भगवान शिव की स्तुति

  • शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र,
  • एक छोटा, तीन श्लोकों का,
  • शिव स्तोत्र है,
  • अर्थात,
  • छोटी सी, सुंदर, तीन श्लोकों की,
  • भगवान् शिव की स्तुति और प्रार्थना है।
  • प्रातः स्मरण अर्थात
  • सुबह किया जाने वाला,
  • ईश्वर का स्मरण।
  • यदि सुबह बिस्तर से उठते ही,
  • शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र का,
  • पाठ किया जाए तो,
  • ऊर्जा और खुशी से भरी हुई,
  • दिन की शुरुआत होती है।

शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र

शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र के इस पोस्ट में

  1. पहले स्तोत्र, भावार्थ और
    शब्दों के अर्थ के साथ दिया गया है।

  2. बाद में, संस्कृत शब्दों को,
    पढ़ने में सरल, इस फॉर्मेट में दिया है।

  3. फिर स्तोत्र, सिर्फ संस्कृत में और

  4. अंत में शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र,
    सिर्फ हिंदी में दिया गया है।

1. शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र – भावार्थ और शब्दों का अर्थ

1.

प्रातः स्मरामि
भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं
वृषभवाहनमम्बिकेशम्।

खट्वाङ्गशूल
वरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्॥

भावार्थ –

  • जो सांसारिक भय को हरने वाले हैं और
  • देवताओं के स्वामी हैं,
  • जो गंगा जी को धारण करते हैं,
  • जिनका वृषभ वाहन है,
  • जो अम्बिका के ईश हैं।
  • जिनके हाथ में खट्वांग (खटवांग), त्रिशूल और
  • वरद अभय मुद्रा है,
  • उन संसार रोग को हरने के निमित्त,
  • अद्वितीय औषध रुप,
  • ईश महादेव जी को,
  • मैं प्रणाम करता हूं।
  • वरद अर्थात
    • आशीर्वाद देने की मुद्रा
    • वर देने वाले, वरदाता
    • आशीर्वाद, कृपा, वरदान
  • खट्वांग, खटवांग अर्थात
    • शिव के हाथ का एक आयुध, अस्त्र।

शब्दों का अर्थ –

  • प्रातः स्मरामि – मै प्रात:काल नमस्कार करता हूं
  • भव भीति हरं – जो सांसारिक भय को हरने वाले हैं
  • सुरेशं – देवताओं के स्वामी हैं,
  • गङ्गा धरं – जो गंगा जी को धारण करते हैं,
  • वृषभ वाहनम् – जिनका वृषभ वाहन है,
  • अम्बिकेशम् – जो अम्बिका के ईश हैं।
  • खट्वाङ्ग शूल – जिनके हाथ में खट्वांग (खटवांग), त्रिशूल
  • वरदाभय हस्तमीशं – आशीर्वाद देने की हाथों की मुद्रा
  • संसार रोग हरम् – उन संसार रोग को हरने के निमित्त
  • औषधम्-अद्वितीयम् – अद्वितीय और औषध रुप,
  • ईश महादेव जी को, मैं प्रणाम करता हूं।
  • वरद अर्थात – आशीर्वाद देने की मुद्रा
  • खट्वांग, खटवांग अर्थात – शिव के हाथ का एक अस्त्र।

2.

प्रातर्नमामि गिरिशं
गिरिजार्धदेहं
सर्गस्थिति
प्रलयकारणमादिदेवम्।

विश्वेश्वरं
विजितविश्वमनोभिरामं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्॥

भावार्थ –

  • भगवती पार्वती जिनका आधा अंग है,
    • भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप
    • शिव और पार्वती
  • जो संसार की सृष्टि, स्थिति और
  • प्रलय के कारण हैं,
  • आदिदेव है,
  • विश्वनाथ है,
  • विश्व विजयी और मनोहर है,
  • सांसारिक रोग को नष्ट करने के लिए,
  • अद्वितीय और
  • औषध रूप,
  • उन गिरीश अर्थात शिवजी को,
  • मै प्रात:काल नमस्कार करता हूं

शब्दों का अर्थ –

  • प्रातर्नमामि – मै प्रात:काल नमस्कार करता हूं
  • गिरिशं – भगवान् शिव को
  • गिरिजार्धदेहं – अर्धनारीश्वर रूप
    • भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप
    • शिव और पार्वती
  • सर्ग स्थिति – जो संसार की सृष्टि, स्थिति और
  • प्रलय कारणम् – प्रलय के कारण हैं
  • आदिदेवम् – आदिदेव है
  • विश्वेश्वरं – विश्वनाथ है,
  • विजित विश्व – विश्व विजयी और
  • मनोभिरामं –  मनोहर है,
  • संसार रोग हरम् – सांसारिक रोग को नष्ट करने के लिए,
  • औषधम्-अद्वितीयम् – अद्वितीय औषध रुप,
  • उन गिरीश अर्थात शिवजी को,
  • मै प्रात:काल नमस्कार करता हूं

3.

प्रातर्भजामि
शिवमेकमनन्तमाद्यं
वेदान्तवेद्यमनघं
पुरुषं महान्तम्।

नामादिभेदरहितं
षड्भावशून्यं
(या विकारशून्यं)
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्॥

भावार्थ –

  • जो अंत से रहित,
  • आदिदेव है,
  • वेदांत से जानने योग्य,
  • पाप रहित एवं महान पुरुष है
  • तथा
  • जो नाम आदि भेदों से रहित,
  • विकारों से शुन्य, अर्थात विकारों रहित,
  • संसार रोगके हरने के निमित्त,
  • अद्वितीय औषध है,
  • उन एक शिव जी को मैं प्रात:काल भजता हूँ

शब्दों का अर्थ –

  • प्रातर्भजामि – मैं प्रात:काल भजता हूँ
  • शिवमेकम् अनन्तम् आद्यं – शिवजी को, जो अंत से रहित,
  • वेदान्त वेद्य मनघं – वेदांत से जानने योग्य,
  • पुरुषं महान्तम् – पाप रहित एवं महान पुरुष है
  • नामादिभेदरहितं – जो नाम आदि भेदों से रहित,
  • षड्भावशून्यं (या विकारशून्यं) – विकारों से शुन्य,
    • अर्थात विकारों से रहित है,
  • संसाररोग हरम् – सांसारिक रोग को नष्ट करने के लिए,
  • औषधम्-अद्वितीयम् – अद्वितीय औषध रुप,
  • उन एक शिव जी को,
  • मैं प्रात:काल भजता हूँ

2. स्तोत्र – पढ़ने के लिए सरल, संस्कृत शब्द

1.

