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दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 – अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index


दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 के मुख्य प्रसंग

  1. विनियोग और ध्यान
  2. राजा सुरथ का प्रसंग
  3. वैश्य समाधि (धनी व्यापारी) का प्रसंग
  4. राजा और वैश्य का,
    • समस्या के समाधान के लिए,
    • मेधा मुनि के पास जाना
  5. मेधा मुनि द्वारा राजा को,
    • माया, बंधन और
    • मोक्ष का कारण बताना
  6. भगवती महामाया की महिमा
  7. मधु और कैटभ से बचने के लिए,
    • ब्रम्हाजी का,
    • भगवान् विष्णु के पास जाना
  8. ब्रम्हाजी का माँ भगवती की स्तुति करना
  9. देवी भगवती की महिमा,
    • और उनके स्वरुप
  10. राक्षसों के संहार के लिए,
    • देवी का प्रादुर्भाव
    • अर्थात, प्रकट होना
  11. मधु और कैटभ का,
    • भगवान् विष्णु के साथ युद्ध
  12. मधु और कैटभ का संहार

1. दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 का, विनियोग और ध्यान

श्रीमहाकाली देवी की प्रसत्रताके लिये, पहले अध्याय का विनियोग

॥विनियोगः॥
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,
नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्,
ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – प्रथम चरित्रके
  • ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता,
  • गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति,
  • रक्तदन्तिका बीज, अग्रि तत्त्व और
  • ऋग्वेद स्वरूप है।
  • श्रीमहाकाली देवताकी प्रसत्रताके लिये,
  • प्रथम चरित्रके जपमें,
  • विनियोग किया जाता है ।

महाकाली देवी का, पहले अध्याय का, ध्यान मन्त्र

॥ध्यानम्॥
ॐ खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्‍तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ नमश्चण्डिकायै

ध्यान

  • भगवान् विष्णुके सो जानेपर,
  • मधु और कैटभको मारनेके लिये,
  • कमलजन्मा ब्रह्माजीने,
  • जिनका स्तवन किया था,
  • उन महाकाली देवीका,
  • मैं ध्यान करता (करती) हूँ ।
  • वे अपने दस हाथोंमें,
  • खड़ग, चक्र, गदा, बाण,
  • धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि,
  • मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं।
  • उनके तीन नेत्र हैं।
  • वे समस्त अंगो मे,
  • दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं।
  • उनके शरीरकी कान्ति,
  • नीलमणिके समान है तथा
  • वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।
  • ॐ चण्डीदेवीको नमस्कार है।

2. मार्कण्डेयजी, राजा सुरथ और समाधि की कथा बताते है

मार्कण्डेयजी, पहले, राजा सुरथ की कथा सुनाते है

ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच॥१॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम॥२॥

  • मार्कण्डेय जी बोले –
  • सूर्य के पुत्र साविर्णि,
  • जो आठवें मनु कहे जाते हैं,
  • उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो।

इस कथा में, भगवती महामाया की कृपा का प्रसंग

महामायानुभावेन यथा मन्वन्‍तराधिपः।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः॥३॥

  • सूर्यकुमार महाभाग सवर्णि,
  • भगवती महामाया के अनुग्रह से,
  • जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए,
  • वही प्रसंग सुनाता हूँ।

राजा सुरथ धार्मिक राजा थे

स्वारोचिषेऽन्‍तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥४॥

  • पूर्वकाल की बात है,
  • सुरथ नाम के एक राजा थे,
  • जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे।
  • उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था ।

राजा सुरथ, धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥५॥

  • वे प्रजा का अपने पुत्रों की भाँति,
  • धर्मपूर्वक पालन करते थे।
  • फिर भी उस समय,
  • कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय,
  • उनके शत्रु हो गये।

राजा सुरथ की एक बार, युद्ध में हार हुई

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥६॥

  • राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी।
  • उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ।
  • यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे,
  • तो भी राजा सुरथ,
  • युद्ध में उनसे परास्त हो गये।

राजा सुरथ का राज्य, सीमित हो गया

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्।
आक्रान्‍तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः॥७॥

  • तब वे युद्ध भूमि से,
  • अपने नगर को लौट आये, और
  • केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे।
  • समूची पृथ्वी से,
  • अब उनका अधिकार जाता रहा।
  • किंतु वहाँ भी, उन प्रबल शत्रुओं ने,
  • महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।

मंत्रियों ने, सेना और खजाने को, हथिया लिया

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८॥

  • राजा का बल क्षीण हो चला था,
  • इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मंत्रियों ने,
  • वहाँ उनकी राजधानी में भी,
  • राजकीय सेना और खजाने को वहाँ से हथिया लिया।

राजा सुरथ, अकेले जंगल की ओर चले गए

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्॥९॥

  • सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था।
  • इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने,
  • घोड़े पर सवार हो,
  • वहाँ से अकेले ही,
  • एक घने जंगल में चले गये।

राजा सुरथ, मेधा मुनि के आश्रम पहुंचे

स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः।
प्रशान्‍तश्‍वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्॥१०॥

  • वहाँ उन्होंने,
  • विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा।
  • जहाँ कितने ही हिंसक जीव,
  • अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर,
  • परम शान्त भाव से रह रहे थे।

मेधा मुनि के आश्रम का शांत वातावरण

तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः।
इतश्‍चेतश्‍च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥११॥

  • मुनि के बहुत से शिष्य,
  • उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे।
  • वहां जाने पर मुनि ने,
  • उनका सत्कार किया।
  • उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर राजा सुरथ,
  • इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक वहां रहे।

राजा सुरथ को, राज्य के बारे में चिंता होने लगी

सोऽचिन्‍तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्॥१२॥

  • फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर,
  • उस आश्रम में इस प्रकार चिंता करने लगे –
  • पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने,
  • जिसका पालन किया था,
  • वहीं नगर आज मुझसे रहित है।
  • पता नहीं, मेरे दुराचारी मंत्रीगण ,
  • उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं।

राजा सुरथ को, हाथी की चिंता

मद्‌भृत्यैस्तैरसद्‌वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः॥१३॥

  • जो सदा मद की वर्षा करने वाला और
  • शूरवीर था,
  • वह मेरा प्रधान हाथी,
  • अब शत्रुओं के अधीन होकर,
  • न जाने किन भोगों को भोगता होगा?

राजा सुरथ को, लोगों की चिंता

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः॥१४॥

  • जो लोग,
  • मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से,
  • सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे,
  • वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं को,
  • अनुसरण करते होंगे।

राजा सुरथ को, धन की चिंता

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम्।
असम्यग्व्यशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्॥१५॥
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः॥१६॥

  • उन अपव्ययी लोगों के द्वारा,
  • खर्च होते रहने के कारण,
  • अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ,
  • मेरा वह खजाना भी खाली हो जायेगा।
  • ये तथा और भी कई बातें,
  • राजा सुरथ निरंतर सोचते रहते थे।

अब, वैश्य समाधि (धनी व्यापारी) का प्रसंग

राजा सुरथ की, वैश्य समाधि से भेंट

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्‍चागमनेऽत्र कः॥१७॥

  • एक दिन उन्होंने वहाँ
  • मेधा मुनि के आश्रम के निकट
  • एक वैश्य को देखा, और
  • उससे पूछा –
  • भाई, तुम कौन हो?
    • वैश्य अर्थात –
    • व्यापारी समुदाय, व्यापार करनेवाला

राजा सुरथ, वैश्य से, उसके दु:ख का कारण पूछते है

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥१८॥
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥१९॥

  • यहां तुम्हारे आने का क्या कारण है?
  • तुम क्यों शोकग्रस्त और
  • अनमने से दिखायी देते हो?
  • राजा सुरथ का,
  • यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर,
  • वैश्य ने विनीत भाव से,
  • उन्हें प्रणाम करके कहा –

समाधि, एक धनि वैश्य, अर्थात व्यापारी था

वैश्‍य उवाच॥२०॥
समाधिर्नाम वैश्‍योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले॥२१॥

  • वैश्य बोला – राजन्!
  • मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ।
  • मेरा नाम समाधि है।

वैश्य समाधि, अपने दुःख का कारण बताते है

लोभी पत्नी और पुत्रों ने, वैश्य को, घर से निकाल दिया

पुत्रदारैर्निरस्तश्‍च धनलोभादसाधुभिः।
विहीनश्‍च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥२२॥

  • मेरे दुष्ट स्त्री और पुत्रों ने,
  • धन के लोभ से,
  • मुझे घर से बाहर निकाल दिया है।
  • मैं इस समय,
  • धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हूँ।
  • मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा ही धन लेकर,
  • मुझे दूर कर दिया है,

दुःखी वैश्य, आश्रम में आ गया

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्॥२३॥

  • इसलिये दुखी होकर,
  • मैं वन में चला आया हँ।
  • यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि,
  • मेरे पुत्रों की, स्त्री की और
  • स्वजनों का कुशल है या नहीं।

वैश्य को, पत्नी और पुत्रों की चिंता

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्॥२४॥

  • इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं,
  • अथवा उन्हें कोई कष्ट है?

क्या पुत्र सदाचारी है या नहीं?

कथं ते किं नु सद्‌वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥२५॥

  • वे मेरे पुत्र कैसे हैं?
  • क्या वे सदाचारी हैं,
  • अथवा दुराचारी हो गये हैं?

वैश्य को, लोभी रिश्तेदारों की चिंता करते देख, राजा को अचम्भा हुआ

राजोवाच॥२६॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः॥२७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्॥२८॥

  • राजा ने पूछा –
  • जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण,
  • तुम्हें घर से निकाल दिया,
  • उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह क्यों है?

वैश्य भी, राजा की बात से, सहमत होता है

वैश्य उवाच॥२९॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्‌गतं वचः॥३०॥

  • वैश्य बोला –
  • आप मेरे विषय में जो बात कहते हैं,
  • वह सब ठीक है।
  • अर्थात,
  • जिन लोभी रिश्तेदारों ने,
  • वैश्य को,
  • धन के लोभ में,
  • घर से निकाल दिया,
  • उनके प्रति,
  • मन में स्नेह के विचार,
  • क्यों आ रहे है।

वैश्य के, धन के लोभी पुत्र, पत्नी और रिश्तेदार

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः॥३१॥
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते॥३२॥

  • किंतु क्या करूँ,
  • मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता।
  • जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर,
  • पिता के प्रति स्नेह,
  • पति के प्रति प्रेम तथा
  • आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे,
  • मुझे घर से निकाल दिया है,
  • उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है।

लोभी परिजनों के लिए, मन में, स्नेह के विचार आते देख, वैश्य को भी हैरानी

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।
तेषां कृते मे निःश्‍वासो दौर्मनस्यं च जायते॥३३॥

  • महामते,
  • गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी,
  • जो मेरा चित्त,
  • इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है,
  • यह क्या है –
  • इस बात को,
  • मैं जानकर भी नहीं जान पाता।
  • उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हँ और
  • मेरा हृदय अत्यन्त दु:खित हो रहा है।

लोभी स्वजनों के लिए स्नेह क्यों?

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्॥३४॥

  • उन लोगों में,
  • प्रेम का सर्वथा अभाव है,
  • तो भी,
  • उनके प्रति,
  • जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता,
  • इसके लिये क्या करुँ।

राजा और वैश्य द्वारा, मेधा मुनि से, मोह का कारण पूछना

राजा सुरथ और समाधि, मेधा मुनि के पास गए

मार्कण्डेय उवाच॥३५॥
तस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ॥३६॥

  • मार्कण्डेयजी कहते हैं –
  • तदन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और
  • वह समाधि नामक वैश्य,
  • दोनों साथ-साथ,
  • मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए, और

राजा और वैश्य मुनि को प्रणाम करते है

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्॥३७॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्‍यपार्थिवौ॥३८॥

  • उन्हें प्रणाम करके उनके सामने बैठ गए।
  • तत्पश्चात वैश्य और राजा ने,
  • कुछ वार्तालाप आरंभ किया।

राजा और वैश्य, अपनी चिंता, मेधा मुनि को बताते है

राजोवाच॥३९॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्॥४०॥

  • राजा ने कहा –
  • भगवन् मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ,
  • उसे बताइये।

राजा पूछते है – जो राज्य चला गया, उसके प्रति चिंता क्यों हो रही है?

