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सप्तश्लोकी दुर्गा

Saptashloki Durga Stotra – Hindi Meaning

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

शिवजी, देवी माँ से, कलियुगमें भक्तोंके कामनाओंकी सिद्धि के लिए, उपाय पूछते है

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव उवाच –
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ हि कार्यसिद्ध‍यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥

  • शिवजी बोले – हे देवि!
  • तुम भक्तोंके लिये सुलभ हो और
  • समस्त कर्मोंका विधान करनेवाली हो।
  • कलियुगमें कामनाओंकी सिद्धि-हेतु,
  • यदि कोई उपाय हो,
  • तो उसे अपनी वाणीद्वारा,
  • सम्यक्-रूपसे व्यक्त करो।

माँ दुर्गा, शिवजी को, अम्बास्तुति के बारे में बताती है

देव्युवाच –
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

  • देवीने कहा –
  • हे देव! आपका मेरे ऊपर बहुत स्नेह है।
  • कलियुगमें,
  • समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला,
  • जो साधन है,
  • वह बतलाऊँगी, सुनो!
  • उसका नाम है – अम्बास्तुति

सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ का विनियोग

ॐ अस्य श्रीदुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मन्त्रस्य नारायण ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवताः,
श्रीदुर्गा प्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः।

  • ॐ इस दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्रमन्त्रके,
  • नारायण ऋषि हैं,
  • अनुष्टुप् छन्द है,
  • श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और
  • महासरस्वती देवता हैं,
  • श्रीदुर्गाकी प्रसन्नताके लिये,
  • सप्तश्लोकी दुर्गापाठमें इसका विनियोग किया जाता है।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥१॥

  • वे भगवती महामाया देवी,
  • ज्ञानियोंके भी चित्तको,
  • बलपूर्वक खींचकर,
  • मोहमें डाल देती हैं॥१॥

माँ दुर्गा – दुःख और भय हरनेवाली

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र‍य दुःखभय हारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥२॥

  • माँ दुर्गे!
  • आप स्मरण करनेपर,
  • सब प्राणियोंका भय हर लेती हैं और
  • स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन करनेपर,
  • उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं।
  • दुःख, दरिद्रता और
  • भय हरनेवाली देवि!
  • आपके सिवा दूसरी कौन है,
  • जिसका चित्त,
  • सबका उपकार करनेके लिये,
  • सदा ही दयार्द्र रहता हो॥२॥

माँ भगवती – कल्याणदायिनी, मंगलमयी

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥३॥

  • नारायणी!
  • तुम सब प्रकारका,
  • मंगल प्रदान करनेवाली, मंगलमयी हो।
  • कल्याणदायिनी शिवा हो।
  • सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाली,
  • शरणागत वत्सला,
  • तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो।
  • तुम्हें नमस्कार है॥३॥

शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

  • शरणमें आये हुए दीनों एवं
  • पीड़ितोंकी रक्षामें संलग्न रहनेवाली तथा
  • सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवि!
  • तुम्हें नमस्कार है॥४॥

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥५॥

  • सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा
  • सब प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न
  • दिव्यरूपा दुर्गे देवि!
  • सब भयोंसे हमारी रक्षा करो;
  • तुम्हें नमस्कार है॥५॥

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥६॥

  • देवि! तुम प्रसन्न होनेपर,
  • सब रोगोंको नष्ट कर देती हो और
  • कुपित होनेपर,
  • मनोवांछित सभी कामनाओंका,
  • नाश कर देती हो।
  • जो लोग तुम्हारी शरणमें जा चुके हैं,
  • उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं।
  • तुम्हारी शरणमें गये हुए मनुष्य,
  • दूसरोंको शरण देनेवाले हो जाते हैं॥६॥

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥७॥

  • सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार,
  • तीनों लोकोंकी समस्त बाधाओंको शान्त करो और
  • हमारे शत्रुओंका नाश करती रहो॥७॥

॥इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा॥

॥श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण॥

Saptashati

Durga

सप्तश्लोकी दुर्गा
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दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – अर्थसहित – माँ दुर्गा के 108 नाम

॥ईश्वर उवाच॥
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने॥
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

  • शंकरजी, पार्वतीजी से कहते हैं –
  • कमलानने,
  • अब मैं अष्टोत्तरशत (108) नाम का,
  • वर्णन करता हूँ, सुनो;
  • जिसके प्रसाद (पाठ या श्रवण) मात्र से,
  • भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

  • सती – अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली,
    • दक्ष की बेटी –
    • माँ दुर्गा का पहला स्वरूप –
    • माँ शैलपुत्री
  • साध्वी – आशावादी
  • भवप्रीता – भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली
  • भवानी – ब्रह्मांड की निवास
  • भवमोचनी – संसार बंधनों से मुक्त करने वाली
  • आर्या – देवी
  • दुर्गा – अपराजेय
  • जया – विजयी
  • आद्य – शुरूआत की वास्तविकता
  • त्रिनेत्र – तीन आँखों वाली
  • शूलधारिणी – शूल धारण करने वाली

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

  • पिनाकधारिणी – शिव का त्रिशूल धारण करने वाली
  • चित्रा – सुरम्य, सुंदर
  • चण्डघण्टा – चंद्रघंटा
    • प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली
    • माँ दुर्गा का तीसरा स्वरूप
  • महातपा – भारी तपस्या करने वाली
  • मन – मनन- शक्ति
  • बुद्धि – बोधशक्ति, सर्वज्ञाता
  • अहंकारा – अहंताका आश्रय, अभिमान करने वाली
  • चित्तरूपा – वह जो सोच की अवस्था में है
  • चिता – मृत्युशय्या
  • चिति – चेतना