प्रातः स्मरामि
भवभीति हरं सुरेशं
गंगा-धरं
वृषभ वाहनम् अम्बिकेशम्।

खटवांग शूल
वरदा भय हस्तम् ईशं
संसार रोग हरम् औषधम् अद्वितीयम्॥


2.

प्रातर् नमामि गिरिशं
गिरिजा अर्ध देहं
सर्ग स्थिति
प्रलय कारणम् आदि देवम्।

विश्वेश्वरं
विजित विश्व मनोभिरामं
संसार रोग हरम् औषधम् अद्वितीयम्॥


3.

प्रातर् भजामि
शिवम् एकम् अनन्तम् आद्यं
वेदान्त वेद्य मनघं
पुरुषं महान्तम्।

नाम् आदि भेद रहितं
षण भाव शून्यं
संसार रोग हरम् औषधम् अद्वितीयम्॥


3. शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र – सिर्फ संस्कृत में

1.

प्रातः स्मरामि
भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं
वृषभवाहनमम्बिकेशम्।

खट्वाङ्गशूल
वरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्॥


2.

प्रातर्नमामि गिरिशं
गिरिजार्धदेहं
सर्गस्थिति
प्रलयकारणमादिदेवम्।

विश्वेश्वरं
विजितविश्वमनोभिरामं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्॥


3.

प्रातर्भजामि
शिवमेकमनन्तमाद्यं
वेदान्तवेद्यमनघं
पुरुषं महान्तम्।

नामादिभेदरहितं
षड्भावशून्यं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्॥


4. शिव प्रातः स्मरण स्तोत्र – सिर्फ हिंदी में

1.

  • जो सांसारिक भय को हरने वाले हैं और
  • देवताओं के स्वामी हैं।
  • जो गंगा जी को धारण करते हैं,
  • जिनका वृषभ वाहन है, और
  • जो अम्बिका के ईश हैं।
  • जिनके हाथ में खट्वांग (खटवांग), त्रिशूल और
  • वरद अभय मुद्रा है।
    • अर्थात वर, आशीर्वाद की हाथों की मुद्रा
  • उन संसार रोग को हरने वाले,
  • अद्वितीय औषध रुप,
  • भगवान शिव को,
  • मैं प्रणाम करता हूं।

2.

  • अर्धनारीश्वर स्वरुप अर्थात
  • भगवती पार्वती जिनका आधा अंग है,
  • जो संसार की सृष्टि, स्थिति और
  • प्रलय के कारण हैं और
  • आदिदेव है।
  • विश्वनाथ है,
  • विश्व विजयी और मनोहर है।
  • सांसारिक रोगों को नष्ट करने के लिए,
  • अद्वितीय और
  • औषध रूप,
  • उन गिरीश अर्थात शिवजी को,
  • मै प्रात:काल नमस्कार करता हूं।

2.

  • जो अंत से रहित,
  • आदिदेव है।
  • वेदांत से जानने योग्य,
  • पाप रहित एवं महान पुरुष है।
  • तथा, जो नाम आदि भेदों से रहित,
  • विकारों से शुन्य, अर्थात विकारों रहित है।
  • और संसार रोगके हरने के निमित्त,
  • अद्वितीय औषध है,
  • उन शिव जी को मैं प्रात:काल भजता हूँ।

Shiv Stotra

Stotra

Shiva Pratah Smarana Stotra
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Stotra

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ सहित – नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय

Shiv Panchakshar Stotra Meaning in Hindi

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का महत्व

  • पंचाक्षर अर्थात
  • पांच अक्षर – न, म, शि, वा और य
  • श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र के,
  • पाँचों श्लोकों में,
  • क्रमशः न, म, शि, वा और य है।
  • न, म, शि, वा और य
  • अर्थात् नम: शिवाय
  • इसलिए,
  • यह पंचाक्षर स्तोत्र शिवस्वरूप है।

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – भावार्थ और शब्दों का अर्थ

1. नमः शिवाय का पहिला अक्षर “न”

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • जिनके कंठ मे साँपोंका हार है,
  • जिनके तीन नेत्र हैं,
  • भस्म ही जिनका अंगराग है (अनुलेपन) है,
  • दिशाँए ही जिनके वस्त्र हैं,
  • उन अविनाशी महेश्वर “न” कार स्वरूप शिवको,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • नागेंद्रहाराय – हे शंकर, आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं
  • त्रिलोचनाय – हे तीन नेत्रों वाले (त्रिलोचन)
  • भस्मांग रागाय – आप भस्म से अलंकृत है
  • महेश्वराय – महेश्वर है
  • नित्याय – नित्य (अनादि एवं अनंत) है और
  • शुद्धाय – शुद्ध हैं
  • दिगंबराय – अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिगम्बर
  • तस्मै न काराय – आपके “न” अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव, नमस्कार है

2. नमः शिवाय का दुसरा अक्षर “म”

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय
नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • गंगाजल और चन्दन से जिनकी अर्चा अर्थात पूजा हुई है,
  • मन्दार पुष्प तथा अन्यान्य पुष्पों से जिनकी सुंदर पूजा हुई है,
  • उन नन्दी के अधिपति और प्रमथगणों के स्वामी,
  • महेश्वर “म”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • मंदाकिनी सलिल – गंगा की धारा द्वारा शोभायमान
  • चंदन चर्चिताय – चन्दन से अलंकृत एवं
  • नंदीश्वर प्रमथनाथ – नन्दीश्वर एवं प्रमथ के स्वामी
  • महेश्वराय – महेश्वर
    • प्रमथ अर्थात
    • शिव के गण अथवा पारिषद
  • मंदारपुष्प – आप सदा मन्दार पर्वत से प्राप्त पुष्पों एवं
  • बहुपुष्प – बहुत से अन्य स्रोतों से प्राप्त पुष्पों द्वारा
  • सुपूजिताय – पुजित है
  • तस्मै म काराय – हे “म” अक्षर धारी
  • नमः शिवाय – शिव आपको नमन है