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि॥४१॥

  • मेरा चित्त,
  • अपने अधीन न होने के कारण,
  • वह बात,
  • मेरे मन को बहुत दु:ख देती है।
  • मुनिश्रेष्ठ,
  • जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है,
  • उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में,
  • मेरी ममता बनी हुई है।

और, वैश्य को, लोभी रिश्तेदारों के लिए, स्नेह क्यों?

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः॥४२॥

  • यह जानते हुए भी कि
  • वह अब मेरा नहीं है,
  • अज्ञानी की भाँति,
  • मुझे उसके लिये दु:ख होता है,
  • यह क्या है?
  • इधर यह वैश्य भी,
  • घर से अपमानित होकर आया है।
  • इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने,
  • इसको छोड़ दिया है।

लोभी परिजनों के लिए, मन में चिंता क्यों?

स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥४३॥

  • स्वजनों ने भी,
  • इसका परित्याग कर दिया है,
  • तो भी इसके हृदय में,
  • उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है।
  • इस प्रकार,
  • यह तथा मैं,
  • दोनों ही बहुत दुखी हैं।

राजा और वैश्य, मुनि से, मोह का कारण पूछते है

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥४४॥

  • जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है,
  • उस विषय के लिये भी,
  • हमारे मन में,
  • ममता जनित आकर्षण,
  • पैदा हो रहा है।
  • महाभाग, हम दोनों समझदार है,
  • तो भी,
  • हममें जो मोह पैदा हुआ है,
  • यह क्या है?

लोभी स्वजनों के प्रति स्नेह, अर्थात विवेकशून्य मनुष्य

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥४५॥

  • विवेकशून्य पुरुष की भाँति,
  • मुझमें और इसमें भी
  • यह मूढ़ता,
  • प्रत्यक्ष दिखायी देती है।

3. भगवती महामाया की महिमा

मेधा मुनि, राजा को, मनुष्यों और प्राणियों के मोह के बारे में बताते है

ऋषिरुवाच॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥४७॥

  • ऋषि बोले – महाभाग,
  • विषय मार्ग का ज्ञान,
  • सब जीवों को है।

प्राणियों के विषय अलग अलग

विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥४८॥

  • इसी प्रकार विषय भी,
  • सबके लिये अलग-अलग हैं।
  • कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और
  • दूसरे रात में ही नहीं देखते।

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥४९॥

  • तथा कुछ जीव ऐसे हैं,
  • जो दिन और रात्रि में भी,
  • बराबर ही देखते हैं।
  • यह ठीक है कि,
  • मनुष्य समझदार होते हैं,
  • किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते।

प्राणी भी, मनुष्य की तरह समझदार होते है

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥५०॥

  • पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी,
  • समझदार होते हैं।
  • मनुष्यों की समझ भी,
  • वैसी ही होती है,
  • जैसी,
  • उन मृग और पक्षियों की होती है

प्राणियों की भी समझ, मनुष्यों जैसी होती है

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥५१॥

  • तथा जैसी मनुष्यों की होती है,
  • वैसी ही,
  • उन मृग-पक्षी आदि की होती है।
  • यह तथा अन्य बातें भी,
  • प्राय: दोनों में समान ही हैं।

प्राणी और मनुष्य, दोनों में, बच्चों के लिए मोह होता है

कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥५२॥

  • समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो,
  • यह स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी,
  • मोहवश बच्चों की चोंच में,
  • कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं।
  • नरश्रेष्ठ, क्या तुम नहीं देखते कि,
  • ये मनुष्य समझदार होते हुए भी,
  • लोभवश,
  • अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये,
  • पुत्रों की अभिलाषा करते हैं?

जग में मोह माया का कारण – भगवती महामाया का प्रभाव

लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्‍यसि।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥५३॥
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥५४॥

  • यद्यपि, उन सबमें,
  • समझ की कमी नहीं है,
  • तथापि वे संसार की स्थिति,
    • अर्थात जन्म-मरण की परम्परा,
  • बनाये रखने वाले,
  • भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा,
  • ममतामय भँवर से युक्त,
  • मोह के गहरे गर्त में,
  • गिराये जाते हैं।
  • इसलिये,
  • इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये।

विष्णु भगवान की भगवती महामाया

महामाया हरेश्‍चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥५५॥

  • जगदीश्वर भगवान विष्णु की,
  • योगनिद्रारूपा,
  • जो भगवती महामाया हैं,
  • उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है।

भगवती देवी से ही – मोह के बंधन और बंधनो से मुक्ति, दोनों बातें

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
तया विसृज्यते विश्‍वं जगदेतच्चराचरम्॥५६॥

  • वे भगवती महामाया देवी,
  • ज्ञानियों के भी चित्त को,
  • बलपूर्वक खींचकर,
  • मोह में डाल देती हैं।
  • वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की,
  • सृष्टि करती हैं, तथा
  • वे ही प्रसन्न होने पर,
  • मनुष्यों को मुक्ति के लिये,
  • वरदान देती हैं।

संसार बंधन और मोक्ष, दोनों अवस्थाएं, भगवती महामाया के कारण

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्‍च सैव सर्वेश्‍वरेश्‍वरी॥५८॥

  • वे ही पराविद्या,
  • संसार-बंधन और
  • मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी, तथा
  • संपूर्ण ईश्वरों की भी,
  • अधीश्वरी हैं।

राजा, मेधा मुनि को, देवी महामाया के बारे में विस्तार से बताने के लिए कहते है

राजोवाच॥५९॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥६०॥

  • राजा ने पूछा –
  • भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं,
  • वे देवी कौन हैं?

देवी महामाया का स्वरुप, प्रभाव और प्रादुर्भाव कैसे हुआ?

ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा॥६१॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर॥६२॥

  • ब्रह्मन्! उनका अविर्भाव कैसे हुआ?
  • तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं।
  • ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे,
  • उन देवी का जैसा प्रभाव हो,
  • जैसा स्वरूप हो और
  • जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो,
  • वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।

भगवती महामाया का स्वरुप – नित्यस्वरूपा है

ऋषिरुवाच॥६३॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥६४॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा॥६५॥

  • ऋषि बोले – राजन्!
  • वास्तव मे तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं।
  • सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा,
  • उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है,
  • तथापि उनका प्राकटय,
  • अनेक प्रकार से होता है।
  • वह मुझ से सुनो।
  • यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं,
  • तथापि जब देवताओं को,
  • कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं,
  • उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं।

4. मधु और कैटभ के संहार का प्रसंग

ब्रह्माजी, मधु और कैटभ से बचने के लिए, भगवान् विष्णु के पास जाते है

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥६६॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्‍ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ॥६७॥

  • कल्प (प्रलय) के अन्त में,
  • सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।
  • सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर,
  • योगनिद्रा का आश्रय ले शयन कर रहे थे।
  • उस समय उनके कानों की मैल से,
  • दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए,
  • जो मुध और कैटभ के नाम से विख्यात थे।

ब्रह्माजी, विष्णु भगवान् को, सोया हुआ देखते है

विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्‍तुं ब्रह्माणमुद्यतौ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥

  • वे दोनों,
  • ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गये।
  • प्रजापति ब्रह्माजी ने,
  • जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया, और
  • भगवान को सोया हुआ देखा,
  • तो सोचा की,
  • मुझे कौन बचाएगा।

भगवान् विष्णु को जगाने के लिए, ब्रम्हाजी, देवी महामाया की स्तुति करने लगते है

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥६९॥

  • एकाग्रचित्त होकर ब्रम्हाजी,
  • भगवान विष्णु को जगाने के लिए,
  • उनके नेत्रों में निवास करने वाली,
  • योगनिद्रा की स्तुति करने लगे,
  • जो विष्णु भगवान को सुला रही थी।

5. देवी भगवती की महिमा, उनका प्रभाव और उनके स्वरुप

ब्रह्माजी, भगवती की स्तुति करते है

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम्।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्॥७०॥

  • जो इस विश्व की अधीश्वरी,
  • जगत को धारण करने वाली,
  • संसार का पालन और संहार करने वाली, तथा
  • तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं,
  • उन्हीं भगवती निद्रादेवी की,
  • भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।

स्वाहा, स्वधा और स्वर – देवी के स्वरुप

ब्रह्मोवाच॥७२॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधां त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥७३॥

  • ब्रह्मा जी ने कहा –
  • देवि तुम्हीं स्वाहा,
  • तुम्हीं स्वधा और
  • तम्ही वषट्कार हो।
  • स्वर भी,
  • तुम्हारे ही स्वरूप हैं।

ॐ कार की, तीनो मात्राओं में, देवी का स्वरुप

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥७४॥

  • तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो।
  • नित्य अक्षर प्रणव में,
  • अकार, उकार, मकार –
  • इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो, तथा
  • इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त
  • जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है,
  • जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता,
  • वह भी तुम्हीं हो।

देवी भगवती – जगत जननी और सृष्टि की रचना

त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥७५॥

  • देवि!
  • तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा
  • परम जननी हो।
  • देवि!
  • तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्ड को,
  • धारण करती हो।
  • तुम से ही इस जगत की,
  • सृष्टि होती है।

देवी माँ – जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार

त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्‍ते च सर्वदा।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥७६॥

  • तुम्हीं से इसका पालन होता है और
  • सदा तुम्ही कल्प के अंत में,
  • सबको अपना ग्रास बना लेती हो।
  • जगन्मयी देवि!
  • इस जगत की उत्पप्ति के समय तुम,
    • सृष्टिरूपा हो,
  • पालन-काल में,
    • स्थितिरूपा हो तथा
  • कल्पान्त के समय,
    • संहाररूप
  • धारण करने वाली हो।

तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली – माँ भगवती

तथा संहृतिरूपान्‍ते जगतोऽस्य जगन्मये।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥७७॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी॥७८॥

  • तुम्हीं महाविद्या, महामाया,
  • महामेधा, महास्मृति,
  • महामोह रूपा, महादेवी और महासुरी हो।
  • तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली,
  • सबकी प्रकृति हो।

श्री, ईश्वरी, ह्रीं और बुद्धि स्वरुप

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्‍च दारुणा।
त्वं श्रीस्त्वमीश्‍वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥७९॥

  • भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और
  • मोहरात्रि भी तुम्हीं हो।
  • तुम्हीं श्री,
  • तुम्हीं ईश्वरी,
  • तुम्हीं ह्रीं और
  • तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो।

शांति, क्षमा, तुष्टि स्वरुप

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा॥८०॥

  • लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और
  • क्षमा भी तुम्हीं हो।
  • तुम खङ्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा
  • गदा, चक्र, शंख और
  • धनुष धारण करने वाली हो।

देवी के अस्त्र और सौम्य स्वरुप

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी॥८१॥

  • बाण, भुशुण्डी और परिघ –
  • ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं।
  • तुम सौम्य और सौम्यतर हो –
  • इतना ही नहीं,
    • सौम्य अर्थात विनम्रता, शीतलता,
    • सुशीलता, कोमलता
  • जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं,
  • उन सबकी अपेक्षा,
  • तुम अत्याधिक सुन्दरी हो।

सत-असत सभी चीजों की शक्ति

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्‍वरी।
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥८२॥

  • पर और अपर – सबसे परे रहने वाली
  • परमेश्वरी तुम्हीं हो।
  • सर्वस्वरूपे देवि!
  • कहीं भी सत्-असत् रूप,
  • जो कुछ वस्तुएँ हैं और
  • उन सबकी जो शक्ति है,
  • वह तुम्हीं हो।

देवी की माया की शक्ति – भगवान् भी निद्रा में

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्॥८३॥

  • ऐसी अवस्था में,
  • तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है।
  • जो इस जगत की सृष्टि, पालन और
  • संहार करते हैं,
  • उन भगवान को भी,
  • जब तुमने,
  • निद्रा के अधीन कर दिया है,
  • तो तुम्हारी स्तुति करने में,
  • यहाँ कौन समर्थ हो सकता है।

देवी की, सृष्टि की रचना की शक्ति

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्‍वरः।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥

  • मुझको, भगवान शंकर को तथा
  • भगवान विष्णु को भी,
  • तुमने ही शरीर धारण कराया है।

देवी का उदार प्रभाव

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता॥८५॥

  • अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है।
  • देवि!
  • तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो।

देवता, भगवान् विष्णु को जगाने के लिए, माँ भगवती से, विनती करते है

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
बोधश्‍च क्रियतामस्य हन्‍तुमेतौ महासुरौ॥८७॥