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

  • सर्वमन्त्रमयी – सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली
  • सत्ता – सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है
  • सत्यानन्दस्वरूपिणी – अनन्त आनंद का रूप
  • अनन्ता – जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं
  • भाविनी – सबको उत्पन्न करने वाली
  • भाव्या – भावना एवं ध्यान करने योग्य
  • भव्या – भव्यता के साथ, कल्याणस्वरूपा
  • अभव्या – जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं
  • सदागति – हमेशा गति में, मोक्ष दान

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥५॥

  • शाम्भवी – शिवप्रिया, शंभू की पत्नी
  • देवमाता – देवगण की माता
  • चिन्ता – चिन्ता
  • रत्नप्रिया – गहने से प्यार
  • सर्वविद्या – ज्ञान का निवास
  • दक्षकन्या – दक्ष की बेटी
  • दक्षयज्ञविनाशिनी – दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥६॥

  • अपर्णा – तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली
  • अनेकवर्णा – अनेक रंगों वाली
  • पाटला – लाल रंग वाली
  • पाटलावती – गुलाब के फूल या लाल परिधान या
    • फूल धारण करने वाली
  • पट्टाम्बरपरीधाना – रेशमी वस्त्र पहनने वाली
  • कलमंजीररंजिनी (कलमञ्जररञ्जिनी) – पायल (मधुर ध्वनि करने वाले मञ्जीर/पायल) को धारण करके प्रसन्न रहने वाली

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

  • अमेय – जिसकी कोई सीमा नहीं
  • विक्रमा – असीम पराक्रमी
  • क्रूरा – दैत्यों के प्रति कठोर
  • सुन्दरी – सुंदर रूप वाली
  • सुरसुन्दरी – अत्यंत सुंदर
  • वनदुर्गा – जंगलों की देवी
  • मातंगी – मतंगा की देवी
  • मातंगमुनि-पूजिता – बाबा मातंग द्वारा पूजनीय

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥८॥

  • ब्राह्मी – भगवान ब्रह्मा की शक्ति
  • माहेश्वरी – प्रभु शिव की शक्ति
  • इंद्री – इन्द्र की शक्ति
  • कौमारी – किशोरी
  • वैष्णवी – अजेय
  • चामुण्डा – चंड और मुंड का नाश करने वाली
  • वाराही – वराह पर सवार होने वाली
  • लक्ष्मी – सौभाग्य की देवी
  • पुरुषाकृति – वह जो पुरुष धारण कर ले

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥९॥

  • विमिलौत्त्कार्शिनी (विमला उत्कर्षिणी) – आनन्द प्रदान करने वाली
  • ज्ञाना – ज्ञान से भरी हुई
  • क्रिया – हर कार्य में होने वाली
  • नित्या – अनन्त
  • बुद्धिदा – ज्ञान देने वाली
  • बहुला – विभिन्न रूपों वाली
  • बहुलप्रेमा – सर्व प्रिय
  • सर्ववाहन-वाहना – सभी वाहन पर विराजमान होने वाली

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥१०॥

  • निशुम्भशुम्भ-हननी – शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली
  • महिषासुर-मर्दिनि – महिषासुर का वध करने वाली
  • मधुकैटभहंत्री – मधु व कैटभ का नाश करने वाली
  • चण्डमुण्ड-विनाशिनि – चंड और मुंड का नाश करने वाली

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

  • सर्वासुरविनाशा – सभी राक्षसों का नाश करने वाली
  • सर्वदानवघातिनी – संहार के लिए शक्ति रखने वाली
  • सर्वशास्त्रमयी – सभी सिद्धांतों में निपुण
  • सत्या – सच्चाई
  • सर्वास्त्रधारिणी – सभी हथियारों धारण करने वाली

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२॥

  • अनेकशस्त्रहस्ता – हाथों में कई हथियार धारण करने वाली
  • अनेकास्त्रधारिणी – अनेक हथियारों को धारण करने वाली
  • कुमारी – सुंदर किशोरी
  • एककन्या – कन्या
  • कैशोरी – जवान लड़की
  • युवती – नारी
  • यति – तपस्वी

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥१३॥

  • अप्रौढा – जो कभी पुराना ना हो
  • प्रौढा – जो पुराना है
  • वृद्धमाता – शिथिल
  • बलप्रदा – शक्ति देने वाली
  • महोदरी – ब्रह्मांड को संभालने वाली
  • मुक्तकेशी – खुले बाल वाली
  • घोररूपा – एक भयंकर दृष्टिकोण वाली
  • महाबला – अपार शक्ति वाली

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

  • अग्निज्वाला – मार्मिक आग की तरह
  • रौद्रमुखी – विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा
  • कालरात्रि – काले रंग वाली (माँ दुर्गा का सातवां रूप)
  • तपस्विनी – तपस्या में लगे हुए (माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप – माँ ब्रह्मचारिणी)
  • नारायणी – भगवान नारायण की विनाशकारी रूप
  • भद्रकाली – काली का भयंकर रूप
  • विष्णुमाया – भगवान विष्णु का जादू
  • जलोदरी – ब्रह्मांड में निवास करने वाली

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥

  • शिवदूती – भगवान शिव की राजदूत
  • करली – हिंसक
  • अनन्ता – विनाश रहित
  • परमेश्वरी – प्रथम देवी
  • कात्यायनी – ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय
    • माँ दुर्गा का छठवां रूप – कात्यायनी देवी
  • सावित्री – सूर्य की बेटी
  • प्रत्यक्षा – वास्तविक
  • ब्रह्मवादिनी – वर्तमान में हर जगह वास करने वाली

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥१६॥

  • देवी पार्वती!
  • जो प्रतिदिन,
  • दुर्गाजी के इस अष्टोत्तरशतनाम का,
  • पाठ करता है,
  • उसके लिये तीनों लोकों में,
  • कुछ भी असाध्य नहीं है।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥१७॥

  • वह धन, धान्य,
  • पुत्र, स्त्री,
  • घोड़ा, हाथी,
  • धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा
  • अन्तमें सनातन मुक्ति भी,
  • प्राप्त कर लेता है।