3. नमः शिवाय का तीसरा अक्षर “शि”

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय
तस्मै शि काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • जो कल्याण स्वरूप हैं,
  • पार्वती जी के मुख कमल को विकसित (प्रसन्न) करने के लिये,
    • जो सूर्य स्वरूप हैं,
  • जो राजा दक्ष के यज्ञका नाश करने वाले हैं,
  • जिनकी ध्वजा मे बैलका चिन्ह है,
  • उन शोभाशाली,
  • श्री नीलकण्ठ “शि”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • शिवाय – हे शिव,
  • गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय – माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य समान तेज प्रदान करने वाले,
  • दक्षाध्वरनाशकाय – आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था
  • श्री नीलकंठाय – नीलकण्ठ
  • वृषभद्धजाय – हे धर्म ध्वज धारी
  • तस्मै शि काराय – आपके “शि” अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव, नमस्कार है

4. नमः शिवाय का चौथा अक्षर “वा”

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य
मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • वसिष्ठ, अगस्त्य, और गौतम आदि श्रेष्ठ ऋषि मुनियोंने तथा
  • इन्द्र आदि देवताओंने जिन देवाधिदेव, शंकरजी की पूजा की है।
  • चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र है,
  • उन “व”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य – वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि
  • मुनींद्र देवार्चित शेखराय – मुनियों द्वारा एवं देवगणो द्वारा पुजित देवाधिदेव
  • चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय – आपके सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि, तीन नेत्र समान हैं
  • तस्मै व काराय – आपके “व” अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव नमस्कार है

5. नमः शिवाय का पांचवां अक्षर “य”

यक्षस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगंबराय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • जिन्होंने यक्षरूप धारण किया है,
  • जो जटाधारी हैं,
  • जिनके हाथ मे पिनाक (धनुष) है,
  • जो दिव्य सनातन पुरुष हैं,
  • उन दिगम्बर देव “य”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • यक्षस्वरूपाय – हे यज्ञ स्वरूप,
  • जटाधराय – जटाधारी शिव
  • पिनाकहस्ताय – पिनाक को धारण करने वाले
    • पिनाक अर्थात
    • शिव का धनुष
  • सनातनाय – आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन है
  • दिव्याय देवाय दिगंबराय – हे दिव्य अम्बर धारी शिव
  • तस्मै य काराय – आपके “य” अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव, नमस्कार है

पंचाक्षर मंत्र के पाठ का लाभ

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः
पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥

भावार्थ:

  • जो शिवके समीप,
  • इस पवित्र पंचाक्षर मंत्र का पाठ करता है,
  • वह शिवलोकको प्राप्त होता है और
  • वहा शिवजी के साथ आनन्दित होता है।

शब्दों का अर्थ –

  • पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः – जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का
  • पठेत् शिव सन्निधौ – नित्य ध्यान करता है
  • शिवलोकमवाप्नोति – वह शिव के पुण्य लोक को प्राप्त करता है
  • शिवेन सह मोदते – तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है

॥इति श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय
तस्मै न काराय नमः शिवायः॥

मंदाकिनी सलिल
चंदन चर्चिताय
नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय
तस्मै म काराय नमः शिवायः॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय
तस्मै शि काराय नमः शिवायः॥

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य
मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय
तस्मै व काराय नमः शिवायः॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगंबराय
तस्मै य काराय नमः शिवायः॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः
पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥

॥इति श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

Shiv Stotra

Stotra

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ सहित – नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय
Categories
Stotra

श्री शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र – अर्थ सहित – नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

Shiv Rudrashtakam Stotra Meaning in Hindi

तुलसीदास कृत शिव रूद्राष्टक स्तोत्र

  • रुद्राष्टकम अर्थात
    • रुद्र + अष्टक
  • रुद्र अर्थात भगवान शिव
  • अष्टक अर्थात आठ श्लोकों का समूह
  • इसलिए, रुद्राष्टकम स्तोत्र यानी
  • भगवान रुद्र अर्थात शंकरजी की,
  • स्तुति के लिए, आठ श्लोक।
  • तुलसीदासजी ने,
  • भगवान् शिव की स्तुति के लिए,
  • इस स्तोत्र की रचना की थी।
  • गोस्वामी तुलसीदासजी के,
  • श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में,
  • रुद्राष्टकम स्तोत्र का,
  • उल्लेख आता है।

रुद्राष्टकम स्तोत्र पढ़ने का लाभ

  • रुद्राष्टकम स्तोत्र में,
  • शिवजी के रूप, गुण और
  • कार्यों का वर्णन किया हुआ है।
  • जो मनुष्य,
  • रुद्राष्टकम स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं,
  • भोलेनाथ उन से प्रसन्न होते हैं।
  • उस मनुष्य के दुःख दूर हो जाते है, और
  • जीवन में सुख शांति आती है।

रुद्राष्टकम स्तोत्र – अर्थसहित

1.

मोक्षस्वरुप, आकाशरूप, सर्व्यवापी शिवजी को प्रणाम

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥1॥

भावार्थ:

  • हे मोक्षस्वरुप,
  • सर्व्यवापी,
  • ब्रह्म और वेदस्वरूप,
  • ईशान दिशाके ईश्वर तथा
  • सबके स्वामी श्री शिवजी,
  • मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
  • निजस्वरुप में स्थित
    • अर्थात माया आदि से रहित,
  • गुणों से रहित,
  • भेद रहित,
  • इच्छा रहित,
  • चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दीगम्बर
    • अर्थात आकाश को भी आच्छादित करने वाले,
  • आपको में भजता हूँ ॥१॥

शब्दों का अर्थ –

  • नमामीशम् – श्री शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूँ जो
  • ईशान – ईशान दिशाके ईश्वर
  • निर्वाणरूपं – मोक्षस्वरुप
  • विभुं व्यापकं – सर्व्यवापी
  • ब्रह्मवेदस्वरूपम् – ब्रह्म और वेदस्वरूप है
  • निजं – निजस्वरुप में स्थित (अर्थात माया आदि से रहित)
  • निर्गुणं – गुणों से रहित
  • निर्विकल्पं – भेद रहित
  • निरीहं – इच्छा रहित
  • चिदाकाशम् – चेतन आकाशरूप एवं
  • आकाशवासं – आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले
    • अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले)
  • भजेहम् – हे शिव, आपको में भजता हूँ

2.