  • ये जो दोनों दुर्घर्ष असुर मधु और कैटभ हैं,
  • इनको मोह में डाल दो, और
  • जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो।
  • साथ ही इनके भीतर,
  • इन दोनों असुरों को
    • मधु और कैटभ को
  • मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।

मधु और कैटभ के संहार के लिए, देवी महामाया का प्रादुर्भाव

ऋषिरुवाच॥८८॥
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा॥८९॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः॥९०॥

  • ऋषि कहते हैं – राजन्!
  • जब ब्रह्मा जी ने वहाँ,
  • मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से,
  • भगवान विष्णु को जगाने के लिए
  • तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी, योगनिद्रा की,
  • इस प्रकार स्तुति की,
  • तब वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका,
  • बाहु, हृदय और वक्ष स्थल से निकलकर,
  • अव्यक्तजन्मा
  • ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खडी हो गयी।

भगवान् विष्णु, योगनिद्रा से जागते है

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥

  • योगनिद्रा से मुक्त होने पर,
  • जगत के स्वामी भगवान जनार्दन,
  • उस एकार्णव के जल में,
  • शेषनाग की शय्या से जाग उठे।

भगवान् विष्णु, असुरों को देखते है

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ।
मधुकैटभो दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥९२॥

  • फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा।
  • वे दुरात्मा मधु और कैटभ,
  • अत्यन्त बलवान तथा परक्रमी थे और

क्रोधरक्‍तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः॥९३॥

  • क्रोध से ऑंखें लाल किये,
  • ब्रह्माजी को खा जाने के लिये,
  • उद्योग कर रहे थे।

मधु और कैटभ का, भगवान् विष्णु के साथ युद्ध

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ॥९४॥
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥९५॥

  • तब भगवान श्री हरि ने उठकर,
  • उन दोनों के साथ,
  • पाँच हजार वर्षों तक,
  • केवल बाहु युद्ध किया।
  • वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण,
  • उन्मत्त हो रहे थे।
  • तब महामाया ने उन्हें मोह में डाल दिया।
  • और वे भगवान विष्णु से कहने लगे –
  • हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं।
  • तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।

भगवती महामाया का, मधु और कैटभ पर, माया का प्रभाव

श्रीभगवानुवाच॥९६॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥९७॥

  • श्री भगवान् बोले –
  • यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो,
  • तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ।

भगवान् विष्णु, दैत्यों को, उनके हाथ से मरने के लिए कहते है

किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम॥९८॥

  • बस, इतना सा ही मैंने वर माँगा है।
  • यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।

असुरों को, गलती का अहसास होता है

ऋषिरुवाच॥९९॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्॥१००॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इस दैत्योको को,
  • अब अपनी भूल मालूम पड़ी।
  • उन्होंने देखा की,
  • सब जगह पानी ही पानी है, और
  • कही भी,
  • सुखा स्थान नहीं दिखाई दे रहा है।
  • कल्प –
    • प्रलय के अन्त में,
    • सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।

मधु और कैटभ का संहार, कौन सी जगह पर

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता॥१०१॥

  • तब कमलनयन भगवान से कहा –
  • जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो,
  • जहाँ सूखा स्थान हो,
  • वही हमारा वध करो।

भगवान्, मधु और कैटभ का वध करते है

ऋषिरुवाच॥१०२॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः॥१०३॥

  • ऋषि कहते हैं-
  • तब तथास्तु कहकर,
  • शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने,
  • उन दोनों के मस्तक, अपनी जाँघ पर रखकर,
  • चक्रसे काट डाले।

असुरों के संहार के लिए, देवी महामाया प्रकट हुई थी

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥१०४॥

  • इस प्रकार,
  • ये देवी महामाया,
  • ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं।
  • अब पुनः तुम से,
  • उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ,
  • सो सुनो।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥


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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 2

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Durga Saptashati – 2

दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

Saptashati

Durga

दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 – अर्थ सहित
Categories
Devi Mahatmya

दुर्गा कवच – देवी कवच – अर्थसहित

Devi Kavach – Durga Kavach – Meaning in Hindi

देवी कवच अध्याय के मुख्य प्रसंग

  1. देवी कवच विनियोग
  2. दुर्गा कवच का पाठ क्यों करना चाहिए
  3. देवियोंके के विभिन्न वाहन और देवीके स्वरुप

  4. देवी कवच आरम्भ करने से पहले प्रार्थना
  5. देवी कवच आरम्भ
  6. देवी कवच पाठ के लाभ

देवी कवच विनियोग

अथ देवी कवच
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता,
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्,
दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे
सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

  • ॐ इस श्रीचण्डीकवचके,
  • ब्रह्मा ऋषि,
  • अनुष्टुप् छन्द,
  • चामुण्डा देवता,
  • अङ्गन्यासमें कही गई माताएं बीज,
  • दिग्बन्ध देवता तत्व है,
  • श्रीजगदम्बाजी की कृपा के लिए
  • सप्तशती के पाठ के जपमें,
  • इसका विनियोग किया जाता है।

ॐ चण्डिका देवीको नमस्कार है।


देवी कवच का पाठ क्यों करना चाहिए

1.

मनुष्योंकी सब प्रकारसे, रक्षा करनेवाला, दुर्गा कवच

मार्कण्डेय उवाच –
ॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥

  • मार्कण्डेयजीने कहा – पितामह!
  • जो इस संसारमें परम गोपनीय तथा
  • मनुष्योंकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और
  • जो अबतक आपने,
  • दूसरे किसीके सामने प्रकट नहीं किया हो,
  • ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥१॥

2.

सभी प्राणियोंका का उपकार करनेवाला, और पवित्र, देवी कवच

ब्रह्मोवाच –
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥

  • ब्रह्माजी बोले – ब्रह्मन्!
  • ऐसा साधन तो,
  • एक देवीका कवच ही है,
  • जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय,
  • पवित्र तथा
  • सम्पूर्ण प्राणियोंका उपकार करनेवाला है।
  • महामुने! उसे श्रवण करो॥२॥

3.

1. शैलपुत्री, 2. ब्रह्मचारिणी, 3. चन्द्रघण्टा, 4. कूष्माण्डा

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥

  • देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं,
  • जिन्हें – नवदुर्गा – कहते हैं।
  • उनके पृथक्-पृथक् नाम बतलाये जाते हैं।
  • प्रथम नाम
    • शैलपुत्री है।
  • दूसरी मूर्तिका नाम
    • ब्रह्मचारिणी है।
  • तीसरा स्वरूप
    • चन्द्रघण्टा के नामसे प्रसिद्ध है।
  • चौथी मूर्तिको
    • कूष्माण्डा कहते हैं।

4.

5. स्कन्दमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥

  • पाँचवीं दुर्गाका नाम
    • स्कन्दमाता है।
  • देवीके छठे रूपको
    • कात्यायनी कहते हैं।
  • सातवाँ
    • कालरात्रि और
  • आठवाँ स्वरूप
    • महागौरी के नामसे
  • प्रसिद्ध है।

5.

9. सिद्धिदात्री

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥

  • नवीं दुर्गाका नाम
    • सिद्धिदात्री है।
  • ये सब नाम,
  • सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान्‌के द्वारा ही,
  • प्रतिपादित हुए हैं॥५॥

6 – 7.

देवीकी कृपा से, सारे दुःख और संकट, दूर हो जाते है, और, भय नहीं लगता

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥

  • जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो,
  • रणभूमिमें शत्रुओंसे घिर गया हो,
  • विषम संकटमें फँस गया हो तथा
  • इस प्रकार भयसे आतुर होकर
  • जो भगवती दुर्गाकी शरणमें प्राप्त हुए हों,
  • उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता॥६॥
  • युद्धके समय संकटमें पड़नेपर भी,
  • उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं आती और
  • उन्हें शोक, दुःख और
  • भयकी प्राप्ति नहीं होती॥७॥

8.

देवी का चिंतन करनेवालों की, देवी सदैव रक्षा करती है

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥

  • जिन्होंने,
  • भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है,
  • उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है।
  • देवेश्वरि!
  • जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं,
  • उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती हो॥८॥

देवियोंके के विभिन्न वाहन और देवीके स्वरुप

9.

चामुण्डादेवी, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवीदेवी

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥

  • चामुण्डादेवी,
    • प्रेतपर आरूढ़ होती हैं।
  • वाराही,
    • भैंसेपर सवारी करती हैं।
  • ऐन्द्री का वाहन,
    • ऐरावत हाथी है।
  • वैष्णवीदेवी,
    • गरुडपर ही आसन जमाती हैं॥९॥

10.

माहेश्वरी, कौमारीका, लक्ष्मीदेवी

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥

  • माहेश्वरी,
    • वृषभपर आरूढ़ होती हैं।
  • कौमारी का वाहन,
    • मयूर है।
  • भगवान् विष्णुकी प्रियतमा लक्ष्मीदेवी,
    • कमलके आसनपर विराजमान हैं और
    • हाथोंमें कमल धारण किये हुए हैं॥१०॥

11.

ईश्वरीदेवी, ब्राह्मीदेवी

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११॥

  • वृषभपर आरूढ़ ईश्वरीदेवीने,
    • श्वेत रूप धारण कर रखा है।
  • ब्राह्मीदेवी,
    • हंसपर बैठी हुई हैं और
    • सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं॥११॥

12.

योगशक्तियोंसे सम्पन्न सभी देवी के रूप

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२॥

  • इस प्रकार ये सभी माताएँ,
  • सब प्रकारकी योगशक्तियोंसे सम्पन्न हैं।
  • इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं,
  • जो अनेक प्रकारके आभूषणोंकी शोभासे युक्त तथा
  • नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं॥१२॥

13.

देवियोंके शस्त्र-धारण करने का उद्देश्य

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥

  • (देवियोंके शस्त्र-धारणका उद्देश्य श्लोक 13 – 15 में)
  • ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोधमें भरी हुई हैं और
  • भक्तोंकी रक्षाके लिये,
  • रथपर बैठी दिखायी देती हैं।
  • ये शंख, चक्र,
  • गदा, शक्ति,
  • हल और मुसल, और …

14.

भक्तों की रक्षा के लिए, देवी माँ के हाथों में, विभिन्न अस्त्र-शस्त्र

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥

  • खेटक और तोमर,
  • परशु तथा पाश,
  • कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम
  • शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र,
  • अपने हाथोंमें धारण करती हैं।

15.

देवी के अस्त्र शस्त्रों से, राक्षसों का संहार और, भक्तों की रक्षा

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥

  • दैत्योंके शरीरका नाश करना,
  • भक्तोंको अभयदान देना और
  • देवताओंका कल्याण करना –
  • यही उनके शस्त्र-धारणका,
  • उद्देश्य है॥१३-१५॥

16.

देवी कवच आरम्भ करने से पहले प्रार्थना

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥१६॥

  • कवच आरम्भ करनेके पहले,
  • इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये –
  • महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम,
  • महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि!
  • तुम महान् भयका नाश करनेवाली हो,
  • तुम्हें नमस्कार है॥१६॥

देवी कवच आरम्भ

17.

माँ जगदम्बा, ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति), अग्निशक्ति

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥

  • तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है।
  • शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके!
    • मेरी रक्षा करो।
  • पूर्व दिशामें,
    • ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति),
    • मेरी रक्षा करे।
  • अग्निकोणमें,
    • अग्निशक्ति, और… ॥१७॥

18.

वाराही, खड्गधारिणी, वारुणी और मृगवाहिनी

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्‌गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥

  • दक्षिण दिशामें,
    • वाराही तथा
  • नैर्ऋत्यकोणमें,
    • खड्गधारिणी,
    • मेरी रक्षा करे।
  • पश्चिम दिशामें,
    • वारुणी और
  • वायव्यकोणमें,
    • मृगपर सवारी करनेवाली देवी,
    • मेरी रक्षा करे॥१८॥

19.

कौमारी, शूलधारिणीदेवी, ब्रह्माणि, वैष्णवीदेवी

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥

  • उत्तर दिशामें,
    • कौमारी और
  • ईशान-कोणमें,
    • शूलधारिणीदेवी,
    • रक्षा करे।
  • ब्रह्माणि,
    • तुम ऊपरकी ओरसे मेरी रक्षा करो और
  • वैष्णवीदेवी,
    • नीचेकी ओरसे,
    • मेरी रक्षा करे॥१९॥

20.

