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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 01

सुंदरकांड की लिस्ट (Sunderkand – Index)

  • सुन्दरकांड में
  • 526 चौपाइयाँ,
  • 60 दोहे,
  • 6 छंद और 3 श्लोक है।

सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।


सुन्दरकांड के पहले भाग के मुख्य प्रसंग

  1. हनुमानजी का वानरों को समझाकर,
    • लंका की और जाना

  2. मैनाक पर्वत से भेंट
  3. सुरसा से भेंट
  4. सुरसा को, हनुमानजी की शक्ति और बुद्धि का पता चलना
  5. समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

  6. हनुमानजी का लंका पहुंचना

  7. लंका का वर्णन
  8. लंका के बग़ीचों, रास्तों और राक्षसों का वर्णन

  9. हनुमानजी का लंका में प्रवेश

1. हनुमानजी लंका जाने के लिए चले

1.1

हनुमानजी वानरों को समझाते है

जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

  • जाम्बवान के सुहावने वचन सुनकर
  • हनुमानजी को अपने मन में,
  • वे वचन बहुत अच्छे लगे॥
  • और हनुमानजी ने कहा की हे भाइयो!
  • आप लोग कन्द, मूल व फल खा,
  • दुःख सह कर मेरी राह देखना॥

1.2

श्रीराम का कार्य करने पर, मन को, ख़ुशी मिलती है

जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

  • जब मै,
  • सीताजीको देखकर लौट आऊंगा,
  • तब कार्य सिद्ध होने पर,
  • मन को बड़ा हर्ष होगा॥
  • ऐसे कह, सबको नमस्कार करके,
  • रामचन्द्रजी का ह्रदय में ध्यान धरकर,
  • प्रसन्न होकर,
  • हनुमानजी लंका जाने के लिए चले॥

1.3

हनुमानजी ने, एक पहाड़ पर, भगवान् श्रीराम का स्मरण किया

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी।
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

  • समुद्र के तीर पर,
  • एक सुन्दर पहाड़ था।
  • उसपर कूदकर,
  • हनुमानजी कौतुकी से चढ़ गए॥
  • फिर वारंवार,
  • रामचन्द्रजी का स्मरण करके,
  • बड़े पराक्रम के साथ,
  • हनुमानजी ने गर्जना की॥

1.4

हनुमानजी, श्रीराम के बाण जैसे तेज़ गति से, लंका की ओर जाते है

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

  • जिस पहाड़ पर,
  • हनुमानजी ने पाँव रखे थे,
  • वह पहाड़,
  • तुरंत पाताल के अन्दर चला गया॥
  • और जैसे,
  • श्रीरामचंद्रजी का अमोघ बाण जाता है,
  • ऐसे हनुमानजी वहा से चले॥

सोरठा

समुद्र ने, मैनाक पर्वत को, हनुमानजी की सेवा के लिए भेजा

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

  • समुद्र ने हनुमानजी को,
  • श्रीराम का दूत जानकर,
  • मैनाक नाम पर्वत से कहा की,
  • हे मैनाक,
  • तू जा, और इनको ठहरा कर,
  • श्रम मिटानेवाला हो॥

मैनाक पर्वत, हनुमानजी से, विश्राम करने के लिए कहता है

सिन्धुवचन सुनी कान, तुरत उठेउ मैनाक तब।
कपिकहँ कीन्ह प्रणाम, बार बार कर जोरिकै॥

  • समुद्रके वचन,
  • कानो में पड़तेही
  • मैनाक पर्वत वहांसे तुरंत उठा, और
  • हनुमानजीके पास आकर,
  • वारंवार हाथ जोड़कर
  • उसने हनुमानजीको प्रणाम किया॥

1. दोहा

प्रभु राम का कार्य, पूरा किये बिना, विश्राम नही

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥1॥

  • हनुमानजी ने,
  • उसको अपने हाथसे छूकर,
  • फिर उसको प्रणाम किया,
  • और कहा की,
  • रामचन्द्रजीका का कार्य किये बिना,
  • मुझको विश्राम कहा है? ॥1॥

2. हनुमानजी की सुरसा से भेंट

2.1

देवताओं ने नागमाता सुरसा को भेजा

जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

  • हनुमानजी को जाते देखकर
  • उनके बल और
  • बुद्धि के वैभव को जानने के लिए
  • देवताओं ने,
  • नाग माता सुरसा को भेजा।
  • उस नागमाताने आकर,
  • हनुमानजी से यह बात कही॥

2.2

सुरसा ने हनुमानजी का रास्ता रोका

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

  • “आज तो मुझको,
  • देवताओं ने यह अच्छा आहार दिया।”
  • यह बात सुन हँस कर,
  • हनुमानजी बोले॥
  • “मैं रामचन्द्रजी का काम करके लौट आऊ और
  • सीताजी की खबर,
  • रामचन्द्रजी को सुना दूं॥”

2.3

हनुमानजी ने, सुरसा को समझाया कि, वह उनको नहीं खा सकती

तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

  • फिर हे माता!
  • मै आकर आपके मुँह में,
  • प्रवेश करूंगा।
  • अभी तू मुझे जाने दे।
  • इसमें कुछभी फर्क नहीं पड़ेगा।
  • मै तुझे सत्य कहता हूँ॥
  • जब सुरसा ने,
  • किसी उपायसे उनको जाने नहीं दिया,
  • तब हनुमानजी ने कहा कि,
  • तू क्यों देरी करती है?
  • तू मुझको नही खा सकती॥

2.4

सुरसा ने, कई योजन मुंह फैलाया, तो हनुमानजी ने भी, शरीर फैलाया

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

  • सुरसाने अपना मुंह,
  • एक योजनभरमें फैलाया।
  • हनुमानजी ने अपना शरीर,
  • दो योजन विस्तारवाला किया॥
  • सुरसा ने अपना मुँह,
  • सोलह (१६) योजनमें फैलाया।
  • हनुमानजीने अपना शरीर तुरंत,
  • बत्तीस (३२) योजन बड़ा किया॥

2.5

सुरसा ने, मुंह सौ योजन फैलाया, तो हनुमानजी ने, छोटा सा रूप धारण किया

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

  • सुरसा ने जैसा जैसा मुंह फैलाया,
  • हनुमानजीने वैसे ही अपना स्वरुप,
  • उससे दुगना दिखाया॥
  • जब सुरसा ने अपना मुंह,
  • सौ योजन (चार सौ कोस का) में फैलाया,
  • तब हनुमानजी तुरंत,
  • बहुत छोटा स्वरुप धारण कर॥

2.6

सुरसा को, हनुमानजी की शक्ति का पता चला

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

  • उसके मुंहमें पैठ कर (घुसकर),
  • झट बाहर चले आए।
  • फिर सुरसा से विदा मांग कर,
  • हनुमानजी ने प्रणाम किया॥
  • उस वक़्त सुरसा ने हनुमानजी से कहा की –
  • हे हनुमान!
  • देवताओंने मुझको जिसके लिए भेजा था,
  • वह तेरा बल और बुद्धि का भेद,
  • मैंने अच्छी तरह पा लिया है॥

2. दोहा

सुरसा, हनुमानजी को प्रणाम करके, चली जाती है

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥2॥

  • तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो,
  • सो श्रीरामचंद्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे।
  • ऐसे आशीर्वाद देकर,
  • सुरसा तो अपने घर को चली,
  • और हनुमानजी प्रसन्न होकर,
  • लंकाकी ओर चले ॥2॥

3. हनुमानजी, लंका की ओर चले

3.1

समुद्र में छाया पकड़ने वाला राक्षस

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

  • समुद्र के अन्दर एक राक्षस रहता था।
  • सो वह माया करके,
  • आकाशचारी पक्षी और जंतुओको,
  • पकड़ लिया करता था॥
  • जो जीवजन्तु आकाश में उड़कर जाता,
  • उसकी परछाई जल में देखकर,
  • परछाई को जल में पकड़ लेता॥

3.2

हनुमानजी ने, मायावी राक्षस के छल को पहचाना

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥

  • परछाई को जल में पकड़ लेता,
  • जिससे वह जिव जंतु फिर वहा से सरक नहीं सकता।
  • इस तरह वह हमेशा,
  • आकाशचारी जिवजन्तुओ को खाया करता था॥
  • उसने वही कपट हनुमानसे किया।
  • हनुमान ने उसका वह छल,
  • तुरंत पहचान लिया॥

3.4

हनुमानजी समुद्र के पार पहुंचे

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

  • धीर बुद्धिवाले पवनपुत्र वीर हनुमानजी
  • उसे मारकर समुद्र के पार उतर गए॥
  • वहा जाकर हनुमानजी वन की शोभा देखते है कि,
  • भ्रमर मकरंद के लोभसे गुँजाहट कर रहे है॥

लंका का वर्णन

3.5

हनुमानजी लंका पहुंचे

नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

  • अनेक प्रकार के वृक्ष,
  • फल और फूलोसे शोभायमान हो रहे है।
  • पक्षी और हिरणोंका झुंड देखकर,
  • मन मोहित हुआ जाता है॥
  • वहा सामने हनुमानजी एक बड़ा विशाल पर्वत देखकर,
  • निर्भय होकर,
  • उस पहाड़पर कूदकर चढ़ बैठे॥

3.6

भगवान् शंकर, पार्वतीजी को, श्रीराम की महिमा बताते है

उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥

  • महदेव जी कहते है कि
  • हे पार्वती!
  • इसमें हनुमान की कुछ भी अधिकता नहीं है।
  • यह तो केवल रामचन्द्रजीके ही
  • प्रताप का प्रभाव है कि,
  • जो काल को भी खा जाता है॥
  • पर्वत पर चढ़कर हनुमानजी ने लंका को देखा,
  • तो वह ऐसी बड़ी दुर्गम है की,
  • जिसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता॥

3.7

लंका नगरी और उसके सुवर्ण कोट का वर्णन

अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥

  • पहले तो वह पुरी बहुत ऊँची,
  • फिर उसके चारो ओर समुद्र की खाई।
  • उसपर भी सुवर्णके कोटका महाप्रकाश कि,
  • जिससे नेत्र चकाचौंध हो जावे॥

छंद

लंका नगरी और उसके महाबली राक्षसों का वर्णन

कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

  • उस नगरीका रत्नों से जड़ा हुआ,
  • सुवर्ण का कोट,
  • अतिव सुन्दर बना हुआ है।
  • चौहटे, दुकाने व सुन्दर गलियों के बहार,
  • उस सुन्दर नगरी के अन्दर बनी है॥
  • जहा हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल व
  • रथोकी गिनती कोई नहीं कर सकता।
  • और जहा महाबली,
  • अद्भुत रूपवाले राक्षसोके सेनाके झुंड इतने है कि
  • जिसका वर्णन किया नहीं जा सकता॥

लंका के बाग-बगीचों का वर्णन

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥

  • जहा वन, बाग़, बागीचे,
  • बावडिया, तालाब, कुएँ,
  • बावलिया शोभायमान हो रही है।
  • जहां मनुष्यकन्या, नागकन्या,
  • देवकन्या और गन्धर्वकन्याये विराजमान हो रही है –
  • जिनका रूप देखकर,
  • मुनिलोगोका मन मोहित हुआ जाता है॥
  • कही पर्वत के समान बड़े विशाल देहवाले महाबलिष्ट,
  • मल्ल गर्जना करते है और
  • अनेक अखाड़ों में अनेक प्रकारसे भिड रहे है और
  • एक एकको आपस में पटक पटक कर गर्जना कर रहे है॥

लंका के राक्षसों का बुरा आचरण

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

  • जहा कही विकट शरीर वाले करोडो भट,
  • चारो तरफसे नगरकी रक्षा करते है और
  • कही वे राक्षस लोग,
  • भैंसे, मनुष्य, गौ, गधे, बकरे और
  • पक्षीयोंको खा रहे है॥
  • राक्षस लोगो का आचरण बहुत बुरा है।
  • इसीलिए तुलसीदासजी कहते है कि
  • मैंने इनकी कथा बहुत संक्षेपसे कही है।
  • ये महादुष्ट है, परन्तु,
  • रामचन्द्रजीके बानरूप पवित्र तीर्थनदीके अन्दर,
  • अपना शरीर त्यागकर,
  • गति अर्थात मोक्षको प्राप्त होंगे॥

3. दोहा

हनुमानजी, छोटा सा रूप धरकर, लंका में प्रवेश करने का सोचते है

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार ॥3॥

  • हनुमानजी ने बहुत से रखवालो को देखकर,
  • मन में विचार किया की,
  • मै छोटा रूप धारण करके नगर में प्रवेश करूँ ॥3॥

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सुंदरकांड की लिस्ट (Sunderkand – Index)

  • सुन्दरकांड में 526 चौपाइयाँ, 60 दोहे, 6 छंद और 3 श्लोक है।
  • सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद, 1 दोहा आता है।

सुन्दरकांड के दूसरे भाग के मुख्य प्रसंग

  1. हनुमानजी की लंकिनी से भेंट
  2. ब्रम्हाजी का वरदान और
    • राक्षसों के विनाश का संकेत

  3. हनुमानजी का लंका में प्रवेश
  4. हनुमानजी का लंका में सीताजी की खोज करना

  5. हनुमानजी की विभीषण से भेंट
  6. हनुमानजी का विभीषण को राम कथा सुनाना

हनुमानजी की लंकिनी से भेंट

4.1

हनुमानजी, राम नामका स्मरण करते हुए, लंका में प्रवेश करते है

मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

  • हनुमानजी,
  • मच्छर के समान, छोटा-सा रूप धारण कर,
  • प्रभु श्री रामचन्द्रजी के नाम का सुमिरन करते हुए,
  • लंका में प्रवेश करते है॥

लंकिनी, हनुमानजी का रास्ता रोकती है

  • लंका के द्वार पर,
  • हनुमानजी की भेंट,
  • लंकिनी नाम की एक राक्षसी से होती है॥
  • वह पूछती है कि,
  • मेरा निरादर करके कहा जा रहे हो?

4.2

हनुमानजी, लंकिनी को, घूँसा मारते है

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

  • तूने मेरा भेद नहीं जाना?
  • जहाँ तक चोर हैं,
  • वे सब मेरे आहार हैं।
  • महाकपि हनुमानजी,
  • उसे एक घूँसा मारते है,
  • जिससे वह पृथ्वी पर लुढक पड़ती है।

लंकिनी, हनुमानजी को, प्रणाम करती है

4.3

पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥

  • वह राक्षसी लंकिनी,
  • अपने को सँभालकर फिर उठती है।
  • और डर के मारे हाथ जोड़कर,
  • हनुमानजी से कहती है॥

लंकिनी, हनुमानजी को, ब्रह्माजी के वरदान के बारे में बताती है

  • जब ब्रह्मा ने,
  • रावण को वर दिया था,
  • तब चलते समय उन्होंने,
  • राक्षसों के विनाश की,
  • यह पहचान मुझे बता दी थी कि॥

4.4

ब्रह्माजी के वरदान में, राक्षसों के संहार का संकेत

बिकल होसि तैं कपि कें मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥

  • जब तू बंदर के मारने से,
  • व्याकुल हो जाए,
  • तब तू,
  • राक्षसों का संहार हुआ जान लेना।

हनुमानजी के दर्शन होने के कारण, लंकिनी खुदको भाग्यशाली समझती है

  • हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं,
  • जो मैं श्री रामजी के दूत को,
  • अपनी आँखों से देख पाई।

4. दोहा

थोड़े समय का सत्संग – स्वर्ग के सुख से बढ़कर है

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥4॥

  • हे तात!,
  • स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को,
  • तराजू के एक पलड़े में रखा जाए,
  • तो भी, वे सब मिलकर,
  • उस सुख के बराबर नहीं हो सकते,
  • जो क्षण मात्र के सत्संग से होता है ॥4॥

5.1

प्रभु श्रीराम को निरंतर स्मरण करने के फायदे

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

  • अयोध्यापुरी के राजा रघुनाथ को,
  • हृदय में रखे हुए,
  • नगर में प्रवेश करके,
  • सब काम कीजिए।
  • उसके लिए,
    • अर्थात, जिसके मन में श्री राम का स्मरण रहता है
  • विष,
    • अमृत हो जाता है,
  • शत्रु,
    • मित्रता करने लगते हैं,
  • समुद्र,
    • गाय के खुर के बराबर हो जाता है,
  • अग्नि में,
    • शीतलता आ जाती है।

5.2

हनुमानजी, छोटा सा रूप धरकर, लंका में प्रवेश करते है

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥

  • और हे गरुड़!
  • सुमेरु पर्वत उसके लिए,
    • रज के समान हो जाता है,
  • जिसे राम ने एक बार कृपा करके देख लिया।
  • तब हनुमानजी ने,
  • बहुत ही छोटा रूप धारण किया, और
  • भगवान का स्मरण करके,
  • नगर में प्रवेश किया।

5.3

हनुमानजी, रावण के महल तक पहुंचे

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥

  • उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महल की खोज की।
  • जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा देखे।
  • फिर वे रावण के महल में गए।
  • वह अत्यंत विचित्र था,
  • जिसका वर्णन नहीं हो सकता।

5.4

हनुमानजी, सीताजी की खोज करते करते, विभीषण के महल तक पहुंचे

सयन किएँ देखा कपि तेही।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

  • हनुमानजी ने,
  • महल में रावण को सोया हुआ देखा।
  • वहां भी हनुमानजी ने,
  • सीताजी की खोज की,
  • परन्तु सीताजी,
  • उस महल में कही भी दिखाई नहीं दीं।
  • फिर उन्हें,
  • एक सुंदर भवन दिखाई दिया।
  • उस महल में,
  • भगवान का एक मंदिर बना हुआ था।

5. दोहा

विभीषण के महल का वर्णन – श्रीराम के चिन्ह और तुलसी के पौधे

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई ॥5॥

  • वह महल,
  • श्री राम के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था,
  • उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती।
  • वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर,
  • कपिराज हनुमान हर्षित हुए॥ 5॥

हनुमानजी की विभीषण से भेंट

6.1

राक्षसों की नगरी में, सत-पुरुष को देखकर, हनुमानजी को आश्चर्य हुआ

लंका निसिचर निकर निवासा।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

  • और उन्हीने सोचा की,
  • यह लंका नगरी तो,
  • राक्षसोंके कुलकी निवासभूमी है।
  • यहाँ सत्पुरुषो के रहने का क्या काम॥
  • इस तरह हनुमानजी,
  • मन ही मन में विचार करने लगे।
  • इतने में विभीषण की आँख खुली॥

6.2

हनुमानजी, विभीषण को, राम नाम का जप करते देखते है

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी॥

  • और जागते ही उन्होंने,
  • – राम! राम! – ऐसा स्मरण किया,
  • तो हनुमानजीने जाना की,
  • यह कोई सत्पुरुष है।
  • इस बात से,
  • हनुमानजीको बड़ा आनंद हुआ॥

सत्पुरुषों से क्यों पहचान करनी चाहिये

  • हनुमानजीने विचार किया कि,
  • इनसे जरूर पहचान करनी चहिये,
  • क्योंकि सत्पुरुषोके हाथ,
  • कभी कार्यकी हानि नहीं होती॥

6.3

हनुमानजी, ब्राह्मण का रूप धारण करते है

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥

  • फिर हनुमानजीने,
  • ब्राम्हणका रूप धरकर वचन सुनाया,
  • तो वह वचन सुनतेही,
  • विभीषण उठकर उनके पास आया॥
  • और प्रणाम करके कुशल पूँछा कि,
  • हे विप्र (ब्राह्मणदेव)!,
  • जो आपकी बात हो,
  • सो हमें समझाकर कहो॥

6.4

विभीषण, हनुमानजी से, उनके बारे में पूछते है

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी॥

  • विभीषणने कहा कि,
  • शायद आप कोई भगवन्तोमेंसे तो नहीं हो!
  • क्योंकि मेरे मनमें,
  • आपकी ओर बहुत प्रीती बढती जाती है॥
  • अथवा मुझको बडभागी करने के वास्ते,
  • भक्तोपर अनुराग रखनेवाले ,
  • आप साक्षात दिनबन्धु ही तो नहीं पधार गए हो॥

6. दोहा

हनुमानजी, विभीषण को, श्री राम कथा सुनाते है

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥6॥

  • विभिषणके ये वचन सुनकर,
  • हनुमानजीने रामचन्द्रजीकी सब कथा,
  • विभीषणसे कही, और
  • अपना नाम बताया।

प्रभु राम के, नाम स्मरण से, दोनों के मन आनंदित हो जाते है

  • परस्परकी बाते सुनतेही,
  • दोनोंके शरीर रोमांचित हो गए और
  • श्री रामचन्द्रजीका स्मरण आ जानेसे,
  • दोनों आनंदमग्न हो गए ॥6॥

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सुंदरकांड – 03

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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 02
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 03

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(सुन्दरकांड में 526 चौपाइयाँ, 60 दोहे, 6 छंद और 3 श्लोक है। सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।)


हनुमानजी और विभीषण का संवाद

चौपाई (Chaupai – Sunderkand)

7.1

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥

  • विभीषण कहते है की हे हनुमानजी!
  • हमारी रहनी हम कहते है सो सुनो।
  • जैसे दांतों के बिचमें बिचारी जीभ रहती है,
  • ऐसे हम इन राक्षसोंके बिच में रहते है॥
  • हे प्यारे! वे सूर्यकुल के नाथ (रघुनाथ),
  • मुझको अनाथ जानकर कभी कृपा करेंगे?

7.2

तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

  • जिससे प्रभु कृपा करे ऐसा साधन तो मेरे है नहीं।
  • क्योंकि मेरा शरीर तो तमोगुणी राक्षस है,
  • और न कोई प्रभुके चरणकमलों में मेरे मनकी प्रीति है॥
  • परन्तु हे हनुमानजी,
  • अब मुझको इस बातका पक्का भरोसा हो गया है कि,
  • भगवान मुझपर अवश्य कृपा करेंगे।
  • क्योंकि भगवानकी कृपा बिना,
  • सत्पुरुषोंका मिलाप नहीं होता॥

7.3

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
करहिं सदा सेवक पर प्रीति॥

  • रामचन्द्रजी ने मुझपर कृपा की है।
  • इसीसे आपने आकर मुझको दर्शन दिए है॥
  • विभीषणके यह वचन सुनकर हनुमानजीने कहा कि,
  • हे विभीषण! सुनो,
  • प्रभुकी यह रीतीही है की वे सेवकपर सदा परमप्रीति किया करते है॥

7.4

कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥

  • हनुमानजी कहते है की कहो मै कौनसा कुलीन पुरुष हूँ।
  • हमारी जाति देखो (चंचल वानर की), जो महाचंचल और सब प्रकारसे हीन गिनी जाती है॥
  • जो कोई पुरुष प्रातःकाल हमारा (बंदरों का) नाम ले लेवे तो उसे उस दिन खाने को भोजन नहीं मिलता॥

7. दोहा

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥7॥

  • हे सखा, सुनो मै ऐसा अधम नीच हूँ।
  • तिस पर भी रघुवीरने कृपा कर दी,
  • तो आप तो सब प्रकारसे उत्तम हो॥
  • आप पर कृपा करे इस में क्या बड़ी बात है।
  • ऐसे प्रभु श्री रामचन्द्रजी के गुणोंका स्मरण करनेसे,
  • दोनों के नेत्रोमें आंसू भर आये॥

हनुमानजी और विभीषण का संवाद

चौपाई

8.1

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥

  • जो मनुष्य जानते बुझते,
  • ऐसे स्वामीको छोड़ बैठते है।
  • वे दूखी क्यों न होंगे?
  • इस तरह रामचन्द्रजीके परम पवित्र व कानोंको सुख देने वाले गुणग्रामको (गुणसमूहोंको),
  • विभीषणके कहते कहते,
  • हनुमानजी ने विश्राम पाया॥

8.2

पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥

  • फिर विभीषण ने हनुमानजी से वह सब कथा कही, कि
  • सीताजी जिस जगह, जिस तरह रहती थी।
  • तब हनुमानजी ने विभीषण से कहा,
  • हे भाई सुनो,
  • मैं सीता माताको देखना चाहता हूँ॥

8.3

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहवाँ॥

  • सो मुझे उपाय बताओ।
  • हनुमानजी के यह वचन सुनकर विभीषण ने वहांकी सब तदबिज सुनाई।
  • तब हनुमानजी भी विभीषणसे विदा लेकर वहांसे चले॥
  • फिर वैसाही छोटासा स्वरुप धर कर,
  • हनुमानजी वहा गए कि,
  • जहां अशोकवनमें सीताजी रहा करती थी॥

हनुमानजी ने अशोकवन में सीताजी को देखा

8.4

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

  • हनुमानजी ने सीताजी का दर्शन करके,
  • उनको मनही मनमें प्रणाम किया और बैठे।
  • इतने में एक प्रहर रात्रि बीत गयी॥
  • हनुमानजी सीताजी को देखते है,
  • सो उनका शरीर तो बहुत दुबला हो रहा है।
  • सरपर लटोकी एक वेणी बंधी हुई है।
  • और अपने मनमें श्री राम के गुणों का जप कर रही है॥

8. दोहा

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥8॥

  • और अपने पैरो में दृष्टि लगा रखी है।
  • मन रामचन्द्रजी के चरणों में लीन हो रहा है।
  • सीताजीकी यह दीन दशा देखकर,
  • हनुमानजीको बड़ा दुःख हुआ॥

अशोक वाटिका में रावण और सीताजी का संवाद

चौपाई

9.1

तरु पल्लव महँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा॥

  • हनुमानजी वृक्षों के पत्तो की ओटमें छिपे हुए,
  • मनमें विचार करने लगे कि हे भाई अब मै क्या करू? ॥
  • उस अवसरमें बहुतसी स्त्रियोंको संग लिए रावण वहा आया।
  • जो स्त्रिया रावणके संग थी, वे बहुत प्रकार के गहनों से बनी ठनी थी॥

9.2

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी॥

  • उस दुष्टने सीताजी को अनेक प्रकार से समझाया।
  • साम, दाम, भय और भेद अनेक प्रकारसे दिखाया॥
  • रावणने सीतासे कहा कि हे सुमुखी!
  • जो तू एकबार भी मेरी तरफ देख ले तो हे सयानी॥

9.3

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

  • जो ये मेरी मंदोदरी आदी रानियाँ है,
  • इन सबको तेरी दासियाँ बना दूं,
  • यह मेरा प्रण जान॥
  • रावण का वचन सुन बीचमें तृण रखकर (तिनके का आड़ – परदा रखकर),
  • परम प्यारे रामचन्द्रजीका स्मरण करके,
  • सीताजीने रावण से कहा –

9.4

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥

  • हे रावण! सुन,
  • खद्योत अर्थात जुगनू के प्रकाश से कमलिनी कदापी प्रफुल्लित नहीं होती।
  • किंतु कमलिनी सूर्यके प्रकाशसेही प्रफुल्लित होती है।
  • अर्थात तू खद्योतके (जुगनूके) समान है, और
  • रामचन्द्रजी सूर्यके सामान है॥
  • सीताजीने अपने मन में ऐसे समझकर,
  • रावणसे कहा कि रे दुष्ट!
  • रामचन्द्रजीके बाणको अभी भूल गया क्या?
  • वह रामचन्द्रजी का बाण याद नहीं है॥

9.5

सठ सूनें हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥

  • अरे निर्लज्ज! अरे अधम!
  • रामचन्द्रजी के सूने तू मुझको ले आया।
  • तुझे शर्म नहीं आती॥

9. दोहा

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥9॥

  • सीता के मुख से कठोर वचन अर्थात अपनेको खद्योतके (जुगनूके) तुल्य और
  • रामचन्द्रजीको सुर्यके समान सुनकर रावण को बड़ा क्रोध हुआ।
  • जिससे उसने तलवार निकाल कर ये वचन कहे ॥9॥

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सुंदरकांड – 0४

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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 03
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 04

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(सुन्दरकांड में 526 चौपाइयाँ, 60 दोहे, 6 छंद और 3 श्लोक है। सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।)


रावण और सीताजी का संवाद

चौपाई

10.1

सीता तैं मम कृत अपमाना।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी।
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥

हे सीता! तूने मेरा मान भंग कर दिया है।
इस वास्ते इस कठोर खडग (कृपान) से मैं तेरा सिर उड़ा दूंगा॥
हे सुमुखी, या तो तू जल्दी मेरा कहना मान ले, नहीं तो तेरा जी जाता है॥


10.2

स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥

रावण के ये वचन सुनकर सीताजी ने कहा, हे शठ रावण, सुन, मेरा भी तो ऐसा पक्का प्रण है की या तो इस कंठपर श्याम कमलोकी मालाके समान सुन्दर और हाथिओ के सुन्ड के समान सुढार रामचन्द्रजी की भुजा रहेगी या तेरा यह महाघोर खडंग रहेगा।

अर्थात रामचन्द्रजी के बिना मुझे मरना मंजूर है, पर अन्यका स्पर्श नहीं करूंगी॥


10.3

चंद्रहास हरु मम परितापं।
रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा।
कह सीता हरु मम दुख भारा॥

सीता उस तलवार से प्रार्थना करती है कि हे तलवार! तू मेरा सिर उडाकर मेरे संताप को दूर कर क्योंकि मै रामचन्द्रजीकी विरहरूप अग्निसे संतप्त हो रही हूँ॥

सीताजी कहती है, हे असिवर! तेरी धाररूप शीतल रात्रिसे मेरे भारी दुख़को दूर कर॥


10.4

सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥

सीताजीके ये वचन सुनकर, रावण फिर सीताजी को मारने को दौड़ा। तब मय दैत्यकी कन्या मंदोदरी ने नितिके वचन कह कर उसको समझाया॥

फिर रावणने, सीताजीकी रखवारी सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि, तुम जाकर सीता को अनेक प्रकार से त्रास दिखाओ॥


10.5

मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥

यदि वह एक महीने के भीतर मेरा कहना नहीं मानेगी तो मैं तलवार निकाल कर उसे मार डालूँगा॥


10. दोहा

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥10॥

उधर तो रावण अपने भवनके भीतर गया। इधर वे नीच राक्षसियोंके झुंडके झुंड अनेक प्रकारके रूप धारण कर के सीताजी को भय दिखाने लगे॥


त्रिजटा का स्वप्न

चौपाई

11.1

त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥

उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। वह रामचन्द्रजीके चरनोंकी परमभक्त और बड़ी निपुण और विवेकवती थी॥

उसने सब राक्षसियों को अपने पास बुलाकर, जो उसको सपना आया था, वह सबको सुनाया और उनसे कहा की हम सबको सीताजी की सेवा करके अपना हित कर लेना चाहिए॥