ॐ कार शब्द के मूल, निराकार, महाकाल कैलाशपति को नमस्कार

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्॥2॥

भावार्थ:

  • निराकार,
  • ओंकार के मूल,
  • तुरीय अर्थात
    • तीनों गुणों से अतीत,
  • वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से पर,
  • कैलाशपति,
  • विकराल, महाकाल के काल,
  • कृपालु, गुणों के धाम,
  • संसार से परे,
  • आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥

शब्दों का अर्थ –

  • निराकार – निराकार स्वरुप
  • ओमङ्कारमूलं – ओंकार के मूल
  • तुरीयं – तीनों गुणों से अतीत
  • गिराज्ञान गोतीतमीशं – वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे
  • गिरीशम् – कैलाशपति
  • करालं – विकराल
  • महाकालकालं – महाकाल के काल
  • कृपालं – कृपालु
  • गुणागार – गुणों के धाम
  • संसारपारं – संसार से परे
  • नतोहम् – परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ

3.

सिरपर गंगाजी, ललाटपर चन्द्रमा, गले में सर्पों की माला

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥3॥

भावार्थ:

  • जो हिमाचल के समान,
    • गौरवर्ण तथा गंभीर हैं,
  • जिनके शरीर में,
    • करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है,
  • जिनके सिरपर,
    • सुन्दर गंगा जी नदी विराजमान हैं,
  • जिनके ललाटपर,
    • द्वितीय का चन्द्रमा और
  • गले में,
    • सर्प सुशोभित हैं ॥३॥

शब्दों का अर्थ –

  • तुषाराद्रिसंकाश – जो हिमाचल के समान
  • गौरं गभिरं – गौरवर्ण तथा गंभीर हैं
  • मनोभूत कोटि प्रभा – करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है
  • श्री शरीरम् – जिनके श्री शरीर में
  • स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
  • जिनके सिरपर,
  • सुन्दर नदी गंगा जी विराजमान हैं
  • लसद्भालबालेन्दु – जिनके ललाटपर द्वितीय का चन्द्रमा और
  • कण्ठे भुजङ्गा – गले में सर्प सुशोभित हैं

4.

नीलकंठ, प्रसन्नमुख, दयालु, सबके नाथ, शिवजी को प्रणाम

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥4॥

भावार्थ:

  • जिनके कानों में,
    • कुण्डल हिल रहे हैं,
  • सुन्दर भ्रुकुटी और
  • विशाल नेत्र हैं,
  • जो प्रसन्नमुख,
  • नीलकंठ और
  • दयालु हैं,
  • सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और
  • मुण्डमाला पहने हैं,
  • सबके प्यारे और सबके नाथ,
    • कल्याण करने वाले,
  • श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ ॥४॥

शब्दों का अर्थ –

  • चलत्कुण्डलं – जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं
  • भ्रूसुनेत्रं विशालं – सुन्दर भृकुटि और विशाल नेत्र हैं
  • प्रसन्नाननं – जो प्रसन्नमुख
  • नीलकण्ठं – नीलकंठ और
  • दयालम् – दयालु हैं
  • मृगाधीशचर्माम्बरं – सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और
  • मुण्डमालं – मुण्डमाला पहने हैं
  • प्रियं शङ्करं – उन सबके प्यारे और
  • सर्वनाथं – सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकर जी को
  • भजामि – मैं भजता हूँ

5.

अखंड, तेजस्वी, हाथ में त्रिशूलधारी, भवानीपति शिवजी को प्रणाम

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥5॥

भावार्थ:

  • प्रचंड (रुद्ररूप) श्रेष्ठ,
  • तेजस्वी, परमेश्वर,
  • अखंड, अजन्मा,
  • करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले,
  • तीनों प्रकार के शूलों (दुखों) को निर्मूल करने वाले,
  • हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए,
  • भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले,
  • भवानी के पति,
  • श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ ॥५॥

शब्दों का अर्थ –

  • प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
  • प्रचंड (रुद्ररूप) श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर
  • अखण्डं – अखंड
  • अजं – अजन्मा
  • भानुकोटिप्रकाशं – करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले
  • त्र्यःशूलनिर्मूलनं – तीनों प्रकार के शूलों (दुखों) को निर्मूल करने वाले
  • शूलपाणिं – हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए
  • भजेहं – मैं भजता हूँ
  • भवानीपतिं – भवानी के पति श्री शंकर
  • भावगम्यम् – भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले

6.

कल्याण स्वरुप, दु:ख हरने वाले, भोलेनाथ को नमस्कार

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

भावार्थ:

  • कलाओं से परे,
  • कल्याण स्वरुप,
  • कल्पका अंत (प्रलय) करने वाले,
  • सज्जनों को सदा आनंद देने वाले,
  • त्रिपुर के शत्रु,
  • सच्चिदानन्दघन,
  • मोहको हराने वाले,
  • मनको मथ डालने वाले,
  • कामदेव के शत्रु,
  • हे प्रभु, प्रसन्न होइये ॥६॥

शब्दों का अर्थ –

  • कलातीत – कलाओं से परे
  • कल्याण – कल्याण स्वरुप
  • कल्पान्तकारी – कल्पका अंत (प्रलय) करने वाले
  • सदा सज्जनानन्ददाता – सज्जनों को सदा आनंद देने वाले
  • पुरारी – त्रिपुर के शत्रु
  • चिदानन्दसंदोह – सच्चिदानन्दघन
  • मोहापहारी – मोहको हराने वाले
  • प्रसीद प्रसीद प्रभो – कामदेव के शत्रु, हे प्रभु, प्रसन्न होइये
  • मन्मथारी – मनको मथ डालने वाले

7.