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्॥
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥

  • कुमारीका पूजन और देवी सुरेश्वरीका ध्यान करके,
  • पराभक्तिके साथ उनका पूजन करे,
  • फिर अष्टोत्तरशत-नामका पाठ आरम्भ करे।

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात्॥१९॥

  • देवि! जो ऐसा करता है,
  • उसे, सब श्रेष्ठ देवताओंसे भी,
  • सिद्धि प्राप्त होती है॥
  • राजा उसके दास हो जाते हैं।
  • वह राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है।

गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः॥२०॥

  • गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिन्दूर,
  • कपूर, घी (अथवा दूध), चीनी और मधु –
  • इन वस्तुओंको एकत्र करके,
  • इनसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर,
  • जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्रको धारण करता है,
  • वह शिवके तुल्य (मोक्षरूप) हो जाता है।

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥

  • भौमवती अमावास्याकी आधी रातमें,
  • जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्रपर हों,
  • उस समय इस स्तोत्रको लिखकर,
  • जो इसका पाठ करता है,
  • वह सम्पत्तिशाली होता है।

इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं समाप्तम्।

Saptashati

Durga

दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र – अर्थसहित – माँ दुर्गा के 108 नाम
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दुर्गा कवच – देवी कवच – अर्थसहित

Devi Kavach – Durga Kavach – Meaning in Hindi

देवी कवच अध्याय के मुख्य प्रसंग

  1. देवी कवच विनियोग
  2. दुर्गा कवच का पाठ क्यों करना चाहिए
  3. देवियोंके के विभिन्न वाहन और देवीके स्वरुप

  4. देवी कवच आरम्भ करने से पहले प्रार्थना
  5. देवी कवच आरम्भ
  6. देवी कवच पाठ के लाभ

देवी कवच विनियोग

अथ देवी कवच
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता,
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्,
दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

  • ॐ इस श्रीचण्डीकवचके,
  • ब्रह्मा ऋषि,
  • अनुष्टुप् छन्द,
  • चामुण्डा देवता,
  • अङ्गन्यासमें कही गई माताएं बीज,
  • दिग्बन्ध देवता तत्व है,
  • श्रीजगदम्बाजी की कृपा के लिए
  • सप्तशती के पाठ के जपमें,
  • इसका विनियोग किया जाता है।

ॐ चण्डिका देवीको नमस्कार है।


देवी कवच का पाठ क्यों करना चाहिए

1.

मनुष्योंकी सब प्रकारसे, रक्षा करनेवाला, दुर्गा कवच

मार्कण्डेय उवाच –
ॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥

  • मार्कण्डेयजीने कहा – पितामह!
  • जो इस संसारमें परम गोपनीय तथा
  • मनुष्योंकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और
  • जो अबतक आपने,
  • दूसरे किसीके सामने प्रकट नहीं किया हो,
  • ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥१॥

2.

सभी प्राणियोंका का उपकार करनेवाला, और पवित्र, देवी कवच

ब्रह्मोवाच –
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥

  • ब्रह्माजी बोले – ब्रह्मन्!
  • ऐसा साधन तो,
  • एक देवीका कवच ही है,
  • जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय,
  • पवित्र तथा
  • सम्पूर्ण प्राणियोंका उपकार करनेवाला है।
  • महामुने! उसे श्रवण करो॥२॥

3.

1. शैलपुत्री, 2. ब्रह्मचारिणी, 3. चन्द्रघण्टा, 4. कूष्माण्डा

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥

  • देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं,
  • जिन्हें – नवदुर्गा – कहते हैं।
  • उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैं।
  • प्रथम नाम
    • शैलपुत्री है।
  • दूसरी मूर्तिका नाम
    • ब्रह्मचारिणी है।
  • तीसरा स्वरूप
    • चन्द्रघण्टा के नामसे प्रसिद्ध है।
  • चौथी मूर्तिको
    • कूष्माण्डा कहते हैं।

4.

5. स्कन्दमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥

  • पाँचवीं दुर्गाका नाम
    • स्कन्दमाता है।
  • देवीके छठे रूपको
    • कात्यायनी कहते हैं।
  • सातवाँ
    • कालरात्रि और
  • आठवाँ स्वरूप
    • महागौरी के नामसे
  • प्रसिद्ध है।

5.

9. सिद्धिदात्री

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥

  • नवीं दुर्गाका नाम
    • सिद्धिदात्री है।
  • ये सब नाम,
  • सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान्‌के द्वारा ही,
  • प्रतिपादित हुए हैं॥५॥

6 – 7.

देवीकी कृपा से, सारे दुःख और संकट, दूर हो जाते है, और, भय नहीं लगता

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥

  • जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो,
  • रणभूमिमें शत्रुओंसे घिर गया हो,
  • विषम संकटमें फँस गया हो तथा
  • इस प्रकार भयसे आतुर होकर
  • जो भगवती दुर्गाकी शरणमें प्राप्त हुए हों,
  • उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता॥६॥
  • युद्धके समय संकटमें पड़नेपर भी,
  • उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं आती और
  • उन्हें शोक, दुःख और
  • भयकी प्राप्ति नहीं होती॥७॥

8.

देवी का चिंतन करनेवालों की, देवी सदैव रक्षा करती है

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥

  • जिन्होंने,
  • भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है,
  • उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है।
  • देवेश्वरि!
  • जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं,
  • उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती हो॥८॥

देवियोंके के विभिन्न वाहन और देवीके स्वरुप

9.

चामुण्डादेवी, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवीदेवी

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥

  • चामुण्डादेवी,
    • प्रेतपर आरूढ़ होती हैं।
  • वाराही,
    • भैंसेपर सवारी करती हैं।
  • ऐन्द्री का वाहन,
    • ऐरावत हाथी है।
  • वैष्णवीदेवी,
    • गरुडपर ही आसन जमाती हैं॥९॥

10.