चामुण्डादेवी, जया, विजया

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥

  • इसी प्रकार शवको अपना वाहन बनानेवाली,
  • चामुण्डादेवी,
    • दसों दिशाओंमें,
    • मेरी रक्षा करे।
  • जया,
    • आगेसे और
  • विजया,
    • पीछेकी ओरसे,
    • मेरी रक्षा करे॥२०॥

21.

अजिता, अपराजिता, उद्योतिनी

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥

  • वामभागमें,
    • अजिता और
  • दक्षिणभागमें,
    • अपराजिता,
    • रक्षा करे।
  • वामभाग अर्थात
    • बाई ओर, बाएं तरफ
  • उद्योतिनी,
    • शिखाकी रक्षा करे।
  • उमा,
    • मेरे मस्तकपर विराजमान होकर,
    • रक्षा करे॥२१॥

22.

मालाधरी, यशस्विनी देवी, त्रिनेत्रा, यमघण्टा देवी

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥

  • ललाटमें,
    • मालाधरी रक्षा करे और
  • यशस्विनीदेवी,
    • मेरी भौंहोंका,
    • संरक्षण करे।
  • भौंहोंके मध्यभागमें,
    • त्रिनेत्रा और
  • नथुनोंकी,
    • यमघण्टादेवी,
    • रक्षा करे॥२२॥

23.

शंखिनी, द्वारवासिनी, कालिकादेवी, भगवती शांकरी

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥

  • दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें,
    • शंखिनी और
  • कानोंमें,
    • द्वारवासिनी रक्षा करे।
  • कालिकादेवी,
    • कपोलोंकी तथा
  • भगवती शांकरी,
    • कानोंके मूलभागकी,
    • रक्षा करे॥२३॥

24.

सुगन्धा, चर्चिका देवी, अमृतकला, सरस्वतीदेवी

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥

  • नासिकामें,
    • सुगन्धा और
  • ऊपरके ओठमें,
    • चर्चिकादेवी रक्षा करे।
  • नीचेके ओठमें,
    • अमृतकला तथा
  • जिह्वामें,
    • सरस्वतीदेवी,
    • रक्षा करे॥२४॥

25.

कौमारी, चण्डिका, चित्रघण्टा, महामाया

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥

  • कौमारी,
    • दाँतोंकी और
  • चण्डिका,
    • कण्ठप्रदेशकी रक्षा करे।
  • चित्रघण्टा,
    • गलेकी घाँटीकी और
  • महामाया,
    • तालुमें रहकर,
  • रक्षा करे॥२५॥

26.

कामाक्षी, सर्वमंगला, भद्रकाली, धनुर्धरी

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥

  • कामाक्षी,
    • ठोढ़ीकी और
  • सर्वमंगला,
    • मेरी वाणीकी रक्षा करे।
  • भद्रकाली,
    • ग्रीवामें (गलेमें) और
  • धनुर्धरी,
    • मेरुदण्ड (पृष्ठवंश) में रहकर,
  • रक्षा करे॥२६॥

27.

नीलग्रीवा, नलकूबरी, खड्गिनी, वज्रधारिणी

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥

  • कण्ठके बाहरी भागमें,
    • नीलग्रीवा और
  • कण्ठकी नलीमें,
    • नलकूबरी रक्षा करे।
  • दोनों कंधोंमें,
    • खड्गिनी और
  • मेरी दोनों भुजाओंकी,
    • वज्रधारिणी,
  • रक्षा करे॥२७॥

28.

दण्डिनी, अम्बिका, शूलेश्वरी, कुलेश्वरी

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्‌गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥२८॥

  • दोनों हाथोंमें,
    • दण्डिनी और
  • अंगुलियोंमें,
    • अम्बिका रक्षा करे।
  • शूलेश्वरी,
    • नखोंकी रक्षा करे।
  • कुलेश्वरी,
    • कुक्षि (पेट) में रहकर,
  • रक्षा करे॥२८॥

29.

महादेवी, शोकविनाशिनी देवी, ललितादेवी, शूलधारिणी

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥

  • महादेवी,
    • दोनों स्तनोंकी और
  • शोकविनाशिनीदेवी,
    • मनकी रक्षा करे।
  • ललितादेवी,
    • हृदयमें और
  • शूलधारिणी,
    • उदरमें रहकर,
  • रक्षा करे॥२९॥

30.

कामिनी, गुह्येश्वरी, पूतना और कामिका, महिषवाहिनी

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥

  • नाभिमें,
    • कामिनी और
  • गुह्यभागकी,
    • गुह्येश्वरी रक्षा करे।
  • पूतना और कामिका,
    • लिंगकी और
  • महिषवाहिनी,
    • गुदाकी रक्षा करे॥३०॥

31.

भगवती, विन्ध्यवासिनी, महाबलादेवी

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥

  • भगवती,
    • कटिभागमें और
  • विन्ध्यवासिनी,
    • घुटनोंकी रक्षा करे।
  • सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली महाबलादेवी
    • दोनों पिण्डलियोंकी,
  • रक्षा करे॥३१॥

32.

नारसिंही, तैजसीदेवी, श्रीदेवी, तलवासिनी

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्‌गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥३२॥

  • नारसिंही,
    • दोनों घुट्ठियोंकी और
  • तैजसीदेवी,
    • दोनों चरणोंके पृष्ठभागकी रक्षा करे।
  • श्रीदेवी,
    • पैरोंकी अंगुलियोंमें और
  • तलवासिनी,
    • पैरोंके तलुओंमें रहकर रक्षा करे॥३२॥

33.

दंष्ट्राकराली देवी, ऊर्ध्वकेशिनी देवी, कौबेरी, वागीश्वरी देवी

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥

  • अपनी दाढ़ोंके कारण,
  • भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकरालीदेवी,
    • नखोंकी और
  • ऊर्ध्वकेशिनीदेवी,
    • केशोंकी रक्षा करे।
  • रोमावलियोंके छिद्रोंमें,
    • कौबेरी और
  • त्वचाकी,
    • वागीश्वरीदेवी रक्षा करे॥३३॥

34.

पार्वतीदेवी, कालरात्रि, मुकुटेश्वरी

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥

  • पार्वतीदेवी,
    • रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और
    • मेदकी रक्षा करे।
  • आँतोंकी,
    • कालरात्रि और
  • पित्तकी,
    • मुकुटेश्वरी रक्षा करे॥३४॥

35.

पद्मावतीदेवी, चूडामणिदेवी, ज्वालामुखी, अभेद्यादेवी

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ॥३५॥

  • मूलाधार आदि कमल-कोशोंमें,
    • पद्मावतीदेवी और
  • कफमें,
    • चूडामणिदेवी स्थित होकर रक्षा करे।
  • नखके तेजकी,
    • ज्वालामुखी रक्षा करे।
  • जिसका किसी भी अस्त्रसे,
  • भेदन नहीं हो सकता,
  • वह अभेद्यादेवी,
    • शरीरकी समस्त संधियोंमें रहकर रक्षा करे॥३५॥

36.

ब्रह्माणि!, छत्रेश्वरी, धर्मधारिणी देवी

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥

  • ब्रह्माणि,
    • आप मेरे वीर्यकी रक्षा करें।
  • छत्रेश्वरी,
    • छायाकी तथा
  • धर्मधारिणी-देवी,
    • मेरे अहंकार, मन और
    • बुद्धिकी रक्षा करे॥३६॥

37.

वज्रहस्तादेवी, भगवती कल्याणशोभना

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥

  • हाथमें वज्र धारण करनेवाली,
  • वज्रहस्तादेवी,
    • मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायुकी रक्षा करे।
  • कल्याणसे शोभित होनेवाली,
  • भगवती कल्याणशोभना,
    • मेरे प्राणकी रक्षा करे॥३७॥

38.

योगिनीदेवी, नारायणीदेवी

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥

  • रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श – इन विषयोंका अनुभव करते समय,
    • योगिनीदेवी रक्षा करे तथा
  • सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी रक्षा सदा,
    • नारायणीदेवी करे॥३८॥

39.

वाराही, वैष्णवी, लक्ष्मी

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥

  • वाराही,
    • आयुकी रक्षा करे।
  • वैष्णवी,
    • धर्मकी रक्षा करे तथा
  • चक्रिणी (चक्र धारण करनेवाली) देवी,
    • यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा
    • विद्याकी रक्षा करे॥३९॥

40.

इन्द्राणि, चंडिका, महालक्ष्मी, भैरवी

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥

  • इन्द्राणि,
    • आप मेरे गोत्रकी रक्षा करें।
  • चण्डिके!,
    • तुम मेरे पशुओंकी रक्षा करो।
  • महालक्ष्मी,
    • पुत्रोंकी रक्षा करे और
  • भैरवी,
    • पत्नीकी रक्षा करे॥४०॥

41.

सुपथा, क्षेमकरी, महालक्ष्मी, विजयादेवी

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥

  • मेरे पथकी,
    • सुपथा तथा
  • मार्गकी,
    • क्षेमकरी रक्षा करे।
  • राजाके दरबारमें,
    • महालक्ष्मी रक्षा करे तथा
  • सब ओर व्याप्त रहनेवाली,
  • विजयादेवी,
    • सम्पूर्ण भयोंसे,
  • मेरी रक्षा करे॥४१॥

42.

पापनाशिनी देवी, मेरी सब ओर से रक्षा करों

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥

  • देवि! जो स्थान कवचमें नहीं कहा गया है,
  • अतएव रक्षासे रहित है,
  • वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो;
  • क्योंकि तुम विजयशालिनी और
  • पापनाशिनी हो॥४२॥

देवी कवच पाठ के लाभ

43.

यात्रा के पहले दुर्गा कवच का पाठ

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥

  • यदि अपने शरीरका भला चाहे तो,
  • मनुष्य बिना कवचके कहीं एक पग भी न जाय –
  • कवचका पाठ करके ही यात्रा करे॥४३॥
  • क्योंकि…

44.

धन लाभ, विजय और इच्छाओं की पूर्ति

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥

  • कवचके द्वारा,
  • सब ओरसे सुरक्षित मनुष्य,
  • जहाँ-जहाँ भी जाता है,
  • वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा
  • सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाली,
  • विजयकी प्राप्ति होती है।
  • वह जिस-जिस वस्तुका चिन्तन करता है,
  • उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है।
  • वह पुरुष,
  • इस पृथ्वीपर तुलनारहित,
  • महान् ऐश्वर्यका भागी होता है॥४४॥

45.

पराजय, शोक और भय से मुक्ति

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥

  • कवचसे सुरक्षित मनुष्य,
    • निर्भय हो जाता है।
  • युद्धमें उसकी,
  • पराजय नहीं होती तथा
  • वह तीनों लोकोंमें,
  • पूजनीय होता है॥४५॥

46 – 47.

नियमित, श्रद्धापूर्वक देवी कवच का पाठ

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥४७॥

  • देवीका यह कवच,
  • देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।
  • जो प्रतिदिन नियमपूर्वक,
  • तीनों संध्याओंके समय,
  • श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता है,
  • उसे…॥४६॥
  • दैवी कला प्राप्त होती है तथा
  • वह तीनों लोकोंमें,
  • कहीं भी पराजित नहीं होता।
  • इतना ही नहीं, वह अपमृत्युसे रहित हो,
  • सौ से भी अधिक वर्षोंतक जीवित रहता है॥४७॥

48.

सभी व्याधियों और रोगों से मुक्ति

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥

  • उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ,
  • नष्ट हो जाती हैं।
  • सभी प्रकारके विष,
  • दूर हो जाते हैं, और
  • उनका कोई असर नहीं होता॥४८॥

49 – 50 – 51 – 52.

देवी कवच, सभी बुरी चीजों से रक्षा करता है

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ॥४९॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥५२॥

  • इस पृथ्वीपर,
  • मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा
  • इस प्रकारके जितने मन्त्र-यन्त्र होते हैं,
  • वे सब इस कवचको हृदयमें धारण कर लेनेपर,
  • उस मनुष्यको देखते ही नष्ट हो जाते हैं।
  • ये ही नहीं,
  • पृथ्वीपर विचरनेवाले ग्रामदेवता,
  • आकाशचारी देवविशेष,
  • जलके सम्बन्धसे प्रकट होनेवाले गण,
  • उपदेशमात्रसे सिद्ध होनेवाले निम्नकोटिके देवता,
  • अपने जन्मके साथ प्रकट होनेवाले देवता,
  • कुलदेवता, माला (कण्ठमाला आदि),
  • डाकिनी, शाकिनी,
  • अन्तरिक्षमें विचरनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,
  • ग्रह, भूत, पिशाच,
  • यक्ष, गन्धर्व, राक्षस,
  • ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और
  • अनिष्टकारक देवता भी,
  • हृदयमें कवच धारण किये रहनेपर,
  • उस मनुष्यको देखते ही भाग जाते हैं।
  • कवचधारी पुरुषको,
  • राजासे सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है।
  • यह कवच,
  • मनुष्यके तेजकी वृद्धि करनेवाला और
  • उत्तम है॥४९-५२॥

53 – 54.