11.2

सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥

क्योकि मैंने सपने में ऐसा देखा है कि एक वानरने लंकापुरीको जलाकर राक्षसों की सारी सेनाको मार डाला॥

और रावण गधेपर सवार होकर दक्षिण दिशामें जाता हुआ मैंने सपने में देखा है। वह भी कैसा की नग्नशरीर, सिर मुंडा हुआ और बीस भुजायें टूटी हुई॥


11.3

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥

और मैंने यह भी देखा है कि मानो लंकाका राज विभिषणको मिल गया है॥

और नगरिके अन्दर रामचन्द्रजी की दुहाई फिर गयी है। तब रामचन्द्रजीने सीताको बुलाने के लिए बुलावा भेजा है॥


11.4

यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥

त्रिजटा कहती है की मै आपसे यह बात खूब सोच कर कहती हूँ की, यह स्वप्न चार दिन बितने के बाद सत्य हो जाएगा॥

त्रिजटाके ये वचन सुनकर सब राक्षसियाँ डर गई। और डरके मारे सब सीताजीके चरणों में गिर पड़ी॥


11. दोहा

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥11॥

फिर सब राक्षसियाँ मिलकर जहां तहां चली गयी। तब सीताजी अपने मनमें सोच करने लगी की एक महिना बितनेके बाद यह नीच राक्षस (रावण) मुझे मार डालेगा ॥11॥


सीताजी और त्रिजटा का संवाद

चौपाई

12..1

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥

फिर त्रिजटाके पास हाथ जोड़कर सीताजी ने कहा की हे माता! तू मेरी सच्ची विपत्तिकी साथिन है॥

सीताजी कहती है की जल्दी उपाय कर नहीं तो मै अपना देह तजती हूँ। क्योंकि अब मुझसे अति दुखद विरहका दुःख सहा नहीं जाता॥


12..2

आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥

हे माता! अब तू जल्दी काठ ला और चिता बना कर मुझको जलानेके वास्ते जल्दी उसमे आग लगा दे॥

हे सयानी! तू मेरी प्रीति सत्य कर। सीताजीके ऐसे शूलके सामान महाभयानाक वचन सुनकर॥


12..3

त्रिजटा ने सीताजी को सान्तवना दी
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥

त्रिजटा ने तुरंत सीताजी के चरणकमल गहे और सिताजीको समझाया और प्रभु रामचन्द्रजी का प्रताप, बल और उनका सुयश सुनाया॥

और सिताजीसे कहा की हे राजपुत्री! अभी रात्री है, इसलिए अभी अग्नि नहीं मिल सकती। ऐसा कहा कर वहा अपने घरको चली गयी॥


12..4

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
हिमिलि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥

तब अकेली बैठी बैठी सीताजी कहने लगी की क्या करू दैवही प्रतिकूल हो गया। अब न तो अग्नि मिले और न मेरा दुःख कोई तरहसे मिट सके॥

ऐसे कह तारोको देख कर सीताजी कहती है की ये आकाशके भीतर तो बहुतसे अंगारे प्रकट दीखते है परंतु पृथ्वीपर पर इनमेसे एकभी तारा नहीं आता॥


12..5

पावकमय ससि स्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥

सीताजी चन्द्रमा को देखकर कहती है कि यह चन्द्रमा का स्वरुप साक्षात अग्निमय दिख पड़ता है पर यहभी मानो मुझको मंदभागिन जानकार आगको नहीं बरसाता॥

अशोकके वृक्ष को देखकर उससे प्रार्थना करती है कि हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुनकर तू अपना नाम सत्य कर। अर्थात मुझे अशोक अर्थात शोकरहित कर। मेरे शोकको दूर कर॥


12..6

नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

हे अग्निके समान रक्तवर्ण नविन कोंपलें (नए कोमल पत्ते)! तुम मुझको अग्नि देकर मुझको शांत करो॥

इस प्रकार सीताजीको विरह से अत्यन्त व्याकुल देखकर हनुमानजीका वह एक क्षण कल्पके समान बीतता गया॥


12. दोहा

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥12॥

उस समय हनुमानजीने अपने मनमे विचार करके अपने हाथमेंसे मुद्रिका (अँगूठी) डाल दी।

सो सीताजी को वह मुद्रिका उससमय कैसी दिख पड़ी की मानो अशोकके अंगारने प्रगट हो कर हमको आनंद दिया है (मानो अशोक ने अंगारा दे दिया।)।

सो सिताजीने तुरंत उठकर वह मुद्रिका अपने हाथमें ले ली ॥12॥


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सुंदरकांड – 0५

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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 04
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 05

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(सुन्दरकांड में 526 चौपाइयाँ, 60 दोहे, 6 छंद और 3 श्लोक है। सुन्दरकांड में 5 से 7 चौपाइयों के बाद 1 दोहा आता है।)


हनुमान सीताजी से मिले

चौपाई

13.1

तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥

फिर सीताजीने उस मुद्रिकाको देखा तो वह सुन्दर मुद्रिका रामचन्द्रजीके मनोहर नामसे अंकित हो रही थी अर्थात उसपर श्री राम का नाम खुदा हुआ था॥

उस मुद्रिकाको देखतेही सीताजी चकित होकर देखने लगी। आखिर उस मुद्रिकाको पहचान कर हृदय में अत्यंत हर्ष और विषादको प्राप्त हुई और बहुत अकुलाई॥


13.2

जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥

यह क्या हुआ? यह रामचन्द्रजीकी नामांकित मुद्रिका यहाँ कैसे आयी? या तो उन्हें जितनेसे यह मुद्रिका यहाँ आ सकती है, किंतु उन अजेय रामचन्द्रजीको जीत सके ऐसा तो जगतमे कौन है? अर्थात उनको जीतनेवाला जगतमे है ही नहीं। और जो कहे की यह राक्षसोने मायासे बनाई है सो यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि मायासे ऐसी बन नहीं सकती॥

इस प्रकार सीताजी अपने मनमे अनेक प्रकार से विचार कर रही थी। इतनेमें ऊपरसे हनुमानजी ने मधुर वचन कहे॥


13.3

रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई॥

हनुमानजी रामचन्द्रजीके गुनोका वर्णन करने लगे। उनको सुनतेही सीताजीका सब दुःख दूर हो गया॥

और वह मन और कान लगा कर सुनने लगी। हनुमानजीने भी आरंभसे लेकर सब कथा सीताजी को सुनाई॥


13.4

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥

हनुमानजीके मुखसे रामचन्द्रजीका चरितामृत सुनकर सीताजीने कहा कि जिसने मुझको यह कानोंको अमृतसी मधुर लगनेवाली कथा सुनाई है वह मेरे सामने आकर प्रकट क्यों नहीं होता?

सीताजीके ये वचन सुनकर हनुमानजी चलकर उनके समीप गए तो हनुमानजी का वानर रूप देखकर सीताजीके मनमे बड़ा विस्मय हुआ की यह क्या! सो कपट समझकर हनुमानजी को पीठ देकर बैठ गयी॥


13.5

राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥

तब हनुमानजीने सीताजीसे कहा की हे माता! मै रामचन्द्रजीका दूत हूं। मै रामचन्द्रजीकी शपथ खाकर कहता हूँ की इसमें फर्क नहीं है॥

और रामचन्द्रजीने आपके लिए जो निशानी दी थी, वह यह मुद्रिका (अँगूठी) मैंने लाकर आपको दी है॥


नर बानरहि संग कहु कैसें।
कही कथा भइ संगति जैसें॥

तब सिताजी ने कहा की हे हनुमान! नर और वानरोंके बीच आपसमें प्रीति कैसे हुई वह मुझे कह। तब उनके परस्परमे जैसे प्रीति हुई थी वे सब समाचार हनुमानजी ने सिताजीसे कहे॥


13. दोहा

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ॥13॥

हनुमानजीके प्रेमसहित वचन सुनकर सीताजीके मनमे पक्का भरोसा आ गया और उन्होंने जान लिया की यह मन, वचन और कायासे कृपासिंधु श्रीरामजी के दास है॥


हनुमान ने सीताजी को आश्वासन दिया

चौपाई

14.1

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥

हनुमानजी को हरिभक्त जानकर सीताजीके मन में अत्यंत प्रीति बढ़ी, शरीर अत्यंत पुलकित हो गया और नेत्रोमे जल भर आया॥

सीताजीने हनुमान से कहा की हे हनुमान! मै विरहरूप समुद्रमें डूब रही थी, सो हे तात! मुझको तिरानेके लिए तुम नौका हुए हो॥


14.2

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी।
अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई।
कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥

अब तुम मुझको बताओ कि सुखधाम श्रीराम लक्ष्मणसहित कुशल तो है॥

हे हनुमान! रामचन्द्रजी तो बड़े दयालु और बड़े कोमलचित्त है। फिर यह कठोरता आपने क्यों धारण कि है? ॥


14.3

सहज बानि सेवक सुखदायक।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता।
होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥

यह तो उनका सहज स्वभावही है कि जो उनकी सेवा करता है उनको वे सदा सुख देते रहते है॥ सो हे हनुमान! वे रामचन्द्रजी कभी मुझको भी याद करते है? ॥

कभी मेरे भी नेत्र रामचन्द्रजीके कोमल श्याम शरिरको देखकर शीतल होंगे॥


14.4

बचनु न आव नयन भरे बारी।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥

सीताजीकी उस समय यह दशा हो गयी कि मुखसे वचन निकलना बंद हो गया और नेत्रोमें जल भर आया। इस दशा में सीताजीने प्रार्थना की, कि हे नाथ! मुझको आप बिल्कुल ही भूल गए॥

सीताजीको विरह्से अत्यंत व्याकुल देखकर हनुमानजी बड़े विनयके साथ कोमल वचन बोले॥


14.5

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानह जियँ ऊना।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥

हे माता! लक्ष्मणसहित रामचन्द्रजी सब प्रकार से प्रसन्न है, केवल एक आपके दुःख से तो वे कृपानिधान अवश्य दुखी है। बाकी उनको कुछ भी दुःख नहीं है॥

हे माता! आप अपने मनको उन मत मानो (अर्थात रंज मत करो, मन छोटा करके दुःख मत कीजिए), क्योंकि रामचन्द्रजीका प्यार आपकी और आपसे भी दुगुना है॥


14. दोहा

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर ॥14॥

हे माता! अब मै आपको जो रामचन्द्रजीका संदेशा सुनाता हूं सो आप धीरज धारण करके उसे सुनो ऐसे कह्तेही हनुमानजी प्रेम से गदगद हो गए और नेत्रोमे जल भर आया ॥14॥


हनुमान ने सीताजीको रामचन्द्रजीका सन्देश दिया

चौपाई

15.1

कहेउ राम बियोग तव सीता।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।
कालनिसा सम निसि ससि भानू॥

हनुमानजी ने सीताजी से कहा कि हे माता! रामचन्द्रजी ने जो सन्देश भेजा है वह सुनो। रामचन्द्रजी ने कहा है कि तुम्हारे वियोगमें मेरे लिए सभी बाते विपरीत हो गयी है॥

नविन कोपलें तो मानो अग्निरूप हो गए है। रात्रि मानो कालरात्रि बन गयी है। चन्द्रमा सूरजके समान दिख पड़ता है॥


15.2

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥

कमलोका वन मानो भालोके समूहके समान हो गया है। मेघकी वृष्टि मानो तापे हुए तेलके समान लगती है॥

मै जिस वृक्षके तले बैठता हूं, वही वृक्ष मुझको पीड़ा देता है और शीतल, सुगंध, मंद पवन मुझको साँपके श्वासके समान प्रतीत होता है॥


15.3

कहेहू तें कछु दुख घटि होई।
काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥

और अधिक क्या कहूं? क्योंकि कहनेसे कोई दुःख घट थोडाही जाता है? परन्तु यह बात किसको कहूं! कोई नहीं जानता॥

मेरे और आपके प्रेमके तत्वको कौन जानता है! कोई नहीं जानता। केवल एक मेरा मन तो उसको भलेही पहचानता है॥


15.4

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥

पर वह मन सदा आपके पास रहता है। इतने ही में जान लेना कि राम किस कदर प्रेमके वश है॥

रामचन्द्रजीके सन्देश सुनतेही सीताजी ऐसी प्रेममे मग्न हो गयी कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध न रही॥


15.5

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु ताई।रघुपति प्रभु
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥

उस समय हनुमानजीने सीताजीसे कहा कि हे माता! आप सेवकजनोंके सुख देनेवाले श्रीराम को याद करके मनमे धीरज धरो॥

श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुताको हृदयमें मानकर मेरे वचनोको सुनकर विकलताको तज दो (छोड़ दो)॥


15. दोहा

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥15॥

हे माता! रामचन्द्रजीके बानरूप अग्निके आगे इस राक्षस समूहको आप पतंगके समान जानो और इन सब राक्षसोको जले हुए जानकर मनमे धीरज धरो ॥15॥


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सुंदरकांड – 06

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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 05
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 06

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हनुमानजी का मेघनाद से युद्ध

चौपाई

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

रावण राक्षसोंके मुखसे अपने पुत्रका वध सुनकर बड़ा गुस्सा हुआ और महाबली मेघनादको भेजा॥

और मेघनादसे कहा कि हे पुत्र! उसे मारना मत किंतु बांधकर पकड़ लें आना, क्योंकि मैं भी उसे देखूं तो सही बह वानर कहाँ का है॥


चला इंद्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥

इन्द्रजीत (इंद्र को जीतनेवाला) असंख्य योद्धाओ को संग लेकर चला। भाई के वध का समाचार सुनकर उसे बड़ा गुस्सा आया॥

हनुमानजी ने उसे देखकर यह कोई दारुण भट (भयानक योद्धा) आता है ऐसे जानकार कटकटाके महाघोर गर्जना की और दौड़े॥


अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा॥

एक बड़ा भारी वृक्ष उखाड़ कर उससे मेघनादको विरथ अर्थात रथहीन कर दिया॥

उसके साथ जो बड़े बड़े महाबली योद्धा थे, उन सबको पकड़ पकड़कर हनुमानजी अपने शरीर से मसल डाला॥


तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई॥

ऐसे उन राक्षसोंको मारकर हनुमानजी मेघनादके पास पहुँचे। फिर वे दोनों ऐसे भिड़े कि मानो दो गजराज आपस में भीड़ रहे है॥

हनुमान मेघनादको एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े और मेघनादको उस प्रहार से एक क्षणभर के लिए मूर्च्छा आ गयी।


उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

फिर मेघनादने सचेत होकर अनेक मायाये फैलायी पर हनुमानजी किसी प्रकार जीते नहीं गए॥


मेघनादने ब्रम्हास्त्र चलाया

दोहा

ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ॥19॥

मेघनाद अनेक अस्त्र चलाकर थक गया, तब उसने ब्रम्हास्त्र चलाया। उसे देखकर हनुमानजी ने मनमे विचार किया कि इससे बंध जाना ही ठीक है।

क्योंकि जो मै इस ब्रम्हास्त्रको नहीं मानूंगा तो इस अस्त्रकी अद्भुत महिमा घट जायेगी ॥19॥


मेघनाद हनुमानजी को बंदी बनाकर रावणकी सभा में ले गया

चौपाई

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा।
परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥

मेघनादने हनुमानजीपर ब्रम्हास्त्र चलाया, उस ब्रम्हास्त्रसे हनुमानजी गिरने लगे तो गिरते समय भी उन्होंने अपने शरीरसे बहुतसे राक्षसोंका संहार कर डाला॥

जब मेघनादने जान लिया कि हनुमानजी अचेत हो गए है, तब वह उन्हें नागपाशसे बांधकर लंकामे ले गया॥


जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

महादेवजी कहते है कि हे पार्वती! सुनो, जिनके नामका जप करनेसे ज्ञानी लोग भवबंधन को काट देते है॥

उस प्रभुका दूत (हनुमानजी) भला बंधन में कैसे आ सकता है? परंतु अपने प्रभुके कार्यके लिए हनुमानने अपनेको बंधा दिया॥


कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥

हनुमानजी को बंधा हुआ सुनकर सब राक्षस देखनेको दौड़े और कौतुकके लिए उसे सभामे ले आये॥

हनुमानजी ने जाकर रावण की सभा देखी, तो उसकी प्रभुता और ऐश्वर्य किसी कदर कही जाय ऐसी नहीं थी॥


कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

कारण यह है की, तमाम देवता बड़े विनय के साथ हाथ जोड़े सामने खड़े उसकी भ्रूकुटीकी ओर भयसहित देख रहे है॥

यद्यपि हनुमानजी ने उसका ऐसा प्रताप देखा, परंतु उनके मन में ज़रा भी डर नहीं था। हनुमानजी उस सभामें राक्षसोंके बीच ऐसे निडर खड़े थे कि जैसे गरुड़ सर्पोके बीच निडर रहा करता है॥


दोहा

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद ॥20॥

रावण हनुमानजी की और देखकर हँसा और कुछ दुर्वचन भी कहे, परंतु फिर उसे पुत्रका मरण याद आजानेसे उसके हृदयमे बड़ा संताप पैदा हुआ॥


हनुमानजी और रावण का संवाद

चौपाई

कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही॥

रावण ने हनुमानजी से कहा कि हे वानर! तू कहांसे आया है? और तूने किसके बल से मेरे वनका विध्वंस कर दिया है॥

मैं तुझे अत्यंत निडर देख रहा हूँ सो क्या तूने कभी मेरा नाम अपने कानों से नहीं सुना है?॥


मारे निसिचर केहिं अपराधा।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरचति माया॥

तुझको हम जीसे नहीं मारेंगे, परन्तु सच कह दे कि तूने हमारे राक्षसोंको किस अपराध के लिए मारा है?

रावणके ये वचन सुनकर हनुमानजीने रावण से कहा कि हे रावण! सुन, यह माया (प्रकृति) जिस परमात्माके बल (चैतन्यशक्ति) को पाकर अनेक ब्रम्हांडसमूह रचती है॥


जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरि कानन॥

हे रावण! जिसके बलसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये तीनो देव जगतको रचते है, पालते है और संहार करते है॥

और जिनकी सामर्थ्यसे शेषजी अपने शिरसे वन और पर्वतोंसहित इस सारे ब्रम्हांडको धारण करते है॥


धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥

और जो देवताओके रक्षा के लिए और तुम्हारे जैसे दुष्टोको दंड देनेके लिए अनेक शरीर (अवतार) धारण करते है॥

जिसने महादेवजीके अति कठिन धनुषको तोड़कर तेरे साथ तमाम राजसमूहोके मदको भंजन किया (गर्व चूर्ण कर दिया) है॥


खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली॥

और जिसने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि ऐसे बड़े बलवाले योद्धओको मारा है॥


दोहा

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥21॥

और हे रावण! सुन, जिसके बलके लवलेश अर्थात किन्चित्मात्र अंश से तूने तमाम चराचर जगत को जीता है, उस परमात्मा का मै दूत हूँ। जिसकी प्यारी सीता को तू हर ले आया है ॥21॥


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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 06
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 07

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हनुमानजी का मेघनाद से युद्ध

चौपाई

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

रावण राक्षसोंके मुखसे अपने पुत्रका वध सुनकर बड़ा गुस्सा हुआ और महाबली मेघनादको भेजा॥

और मेघनादसे कहा कि हे पुत्र! उसे मारना मत किंतु बांधकर पकड़ लें आना, क्योंकि मैं भी उसे देखूं तो सही बह वानर कहाँ का है॥


चला इंद्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥

इन्द्रजीत (इंद्र को जीतनेवाला) असंख्य योद्धाओ को संग लेकर चला। भाई के वध का समाचार सुनकर उसे बड़ा गुस्सा आया॥

हनुमानजी ने उसे देखकर यह कोई दारुण भट (भयानक योद्धा) आता है ऐसे जानकार कटकटाके महाघोर गर्जना की और दौड़े॥


अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा॥

एक बड़ा भारी वृक्ष उखाड़ कर उससे मेघनादको विरथ अर्थात रथहीन कर दिया॥

उसके साथ जो बड़े बड़े महाबली योद्धा थे, उन सबको पकड़ पकड़कर हनुमानजी अपने शरीर से मसल डाला॥


तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई॥

ऐसे उन राक्षसोंको मारकर हनुमानजी मेघनादके पास पहुँचे। फिर वे दोनों ऐसे भिड़े कि मानो दो गजराज आपस में भीड़ रहे है॥

हनुमान मेघनादको एक घूँसा मारकर वृक्ष पर जा चढ़े और मेघनादको उस प्रहार से एक क्षणभर के लिए मूर्च्छा आ गयी।


उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥

फिर मेघनादने सचेत होकर अनेक मायाये फैलायी पर हनुमानजी किसी प्रकार जीते नहीं गए॥


मेघनादने ब्रम्हास्त्र चलाया

दोहा

ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ॥19॥

मेघनाद अनेक अस्त्र चलाकर थक गया, तब उसने ब्रम्हास्त्र चलाया। उसे देखकर हनुमानजी ने मनमे विचार किया कि इससे बंध जाना ही ठीक है।

क्योंकि जो मै इस ब्रम्हास्त्रको नहीं मानूंगा तो इस अस्त्रकी अद्भुत महिमा घट जायेगी ॥19॥


मेघनाद हनुमानजी को बंदी बनाकर रावणकी सभा में ले गया

चौपाई

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा।
परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥

मेघनादने हनुमानजीपर ब्रम्हास्त्र चलाया, उस ब्रम्हास्त्रसे हनुमानजी गिरने लगे तो गिरते समय भी उन्होंने अपने शरीरसे बहुतसे राक्षसोंका संहार कर डाला॥

जब मेघनादने जान लिया कि हनुमानजी अचेत हो गए है, तब वह उन्हें नागपाशसे बांधकर लंकामे ले गया॥


जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

महादेवजी कहते है कि हे पार्वती! सुनो, जिनके नामका जप करनेसे ज्ञानी लोग भवबंधन को काट देते है॥

उस प्रभुका दूत (हनुमानजी) भला बंधन में कैसे आ सकता है? परंतु अपने प्रभुके कार्यके लिए हनुमानने अपनेको बंधा दिया॥


कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥

हनुमानजी को बंधा हुआ सुनकर सब राक्षस देखनेको दौड़े और कौतुकके लिए उसे सभामे ले आये॥

हनुमानजी ने जाकर रावण की सभा देखी, तो उसकी प्रभुता और ऐश्वर्य किसी कदर कही जाय ऐसी नहीं थी॥


कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥

कारण यह है की, तमाम देवता बड़े विनय के साथ हाथ जोड़े सामने खड़े उसकी भ्रूकुटीकी ओर भयसहित देख रहे है॥

यद्यपि हनुमानजी ने उसका ऐसा प्रताप देखा, परंतु उनके मन में ज़रा भी डर नहीं था। हनुमानजी उस सभामें राक्षसोंके बीच ऐसे निडर खड़े थे कि जैसे गरुड़ सर्पोके बीच निडर रहा करता है॥


दोहा

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद ॥20॥

रावण हनुमानजी की और देखकर हँसा और कुछ दुर्वचन भी कहे, परंतु फिर उसे पुत्रका मरण याद आजानेसे उसके हृदयमे बड़ा संताप पैदा हुआ॥


हनुमानजी और रावण का संवाद

चौपाई

कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही॥

रावण ने हनुमानजी से कहा कि हे वानर! तू कहांसे आया है? और तूने किसके बल से मेरे वनका विध्वंस कर दिया है॥

मैं तुझे अत्यंत निडर देख रहा हूँ सो क्या तूने कभी मेरा नाम अपने कानों से नहीं सुना है?॥


मारे निसिचर केहिं अपराधा।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरचति माया॥

तुझको हम जीसे नहीं मारेंगे, परन्तु सच कह दे कि तूने हमारे राक्षसोंको किस अपराध के लिए मारा है?

रावणके ये वचन सुनकर हनुमानजीने रावण से कहा कि हे रावण! सुन, यह माया (प्रकृति) जिस परमात्माके बल (चैतन्यशक्ति) को पाकर अनेक ब्रम्हांडसमूह रचती है॥


जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरि कानन॥

हे रावण! जिसके बलसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये तीनो देव जगतको रचते है, पालते है और संहार करते है॥

और जिनकी सामर्थ्यसे शेषजी अपने शिरसे वन और पर्वतोंसहित इस सारे ब्रम्हांडको धारण करते है॥


धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥

और जो देवताओके रक्षा के लिए और तुम्हारे जैसे दुष्टोको दंड देनेके लिए अनेक शरीर (अवतार) धारण करते है॥

जिसने महादेवजीके अति कठिन धनुषको तोड़कर तेरे साथ तमाम राजसमूहोके मदको भंजन किया (गर्व चूर्ण कर दिया) है॥


खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली॥

और जिसने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि ऐसे बड़े बलवाले योद्धओको मारा है॥


दोहा

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥21॥

और हे रावण! सुन, जिसके बलके लवलेश अर्थात किन्चित्मात्र अंश से तूने तमाम चराचर जगत को जीता है, उस परमात्मा का मै दूत हूँ। जिसकी प्यारी सीता को तू हर ले आया है ॥21॥


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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 07
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 08

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हनुमानजी और रावण का संवाद

चौपाई

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥

हे रावण! आपकी प्रभुता तो मैंने तभी से जान ली है कि जब आपको सहस्रबाहुके साथ युद्ध करनेका काम पड़ा था॥

और मुझको यह बातभी याद है कि आप बालिसे लड़ कर जो यश पाये थे। हनुमानजी के ये वचन सुनकर रावण ने हँसी में ही उड़ा दिए॥


खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारग गामी॥

तब फिर हनुमानजी ने कहा कि हे रावण! मुझको भूख लग गयी थी इसलिए तो मैंने आपके बाग़ के फल खाए है और जो वृक्षोको तोडा है सो तो केवल मैंने अपने वानर स्वाभावकी चपलतासे तोड़ डाले है॥

और जो मैंने आपके राक्षसोंको मारा उसका कारण तो यह है की हे रावण! अपना देह तो सबको बहुत प्यारा लगता है, सो वे खोटे रास्ते चलने वाले राक्षस मुझको मारने लगे॥


जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥

तब मैंने अपने प्यारे शरीरकी रक्षा करनेके लिए जिन्होंने मुझको मारा था उनको मैंने भी मारा। इसपर आपके पुत्र ने मुझको बाँध लिया है॥

हनुमानजी कहते है कि मुझको बंध जाने से कुछ भी शर्म नहीं आती क्योंकि मै अपने स्वामीका कार्य करना चाहता हूँ॥


बिनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥

हे रावण! मै हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना करता हूँ। सो अभिमान छोड़कर मेरी शिक्षा सुनो। और अपने मनमे विचार करके तुम अपने आप खूब अच्छी तरह देख लो और सोचनेके बाद भ्रम छोड़कर भक्तजनोंके भय मिटानेवाले प्रभुकी सेवा करो॥


जाकें डर अति काल डेराई।
जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै।
मोरे कहें जानकी दीजै॥

हे रावण! काल, (जो देवता, दैत्य और सारे चराचरको खा जाता है) भी जिसके सामने अत्यंत भयभीत रहता है॥

उस परमात्मासे कभी बैर नहीं करना चाहिये। इसलिए जो तू मेरा कहना माने तो सीताजीको रामचन्द्रजीको दे दो॥


दोहा

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥22॥

हे रावण! खरके मारनेवाले रघुवंशमणि रामचन्द्रजी भक्तपालक और करुणाके सागर है। इसलिए यदि तू उनकी शरण चला जाएगा तो वे प्रभु तेरे अपराधको माफ़ करके तेरी रक्षा करेंगे ॥22॥


हनुमानजी का रावण को समझाना

चौपाई

राम चरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥

इसलिए तू रामचन्द्रजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण कर और उनकी कृपासे लंकामें अविचल राज कर॥

महामुनि पुलस्त्यजीका यश निर्मल चन्द्रमाके समान परम उज्वल है इसलिए तू उस कुलके बीचमें कलंक के समान मत हो॥


राम नाम बिनु गिरा न सोहा।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।
सब भूषन भूषित बर नारी॥

हे रावण! तू अपने मनमें विचार करके मद और मोहको त्यागकर अच्छी तरह जांचले कि रामके नाम बिना वाणी कभी शोभा नहीं देती॥

हे रावण! चाहे स्त्री सब अलंकारोसे अलंकृत और सुन्दर क्यों न होवे परंतु वस्त्रके बिना वह कभी शोभायमान नहीं होती। ऐसेही रामनाम बिना वाणी शोभायमान नहीं होती॥


राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥

हे रावण! जो पुरुष रामचन्द्रजीसे विमुख है उसकी संपदा और प्रभुता पानेपर भी न पानेके बराबर है। क्योंकि वह स्थिर नहीं रहती किन्तु तुरंत चली जाती है॥

देखो, जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है, वहां बरसात हो जाने के बाद फिर सब जल सुख ही जाता है, कही नहीं रहता॥


सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥

हे रावण! सुन, मै प्रतिज्ञा कर कहता हूँ कि रामचन्द्रजीसे विमुख पुरुषका रखवारा कोई नहीं है॥
हे रावण! रामचन्द्रजीसे द्रोह करनेवाले तुझको ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी बचा नहीं सकते॥


दोहा

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥23॥

हे रावण! मोह्का मूल कारण और अत्यंत दुःख देनेवाली अभिमानकी बुद्धिको छोड़कर कृपाके सागर भगवान् श्री रघुवीरकुलनायक रामचन्द्रजीकी सेवा कर ॥23॥


रावण ने हनुमानजी की पूँछ जलाने का हुक्म दिया

चौपाई

जदपि कही कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥

यद्यपि हनुमानजी रावणको अति हितकारी और भक्ति, ज्ञान, धर्म और नीतिसे भरी वाणी कही, परंतु उस अभिमानी अधमके उसके कुछ भी असर नहीं हुआ॥

इससे हँसकर बोला कि हे वानर! आज तो हमको तु बडा ज्ञानी गुरु मिला॥


मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥

हे नीच! तू मुझको शिक्षा देने लगा है. सो हे दुष्ट! कहीं तेरी मौत तो निकट नहीं आ गयी है?॥
रावणके ये वचन सुन पीछे फिरकर हनुमान्‌ने कहा कि हे रावण! अब मैंने तेरा बुद्धिभ्रम स्पष्ट रीतिसे जान लिया है॥


सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना।
बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥

हनुमान्‌के वचन सुनकर रावणको बड़ा कोध आया, जिससे रावणने राक्षसोंको कहा कि हे राक्षसो! इस मूर्खके प्राण जल्दी लेलो अर्थात इसे तुरंत मार डालो॥