माहेश्वरी, कौमारीका, लक्ष्मीदेवी

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥

  • माहेश्वरी,
    • वृषभपर आरूढ़ होती हैं।
  • कौमारी का वाहन,
    • मयूर है।
  • भगवान् विष्णुकी प्रियतमा लक्ष्मीदेवी,
    • कमलके आसनपर विराजमान हैं और
    • हाथोंमें कमल धारण किये हुए हैं॥१०॥

11.

ईश्वरीदेवी, ब्राह्मीदेवी

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११॥

  • वृषभपर आरूढ़ ईश्वरीदेवीने,
    • श्वेत रूप धारण कर रखा है।
  • ब्राह्मीदेवी,
    • हंसपर बैठी हुई हैं और
    • सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं॥११॥

12.

योगशक्तियोंसे सम्पन्न सभी देवी के रूप

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२॥

  • इस प्रकार ये सभी माताएँ,
  • सब प्रकारकी योगशक्तियोंसे सम्पन्न हैं।
  • इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं,
  • जो अनेक प्रकारके आभूषणोंकी शोभासे युक्त तथा
  • नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं॥१२॥

13.

देवियोंके शस्त्र-धारण करने का उद्देश्य

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥

  • (देवियोंके शस्त्र-धारणका उद्देश्य श्लोक 13 – 15 में)
  • ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोधमें भरी हुई हैं और
  • भक्तोंकी रक्षाके लिये,
  • रथपर बैठी दिखायी देती हैं।
  • ये शंख, चक्र,
  • गदा, शक्ति,
  • हल और मुसल, और …

14.

भक्तों की रक्षा के लिए, देवी माँ के हाथों में, विभिन्न अस्त्र-शस्त्र

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥

  • खेटक और तोमर,
  • परशु तथा पाश,
  • कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम
  • शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र,
  • अपने हाथोंमें धारण करती हैं।

15.

देवी के अस्त्र शस्त्रों से, राक्षसों का संहार और, भक्तों की रक्षा

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥

  • दैत्योंके शरीरका नाश करना,
  • भक्तोंको अभयदान देना और
  • देवताओंका कल्याण करना –
  • यही उनके शस्त्र-धारणका,
  • उद्देश्य है॥१३-१५॥

16.

देवी कवच आरम्भ करने से पहले प्रार्थना

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥१६॥

  • कवच आरम्भ करनेके पहले,
  • इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये –
  • महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम,
  • महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि!
  • तुम महान् भयका नाश करनेवाली हो,
  • तुम्हें नमस्कार है॥१६॥

देवी कवच आरम्भ

17.

माँ जगदम्बा, ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति), अग्निशक्ति

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥

  • तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है।
  • शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके!
    • मेरी रक्षा करो।
  • पूर्व दिशामें,
    • ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति),
    • मेरी रक्षा करे।
  • अग्निकोणमें,
    • अग्निशक्ति, और… ॥१७॥

18.

वाराही, खड्गधारिणी, वारुणी और मृगवाहिनी

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्‌गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥

  • दक्षिण दिशामें,
    • वाराही तथा
  • नैर्ऋत्यकोणमें,
    • खड्गधारिणी,
    • मेरी रक्षा करे।
  • पश्चिम दिशामें,
    • वारुणी और
  • वायव्यकोणमें,
    • मृगपर सवारी करनेवाली देवी,
    • मेरी रक्षा करे॥१८॥

19.

कौमारी, शूलधारिणीदेवी, ब्रह्माणि, वैष्णवीदेवी

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥

  • उत्तर दिशामें,
    • कौमारी और
  • ईशान-कोणमें,
    • शूलधारिणीदेवी,
    • रक्षा करे।
  • ब्रह्माणि,
    • तुम ऊपरकी ओरसे मेरी रक्षा करो और
  • वैष्णवीदेवी,
    • नीचेकी ओरसे,
    • मेरी रक्षा करे॥१९॥

20.

चामुण्डादेवी, जया, विजया

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥

  • इसी प्रकार शवको अपना वाहन बनानेवाली,
  • चामुण्डादेवी,
    • दसों दिशाओंमें,
    • मेरी रक्षा करे।
  • जया,
    • आगेसे और
  • विजया,
    • पीछेकी ओरसे,
    • मेरी रक्षा करे॥२०॥

21.

अजिता, अपराजिता, उद्योतिनी

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥

  • वामभागमें,
    • अजिता और
  • दक्षिणभागमें,
    • अपराजिता,
    • रक्षा करे।
  • वामभाग अर्थात
    • बाई ओर, बाएं तरफ
  • उद्योतिनी,
    • शिखाकी रक्षा करे।
  • उमा,
    • मेरे मस्तकपर विराजमान होकर,
    • रक्षा करे॥२१॥

22.

मालाधरी, यशस्विनी देवी, त्रिनेत्रा, यमघण्टा देवी

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥

  • ललाटमें,
    • मालाधरी रक्षा करे और
  • यशस्विनीदेवी,
    • मेरी भौंहोंका,
    • संरक्षण करे।
  • भौंहोंके मध्यभागमें,
    • त्रिनेत्रा और
  • नथुनोंकी,
    • यमघण्टादेवी,
    • रक्षा करे॥२२॥

23.

शंखिनी, द्वारवासिनी, कालिकादेवी, भगवती शांकरी

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥

  • दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें,
    • शंखिनी और
  • कानोंमें,
    • द्वारवासिनी रक्षा करे।
  • कालिकादेवी,
    • कपोलोंकी तथा
  • भगवती शांकरी,
    • कानोंके मूलभागकी,
    • रक्षा करे॥२३॥

24.