सुयश, वृद्धि और परिवार के लिए देवी माँ का कवच

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥

  • कवचका पाठ करनेवाला पुरुष,
  • अपनी कीर्तिसे विभूषित भूतलपर,
  • अपने सुयशके साथ-साथ,
  • वृद्धिको प्राप्त होता है।
  • जो पहले कवचका पाठ करके,
  • उसके बाद,
  • सप्तशती चण्डीका पाठ करता है,
  • उसकी जबतक,
  • वन, पर्वत और काननों सहित,
  • यह पृथ्वी टिकी रहती है,
  • तबतक यहाँ,
  • पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा,
  • बनी रहती है॥५३-५४॥

55.

परमपद की प्राप्ति

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥

  • फिर देहका अन्त होनेपर,
  • वह पुरुष,
  • भगवती महामायाके प्रसादसे,
  • उस नित्य परमपदको प्राप्त होता है,
  • जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥५५॥

56.

भगवान् शिव के चरणों में जगह

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥

  • वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और
  • कल्याणमय शिवके साथ,
  • आनन्दका भागी होता है॥५६॥

  • इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

Saptashati

Durga

दुर्गा कवच – देवी कवच – अर्थसहित
Categories
Ramayan

सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 01

सुंदरकांड की लिस्ट (Sunderkand – Index)

  • सुन्दरकांड में
  • 526 चौपाइयाँ,
  • 60 दोहे,
  • 6 छंद और 3 श्लोक है।

सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।


सुन्दरकांड के पहले भाग के मुख्य प्रसंग

  1. हनुमानजी का वानरों को समझाकर,
    • लंका की और जाना

  2. मैनाक पर्वत से भेंट
  3. सुरसा से भेंट
  4. सुरसा को, हनुमानजी की शक्ति और बुद्धि का पता चलना
  5. समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

  6. हनुमानजी का लंका पहुंचना

  7. लंका का वर्णन
  8. लंका के बग़ीचों, रास्तों और राक्षसों का वर्णन

  9. हनुमानजी का लंका में प्रवेश

1. हनुमानजी लंका जाने के लिए चले

1.1

हनुमानजी वानरों को समझाते है

जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

  • जाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर
  • हनुमानजी को अपने मन में,
  • वे वचन बहुत अच्छे लगे॥
  • और हनुमानजी ने कहा की हे भाइयो!
  • आप लोग कन्द, मूल व फल खा,
  • दुःख सह कर मेरी राह देखना॥

1.2

श्रीराम का कार्य करने पर, मन को, ख़ुशी मिलती है

जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

  • जब मै,
  • सीताजीको देखकर लौट आऊंगा,
  • तब कार्य सिद्ध होने पर,
  • मन को बड़ा हर्ष होगा॥
  • ऐसे कह, सबको नमस्कार करके,
  • रामचन्द्रजी का ह्रदय में ध्यान धरकर,
  • प्रसन्न होकर,
  • हनुमानजी लंका जाने के लिए चले॥

1.3

हनुमानजी ने, एक पहाड़ पर, भगवान् श्रीराम का स्मरण किया

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी।
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

  • समुद्र के तीर पर,
  • एक सुन्दर पहाड़ था।
  • उसपर कूदकर,
  • हनुमानजी कौतुकी से चढ़ गए॥
  • फिर वारंवार,
  • रामचन्द्रजी का स्मरण करके,
  • बड़े पराक्रम के साथ,
  • हनुमानजी ने गर्जना की॥

1.4

हनुमानजी, श्रीराम के बाण जैसे तेज़ गति से, लंका की ओर जाते है

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

  • जिस पहाड़ पर,
  • हनुमानजी ने पाँव रखे थे,
  • वह पहाड़,
  • तुरंत पाताल के अन्दर चला गया॥
  • और जैसे,
  • श्रीरामचंद्रजी का अमोघ बाण जाता है,
  • ऐसे हनुमानजी वहा से चले॥

सोरठा

समुद्र ने, मैनाक पर्वत को, हनुमानजी की सेवा के लिए भेजा

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

  • समुद्र ने हनुमानजी को,
  • श्रीराम का दूत जानकर,
  • मैनाक नाम पर्वत से कहा की,
  • हे मैनाक,
  • तू जा, और इनको ठहरा कर,
  • श्रम मिटानेवाला हो॥

मैनाक पर्वत, हनुमानजी से, विश्राम करने के लिए कहता है

सिन्धुवचन सुनी कान, तुरत उठेउ मैनाक तब।
कपिकहँ कीन्ह प्रणाम, बार बार कर जोरिकै॥

  • समुद्रके वचन,
  • कानो में पड़तेही
  • मैनाक पर्वत वहांसे तुरंत उठा, और
  • हनुमानजीके पास आकर,
  • वारंवार हाथ जोड़कर
  • उसने हनुमानजीको प्रणाम किया॥

1. दोहा

प्रभु राम का कार्य, पूरा किये बिना, विश्राम नही

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥1॥

  • हनुमानजी ने,
  • उसको अपने हाथसे छूकर,
  • फिर उसको प्रणाम किया,
  • और कहा की,
  • रामचन्द्रजीका का कार्य किये बिना,
  • मुझको विश्राम कहा है? ॥1॥

2. हनुमानजी की सुरसा से भेंट

2.1

देवताओं ने नागमाता सुरसा को भेजा

जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

  • हनुमानजी को जाते देखकर
  • उनके बल और
  • बुद्धि के वैभव को जानने के लिए
  • देवताओं ने,
  • नाग माता सुरसा को भेजा।
  • उस नागमाताने आकर,
  • हनुमानजी से यह बात कही॥

2.2

सुरसा ने हनुमानजी का रास्ता रोका

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

  • “आज तो मुझको,
  • देवताओं ने यह अच्छा आहार दिया।”
  • यह बात सुन हँस कर,
  • हनुमानजी बोले॥
  • “मैं रामचन्द्रजी का काम करके लौट आऊ और
  • सीताजी की खबर,
  • रामचन्द्रजी को सुना दूं॥”

2.3

हनुमानजी ने, सुरसा को समझाया कि, वह उनको नहीं खा सकती

तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

  • फिर हे माता!
  • मै आकर आपके मुँह में,
  • प्रवेश करूंगा।
  • अभी तू मुझे जाने दे।
  • इसमें कुछभी फर्क नहीं पड़ेगा।
  • मै तुझे सत्य कहता हूँ॥
  • जब सुरसा ने,
  • किसी उपायसे उनको जाने नहीं दिया,
  • तब हनुमानजी ने कहा कि,
  • तू क्यों देरी करती है?
  • तू मुझको नही खा सकती॥

2.4

सुरसा ने, कई योजन मुंह फैलाया, तो हनुमानजी ने भी, शरीर फैलाया

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

  • सुरसाने अपना मुंह,
  • एक योजनभरमें फैलाया।
  • हनुमानजी ने अपना शरीर,
  • दो योजन विस्तारवाला किया॥
  • सुरसा ने अपना मुँह,
  • सोलह (१६) योजनमें फैलाया।
  • हनुमानजीने अपना शरीर तुरंत,
  • बत्तीस (३२) योजन बड़ा किया॥

2.5

सुरसा ने, मुंह सौ योजन फैलाया, तो हनुमानजी ने, छोटा सा रूप धारण किया

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

  • सुरसा ने जैसा जैसा मुंह फैलाया,
  • हनुमानजीने वैसे ही अपना स्वरुप,
  • उससे दुगना दिखाया॥
  • जब सुरसा ने अपना मुंह,
  • सौ योजन (चार सौ कोस का) में फैलाया,
  • तब हनुमानजी तुरंत,
  • बहुत छोटा स्वरुप धारण कर॥

2.6

सुरसा को, हनुमानजी की शक्ति का पता चला

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

  • उसके मुंहमें पैठ कर (घुसकर),
  • झट बाहर चले आए।
  • फिर सुरसा से विदा मांग कर,
  • हनुमानजी ने प्रणाम किया॥
  • उस वक़्त सुरसा ने हनुमानजी से कहा की –
  • हे हनुमान!
  • देवताओंने मुझको जिसके लिए भेजा था,
  • वह तेरा बल और बुद्धि का भेद,
  • मैंने अच्छी तरह पा लिया है॥

2. दोहा

सुरसा, हनुमानजी को प्रणाम करके, चली जाती है

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥2॥

  • तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो,
  • सो श्रीरामचंद्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे।
  • ऐसे आशीर्वाद देकर,
  • सुरसा तो अपने घर को चली,
  • और हनुमानजी प्रसन्न होकर,
  • लंकाकी ओर चले ॥2॥

3. हनुमानजी, लंका की ओर चले

3.1

समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

  • समुद्र के अन्दर एक राक्षस रहता था।
  • सो वह माया करके,
  • आकाशचारी पक्षी और जंतुओको,
  • पकड़ लिया करता था॥
  • जो जीवजन्तु आकाश में उड़कर जाता,
  • उसकी परछाई जल में देखकर,
  • परछाई को जल में पकड़ लेता॥

3.2

हनुमानजी ने, मायावी राक्षस के छल को पहचाना

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥

  • परछाई को जल में पकड़ लेता,
  • जिससे वह जिव जंतु फिर वहा से सरक नहीं सकता।
  • इस तरह वह हमेशा,
  • आकाशचारी जिवजन्तुओ को खाया करता था॥
  • उसने वही कपट हनुमानसे किया।
  • हनुमान ने उसका वह छल,
  • तुरंत पहचान लिया॥

3.4

हनुमानजी समुद्र के पार पहुंचे

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

  • धीर बुद्धिवाले पवनपुत्र वीर हनुमानजी
  • उसे मारकर समुद्र के पार उतर गए॥
  • वहा जाकर हनुमानजी वन की शोभा देखते है कि,
  • भ्रमर मकरंद के लोभसे गुँजाहट कर रहे है॥

लंका का वर्णन

3.5

हनुमानजी लंका पहुंचे

नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

  • अनेक प्रकार के वृक्ष,
  • फल और फूलोसे शोभायमान हो रहे है।
  • पक्षी और हिरणोंका झुंड देखकर,
  • मन मोहित हुआ जाता है॥
  • वहा सामने हनुमानजी एक बड़ा विशाल पर्वत देखकर,
  • निर्भय होकर,
  • उस पहाड़पर कूदकर चढ़ बैठे॥

3.6

भगवान् शंकर, पार्वतीजी को, श्रीराम की महिमा बताते है

उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥

  • महदेव जी कहते है कि
  • हे पार्वती!
  • इसमें हनुमान की कुछ भी अधिकता नहीं है।
  • यह तो केवल रामचन्द्रजीके ही
  • प्रताप का प्रभाव है कि,
  • जो काल को भी खा जाता है॥
  • पर्वत पर चढ़कर हनुमानजी ने लंका को देखा,
  • तो वह ऐसी बड़ी दुर्गम है की,
  • जिसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता॥

3.7

लंका नगरी और उसके सुवर्ण कोट का वर्णन

अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥

  • पहले तो वह पुरी बहुत ऊँची,
  • फिर उसके चारो ओर समुद्र की खाई।
  • उसपर भी सुवर्णके कोटका महाप्रकाश कि,
  • जिससे नेत्र चकाचौंध हो जावे॥

छंद

लंका नगरी और उसके महाबली राक्षसों का वर्णन

कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

  • उस नगरीका रत्नों से जड़ा हुआ,
  • सुवर्ण का कोट,
  • अतिव सुन्दर बना हुआ है।
  • चौहटे, दुकाने व सुन्दर गलियों के बहार,
  • उस सुन्दर नगरी के अन्दर बनी है॥
  • जहा हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल व
  • रथोकी गिनती कोई नहीं कर सकता।
  • और जहा महाबली,
  • अद्भुत रूपवाले राक्षसोके सेनाके झुंड इतने है कि
  • जिसका वर्णन किया नहीं जा सकता॥