इस प्रकार रावण के वचन सुनतेही राक्षस मारनेको दौड़ें तब अपने मंत्रियोंके साथ विभीषण वहां आ पहुँचे॥


नाइ सीस करि बिनय बहूता।
नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥

बड़े विनयके साथ रावणको प्रणाम करके बिभीषणने कहा कि यह दूत है। इसलिए इसे मारना नही चाहिये; क्योंकि यह बात नीतिसे विरुद्ध है॥

हे स्वामी! इसे आप और एक दंड दे दीजिये पर मारें मत। बिभीषणकी यह बात सुनकर सब राक्षसोंने कहा कि हे भाइयो! यह सलाह तो अच्छी है॥


सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
अंग भंग करि पठइअ बंदर॥

रावण इस बातको सुनकर बोला कि जो इसको मारना ठीक नहीं है तो इस बंदरका कोई अंग भंग करके इसे भेज दो॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥24॥

सब लोगोने समझा कर रावणसे कहा कि वानरका ममत्व पूंछ पर बहुत होता है। इसलिए इसकी पूंछमें तेलसे भीगेहुए कपडे लपेटकर आग लगा दो ॥24॥


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सुंदरकांड – 9

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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 08
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 09

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राक्षसोंने हनुमानजी की पूँछ में आग लगा दी

चौपाई

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई।
देखउ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥

जब यह वानर पूंछहीन होकर अपने मालिकके पास जायेगा, तब अपने स्वामीको यह ले आएगा॥ इस वानरने जिसकी अतुलित बढाई की है भला उसकी प्रभुताको मैं देखूं तो सही कि वह कैसा है?॥


बचन सुनत कपि मन मुसुकाना।
भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना।
लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥

रावनके ये वचन सुनकर हनुमानजी मनमें मुस्कुराए और मनमें सोचने लगे कि मैंने जान लिया है कि इस समय सरस्वती सहाय हुई है। क्योंकि इसके मुंहसे रामचन्द्रजीके आनेका समाचार स्वयं निकल गया॥

तुलसीदासजी कहते है कि वे राक्षसलोग रावणके वचन सुनकर वही रचना करने लगे अर्थात तेलसे भिगो भिगोकर कपडे उनकी पूंछमें लपेटने लगे॥


रहा न नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥

उस समय हनुमानजीने ऐसा खेल किया कि अपनी पूंछ इतनी लंबी बढ़ा दी जिसको लपेटने के लिये नगरीमें कपडा, घी व तेल कुछ भी बाकी न रहा॥

नगरके जो लोग तमाशा देखनेको वहां आये थे वे सब लातें मार मारकर बहुत हँसते हैं॥


बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता।
भयउ परम लघुरूप तुरंता॥

अनेक ढोल बज रहे हे, सबलोग ताली दे रहे हैं, इस तरह हनुमानजीको नगरीमें सर्वत्र फिराकर फिर उनकी पूंछमें आग लगा दी॥

हनुमानजीने जब पूंछमें आग जलती देखी तब उन्होने तुरंत बहुत छोटा स्वरूप धारण कर लिया॥


निबुकि चढ़ेउ कप कनक अटारीं।
भईं सभीत निसाचर नारीं॥

और बंधन से निकलकर पीछे सुवर्णकी अटारियोंपर चढ़ गए, जिसको देखतेही तमाम राक्षसोंकी स्त्रीयां भयभीत हो गयी॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ॥25॥

उस समय भगवानकी प्रेरणासे उनचासो पवन बहने लगे और हनुमानजीने अपना स्वरूप ऐसा बढ़ाया कि वह आकाशमें जा लगा फिर अट्टहास करके बड़े जोरसे गरजे ॥25॥


हनुमानजी ने लंका जलाई

चौपाई

देह बिसाल परम हरुआई।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला।
झपट लपट बहु कोटि कराला॥

यद्यपि हनुमानजीका शरीर बहुत बड़ा था परंतु शरीरमें बड़ी फुर्ती थी जिससे वह एक घरसे दूसरे घरपर चढ़ते चले जाते थे॥

जिससे तमाम नगर जल गया। लोग सब बेहाल हो गये और झपट कर बहुतसे विकराल कोटपर चढ़ गये॥


तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरें सुर कोई॥

और सबलोग पुकारने लगे कि हे तात! हे माता! अब इस समयमें हमें कौन बचाएगा॥

हमने जो कहा था कि यह वानर नहीं है, कोई देव वानरका रूप धरकर आया है। सो देख लीजिये यह बात ऐसी ही है॥


साधु अवग्या कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥

और यह नगर जो अनाथके नगरके समान जला है सो तो साधुपुरुषोंका अपमान करनेंका फल ऐसाही हुआ करता है॥

तुलसीदासजी कहते हैं कि हनुमानजीने एक क्षणभरमें तमाम नगरको जला दिया. केवल एक बिभीषणके घरको नहीं जलाया॥


ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

महादेवजी कहते है कि हे पार्वती! जिसने इस अग्रिको पैदा किया है उस परमेश्वरका बिभीषण भक्त था इस कारण से उसका घर नहीं जला॥ हनुमानजी ने उलट पलट कर (एक ओर से दूसरी ओर तक) तमाम लंकाको जला कर फिर समुद्रके अंदर कूद पडे॥


दोहा

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥26॥

अपनी पूछको बुझाकर, श्रमको मिटाकर (थकावट दूर करके), फिरसे छोटा स्वरूप धारण करके हनुमानजी हाथ जोड़कर सीताजीके आगे आ खडे हुए ॥26॥


हनुमानजी लंकासे लौटने से पहले सीताजी से मिले

चौपाई

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

और बोले कि हे माता! जैसे रामचन्द्रजीने मुझको पहचानके लिये मुद्रिकाका निशान दिया था, वैसे ही आपभी मुझको कुछ चिन्ह दो॥

तब सीताजीने अपने सिरसे उतार कर चूडामणि दिया। हनुमानजीने बड़े आनंदके साथ वह ले लिया॥


कहेहु तात अस मोर प्रनामा।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ सम संकट भारी॥

सीताजीने हनुमानजीसे कहा कि हे पुत्र! मेरा प्रणाम कह कर प्रभुसे ऐसे कहना कि हे प्रभु! यद्यपि आप सर्व प्रकारसे पूर्णकाम हो (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है)॥

हे नाथ! आप दीनदयाल हो, इसलिये अपने विरदको सँभाल कर (दीन दुःखियों पर दया करना आपका विरद है, सो उस विरद को याद करके) मेरे इस महासंकटको दूर करो॥


तात सक्रसुत कथा सनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

हे पुत्र । फिर इन्द्रके पुत्र जयंतकी कथा सुनाकर प्रभुकों बाणोंका प्रताप समझाकर याद दिलाना॥
और कहना कि हे नाथ! जो आप एक महीनेके अन्दर नहीं पधारोगे तो फिर आप मुझको जीती नहीं पाएँगे॥


कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥

हे तात! कहना, अब मैं अपने प्राणोंको किस प्रकार रखूँ? क्योंकि तुमभी अब जाने को कह रहे हो॥

तुमको देखकर मेरी छाती ठंढी हुई थी परंतु अब तो फिर मेरेलिए वही दिन हैं और वही रातें हैं॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥27॥

हनुमानजीने सीताजीको (जानकी को) अनेक प्रकारसे समझाकर कई तरहसे धीरज दिया और फिर उनके चरणकमलोंमें सिर नमाकर वहांसे रामचन्द्रजीके पास रवाना हुए ॥27॥


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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 09
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सुन्दरकाण्ड अर्थसहित – 10

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हनुमानजीका लंका से वापिस लौटना

चौपाई

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥

जाते समय हनुमानजीने ऐसी भारी गर्जना की, कि जिसको सुनकर राक्षसियोंके गर्भ गिर गये॥

सपुद्रको लांघकर हनुमानजी समुद्रके इस पार आए। और उस समय उन्होंने किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सब बन्दरोंको सुनाया॥


(राका दिन पहूँचेउ हनुमन्ता। धाय धाय कापी मिले तुरन्ता॥
हनुमानजीने लंकासे लौटकर कार्तिककी पूर्णिमाके दिन वहां पहुंचे। उस समय दौड़ दौड़ कर वानर बडी त्वराके साथ हनुमानजीसे मिले॥)


हरषे सब बिलोकि हनुमाना।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥

हनुमानजीको देखकर सब वानर बहुत प्रसन्न हुए और उस समय वानरोंने अपना नया जन्म समझा॥

हनुमानजीका मुख अति प्रसन्न और शरीर तेजसे अत्यंत दैदीप्यमान देखकर वानरोंने जान लिया कि हनुमानजी रामचन्द्रजीका कार्य करके आए है॥


मिले सकल अति भए सुखारी।
तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा।
पूँछत कहत नवल इतिहासा॥

और इसीसे सब वानर परम प्रेमके साथ हनुमानजीसे मिले और अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे कैसे प्रसन्न हुए सो कहते हैं कि मानो तड़पती हुई मछलीको पानी मिल गया॥

फिर वे सब सुन्दर इतिहास पूंछते हुए आर कहते हुए आनंदके साथ रामचन्द्रजीके पास चले॥


तब मधुबन भीतर सब आए।
अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥

फिर उन सबोंने मधुवनके अन्दर आकर युवराज अंगदके साथ वहां मीठे फल खाये॥
जब वहांके पहरेदार बरजने लगे तब उनको मुक्कोसे ऐसा मारा कि वे सब वहांसे भाग गये॥


दोहा

जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥28॥

वहांसे जो वानर भाग कर बचे थे उन सबोंने जाकर राजा सुग्रीवसे कहा कि हे राजा! युवराज अंगदने वनका सत्यानाश कर दिया है। यह समाचार सुनकर सुग्रीवको बड़ा आनंद आया कि वे लोग प्रभुका काम करके आए हैं ॥28॥


हनुमानजी सुग्रीव से मिले

चौपाई

जौं न होति सीता सुधि पाई।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा।
आइ गए कपि सहित समाजा॥

सुग्रीवको आनंद क्यों हुआ? उसका कारण कहते हैं। सुग्रीवने मनमें विचार किया कि जो उनको सीताजीकी खबर नहीं मिली होती तो वे लोग मधुवनके फल कदापि नहीं खाते॥

राजा सुग्रीव इस तरह मनमें विचार कर रहे थे। इतनेमें समाजके साथ वे तमाम वानर बहां चले आये॥


आइ सबन्हि नावा पद सीसा।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी।
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥

सबने आकर सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया।
और आकर उन सभीने नमस्कार किया तब बड़े प्यारके साथ सुग्रीव उन सबसे मिले॥

सुग्रीवने सभीसे कुशल पूंछा तब उन्होंने कहा कि नाथ! आपके चरण कुशल देखकर हम कुशल हैं और जो यह काम बना है सो केवल रामचन्द्रजीकी कृपासे बना है॥


नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ।
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥

हे नाथ! यह काम हनुमानजीने किया है। यह काम क्या किया है मानो सब वानरोंके इसने प्राण बचा लिये हैं॥
यह बात सुनकर सुग्रीव उठकर फिर हनुमानजीसे मिले और वानरोंके साथ रामचन्द्रजीके पास आए॥


राम कपिन्ह जब आवत देखा।
किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई।
परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

वानरोंको आते देखकर रामचन्द्रजीके मनमें बड़ा आनन्द हुआ कि ये लोग काम सिद्ध करके आ गये हैं॥ राम और लक्ष्मण ये दोनों भाई स्फटिकमणिकी शिलापर बैठे हुए थे। वहां जाकर सब वानर दोनों भाइयोंके चरणोंमें गिरे॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

प्रीति सहित सब भेंटे रघुपति करुना पुंज॥
पूछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ॥29॥

करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजी प्रीतिपूर्वक सब वानरोंसे मिले और उनसे कुशल पूँछा. तब उन्होंने कहा कि हे नाथ! आपके चरणकमलोंको कुशल देखकर (चरणकमलोंके दर्शन पाने से) अब हम कुशल हें ॥29॥


हनुमानजी और सुग्रीव रामचन्द्रजी से मिले

चौपाई

जामवंत कह सुनु रघुराया।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥

उस समय जाम्बवान ने रामचन्द्रजीसे कहा कि हे नाथ! सुनो, आप जिसपर दया करते हो॥

उसके सदा सर्वदा शुभ और कुशल निरंतर रहते हें। तथा देवता मनुष्य और मुनि सभी उसपर सदा प्रसन्न रहते हैं॥


सोइ बिजई बिनई गुन सागर।
तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू।
जन्म हमार सुफल भा आजू॥

और वही विजयी (विजय करनेवाला), विनयी (विनयवाला) और गुणोंका समुद्र होता है और उसकी सुख्याति तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध रहती है॥

यह सब काम आपकी कृपासे सिद्ध हुआ हैं। और हमारा जन्म भी आजही सफल हुआ है॥


नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
(जो मुख लाखहु जाइ न बरणी॥)
पवनतनय के चरित सुहाए।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥

हे नाथ! पवनपुत्र हनुमानजीने जो काम किया है उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता
(वह कोई आदमी जो लाख मुखोंसे कहना चाहे तो भी वह कहा नहीं जा सकता)॥
हनुमानजीकी प्रशंसाके वचन और कार्य जाम्बवानने रामचन्द्रजीको सुनाये॥


सुनत कृपानिधि मन अति भाए।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी।
रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥

उन वचनोंको सुनकर दयालु श्रीरामचन्द्वजीने उठकर हनुमानजीको अपनी छातीसे लगाया॥
और श्रीरामने हनुमानजीसे पूछा कि हे तात! कहो, सीता किस तरह रहती है? और अपने प्राणोंकी रक्षा वह किस तरह करती है?॥


दोहा

नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ॥30॥

हनुमानजीने कहा कि हे नाथ । यद्यपि सीताजीको कष्ट तो इतना है कि उनके प्राण एक क्षणभर न रहे। परंतु सीताजीने आपके दर्शनके लिए प्राणोंका ऐसा बंदोबस्त करके रखा है कि रात दिन अखंड पहरा देनेके वास्ते आपके नामको तो उसने सिपाही बना रखा है (आपका नाम रात-दिन पहरा देनेवाला है)। और आपके ध्यानको कपाट बनाया है (आपका ध्यान ही किवाड़ है)। और अपने नीचे किये हुए नेत्रोंसे जो अपने चरणकी ओर निहारती है वह यंत्रिका अर्थात् ताला है. अब उसके प्राण किस रास्ते बाहर निकलें ॥30॥


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हनुमानजी ने श्रीराम को सीताजी का सन्देश दिया

चौपाई

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही।
रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी।
बचन कहे कछु जनककुमारी॥

और चलते समय मुझको यह चूड़ामणि दिया हे. ऐसे कह कर हनुमानजीने वह चूड़ामणि रामचन्द्रजीको दे दिया। तब रामचन्द्रजीने उस रत्नको लेकर अपनी छातीसे लगाया॥

तब हनुमानजीने कहा कि हे नाथ! दोनो हाथ जोड़कर नेत्रोंमें जल लाकर सीताजीने कुछ वचनभी कहे है सो सुनिये॥


अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना।
दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी।
केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥

सीताजीने कहा है कि लक्ष्मणजीके साथ प्रभुके चरण धरकर मेरी ओरसे ऐसी प्रार्थना करना कि हे नाथ! आप तो दीनबंधु और शरणागतोके संकटको मिटानेवाले हो॥

फिर मन, वचन और कर्मसे चरणोमें प्रीति रखनेवाली मुझ दासीको आपने किस अपराधसे त्याग दिया है॥


अवगुन एक मोर मैं माना।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥

हाँ, मेरा एक अपराध पक्का (अवश्य) हैं और वह मैंने जान भी लिया है कि आपसे बिछुरतेही (वियोग होते ही) मेरे प्राण नही निकल गये॥

परंतु हें नाथ! वह अपराध मेरा नहीं है किन्तु नेत्रोका है; क्योंकि जिस समय प्राण निकलने लगते है उस समय ये नेत्र हठ कर उसमें बाधा कर देते हैं (अर्थात् केवल आपके दर्शनके लोभसे मेरे प्राण बने रहे हैं)॥


बिरह अगिनि तनु तूल समीरा।
स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी।
जरैं न पाव देह बिरहागी॥

हे प्रभु! आपका विरह तो अग्नि है, मेरा शरीर तूल (रुई) है। श्वास प्रबल वायु है। अब इस सामग्रीके रहते शरीर क्षणभरमें जल जाय इसमें कोई आश्चर्य नहीं॥

परंतु नेत्र अपने हितके लिए अर्थात् दर्शनके वास्ते जल बहा बहा कर उस विरह की आग को शांत करते हैं, इससे विरह की आग भी मेरे शरीरको जला नहीं पाती॥


सीता कै अति बिपति बिसाला।
बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥

हनुमानजी ने कहा कि हे दीनदयाल! सीताकी विपत्ति ऐसी भारी है कि उसको न कहना ही अच्छा है॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥31॥

हे करुणानिधान! हे प्रभु! सीताजीके एक एक क्षण, सौ सौ कल्पके समान व्यतीत होते हैं। इसलिए जल्दी चलकर और अपने बाहुबलसे दुष्टोंके दलको जीतकर उनको जल्दी ले आइए ॥31॥


रामचन्द्रजी और हनुमान का संवाद

चौपाई

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना।
भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन कायँ मन मम गति जाही।
सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥

सुखके धाम श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके दुःखके समाचार सुन अति खिन्न हुए और उनके कमलसे दोनों नेत्रोंमें जल भर आया॥ रामचन्द्रजीने कहा कि जिसने मन, वचन व कर्मसे मेरा शरण लिया है क्या स्वप्नमें भी उसको विपत्ति होनी चाहिये? कदापि नहीं॥


कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की।
रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥

हनुमानजीने कहा कि हे प्रभु! मनुष्यकी यह विपत्ति तो वही (तभी) है जब यह मनुष्य आपका भजन स्मरण नही करता॥ हे प्रभु इस राक्षसकी कितनीसी बात है। आप शत्रुको जीतकर सीताजीको ले आइये॥


सुनु कपि तोहि समान उपकारी।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

रामचन्द्रजीने कहा कि हे हनुमान! सुन, तेरे बराबर मेरे उपकार करनेवाला देवता, मनुष्य और मुनि कोइ भी देहधारी नहीं है॥

हे हनुमान! में तेरा क्या प्रत्युपकार (बदले में उपकार) करूं; क्योंकि मेरा मन बदला देनेके वास्ते सन्मुखही (मेरा मन भी तेरे सामने) नहीं हो सकता॥


सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता।
लोचन नीर पुलक अति गाता॥

हे हनुमान! सुन, मेंने अपने मनमें विचार करके देख लिया है कि मैं तुमसे उऋण नहीं हो सकता॥
रामचन्द्रजी ज्यों ज्यों वारंवार हनुमानजीकी ओर देखते है; त्यों त्यों उनके नेत्रोंमें जल भर आता है और शरीर पुलकित हो जाता है॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ॥32॥

हनुमानजी प्रभुके वचन सुनकर और प्रभुके मुखकी ओर देखकर मनमें परम हर्षित हो गए॥
और बहुत व्याकुल होकर कहा ‘हे भगवान्! रक्षा करो’ ऐसे कहता हुए चरणोंमे गिर पड़े ॥32॥


श्री राम हनुमान संवाद

चौपाई

बार बार प्रभु चहइ उठावा।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥

यद्यपि प्रभु उनको चरणोंमेंसे बार-बार उठाना चाहते हैं, परंतु हनुमान् प्रेममें ऐसे मग्न हो गए थे कि वह उठना नहीं चाहते थे॥

कवि कहते है कि रामचन्द्रजीके चरणकमलोंके बीच हनुमानजी सिर धरे है इस बातको स्मरण करके महादेवकी भी वही दशा होगयी और प्रेममें मग्न हो गये; क्योंकि हनुमान् रुद्रका अंशावतार है॥


सावधान मन करि पुनि संकर।
लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाई प्रभु हृदयँ लगावा।
कर गहि परम निकट बैठावा॥

फिर महादेव अपने मनको सावधान करके अति मनोहर कथा कहने लगे॥
महादेवजी कहते है कि हे पार्वती! प्रभुने हनमान्‌कों उठाकर छातीसे लगाया और हाथ पकड कर अपने बहुत नजदीक बिठाया॥


कहु कपि रावन पालित लंका।
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन बिगत अभिमाना॥

और हनुमानसे कहा कि हे हनुमान! कहो, वह रावणकी पाली हुई लंकापुरी, कि जो बड़ा बंका किला है, उसको तुमने कैसे जलाया?॥

रामचन्द्रजीकी यह बात सुन उनको प्रसन्न जानकर हनुमानजीने अभिमानरहित होकर यह वचन कहे कि॥


साखामग कै बड़ि मनुसाई।
साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥

हे प्रभु! बानरका तो अत्यंत पराक्रम यही है कि वृक्षकी एक डालसे दूसरी डालपर कूद जाय॥

परंतु जो मै समुद्रको लांघकर लंका में चला गया और वहा जाकर मैंने लंका को जला दिया और बहुतसे राक्षसोंको मारकर अशोक वनको उजाड़ दिया॥


सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥

हे प्रभु! यह सब आपका प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता कुछ नहीं है॥


दोहा (Doha – Sunderkand)

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल ॥33॥

हे प्रभु! आप जिस पर प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी असाध्य (कठिन) नहीं है।
आपके प्रतापसे निश्चय रूई बड़वानलको जला सकती है (असंभव भी संभव हो सकता है) ॥33॥


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श्री राम और हनुमानजी का संवाद

चौपाई

नाथ भगति अति सुखदायनी।
देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी।
एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥

रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर हनुमानजीने कहा कि हे नाथ! मुझे तो कृपा करके आपकी अनपायिनी (जिसमें कभी विच्छेद नहीं पडे ऐसी, निश्चल) कल्याणकारी और सुखदायी भक्ति दो॥

महादेवजीने कहा कि हे पार्वती! हनुमानकी ऐसी परम सरल वाणी सुनकर प्रभुने कहा कि हे हनुमान्! ‘एवमस्तु’ (ऐसाही हो) अर्थात् तुमको हमारी भक्ति प्राप्त हो॥


उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।
ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा।
रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥

हे पार्वती! जिन्होंने रामचन्द्रजीके परम दयालु स्वभावको जान लिया है, उनको रामचन्द्रजीकी भक्तिको छोंड़कर दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता॥

यह हनुमान् और रामचन्द्रजीका संवाद जिसके हृदयमें दृढ़ रीतिसे आ जाता है, वह श्री रामचन्द्रजीकी भक्तिको अवश्य पा लेता है॥


सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा।
जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा।
कहा चलैं कर करहु बनावा॥

प्रभुके ऐसे वचन सुनकर तमाम वानरवृन्दने पुकार कर कहा कि हे दयालू! हे सुखके मूलकारण प्रभु! आपकी जय हो, जय हो, जय हो॥

उस समय प्रभुने सुग्रीवको बुलाकर कहा कि हे सुग्रीव! अब चलनेकी तैयारी करो॥


अब बिलंबु केह कारन कीजे।
तुरंत कपिन्ह कहँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी।
नभ तें भवन चले सुर हरषी॥

अब विलम्ब क्यों किया जाता है। अब तुम वानरोंको तुरंत आज्ञा क्यो नहीं देते हो॥

इस कौतुकको देखकर (भगवान की यह लीला) देवताओंने आकाशसे बहुतसे फूल बरसाये और फिर वे आनंदित होकर अपने अपने लोक को चल दिये॥


दोहा

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥34॥

रामचन्द्रजीकी आज्ञा होते ही सुग्रीवने वानरोंके सेनापतियोंको बुलाया और सुग्रीवकी आज्ञाके साथही वानर और रीछोके झुंड कि जिनके अनके प्रकारके वर्ण हैं और अतूलित बल हैं वे वहां आये॥


श्री रामजी का वानरों की सेना के साथ समुद्र तट पर जाना

चौपाई

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा।
गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना।
चितइ कृपा करि राजिव नैना॥

महाबली वानर और रीछ वहां आकर गर्जना करते हैं और रामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर झुँकाकर प्रणाम करते हैं॥
तमाम वानरॉकी सेनाको देखकर कमलनयन प्रभुने कृपा दृष्टिसे उनकी ओर देखा॥


राम कृपा बल पाइ कपिंदा।
भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना।
सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥

प्रभुकी कृपादृष्टि पड़तेही तमाम वानर रघुनाथजीके कृपाबलको पाकर ऐसे बली और बड़े होगये कि मानों पक्षसहित पहाड़ ही (पंखवाले बड़े पर्वत) तो नहीं है? ॥

उस समय रामचन्द्रजीने आनंदित होकर प्रयाण किया. तब नाना प्रकारके अच्छे और सुन्दर शगुनभी होने लगे॥


जासु सकल मंगलमय कीती।
तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं।
फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥

यह दस्तूर है कि जिसके सब मंगलमय होना होता है (जिनकी कीर्ति सब मंगलों से पूर्ण है) उसके प्रयाणके समय शगुनभी अच्छे होते है॥

प्रभुने प्रयाण किया उसकी खबर सीताजीको भी हो गई; क्योंकि जिस समय प्रभुने प्रयाण किया उस वक्त सीताजीके शुभसूचक बाएं अंग फड़कने लगे (मानो कह रह है की श्री राम आ रहे हैं)॥


जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई।
असगुन भयउ रावनहिं सोई॥
चला कटकु को बरनैं पारा।
गर्जहिं बानर भालु अपारा॥

ओर जो जो शगुन सीताजीके अच्छे हुए वे सब रावणके बुरे शगुन हुए॥

इस प्रकार रामचन्द्रजीकी सेना रवाना हुई, कि जिसके अन्दर असंख्यात वानर और रीछ गरज रहे है. उस सेनाका वर्णन करके कौन आदमी पार पा सकता है (कौन कर सकता है?)॥


नख आयुध गिरि पादपधारी।
चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं।
डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥

जिनके नखही तो शस्त्र हैं। पर्वत व वृक्ष हाथोंमें है वे इच्छाचारी वानर (इच्छानुसार सर्वत्र बेरोक-टोक चलनेवाले) और रीछ आकाशमें कूदते हुए, आकाशमार्ग होकर सेनाके बीच जा रहे है॥

वानर व रीछ मार्गमें जाते हुए सिंहनाद कर रहे है. जिससे दिग्गज हाथी डगमगाते हैं और चीत्कार करते हैं॥


छंद – Sunderkand

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥

जब रामचन्द्रजीने प्रयाण किया तब दिग्गज चिंघाड़ने लगे, पृथ्वी डगमगाने लगी, पर्वत कांपने लगे, समुद्र खड़भड़ा गये, सूर्य आनंदित हुआ कि हमारे वंशमें दुष्टोंको दंड देनेवाला पैदा हुआ। देवता, मुनि, नाग व् किन्नर ये सब मन में हर्षित हुए कि अब हमारे दुःख टल गए।

वानर विकट रीतिसे कटकटा रहे है, कोटयानकोट बहुतसे भट इधर उधर दौड़ रहे हैं और रामचन्द्रजीके गुणगणोंको गा रहे हैं कि हे प्रबलप्रतापवाले राम! आपकी जय हो॥


छंद – Sunderkand

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥

उस सेनाके अपार भारको शेषजी (सर्पराज शेष) स्वयं सह नहीं सकते जिससे वारंवार मोहित होते हें और अपने दाँतोंसे बार-बार कमठकी (कच्छप की) कठोर पीठको पकडे रहते है।

सो वह शोभा कैसी मालूम होती है कि मानो रामचन्द्रजीके सुन्दर प्रयाणकी प्रस्थिति (प्रस्थान यात्रा) को परमरम्य जानकर शेषजी कमठकी पीठरूप खप्परपर अपने दांतोसे लिख रहे हैं, कि जिससे वह प्रस्थानका पवित्र संवत् च मिती सदा स्थिर बनी रहे, जैसे कुएं बावली मंदिर आदि बनानेवाले उसपर पत्थरमें प्रशस्ति खुदवाकर लगा देते है ऐसे शेषजी मानो कमठकी पीठपर प्रशस्तिही खोद रहे थे॥


दोहा

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥35॥

कृपाके भ्रंडार श्रीरामचन्द्रजी इस तरह जाकर समुद्रके तीरपर उतरे, तब वीर रीछ और वानर जहां तहां वहुतसे फल खाने लगे ॥35॥


मंदोदरी और रावण का संवाद

चौपाई

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका।
जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा।
नहिं निसिचर कुल केर उवारा॥

जबसे हनुमान् लंकाको जलाकर चले गए तबसे वहां राक्षसलोग शंकासहित (भयभीत) रहने लगे॥
और अपने अपने घरमें सब विचार करने लगे कि अब राक्षसकुल बचनेका नहीं है (राक्षस कुल की रक्षा का कोई उपाय नहीं है)॥


जासु दूत बल बरनि न जाई।
तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी।
मंदोदरी अधिक अकुलानी॥

हम लोग जिसके दूतके बलको भी कह नहीं सकते उसके आनेपर फिर पुरका भला कैसे हो सकेगा (बुरी दशा होगी)॥
नगरके लोगोंकी ऐसी अति भयसहित वाणी सुनकर मन्दोंदरी अपने मनमें बहुत घबरायी॥


रहसि जोरि कर पति पग लागी।
बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू।
मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥

और एकान्तमें आकर हाथ जोड़कर पातिके चरणोंमे गिरकर नितिके रससे भरे हुए ये वचन बोली॥
हे कान्त! हरि भगवानसे जो आपके वैरभाव हैं उसे छोड़ दीजिए। मै जो आपसे कहती हूँ वह आपको अत्यंत हितकारी है सो इसको अपने चित्तमें धारण कीजिए॥


समुझत जासु दूत कइ करनी।
स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥

भला अब उसके दूतके कामको तो देखो कि जिसको नाम लेनेसे राक्षसियोंके गर्भ गिर जाते हैं ॥
इसलिए हे कान्त! मेरा कहना तो यह है कि जो आप अपना भला चाहो तो, अपने मंत्रियोंको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्री को भेज दीजिए॥


तव कुल कमल बिपिन दुखदाई।
सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥

जैसे शीतऋतु अर्थात् शिशिर रीतुकी रात्रि (जाड़ेकी रात्रि) आनेसे कमलोंके बनका नाश हो जाता हे ऐसे तुम्हारे कुलरूप कमलबनका संहार करनेके लिये यह सीता शिशिर रितुकी रात्रिके समान आयी है॥