सुगन्धा, चर्चिका देवी, अमृतकला, सरस्वतीदेवी

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥

  • नासिकामें,
    • सुगन्धा और
  • ऊपरके ओठमें,
    • चर्चिकादेवी रक्षा करे।
  • नीचेके ओठमें,
    • अमृतकला तथा
  • जिह्वामें,
    • सरस्वतीदेवी,
    • रक्षा करे॥२४॥

25.

कौमारी, चण्डिका, चित्रघण्टा, महामाया

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥

  • कौमारी,
    • दाँतोंकी और
  • चण्डिका,
    • कण्ठप्रदेशकी रक्षा करे।
  • चित्रघण्टा,
    • गलेकी घाँटीकी और
  • महामाया,
    • तालुमें रहकर,
  • रक्षा करे॥२५॥

26.

कामाक्षी, सर्वमंगला, भद्रकाली, धनुर्धरी

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥

  • कामाक्षी,
    • ठोढ़ीकी और
  • सर्वमंगला,
    • मेरी वाणीकी रक्षा करे।
  • भद्रकाली,
    • ग्रीवामें (गलेमें) और
  • धनुर्धरी,
    • मेरुदण्ड (पृष्ठवंश) में रहकर,
  • रक्षा करे॥२६॥

27.

नीलग्रीवा, नलकूबरी, खड्गिनी, वज्रधारिणी

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥

  • कण्ठके बाहरी भागमें,
    • नीलग्रीवा और
  • कण्ठकी नलीमें,
    • नलकूबरी रक्षा करे।
  • दोनों कंधोंमें,
    • खड्गिनी और
  • मेरी दोनों भुजाओंकी,
    • वज्रधारिणी,
  • रक्षा करे॥२७॥

28.

दण्डिनी, अम्बिका, शूलेश्वरी, कुलेश्वरी

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्‌गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥२८॥

  • दोनों हाथोंमें,
    • दण्डिनी और
  • अंगुलियोंमें,
    • अम्बिका रक्षा करे।
  • शूलेश्वरी,
    • नखोंकी रक्षा करे।
  • कुलेश्वरी,
    • कुक्षि (पेट) में रहकर,
  • रक्षा करे॥२८॥

29.

महादेवी, शोकविनाशिनी देवी, ललितादेवी, शूलधारिणी

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥

  • महादेवी,
    • दोनों स्तनोंकी और
  • शोकविनाशिनीदेवी,
    • मनकी रक्षा करे।
  • ललितादेवी,
    • हृदयमें और
  • शूलधारिणी,
    • उदरमें रहकर,
  • रक्षा करे॥२९॥

30.

कामिनी, गुह्येश्वरी, पूतना और कामिका, महिषवाहिनी

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥

  • नाभिमें,
    • कामिनी और
  • गुह्यभागकी,
    • गुह्येश्वरी रक्षा करे।
  • पूतना और कामिका,
    • लिंगकी और
  • महिषवाहिनी,
    • गुदाकी रक्षा करे॥३०॥

31.

भगवती, विन्ध्यवासिनी, महाबलादेवी

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥

  • भगवती,
    • कटिभागमें और
  • विन्ध्यवासिनी,
    • घुटनोंकी रक्षा करे।
  • सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली महाबलादेवी
    • दोनों पिण्डलियोंकी,
  • रक्षा करे॥३१॥

32.

नारसिंही, तैजसीदेवी, श्रीदेवी, तलवासिनी

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्‌गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥३२॥

  • नारसिंही,
    • दोनों घुट्ठियोंकी और
  • तैजसीदेवी,
    • दोनों चरणोंके पृष्ठभागकी रक्षा करे।
  • श्रीदेवी,
    • पैरोंकी अंगुलियोंमें और
  • तलवासिनी,
    • पैरोंके तलुओंमें रहकर रक्षा करे॥३२॥

33.

दंष्ट्राकराली देवी, ऊर्ध्वकेशिनी देवी, कौबेरी, वागीश्वरी देवी

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥

  • अपनी दाढ़ोंके कारण,
  • भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकरालीदेवी,
    • नखोंकी और
  • ऊर्ध्वकेशिनीदेवी,
    • केशोंकी रक्षा करे।
  • रोमावलियोंके छिद्रोंमें,
    • कौबेरी और
  • त्वचाकी,
    • वागीश्वरीदेवी रक्षा करे॥३३॥

34.

पार्वतीदेवी, कालरात्रि, मुकुटेश्वरी

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥

  • पार्वतीदेवी,
    • रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और
    • मेदकी रक्षा करे।
  • आँतोंकी,
    • कालरात्रि और
  • पित्तकी,
    • मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥३४॥

35.

पद्मावतीदेवी, चूडामणिदेवी, ज्वालामुखी, अभेद्यादेवी

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ॥३५॥

  • मूलाधार आदि कमल-कोशोंमें,
    • पद्मावतीदेवी और
  • कफमें,
    • चूडामणिदेवी स्थित होकर रक्षा करे।
  • नखके तेजकी,
    • ज्वालामुखी रक्षा करे।
  • जिसका किसी भी अस्त्रसे,
  • भेदन नहीं हो सकता,
  • वह अभेद्यादेवी,
    • शरीरकी समस्त संधियोंमें रहकर रक्षा करे॥३५॥

36.

ब्रह्माणि!, छत्रेश्वरी, धर्मधारिणी देवी

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥

  • ब्रह्माणि,
    • आप मेरे वीर्यकी रक्षा करें।
  • छत्रेश्वरी,
    • छायाकी तथा
  • धर्मधारिणी-देवी,
    • मेरे अहंकार, मन और
    • बुद्धिकी रक्षा करे॥३६॥

37.

वज्रहस्तादेवी, भगवती कल्याणशोभना

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥

  • हाथमें वज्र धारण करनेवाली,
  • वज्रहस्तादेवी,
    • मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायुकी रक्षा करे।
  • कल्याणसे शोभित होनेवाली,
  • भगवती कल्याणशोभना,
    • मेरे प्राणकी रक्षा करे॥३७॥

38.