लंका के बाग-बगीचों का वर्णन

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥

  • जहा वन, बाग़, बागीचे,
  • बावडिया, तालाब, कुएँ,
  • बावलिया शोभायमान हो रही है।
  • जहां मनुष्यकन्या, नागकन्या,
  • देवकन्या और गन्धर्वकन्याये विराजमान हो रही है –
  • जिनका रूप देखकर,
  • मुनिलोगोका मन मोहित हुआ जाता है॥
  • कही पर्वत के समान बड़े विशाल देहवाले महाबलिष्ट,
  • मल्ल गर्जना करते है और
  • अनेक अखाड़ों में अनेक प्रकारसे भिड रहे है और
  • एक एकको आपस में पटक पटक कर गर्जना कर रहे है॥

लंका के राक्षसों का बुरा आचरण

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

  • जहा कही विकट शरीर वाले करोडो भट,
  • चारो तरफसे नगरकी रक्षा करते है और
  • कही वे राक्षस लोग,
  • भैंसे, मनुष्य, गौ, गधे, बकरे और
  • पक्षीयोंको खा रहे है॥
  • राक्षस लोगो का आचरण बहुत बुरा है।
  • इसीलिए तुलसीदासजी कहते है कि
  • मैंने इनकी कथा बहुत संक्षेपसे कही है।
  • ये महादुष्ट है, परन्तु,
  • रामचन्द्रजीके बानरूप पवित्र तीर्थनदीके अन्दर,
  • अपना शरीर त्यागकर,
  • गति अर्थात मोक्षको प्राप्त होंगे॥

3. दोहा

हनुमानजी, छोटा सा रूप धरकर, लंका में प्रवेश करने का सोचते है

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार ॥3॥

  • हनुमानजी ने बहुत से रखवालो को देखकर,
  • मन में विचार किया की,
  • मै छोटा रूप धारण करके नगर में प्रवेश करूँ ॥3॥

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सुंदरकांड – 02

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Sunderkand – 02

सुन्दरकाण्ड की लिस्ट (Sunderkand – Index)

Sunderkand

Hanuman

सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 01
Categories
Dohe

गुरु महिमा – संत कबीर के दोहे अर्थसहित

सतगुरु का जीवन में महत्व

1.

गुरु को पहले प्रणाम करें

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय॥

  • गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
    • गुरु और गोविन्द (भगवान),
    • दोनों एक साथ खड़े है
  • काके लागूं पांय।
    • पहले किसके चरण-स्पर्श करें (प्रणाम करे)?
  • बलिहारी गुरु आपने,
    • कबीरदासजी कहते है,
    • पहले गुरु को प्रणाम करूँगा
    • क्योंकि, आपने (गुरु ने),
  • गोविंद दियो बताय॥
    • गोविंद तक पहुंचने का मार्ग बताया है।

ज्ञान, मोक्ष और सत्य के लिए, गुरु की शरण जरूरी

2.

गुरु बिन ज्ञान न उपजै,
गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को,
गुरु बिन मिटे न दोष॥

  • गुरु बिन ज्ञान न उपजै, –
    • गुरु के बिना,
    • ज्ञान मिलना कठिन है
  • गुरु बिन मिलै न मोष। –
    • गुरु के बिना,
    • मोक्ष नहीं
  • गुरु बिन लखै न सत्य को, –
    • गुरु के बिना,
    • सत्य को पह्चानना असंभव है और
  • गुरु बिन मिटे न दोष॥ –
    • गुरु बिना,
    • दोष का अर्थात
    • मन के विकारों का,
    • मिटना मुश्किल है

गुरु की आज्ञा और उनके बताये मार्ग

यदि गुरु की आज्ञा नहीं मानी, तो….

3.

गुरु आज्ञा मानै नहीं,
चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए,
आए सिर पर काल॥

  • गुरु आज्ञा मानै नहीं, –
    • जो मनुष्य,
    • गुरु की आज्ञा नहीं मानता है, और
  • चलै अटपटी चाल। –
    • गलत मार्ग पर चलता है
  • लोक वेद दोनों गए, –
    • वह,
    • लोक और वेद दोनों से ही,
    • लोक अर्थात दुनिया और
    • वेद अर्थात धर्म, से
    • पतित हो जाता है और
  • आए सिर पर काल॥ –
    • दुःख और कष्टों से,
    • घिरा रहता है

सतगुरु के बताएं मार्ग पर चलना जरूरी है, क्योंकि…..

4.

गुरु शरणगति छाडि के,
करै भरोसा और।
सुख संपती को कह चली,
नहीं नरक में ठौर॥

  • गुरु शरणगति छाडि के –
    • जो व्यक्ति सतगुरु की शरण छोड़कर और
    • उनके बताये मार्ग पर न चलकर
  • करै भरोसा और –
    • अन्य बातो में विश्वास करता है
  • सुख संपती को कह चली –
    • उसे जीवन में,
    • दुखो का सामना करना पड़ता है और
  • नहीं नरक में ठौर –
    • उसे नरक में भी जगह नहीं मिलती

गुरु, किस प्रकार, शिष्य के मन के विकार, दूर करते है?

5.

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है,
गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दै,
बाहर बाहै चोट॥

  • गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, –
    • गुरु कुम्हार के समान है
    • शिष्य मिट्टी के घडे के समान है
  • गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट। –
    • गुरु कठोर अनुशासन,
    • किन्तु मन में प्रेम भावना रखते हुए,
    • शिष्य के खोट को,
    • अर्थात मन के विकारों को,
    • दूर करते है
  • अंतर हाथ सहार दै, –
    • जैसे कुम्हार,
    • घड़े के भीतर से,
    • हाथ का सहारा देता है
  • बाहर बाहै चोट॥ –
    • और बाहर चोट मारकर,
    • घड़े को सुन्दर आकार देता है

पारस पत्थर और गुरु में क्या अंतर है?

6.

गुरु पारस को अन्तरो,
जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे,
ये करि लेय महंत॥

  • गुरु पारस को अन्तरो –
    • गुरु और पारस पत्थर के अंतर को
  • जानत हैं सब संत –
    • सभी संत (विद्वान, ज्ञानीजन),
    • भलीभाँति जानते हैं।
  • वह लोहा कंचन करे –
    • पारस पत्थर,
    • सिर्फ लोहे को सोना बनाता है
  • ये करि लेय महंत –
    • किन्तु गुरु,
    • शिष्य को ज्ञान की शिक्षा देकर,
    • अपने समान गुनी और महान बना लेते है।

गुरु, सबसे बड़े दाता अर्थात दानी है

7.

गुरु समान दाता नहीं,
याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा,
सो गुरु दिन्ही दान॥

  • गुरु समान दाता नहीं –
    • गुरु के समान,
    • कोई दाता (दानी) नहीं है
  • याचक सीष समान –
    • शिष्य के समान,
    • कोई याचक (माँगनेवाला) नहीं है
  • तीन लोक की सम्पदा –
    • ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति,
    • जो तीनो लोको की,
    • संपत्ति से भी बढ़कर है
  • सो गुरु दिन्ही दान –
    • शिष्य के मांगने से,
    • गुरु उसे यह संपत्ति अर्थात
    • ज्ञान रूपी सम्पदा,
    • दान में दे देते है

मोह माया के लुभावने बंधनो से छूटने के लिए, गुरु की कृपा जरूरी

8.

कबीर माया मोहिनी,
जैसी मीठी खांड।
सतगुरु की किरपा भई,
नहीं तौ करती भांड॥

  • कबीर माया मोहिनी –
    • माया (संसार का आकर्षण)
    • बहुत ही मोहिनी है, लुभावनी है
  • जैसी मीठी खांड –
    • जैसे,
    • मीठी शक्कर या मिसरी
  • सतगुरु की किरपा भई –
    • सतगुरु की कृपा हो गयी
    • (इसलिए माया के इस मोहिनी रूप से बच गया)
  • नहीं तौ करती भांड –
    • नहीं तो यह मुझे भांड बना देती।
    • (भांड अर्थात – विदूषक, मसख़रा, गंवार, उजड्ड)
  • माया ही मनुष्य को,
  • संसार के जंजाल में उलझाए रखती है।
  • संसार के मोहजाल में फंसकर,
  • अज्ञानी मनुष्य,
  • मन में,
  • अहंकार, इच्छा,
  • राग और द्वेष के विकारों को,
  • उत्पन्न करता रहता है।
  • विकारों से भरा मन,
  • माया के प्रभाव से उपर नहीं उठ सकता है और
  • जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है।
  • कबीरदासजी कहते है,
  • सतगुरु की कृपा से, मनुष्य,
  • माया के इस मोहजाल से,
  • छूट सकता है।

सतगुरु – जैसे अमृत की खान – ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति देनेवाले

9.

यह तन विष की बेलरी,
गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै,
तो भी सस्ता जान॥

  • यह तन विष की बेलरी –
    • यह शरीर सांसारिक विषयो की बेल है।
  • गुरु अमृत की खान –
    • सतगुरु विषय और विकारों से रहित है,
    • इसलिए वे अमृत की खान है
  • मन के विकार (अहंकार, आसक्ति, द्वेष आदि),
  • विष के समान होते है।
  • इसलिए शरीर जैसे विष की बेल है।
  • सीस दिये जो गुर मिलै –
    • ऐसे सतगुरु,
    • यदि शीश (सर्वस्व) अर्पण करने पर भी मिल जाए
  • तो भी सस्ता जान –
    • तो भी यह सौदा,
    • सस्ता ही समझना चाहिए।
  • अपना सर्वस्व समर्पित करने पर भी,
  • ऐसे सतगुरु से भेंट हो जाए,
  • जो विषय विकारों से मुक्त है।
  • तो भी यह सौदा,
  • सस्ता ही समझना चाहिए।
  • क्योंकि, गुरु से ही,
  • हमें ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति मिल सकती है,
  • जो तीनो लोको की संपत्ति से भी बढ़कर है।

सतगुरु की महिमा अपरंपार है

10.

सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

  • सतगुरु महिमा अनंत है –
    • सतगुरु की महिमा अनंत हैं
  • अनंत किया उपकार –
    • उन्होंने मुझ पर,
    • अनंत उपकार किये है
  • लोचन अनंत उघारिया –
    • उन्होंने मेरे ज्ञान के चक्षु,
    • (अनन्त लोचन अर्थात ज्ञान के चक्षु),
    • खोल दिए
  • अनंत दिखावन हार –
    • और मुझे,
    • अनंत (ईश्वर) के दर्शन करा दिए।
  • ज्ञान चक्षु खुलने पर ही,
  • मनुष्य को,
  • इश्वर के दर्शन हो सकते है।
  • मनुष्य आंखों से नहीं परन्तु,
  • भीतर के ज्ञान के चक्षु से ही,
  • निराकार परमात्मा को देख सकता है।

सतगुरु के गुण अनगिनत है

11.

सब धरती कागद करूँ,
लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ,
गुरु गुण लिखा न जाय॥

  • सब धरती कागद करूं –
    • सारी धरती को,
    • कागज बना लिया जाए
  • लिखनी सब बनराय –
    • सब वनों की (जंगलो की) लकडियो को,
    • कलम बना ली जाए
  • सात समुद्र का मसि करूं –
    • सात समुद्रों को,
    • स्याही बना ली जाए
  • गुरु गुण लिखा न जाय –
    • तो भी गुरु के गुण लिखे नहीं जा सकते,
    • (गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता)।
    • क्योंकि,
    • गुरु की महिमा अपरंपार है।

अहंकार त्यागकर ही, गुरु से ज्ञान प्राप्त हो सकता है

12.

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए,
सीस दीजिए दान।
बहुतक भोंदू बह गए,
राखि जीव अभिमान॥

  • गुरु सों ज्ञान जु लीजिए –
    • गुरु से ज्ञान पाने के लिए
  • सीस दीजिए दान –
    • तन और मन,
    • पूर्ण श्रद्धा से,
    • गुरु के चरणों में समर्पित कर दो।
  • राखि जीव अभिमान –
    • जो अपने तन, मन और धन का,
    • अभिमान नहीं छोड़ पाते है
  • बहुतक भोंदु बहि गये –
    • ऐसे कितने ही मूर्ख (भोंदु) और अभिमानी लोग,
    • संसार के माया के प्रवाह में बह जाते है।
    • वे संसार के माया जाल में,
    • उलझ कर रह जाते है और
    • उद्धार से वंचित रह जाते है।

ज्ञान प्राप्ति के लिए, निरंतर ध्यान और भक्ति

13.