हे नाथ! सुनो, सीताको बिना देनेके तो चाहे महादेव ओर ब्रह्माजी भले कुछ उपाय क्यों न करे पर उससे आपका हित नहीं होगा॥


दोहा

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥36॥

हे नाथ रामचन्द्रजीके बाण तो सर्पोके गणके (समूह) समान है और राक्षससमूह मेंडकके झुंडके समान हैं। सो वे इनका संहार नहीं करते इससे पहले पहले आप यत्न करो और जिस बातका हठ पकड़ रक्खा है उसको छोड़कर उपाय कर लीजिए॥


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रावण और मंदोदरी का संवाद

चौपाई

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी।
बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा।
मंगल महुँ भय मन अति काचा॥

कवि कहता है कि वो शठ मन्दोदरीकी यह वाणी सुनकर हँसा, क्योंकि उसके अभिमानकौ तमाम संसार जानता है॥
और बोला कि जगत्‌में जो यह बात कही जाती है कि स्त्रीका स्वभाव डरपोक होता है सो यह बात सच्ची है। और इसीसे तेरा मन मंगलकी बातमें अमंगल समझता है॥


जौं आवइ मर्कट कटकाई।
जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा।
तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥

रावण बोला, अब वानरोकी सेना यहां आवेगी तो क्या बिचारी वह जीती रह सकेगी, क्योंकि राक्षस उसको आते ही खा जायेंगे॥

जिसकी त्रासके मारे लोकपाल कांपते है उसकी स्त्रीका भय होना यह तो एक बड़ी हँसीकी बात है॥


अस कहि बिहसि ताहि उर लाई।
चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता।
भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥

वह दुष्ट मंदोदारीको ऐसे कह, उसको छातीमें लगाकर मनमें बड़ी ममता रखता हुआ सभामें गया॥
परन्नु मन्दोदरीने उस वक़्त समझ लिया कि अब इस कान्तपर दैव प्रतिकूल होगया है॥


बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई।
सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू।
ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥

रावण सभामे जाकर बैठा। वहां ऐसी खबर आयी कि सब सेना समुद्र के उस पार आ गयी है॥

तब रावणने सब मंत्रियोंसे पूँछा की तुम अपना अपना जो योग्य मत हो वह कहो। तब वे सब मंत्री हँसे और चुप लगा कर रह गए (इसमें सलाह की कौन-सी बात है?)॥


जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं।
नर बानर केहि लेखे माहीं॥

फिर बोले की हे नाथ! जब आपने देवता और दैत्योंको जीता उसमें भी आपको श्रम नही हुआ तो मनुष्य और वानर तो कौन गिनती है॥


दोहा

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥37॥

जो मंत्री भय वा लोभसे राजाको सुहाती बात कहता है, तो उसके राजका तुरंत नाश हो जाता है, और जो वैद्य रोगीको सुहाती बात कहता है तो रोगीका वेगही नाश हो जाता है, तथा गुरु जो शिष्यके सुहाती बात कहता है, उसके धर्मका शीघ्रही नाश हो जाता है ॥37॥


विभीषण का रावण को समझाना

चौपाई

सोइ रावन कहुँ बनी सहाई।
अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा।
भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥

सो रावणके यहां वैसीही सहाय बन गयी अर्थात् सब मंत्री सुना सुना कर रावणकी स्तुति करने लगे॥
उस अवसरको जानकर विभीषण वहां आया और बड़े भाईके चरणों में उसने सिर नवाया॥


पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन।
बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता।
मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥

फिर प्रणाम करके वह अपने आसनपर जा बैठा॥

और रावणकी आज्ञा पाकर यह वचन बोला, हे कृपालु! आप मुझसे जो बात पूछते हो सो हे तात! मैं भी मेरी बुद्धिके अनुसार कहूंगा॥


जो आपन चाहै कल्याना।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥

हे तात! जो आप अपना कल्याण, सुयश, सुमति, शुभ-गति, और नाना प्रकारका सुख चाहते हो॥

तब तो हे स्वामी! परस्त्रीके लिलारका (ललाट को) चौथके चांदकी नाई (तरह) त्याग दो (जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)॥


चौदह भुवन एक पति होई।
भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥

चाहो कोई एकही आदमी चौदहा लोकोंका पति हो जावे परंतु जो प्राणीमात्रसे द्रोह रखता है वह स्थिर नहीं रहता अर्थात् तुरंत नष्ट हो जाता हैँ॥

जो आदमी गुणोंका सागर और चतुर है परंतु वह यदि थोड़ा भी लोभ कर जाय तो उसे कोई भी अच्छा नहीं कहता॥


दोहा

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥38॥

हे नाथ! ये सद्ग्रन्थ अर्थात् वेद आदि शास्त्र ऐसे कहते हैं कि काम, कोध, मद और लोभ ये सब नरक के मार्ग हैं, इस वास्ते इन्हें छोड़कर रामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा करो ॥38॥


रावण को विभीषण का समझाना

चौपाई

तात राम नहिं नर भूपाला।
भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता।
ब्यापक अजित अनादि अनंता॥

हे तात! राम मनुष्य और राजा नहीं हैं, किंतु वे साक्षात त्रिलोकीनाथ और कालके भी काल है॥

जो साक्षात् परब्रह्म, निर्विकार, अजन्मा, सर्वव्यापक, अजेय, आदि और अनंत ब्रह्म है॥


गो द्विज धेनु देव हितकारी।
कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता।
बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥

वे कृपासिंधु गौ, ब्राह्मण, देवता और पृथ्वीका हित करनेके लिये, दुष्टोके दलका संहार करनेके लिये, वेद और धर्मकी रक्षा करनेके लिये प्रकट हुए हे॥


ताहि बयरु तजि नाइअ माथा।
प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही।
भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥

सो शरणगतोंके संकट मिटानेवाले उन रामचन्द्रजीको वैर छोड़कर प्रणाम करो॥

हे नाथ! रामचन्द्रजी को सीता दे दीजिए और कामना छोडकर स्नेह रखनेवाले रामका भजन करो॥


सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा।
बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन।
सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥

हे नाथ! वे शरण जानेपर ऐसे अधर्मीको भी नहीं त्यागते कि जिसको विश्वद्रोह करनेका पाप लगा हो॥

हे रावण! आप अपने मनमें निश्चय समझो कि जिनका नाम लेनेसे तीनों प्रकारके ताप निवृत्त हो जाते हैं वेही प्रभु आज पृथ्वीपर प्रकट हुए हैं॥


दोहा

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥39(क)॥

हे रावण! मैं आपके वारंवार पावों में पड़कर विनती करता हूँ, सो मेरी विनती सुनकर आप मान, मोह, और मदको छोड़ श्री रामचन्द्रजी की सेवा करो ॥39(क)॥


दोहा

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥39(ख)॥

पुलस्त्यऋषीने अपने शिष्यको भेजकर यह बात कहला भेजी थी सो अवसर पाकर यह बात हे रावण! मैंने आपसे कही है ॥39(ख)॥


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विभीषण और माल्यावान का रावण को समझाना

चौपाई

माल्यवंत अति सचिव सयाना।
तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन।
सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥

वहां माल्यावान नाम एक सुबुद्धि मंत्री बैठा हुआ था. वह विभीषणके वचन सुनकर. अतिप्रसन्न हुआ ॥

और उसने रावणसे कहा कि तात ‘आपका छोटा भाई बड़ा नीति जाननेवाला हैँ इस वास्ते बिभीषण जो बात कहता है, उसी बातको आप अपने मनमें धारण करो॥


रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ।
दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवंत गह गयउ बहोरी।
कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥

माल्यवान्‌की यह बात सुनकर रावणने कहा कि हे राक्षसो! ये दोनों नीच शत्रुकी बड़ाई करते हैं, तुममेंसे कोई भी उनको यहां से निकाल नहीं देते, यह क्या बात है॥

तब माल्यवान् तो उठकर अपने घरको चला गया. और बिभीषणने हाथ जोड़कर फिर कहा॥


सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

कि हे नाथ! वेद और पुरानोमें ऐसा कहा है कि सुबुद्धि और कुबुद्धि सबके मनमें रहती है। जहा सुमति है, वहा संपदा है. आर जहा कुबुद्धि है वहां विपत्ति॥


तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी।
तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥

हे रावण! आपके हृदयमें कुबुद्धि आ बसी है, इसीसे आप हित और अनहितको. विपरीत मानते हो की जिससे शत्रुको प्रीति होती है॥

जो राक्षसोंके कुलकी कालरात्रि है, उस सीतापर आपकी बहुत प्रीति हैं यह कुबुद्धि नहीं तो और क्या हे॥


दोहा

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ॥40॥

हे तात में चरण पकडकर आपसे प्रार्थना करता हूं सो मेरी प्रार्थना अंगीकार करो। आप सीता रामचंद्रजीको दे दो, जिससे आपका बहुत भला होगा ॥40॥


विभीषण का अपमान

चौपाई

बुध पुरान श्रुति संमत बानी।
कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई।
खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥

सयाने बिभीषणने नीतिको कहकर वेद और पुराणके संमत वाणी कही॥

जिसको सुनकर रावण गुस्सा होकर उठ खड़ा हुआ और बोला कि हे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी दीखती है॥


जिअसि सदा सठ मोर जिआवा।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं।
भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥

हे नीच! सदा तू जीविका तो मेरी पाता है और शत्रुका पक्ष सदा अच्छा लगता है॥
हे दुष्ट! तू यह नही कहता कि जिसको हमने अपने भुजबलसे नहीं जीता ऐसा जगत्‌में कौन है? ॥


मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा।
अनुज गहे पद बारहिं बारा॥

हे शठ मेरी नगरीमें रहकर जो तू तपस्वीसे प्रीति करता है तो हे नीच! उससे जा मिल और उसीसे नीतिका उपदेश कर॥
ऐसे कहकर रावणने लातका प्रहार किया, परंतु बिभीषणने तो इतने परभी वारंत्रार पैर ही पकड़े॥


उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥

शिवजी कहते हैं, है पार्वती! सत्पुरुषोंकी यही बड़ाई है कि बुरा करनेवालों की भलाई ही सोचते है और करते हैं॥

विभीषण ने कहा, हे रावण! आप मेरे पिताके बराबर हो इस वास्ते आपने जो मुझको मारा वह ठीक ही है, परंतु आपका भला तो रामचन्द्रजीके भजन से ही होगा॥


सचिव संग लै नभ पथ गयऊ।
सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥

ऐसे कहकर बिभीषण अपने मंत्रियोंको संग लेकर आकाशमार्ग गया और जाते समय सबको सुनाकर ऐसे कहता गया॥


दोहा

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥41॥

कि हे प्रभु! रामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ है और तेरी सभा कालके आधीन है। और में अब रामचन्द्रजीके शरण जाता हूँ सो मुझको अपराध मत लगाना ॥41॥


विभीषण का प्रभु श्रीरामकी शरण के लिए प्रस्थान

चौपाई

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।
आयूहीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी।
कर कल्यान अखिल कै हानी॥

जिस वक़्त विभीषण ऐसे कहकर लंकासे चले उसी समय तमाम राक्षस आयुहीन हो गये॥

महादेवजीने कहा कि हे पार्वती! साधू पुरुषोकी अवज्ञा करनी ऐसी ही बुरी है कि वह तुरंत तमाम कल्याणको नाश कर देती है॥


रावन जबहिं बिभीषन त्यागा।
भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं।
करत मनोरथ बहु मन माहीं॥

रावणने जिस समय बिभीषणका परित्याग किया उसी क्षण वह मंदभागी विभवहीन हो गया॥
बिभीषण मनमें अनेक प्रकारके मनोरथ करते हुए आनंदके साथ रामचन्द्रजीके पास चला॥


देखिहउँ जाइ चरन जलजाता।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषनारी।
दंडक कानन पावनकारी॥

विभीषण मनमें विचार करने लगा कि आज जाकर मैं रघुनाथजीके भक्तलोगोंके सुखदायी अरुण (लाल वर्ण के सुंदर चरण) और सुकोमल चरणकमलोंके दर्शन करूंगा॥

कैसे हे चरणकमल कि जिनको परस कर (स्पर्श पाकर) गौतम ऋषिकी स्त्री (अहल्या) ऋषिके शापसे पार उतरी, जिनसे दंडक वन पवित्र हुआ है॥


जे पद जनकसुताँ उर लाए।
कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई।
अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥

जिनको सीताजी अपने हृदयमें सदा लगाये रहतीं है. जो कपटी हरिण ( मारीच राक्षस) के पीछे दौड़े॥
रूप हृदयरूपी सरोवर भीतर कमलरूप हैं, उन चरणोको जाकर मैं देखूंगा। अहो! मेरा बड़ा भाग्य हे॥


दोहा

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥42॥

जिन चरणोकी पादुकाओमें भरतजी रातदिन मन लगाये है, आज मैं जाकर इन्ही नेत्रोसे उन चरणोंको देखूंगा ॥42॥


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चौपाई

ऐहि बिधि करत सप्रेम बिचारा।
आयउ सपदि सिंदु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा।
जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥

यिभीषण इस प्रकार प्रेमसहित अनेक प्रकारके विचार करते हुए तुरंत समुद्रके इस पार आए॥
वानरोंने बिभीषणको आते देखकर जाना कि यह कोई शत्रुका दूत है॥


ताहि राखि कपीस पहिं आए।
समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई।
आवा मिलन दसानन भाई॥

वानर उनको वही रखकर सुग्रीवके पास आये और जाकर उनके सब समाचार सुग्रीवको सुनाये॥
तब सुग्रीवने जाकर रामचन्द्रजीसे कहा कि हे प्रभु! रावणका भाई आपसे मिलनेको आया है॥


कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा।
कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया॥

तब रामचन्द्रजीने कहा कि हे सखा! तुम्हारी क्या राय है (तुम क्या समझते हो)? तब सुग्रीवने रामचन्द्रजीसे कहा कि हे नरनाथ! सुनो,॥

राक्षसोंकी माया जाननेमें नहीं आ सकती। इसी बास्ते यह नहीं कह सकते कि यह मनोवांछित रूप धरकर यहां क्यों आया है?॥


भेद हमार लेन सठ आवा।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भयहारी॥

मेरे मनमें तो यह जँचता है कि यह शठ हमारा भेद लेने को आया है। इस वास्ते इसको बांधकर रख देना चाहिये॥
तब रामचन्द्रजीने कहा कि हे सखा! तुमने यह नीति बहुत अच्छी बिचारी परंतु मेरा पण शरणागतोंका भय मिटानेका है॥


सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना॥

रामचन्द्रजीके वचन सुनकर हनुमानजीको बड़ा आनंद हुआ कि भगवान् सच्चे शरणागतवत्सल हैं (शरण में आए हुए पर पिता की भाँति प्रेम करनेवाले)॥


दोहा

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥43॥

कहा है कि जो आदमी अपने अहितको विचार कर शरणागतको त्याग देते हैं, उन मनुष्योको पामर (पागल) और पापरूप जानना चाहिये क्योंकि उनको देखनेहीसे हानि होती है ॥43॥


विभीषण को भगवान रामकी शरण प्राप्ति

चौपाई

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

प्रभुने कहा कि चाहे कोई महापापी होवे अर्थात् जिसको करोड़ ब्रह्महत्याका पाप लगा हुआ होवे और वह भी यदि मेरे शरण चला आवे तो मै उसको किसी कदर छोंड़ नहीं सकता॥

यह जीव जब मेरे सन्मुख हो जाता है तब मैं उसके करोड़ों जन्मोंके पापोको नाश कर देता हूं॥


पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई।
मोरें सनमुख आव कि सोई॥

पापी पुरुषोंका यह सहज स्वभाव है कि उनको किसी प्रकारसे मेरा भजन अच्छा नहीं लगता॥
हे सुग्रीव! जो पुरुष (वह रावण का भाई) दुष्टहृदय होगा क्या वह मेरे सत्पर आ सकेगा? कदापि नहीं॥


निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥

हे सुग्रीव! जो आदमी निर्मल अंतःकरणवाला होगा, वही मुझको पावेगा क्योंकि मुझको छल, छिद्र और कपट कुछ भी अच्छा नहीं लगता॥

कदाचित् रावणने इसको भेद लेनेके लिए भेजा होगा, फिर भी हे सुग्रीव! हमको उसका न तो कुछ भय है और न किसी प्रकारकी हानि है॥


जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥

क्योंकि जगत्‌में जितने राक्षस है, उन सबोंको लक्ष्मण एक क्षणभरमें मार डालेगा॥
और उनमेंसे भयभीत होकर जो मेरे शरण आजायगा उसको तो में अपने प्राणोंके बराबर रखूँगा॥


दोहा

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत ॥44॥

हँसकर कृपानिधान श्रीरामने कहा कि हे सुग्रीव! चाहो वह शुद्ध मनसे आया हो अथवा भेदबुद्धि विचारकर आया हो, दोनो ही तरहसे इसको यहां ले आओ। रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर अंगद और हनुमान् आदि सब बानर हे कृपालु! आपका. जय हो ऐसे कहकर चले ॥44॥


विभीषण को भगवान रामकी शरण प्राप्ति

चौपाई

सादर तेहि आगें करि बानर।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता।
नयनानंद दान के दाता॥

वे वानर आदरसहित विभीषणको अपने आगे लेकर उस स्थानको चले कि जहां करुणानिधान श्री रघुनाथजी विराजमान थे॥

विभीषणने नेत्रोंको आनन्द देनेवाले उन दोनों भाइयोंको दूर ही से देखा॥


बहुरि राम छबिधाम बिलोकी।
रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन।
स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥

फिर वह छविके धाम श्रीरामचन्द्रजीको देखकर पलकोको रोककर एकटक देखते खड़े रहे॥

श्रीरघुनाथजीका स्वरूप कैसा है जिसमें लंबी भुजा है, कमलसे लालनेत्र हैं। मेघसा सधन श्याम शरीर है, जो शरणागतोंके भयको मिटानेवाला है॥


सघ कंध आयत उर सोहा।
आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता।
मन धरि धीर कही मृदु बाता॥

जिसके सिंहकेसे कंधे है, विशाल वक्षःस्थल शोभायमान है, मुख ऐसा है कि जिसकी छविको देखकर असंख्य कामदेव मोहित हो जाते हैं॥

उस स्वरूपका दर्शन होतेही विभीषणको नेत्रोंमें जल आ गया। शरीर अत्यंत पुलकित हो गया, तथापि उसने मनमें धीरज धरकर ये सुकोमल वचन कहे॥


नाथ दसानन कर मैं भ्राता।
निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा।
जथा उलूकहि तम पर नेहा॥

कि हे देवताओंके पालक! मेरा राक्षसोंके वंशमें तो जन्म है और हे नाथ! मैं रावणका भाई॥

स्वभावसेही पाप मुझको प्रिय लगता है, और यह मेरा तामस शरीर है सो यह बात ऐसी है कि जैसे उल्लूका अंधकारपर सदा स्नेह रहता है। ऐसे मेरे पाप पर प्यार है॥


दोहा

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥45॥

तथापि हे प्रभु! हे भय और संकट मिटानेवाले! मै कानोंसे आपका सुयश सुनकर आपके शरण आया हूँ। सो हे आर्ति (दुःख) हरण हारे! हे शरणागतोंको सुख देनेवाले प्रभु! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥45॥


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विभीषण को भगवान रामकी शरण प्राप्ति

चौपाई

अस कहि करत दंडवत देखा।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥

ऐसे कहते हुए बिभीषणको दंडवत करते देखकर प्रभु बड़े अल्हादके साथ तुरंत उठ खड़े हए॥
और बिभीषणके दीन वचन सुनकर प्रभुके मनमें वे बहुत भाए आर उसीसे प्रभुने अपनी विशाल भुजासे उनको उठाकर अपनी छातीसे लगाया॥


अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी।
बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥

लक्ष्मण सहित प्रभुने उससे मिलकर उसको अपने पास बिठाया. फिर भक्तोंके हित करनेवाले प्रभुने ये वचन कहे॥
कि हे लंकेश विभीषण! आपके परिवारसहित कुशल तो है? क्योंकि आपका रहना कुमार्गियोंके बीचमें है॥


खल मंडली बसहु दिनु राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती।
अति नय निपुन न भाव अनीती॥

रात दिन तुम दुष्टोंकी मंडलीके बीच रहते हो इससे, हे सखा! आपका धर्म कैसे निभता होगा॥
मैने तुम्हारी सब गति जानली है। तुम बडे नीतिनिपुण हो और तुम्हारा अभिप्राय अन्यायपर नहीं है (तुम्हें अनीति नहीं सुहाती)॥


बरु भल बास नरक कर ताता।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया।
जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥

रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर विभीषणने कहा कि हे प्रभु! चाहे नरकमें रहना अच्छा है परंतु दुष्टकी संगति अच्छी नहीं. इसलिये हे विधाता! कभी दुष्टकी संगति मत देना॥
हे रघुनाथजी! आपने अपना जन जानकर जो मुझपर दया की, उससे आपके दर्शन हुए। हे प्रभु! अब में आपके चरणोके दर्शन करनेसे कुशल हूँ॥


दोहा

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥46॥

है प्रभु! यह मनुष्य जब तक शोकके धामरूप काम अर्थात् लालसाको छोंड कर श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा नहीं करता तब तक इस जीवको स्वप्रमें भी न तो कुशल है और न कहीं मनको विश्राम (शांति) है ॥46॥


भगवान् श्री राम की महिमा

चौपाई

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।
लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरें चाप सायक कटि भाथा॥

जब तक धनुप बाण धारण किये और कमरमें तरकस कसे हुए श्रीरामचन्द्रजी हृदयमें आकर नहीं बिराजते तब तक लोभ, मोह, मत्सर, मद और मान ये अनेक दुष्ट हृदयके भीतर निवास कर सकते हैं और जब आप आकर हृदयमें विराजते हो तब ये सब भाग जाते हैं॥


ममता तरुन तमी अँधिआरी।
राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥

जब तक जीवके हृदयमें प्रभुका प्रतापरूप सूर्य उदय नहीं होता तबतक रागद्वेषरूप उल्लुओं को सुख देनेवाली ममतारूप सघन अंधकारमय अंधियारी रात्रि रहा करती है॥


अब मैं कुसल मिटे भय भारे।
देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥

हे राम! अब मैंने आपके चरणकमलोंका दर्शन कर लिया है इससे अब मैं कुशल हूं और मेरा विकट भय भी निवृत्त हो गया है॥
हे प्रभु! हे दयालु! आप जिसपर अनुकूल रहते हो उसको तीन प्रकारके भय और दुःख (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) कभी नहीं व्यापते॥


मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ।
सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा।
तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥

हे प्रभु! मैं जातिका राक्षस हूं। मेरा स्वभाव अति अधम है। मैंने कोईभी शुभ आचरन नहीं किया है॥
तिसपरभी प्रभुने कृपा करके आनंदसे मुझको छातीसे लगाया कि जिस प्रभुके स्वरूपको ध्यान पाना मुनिलोगोंको कठिन है॥


दोहा

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज ॥47॥

सुखकी राशि रामचन्द्रजीकी कृपासे अहो! आज मेरा भाग्य बड़ा अमित और अपार हैं क्योकि ब्रह्माजी और महादेवजी जिन चरणारविन्द-युगलकी (युगल चरण कमलों कि) सेवा करते हैं, उन चरणकमलोंका मैंने अपने नेत्रोंसे दर्शन किया ॥47॥


प्रभु श्री रामचंद्रजी की महिमा

चौपाई

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ।
जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही।
आवै सभय सरन तकि मोही॥

बिभीषणकी भक्ति देखकर रामचन्द्रजीने कहा कि हे सखा! मैं अपना स्वभाव कहता हूं, सो तू सुन, मेरे स्वभावको या तो काकभुशुंडि जानते हैं या महादेव जानते है, या पार्वती जानती है। इनके सिवा दूसरा कोई नहीं जानता॥

प्रभु कहते हैं कि जो मनुष्य चराचरसे (जड़-चेतन) द्रोह रखता हो, और वह भयभीत होंके मेरे शरण आ जाए तो॥


तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

मद, मोह, कपट और नानाप्रकारके छलको छोड़कर हे सखा! मैं उसको साधु पुरुषके समान कर लेता हूँ॥
देखो, माता, पिता, बंधू, पुत्र, श्री, सन, धन, घर, सुहृद और कुटुम्ब


सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं।
हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥

इन सबके ममतारूप तागोंको इकट्ठा करके एक सुन्दर डोरी बट (डोरी बनाकर) और उससे अपने मनको मेरे चरणोंमें बांध दे। अर्थात् सबमेंसे ममता छोड़कर केवल मुझमें ममता रखें, जैसे ”त्वमेव माता पिता त्वमेव त्वमेव बंधूश्चा सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव”॥

जो भक्त समदर्शी है और जिसके किसी प्रकारकी इच्छा नहीं हे तथा जिसके मनमें हर्ष, शोक, और भय नहीं है॥


अस सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें।
धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥

ऐसे सत्पुरुष मेरे हृदयमें कैसे रहते है, कि जैसे लोभी आदमीके मन में धन सदा बसा रहता है ॥
हे बिभीषण! तुम्हारे जैसे जो प्यारे सन्त भक्त हैं उन्हीके लिए मैं देह धारण करता हूं, और दूसरा मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है॥


दोहा

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥48॥

जो लोग सगुण उपासना करते हैं, बड़े हितकारी हैं, नीतिमें निरत है, नियममें दृढ़ है और जिनकी ब्राह्मणोंके चरणकमलों में प्रीति है वे मनुष्य मुझको प्राणों के समान प्यारे लगते हें ॥48॥


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विभीषण की भगवान् श्रो रामसे प्रार्थना

चौपाई

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें।
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा।
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥

हे लंकेश (लंकापति)! सुनो, आपमें सब गुण है और इसीसे आप मुझको अतिशय प्यारें लगते हो॥
रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर तमाम वानरोंके झुंड कहने लगे कि हे कृपाके पुंज! आपकी जय हो॥


सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी।
नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा।
हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥

ओर विभीषणभी प्रभुकी बाणीको सुनता हुआ उसको कर्णामृतरूप जानकर तृप्त नहीं होता था॥

और वारंवार रामचन्द्वजीके चरणकमल धरकर ऐसा आल्हादित हुआ कि वह अपार प्रेम हृदयके अंदर नहीं समाया॥


सुनहु देव सचराचर स्वामी।
प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥

इस दशाको पहुँच कर बिभीषणने कहा कि हे देव! चराचरसहित संसारके (चराचर जगतके) स्वामी! हे शरणागतोंके पालक! हे हृदयके अंतर्यामी! सुनिए॥

पहले मेरे जो कुछ वासना थी वह भी आपके चरणकमलकी प्रीतिरूप नदीसे बह गई॥


अब कृपाल निज भगति पावनी।
देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा।
मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥

हे कृपालू! अब आप दया करके मुझको आपकी वह पावन करनहारी भक्ति दीजिए कि जिसको महादेवजी सदा धारण करते हैं॥

रणधीर रामचन्द्रजीने एवमस्तु ऐसे कहकर तुरत समुद्रका जल मँगवाया॥


जदपि सखा तव इच्छा नहीं।
मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा।
सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥

और कहा कि हे सखा! यद्यपि तेरे किसी बातकी इच्छा नहीं है तथापि जगत्‌में मेरा दर्शन अमोघ है अर्थात् निष्फल नही है॥

ऐसे कहकर प्रभुने बिभीषणके राजतिलक कर दिया. उस समय आकाशमेंसे अपार पुष्पोंकी वर्षा हुई॥


दोहा

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड ॥49(क)॥

रावणका क्रोध तो अग्निके समान है और उसका श्वास प्रचंड पवनके तुल्य है। उससे जलते हुए विभीषणको बचाकर प्रभुने उसको अखंड राज दिया ॥49(क)॥


दोहा

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥49(ख)॥

महादेवने दश माथे देनेपर रावणको जो संपदा दी थी वह संपदा कम समझकर रामचन्द्रजीने बिभीषणको सकुचते हुए दी ॥49(ख)॥


समुद्र पार करने के लिए विचार

चौपाई

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना।
ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा।
प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥

ऐसे प्रभुको छोड़कर जो आदमी दूसरेको भजते हैं वे मनुष्य बिना सींग पूंछके पशु हैं॥
प्रभुने बिभीषणको अपना भक्त जानकर जो अपनाया, यह प्रभुका स्वभाव सब वानरोंको अच्छा लगा॥


पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी।
सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक।
कारन मनुज दनुज कुल घालक॥

प्रभु तो सदा सर्वत्र, सबके घटमें रहनेवाले (सबके हृदय में बसनेवाले), सर्वरूप (सब रूपों में प्रकट), सर्वरहित और सदा उदासीन ही हैं॥

राक्षसकुलके संहार करनेवाले, नीतिको पालनेवाले, मायासे मनुष्यमूर्ति (कारण से भक्तों पर कृपा करने के लिए मनुष्य बने हुए), श्रीरामचन्द्रजीने सब मंत्रियोंसे कहा॥


सुनु कपीस लंकापति बीरा।
केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती।
अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥

कि हे लंकेश (लंकापति विभीषण)! हे वानरराज! हे वीर पुरुषो सुनो, अब इस गंभीर समुद्रको पार कैसे उतरें? वह युक्ति निकालो॥

क्योंकि यह समुद्र सर्प, मगर और अनेक जातिकी मछलियोंसे व्याप्त हो रहा है, बड़ा अथाह है, इसीसे सब प्रकारसे मुझको तो दुस्तर (कठिन) मालूम होता है॥


कह लंकेस सुनहु रघुनायक।
कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई।
बिनय करिअ सागर सन जाई॥

उसवक्त लंकेश अर्थात् विभीषणने कहा कि हे रघुनाथ! सुनो, आपके बाण ऐसे हैं कि जिनसे करोडो समुद्र सूख जाए, तब इस समुद्रका क्या भार है॥

तथापि नीतिमें ऐसा कहा है कि पहले साम वचनोंसे काम लेना चाहिये, इसवास्ते समुद्रके पास पधार कर आप विनती करो॥


दोहा

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि॥
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥50॥

बिभीषण कहता है कि हे प्रभु! यह समुद्र आपका कुलगुरु है। सो विचार कर अवश्य उपाय कहेगा और उपायको धरकर ये वानर और रीछ बिना परिश्रम समुद्रके पार हो जाएँगे ॥50॥