योगिनीदेवी, नारायणीदेवी

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥

  • रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श – इन विषयोंका अनुभव करते समय,
    • योगिनीदेवी रक्षा करे तथा
  • सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी रक्षा सदा,
    • नारायणीदेवी करे॥३८॥

39.

वाराही, वैष्णवी, लक्ष्मी

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥

  • वाराही,
    • आयुकी रक्षा करे।
  • वैष्णवी,
    • धर्मकी रक्षा करे तथा
  • चक्रिणी (चक्र धारण करनेवाली) देवी,
    • यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा
    • विद्याकी रक्षा करे॥३९॥

40.

इन्द्राणि, चंडिका, महालक्ष्मी, भैरवी

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥

  • इन्द्राणि,
    • आप मेरे गोत्रकी रक्षा करें।
  • चण्डिके!,
    • तुम मेरे पशुओंकी रक्षा करो।
  • महालक्ष्मी,
    • पुत्रोंकी रक्षा करे और
  • भैरवी,
    • पत्नीकी रक्षा करे॥४०॥

41.

सुपथा, क्षेमकरी, महालक्ष्मी, विजयादेवी

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥

  • मेरे पथकी,
    • सुपथा तथा
  • मार्गकी,
    • क्षेमकरी रक्षा करे।
  • राजाके दरबारमें,
    • महालक्ष्मी रक्षा करे तथा
  • सब ओर व्याप्त रहनेवाली,
  • विजयादेवी,
    • सम्पूर्ण भयोंसे,
  • मेरी रक्षा करे॥४१॥

42.

पापनाशिनी देवी, मेरी सब ओर से रक्षा करों

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥

  • देवि! जो स्थान कवचमें नहीं कहा गया है,
  • अतएव रक्षासे रहित है,
  • वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो;
  • क्योंकि तुम विजयशालिनी और
  • पापनाशिनी हो॥४२॥

देवी कवच पाठ के लाभ

43.

यात्रा के पहले दुर्गा कवच का पाठ

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥

  • यदि अपने शरीरका भला चाहे तो,
  • मनुष्य बिना कवचके कहीं एक पग भी न जाय –
  • कवचका पाठ करके ही यात्रा करे॥४३॥
  • क्योंकि…

44.

धन लाभ, विजय और इच्छाओं की पूर्ति

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥

  • कवचके द्वारा,
  • सब ओरसे सुरक्षित मनुष्य,
  • जहाँ-जहाँ भी जाता है,
  • वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा
  • सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाली,
  • विजयकी प्राप्ति होती है।
  • वह जिस-जिस वस्तुका चिन्तन करता है,
  • उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है।
  • वह पुरुष,
  • इस पृथ्वीपर तुलनारहित,
  • महान् ऐश्वर्यका भागी होता है॥४४॥

45.

पराजय, शोक और भय से मुक्ति

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥

  • कवचसे सुरक्षित मनुष्य,
    • निर्भय हो जाता है।
  • युद्धमें उसकी,
  • पराजय नहीं होती तथा
  • वह तीनों लोकोंमें,
  • पूजनीय होता है॥४५॥

46 – 47.

नियमित, श्रद्धापूर्वक देवी कवच का पाठ

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥४७॥

  • देवीका यह कवच,
  • देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।
  • जो प्रतिदिन नियमपूर्वक,
  • तीनों संध्याओंके समय,
  • श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता है,
  • उसे…॥४६॥
  • दैवी कला प्राप्त होती है तथा
  • वह तीनों लोकोंमें,
  • कहीं भी पराजित नहीं होता।
  • इतना ही नहीं, वह अपमृत्युसे रहित हो,
  • सौ से भी अधिक वर्षोंतक जीवित रहता है॥४७॥

48.

सभी व्याधियों और रोगों से मुक्ति

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥

  • उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ,
  • नष्ट हो जाती हैं।
  • सभी प्रकारके विष,
  • दूर हो जाते हैं, और
  • उनका कोई असर नहीं होता॥४८॥

49 – 50 – 51 – 52.

देवी कवच, सभी बुरी चीजों से रक्षा करता है

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ॥४९॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥५२॥

  • इस पृथ्वीपर,
  • मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा
  • इस प्रकारके जितने मन्त्र-यन्त्र होते हैं,
  • वे सब इस कवचको हृदयमें धारण कर लेनेपर,
  • उस मनुष्यको देखते ही नष्ट हो जाते हैं।
  • ये ही नहीं,
  • पृथ्वीपर विचरनेवाले ग्रामदेवता,
  • आकाशचारी देवविशेष,
  • जलके सम्बन्धसे प्रकट होनेवाले गण,
  • उपदेशमात्रसे सिद्ध होनेवाले निम्नकोटिके देवता,
  • अपने जन्मके साथ प्रकट होनेवाले देवता,
  • कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि),
  • डाकिनी, शाकिनी,
  • अन्तरिक्षमें विचरनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,
  • ग्रह, भूत, पिशाच,
  • यक्ष, गन्धर्व, राक्षस,
  • ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और
  • अनिष्टकारक देवता भी,
  • हृदयमें कवच धारण किये रहनेपर,
  • उस मनुष्यको देखते ही भाग जाते हैं।
  • कवचधारी पुरुषको,
  • राजासे सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है।
  • यह कवच,
  • मनुष्यके तेजकी वृद्धि करनेवाला और
  • उत्तम है॥४९-५२॥

53 – 54.

सुयश, वृद्धि और परिवार के लिए देवी माँ का कवच

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥

  • कवचका पाठ करनेवाला पुरुष,
  • अपनी कीर्तिसे विभूषित भूतलपर,
  • अपने सुयशके साथ-साथ,
  • वृद्धिको प्राप्त होता है।
  • जो पहले कवचका पाठ करके,
  • उसके बाद,
  • सप्तशती चण्डीका पाठ करता है,
  • उसकी जबतक,
  • वन, पर्वत और काननों सहित,
  • यह पृथ्वी टिकी रहती है,
  • तबतक यहाँ,
  • पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा,
  • बनी रहती है॥५३-५४॥

55.