गुरु मूरति गति चंद्रमा,
सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे,
गुरु मूरति की ओर॥

  • गुरु मूरति गति चंद्रमा –
    • गुरु की मूर्ति जैसे चन्द्रमा और
  • सेवक नैन चकोर –
    • शिष्य के नेत्र जैसे चकोर पक्षी।
    • (चकोर पक्षी चन्द्रमा को निरंतर निहारता रहता है, वैसे ही हमें)
  • गुरु मूरति की ओर –
    • गुरु ध्यान में और
    • गुरु भक्ति में
  • आठ पहर निरखत रहे –
    • आठो पहर रत रहना चाहिए।
    • (निरखत, निरखना – ध्यान से देखना)

सतगुरु को कभी दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए, क्योंकि ….

14.

कबीर ते नर अन्ध हैं,
गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है,
गुरु रुठे नहिं ठौर॥

  • कबीर ते नर अन्ध हैं –
    • संत कबीर कहते है की
    • वे मनुष्य,
    • नेत्रहीन (अन्ध) के समान है
  • गुरु को कहते और –
    • जो गुरु के महत्व को,
    • नहीं जानते
  • हरि के रुठे ठौर है –
    • भगवान के रूठने पर,
    • मनुष्य को स्थान (ठौर) मिल सकता है
  • गुरु रुठे नहिं ठौर –
    • लेकिन,
    • गुरु के रूठने पर,
    • कही स्थान नहीं मिल सकता

15.

आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥

  • आछे दिन पाछे गये –
    • अच्छे दिन बीत गए
    • अर्थात
    • मनुष्य सुख के दिन,
    • सिर्फ मौज मस्ती में बिता देता है
  • गुरु सों किया न हेत –
    • गुरु की भक्ति नहीं की,
    • गुरु के वचन नहीं सुने
  • अब पछितावा क्या करे –
    • अब पछताने से क्या होगा
  • चिड़िया चुग गई खेत –
    • जब चिड़ियाँ खेत चुग गई
    • (जब अवसर चला गया)

संत कबीर के दोहे – अर्थसहित


Kabirdas ke Dohe – Guru Mahima

सतगुरु सम कोई नहीं,
सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये,
अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड॥

सतगुरु तो सतभाव है,
जो अस भेद बताय।
धन्य शीष धन भाग तिहि,
जो ऐसी सुधि पाय॥


गुरु मुरति आगे खडी,
दुतिया भेद कछु नाहि।
उन्ही कूं परनाम करि,
सकल तिमिर मिटी जाहिं॥

गुरु की आज्ञा आवै,
गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं,
आवागमन नशाय॥


भक्ति पदारथ तब मिलै,
जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो,
पूरण भाग मिलाय॥

गुरु को सिर राखिये,
चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को,
तीन लोक भय नहिं॥


गुरुमुख गुरु चितवत रहे,
जैसे मणिहिं भुवंग।
कहैं कबीर बिसरें नहीं,
यह गुरुमुख को अंग॥

कबीर ते नर अंध है,
गुरु को कहते और।
हरि के रूठे ठौर है,
गुरु रूठे नहिं ठौर॥


भक्ति-भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

गुरु बिन माला फेरते,
गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन सब निष्फल गया,
पूछौ वेद पुरान॥


कबीर गुरु की भक्ति बिन,
धिक जीवन संसार।
धुवाँ का सा धौरहरा,
बिनसत लगै न बार॥

कबीर गुरु की भक्ति करु,
तज निषय रस चौंज।
बार-बार नहिं पाइए,
मानुष जनम की मौज॥


काम क्रोध तृष्णा तजै,
तजै मान अपमान।
सतगुरु दाया जाहि पर,
जम सिर मरदे मान॥

कबीर गुरु के देश में,
बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै,
जाति वरन कुल खोय॥


आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥

अमृत पीवै ते जना,
सतगुरु लागा कान।
वस्तु अगोचर मिलि गई,
मन नहिं आवा आन॥


बलिहारी गुरु आपनो,
घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया,
करत न लागी बार॥

गुरु आज्ञा लै आवही,
गुरु आज्ञा लै जाय।
कहै कबीर सो सन्त प्रिय,
बहु विधि अमृत पाय॥


भूले थे संसार में,
माया के साँग आय।
सतगुरु राह बताइया,
फेरि मिलै तिहि जाय॥

बिना सीस का मिरग है,
चहूँ दिस चरने जाय।
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं,
राखो तत्व लगाय॥


गुरु नारायन रूप है,
गुरु ज्ञान को घाट।
सतगुरु बचन प्रताप सों,
मन के मिटे उचाट॥

गुरु समरथ सिर पर खड़े,
कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै,
मुक्ति न छोड़े पास॥


तीरथ गये ते एक फल,
सन्त मिले फल चार।
सतगुरु मिले अनेक फल,
कहें कबीर विचार॥

सतगुरु खोजो सन्त,
जोव काज को चाहहु।
मिटे भव को अंक,
आवा गवन निवारहु॥


सतगुरु शब्द उलंघ के,
जो सेवक कहूँ जाय।
जहाँ जाय तहँ काल है,
कहैं कबीर समझाय॥

सतगुरु को माने नही,
अपनी कहै बनाय।
कहै कबीर क्या कीजिये,
और मता मन जाय॥


सतगुरु मिला जु जानिये,
ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भांड तोड़ि करि,
रहै निराला होय॥

सतगुरु मिले जु सब मिले,
न तो मिला न कोय।
माता-पिता सुत बाँधवा,
ये तो घर घर होय॥


चौंसठ दीवा जोय के,
चौदह चन्दा माहिं।
तेहि घर किसका चाँदना,
जिहि घर सतगुरु नाहिं॥

सुख दुख सिर ऊपर सहै,
कबहु न छोड़े संग।
रंग न लागै का,
व्यापै सतगुरु रंग॥


यह सतगुरु उपदेश है,
जो मन माने परतीत।
करम भरम सब त्यागि के,
चलै सो भव जल जीत॥

जाति बरन कुल खोय के,
भक्ति करै चितलाय।
कहैं कबीर सतगुरु मिलै,
आवागमन नशाय॥


जेहि खोजत ब्रह्मा थके,
सुर नर मुनि अरु देव।
कहै कबीर सुन साधवा,
करु सतगुरु की सेव॥

Kabir Dohe

Dohe

Guru Mahima - Sant Kabir ke Dohe - Arth Sahit - Meaning in Hindi
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मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके

  • इस लेख में,
  • मन को नियंत्रण में करने के लिए,
  • 15 उपाय दिए गए हैं।
  • इस पोस्ट में,
  • जितने उपाय बताए गए हैं,
  • वे सभी,
  • संत, महात्मा पुरुष या ऊँचे साधक द्वारा,
  • बताई गई बातों से लिए गए हैं।
  • आध्यात्मिक जीवन हो या
  • सांसारिक जीवन,
  • दोनों ही स्थितियों में,
  • सफलता के लिए,
  • मन पर कंट्रोल, सबसे महत्वपूर्ण है।
  • यदि आपको लगता है कि,
  • मन पर नियंत्रण करना जरूरी है,
  • तो अपनी अवस्था के अनुकुल
  • नीचे दिए गए उपाय में से,
  • किसी एक उपाय से शुरू कर सकते हैं।

इस आर्टिकल में, मन को शांत करने के लिए, जो आनापान ध्यान साधना है उसके बारे में नहीं दिया गया है।

आनापान ध्यान और विपश्यना के बारे में, विस्तार से, दूसरे आर्टिकल में दिया गया है।


मन को वश में क्यों करें?

भगवान् ने, मन के बारे में, गीता में क्या कहा है?

  • श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –
  • जिसका मन वशमें नहीं है,
  • उसके लिये,
  • योगका प्राप्त करना,
  • अत्यन्त कठिन है,
  • परन्तु जिसका मन वशमें है,
  • ऐसा प्रयत्नशील व्यक्ति,
  • साधन द्वारा,
  • योग प्राप्त कर सकता है।’

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
(गीता ६ ॥३६)

  • भगवान् श्रीकृष्णके,
  • इन वचनोंके अनुसार,
  • यह सिद्ध होता है कि,
  • मनको वश में किये बिना,
  • परमात्माकी प्राप्ति के लिए,
  • योग, भक्ति या साधना
  • अत्यन्त कठिन है।

दुःखोंसे मुक्ति के लिए, मन को काबू में करने के अलावा, दुसरा उपाय नही

  • यदि कोई ऐसा चाहे कि,
  • मन तो अपनी इच्छानुसार,
  • निरंकुश होकर,
  • विषय वाटिकामे,
  • स्वच्छन्द विचरण किया करे और
  • परमात्माके दर्शन,
  • अपनेआप ही हो जायें,
  • तो यह उसकी भूल है।
  • आनन्दमय परमात्माकी प्राप्ति और
  • दुःखोंसे मुक्ति चाहनेवाले को,
  • मन को वशमें करना ही पड़ेगा,
  • इसके सिवा,
  • और कोई उपाय नहीं है।

आदि शंकराचार्य ने मन के बारे में कहा है –

  • भगवान् शङ्कराचार्यने कहा है –

जित जगत् केन, मनो हि येन।

  • अर्थात,
  • जगत को किसने जीता?
  • जिसने मनको जीत लिया।
  • अर्थात, मन पर विजय मिलते ही,
  • मानो विश्वपर विजय मिल जाती है।

किन्तु, मन बड़ा चंचल और बलवान है

  • परन्तु,
  • मन स्वभावसे ही बड़ा चञ्चल और
  • बलवान् है और
  • इसे वशमें करना,
  • साधारण बात नहीं।
  • सारे साधन,
  • इसीको कंट्रोल में करने के लिये,
  • किये जाते है,

अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण से कहा था, मन बड़ा चंचल है

  • अर्जुनने भी मनको वशमें करना,
  • कठिन समझकर,
  • भगवान् से यही कहा था –

चञ्चलं हि मनः कृष्ण
प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये
वायोरिव सुदुष्करम्॥ (गीता ६।३४)

  • हे भगवन्।
  • यह मन बड़ा ही चंचल,
  • हठीला, दृढ़ और बलवान है।
  • इसे रोकना मैं तो,
  • वायुके रोकनेके समान,
  • अत्यन्त दुष्कर समझता हूँ।

लेकिन, भगवान् कृष्ण ने, अर्जुन को, मन वश में करने का रास्ता बताया

  • भगवान् ने भी इस बातको स्वीकार किया,
  • पर साथ ही उपाय भी बतला दिया –

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
(गीता ६ । ३५)

  • भगवान् ने कहा, – अर्जुन!
  • इसमे कोई सन्देह नहीं कि,
  • इस चञ्चल मनका निग्रह करना,
  • बड़ा ही कठिन है,
  • परन्तु अभ्यास और वैराग्यसे,
  • यह वशमें हो सकता है।
  • इससे यह सिद्ध हो गया कि,
  • मनका वशमें करना कठिन भले ही हो,
  • पर असम्भव नहीं, और
  • इसके वश किये बिना,
  • दुःखोंकी निवृत्ति नहीं।
  • इसलिए मन को,
  • वश में करने का,
  • निरंतर प्रयास करना ही चाहिये।
  • इसके लिये,
  • सबसे पहले इसका साधारण स्वरुप और
  • स्वभाव जानने की आवश्यकता है।

मनका स्वरूप

मन क्या है?

  • यह आत्म और अनात्म पदार्थके,
  • बीचमे रहनेवाली एक विलक्षण वस्तु है।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

  • मन इतना बलवान है की,
  • यह व्यक्ति को,
  • बंधन या मोक्ष दोनों में से,
  • किसी एक रास्ते पर ले जा सकता है।
  • बस, मन ही जगत् है,
  • मन नहीं तो जगत् नहीं।

मन क्या करता है?

  • मन का कार्य है,
  • संकल्प-विकल्प करना,
  • जिसकी वजह से,
  • विकार उत्पन्न होते है।
  • यह जिस पदार्थको,
  • भलीभाँति ग्रहण करता है,
  • स्वयं भी तदाकार बन जाता है।
  • साधारणतया, यही मनका,
  • स्वरूप और स्वभाव है।
  • मन रागके अर्थात
  • आसक्ति के साथ ही चलता है।
  • सारे अनर्थों और दुःखो की उत्पत्ति,
  • रागसे ही होती है।
  • राग न हो तो,
  • मन प्रपञ्चोंकी ओर न जाय।

तो मन को कण्ट्रोल कैसे करें?