समुद्र पार करने के लिए विचार

चौपाई

सखा कही तुम्ह नीति उपाई।
करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा।
राम बचन सुनि अति दुख पावा॥

बिभीषणकी यह बात सुनकर रामचन्द्रजीने कहा कि हे सखा! तुमने यह उपाय तो बहुत अच्छा बतलाया और हम इस उपायको करेंगे भी, परंतु यदि दैव सहाय होगा तो सफल होगा॥

यह सलाह लक्ष्मणके मनमें अच्छी नही लगी अतएव रामचन्द्रजीके वचन सुनकर लक्ष्मणने बड़ा दुख पाया॥


नाथ दैव कर कवन भरोसा।
सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा।
दैव दैव आलसी पुकारा॥

और लक्ष्मणने कहा कि हे नाथ! दैवका क्या भरोसा है? आप तो मनमें क्रोध लाकर समुद्रको सुखा दीजिये॥

दैवपर भरोसा रखना यह तो कायर पुरुषोंके मनका एक आधार है; क्योंकि वेही आलसी लोग दैव करेगा सो होगा ऐसा विचार कर दैव दैव करके पुकारते रहते हैं॥


सुनत बिहसि बोले रघुबीरा।
ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई।
सिंधु समीप गए रघुराई॥

लक्ष्मणके ये वचन सुनकर प्रभुने हँसकर कहा कि हे भाई! मैं ऐसेही करूंगा पर तू मनमे कुछ धीरज धर॥
प्रभु लक्ष्मणको ऐसे कह समझाय बुझाय समुद्रके निकट पधारे॥


प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई।
बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए।
पाछें रावन दूत पठाए॥

और प्रथमही प्रभुने जाकर समुद्रको प्रणाम किया और फिर कुश बिछा कर उसके तटपर विराजे॥

जब बिभीषण रामचन्द्रजीके पास चला आया तब पीछेसे रावणने अपना दूत भेजा॥


दोहा

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ॥51॥

उस दूतने कपटसे वानरका रूप धरकर वहांका तमाम हाल देखा. तहां प्रभुका शरणागतोंपर अतिशय स्नेह देखकर उसने अपने मनमें प्रभुके गुणोंकी बड़ी सराहना की ॥51॥


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रावणदूत शुक का आना

चौपाई

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥

और देखते देखते प्रेम ऐसा बढ़ गया कि वह (रावणदूत शुक) छिपाना भूल कर रामचन्द्रजीके स्वभावकी प्रकटमें प्रशंसा करने लगा॥

जब वानरोने जाना कि यह शत्रुका दूत है तब उसे बांधकर सुग्रीवके पास लाये


कह सुग्रीव सुनहु सब बानर।
अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए।
बाँधि कटक चहु पास फिराए॥

सुग्रीवने देखकर कहा कि हे वानरो सुनो, इस राक्षस दुष्टको अंग-भंग करके भेज दो॥

सुग्रीवके ये वचन सुनकर सब वानर दौड़े, फिर उसको बांध कर कटक (सेना) में चारों ओर फिराया॥


बहु प्रकार मारन कपि लागे।
दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना।
तेहि कोसलाधीस कै आना॥

वानर उसको अनेक प्रकारसे मारने लगे और वह अनेक प्रकारसे दीनकी भांति पुकारने लगा फिर भी वानरोंने उसको नहीं छोड़ा॥

तब उसने पुकार कर कहा कि जो हमारी नाक कान काटते है उनको श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है॥


सुनि लछिमन सब निकट बोलाए।
दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती।
लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥

सेनामें खरभर सुनकर लक्ष्मणने उसको अपने पास बुलाया और दया आ जानेसे हँसकर लक्ष्मणने उसको छुड़ा दिया॥

एक पत्री लिख कर लक्ष्मणने उसको दी और कहा कि यह पत्री रावणको देना और उस कुलघातीकों कहना कि ये लक्ष्मणके हित वचन (संदेसे को) बाँचो॥


दोहा

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार ॥52॥

और उस मूर्खसे मेरा बड़ा अपार सन्देशा मुहँसेंभी कह देना कि या तो तू सीताजीको देदे और हमारे शरण आजा, नही तो तेरा काल आया समझ ॥52॥


लक्ष्मणजी के पत्र को लेकर रावणदूत का लौटना

चौपाई

तुरत नाइ लछिमन पद माथा।
चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए।
रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥

लक्ष्मणके ये वचन सुन तुरंत लक्ष्मणके चरणोंमें शिर झुका कर रामचन्द्रजीके गुणोंकी प्रशंसा करता हुआ वह वहांसे चला॥
रामचन्द्रजीके यशकों गाता हुआ लंकामें आया. रावणके पास जाकर उसने रावणके चरणोंमें प्रणाम किया॥


बिहसि दसानन पूँछी बाता।
कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुन कहु खबरि बिभीषन केरी।
जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥

उस समय रावणने हँसकर उससे पूंछा कि हे शुक! अपनी कुशलताकी बात कहो॥
और फिर विभीषणकी कुशल कहो, कि जिसकी मौत बहुत निकट आगयी है॥


करत राज लंका सठ त्यागी।
होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई।
कठिन काल प्रेरित चलि आई॥

उस शठने लंकाको राज करते करते छोड़ दिया सो अब उस अभागेकी जवके (जौके) घुनके (कीड़ा) समान दशा होगी अर्थात् जैसे जव पीसनेके साथ उसमेंका घुनभी पीस जाता है, ऐसे रामके साथ वह भी मारा जाएगा॥

फिर कहो कि रीछ और वानरोंकी सेना कैसी और कितनी है कि जो कठिन कालकी प्रेरणासे इधरको चली आती है॥


जिन्ह के जीवन कर रखवारा।
भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी।
जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥

हे शुक! अभी उनके जीवकी रक्षा करनेवाला बिचारा कोमलहृदय समुद्र हुआ है (उनके और राक्षसों के बीच में यदि समुद्र न होता तो अब तक राक्षस उन्हें मारकर खा गए होते)। सो रहे, इससे कितने दिन बचेंगे॥

और फिर उन तपस्वियोकी बात कहो जिनके ह्रदयमें मेरी बड़ी त्रास बैठ रही है (मेरा बड़ा डर है)॥


दोहा

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥53॥

हे शुक! क्या तेरी उनसे भेंट हुई? क्या वे मेरी सुख्याति (सुयश) कानोंसे सुनकर पीछे लौट गए। हे शुक! शत्रुके दलका तेज आर बल क्यों नहीं कहता? तेरा चित्त चकित-सा (भौंचक्का-सा) कैसे हो रहा है? ॥53॥


दूत का रावण को समझाना

चौपाई

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें।
मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा।
जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥

रावणके ये वचन सुनकर शुकने कहा कि हे नाथ! जैसे आप कृपा करके पूंछते हो ऐसेही क्रोधको त्यागकर जो वचन में कहूं उसको मानो॥

हे नाथ! जिस समय आपका भाई रामसे जाकर मिला उसी क्षण रामने उसके राजतिलक कर दिया है॥


रावन दूत हमहि सुनि काना।
कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे।
राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥

मै वानरका रूप धरकर सेनाके भीतर घुसा, सो फिरते फिरते वानरोंने जब मुझको आपका दूत जान लिया तब उन्होंने मुझको बांधकर अनेक प्रकारका दुःख दिया॥

और मेरी नाक कान काटने लगे, तब मैंने उनको रामकी शपथ दी तब उन्होंने मुझको छोड़ दिया॥


पूँछिहु नाथ राम कटकाई।
बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी।
बिकटानन बिसाल भयकारी॥

हे नाथ! आप मुझको वानरोंकी सेनाके समाचार पूँछते हो सो वे सौ करोड़ मुखोंसे तो कही नहीं जा सकती॥

हे रावण! रीछ और वानर अनेक रंग धारण किये बड़े डरावने दीखते हैं, बड़े विकट उनके मुख हैं और बड़े विशाल उनके शरीर हैं॥


जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा।
सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला।
अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥

हे रावण! जिसने इस लंकाको जलाया था और आपके पुत्र अक्षयकुमारको मारा था, उस वानरका बल तो सब वानरों में थोड़ा है॥

उनके बीच कई नामी भट पड़े हे, कि जो बड़े भयानक और बड़े कठोर हैं. जिनके नाना वर्णवाले और विशाल व तेजस्वी शरीर हैं॥


दोहा

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ॥54॥

उनमें जो बड़े बड़े योद्धा हैं उनमेंसे कुछ नाम कहता हूँ सो सुनो – द्विविद, मयन्द, नील, नल, अंगद वगैरे, विकटास्य, दधिरख, केसरी, कुमुद, गव और बलका पुंज जाम्बवान ॥54॥


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रावणदूत शुक का रावण को समझाना

चौपाई

ए कपि सब सुग्रीव समाना।
इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं।
तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥

ये सब वानर सुग्रीवके समान बलवान हैं। इनके बराबर दूसरे करोड़ों वानर हैं, कौन गिन सकता है? ॥
रामचन्द्रजीकी कृपासे उनके बलकी कुछ तुलना नहीं है। वे उनके प्रभावसे त्रिलोकीको तृन (घास) के समान समझते हैं


अस मैं सुना श्रवन दसकंधर।
पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं।
जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥

हे रावण! वहां मैं गिन तो नहीं सका परंनु कानोंसे ऐसा सुना था कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं॥
हे नाथ! उस कटकमें (सेना) ऐसा वानर एकभी नहीं है कि जो रणमें आपको जीत न सके॥


परम क्रोध मीजहिं सब हाथा।
आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला।
पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥

सब वानर बड़ा कोध करके हाथ मीजते हैं; परंतु बिचारे करें क्या? रामचन्द्रजी उनको आज्ञा नहीं देते॥

वे ऐसे बली है कि मछलियां और सर्पोंके साथ समुद्रको सुखा सकते हैं और नखोंसे विशाल पर्वतको चीर सकते है॥


मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा।
ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका।
मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥

और सब वानर ऐसे वचन कहते हैं कि हम जाकर रावणको मार कर उसी क्षण धूल में मिला देंगे॥
वे स्वभावसेही निशंक है, सो बेधड़क गरजते है और तर्जते है. मानों वे अभी लंकाको ग्रसना (निगलना) चाहते है॥


दोहा
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम ॥55॥

हे रावण! वे रीछ और वानर अव्वल तो स्वभावहीसे शूर-बीर हैं और तिसपर फिर श्रीरामचन्द्रजी सिर पर है। इसलिए हे रावण! वे करोड़ों कालों को भी संग्राममें जीत सकते हैं ॥55॥


रावणदूत शुक का रावण को समझाना

चौपाई

राम तेज बल बुधि बिपुलाई।
सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर।
तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥

रामचन्द्रजीके तेज, बल, और बुद्धिकी बढ़ाईको करोड़ों शेषजी भी गा नहीं सकते तब औरकी तो बातही कौन?॥

यद्यपि वे एक बाणसे सौ समुद्रकों सुखा सकते है परंतु आपका भाई बिभीषण नीतिमें परम निपुण है इसलिए श्री राम ने समुद्रका पार उतरनेके लिये आपके भाई विभीषणसे पूछा॥


तासु बचन सुनि सागर पाहीं।
मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा।
जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥

तब उसने सलाह दी कि पहले तो नरमीसे काम निकालना चाहिये और जो नरमीसे काम नहीं निकले तो पीछे तेजी करनी चाहिये॥ बिभीपणके ये वचन सुनकर श्री राम मनमें दया रखकर समुद्रके पास मार्ग मांगते है॥

दूतके ये वचन सुनकर रावण हँसा और बोला कि जिसकी ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरोंको तो सहाय बनाया है॥


सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई।
सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई।
रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥

और स्वभावसे डरपोंकके (विभीषण के) वचनोंपर दृढ़ता बांधी है तथा समुद्रसे अबोध बालककी तरह मचलना (बालहठ) ठाना है॥

हे मूर्ख! उसकी झूठी बड़ाई तू क्यों करता है? मैंने शत्रुके बल और बुद्धिकी थाह पा ली है॥


सचिव सभीत बिभीषन जाकें।
बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी।
समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥

जिसके डरपोंक बिभीषणसे मंत्री हैं उसके विजय और विभूति कहाँ? ॥

खल रावनके ये वचन सुनकर दूतको बड़ा क्रोध आया। इससे उसने अवसर जानकर लक्ष्मणके हाथकी पत्री निकाली॥


रामानुज दीन्हीं यह पाती।
नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन।
सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥

और कहा कि यह पत्रिका रामके छोटे भाई लक्ष्मणने दी है। सो हे नाथ! इसको पढ़कर अपनी छातीको शीतल करो॥

रावणने हँसकर वह पत्रिका बाएं हाथमें ली और यह शठ (मूर्ख) अपने मंत्रियोंको बुलाकर पढाने लगा॥


दोहा

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥56(क)॥

(पत्रिका में लिखा था -) हे शट (अरे मूर्ख)! तू बातोंसे मनको भले रिझा ले, हे कुलांतक! अपने कुलका नाश मत कर, रामचन्द्रजीसे विरोध करके विष्णु, ब्रह्मा और महेशके शरण जाने पर भी तू बच नही सकेगा॥56(क)॥


दोहा

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग ॥56(ख)॥

तू अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाईके जैसे प्रभुके चरणकमलोंका भ्रमर होजा। अर्थात् रामचन्द्रजीके चरणोंका चेरा होजा। अरे खल! रामचन्द्रजीके बाणरूप आगमें तू कुलसहित पतंग मत हो, जैसे पतंग आगमें पड़कर जल जाता है ऐसे तू रामचन्द्रजीके बाणसे मृत्यु को मत प्राप्त हो ॥56(ख)॥


चौपाई

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई।
कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा।
लघु तापस कर बाग बिलासा॥

ये अक्षर सुनकर रावण मनमें तो कुछ डरा, परंतु ऊपरसे हँसकर सबको सुनाके रावणने कहा॥
कि इस छोटे तपस्वीकी वाणीका विलास तो ऐसा है कि मानों पृथ्वीपर पड़ा हुआ आकाशको हाथसे पकड़े लेता है॥


कह सुक नाथ सत्य सब बानी।
समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा।
नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥

उस समय शुकने (दूत) कहा कि हे नाथ! यह वाणी सब सत्य है, सो आप स्वाभाविक अभिमानको छोड़कर समझ लों॥
हे नाथ! आप क्रोध तजकर मेरे वचन सुनो, और राम से जो विरोध बांध रक्खा है उसे छोड़ दो॥


अति कोमल रघुबीर सुभाऊ।
जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही।
उर अपराध न एकउ धरिही॥

यद्यपि वे राम सब लोकोंके स्वामी हैं तोभी उनका स्वभाव बड़ा ही कोमल है॥

आप जाकर उनसे मिलोगे तो मिलते ही वे आप पर कृपा करेंगे, आपके एकभी अपराधको वे दिलमें नही रक्खेंगे॥


जनकसुता रघुनाथहि दीजे।
एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही।
चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥

हे प्रभु । एक इतना कहना तो मेरा भी मानो कि सीताको आप रामचन्द्रजीको दे दो॥
(शुकने कई बातें कहीं परंतु रावण कुछ नहीं बोला परंतु) जिस समय सीताको देनेकी बात कही उसी क्षण उस दुष्टने शुकको (दूतको) लात मारी॥


नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ।
कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई।
राम कृपाँ आपनि गति पाई॥

तब वह भी (विभीषण की भाँति) रावणके चरणोंमें शिर नमाकर वहां को चला कि जहां कृपाके सिंधु श्री रामचन्द्रजी विराजे थे॥
रामचन्द्रजी को प्रणाम करके उसने वहां की सब बात कही। तदनंतर वह राक्षस रामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी गति अर्थात् मुनिशरीरको प्राप्त हुआ॥


रिषि अगस्ति कीं साप भवानी।
राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा।
मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥

महादेवजी कहते हैं कि हे पार्वती! यह पूर्वजन्ममें बड़ा ज्ञानी मुनि था, सो अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस हुआ था॥
यहां रामचन्द्रजीके चरणोको वारंवार नमस्कार करके फिर अपने आश्रमको गया॥


समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

दोहा

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ॥57॥

जब जड़ समुद्रने विनयसे नहीं माना अर्थात् रामचन्द्रजीको दर्भासनपर बैठे तीन दिन बीत गये तब रामचन्द्रजीने क्रोध करके कहा कि भय बिना प्रीति नहीं होती ॥57॥


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समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

चौपाई

लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति।
सहज कृपन सन सुंदर नीति॥

हे लक्ष्मण! धनुष बाण लाओ। क्योंकि अब इस समुद्रको बाणकी आगसे सुखाना होगा॥

देखो, इतनी बातें सब निष्फल जाती हैं। शठके पास विनय करना, कुटिल आदमीसे प्रीति रखना, स्वाभाविक कंजूस आदमीके पास सुन्दर नीतिका कहना॥


ममता रत सन ग्यान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा॥

ममतासे भरे हुए जनके पास ज्ञानकी बात कहना, अतिलोभीके पास वैराग्यका प्रसंग चलाना॥

क्रोधीके पास समताका उपदेश करना, कामी (लंपट) के पास भगवानकी कथाका प्रसंग चलाना और ऊसर भूमिमें बीज बोना ये सब बराबर है॥


अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

ऐसे कहकर रामचन्द्रजीने अपना धनुष चढ़ाया। यह रामचन्द्रजीका मत लक्ष्मणके मनको बहुत अच्छा लगा॥

प्रभुने इधर तो धनुषमें विकराल बाणका सन्धान किया और उधर समुद्रके हृदयके बीच संतापकी ज्वाला उठी॥


मकर उरग झष गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

मगर, सांप, और मछलियां घबरायीं और समुद्रने जाना कि अब तो जलजन्तु जलने है॥

तब वह मानको तज, ब्राह्मणका स्वरूप धर, हाथमें अनेक मणियोंसे भरा हुआ कंचनका थार ले बाहर आया॥


दोहा

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ॥58॥

काकभुशुंडिने कहा कि हे गरुड़! देखा, केला काटनेसेही फलता है। चाहो दूसरे करोडों उपाय करलो और ख़ूब सींच लो, परंतु बिना काटे नहीं फलता। ऐसेही नीच आदमी विनय करनेसे नहीं मानता किंतु डाटने से ही नमता है ॥58॥


समुद्र की श्री राम से विनती

चौपाई

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥

समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़े और प्रभुसे प्रार्थना की कि हे प्रभु मेरे सब अपराध क्षमा करो॥
हे नाथ! आकाश, पवन, अग्रि, जल, और पृथ्वी इनकी करणी स्वभावहीसे जड़ है॥


तव प्रेरित मायाँ उपजाए।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।
सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥

और सृष्टिके निमित्त आपकीही प्रेरणासे मायासे ये प्रकट हुए है, सो यह बात सब ग्रंथोंमें प्रसिद्ध हे॥

हे प्रभु! जिसको स्वामीकी जैसी आज्ञा होती है वह उसी तरह रहता है तो सुख पाता है॥


प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी॥

हे प्रभु! आपने जो मुझको शिक्षा दी, यह बहुत अच्छा किया; परंतु मर्यादा तो सब आपकी ही बांधी हुई है॥


प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।
करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

हे प्रभु! मैं आपके प्रतापसे सूख जाऊंगा और उससे कटक भी पार उतर जाएगा। परंतु इसमें मेरी महिमा घट जायगी॥
और प्रभुकी आज्ञा अपेल (अर्थात अनुल्लंघनीय – आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता) है। सो यह बात वेदमें गायी है। अब जो आपको जचे वही आज्ञा देवें सो मै उसके अनुसार शीघ्र करूं॥


दोहा

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥59॥

समुद्रके ऐसे अतिविनीत वचन सुनकर, मुस्कुरा कर, प्रभुने कहा कि हे तात! जैसे यह हमारा वानरका कटक पार उतर जाय वैसा उपाय करो ॥59॥


चौपाई

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई।
लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥

रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर समुद्रने कहा कि हे नाथ! नील और नल ये दोनों भाई है। नलको बचपनमें ऋषियोंसे आशीर्वाद मिला हुआ है॥

इस कारण हे प्रभु! नलका छुआ हुआ भारी पर्वत भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जाएगा॥

(नील और नल दोनो बचपनमें खेला करते थे। सो ऋषियोंके आश्रमोंमें जाकर जिस समय मुनिलोग शालग्रामजीकी पूजा कर आख मूंद ध्यानमें बैठते थे, तब ये शालग्रामजीको लेकर समुद्रमें फेंक देते थे। इससे ऋषियोंने शाप दिया कि नलका डाला हूआ पत्थर नहीं डुबेंगा। सो वही शाप इसके वास्ते आशीर्वादात्मक हुआ।)


मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।
करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥

हे प्रभु! मुझसे जो कुछ बन सकेगा वह अपने बलके अनुसार आपकी प्रभुताकों हदयमें रखकर मै भी सहाय करूंगा॥

हे नाथ! इस तरह आप समुद्रमें सेतु बांध दीजिये कि जिसको विद्यमान देखकर त्रिलोकीमें लोग आपके सुयशको गाते रहेंगे॥


एहि सर मम उत्तर तट बासी।
हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा।
तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥

हे नाथ! इसी बाणसे आप मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके पुंज दुष्टोंका संहार करो॥

ऐसे दयालु रणधीर श्रीरामचन्द्रजीने सागरके मनकी पीड़ा को जानकर उसको तुरंत हर लिया॥


देखि राम बल पौरुष भारी।
हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा।
चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥

समुद्र रामचन्द्रजीके अपरिमित (अपार) बलको देखकर आनंदपूर्वक सुखी हुआ॥

समुद्रने सारा हाल रामचन्द्रजीको कह सुनाया, फिर चरणोंको प्रणाम कर अपने धामको सिधारा॥


दोहा

छं० – निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

समुद्र तो ऐसे प्रार्थना करके अपने घरको गया। रामचन्द्रजीके भी मनमें यह समुद्रकी सलाह भा गयी।

तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुग के पापों को हरनेवाला यह रामचन्द्रजीका चरित मेरी जैसी बुद्धि है वैसा मैंने गाया है; क्योंकि रामचन्द्रजीके गुणगाण (गुणसमूह) ऐसे हैं कि वे सुखके तो धाम हैं, संशयके मिटानेवाले है और विषाद (रंज) को शांत करनेवाले है सो जिनका मन पवित्र है और जो सज्जन पुरुष है, वे उन चरित्रोंको सब आशा और सब भरोसोंको छोड़ कर गाते हैं और सुनते हैं॥


दोहा

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥60॥

सर्व प्रकारके सुमंगल देनेवाले रामचन्द्रजीके गुणोंका जो मनुष्य गान करते है और आदरसहित सुनते हैं वे लोग संसारसमुद्रको बिना नाव पार उतर जाते हें ॥60॥


इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः समाप्तः।

कलियुग के समस्त पापों का नाश करनेवाले श्री रामचरितमानस का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।

जय सियाराम जय जय सियाराम


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गुरु महिमा – संत कबीर के दोहे अर्थसहित

सतगुरु का जीवन में महत्व

1.

गुरु को पहले प्रणाम करें

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय॥

  • गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
    • गुरु और गोविन्द (भगवान),
    • दोनों एक साथ खड़े है
  • काके लागूं पांय।
    • पहले किसके चरण-स्पर्श करें (प्रणाम करे)?
  • बलिहारी गुरु आपने,
    • कबीरदासजी कहते है,
    • पहले गुरु को प्रणाम करूँगा
    • क्योंकि, आपने (गुरु ने),
  • गोविंद दियो बताय॥
    • गोविंद तक पहुंचने का मार्ग बताया है।

ज्ञान, मोक्ष और सत्य के लिए, गुरु की शरण जरूरी

2.

गुरु बिन ज्ञान न उपजै,
गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को,
गुरु बिन मिटे न दोष॥

  • गुरु बिन ज्ञान न उपजै, –
    • गुरु के बिना,
    • ज्ञान मिलना कठिन है
  • गुरु बिन मिलै न मोष। –
    • गुरु के बिना,
    • मोक्ष नहीं
  • गुरु बिन लखै न सत्य को, –
    • गुरु के बिना,
    • सत्य को पह्चानना असंभव है और
  • गुरु बिन मिटे न दोष॥ –
    • गुरु बिना,
    • दोष का अर्थात
    • मन के विकारों का,
    • मिटना मुश्किल है

गुरु की आज्ञा और उनके बताये मार्ग

यदि गुरु की आज्ञा नहीं मानी, तो….

3.

गुरु आज्ञा मानै नहीं,
चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए,
आए सिर पर काल॥

  • गुरु आज्ञा मानै नहीं, –
    • जो मनुष्य,
    • गुरु की आज्ञा नहीं मानता है, और
  • चलै अटपटी चाल। –
    • गलत मार्ग पर चलता है
  • लोक वेद दोनों गए, –
    • वह,
    • लोक और वेद दोनों से ही,
    • लोक अर्थात दुनिया और
    • वेद अर्थात धर्म, से
    • पतित हो जाता है और
  • आए सिर पर काल॥ –
    • दुःख और कष्टों से,
    • घिरा रहता है

सतगुरु के बताएं मार्ग पर चलना जरूरी है, क्योंकि…..

4.

गुरु शरणगति छाडि के,
करै भरोसा और।
सुख संपती को कह चली,
नहीं नरक में ठौर॥

  • गुरु शरणगति छाडि के –
    • जो व्यक्ति सतगुरु की शरण छोड़कर और
    • उनके बताये मार्ग पर न चलकर
  • करै भरोसा और –
    • अन्य बातो में विश्वास करता है
  • सुख संपती को कह चली –
    • उसे जीवन में,
    • दुखो का सामना करना पड़ता है और
  • नहीं नरक में ठौर –
    • उसे नरक में भी जगह नहीं मिलती

गुरु, किस प्रकार, शिष्य के मन के विकार, दूर करते है?

5.

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है,
गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दै,
बाहर बाहै चोट॥

  • गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, –
    • गुरु कुम्हार के समान है
    • शिष्य मिट्टी के घडे के समान है
  • गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट। –
    • गुरु कठोर अनुशासन,
    • किन्तु मन में प्रेम भावना रखते हुए,
    • शिष्य के खोट को,
    • अर्थात मन के विकारों को,
    • दूर करते है
  • अंतर हाथ सहार दै, –
    • जैसे कुम्हार,
    • घड़े के भीतर से,
    • हाथ का सहारा देता है
  • बाहर बाहै चोट॥ –
    • और बाहर चोट मारकर,
    • घड़े को सुन्दर आकार देता है

पारस पत्थर और गुरु में क्या अंतर है?

6.

गुरु पारस को अन्तरो,
जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे,
ये करि लेय महंत॥

  • गुरु पारस को अन्तरो –
    • गुरु और पारस पत्थर के अंतर को
  • जानत हैं सब संत –
    • सभी संत (विद्वान, ज्ञानीजन),
    • भलीभाँति जानते हैं।
  • वह लोहा कंचन करे –
    • पारस पत्थर,
    • सिर्फ लोहे को सोना बनाता है
  • ये करि लेय महंत –
    • किन्तु गुरु,
    • शिष्य को ज्ञान की शिक्षा देकर,
    • अपने समान गुनी और महान बना लेते है।

गुरु, सबसे बड़े दाता अर्थात दानी है

7.

गुरु समान दाता नहीं,
याचक सीष समान।
तीन लोक की सम्पदा,
सो गुरु दिन्ही दान॥

  • गुरु समान दाता नहीं –
    • गुरु के समान,
    • कोई दाता (दानी) नहीं है
  • याचक सीष समान –
    • शिष्य के समान,
    • कोई याचक (माँगनेवाला) नहीं है
  • तीन लोक की सम्पदा –
    • ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति,
    • जो तीनो लोको की,
    • संपत्ति से भी बढ़कर है
  • सो गुरु दिन्ही दान –
    • शिष्य के मांगने से,
    • गुरु उसे यह संपत्ति अर्थात
    • ज्ञान रूपी सम्पदा,
    • दान में दे देते है

मोह माया के लुभावने बंधनो से छूटने के लिए, गुरु की कृपा जरूरी

8.

कबीर माया मोहिनी,
जैसी मीठी खांड।
सतगुरु की किरपा भई,
नहीं तौ करती भांड॥

  • कबीर माया मोहिनी –
    • माया (संसार का आकर्षण)
    • बहुत ही मोहिनी है, लुभावनी है
  • जैसी मीठी खांड –
    • जैसे,
    • मीठी शक्कर या मिसरी
  • सतगुरु की किरपा भई –
    • सतगुरु की कृपा हो गयी
    • (इसलिए माया के इस मोहिनी रूप से बच गया)
  • नहीं तौ करती भांड –
    • नहीं तो यह मुझे भांड बना देती।
    • (भांड अर्थात – विदूषक, मसख़रा, गंवार, उजड्ड)
  • माया ही मनुष्य को,
  • संसार के जंजाल में उलझाए रखती है।
  • संसार के मोहजाल में फंसकर,
  • अज्ञानी मनुष्य,
  • मन में,
  • अहंकार, इच्छा,
  • राग और द्वेष के विकारों को,
  • उत्पन्न करता रहता है।
  • विकारों से भरा मन,
  • माया के प्रभाव से उपर नहीं उठ सकता है और
  • जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है।
  • कबीरदासजी कहते है,
  • सतगुरु की कृपा से, मनुष्य,
  • माया के इस मोहजाल से,
  • छूट सकता है।

सतगुरु – जैसे अमृत की खान – ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति देनेवाले

9.

यह तन विष की बेलरी,
गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै,
तो भी सस्ता जान॥

  • यह तन विष की बेलरी –
    • यह शरीर सांसारिक विषयो की बेल है।
  • गुरु अमृत की खान –
    • सतगुरु विषय और विकारों से रहित है,
    • इसलिए वे अमृत की खान है
  • मन के विकार (अहंकार, आसक्ति, द्वेष आदि),
  • विष के समान होते है।
  • इसलिए शरीर जैसे विष की बेल है।
  • सीस दिये जो गुर मिलै –
    • ऐसे सतगुरु,
    • यदि शीश (सर्वस्व) अर्पण करने पर भी मिल जाए
  • तो भी सस्ता जान –
    • तो भी यह सौदा,
    • सस्ता ही समझना चाहिए।
  • अपना सर्वस्व समर्पित करने पर भी,
  • ऐसे सतगुरु से भेंट हो जाए,
  • जो विषय विकारों से मुक्त है।
  • तो भी यह सौदा,
  • सस्ता ही समझना चाहिए।
  • क्योंकि, गुरु से ही,
  • हमें ज्ञान रूपी अनमोल संपत्ति मिल सकती है,
  • जो तीनो लोको की संपत्ति से भी बढ़कर है।

सतगुरु की महिमा अपरंपार है

10.

सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

  • सतगुरु महिमा अनंत है –
    • सतगुरु की महिमा अनंत हैं
  • अनंत किया उपकार –
    • उन्होंने मुझ पर,
    • अनंत उपकार किये है
  • लोचन अनंत उघारिया –
    • उन्होंने मेरे ज्ञान के चक्षु,
    • (अनन्त लोचन अर्थात ज्ञान के चक्षु),
    • खोल दिए
  • अनंत दिखावन हार –
    • और मुझे,
    • अनंत (ईश्वर) के दर्शन करा दिए।
  • ज्ञान चक्षु खुलने पर ही,
  • मनुष्य को,
  • इश्वर के दर्शन हो सकते है।
  • मनुष्य आंखों से नहीं परन्तु,
  • भीतर के ज्ञान के चक्षु से ही,
  • निराकार परमात्मा को देख सकता है।

सतगुरु के गुण अनगिनत है

11.

सब धरती कागद करूँ,
लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ,
गुरु गुण लिखा न जाय॥

  • सब धरती कागद करूं –
    • सारी धरती को,
    • कागज बना लिया जाए
  • लिखनी सब बनराय –
    • सब वनों की (जंगलो की) लकडियो को,
    • कलम बना ली जाए
  • सात समुद्र का मसि करूं –
    • सात समुद्रों को,
    • स्याही बना ली जाए
  • गुरु गुण लिखा न जाय –
    • तो भी गुरु के गुण लिखे नहीं जा सकते,
    • (गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता)।
    • क्योंकि,
    • गुरु की महिमा अपरंपार है।

अहंकार त्यागकर ही, गुरु से ज्ञान प्राप्त हो सकता है

12.

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए,
सीस दीजिए दान।
बहुतक भोंदू बह गए,
राखि जीव अभिमान॥

  • गुरु सों ज्ञान जु लीजिए –
    • गुरु से ज्ञान पाने के लिए
  • सीस दीजिए दान –
    • तन और मन,
    • पूर्ण श्रद्धा से,
    • गुरु के चरणों में समर्पित कर दो।
  • राखि जीव अभिमान –
    • जो अपने तन, मन और धन का,
    • अभिमान नहीं छोड़ पाते है
  • बहुतक भोंदु बहि गये –
    • ऐसे कितने ही मूर्ख (भोंदु) और अभिमानी लोग,
    • संसार के माया के प्रवाह में बह जाते है।
    • वे संसार के माया जाल में,
    • उलझ कर रह जाते है और
    • उद्धार से वंचित रह जाते है।

ज्ञान प्राप्ति के लिए, निरंतर ध्यान और भक्ति

13.

गुरु मूरति गति चंद्रमा,
सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे,
गुरु मूरति की ओर॥

  • गुरु मूरति गति चंद्रमा –
    • गुरु की मूर्ति जैसे चन्द्रमा और
  • सेवक नैन चकोर –
    • शिष्य के नेत्र जैसे चकोर पक्षी।
    • (चकोर पक्षी चन्द्रमा को निरंतर निहारता रहता है, वैसे ही हमें)
  • गुरु मूरति की ओर –
    • गुरु ध्यान में और
    • गुरु भक्ति में
  • आठ पहर निरखत रहे –
    • आठो पहर रत रहना चाहिए।
    • (निरखत, निरखना – ध्यान से देखना)

सतगुरु को कभी दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए, क्योंकि ….

14.

कबीर ते नर अन्ध हैं,
गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है,
गुरु रुठे नहिं ठौर॥

  • कबीर ते नर अन्ध हैं –
    • संत कबीर कहते है की
    • वे मनुष्य,
    • नेत्रहीन (अन्ध) के समान है
  • गुरु को कहते और –
    • जो गुरु के महत्व को,
    • नहीं जानते
  • हरि के रुठे ठौर है –
    • भगवान के रूठने पर,
    • मनुष्य को स्थान (ठौर) मिल सकता है
  • गुरु रुठे नहिं ठौर –
    • लेकिन,
    • गुरु के रूठने पर,
    • कही स्थान नहीं मिल सकता

15.

आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥

  • आछे दिन पाछे गये –
    • अच्छे दिन बीत गए
    • अर्थात
    • मनुष्य सुख के दिन,
    • सिर्फ मौज मस्ती में बिता देता है
  • गुरु सों किया न हेत –
    • गुरु की भक्ति नहीं की,
    • गुरु के वचन नहीं सुने
  • अब पछितावा क्या करे –
    • अब पछताने से क्या होगा
  • चिड़िया चुग गई खेत –
    • जब चिड़ियाँ खेत चुग गई
    • (जब अवसर चला गया)

संत कबीर के दोहे – अर्थसहित


Kabirdas ke Dohe – Guru Mahima

सतगुरु सम कोई नहीं,
सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये,
अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड॥

सतगुरु तो सतभाव है,
जो अस भेद बताय।
धन्य शीष धन भाग तिहि,
जो ऐसी सुधि पाय॥


गुरु मुरति आगे खडी,
दुतिया भेद कछु नाहि।
उन्ही कूं परनाम करि,
सकल तिमिर मिटी जाहिं॥

गुरु की आज्ञा आवै,
गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत हैं,
आवागमन नशाय॥


भक्ति पदारथ तब मिलै,
जब गुरु होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो,
पूरण भाग मिलाय॥

गुरु को सिर राखिये,
चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को,
तीन लोक भय नहिं॥


गुरुमुख गुरु चितवत रहे,
जैसे मणिहिं भुवंग।
कहैं कबीर बिसरें नहीं,
यह गुरुमुख को अंग॥

कबीर ते नर अंध है,
गुरु को कहते और।
हरि के रूठे ठौर है,
गुरु रूठे नहिं ठौर॥


भक्ति-भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

गुरु बिन माला फेरते,
गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन सब निष्फल गया,
पूछौ वेद पुरान॥


कबीर गुरु की भक्ति बिन,
धिक जीवन संसार।
धुवाँ का सा धौरहरा,
बिनसत लगै न बार॥

कबीर गुरु की भक्ति करु,
तज निषय रस चौंज।
बार-बार नहिं पाइए,
मानुष जनम की मौज॥


काम क्रोध तृष्णा तजै,
तजै मान अपमान।
सतगुरु दाया जाहि पर,
जम सिर मरदे मान॥

कबीर गुरु के देश में,
बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै,
जाति वरन कुल खोय॥


आछे दिन पाछे गए,
गुरु सों किया न हेत।
अब पछतावा क्या करै,
चिड़ियाँ चुग गईं खेत॥

अमृत पीवै ते जना,
सतगुरु लागा कान।
वस्तु अगोचर मिलि गई,
मन नहिं आवा आन॥


बलिहारी गुरु आपनो,
घड़ी-घड़ी सौ सौ बार।
मानुष से देवत किया,
करत न लागी बार॥

गुरु आज्ञा लै आवही,
गुरु आज्ञा लै जाय।
कहै कबीर सो सन्त प्रिय,
बहु विधि अमृत पाय॥


भूले थे संसार में,
माया के साँग आय।
सतगुरु राह बताइया,
फेरि मिलै तिहि जाय॥

बिना सीस का मिरग है,
चहूँ दिस चरने जाय।
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं,
राखो तत्व लगाय॥


गुरु नारायन रूप है,
गुरु ज्ञान को घाट।
सतगुरु बचन प्रताप सों,
मन के मिटे उचाट॥

गुरु समरथ सिर पर खड़े,
कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै,
मुक्ति न छोड़े पास॥


तीरथ गये ते एक फल,
सन्त मिले फल चार।
सतगुरु मिले अनेक फल,
कहें कबीर विचार॥

सतगुरु खोजो सन्त,
जोव काज को चाहहु।
मिटे भव को अंक,
आवा गवन निवारहु॥


सतगुरु शब्द उलंघ के,
जो सेवक कहूँ जाय।
जहाँ जाय तहँ काल है,
कहैं कबीर समझाय॥

सतगुरु को माने नही,
अपनी कहै बनाय।
कहै कबीर क्या कीजिये,
और मता मन जाय॥


सतगुरु मिला जु जानिये,
ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भांड तोड़ि करि,
रहै निराला होय॥

सतगुरु मिले जु सब मिले,
न तो मिला न कोय।
माता-पिता सुत बाँधवा,
ये तो घर घर होय॥


चौंसठ दीवा जोय के,
चौदह चन्दा माहिं।
तेहि घर किसका चाँदना,
जिहि घर सतगुरु नाहिं॥

सुख दुख सिर ऊपर सहै,
कबहु न छोड़े संग।
रंग न लागै का,
व्यापै सतगुरु रंग॥


यह सतगुरु उपदेश है,
जो मन माने परतीत।
करम भरम सब त्यागि के,
चलै सो भव जल जीत॥

जाति बरन कुल खोय के,
भक्ति करै चितलाय।
कहैं कबीर सतगुरु मिलै,
आवागमन नशाय॥


जेहि खोजत ब्रह्मा थके,
सुर नर मुनि अरु देव।
कहै कबीर सुन साधवा,
करु सतगुरु की सेव॥

Kabir Dohe

Dohe

Guru Mahima - Sant Kabir ke Dohe - Arth Sahit - Meaning in Hindi
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कबीर के दोहे – सुमिरन (ईश्वर का स्मरण)- अर्थसहित

ईश्वर का स्मरण अर्थात सुमिरन पर कबीर के दोहे

दुःख से बचने का सरल उपाय – सुख में ईश्वर को याद रखो

1.

दु:ख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दु:ख काहे को होय॥

  • दु:ख में सुमिरन सब करै –
    • आमतौर पर मनुष्य,
    • ईश्वर को,
    • दुःख में याद करता है।
  • सुख में करै न कोय –
    • सुख में,
    • ईश्वर को भूल जाते है
  • जो सुख में सुमिरन करै –
    • यदि सुख में भी,
    • इश्वर को याद करे
  • तो दु:ख काहे को होय –
    • तो दुःख,
    • निकट आएगा ही नहीं

मुक्ति का सरल उपाय – हर श्वास में ईश्वर का सुमिरन

2.

काह भरोसा देह का,
बिनसी जाय छिन मांहि।
सांस सांस सुमिरन करो
और जतन कछु नाहिं॥

  • काह भरोसा देह का –
    • इस शरीर का क्या भरोसा है
  • बिनसी जाय छिन मांहि –
    • किसी भी क्षण,
    • यह (शरीर) हमसे छीन सकता है,
  • सांस सांस सुमिरन करो –
    • इसलिए,
    • हर साँस में,
    • ईश्वर को याद करो
  • और जतन कछु नाहिं –
    • इसके अलावा,
    • मुक्ति का,
    • कोई दूसरा मार्ग नहीं है

ईश्वर के ध्यान के अलावा बाकी सब दुःख है

3.

कबीर सुमिरन सार है,
और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया,
दूजा देखा काल॥

  • कबीर सुमिरन सार है –
    • कबीरदासजी कहते हैं कि
    • सुमिरन (ईश्वर का ध्यान) ही मुख्य है,
  • और सकल जंजाल –
    • बाकी सब,
    • मोह माया का जंजाल है
  • आदि अंत मधि सोधिया –
    • शुरू में, अंत में और मध्य में,
    • जांच परखकर देखा है,
  • दूजा देखा काल –
    • सुमिरन के अलावा,
    • बाकी सब काल (दुःख) है
    • (सार अर्थात –
    • essence – सारांश, तत्त्व, मूलतत्त्व)

मुक्ति अर्थात मोक्ष के लिए क्या करें?

4.

राम नाम सुमिरन करै,
सतगुरु पद निज ध्यान।
आतम पूजा जीव दया,
लहै सो मुक्ति अमान॥

  • राम नाम सुमिरन करै –
    • जो मनुष्य,
    • राम नाम का सुमिरन करता है,
    • इश्वर को याद करता है
  • सतगुरु पद निज ध्यान –
    • सतगुरु के चरणों का,
    • निरंतर ध्यान करता है
  • आतम पूजा –
    • अंतर्मन से,
    • ईश्वर को पूजता है
  • जीव दया –
    • सभी जीवो पर,
    • दया करता है
  • लहै सो मुक्ति अमान –
    • वह इस संसार से,
    • मुक्ति (मोक्ष) पाता है।

ईश्वर के दर्शन के लिए, सबसे सरल और सहज मार्ग

5.

सुमिरण मारग सहज का,
सतगुरु दिया बताय।
सांस सांस सुमिरण करूं,
इक दिन मिलसी आय॥

  • सुमिरण मारग सहज का –
    • सुमिरण का मार्ग,
    • बहुत ही सहज और सरल है
  • सतगुरु दिया बताय –
    • जो मुझे,
    • सतगुरु ने बता दिया है
  • सांस सांस सुमिरण करूं –
    • अब मै,
    • हर साँस में,
    • प्रभु को याद करता हूँ
  • इक दिन मिलसी आय –
    • एक दिन निश्चित ही,
    • मुझे ईश्वर के दर्शन होंगे

हर एक क्षण, मन में, ईश्वर का स्मरण रहना चाहिए जैसे ….

6.

सुमिरण की सुधि यौ करो,
जैसे कामी काम।
एक पल बिसरै नहीं,
निश दिन आठौ जाम॥

  • सुमिरण की सुधि यौ करो –
    • ईश्वर को,
    • इस प्रकार याद करो
  • जैसे कामी काम –
    • जैसे कामी पुरुष,
    • हर समय विषयो के बारे में सोचता है
  • एक पल बिसरै नहीं –
    • एक पल भी,
    • व्यर्थ मत गँवाओं,
    • व्यर्थ मत जाने दो
  • निश दिन आठौ जाम –
    • रात, दिन,
    • आठों पहर,
    • प्रभु परमेश्वर को याद करो

ज्ञान और भक्ति, ईश्वर के सुमिरन के लिए जरूरी

7.

बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

  • बिना सांच सुमिरन नहीं –
    • बिना ज्ञान के,
    • प्रभु का स्मरण (सुमिरन),
    • नहीं हो सकता और
  • बिन भेदी भक्ति न सोय –
    • भक्ति का भेद जाने बिना,
    • सच्ची भक्ति नहीं हो सकती
  • पारस में परदा रहा –
    • जैसे पारस में,
    • थोडा सा भी खोट हो
  • कस लोहा कंचन होय –
    • तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता.
  • यदि मन में,
  • विकारों का खोट हो तो
  • मनुष्य सच्चे मन से,
  • सुमिरन नहीं कर सकता

8.

दर्शन को तो साधु हैं,
सुमिरन को गुरु नाम।
तरने को आधीनता,
डूबन को अभिमान॥

  • दर्शन को तो साधु हैं –
    • दर्शन के लिए,
    • सन्तों का दर्शन श्रेष्ठ हैं और
  • सुमिरन को गुरु नाम –
    • सुमिरन के लिए (चिन्तन के लिए),
    • गुरु व्दारा बताये गये नाम एवं
    • गुरु के वचन उत्तम है
  • तरने को आधीनता –
    • भवसागर (संसार रूपी भव) से पार उतरने के लिए,
    • आधीनता अर्थात विनम्र होना,
    • अति आवश्यक है
  • डूबन को अभिमान –
    • लेकिन डूबने के लिए तो
    • अभिमान, अहंकार ही पर्याप्त है
    • (अर्थात अहंकार नहीं करना चाहिए)

9.

लूट सके तो लूट ले,
राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे,
प्राण जाहिं जब छूट॥

  • लूट सके तो लूट ले –
    • अगर लूट सको तो लूट लो
  • राम नाम की लूट –
    • अभी राम नाम की लूट है,
    • अभी समय है, तुम भगवान का जितना नाम लेना चाहते हो ले लो
  • पाछे फिर पछ्ताओगे –
    • यदि नहीं लुटे,
    • तो बाद में पछताना पड़ेगा
  • प्राण जाहिं जब छूट –
    • जब प्राण छुट जायेंगे

10.

आदि नाम पारस अहै,
मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया,
छूटा बंधन मोह॥

  • आदि नाम पारस अहै –
    • ईश्वर का स्मरण,
    • पारस के समान है
  • मन है मैला लोह –
    • विकारों से भरा मन
    • अर्थात मैला मन,
    • लोहे के समान है
  • परसत ही कंचन भया –
    • जैसे पारस के संपर्क से,
    • लोहा कंचन (सोना) बन जाता है
    • वैसे ही ईश्वर के नाम से,
    • मन शुद्ध हो जाता है
  • छूटा बंधन मोह –
    • और मनुष्य,
    • मोह माया के बन्धनों से,
    • छूट जाता है

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कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित


कबीर के दोहे – सुमिरन

कबीरा सोया क्या करे,
उठि न भजे भगवान।
जम जब घर ले जायेंगे,
पड़ी रहेगी म्यान॥

पाँच पहर धन्धे गया,
तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन,
मुक्ति कैसे होय॥

नींद निशानी मौत की,
उठ कबीरा जाग।
और रसायन छांड़ि के,
नाम रसायन लाग॥

रात गंवाई सोय के,
दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था,
कोड़ी बदले जाय॥


संत कबीर के दोहे – अर्थसहित

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कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित

Kabir

Dohe

Sant Kabir ke Dohe - Sumiran - Ishwar ka Smaran - Arth Sahit - Meaning in Hindi
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Dohe

कबीर के दोहे – मन का फेर – अर्थ सहित

1.

माला फेरत जुग गया,
मिटा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे,
मन का मनका फेर॥

  • माला फेरत जुग गया –
    • कबीरदासजी कहते है की,
    • हे मनुष्य, तुमने हाथ में माला लेकर फेरते हुए,
    • कई युग बिता दिए
  • मिटा न मन का फेर –
    • फिर भी,
    • संसार के विषयो के प्रति,
    • मोह और आसक्ति का,
    • अंत नहीं हुआ
  • कर का मनका डारि दे –
    • इसलिए हाथ (कर) की माला (मनका) को छोड़कर
  • मन का मनका फेर –
    • मन को ईश्वर के ध्यान में लगाओ.
  • (मन का मनका – मन में इश्वर के नाम की माला, मन से ईश्वर को याद करना)

2.

माया मरी न मन मरा,
मर मर गये शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर॥

  • माया मरी न मन मरा –
    • न माया मरी और ना मन मरा
  • मर मर गये शरीर –
    • सिर्फ शरीर ही बारंबार जन्म लेता है और मरता है
  • आशा तृष्णा ना मरी –
    • क्योंकि मनुष्य की आशा और तृष्णा नष्ट नहीं होती
  • कह गये दास कबीर –
    • कबीर दास जी कहते हैं (आशा और तृष्णा जैसे विकारों से मुक्त हुए बिना मनुष्य की मुक्ति या मोक्ष संभव नहीं है)
  • (तृष्णा – craving, greed – लालच, लोभ, तीव्र इच्छा)

3.

न्हाये धोये क्या हुआ,
जो मन का मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहै,
धोये बास न जाय॥

  • न्हाये धोये क्या हुआ –
    • सिर्फ नहाने धोने से (शरीर को सिर्फ बाहर से साफ़ करने से) क्या होगा?
  • जो मन मैल न जाय –
    • यदि मन मैला ही रह गया (मन के विकार नहीं निकाल सके)
  • मीन सदा जल में रहै –
    • मछली हमेशा जल में रहती है
  • धोए बास न जाय –
    • इतना धुलकर भी उसकी दुर्गन्ध (बास) नहीं जाती

4.

जग में बैरी कोय नहीं,
जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे,
दया करे सब कोय॥

  • जग में बैरी कोय नहीं –
    • संसार में हमारा कोई शत्रु (बैरी) नहीं हो सकता
  • जो मन शीतल होय –
    • यदि हमारा मन शांत हो तो
  • या आपा को डारि दे –
    • यदि हम मन से मान-अभिमान (अपा) और अहंकार को छोड़ दे
  • दया करे सब कोय –
    • तो हम सब पर दया करेंगे और सभी हमसे प्रेम करने लगेंगे

5.

तन को जोगी सब करै,
मन को करै न कोय।
सहजै सब विधि पाइये,
जो मन जोगी होय॥

  • तन को जोगी सब करै –
    • तन से (योगी के वस्त्र पहनकर) कोई भी योगी बन सकता है
  • मन को करै न कोय –
    • मन से योगी (मन से आसक्तियों को त्यागकर योगी) कोई नहीं बनता
  • सहजै सब सिधि पाइये –
    • उस मनुष्य को सहज ही सब सिद्धिया मिल जाती है
  • जो मन जोगी होय –
    • जो मन से योगी बन जाता है (मन को शांत कर लेता है)

कबीरदासजी के गुरु की महिमा पर दोहे और उनके सरल अर्थो के लिए, क्लिक करे

कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित


कबीर के दोहे – मन का फेर – अर्थ सहित

बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलिया कोय।
जो मन देखा आपना,
मुझ से बुरा न कोय॥

ऐसी वाणी बोलिए,
मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करे,
आपहुं शीतल होए॥

फल कारण सेवा करे,
करे न मन से काम।
कहे कबीर सेवक नहीं,
चाहे चौगुना दाम॥

मन दिना कछु और ही,
तन साधून के संग।
कहे कबीर कारी दरी,
कैसे लागे रंग॥

सुमिरन मन में लाइए,
जैसे नाद कुरंग।
कहे कबीरा बिसर नहीं,
प्राण तजे ते ही संग॥

कबीर मन पंछी भय,
वहे ते बाहर जाए।
जो जैसी संगत करे,
सो तैसा फल पाए॥

धीरे-धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा,
ॠतु आए फल होय॥


संत कबीरदासजी के दोहे – अर्थसहित

कबीरदासजी के गुरु की महिमा पर दोहे और उनके सरल अर्थो के लिए, क्लिक करे

कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित

Kabir Dohe

Dohe

Kabir ke Dohe - Man ka Pher - Arth Sahit - Meaning in Hindi
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संत कबीर के दोहे – भक्ति – अर्थ सहित

सच्ची भक्ति क्या जरूरी है?

क्रोध, लालच और इच्छाएं, भक्ति के मार्ग में बाधक है

कामी क्रोधी लालची,
इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा,
जाति बरन कुल खोय॥

  • कामी क्रोधी लालची –
    • कामी (विषय वासनाओ में लिप्त रहता है),
    • क्रोधी (दुसरो से द्वेष करता है) और
    • लालची (निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है)
  • इनते भक्ति न होय –
    • इन लोगो से,
    • भक्ति नहीं हो सकती
  • भक्ति करै कोई सूरमा –
    • भक्ति तो कोई पुरुषार्थी,
    • शूरवीर ही कर सकता है, जो
  • जादि बरन कुल खोय –
    • जाति, वर्ण, कुल और
    • अहंकार का त्याग कर सकता है

मुक्ति या मोक्ष के लिए, भक्ति और गुरु के वचन जरूरी है

भक्ति बिन नहिं निस्तरे,
लाख करे जो कोय।
शब्द सनेही होय रहे,
घर को पहुँचे सोय॥

  • भक्ति बिन नहिं निस्तरे –
    • भक्ति के बिना,
    • मुक्ति संभव नहीं है
  • लाख करे जो कोय –
    • चाहे कोई लाख प्रयत्न कर ले
  • शब्द सनेही होय रहे –
    • जो सतगुरु के वचनों को (शब्दों को),
    • ध्यान से सुनता है और
    • उनके बताये मार्ग पर चलता है
  • घर को पहुँचे सोय –
    • वे ही अपने लक्ष्य को,
    • प्राप्त कर सकते है

सच्ची भक्ति के लिए, भक्ति का भेद जानना जरूरी है

भक्ति भक्ति सब कोई कहै,
भक्ति न जाने भेद।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

  • भक्ति भक्ति सब कोई कहै –
    • भक्ति भक्ति हर कोई कहता है,
    • सभी सभी लोग भक्ति करना चाहते हैं,
  • भक्ति न जाने भेद –
    • लेकिन,
    • भक्ति कैसे की जाए,
    • यह भेद नहीं जानते
  • पूरण भक्ति जब मिलै –
    • पूर्ण भक्ति अर्थात सच्ची भक्ति,
    • तभी हो सकती है
  • कृपा करे गुरुदेव –
    • जब सतगुरु की कृपा होती है

सच्चे भक्त को ही, भक्ति और मुक्ति से मिलनेवाला, सुख मिलता है

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की,
चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै,
निज मन समझो आय॥

  • भक्ति जु सिढी मुक्ति की –
    • भक्ति,
    • मुक्ति वह सीढी है
  • चढ़े भक्त हरषाय –
    • जिस पर चढ़कर,
    • भक्त को,
    • अपार ख़ुशी मिलती है
  • और न कोई चढ़ी सकै –
    • दूसरा कोई भी मनुष्य,
    • जो सच्ची भक्ति नहीं कर सकता,
    • इस पर नहीं चढ़ सकता है
  • निज मन समझो आय –
    • यह समझ लेना चाहिए

अहंकार, आसक्ति जैसे विकारों से भरा मन, सच्ची भक्ति नहीं कर सकता

बिना साँच सुमिरन नहीं,
बिन भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा,
कस लोहा कंचन होय॥

  • बिना सांच सुमिरन नहीं –
    • बिना ज्ञान के,
    • प्रभु का स्मरण (सुमिरन) नहीं हो सकता और
  • बिन भेदी भक्ति न सोय –
    • भक्ति का भेद जाने बिना,
    • सच्ची भक्ति नहीं हो सकती
  • पारस में परदा रहा –
    • जैसे पारस में,
    • थोडा सा भी खोट हो
  • कस लोहा कंचन होय –
    • तो वह लोहे को सोना नहीं बना सकता.
  • यदि मन में विकारों का खोट हो,
  • जैसे अहंकार, आसक्ति, द्वेष,
  • तो सच्चे मन से भक्ति नहीं हो सकती

कबीर के दोहे – भक्ति

भक्ति महल बहु ऊँच है,
दूरहि ते दरशाय।
जो कोई जन भक्ति करे,
शोभा बरनि न जाय॥

जब लग नाता जगत का,
तब लग भक्ति न होय।
नाता तोड़े हरि भजे,
भगत कहावें सोय॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै,
भक्ति न जाने मेव।
पूरण भक्ति जब मिलै,
कृपा करे गुरुदेव॥

और कर्म सब कर्म है,
भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के,
भक्ति करो तजि भर्म॥

भक्ति दुहेली गुरुन की,
नहिं कायर का काम।
सीस उतारे हाथ सों,
ताहि मिलै निज धाम॥

गुरु भक्ति अति कठिन है,
ज्यों खाड़े की धार।
बिना साँच पहुँचे नहीं,
महा कठिन व्यवहार॥

आरत है गुरु भक्ति करूँ,
सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में,
भक्त फँसे नहिं कोय॥

भाव बिना नहिं भक्ति जग,
भक्ति बिना नहीं भाव।
भक्ति भाव इक रूप है,
दोऊ एक सुभाव॥

भक्ति भाव भादौं नदी,
सबै चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये,
जेठ मास ठहराय॥

Kabir Dohe

Dohe

संत कबीर के दोहे – भक्ति – अर्थ सहित
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कबीर के दोहे – संगति

संगति पर संत कबीरदासजी के दोहे

मन के विकारों को, दूर करने के लिए,अच्छे विचारों वाले लोगों की संगत

कबीर संगत साधु की,
नित प्रति कीजै जाय।
दुरमति दूर बहावसी,
देसी सुमति बताय॥

  • कबीर संगत साधु की –
    • संत कबीर कहते हैं कि,
    • सज्जन लोगों की संगत
  • नित प्रति कीजै जाय –
    • प्रतिदिन करनी चाहिए।
    • ज्ञानी सज्जनों की संगत में,
    • प्रतिदिन जाना चाहिए।
  • दुरमति दूर बहावसी –
    • इससे दुर्बुद्धि (दुरमति),
    • दूर हो जाती है,
    • मन के विकार,
    • नष्ट हो जाते है और
  • देसी सुमति बताय –
    • सदबुद्धि (सुमति),
    • आती है

बुरे विचार वाले लोगों के साथ, कभी ना जाए

कबीर संगत साधु की,
जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिले,
साकट संग न जाए॥

  • कबिर संगति साधु की –
    • कबीरदासजी कहते हैं कि,
    • साधु की संगत में रहकर यदि
  • जो कि भूसी खाय –
    • जौ की भूसी का भोजन अर्थात
    • स्वादहीन भोजन, सादा भोजन भी मिले,
    • तो भी उसे,
    • प्रेम से ग्रहण करना चाहिए
  • खीर खांड भोजन मिले –
    • लेकिन दुष्ट के साथ,
    • यदि खीर और मिष्ठान आदि,
    • स्वादिष्ट भोजन भी मिले
  • साकत संग न जाय –
    • तो भी उसके साथ,
    • दुष्ट स्वभाव वाले के साथ,
    • नहीं जाना चाहिए।

संत लोगों की संगत, पारस पत्थर के समान

संगत कीजै साधु की,
कभी न निष्फल होय।
लोहा पारस परसते,
सो भी कंचन होय॥

  • संगत कीजै साधु की –
    • संत कबीर कहते है की,
    • सन्तो की संगत करना चाहिए,
  • कभी न निष्फल होय –
    • क्योंकि वह,
    • कभी निष्फल नहीं होती

(संतो की संगति का फल अवश्य प्राप्त होता है)

  • लोहा पारस परसते –
    • जैसे पारस के स्पर्श से,
    • लोहा भी
  • सो भी कंचन होय –
    • सोना बन जाता है।
  • वैसे ही,
  • संतो के वचनों को ध्यानपूर्वक सुनने और
  • उन का पालन करने से,
  • मनुष्य के मन के विकार नष्ट हो जाते है और
  • वह भी सज्जन बन जाता है


कबीर के दोहे – संगति

संगति सों सुख्या ऊपजे,
कुसंगति सो दुख होय।
कह कबीर तहँ जाइये,
साधु संग जहँ होय॥

कबीरा मन पँछी भया,
भये ते बाहर जाय।
जो जैसे संगति करै,
सो तैसा फल पाय॥

सज्जन सों सज्जन मिले,
होवे दो दो बात।
गहदा सो गहदा मिले,
खावे दो दो लात॥

मन दिया कहुँ और ही,
तन साधुन के संग।
कहैं कबीर कोरी गजी,
कैसे लागै रंग॥

साधु संग गुरु भक्ति अरू,
बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
ओछी संगत खर शब्द रू,
घटत-घटत घटि जाय॥