दु:खों से मुक्ति और सुख, शांति के लिए, शंकरजी के चरणों में प्रणाम

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

भावार्थ:

  • जबतक,
  • पार्वती के पति (शंकरजी),
  • आपके चरणकमलों को,
  • मनुष्य नहीं भजते,
  • तबतक,
  • उन्हें न तो इसलोक ओर परलोक में,
  • सुख-शान्ति मिलती है और
  • न उनके तापों का नाश होता है।
  • अत: हे समस्त जीवों के अन्दर (हृदय में),
  • निवास करनेवाले प्रभो,
  • प्रसन्न होइये ॥७॥

शब्दों का अर्थ –

  • न यावद् उमानाथपादारविन्दं – जबतक पार्वती के पति (शिवजी) आपके चरणकमलों को
  • भजन्तीह – मनुष्य नहीं भजते
  • लोके परे वा नराणाम् – तब तक उन्हें इसलोक में या परलोक में
  • न तावत्सुखं शान्ति – न सुख-शान्ति मिलती है और
  • सन्तापनाशं – न उनके तापों का अर्थात दुःखो का नाश होता है
  • प्रसीद प्रभो – प्रभो। प्रसन्न होइये
  • सर्वभूताधिवासं – समस्त जीवों के अन्दर (हृदय में) निवास करनेवाले

8.

हे शंकर, हे शम्भो, मेरी रक्षा कीजिये

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥

भावार्थ:

  • मैं न तो योग जानता हूँ,
  • न जप और पूजा ही।
  • हे शम्भो,
  • मैं तो सदा-सर्वदा,
  • आपको ही नमस्कार करता हूँ।
  • हे प्रभु,
  • बुढापा तथा जन्म और मृत्यु के,
    • दुःख समूहों से जलते हुए,
  • मुझ दुखी की दुःख में रक्षा कीजिये।
  • हे ईश्वर, हे शम्भो,
  • मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥८॥

शब्दों का अर्थ –

  • न जानामि योगं – मैं न तो योग जानता हूँ
  • जपं नैव पूजां – न जप और पूजा ही
  • नतोहं सदा सर्वदा – मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार
  • शम्भुतुभ्यम् – हे शम्भो।
  • जराजन्मदुःखौघ – बुढापा (जरा), जन्म-मृत्यु के दुःख समूहों से
  • तातप्यमानं – जलते हुए मुझ दुखी की दुःख में रक्षा कीजिये
  • प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो – हे प्रभु, हे ईश्वर, हे शम्भो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ

श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥1॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्॥2॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥5॥

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥


स्तोत्र – अर्थसहित – लिस्ट


भगवान शंकर

भगवान शंकर की आराधना करने से, दु:ख दूर होते है और व्यक्ति का मन भी शांत और संतुलित रहता है। भगवान् शिव को महादेव भी कहते है, अर्थात सबसे बड़े भगवान। सोमवार, भगवान शिव की पूजा के लिए, शुभ दिन माना जाता है।

Shiv Stotra

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Shiv Rudrashtakam Stotra Arth Sahit - Meaning in Hindi
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Stotra

ज्योतिर्लिंग स्तोत्र – अर्थसहित

बारह ज्योतिर्लिंग के नाम

1.

सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, अमलेश्वर

सौराष्ट्रे सोमनाथं च
श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालं
ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥

  • सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में
    • श्री सोमनाथ,
  • श्रीशैल पर
    • श्री मल्लिकार्जुन,
  • उज्जयिनी में
    • श्री महाकाल,
  • ओंकारेश्वर में
    • अमलेश्वर (अमरेश्वर)

2.

भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वेशं

परल्यां वैद्यनाथं च
डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं
नागेशं दारुकावने॥

  • परली में
    • वैद्यनाथ,
  • डाकिनी नामक स्थान में
    • श्रीभीमशंकर,
  • सेतुबंध पर
    • श्री रामेश्वर,
  • दारुकावन में
    • श्रीनागेश्वर

3.

विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर

वाराणस्यां तु विश्वेशं
त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं
घुश्मेशं च शिवालये॥

  • वाराणसी (काशी) में
    • श्री विश्वनाथ,
  • गौतमी (गोदावरी) के तट पर
    • श्री त्र्यम्बकेश्वर,
  • हिमालय पर
    • श्रीकेदारनाथ और
  • शिवालय में
    • श्री घृष्णेश्वर,
  • को स्मरण करें।

ज्योतिर्लिंग स्तोत्र और बारह ज्योतिर्लिंग नाम के पाठ का महत्व

4.

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि
सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं
स्मरणेन विनश्यति॥

  • जो मनुष्य,
  • प्रतिदिन,
  • प्रातःकाल और संध्या समय,
  • इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है,
  • उसके सात जन्मों के पाप,
  • इन लिंगों के स्मरण-मात्र से,
  • मिट जाते है।

एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।
कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥

Shiv Stotra

Stotra

Jyotirlinga Stotra - Arth Sahit- Meaning in Hindi
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Stotra

शिव मानस पूजा स्तोत्र – अर्थसहित

Shiv Manas Puja – Meaning in Hindi

मनके द्वारा भगवान् शिव की पूजा

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः
स्नानं च दिव्याम्बरं,
नानारत्नविभूषितं मृगमदा
मोदाङ्कितं चन्दनम्।

जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं
पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते
हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥

भावार्थ:

  • हे देव, हे दयानिधे, हे पशुपते, यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्ना से विभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरि आदि गन्ध से समन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप – यह सब मानसिक [पूजोपहार] ग्रहण कीजिये।

शब्दों का अर्थ –

  • रत्नैः कल्पितम-आसनं – यह रत्ननिर्मित सिंहासन,
  • हिमजलैः स्नानं – शीतल जल से स्नान,
  • च दिव्याम्बरं – तथा दिव्य वस्त्र,
  • नानारत्नविभूषितं – अनेक प्रकार के रत्नों से विभूषित,
  • मृगमदा मोदाङ्कितं चन्दनम् – कस्तूरि गन्ध समन्वित चन्दन,
  • जाती-चम्पक – जूही, चम्पा और
  • बिल्वपत्र-रचितं पुष्पं – बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि
  • च धूपं तथा दीपं – तथा धूप और दीप
  • देव दयानिधे पशुपते – हे देव, हे दयानिधे, हे पशुपते,
  • हृत्कल्पितं गृह्यताम् – यह सब मानसिक (मनके द्वारा) पूजोपहार ग्रहण कीजिये

सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते
पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं
रम्भाफलं पानकम्।

शाकानामयुतं जलं रुचिकरं
कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं
भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥

भावार्थ:

  • मैंने नवीन रत्नखण्डोंसे जड़ित सुवर्णपात्र में घृतयुक्त खीर, दूध और दधिसहित पांच प्रकार का व्यंजन, कदलीफल, शरबत, अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल तथा ताम्बूल – ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं। हे प्रभो, कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये।

शब्दों का अर्थ –

  • सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते पात्रे – नवीन रत्नखण्डोंसे जडित सुवर्णपात्र में
  • घृतं पायसं – घृतयुक्त खीर, (घृत – घी)
  • भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं – दूध और दधिसहित पांच प्रकार का व्यंजन,
  • रम्भाफलं पानकम् – कदलीफल, शरबत,
  • शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं – अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल
  • ताम्बूलं – तथा ताम्बूल (पान)
  • मनसा मया विरचितं – ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं
  • भक्त्या प्रभो स्वीकुरु – हे प्रभो, कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं
चादर्शकं निर्मलम्
वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला
गीतं च नृत्यं तथा।

साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा
ह्येतत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो
पूजां गृहाण प्रभो॥

भावार्थ:

  • छत्र, दो चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी के वाद्य, गान और नृत्य, साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति – ये सब मैं संकल्पसे ही आपको समर्पण करता हूँ। हे प्रभु, मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये।

शब्दों का अर्थ –

  • छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं – छत्र, दो चँवर, पंखा,
  • चादर्शकं निर्मलम् – निर्मल दर्पण,
  • वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला – वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी के वाद्य,
  • गीतं च नृत्यं तथा – गान और नृत्य तथा
  • साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा – साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति
  • ह्येतत्समस्तं मया संकल्पेन – ये सब मैं संकल्पसे ही
  • समर्पितं तव विभो – आपको समर्पण करता हूँ
  • पूजां गृहाण प्रभो – हे प्रभो, मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः
प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग-रचना
निद्रा समाधि-स्थितिः।

सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः
स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं
शम्भो तवाराधनम्॥

भावार्थ:

  • हे शम्भो, मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मन्दिर है, सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं। इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है।

शब्दों का अर्थ –

  • आत्मा त्वं – मेरी आत्मा तुम हो,
  • गिरिजा मतिः – बुद्धि पार्वतीजी हैं,
  • सहचराः प्राणाः – प्राण आपके गण हैं,
  • शरीरं गृहं – शरीर आपका मन्दिर है
  • पूजा ते विषयोपभोग-रचना – सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है,
  • निद्रा समाधि-स्थितिः – निद्रा समाधि है,
  • सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः – मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा
  • स्तोत्राणि सर्वा गिरो – सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं
  • यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं – इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ,
  • शम्भो तवाराधनम् – हे शम्भो, वह सब आपकी आराधना ही है

कर-चरण-कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा
श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥

भावार्थ:

  • हाथोंसे, पैरोंसे, वाणीसे, शरीरसे, कर्मसे, कर्णोंसे, नेत्रोंसे अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको हे करुणासागर महादेव शम्भो। आप क्षमा कीजिये। हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो।

शब्दों का अर्थ –

  • कर-चरण-कृतं वाक् – हाथोंसे, पैरोंसे, वाणीसे,
  • कायजं कर्मजं वा – शरीरसे, कर्मसे,
  • श्रवण-नयनजं वा – कर्णोंसे, नेत्रोंसे अथवा
  • मानसं वापराधम् – मनसे भी जो अपराध किये हों,
  • विहितमविहितं वा – वे विहित हों अथवा अविहित,
  • सर्वमेतत्-क्षमस्व – उन सबको हे शम्भो आप क्षमा कीजिये
  • जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो – हे करुणासागर, हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो

स्तोत्र – लिस्ट

Shiv Stotra

Stotra

शिव मानस पूजा स्तोत्र – अर्थसहित
Categories
Stotra

शिव ताण्डव स्तोत्र – अर्थसहित

॥शिव ताण्डव स्तोत्रम्॥

1.

जटाटवी गल ज्जल
प्रवाह पावित स्थले
गलेऽव लम्ब्य लम्बितां
भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्।

डमड्डम ड्डमड्डम
निनाद वड्डमर्वयं
चकार चण्ड ताण्डवं
तनोतु नः शिवः शिवम्॥

  • जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धाराएं,
  • उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं,
    • प्रक्षालित अर्थात
    • शुद्ध किया हुआ, साफ किया हुआ,
    • धोया हुआ, धुला हुआ
  • जिनके गले में,
  • बडे एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा
  • जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर,
  • प्रचण्ड ताण्डव करते हैं,
  • वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

2.

जटा कटाह सम्भ्रम
भ्रम न्निलिम्प निर्झरी
विलोल वीचि वल्लरी
विराज मान मूर्धनि।

धगद् धगद् धग
ज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके
(धगद्धगद्धगज्ज्वललललाटपट्टपावके)
किशोर चन्द्र शेखरे
रतिः प्रतिक्षणं मम॥

  • जिन शिव जी के जटाओं में,
  • अतिवेग से विलास पुर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे,
  • उनके शिश पर लहरा रहीं हैं,
  • जिनके मस्तक पर,
  • अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें,
  • धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं,
  • उन बाल चंद्रमा से विभूषित,
  • शिवजी में,
  • मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।
    • शिवजी में मेरी भक्ति,
    • प्रतिक्षण बढ़ती रहे।

3.

धरा धरेन्द्र नंदिनी
विलास बन्धु बन्धुर
स्फुरद्दिगन्त सन्तति
प्रमोद मान मानसे।

कृपा कटाक्ष धोरणी
निरुद्ध दुर्ध रापदि
क्वचिद् दिगम्बरे
(क्वचिद्दिगम्बरे)
मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

  • जो पर्वतराजसुता (पार्वतीजी) के,
  • विलासमय रमणिय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं,
  • जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं
  • प्राणीगण वास करते हैं, तथा
  • जिनके कृपादृष्टि मात्र से,
  • भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं,
  • ऐसे दिगम्बर शिवजी की आराधना से,
  • मेरा चित्त सर्वदा आन्दित रहे।
    • दिगंबर अर्थात
    • आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले

4.