  • अब, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की,
  • यह वशमे कैसे हो।
  • इसके लिये उपाय भी,
  • भगवान् ने बतला ही दिया है –
  • अभ्यास और
  • वैराग्य।
  • यही उपाय योगदर्शनमे,
  • महर्षि पतञ्जलिने बतलाया है –

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध।
(समाधिपाद १२)

  • अर्थात,
  • अभ्यास और वैराग्यसे ही,
  • चित्तका निरोध होता है।
  • इसलिए,
  • इसी अभ्यास और,
  • वैराग्य पर,
  • विचार करना चाहिये।

वैराग्य और अभ्यास से मन का नियंत्रण

  • निचे मन को वश में करने के,
  • कुछ उपाय दिए गए है
  • जिसमे पहला उपाय,
  • वैराग्य से संबंधित है और
  • बाद के उपाय,
  • अभ्यास से सम्बंधित है।

1. वैराग्य से संबंधित तरीका – भोगों में वैराग्य

सांसारिक पदार्थों और भोगों की सच्चाई क्या है?

  • जबतक संसारकी वस्तुएँ,
  • सुन्दर और सुखप्रद मालूम होती है,
  • तभीतक मन उनमें जाता है।
  • लेकिन जब,
  • इन भौतिक पदार्थों और भोगों की,
  • असली सच्चाई समझ में आ जाये की,
  • ये सब पदार्थ,
  • दोषयुक्त और दुःखप्रद है,
  • तो मन कदापि इनमें नहीं लगेगा।
  • क्योंकि,
  • इन भोगों के अंत में दुःख ही है,
  • भले ही कुछ समय के लिए,
  • इनमे ख़ुशी मिलती हो,
  • किन्तु अंत में दोष ही है।

सांसारिक वस्तुओं में थोड़े समय के लिए ख़ुशी

  • जब मन को,
  • यह सच्चाई समझ में आ जायेगी,
  • तब मन,
  • कभी इन वस्तुओं के पीछे नहीं दौड़ेगा और
  • यदि कभी इनकी ओर गया भी,
  • तो उसी समय वापस लौट आवेगा।
  • इसलिये, संसारके सारे पदार्थोंमे,
  • चाहे वे इहलौकिक हो या पारलौकिक,
  • दुःख और दोषकी प्रत्यक्ष भावना करनी चाहिये।
  • ऐसा दृढ़ प्रत्यय करना चाहिये कि,
  • इन पदार्थोंमें,
  • केवल दोष और दुःख ही भरे हुए है।

अध्यात्म के रास्ते की सच्चाई क्या है?

  • रमणीय और सुखरूप दीखनेवाली,
  • वस्तुमे ही मन लगता है।
  • यदि यह रमणीयता और सुखरूपता,
  • विषयोंसे हटकर,
  • परमात्मा में दिखायी देने लगे,
    • जैसा कि वास्तवमे है,
  • तो यही मन,
  • तुरन्त विषयोंसे हटकर,
  • परमात्मामे लग जाय।
  • यही वैराग्यका साधन है,
  • और वैराग्य ही,
  • मन जीतनेका एक उत्तम उपाय है।
  • सच्चा वैराग्य तो,
  • संसारके इस दीखनेवाले स्वरूपका
    • सर्वथा अभाव और
  • उसकी जगह परमात्माका
    • नित्यभाव प्रतीत होनेमे है।
  • परन्तु आरम्भमे नये साधकको,
  • मन वश करनेके लिये,
  • इस लोक और परलोकके समस्त पदार्थोंमे,
  • दोष और दुःख देखना चाहिये,
  • जिससे मनका अनुराग उनसे हटे।

भगवान् कृष्ण ने, इस वैराग्य के तरीके के बारे में क्या कहा?

  • श्रीभगवान् ने कहा है –

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्यु जराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम्॥
(गीता १३ । ८)

  • इस लोक और परलोकके,
  • समस्त भोगोंमें
    • वैराग्य, अहंकारका त्याग,
  • इस शरीरमे,
    • जन्म, मृत्यु,
    • बुढ़ापा और रोग आदि
  • दुःख और दोष देखने चाहिये।
  • इस प्रकार वैराग्यकी भावनासे,
  • मन वशमे हो सकता है ।
  • यह तो वैराग्यका संक्षिप्त साधन हुआ,
  • अब कुछ अभ्यासोंपर विचार करें।

2. नियमसे रहना

सांसारिक हो या आध्यात्मिक जीवन, सफलता के लिए, नियम का बड़ा महत्व है

  • मनको वश करनेमें,
  • नियमानुवर्तितासे,
    • अर्थात नियमसे रहने से
  • बड़ी सहायता मिलती है।
  • सारे काम ठीक समयपर,
  • नियमानुसार होने चाहिये।
  • प्रातःकाल बिस्तरसे उठकर,
  • रातको सोने तक,
  • दिनभरके कार्योंकी,
  • एक ऐसी नियमित दिनचर्या बना लेनी चाहिये,
  • जिससे जिस समय जो कार्य करना हो,
  • मन अपने-आप स्वभावसे ही,
  • उस समय उसी कार्य में लग जाय।
  • संसार-साधनमे तो नियमानुवर्तितासे,
  • लाभ होता ही है,
  • परमार्थमे भी इससे बड़ा लाभ होता है।

ध्यान के समय का नियम

  • अपने जिस इष्ट स्वरूपके ध्यानके लिये,
  • प्रतिदिन जिस स्थानपर, जिस आसनपर,
  • जिस आसनसे, जिस समय और
  • जितने समय बैठा जाय,
  • उसमे किसी दिन भी,
  • आलस या व्यतिक्रम नहीं होना चाहिये।
  • पाँच मिनटका भी नियमित ध्यान,
  • अनियमित अधिक समयके ध्यानसे उत्तम है।
  • आज दस मिनट बैठे, कल आध घण्टे,
  • परसो बिल्कुल नहीं किया,
  • इस प्रकारके साधनसे,
  • साधक को मनको,
  • शांत और नियंत्रण करना,
  • अत्यंत कठिन होता है और
  • सिद्धि भी कठिनतासे मिलती है।
  • जब पाँच मिनटका ध्यान नियमसे होने लगे,
  • तब दस मिनटका करे,
  • परन्तु दस मिनटका करनेके बाद,
  • किसी दिन भी नौ मिनट न होना चाहिये।
  • इसी प्रकार स्थान, आसन, समय,
  • इष्ट और मन्त्रका,
  • बारबार परिवर्तन नहीं करना चाहिये।
  • इस तरह, नियम से रहने से भी,
  • मन स्थिर होता है।

सभी बातों में नियम

  • नियमोंका पालन,
  • खाने, पीने, पहनने,
  • सोने और व्यवहार करने,
  • सभी चीजों में होना चाहिये।
  • नियम अपनी अवस्था के अनुकुल,
  • शास्त्रसम्मत बना लेने चाहिये।

3. मनकी क्रियाओंपर विचार

मन के अच्छे और बुरे विचार

  • मनके प्रत्येक कार्यपर,
  • विचार करना चाहिये।
  • प्रतिदिन रातको सोनेसे पूर्व,
  • दिनभरके मनके कार्योंपर,
  • विचार करना उचित है।
  • यद्यपि,
  • मनकी सारी उधेड़-बुनका,
  • स्मरण होना बड़ा कठिन है,
  • परन्तु,
  • जितनी याद रहे,
  • उतनी ही बातों पर विचार कर,
  • जो-जो संकल्प अर्थात विचार,
  • सात्त्विक मालूम दें,
  • उनके लिये,
  • मनकी सराहना करना और
  • जो-जो सङ्कल्प,
  • तामसिक अर्थात बुरे मालूम पड़ें,
  • उनको सुधारने का संकल्प करना चाहिए।

मन के बुरे संकल्प, धीरे धीरे समाप्त हो जाएंगे

  • प्रतिदिन इस प्रकारके अभ्याससे,
  • मनपर सत्कार्य करनेके और
  • बुरे कार्य छोड़नेके संस्कार जमने लगेंगे।
  • जिससे कुछ ही समयमें,
  • मन बुराइयों से बचकर,
  • भले भले कार्योंमे लग जायगा|
  • मन पहले भले कार्यवाला होगा,
  • तब उसे वश करनेमें सुगमता होगी।

बुरी संगति में, पड़ा हुआ बालक का उदाहरण

  • बुरी संगति में पड़ा हुआ बालक जबतक,
  • कुसंगति नहीं छोड़ता,
  • तबतक उसे बुरी संगति से,
  • दूर रहने की सलाह मिलती रहती है।
  • क्योंकि,
  • जबतक वह बालक,
  • बुरी सांगत में है,
  • तब तक उसे कुछ भी समझाना,
  • कठिन होता है।
  • पर जब कुसंग छूट जाता है,
  • तब उसे बुरी सलाह नहीं मिल सकती,
  • दिनरात घरमे उसको,
  • माता-पिताके सदुपदेश मिलते हैं,
  • वह भली-भली बातें सुनता है।
  • तब फिर उसके सुधरकर,
  • माता-पिताके आज्ञाकारी होनेमे,
  • विलम्ब नहीं होता।

मन में, बुरे विचारों की जगह, अच्छे विचार आना शुरू हो जाएंगे

  • इसी तरह,
  • यदि विषय-चिन्तन करनेवाले मनको,
  • कोई एक साथ ही,
  • सर्वथा विषयरहित करना चाहे,
  • तो वह नहीं कर सकता।
  • पहले मनको,
  • बुरे चिन्तनसे बचाना चाहिये,
  • जब वह परमात्म-सम्बन्धी,
  • शुभ चिन्तन करने लगेगा,
  • तब उसको वश करनेमें,
  • कोई कठिनाई नहीं होगी।

4. मनके कहनेमें न चलना

  • मनके कहने में,
  • नहीं चलना चाहिये।
  • जबतक यह मन,
  • वशमें नहीं हो जाता,
  • तबतक इसके कहने के अनुसार,
  • नहीं चलना चाहिये।
  • जैसे शत्रुके प्रत्येक कार्यपर,
  • निगरानी रखनी पड़ती है,
  • वैसे ही,
  • इसके भी प्रत्येक कार्यको,
  • सावधानीसे देखना चाहिये।

मन लोभी, मन लालची, मन चंचल, मन चोर।
मन के मते ना चालीये। मन पल पल में कहीं और॥

  • मनकी खातिर,
  • भूलकर भी नहीं करनी चाहिये।
  • जहाँ कहीं यह उलटा सीधा करने लगे,
  • वहीं इसे धिक्कारना और पछाड़ना चाहिये।

मन बड़ा बलवान, किन्तु धीरे धीरे काबू में आ ही जाता है

  • यद्यपि यह बड़ा बलवान् है,
  • कई बार इससे हारना होगा,
  • पर साहस नहीं छोड़ना चाहिये।
  • जो हिम्मत नहीं हारता,
  • वह एक दिन मनको,
  • अवश्य जीत लेता है।
  • इससे लड़नेमे एक विचित्रता है।
  • यदि दृढ़तासे लढा जाय तो,
  • लड़ने वाले का बल दिनोदिन बढ़ता है और
  • इसका क्रमशः घटने लगता है।
  • इसलिये,
  • इससे लड़नेवाला एक-न-एक दिन,
  • इसपर अवश्य ही विजयी होता है।
  • अतएव इसकी हाँ-में-हाँ न मिलाकर,
  • प्रत्येक कार्यमें खूब सावधानीसे बरतना चाहिये।
  • यह मन बड़ा ही चतुर है।
  • कभी डरावेगा, कभी फुसलावेगा,
  • कभी लालच देगा,
  • बड़े-बड़े अनोखे रंग दिखलावेगा,
  • परन्तु कभी इसके धोखेमे न आना चाहिये।
  • भूलकर भी इसका विश्वास नहीं करना चाहिये।

आज्ञाकारी मन

  • इस प्रकार करनेसे,
  • इसकी हिम्मत टूट जायगी,
  • और
  • लड़ने और धोखा देनेकी,
  • आदत छूट जायगी।
  • अंत में यह आज्ञा देनेवाला न रहकर,
  • सीधा-सादा आज्ञा पालन करनेवाला,
  • विश्वासी सेवक बन जायगा।

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