साखी शब्द बहुतै सुना,
मिटा न मन का दाग।
संगति सो सुधरा नहीं,
ताका बड़ा अभाग॥

साधुन के सतसंग से,
थर-थर काँपे देह।
कबहुँ भाव कुभाव ते,
जनि मिटि जाय सनेह॥

हरि संगत शीतल भया,
मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि,
लहा अन्न प्रगटा आप॥

जा सुख को मुनिवर रटैं,
सुर नर करैं विलाप।
जो सुख सहजै पाईया,
सन्तों संगति आप॥

कबीरा कलह अरु कल्पना,
सतसंगति से जाय।
दुख बासे भागा फिरै,
सुख में रहै समाय॥

संगत कीजै साधु की,
होवे दिन-दिन हेत।
साकुट काली कामली,
धोते होय न सेत॥

सन्त सुरसरी गंगा जल,
आनि पखारा अंग।
मैले से निरमल भये,
साधू जन को संग॥


कबीरदासजी के दोहे – अर्थसहित

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कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित

Kabir Dohe

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Kabir ke Dohe - Sangati - Arth Sahit - Meaning in Hindi
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कबीर के दोहे

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कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित


कबीरदास के दोहे

दु:ख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दु:ख काहे को होय॥

दु:ख में सुमिरन सब करै – मनुष्य ईश्वर को दुःख में याद करता है।
सुख में करै न कोय – सुख में ईश्वर को भूल जाते है
जो सुख में सुमिरन करै – यदि सुख में भी इश्वर को याद करे
तो दु:ख काहे को होय – तो दुःख निकट आएगा ही नहीं


गुरु गोविंद दोऊँ खड़े,
काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय॥

गुरु गोविंद दोऊ खड़े – गुरु और गोविन्द (भगवान) दोनों एक साथ खड़े है
काके लागूं पाँय – पहले किसके चरण-स्पर्श करें (प्रणाम करे)?
बलिहारी गुरु – कबीरदासजी कहते है, पहले गुरु को प्रणाम करूँगा
आपने गोविन्द दियो बताय – क्योंकि, आपने (गुरु ने) गोविंद तक पहुचने का मार्ग बताया है।


लूट सके तो लूट ले,
राम नाम की लूट।
पाछे फिर पछ्ताओगे,
प्राण जाहिं जब छूट॥

लूट सके तो लूट ले – अगर लूट सको तो लूट लो
राम नाम की लूट – अभी राम नाम की लूट है,
अभी समय है, तुम भगवान का जितना नाम लेना चाहते हो ले लो
पाछे फिर पछ्ताओगे – यदि नहीं लुटे तो बाद में पछताना पड़ेगा
प्राण जाहिं जब छूट – जब प्राण छुट जायेंगे


सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

सतगुरु महिमा अनंत है – सतगुरु की महिमा अनंत हैं
अनंत किया उपकार – उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किये है
लोचन अनंत उघारिया – उन्होंने मेरे ज्ञान के चक्षु (अनन्त लोचन) खोल दिए
अनंत दिखावन हार – और मुझे अनंत (ईश्वर) के दर्शन करा दिए।


कामी क्रोधी लालची,
इनसे भक्ति ना होय।
भक्ति करै कोई सूरमा,
जादि बरन कुल खोय॥

कामी क्रोधी लालची
कामी – विषय वासनाओ में लिप्त रहता है,
क्रोधी – दुसरो से द्वेष करता है
लालची – निरंतर संग्रह करने में व्यस्त रहता है
इनते भक्ति न होय – इन लोगो से भक्ति नहीं हो सकती
भक्ति करै कोई सूरमा – भक्ति तो कोई शूरवीर (सुरमा) ही कर सकता है,
जादि बरन कुल खोय – जो जाति, वर्ण, कुल और अहंकार का त्याग कर सकता है


कहैं कबीर देय तू,
जब लग तेरी देह।
देह खेह हो जायगी,
कौन कहेगा देह॥

कहैं कबीर देय तू – कबीर कहते हैं, दान-पुण्य करते रहो,
जब लग तेरी देह – जब तक शरीर (देह) में प्राण हैं
देह खेह हो जायगी – जब यह शरीर धुल में मिल जाएगा (मृत्यु के बाद पंच तत्व में मिल जाएगा)
खेह – धूल, राख, धूल मिट्टी
कौन कहेगा देह – तब दान का अवसर नहीं मिलेगा
इसलिए मनुष्य ने जब तक शरीर में प्राण है तब तक दान अवश्य करना चाहिए


माया मरी न मन मरा,
मर मर गये शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी,
कह गये दास कबीर॥

माया मरी न मन मरा – न माया मरी और ना मन मरा
मर मर गये शरीर – सिर्फ शरीर ही बार बार जन्म लेता है और मरता है
आशा तृष्णा ना मरी – क्योंकि मनुष्य की आशा और तृष्णा नष्ट नहीं होती
तृष्णा – craving, greed – लालच, लोभ, तीव्र इच्छा
कह गये दास कबीर – कबीर दास जी कहते हैं
आशा और तृष्णा जैसे विकारों से मुक्त हुए बिना मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा नहीं मिल सकता


माला फेरत जुग गया,
मिटा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे,
मन का मनका फेर॥

माला फेरत जुग गया – कबीरदासजी कहते है की तुमने हाथ में माला लेकर फेरते हुए कई वर्ष बिता दिए
मिटा न मन का फेर – फिर भी मन को शांत न कर सके
संसार के विषयो के प्रति मोह और आसक्ति को ना मिटा सके
कर का मनका डारि दे – इसलिए हाथ (कर) की माला (मनका) को छोड़कर
मन का मनका फेर – मन को ईश्वर के ध्यान में लगाओ.
मन का मनका – मन में इश्वर के नाम की माला, मन से ईश्वर को याद करना


कबीर ते नर अन्ध हैं,
गुरु को कहते और।
हरि के रुठे ठौर है,
गुरु रुठे नहिं ठौर॥

कबीर ते नर अन्ध हैं – संत कबीर कहते है की वे मनुष्य नेत्रहीन (अन्ध) के समान है
गुरु को कहते और – जो गुरु के महत्व को नहीं जानते
हरि के रुठे ठौर है – भगवान के रूठने पर मनुष्य को स्थान (ठौर) मिल सकता है
गुरु रुठे नहिं ठौर – लेकिन, गुरु के रूठने पर कही स्थान नहीं मिल सकता


दरशन कीजै साधु का,
दिन में कइ कइ बार।
आसोजा का भेह ज्यों,
बहुत करे उपकार॥

दरशन कीजै साधु का – संतो के दर्शन
दिन में कइ कइ बार – दिन में बार-बार करो
जब भी अवसर मिले, साधू-संतो के दर्शन करे
आसोजा का भेह ज्यों – जैसे आश्विन महीने की वर्षा
बहुत करे उपकार – फसल के लिए फायदेमंद है
वैसे ही संतो के दर्शन मनुष्य के लिए बहुत ही हितकारी है


बार-बार नहिं करि सके,
पाख-पाख करि लेय।
कहैं कबीर सो भक्त जन,
जन्म सुफल करि लेय॥

बार-बार नहिं करि सके – यदि साधू-संतो के दर्शन बार बार न हो पाते हो, तो
पाख-पाख करिलेय – पंद्रह दिन में एक बार अवश्य कर ले
कहैं कबीर सो भक्त जन – कबीरदासजी कहते है की, ऐसे भक्तजन
जो नित्य संतो के दर्शन करता है और उनकी वाणी सुनता है
जन्म सुफल करि लेय – भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ अपना जन्म सफल कर लेता है


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कबीर के दोहे – गुरु महिमा – अर्थसहित


आया था किस काम को,
तु सोया चादर तान।
सुरत सम्भाल ए गाफिल,
अपना आप पहचान॥

साईं इतना दीजिये,
जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ,
साधु ना भूखा जाय॥

तिनका कबहुँ ना निंदये,
जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े,
पीर घानेरी होय॥

बडा हुआ तो क्या हुआ,
जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही,
फल लागे अति दूर॥

आय हैं सो जाएँगे,
राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले,
एक बँधे जात जंजीर॥

काल करे सो आज कर,
आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी,
बहुरि करेगा कब॥

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े,
का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे,
गोबिंद दियो मिलाय॥

धीरे-धीरे रे मना,
धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा,
ॠतु आए फल होय॥

जाति न पूछो साधु की,
पूछि लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का,
पड़ा रहन दो म्यान॥

दुर्लभ मानुष जन्म है,
देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े,
बहुरि न लागे डार॥

Kabir Dohe

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Sant Kabir ke Dohe - Arth Sahit
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कबीर के दोहे – 2

कबीरा ते नर अँध है,
गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है,
गुरु रूठे नहीं ठौर॥

पाँच पहर धन्धे गया,
तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन,
मुक्ति कैसे होय॥

शीलवन्त सबसे बड़ा,
सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा,
रही शील में आन॥

गुरु कीजिए जानि के,
पानी पीजै छानि।
बिना विचारे गुरु करे,
परे चौरासी खानि॥

कामी, क्रोधी, लालची,
इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करे कोइ सूरमा,
जाति वरन कुल खोय॥

जागन में सोवन करे,
साधन में लौ लाय।
सूरत डोर लागी रहे,
तार टूट नाहिं जाय॥

साधु ऐसा चहिए,
जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे,
थोथ देइ उड़ाय॥

जहाँ दया तहाँ धर्म है,
जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है,
जहाँ क्षमा तहाँ आप॥

सतगुरू की महिमा अनंत,
अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया,
अनंत दिखावणहार॥

यह तन विषय की बेलरी,
गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै,
तो भी सस्ता जान॥

शब्द गुरु का शब्द है,
काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की,
सत्गुरु यौं समुझाय॥

सुमरित सुरत जगाय कर,
मुख के कछु न बोल।
बाहर का पट बन्द कर,
अन्दर का पट खोल॥

जो गुरु ते भ्रम न मिटे,
भ्रान्ति न जिसका जाय।
सो गुरु झूठा जानिये,
त्यागत देर न लाय॥

गुरु लोभ शिष लालची,
दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे,
चढ़ि पाथर की नाँव॥

मैं अपराधी जन्म का,
नख-सिख भरा विकार।
तुम दाता दु:ख भंजना,
मेरी करो सम्हार॥

सुमिरन में मन लाइए,
जैसे नाद कुरंग।
कहैं कबीर बिसरे नहीं,
प्रान तजे तेहि संग॥

साधू गाँठ न बाँधई
उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े
जब माँगे तब देय॥

जहाँ आपा तहाँ आपदां,
जहाँ संशय तहाँ रोग।
कह कबीर यह क्यों मिटे,
चारों धीरज रोग॥

सात समंदर की मसि करौं
लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं
हरि गुण लिखा न जाइ॥

माया छाया एक सी,
बिरला जाने कोय।
भगता के पीछे लगे,
सम्मुख भागे सोय॥

Kabir Dohe

Dohe

Kabirdas ke Dohe - 2
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Stotra

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ सहित – नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय

Shiv Panchakshar Stotra Meaning in Hindi

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का महत्व

  • पंचाक्षर अर्थात
  • पांच अक्षर – न, म, शि, वा और य
  • श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र के,
  • पाँचों श्लोकों में,
  • क्रमशः न, म, शि, वा और य है।
  • न, म, शि, वा और य
  • अर्थात् नम: शिवाय
  • इसलिए,
  • यह पंचाक्षर स्तोत्र शिवस्वरूप है।

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – भावार्थ और शब्दों का अर्थ

1. नमः शिवाय का पहिला अक्षर “न”

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • जिनके कंठ मे साँपोंका हार है,
  • जिनके तीन नेत्र हैं,
  • भस्म ही जिनका अंगराग है (अनुलेपन) है,
  • दिशाँए ही जिनके वस्त्र हैं,
  • उन अविनाशी महेश्वर “न” कार स्वरूप शिवको,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • नागेंद्रहाराय – हे शंकर, आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं
  • त्रिलोचनाय – हे तीन नेत्रों वाले (त्रिलोचन)
  • भस्मांग रागाय – आप भस्म से अलंकृत है
  • महेश्वराय – महेश्वर है
  • नित्याय – नित्य (अनादि एवं अनंत) है और
  • शुद्धाय – शुद्ध हैं
  • दिगंबराय – अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिगम्बर
  • तस्मै न काराय – आपके “न” अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव, नमस्कार है

2. नमः शिवाय का दुसरा अक्षर “म”

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय
नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • गंगाजल और चन्दन से जिनकी अर्चा अर्थात पूजा हुई है,
  • मन्दार पुष्प तथा अन्यान्य पुष्पों से जिनकी सुंदर पूजा हुई है,
  • उन नन्दी के अधिपति और प्रमथगणों के स्वामी,
  • महेश्वर “म”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • मंदाकिनी सलिल – गंगा की धारा द्वारा शोभायमान
  • चंदन चर्चिताय – चन्दन से अलंकृत एवं
  • नंदीश्वर प्रमथनाथ – नन्दीश्वर एवं प्रमथ के स्वामी
  • महेश्वराय – महेश्वर
    • प्रमथ अर्थात
    • शिव के गण अथवा पारिषद
  • मंदारपुष्प – आप सदा मन्दार पर्वत से प्राप्त पुष्पों एवं
  • बहुपुष्प – बहुत से अन्य स्रोतों से प्राप्त पुष्पों द्वारा
  • सुपूजिताय – पुजित है
  • तस्मै म काराय – हे “म” अक्षर धारी
  • नमः शिवाय – शिव आपको नमन है

3. नमः शिवाय का तीसरा अक्षर “शि”

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय
तस्मै शि काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • जो कल्याण स्वरूप हैं,
  • पार्वती जी के मुख कमल को विकसित (प्रसन्न) करने के लिये,
    • जो सूर्य स्वरूप हैं,
  • जो राजा दक्ष के यज्ञका नाश करने वाले हैं,
  • जिनकी ध्वजा मे बैलका चिन्ह है,
  • उन शोभाशाली,
  • श्री नीलकण्ठ “शि”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • शिवाय – हे शिव,
  • गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय – माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य समान तेज प्रदान करने वाले,
  • दक्षाध्वरनाशकाय – आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था
  • श्री नीलकंठाय – नीलकण्ठ
  • वृषभद्धजाय – हे धर्म ध्वज धारी
  • तस्मै शि काराय – आपके “शि” अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव, नमस्कार है

4. नमः शिवाय का चौथा अक्षर “वा”

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य
मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • वसिष्ठ, अगस्त्य, और गौतम आदि श्रेष्ठ ऋषि मुनियोंने तथा
  • इन्द्र आदि देवताओंने जिन देवाधिदेव, शंकरजी की पूजा की है।
  • चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र है,
  • उन “व”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य – वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि
  • मुनींद्र देवार्चित शेखराय – मुनियों द्वारा एवं देवगणो द्वारा पुजित देवाधिदेव
  • चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय – आपके सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि, तीन नेत्र समान हैं
  • तस्मै व काराय – आपके “व” अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव नमस्कार है

5. नमः शिवाय का पांचवां अक्षर “य”

यक्षस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगंबराय
तस्मै काराय नमः शिवायः॥

भावार्थ:

  • जिन्होंने यक्षरूप धारण किया है,
  • जो जटाधारी हैं,
  • जिनके हाथ मे पिनाक (धनुष) है,
  • जो दिव्य सनातन पुरुष हैं,
  • उन दिगम्बर देव “य”-कार स्वरूप शिव को,
  • नमस्कार है।

शब्दों का अर्थ –

  • यक्षस्वरूपाय – हे यज्ञ स्वरूप,
  • जटाधराय – जटाधारी शिव
  • पिनाकहस्ताय – पिनाक को धारण करने वाले
    • पिनाक अर्थात
    • शिव का धनुष
  • सनातनाय – आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन है
  • दिव्याय देवाय दिगंबराय – हे दिव्य अम्बर धारी शिव
  • तस्मै य काराय – आपके “य” अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को
  • नमः शिवायः – हे शिव, नमस्कार है

पंचाक्षर मंत्र के पाठ का लाभ

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः
पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥

भावार्थ:

  • जो शिवके समीप,
  • इस पवित्र पंचाक्षर मंत्र का पाठ करता है,
  • वह शिवलोकको प्राप्त होता है और
  • वहा शिवजी के साथ आनन्दित होता है।

शब्दों का अर्थ –

  • पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः – जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का
  • पठेत् शिव सन्निधौ – नित्य ध्यान करता है
  • शिवलोकमवाप्नोति – वह शिव के पुण्य लोक को प्राप्त करता है
  • शिवेन सह मोदते – तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है

॥इति श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय
तस्मै न काराय नमः शिवायः॥

मंदाकिनी सलिल
चंदन चर्चिताय
नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय
तस्मै म काराय नमः शिवायः॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय
तस्मै शि काराय नमः शिवायः॥

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य
मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय
तस्मै व काराय नमः शिवायः॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगंबराय
तस्मै य काराय नमः शिवायः॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः
पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति
शिवेन सह मोदते॥

॥इति श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

Shiv Stotra

Stotra

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र – अर्थ सहित – नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय
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Stotra

श्री शिव रुद्राष्टकम स्तोत्र – अर्थ सहित – नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

Shiv Rudrashtakam Stotra Meaning in Hindi

तुलसीदास कृत शिव रूद्राष्टक स्तोत्र

  • रुद्राष्टकम अर्थात
    • रुद्र + अष्टक
  • रुद्र अर्थात भगवान शिव
  • अष्टक अर्थात आठ श्लोकों का समूह
  • इसलिए, रुद्राष्टकम स्तोत्र यानी
  • भगवान रुद्र अर्थात शंकरजी की,
  • स्तुति के लिए, आठ श्लोक।
  • तुलसीदासजी ने,
  • भगवान् शिव की स्तुति के लिए,
  • इस स्तोत्र की रचना की थी।
  • गोस्वामी तुलसीदासजी के,
  • श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में,
  • रुद्राष्टकम स्तोत्र का,
  • उल्लेख आता है।

रुद्राष्टकम स्तोत्र पढ़ने का लाभ

  • रुद्राष्टकम स्तोत्र में,
  • शिवजी के रूप, गुण और
  • कार्यों का वर्णन किया हुआ है।
  • जो मनुष्य,
  • रुद्राष्टकम स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं,
  • भोलेनाथ उन से प्रसन्न होते हैं।
  • उस मनुष्य के दुःख दूर हो जाते है, और
  • जीवन में सुख शांति आती है।

रुद्राष्टकम स्तोत्र – अर्थसहित

1.

मोक्षस्वरुप, आकाशरूप, सर्व्यवापी शिवजी को प्रणाम

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥1॥

भावार्थ:

  • हे मोक्षस्वरुप,
  • सर्व्यवापी,
  • ब्रह्म और वेदस्वरूप,
  • ईशान दिशाके ईश्वर तथा
  • सबके स्वामी श्री शिवजी,
  • मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
  • निजस्वरुप में स्थित
    • अर्थात माया आदि से रहित,
  • गुणों से रहित,
  • भेद रहित,
  • इच्छा रहित,
  • चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दीगम्बर
    • अर्थात आकाश को भी आच्छादित करने वाले,
  • आपको में भजता हूँ ॥१॥

शब्दों का अर्थ –

  • नमामीशम् – श्री शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूँ जो
  • ईशान – ईशान दिशाके ईश्वर
  • निर्वाणरूपं – मोक्षस्वरुप
  • विभुं व्यापकं – सर्व्यवापी
  • ब्रह्मवेदस्वरूपम् – ब्रह्म और वेदस्वरूप है
  • निजं – निजस्वरुप में स्थित (अर्थात माया आदि से रहित)
  • निर्गुणं – गुणों से रहित
  • निर्विकल्पं – भेद रहित
  • निरीहं – इच्छा रहित
  • चिदाकाशम् – चेतन आकाशरूप एवं
  • आकाशवासं – आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले
    • अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले)
  • भजेहम् – हे शिव, आपको में भजता हूँ

2.

ॐ कार शब्द के मूल, निराकार, महाकाल कैलाशपति को नमस्कार

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्॥2॥

भावार्थ:

  • निराकार,
  • ओंकार के मूल,
  • तुरीय अर्थात
    • तीनों गुणों से अतीत,
  • वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से पर,
  • कैलाशपति,
  • विकराल, महाकाल के काल,
  • कृपालु, गुणों के धाम,
  • संसार से परे,
  • आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥

शब्दों का अर्थ –

  • निराकार – निराकार स्वरुप
  • ओमङ्कारमूलं – ओंकार के मूल
  • तुरीयं – तीनों गुणों से अतीत
  • गिराज्ञान गोतीतमीशं – वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे
  • गिरीशम् – कैलाशपति
  • करालं – विकराल
  • महाकालकालं – महाकाल के काल
  • कृपालं – कृपालु
  • गुणागार – गुणों के धाम
  • संसारपारं – संसार से परे
  • नतोहम् – परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ

3.

सिरपर गंगाजी, ललाटपर चन्द्रमा, गले में सर्पों की माला

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥3॥

भावार्थ:

  • जो हिमाचल के समान,
    • गौरवर्ण तथा गंभीर हैं,
  • जिनके शरीर में,
    • करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है,
  • जिनके सिरपर,
    • सुन्दर गंगा जी नदी विराजमान हैं,
  • जिनके ललाटपर,
    • द्वितीय का चन्द्रमा और
  • गले में,
    • सर्प सुशोभित हैं ॥३॥

शब्दों का अर्थ –

  • तुषाराद्रिसंकाश – जो हिमाचल के समान
  • गौरं गभिरं – गौरवर्ण तथा गंभीर हैं
  • मनोभूत कोटि प्रभा – करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है
  • श्री शरीरम् – जिनके श्री शरीर में
  • स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
  • जिनके सिरपर,
  • सुन्दर नदी गंगा जी विराजमान हैं
  • लसद्भालबालेन्दु – जिनके ललाटपर द्वितीय का चन्द्रमा और
  • कण्ठे भुजङ्गा – गले में सर्प सुशोभित हैं

4.

नीलकंठ, प्रसन्नमुख, दयालु, सबके नाथ, शिवजी को प्रणाम

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥4॥

भावार्थ:

  • जिनके कानों में,
    • कुण्डल हिल रहे हैं,
  • सुन्दर भ्रुकुटी और
  • विशाल नेत्र हैं,
  • जो प्रसन्नमुख,
  • नीलकंठ और
  • दयालु हैं,
  • सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और
  • मुण्डमाला पहने हैं,
  • सबके प्यारे और सबके नाथ,
    • कल्याण करने वाले,
  • श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ ॥४॥

शब्दों का अर्थ –

  • चलत्कुण्डलं – जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं
  • भ्रूसुनेत्रं विशालं – सुन्दर भृकुटि और विशाल नेत्र हैं
  • प्रसन्नाननं – जो प्रसन्नमुख
  • नीलकण्ठं – नीलकंठ और
  • दयालम् – दयालु हैं
  • मृगाधीशचर्माम्बरं – सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और
  • मुण्डमालं – मुण्डमाला पहने हैं
  • प्रियं शङ्करं – उन सबके प्यारे और
  • सर्वनाथं – सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकर जी को
  • भजामि – मैं भजता हूँ

5.

अखंड, तेजस्वी, हाथ में त्रिशूलधारी, भवानीपति शिवजी को प्रणाम

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥5॥

भावार्थ:

  • प्रचंड (रुद्ररूप) श्रेष्ठ,
  • तेजस्वी, परमेश्वर,
  • अखंड, अजन्मा,
  • करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले,
  • तीनों प्रकार के शूलों (दुखों) को निर्मूल करने वाले,
  • हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए,
  • भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले,
  • भवानी के पति,
  • श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ ॥५॥

शब्दों का अर्थ –

  • प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
  • प्रचंड (रुद्ररूप) श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर
  • अखण्डं – अखंड
  • अजं – अजन्मा
  • भानुकोटिप्रकाशं – करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले
  • त्र्यःशूलनिर्मूलनं – तीनों प्रकार के शूलों (दुखों) को निर्मूल करने वाले
  • शूलपाणिं – हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए
  • भजेहं – मैं भजता हूँ
  • भवानीपतिं – भवानी के पति श्री शंकर
  • भावगम्यम् – भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले

6.

कल्याण स्वरुप, दु:ख हरने वाले, भोलेनाथ को नमस्कार

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

भावार्थ:

  • कलाओं से परे,
  • कल्याण स्वरुप,
  • कल्पका अंत (प्रलय) करने वाले,
  • सज्जनों को सदा आनंद देने वाले,
  • त्रिपुर के शत्रु,
  • सच्चिदानन्दघन,
  • मोहको हराने वाले,
  • मनको मथ डालने वाले,
  • कामदेव के शत्रु,
  • हे प्रभु, प्रसन्न होइये ॥६॥

शब्दों का अर्थ –

  • कलातीत – कलाओं से परे
  • कल्याण – कल्याण स्वरुप
  • कल्पान्तकारी – कल्पका अंत (प्रलय) करने वाले
  • सदा सज्जनानन्ददाता – सज्जनों को सदा आनंद देने वाले
  • पुरारी – त्रिपुर के शत्रु
  • चिदानन्दसंदोह – सच्चिदानन्दघन
  • मोहापहारी – मोहको हराने वाले
  • प्रसीद प्रसीद प्रभो – कामदेव के शत्रु, हे प्रभु, प्रसन्न होइये
  • मन्मथारी – मनको मथ डालने वाले

7.

दु:खों से मुक्ति और सुख, शांति के लिए, शंकरजी के चरणों में प्रणाम

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

भावार्थ:

  • जबतक,
  • पार्वती के पति (शंकरजी),
  • आपके चरणकमलों को,
  • मनुष्य नहीं भजते,
  • तबतक,
  • उन्हें न तो इसलोक ओर परलोक में,
  • सुख-शान्ति मिलती है और
  • न उनके तापों का नाश होता है।
  • अत: हे समस्त जीवों के अन्दर (हृदय में),
  • निवास करनेवाले प्रभो,
  • प्रसन्न होइये ॥७॥

शब्दों का अर्थ –

  • न यावद् उमानाथपादारविन्दं – जबतक पार्वती के पति (शिवजी) आपके चरणकमलों को
  • भजन्तीह – मनुष्य नहीं भजते
  • लोके परे वा नराणाम् – तब तक उन्हें इसलोक में या परलोक में
  • न तावत्सुखं शान्ति – न सुख-शान्ति मिलती है और
  • सन्तापनाशं – न उनके तापों का अर्थात दुःखो का नाश होता है
  • प्रसीद प्रभो – प्रभो। प्रसन्न होइये
  • सर्वभूताधिवासं – समस्त जीवों के अन्दर (हृदय में) निवास करनेवाले

8.

हे शंकर, हे शम्भो, मेरी रक्षा कीजिये

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥

भावार्थ:

  • मैं न तो योग जानता हूँ,
  • न जप और पूजा ही।
  • हे शम्भो,
  • मैं तो सदा-सर्वदा,
  • आपको ही नमस्कार करता हूँ।
  • हे प्रभु,
  • बुढापा तथा जन्म और मृत्यु के,
    • दुःख समूहों से जलते हुए,
  • मुझ दुखी की दुःख में रक्षा कीजिये।
  • हे ईश्वर, हे शम्भो,
  • मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥८॥

शब्दों का अर्थ –

  • न जानामि योगं – मैं न तो योग जानता हूँ
  • जपं नैव पूजां – न जप और पूजा ही
  • नतोहं सदा सर्वदा – मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार
  • शम्भुतुभ्यम् – हे शम्भो।
  • जराजन्मदुःखौघ – बुढापा (जरा), जन्म-मृत्यु के दुःख समूहों से
  • तातप्यमानं – जलते हुए मुझ दुखी की दुःख में रक्षा कीजिये
  • प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो – हे प्रभु, हे ईश्वर, हे शम्भो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ

श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥1॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्॥2॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥5॥

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम्।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥


स्तोत्र – अर्थसहित – लिस्ट


भगवान शंकर

भगवान शंकर की आराधना करने से, दु:ख दूर होते है और व्यक्ति का मन भी शांत और संतुलित रहता है। भगवान् शिव को महादेव भी कहते है, अर्थात सबसे बड़े भगवान। सोमवार, भगवान शिव की पूजा के लिए, शुभ दिन माना जाता है।

Shiv Stotra

Stotra

Shiv Rudrashtakam Stotra Arth Sahit - Meaning in Hindi
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संकटनाशन गणेश स्तोत्रं – अर्थसहित

संकटों का नाश करने वाला गणेशजी का स्तोत्र

श्री गणेश जी का स्मरण करे और प्रणाम करें

1.

नारद उवाच,
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थ सिद्धये॥१॥

  • नारद जी कहते हैं,
  • पार्वतीनन्दन श्रीगणेश जी को,
  • सिर झुकाकर प्रणाम करे।
  • और फिर,
  • अपनी आयु, कामना और
  • अर्थ की सिद्धि के लिये,
  • उन भक्तनिवासका (श्रीगणेशजीका),
  • नित्य स्मरण करें

वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र

2.

प्रथमं वक्रतुंण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम।
तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम॥॥२॥

  • पहला वक्रतुण्ड,
  • दूसरा एकदन्त,
  • तीसरा कृष्णपिंगाक्ष,
  • चौथा गजवक्त्र
  • कृष्णपिंगाक्ष अर्थात –
    • काली और भूरी आंखोवाले
  • गजवक्त्रं अर्थात –
    • हाथीके से मुखवाले

लम्बोदर, विकट, विघ्नराजेन्द्र, धूम्रवर्णं

3.

लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥३॥

  • पाँचवां लम्बोदर,
  • छठा विकट,
  • सातवाँ विघ्नराजेन्द्र,
  • आठवाँ धूम्रवर्णं
  • लम्बोदर अर्थात –
    • बड़े पेटवाले
  • विकट अर्थात –
    • विकराल
  • विघ्नराजेन्द्र अर्थात –
    • विघ्नोका नाश करने वाले राजाधिराज)

भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन

4.

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु गजाननम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥४॥

  • नवाँ भालचन्द्र,
  • दसवाँ विनायक,
  • ग्यारहवाँ गणपति और
  • बारहवाँ गजानन
  • भालचन्द्र अर्थात –
    • जिसके ललाटपर चंद्रमा सुशोभित है

भय दूर करनेवाला, संकटनाशन गणेश मंत्र

5.