जटा भुजंग पिंगल
स्फुरत्फणा मणिप्रभा
कदम्ब कुंकुम द्रव
प्रलिप्त दिग्व धूमुखे।

मदान्ध सिन्धुरस् फुरत्
त्वगुत्तरीयमे दुरे
(मदान्ध सिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे)
मनो विनोद मद्भुतं
बिभर्तु भूतभर्तरि॥

  • जिनके जटाओं में,
  • लिपटे सर्पों के फण की मणियों के प्रकाश,
  • पीले वर्ण प्रभा-समुहरूप केसर के कातिं से,
  • दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और
  • जो गजचर्म से विभुषित हैं
  • मैं उन शिवजी की भक्ति में आन्दित रहूँ जो
  • सभी प्राणियों की के आधार एवं रक्षक हैं,

5.

सहस्र लोचन
प्रभृत्य शेष लेख शेखर
प्रसून धूलि धोरणी
विधू सरांघ्रि पीठभूः।

भुजङ्ग राज मालया
निबद्ध जाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां
चकोर बन्धुशेखरः॥

  • जिन शिव जी का चरण,
  • इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों के धूल से रंजित हैं
    • (जिन्हे देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पन करते हैं),
  • जिनकी जटा पर,
  • लाल सर्प विराजमान है,
  • वो चन्द्रशेखर,
  • हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

6.

ललाट चत्वर ज्वलद्
धनञ्जय स्फुलिङ्गभा
निपीत पञ्च सायकं
नमन्नि लिम्प नायकम्।

सुधा मयूख लेखया
विराजमान शेखरं
महाकपालि सम्पदे
शिरोजटालमस्तु नः॥

  • जिन शिव जी ने,
  • इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए,
  • कामदेव को,
  • अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से,
  • भस्म कर दिया, तथा
  • जो सभि देवों द्वारा पुज्य हैं, तथा
  • चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं,
  • वे मुझे सिद्दी प्रदान करें।

7.

कराल भाल पट्टिका
धगद् धगद् धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुती कृत
प्रचण्ड पञ्च सायके।

धरा धरेन्द्र नन्दिनी
कुचाग्र चित्रपत्रक
प्रकल्प नैक शिल्पिनि
त्रिलोचने रतिर्मम॥

  • जिनके मस्तक से,
  • धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने,
  • कामदेव को भस्म कर दिया तथा
  • जो शिव,
  • प्रकृति पर चित्रकारी करने में अति चतुर है,
  • उन शिव जी में,
  • मेरी प्रीति अटल हो।

8.

नवीन मेघ मण्डली
निरुद्ध दुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथि नीतमः
प्रबन्ध बद्ध कन्धरः।

निलिम्प निर्झरी
धरस्तनोतु कृत्ति सिन्धुरः
कलानिधान बन्धुरः
श्रियं जगद्धुरंधरः॥

  • जिनका कण्ठ,
  • नवीन मेंघों की घटाओं से,
  • परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के सामान काला है,
  • जो कि गज-चर्म, गंगा एवं
  • बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा
  • जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं,
  • वे शिवजी,
  • हमे सभी प्रकार की सम्पनता प्रदान करें।

9.

प्रफुल्ल नील पङ्कज
प्रपञ्च कालिमप्रभा
वलम्बि कण्ठ कन्दली
रुचि प्रबद्ध कन्धरम्।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं
भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांध कच्छिदं
तमन्त कच्छिदं भजे॥

  • जिनका कण्ठ और कन्धा,
  • पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई,
  • सुन्दर श्याम प्रभा से विभुषित है,
  • जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक,
  • संसार के दु:खो को काटने वाले,
  • दक्षयज्ञ विनाशक,
  • गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा
  • जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं,
  • मैं उन शिवजी को भजता हूँ

10.

अखर्व सर्व मङ्गला
कला कदम्ब मञ्जरी
रस प्रवाह माधुरी
विजृम्भणा मधुव्रतम्।

स्मरान्तकं पुरान्तकं
भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त कान्ध कान्तकं
तमन्त कान्तकं भजे॥

  • जो कल्यानमय, अविनाशि,
  • समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं,
  • जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं,
  • त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के सहांरक,
  • दक्षयज्ञविध्वसंक तथा
  • स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं,
  • मैं उन शिवजी को भजता हूँ।

11.

जयत् वद भ्रविभ्रम
भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस
(जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस)
द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत्
कराल भाल हव्यवाट्
(द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्)।

धिमि द्धिमि द्धिमि ध्वनन्
मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल
ध्वनि क्रम प्रवर्तित
प्रचण्ड ताण्डवः शिवः॥

  • अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे,
  • सर्पों के फूफकार से,
  • क्रमश: ललाट में बढी हूई प्रचंडअग्नि के मध्य
  • मृदंग की मंगलकारी,
  • धिम-धिम की ध्वनि के साथ
  • ताण्डव नृत्य में लीन,
  • शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।

12.

स्पृषद्वि चित्र तल्पयो:
भुजङ्ग मौक्ति कस्रजोर्
गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः
सुहृद्वि पक्ष पक्षयोः।

तृणार विन्द चक्षुषोः
प्रजामही महेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा
सदाशिवं भजाम्यहम॥

  • कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या,
  • सर्प एवं मोतियों की मालाओं,
  • बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टूकडों,
  • शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं,
  • तिनकों तथा कमलों पर
  • समान दृष्टि रखने वाले,
  • शिव को मैं भजता हूँ।

13.

कदा निलिम्प निर्झरी
निकुञ्ज कोटरे वसन्
विमुक्त दुर्मतिः सदा
शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।

विलोल लोल लोचनो
ललाम भाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्
कदा सुखी भवाम्यहम्॥

  • कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ,
  • निष्कपट हो, सिर पर अंजली धारण कर
  • चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले,
  • शिवजी का मंत्रोच्चार करते हुए
  • अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा।

14.