परमपद की प्राप्ति

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥

  • फिर देहका अन्त होनेपर,
  • वह पुरुष,
  • भगवती महामायाके प्रसादसे,
  • उस नित्य परमपदको प्राप्त होता है,
  • जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥५५॥

56.

भगवान् शिव के चरणों में जगह

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥

  • वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और
  • कल्याणमय शिवके साथ,
  • आनन्दका भागी होता है॥५६॥

  • इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

Saptashati

Durga

दुर्गा कवच – देवी कवच – अर्थसहित
Categories
Devi Mahatmya

अर्गला स्तोत्रम् अर्थसहित

अर्गला स्तोत्र का विनियोग

॥अथ अर्गला स्तोत्रम्॥
ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः,
अनुष्टुप छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती
पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥

ॐ नमश्चण्डिकायै

  • ॐ, इस श्री अर्गलास्तोत्र मंत्रके
  • विष्णु ऋषि,
  • अनुष्टुप छन्द,
  • श्रीमहालक्ष्मी देवता है,
  • श्री जगदम्बा की कृपा के लिए
  • सप्तशती पाठ के पहले इसका विनियोग किया जाता है।
  • ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।

माँ जगदम्बा के सभी रूपों को नमस्कार

मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥१॥

  • मार्कण्डेय जी कहते हैं –
  • जयन्ती, मंगला, काली,
  • भद्रकाली, कपालिनी,
  • दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री,
  • स्वाहा और स्वधा –
  • इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके!
  • तुम्हें मेरा नमस्कार है।

जय त्वं देवी चामुण्डे जय भूतार्ति-हारिणि।
जय सर्वगते देवी कालरात्रि नमोऽस्तुते॥२॥

  • देवी चामुण्डे!
  • तुम्हारी जय हो।
  • सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवी!
  • तुम्हारी जय हो।
  • सब में व्याप्त रहने वाली देवी!
  • तुम्हारी जय हो।
  • कालरात्रि!
  • तुम्हें नमस्कार है॥

मधुकैटभविद्रावि-विधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥

  • मधु और कैटभ को मारने वाली तथा
  • ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवी!
  • तुम्हे नमस्कार है।
  • तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो,
  • जय (मोह पर विजय) दो,
  • यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

रूप – आत्मस्वरूप का ज्ञान
जय – मोह पर विजय
यश – मोह पर विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश


महिषासुर-निर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ४॥

  • महिषासुर का नाश करने वाली तथा
  • भक्तों को सुख देने वाली देवी!
  • तुम्हें नमस्कार है।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

रक्तबीज-वधे देवी चण्डमुण्ड-विनाशिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥

  • रक्तबीज का वध और
  • चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ६॥

  • शुम्भ और निशुम्भ तथा
  • धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

वन्दिताङ्घ्रि-युगे देवी सर्वसौभाग्य-दायिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ७॥

  • सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा
  • सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

अचिन्त्यरूप-चरिते सर्वशत्रु-विनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ८॥

  • देवी! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं।
  • तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ९॥

  • पापों को दूर करने वाली चण्डिके!
  • जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में
  • सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं,
  • उन्हें ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

स्तुवद्भ्यो (स्तु-वद भ्यो) भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधि-नाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥

  • रोगों का नाश करने वाली चण्डिके!
  • जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं,
  • उन्हें तुम ज्ञान दो, विजय दो, यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह (त्वाम-अर्चयन्तीह) भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ११॥

  • चण्डिके!
  • इस संसार में,
  • जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं
  • उन्हें ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं (सौभाग्यम-आरोग्यं) देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १२॥

  • मुझे सौभाग्य और
  • आरोग्य (स्वास्थ्य) दो।
  • परम सुख दो।
  • मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १३॥

  • जो मुझसे द्वेष करते हों, उनका नाश और
  • मेरे बल की वृद्धि करो।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

विधेहि देवी कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १४॥

  • देवी! मेरा कल्याण करो।
  • मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो।
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

सुरसुर-शिरोरत्न-निघृष्ट-चरणेम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १५॥

  • अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही,
  • अपने माथे के मुकुट की मणियों को,
  • तुम्हारे चरणों पर रखते हैं।
  • तुम रूप, जय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १६॥

  • तुम अपने भक्तजन को,
  • विद्वान, यशस्वी, और
  • लक्ष्मीवान बनाओ तथा
  • ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

प्रचण्ड-दैत्य-दर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १७॥

  • प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके!
  • मुझ शरणागत को,
  • ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १८॥

  • चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित,
  • चार भुजाधारिणी परमेश्वरि!
  • तुम ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

कृष्णेन संस्तुते देवी शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १९॥

  • देवी अम्बिके!
  • भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक,
  • तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं।
  • तुम रूप दो, जय दो, यश दो और
  • काम-क्रोध का नाश करो॥

हिमाचल-सुतानाथ-संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २०॥

  • हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा,
  • प्रशंसित होने वाली परमेश्वरि!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध का नाश करो॥

इन्द्राणीपति-सद्भाव-पूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २१॥

शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥


देवी प्रचण्डदो-र्दण्ड दैत्यदर्प विनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २२॥

  • प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का,
  • घमंड चूर करने वाली देवी!
  • तुम मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और
  • काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

देवी भक्तजनोद्दाम-दत्तानन्दोदये अम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २३॥

  • देवी! अम्बिके,
  • तुम अपने भक्तजनों को,
  • सदा असीम आनंद प्रदान करती हो।
  • मुझे ज्ञान, विजय और यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानु-सारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥

  • मनोहर पत्नी प्रदान करो,
  • जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा
  • उत्तम कुल में जन्मी हो॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ॥२५॥

  • जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके,
  • सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है,
  • वह सप्तशती की जप-संख्या से मिलने वाले,
  • श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है।
  • साथ ही वह प्रचुर संपत्ति भी प्राप्त कर लेता है॥

॥इति देव्या अर्गला स्तोत्रं सम्पूर्णम॥

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥

Saptashati

Durga

Argala Stotram - Meaning in Hindi
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कीलक स्तोत्र

अथ कीलकम्

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य
शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहासरस्वती देवता,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥


मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥१॥

ॐ चण्डिकादेवीको नमस्कार है।

  • मार्कण्डेयजी कहते हैं –
  • विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है,
  • तीनों वेद ही जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं,
  • जो कल्याण-प्राप्तिके हेतु हैं तथा
  • अपने मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट धारण करते हैं,
  • उन भगवान् शिवको नमस्कार है ॥१॥

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम्।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥२॥

  • मन्त्रोंका जो अभिकीलक है,
  • अर्थात् मन्त्रोंकी सिद्धिमें विघ्न उपस्थित करनेवाले शापरूपी कीलकका जो निवारण करनेवाला है,
  • उस सप्तशतीस्तोत्रको सम्पूर्णरूपसे जानना चाहिये
  • (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये),
  • यद्यपि सप्तशतीके अतिरिक्त,
  • अन्य मन्त्रोंके जपमें भी जो निरन्तर लगा रहता है,
  • वह भी कल्याणका भागी होता है ॥२॥

सिद्ध्‍यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्‍यति ॥३॥

  • उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं तथा
  • उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्ति हो जाती है;
  • तथापि जो अन्य मन्त्रोंका जप न करके,
  • केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्रसे ही देवीकी स्तुति करते हैं,
  • उन्हें स्तुतिमात्रसे ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणीदेवी सिद्ध हो जाती हैं ॥३॥

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्‍येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥४॥

  • उन्हें अपने कार्यकी सिद्धिके लिये मन्त्र, ओषधि तथा
  • अन्य किसी साधनके उपयोगकी आवश्यकता नहीं रहती।
  • बिना जपके ही उनके उच्चाटन आदि समस्त आभिचारिक कर्म,
  • सिद्ध हो जाते हैं ॥४॥

समग्राण्यपि सिद्ध्‍यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥५॥

  • इतना ही नहीं, उनकी सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती हैं।
  • लोगोंके मनमें यह शंका थी कि ‘जब केवल सप्तशतीकी उपासनासे अथवा सप्तशतीको छोड़कर अन्य मन्त्रोंकी उपासनासे भी समानरूपसे सब कार्य सिद्ध होते हैं, तब इनमें श्रेष्ठ कौन-सा साधन है?’ लोगोंकी इस शंकाको सामने रखकर भगवान् शंकरने अपने पास आये हुए जिज्ञासुओंको समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है ॥५॥

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥६॥

  • तदनन्तर भगवती चण्डिकाके सप्तशती नामक स्तोत्रको महादेवजीने गुप्त कर दिया।
  • सप्तशतीके पाठसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मन्त्रोंके जपजन्य पुण्यकी समाप्ति हो जाती है।
  • अतः भगवान् शिवने अन्य मन्त्रोंकी अपेक्षा जो सप्तशतीकी ही श्रेष्ठताका निर्णय किया, उसे यथार्थ ही जानना चाहिये ॥६॥

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥७॥


ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥८॥

  • अन्य मन्त्रोंका जप करनेवाला पुरुष भी यदि सप्तशतीके स्तोत्र और जपका अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूपसे ही कल्याणका भागी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
  • जो साधक कृष्णपक्षकी चतुर्दशी अथवा अष्टमीको एकाग्रचित्त होकर भगवतीकी सेवामें अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसादरूपसे ग्रहण करता है, उसीपर भगवती प्रसन्न होती हैं; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।
  • इस प्रकार सिद्धिके प्रतिबन्धकरूप कीलके द्वारा महादेवजीने इस स्तोत्रको कीलित कर रखा है ॥७-८॥

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥९॥

  • जो पूर्वोक्त रीतिसे निष्कीलन करके इस सप्तशतीस्तोत्रका प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है, वही देवीका पार्षद होता है और वही गन्धर्व भी होता है ॥९॥

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०॥

  • सर्वत्र विचरते रहनेपर भी इस संसारमें उसे कहीं भी भय नहीं होता।
    वह अपमृत्युके वशमें नहीं पड़ता तथा देह त्यागनेके अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥१०॥

ज्ञात्वा प्रारथ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११॥

  • अतः कीलनको जानकर उसका परिहार करके ही सप्तशतीका पाठ आरम्भ करे।
  • जो ऐसा नहीं करता, उसका नाश हो जाता है।
  • इसलिये कीलक और निष्कीलनका ज्ञान प्राप्त करनेपर ही यह स्तोत्र निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्रका ही पाठ आरम्भ करते हैं ॥११॥

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद्‌ दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२॥

  • स्त्रियोंमें जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है, वह सब देवीके प्रसादका ही फल है।
    अतः इस कल्याणमय स्तोत्रका सदा जप करना चाहिये ॥१२॥

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्त्रोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३॥

  • इस स्तोत्रका मन्दस्वरसे पाठ करनेपर स्वल्प फलकी प्राप्ति होती है और उच्चस्वरसे पाठ करनेपर पूर्ण फलकी सिद्धि होती है।
    अतः उच्चस्वरसे ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥१३॥

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥ॐ॥१४॥

  • जिनके प्रसादसे ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्षकी भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बाकी स्तुति मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥१४॥
  • इति देव्याः कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम्।

Saptashati

Durga

Kilak Stotra - Arth Sahit - Meaning in Hindi