इमं हि नित्यमेव मुक्त
मुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो
विशुद्धि मेति संततम्।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु
याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां
सुशङ्करस्य चिंतनम्॥

  • इस उत्त्मोत्त्म शिव ताण्डव स्त्रोत को
  • नित्य पढने या श्रवण करने मात्र से,
  • प्राणि पवित्र हो जाता है, और
  • परमगुरु शिव में स्थापित हो जाता है तथा
  • सभी प्रकार के भ्रमों से,
  • मुक्त हो जाता है।

15.

पूजावसान समये
दशवक्त्रगीतं
यः शम्भु पूजन परं
पठति प्रदोषे।

तस्य स्थिरां
रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं
प्रददाति शम्भुः॥

  • प्रात: शिवपुजन के अंत में
  • इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से
  • लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा
  • भक्त रथ, गज, घोडा आदि सम्पदा से,
  • सर्वदा युक्त रहता है
  • इति श्रीरावण-कृतम् शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् सम्पूर्णम्

॥शिव ताण्डव स्तोत्रम्॥ – जटाटवीगलज्जल

1.

जटाटवीगलज्जल प्रवाह पावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥


2.

जटाकटाह सम्भ्रम भ्रमन्नि लिम्प निर्झरी
विलोल वीचि वल्लरी विराज मान मूर्धनि।
धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके
(धगद्धगद्धगज्ज्वललललाटपट्टपावके)
किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥


3.

धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुर
स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मान मानसे।
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि
क्वचिद् दिगम्बरे (क्वचिद्दिगम्बरे)
मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥


4.

जटा भुजङ्ग पिङ्गल स्फुरत्फणा मणिप्रभा
कदम्ब कुङ्कुमद्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे।
मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे
(मदान्ध सिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे)
मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥


5.

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर
प्रसून धूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रि पीठभूः।
भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः॥


6.

ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जय स्फुलिङ्गभा
निपीत पञ्चसायकं नमन्नि लिम्पनायकम्।
सुधा मयूख लेखया विराजमान शेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥


7.

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृत प्रचण्डपञ्चसायके।
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक
प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥


8.

नवीन मेघ मण्डली निरुद्ध दुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः।
निलिम्प निर्झरी धरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥


9.

प्रफुल्ल नील पङ्कज प्रपञ्च कालिमप्रभा
वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांध कच्छिदं तमन्त कच्छिदं भजे॥


10.

अखर्व सर्व मङ्गला कला कदम्ब मञ्जरी
रस प्रवाह माधुरी विजृम्भणा मधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त कान्ध कान्तकं तमन्त कान्तकं भजे॥


11.

जयत् वद भ्रविभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस
(जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस)
द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट्
(द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्)।
धिमिद्धिमिद्धिमि ध्वनन् मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल
ध्वनि क्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः॥


12.

स्पृषद्वि चित्रतल्पयो: भुजङ्ग मौक्ति कस्रजोर्
गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि पक्ष पक्षयोः।
तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम॥


13.

कदा निलिम्प निर्झरी निकुञ्ज कोटरे वसन्
विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।
विलोल लोल लोचनो ललाम भाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥


14.

इमं हि नित्यमेव मुक्त मुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम्॥


15.

पूजावसान समये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः॥

Shiv Stotra

Stotra

शिव ताण्डव स्तोत्र – अर्थसहित
Categories
Stotra

शिव षडक्षर स्तोत्र मंत्र

Shiv Shadakshar Stotra

1.

ॐ कारं बिंदुसंयुक्तं
नित्यं ध्यायंति योगिन:।
कामदं मोक्षदं चैव
ॐकाराय नमो नम:॥


2.

नमंतिऋषयो देवा
नमन्त्यप्सरसां गणा:।
नरा नमन्तिदेवेशं
नकाराय नमो नम:॥


3.

महादेवं महात्मानं
महाध्यानं परायणम्।
महापापहरं देवं
मकाराय नमो नम:॥


4.

शिवं शांन्तं जगन्नाथं
लोकानुग्रहकारकम्।
शिवमेकपदं नित्यं
शिकाराय नमो नम:॥


5.

वाहनं वृषभो यस्य
वासुकि: कण्ठभूषणम्।
वामे शक्तिधरं देवं
वकाराय नमो नम:॥


6.

यत्र यत्र स्थितो
देव: सर्वव्यापी महेश्वर:।
यो गुरुः सर्वदेवानां
यकाराय नमो नम:॥


षडक्षरमिदं स्तोत्रं
य: पठेच्छिवसंनिधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥

Shiv Stotra

Stotra

शिव षडक्षर स्तोत्र मंत्र
Categories
Chalisa

शिव चालीसा – जय गिरिजा पति दीन दयाला

1.

जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

2.

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के॥


3.

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन छार लगाये॥

4.

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देख नाग मुनि मोहे॥


5.

मैना मातु की ह्वै दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

6.

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥


7.

नन्दि गणेश सोहैत हैं कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

8.

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥


9.

देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

10.

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥


11.

तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महं मारि गिरायउ॥

12.

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥


13.

त्रिपुरासुर संग युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

14.

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥


15.

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

16.

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥


17.

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला।
जरे सुरासुर भये विहाला॥

18.

कीन्ह दया तहं करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥


19.

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

20.

सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥


21.

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई॥

22.

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥


23.

जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी॥

24.

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥


25.

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

26.

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो॥


27.

मातु पिता भ्राता सब कोई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥

28.

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु अब संकट भारी॥


29.

धन निर्धन को देत सदाहीं।
जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥

30.

स्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥


31.

शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

32.

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
नारद शारद शीश नवावैं॥


33.

नमो नमो जय नमो शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

34.

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पार होत है शम्भु सहाई॥


35.

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥

36.

पुत्र हीन कर इच्छा कोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥


37.

पंडित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥

38.

त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा।
तन नहीं ताके रहे कलेशा॥


39.

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

40.

जनम जनम के पाप नसावे।
अंतवास शिवपुर में पावैं॥


41.

कहे अयोध्या आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥


1.

नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश॥


2.

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान।
स्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन्ह कल्याण॥

Chalisa

Aarti

शिव चालीसा – जय गिरिजा पति दीन दयाला