द्वादशैतानि नामामि त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर:।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥५॥

  • इन बारह नामों का जो व्यक्ति,
  • तीनों संध्याओं में अर्थात
  • प्रात:, मध्याह्न और सायंकाल में,
  • पाठ करता है,
  • उसे,
  • किसी भी तरह के,
  • विघ्न का भय नहीं रहता है।
  • इस प्रकार का स्मरण,
  • सब प्रकार की सिद्धियाँ देनेवाला है।

इच्छाओं की पूर्ति करनेवाला, गणेश मंत्र

6.

विद्यार्थी लभते विद्यां, धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्-मोक्षार्थी लभते गतिम्॥६॥

  • इससे विद्याभिलाषी (विद्यार्थी) विद्या,
  • धनार्थी (धन के अभिलाषी) धन,
  • पुत्रार्थी (पुत्र की इच्छा वाले) पुत्र तथा
  • मुमुक्षु मोक्षगति प्राप्त कर लेता है।

7.

जपेद गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासै: फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय:॥७॥

  • इस गणपति स्तोत्रका जप करे तो,
  • छह महीने में इच्छित फल प्राप्त होता है और
  • एक वर्ष में पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है,
  • इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है.

8.

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:॥८॥

  • जो पुरुष इसे लिखकर,
  • आठ ब्राह्मणों को समर्पण करता है,
  • गणेशजी की कृपासे,
  • उसे सब प्राकरकी विद्या प्राप्त हो जाती है।

॥इति श्रीनारदपुराणे श्रीसंकटनाशन
गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम॥॥

  • इस प्रकार श्रीनारद पुराण में लिखा,
  • श्रीसंकटनाशन गणेशस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ.

Ganesh

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संकटनाशन गणेश स्तोत्रं – अर्थसहित
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ज्योतिर्लिंग स्तोत्र – अर्थसहित

बारह ज्योतिर्लिंग के नाम

1.

सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, अमलेश्वर

सौराष्ट्रे सोमनाथं च
श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालं
ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥

  • सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में
    • श्री सोमनाथ,
  • श्रीशैल पर
    • श्री मल्लिकार्जुन,
  • उज्जयिनी में
    • श्री महाकाल,
  • ओंकारेश्वर में
    • अमलेश्वर (अमरेश्वर)

2.

भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वेशं

परल्यां वैद्यनाथं च
डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं
नागेशं दारुकावने॥

  • परली में
    • वैद्यनाथ,
  • डाकिनी नामक स्थान में
    • श्रीभीमशंकर,
  • सेतुबंध पर
    • श्री रामेश्वर,
  • दारुकावन में
    • श्रीनागेश्वर

3.

विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर

वाराणस्यां तु विश्वेशं
त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं
घुश्मेशं च शिवालये॥

  • वाराणसी (काशी) में
    • श्री विश्वनाथ,
  • गौतमी (गोदावरी) के तट पर
    • श्री त्र्यम्बकेश्वर,
  • हिमालय पर
    • श्रीकेदारनाथ और
  • शिवालय में
    • श्री घृष्णेश्वर,
  • को स्मरण करें।

ज्योतिर्लिंग स्तोत्र और बारह ज्योतिर्लिंग नाम के पाठ का महत्व

4.

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि
सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं
स्मरणेन विनश्यति॥

  • जो मनुष्य,
  • प्रतिदिन,
  • प्रातःकाल और संध्या समय,
  • इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है,
  • उसके सात जन्मों के पाप,
  • इन लिंगों के स्मरण-मात्र से,
  • मिट जाते है।

एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।
कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥

Shiv Stotra

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Jyotirlinga Stotra - Arth Sahit- Meaning in Hindi
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शिव मानस पूजा स्तोत्र – अर्थसहित

Shiv Manas Puja – Meaning in Hindi

मनके द्वारा भगवान् शिव की पूजा

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः
स्नानं च दिव्याम्बरं,
नानारत्नविभूषितं मृगमदा
मोदाङ्कितं चन्दनम्।

जाती-चम्पक-बिल्व-पत्र-रचितं
पुष्पं च धूपं तथा,
दीपं देव दयानिधे पशुपते
हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥

भावार्थ:

  • हे देव, हे दयानिधे, हे पशुपते, यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्ना से विभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरि आदि गन्ध से समन्वित चन्दन, जूही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप – यह सब मानसिक [पूजोपहार] ग्रहण कीजिये।

शब्दों का अर्थ –

  • रत्नैः कल्पितम-आसनं – यह रत्ननिर्मित सिंहासन,
  • हिमजलैः स्नानं – शीतल जल से स्नान,
  • च दिव्याम्बरं – तथा दिव्य वस्त्र,
  • नानारत्नविभूषितं – अनेक प्रकार के रत्नों से विभूषित,
  • मृगमदा मोदाङ्कितं चन्दनम् – कस्तूरि गन्ध समन्वित चन्दन,
  • जाती-चम्पक – जूही, चम्पा और
  • बिल्वपत्र-रचितं पुष्पं – बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि
  • च धूपं तथा दीपं – तथा धूप और दीप
  • देव दयानिधे पशुपते – हे देव, हे दयानिधे, हे पशुपते,
  • हृत्कल्पितं गृह्यताम् – यह सब मानसिक (मनके द्वारा) पूजोपहार ग्रहण कीजिये

सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते
पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं
रम्भाफलं पानकम्।

शाकानामयुतं जलं रुचिकरं
कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं
भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥

भावार्थ:

  • मैंने नवीन रत्नखण्डोंसे जड़ित सुवर्णपात्र में घृतयुक्त खीर, दूध और दधिसहित पांच प्रकार का व्यंजन, कदलीफल, शरबत, अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल तथा ताम्बूल – ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं। हे प्रभो, कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये।

शब्दों का अर्थ –

  • सौवर्णे नवरत्न-खण्ड-रचिते पात्रे – नवीन रत्नखण्डोंसे जडित सुवर्णपात्र में
  • घृतं पायसं – घृतयुक्त खीर, (घृत – घी)
  • भक्ष्यं पञ्च-विधं पयो-दधि-युतं – दूध और दधिसहित पांच प्रकार का व्यंजन,
  • रम्भाफलं पानकम् – कदलीफल, शरबत,
  • शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं – अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल
  • ताम्बूलं – तथा ताम्बूल (पान)
  • मनसा मया विरचितं – ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं
  • भक्त्या प्रभो स्वीकुरु – हे प्रभो, कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं
चादर्शकं निर्मलम्
वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला
गीतं च नृत्यं तथा।

साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा
ह्येतत्समस्तं मया
संकल्पेन समर्पितं तव विभो
पूजां गृहाण प्रभो॥

भावार्थ:

  • छत्र, दो चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी के वाद्य, गान और नृत्य, साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति – ये सब मैं संकल्पसे ही आपको समर्पण करता हूँ। हे प्रभु, मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये।

शब्दों का अर्थ –

  • छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं – छत्र, दो चँवर, पंखा,
  • चादर्शकं निर्मलम् – निर्मल दर्पण,
  • वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहलकला – वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभी के वाद्य,
  • गीतं च नृत्यं तथा – गान और नृत्य तथा
  • साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा – साष्टांग प्रणाम, नानाविधि स्तुति
  • ह्येतत्समस्तं मया संकल्पेन – ये सब मैं संकल्पसे ही
  • समर्पितं तव विभो – आपको समर्पण करता हूँ
  • पूजां गृहाण प्रभो – हे प्रभो, मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः
प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोग-रचना
निद्रा समाधि-स्थितिः।

सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः
स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं
शम्भो तवाराधनम्॥

भावार्थ:

  • हे शम्भो, मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मन्दिर है, सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं। इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है।

शब्दों का अर्थ –

  • आत्मा त्वं – मेरी आत्मा तुम हो,
  • गिरिजा मतिः – बुद्धि पार्वतीजी हैं,
  • सहचराः प्राणाः – प्राण आपके गण हैं,
  • शरीरं गृहं – शरीर आपका मन्दिर है
  • पूजा ते विषयोपभोग-रचना – सम्पूर्ण विषयभोगकी रचना आपकी पूजा है,
  • निद्रा समाधि-स्थितिः – निद्रा समाधि है,
  • सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः – मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा
  • स्तोत्राणि सर्वा गिरो – सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं
  • यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं – इस प्रकार मैं जो-जो कार्य करता हूँ,
  • शम्भो तवाराधनम् – हे शम्भो, वह सब आपकी आराधना ही है

कर-चरण-कृतं वाक् कायजं कर्मजं वा
श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्-क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥

भावार्थ:

  • हाथोंसे, पैरोंसे, वाणीसे, शरीरसे, कर्मसे, कर्णोंसे, नेत्रोंसे अथवा मनसे भी जो अपराध किये हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको हे करुणासागर महादेव शम्भो। आप क्षमा कीजिये। हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो।

शब्दों का अर्थ –

  • कर-चरण-कृतं वाक् – हाथोंसे, पैरोंसे, वाणीसे,
  • कायजं कर्मजं वा – शरीरसे, कर्मसे,
  • श्रवण-नयनजं वा – कर्णोंसे, नेत्रोंसे अथवा
  • मानसं वापराधम् – मनसे भी जो अपराध किये हों,
  • विहितमविहितं वा – वे विहित हों अथवा अविहित,
  • सर्वमेतत्-क्षमस्व – उन सबको हे शम्भो आप क्षमा कीजिये
  • जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो – हे करुणासागर, हे महादेव शम्भो, आपकी जय हो, जय हो

स्तोत्र – लिस्ट

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शिव मानस पूजा स्तोत्र – अर्थसहित
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श्री रामरक्षा स्तोत्र – अर्थसहित

॥श्रीरामरक्षास्तोत्रम्॥
॥श्रीगणेशायनम:॥


विनियोग

ऊँ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्र-मन्त्रस्य
बुधकौशिक ऋषि:
श्रीसीता रामचन्द्रो देवता
अनुष्टुप् छन्द:
सीता शक्ति:
श्रीमान् हनुमान् कीलकं
श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्र-जपे विनियोग:।

  • ऊँ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्र-मन्त्रस्य – इस रामरक्षा स्तोत्र -मंत्र के
  • बुधकौशिक ऋषि: – बुधकौशिक ऋषि हैं,
  • श्रीसीता रामचन्द्रो देवता – सीता और रामचन्द्र देवता हैं,
  • अनुष्टुप् छन्द: – अनुष्टप् छन्द हैं
    • (अनुष्टुप् छन्द में चार पद होते हैं। प्रत्येक पद में आठ अक्षर/वर्ण होते हैं)
  • सीता शक्ति: – सीता शक्ति हैं,
  • श्रीमद हनुमान् कीलकं – श्रीमान हनुमानजी कीलक हैं तथा
  • श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे – श्री रामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए
  • रामरक्षास्तोत्र-जपे विनियोग: रामरक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं

अथ ध्यानम

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं
बद्धपद्मासनस्थं,
पीतं वासो वसानं
नवकमल दलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामांकारूढ़ सीतामुखकमल मिलल्लोचनं
नीरदाभं नानालंकारदीप्तं
दधतमुरुजटा-मण्डलं रामचन्द्रम्।

  • ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं – जो धनुष -बाण धारण किए हुए हैं,
  • बद्धपद्मासनस्थं – बद्ध पद्मासन से विराजमान हैं,
  • पीतं वासो वसानंपीतांबर पहने हुए हैं,
  • नवकमल दलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् – जिनके प्रसन्न नयन नूतन कमल दल से स्पर्धा करते तथा
  • वामांकारूढ़ सीतामुखकमल मिलल्लोचनं – वामभाग में विराजमान श्री सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं,
  • नीरदाभं नानालंकारदीप्तं – उन मेघश्याम, नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित तथा विशाल
  • दधतमुरुजटा-मण्डलं रामचन्द्रम् – जटाजूटधारी श्री रामचन्द्र जी का ध्यान करे

॥ इति ध्यानम्॥


1.

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥

  • चरितं रघुनाथस्य – श्री रघुनाथ जी का चरित्र
  • शतकोटि-प्रविस्तरम् – सौ करोड़ विस्तारवाला हैं और
  • एकैकमक्षरं (एकैकम अक्षरं) पुंसां – उसका एक -एक अक्षर भी
  • महापातकनाशनम् – महान पापो को नष्ट करने वाला हैं

2.

ध्यात्वा नीलोत्पलश्याम रामं राजीवलोचनम।
जानकी लक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम॥2॥

  • ध्यात्वा – प्रभु श्री राम का स्मरण करे
  • नीलोत्पलश्याम – जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण
  • रामं राजीवलोचनम – कमलनयन
  • जानकी लक्ष्मणोपेतं – जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित
  • जटामुकुटमण्डितम – जटाओं के मुकुट से सुशोभित हैं

भगवान रामजी का जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण करे, जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन, जटाओं के मुकुट से सुशोभित है


3.

सासितूण धनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम॥3॥

  • सासितूण धनुर्बाणपाणिं – हाथों में खड्ग, तूणीर, धनुष और बाण धारण करने वाले
  • नक्तंचरान्तकम – राक्षसों के संहारकरी तथा
  • स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं (जगत्त्रातुम आविर्भूतम अजं) – संसार की रक्षा के लिए अपनी लीला से ही अवतीर्ण हुए हैं,
  • (अजं) विभुम – उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे

4.

रामरक्षां पठेत प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम।
शिरो में राघवं पातु भालं दशरथात्मज:॥4॥

  • रामरक्षां पठेत प्राज्ञ: – मनुष्य (प्राज्ञ पुरुष) रामरक्षा का पाठ करे
  • पापघ्नीं सर्वकामदाम – इस पापविनाशिनी और सर्वकामप्रदा (रामरक्षा स्तोत्र का)
  • शिरो में राघवं पातु – मेरे सिर की राघव और
  • भालं दशरथात्मज: – ललाट की दशरथात्मज रक्षा करे

सर्वव्यापी भगवान रामजी का जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण कर मनुष्य इस पापविनाशिनी (सभी पापो का नाश करने वाले) और सर्वकामप्रदा (सभी कामनाओ की पूर्ति करने वाले) रामरक्षा का पाठ करे।

मेरे सिर की राघव और ललाट की दशरथात्मज रक्षा करे।


5.

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल:॥5॥

  • कौसल्येयो दृशौ पातु – कौसल्यानन्दन नेत्रों की रक्षा करें,
  • विश्वामित्र प्रिय: श्रुती – विश्वामित्र प्रिय कानों को सुरक्षित रखे तथा
  • घ्राणं पातु मखत्राता – यज्ञ रक्षक घ्राण (नासिका, नाक) की और
  • मुखं सौमित्रि-वत्सल: – सौ मित्रिवत्सल मुख की रक्षा करें

6.

जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवन्दित:।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक:॥6॥

  • जिव्हां विद्यानिधि: पातु – मेरी जिव्हा की विद्यानिधि,
  • कण्ठं भरतवन्दित: – कंठ की भरतवन्दित,
  • स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु – कंधो की दिव्यायुध और
  • भुजौ भग्नेशकार्मुक: – भुजाओं की महादेव जी का धनुष तोड़ने वाले (भग्नेशकार्मुक) रक्षा करें

7.

करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय:॥7॥

  • करौ सीतापति: पातु – हाथों की सीतापति,
  • हृदयं जामदग्न्यजित – हृदय की परशुरामजी को जीतने वालें (जामदग्न्यजित),
  • मध्यं पातु खरध्वंसी – मध्यभाग की खर नाम के राक्षस का नाश करने वाले (खरध्वंसी) और
  • नाभिं जाम्बवदाश्रय: – नाभि की जाम्ब्वदाश्रय रक्षा करें

8.

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुत्मप्रभु:।
ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत॥8॥

  • सुग्रीवेश: कटी पातु – कमर की सुग्रीवेश,
  • सक्थिनी हनुत्मप्रभु: – सक्थियों की हनुमत्प्रभुः और
  • ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत – उरुओं की राक्षसकुल विनाशक रघुश्रेष्ठ रक्षा करें

9.

जानुनी सेतकृत्पातु जंघे दशमुखान्तक:।
पादौ विभीषणश्रीद: पातु रामोsखिलं वपु:॥9॥

  • जानुनी सेतकृत्पातु – जानुओं की सेतुकृत्,
  • जंघे दशमुखान्तक: – जंघाओं की दशमुखान्तक (रावण को मारने वाले),
  • पादौ विभीषणश्रीद: – चरणों की विभीषण श्रीद (विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले ) और
  • पातु रामो-खिलं वपु: – सम्पूर्ण शरीर की श्री राम रक्षा करें

10.

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत॥10॥

  • एतां रामबलोपेतां – जो पुण्यवान् पुरुष रामबल से सम्पन्न
  • रक्षां य: सुकृती पठेत – इस रक्षा का पाठ करता हैं,
  • स चिरायु: सुखी पुत्री – वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान,
  • विजयी विनयी भवेत – विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता हैं

11.

पातालभूतल व्योम चारिणशछदमचारिण :।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि:॥11॥

  • पातालभूतल – जो जीव पाताल, पृथ्वी
  • व्योमचारिणश – अथवा आकाश में विचरते हैं और
  • छद्ममचारिण: – छद्मवेश से घूमते रहते हैं,
  • न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: – वे राम नाम से सुरक्षित पुरुष को देख भी नहीं सकते

12.

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥12॥

  • रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति – “राम”, “रामभद्र”, “रामचन्द्र”
  • वा स्मरन – इन नामों का स्मरण करने से
  • नरो न लिप्यते – मनुष्य पापों में लिप्त नहीं होता तथा
  • पापै-र्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति – भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं

13.

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय:॥13॥

  • जगज्जैत्रैकमन्त्रेण – जो पुरुष जगत को विजय करने वाले
  • रामनाम्नाभिरक्षितम (रामनाम नाभिरक्षितम) – एकमात्र मन्त्र राम नाम से सुरक्षित
  • य: कण्ठे धारयेत्तस्य – इस स्त्रोत को कंठ में धारण कर लेता हैं,
  • करस्था: सर्वसिद्धय: – सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं

14.

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम॥14॥

  • वज्रपंजर-नामेदं यो – जो मनुष्य वज्रपंजर नामक
  • रामकवचं स्मरेत – इस राम कवच का स्मरण करता हैं,
  • अव्याहताज्ञ: सर्वत्र – उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लघन नहीं होता और
  • लभते जयमंगलम – उसे सर्वत्र जय और मंगल की प्राप्ति होती हैं

15.

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर:।
तथा लिखितवान्प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक:॥15॥

  • आदिष्टवान्यथा स्वप्ने – श्री शंकरजी ने रात्रि के समय स्वप्न में
  • रामरक्षामिमां हर: – इस राम रक्षा का जिस प्रकार आदेश दिया था,
  • तथा लिखितवान्प्रात: (लिखितवान प्रात:) – उसी प्रकार प्रातः काल जागने पर
  • प्रबुद्धो बुधकौशिक: – बुधकौशिक जी ने इसे लिख दिया

16.

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्स न: प्रभु:॥16॥

  • आराम: कल्पवृक्षाणां – जो मानो कल्पवृक्ष के बगीचे हैं
  • विराम: सकलापदाम – तथा समस्त आपत्तियों का अंत करने वाले हैं,
  • अभिराम-स्त्रिलोकानां राम: – जो तीनो लोक में परम सुंदर हैं,
  • श्रीमान्स न: प्रभु: – वे श्री राम हमारे प्रभु हैं

17.

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥17॥

  • तरुणौ – जो तरुण अवस्था वाले,
  • रूपसम्पन्नौ – रूपवान,
  • सुकुमारौ – सुकुमार,
  • महाबलौ – महाबली,
  • पुण्डरीक-विशालाक्षौ – कमल के सामान विशाल नेत्रों वाले,
  • चीरकृष्णा-जिनाम्बरौ – चीर वस्त्र और कृष्ण मृगचर्म धारी,

18.

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥18॥

  • फलमूलाशिनौ – फल व मूल आहार वाले,
  • दान्तौ – संयमी,
  • तापसौ – तपस्वी,
  • ब्रह्मचारिणौ – ब्रह्मचारी,
  • पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ राम-लक्ष्मणौ – वे रघुश्रेष्ठ दसरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करे

19.

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम।
रक्ष: कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥19॥

  • शरण्यौ सर्वसत्त्वानां – सम्पूर्ण जीवो को शरण देने वाले,
  • श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम – समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और
  • रक्ष: कुलनिहन्तारौ – राक्षस कुल का नाश करने वाले हैं,
  • त्रायेतां नो रघूत्तमौ – वे रघुश्रेष्ठ दसरथकुमार राम हमारी रक्षा करे

20.

आत्तसज्ज-धनुषा-विषुस्पृशा-वक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम॥20॥

  • आत्तसज्ज-धनुषा – जिन्होंने संधान किया हुआ धनुष ले रखा हैं,
  • विषुस्पृशा – जो बाण का स्पर्श कर रहे हैं तथा
  • वक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ – अक्षय बाणों से युक्त तूणीर लिए हुए हैं,
  • रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: (रामलक्ष्मणा अग्रत:) – वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए
  • पथि सदैव गच्छताम – मार्ग में सदा ही मेरे आगे चले

21.

सन्नद्ध: कवची खड़्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च राम: पातु सलक्ष्मण:॥21॥

  • सन्नद्ध: – सर्वदा उद्यत,
  • कवची – कवचधारी,
  • खड़्गी – हाथ में खड्ग लिए,
  • चापबाणधरो – धनुष बाण धारण किये तथा
  • युवा – युवा अवस्था वाले
  • गच्छन्मनोरथान्नश्च (गच्छन मनोरथान्नश्च) – हमारे मनोरथों की रक्षा करें
  • राम: पातु सलक्ष्मण: – भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे -आगे चलकर

(भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे -आगे चलकर हमारे मनोरथों की रक्षा करें)


22 – 23 – 24.

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्लेयो रघूत्तम:॥22॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम:।
जानकीवल्ल्भ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम:॥23॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित:।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशय:॥24॥

(भगवान का कथन हैं कि) राम, दशरथि, शूर, लक्ष्मणानुचर, बलि, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुत्तम, वेदान्तवेद्य,यज्ञेश,पुराण पुरुषोत्तम, जानकी वल्ल्भ, श्रीमान और अप्रमेयपराक्रम – इन नाम का नित्य प्रति श्रद्धा पूर्वक जप करने से मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त करता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं हैं।


25.

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरा:॥25॥

  • रामं दूर्वादल-श्यामं – जो लोग दूर्वादल के समान श्याम वर्ण,
  • पद्माक्षं – कमल नयन,
  • पीतवाससम – पीताम्बरधारी
  • स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न (नामभिर दिव्यै न) – भगवान राम का इन दिव्य नामों से स्तवन करते हैं,
  • ते संसारिणो नरा: – वे संसार चक्र में नहीं पड़ते

26.

रामं लक्ष्मण-पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरं।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम॥
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्ति।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुल-तिलकं राघवं रावणारिम॥26॥

लक्ष्मणजी के पूर्वज, रघुकुल में श्रेष्ठ, सीताजी के स्वामी, अतिसुन्दर, ककुत्स्थ कुलनन्दन, करुणा सागर, गुणनिधान, ब्राह्मणभक्त, परमधार्मिक, राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ पुत्र, श्याम और शांतिमूर्ति, सम्पूर्ण लोको में सुंदर, रघुकुल तिलक, राघव और रावणारी भगवा न राम की मैं वंदना करता /करती हूँ


27.

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथय नाथाय सीताया: पतये नम:॥27॥

  • रामाय रामभद्राय – राम, रामभद्र,
  • रामचन्द्राय वेधसे – रामचन्द्र, विधार्त स्वरूप,
  • रघुनाथय नाथाय – रघुनाथ,
  • सीताया: पतये नम: – प्रभु सीतापति को नमस्कार हैं

28.

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥28॥

  • श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम – हे रघुनन्दन श्रीराम!
  • श्रीराम राम भरताग्रज राम राम – हे भरताग्रज भगवान राम!
  • श्रीराम राम रणकर्कश राम राम – हे रणधीर प्रभु राम!
  • श्रीराम राम शरणं भव राम राम – आप मेरे आश्रय होइये

29.

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥29॥

  • श्रीरामचन्द्र-चरणौ मनसा स्मरामि – मैं श्री राम चन्द्र के चरणों का मन से स्मरण करता हूँ,
  • श्रीरामचन्द्र-चरणौ वचसा गृणामि – श्री रामचन्द्र के चरणों का वाणी से कीर्तन करता हूँ,
  • श्रीरामचन्द्र-चरणौ शिरसा नमामि – श्री रामचन्द्र के चरणों को सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ तथा
  • श्रीरामचन्द्र-चरणौ शरणं प्रपद्ये – श्री रामचन्द्र के चरणों की शरण लेता हूँ

30.

माता रामो मत्पिता रामचन्द्र:,
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र:।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,
जाने नैव जाने न जाने॥30॥

  • माता रामो – राम मेरी माता हैं,
  • मत्पिता रामचन्द्र:, – राम मेरे पिता हैं,
  • स्वामी रामो – राम स्वामी हैं और
  • मत्सखा रामचन्द्र: – राम ही मेरे सखा हैं,
  • सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं (दयालु: नान्यं) – दयामय राम ही मेरे सर्वस्व हैं,
  • जाने नैव जाने न जाने – उनके सिवा और किसी को मैं नहीं जानटा

31.

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य
वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य
तं वन्दे रघुनंदनम॥31॥

  • दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य – जिनकी दायीं और लक्ष्मणजी,
  • वामे च जनकात्मजा – बाएँ और जानकीजी और
  • पुरतो मारुतिर्यस्य – सामने हनुमानजी विराजमान हैं,
  • तं वन्दे रघुनंदनम – उन रघुनाथजी की मैं वंदना करता हूँ

32.

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं
राजीवनेत्र रघुवंशनाथम।
कारुण्यरुपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥32॥

  • लोकाभिरामं – जो सम्पूर्ण लोकों में सुंदर,
  • रनरङ्‌गधीरं – रणक्रीडा में धीर,
  • राजीवनेत्र – कमलनयन,
  • रघुवंश-नाथम – रघुवंश नायक,
  • कारुण्यरुपं – करुणामूर्ति और
  • करुणाकरं तं – करुणा के भंडार हैं,
  • श्रीरामचन्द्रं – उन श्री रामचन्द्र जी की
  • शरणं प्रपद्ये – मैं शरण लेता हूँ

33.

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥33॥

  • मनोजवं – जिनकी मन के सामान गति और
  • मारुत-तुल्यवेगं – वायु के सामान वेग हैं,
  • जितेन्द्रियं – जो परम जितेन्द्रिय और
  • बुद्धिमतां वरिष्ठम – बुद्धिमानो में श्रेष्ठ हैं।
  • वातात्मजं वानरयूथमुख्यं – उन पवननन्दन वानराग्रगण्य
  • श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये – श्री रामदूत की मैं शरण लेता हूँ

34.

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम॥34॥

  • कूजन्तं रामरामेति – राम-राम इस मधुर नाम को कहने वाले
  • मधुरं मधुराक्षरम – मधुर अक्षरो वाले राम, राम मधुर नाम को कहने वाले
  • आरुह्य कविता-शाखां – कवितामयी डाली पर बैठकर
  • वन्दे वाल्मीकि-कोकिलम – वाल्मीकिरूप कोकिल को मैं वंदना करता हूँ

कवितामयी डाली पर बैठकर मधुर अक्षरो वाले राम – राम इस मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकिरूप कोकिल की मैं वंदना करता हूँ


35.

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम॥35॥

  • आपदाम-पहर्तारं – आपत्तियों को हरने वाले तथा
  • दातारं सर्वसम्पदाम – सब प्रकार की सम्पति प्रदान करने वाले
  • लोकाभिरामं श्रीरामं – लोकाभिराम भगवान राम को
  • भूयो भूयो नमाम्यहम – मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ

36.

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम॥36॥

  • भर्जनं भवबीजानामर्जनं (भवबीजानाम अर्जनं) – सम्पूर्ण संसार बीजों को भून डालनेवाला,
  • सुखसम्पदाम – समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति कराने वाला तथा
  • तर्जनं यमदूतानां – यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं
  • रामरामेति गर्जनम – “राम-राम” ऐसा घोष करना

“राम-राम” ऐसा घोष करना सम्पूर्ण संसार बीजों को भून डालनेवाला, समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति कराने वाला तथा यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं


37.

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे,
रामेणाभिहता निशाचरचमू, रामाय तस्मै नम:।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं,
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥37॥

  • रामो राजमणि: – राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी
  • सदा विजयते – सदा विजय को प्राप्त होते हैं
  • रामं रमेशं भजे – मैं लक्ष्मीपति भगवान राम का भजन करता हूँ
  • रामेणाभिहता निशाचरचमू – जिन रामचन्द्रजी ने सम्पूर्ण राक्षस सेना का ध्वंस कर दिया था,
  • रामाय तस्मै नम: – मैं उनको प्रणाम करता हूँ।
  • रामान्नास्ति परायणं – राम से बड़ा और कोई आश्रय नहीं हैं।
  • परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं – मैं उन रामचन्द्रजी का दास हूँ।
  • रामे चित्तलय: सदा भवतु – मेरा चित्त सदा राम में ही लीन रहें;
  • मे भो राम मामुद्धर – हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये

38.

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्र नाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥38॥

  • राम रामेति रामेति – (श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं -) मैं सर्वदा ‘राम राम, राम’
  • रमे रामे मनोरमे – इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही रमण करता हूँ
  • सहस्त्र नाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने – रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के तुल्य हैं

(श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं -) हे सुमुखि! रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के तुल्य हैं। मैं सर्वदा ‘राम-राम, राम ‘इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही रमण करता हूँ

इति श्री बुधकौशिक-मुनि-विरचितं श्री राम रक्षास्तोत्रं सम्पुर्णम्।

Stotra

Ram

श्री रामरक्षा स्तोत्र – अर्थसहित
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शिव ताण्डव स्तोत्र – अर्थसहित

॥शिव ताण्डव स्तोत्रम्॥

1.

जटाटवी गल ज्जल
प्रवाह पावित स्थले
गलेऽव लम्ब्य लम्बितां
भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्।

डमड्डम ड्डमड्डम
निनाद वड्डमर्वयं
चकार चण्ड ताण्डवं
तनोतु नः शिवः शिवम्॥

  • जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धाराएं,
  • उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं,
    • प्रक्षालित अर्थात
    • शुद्ध किया हुआ, साफ किया हुआ,
    • धोया हुआ, धुला हुआ
  • जिनके गले में,
  • बडे एवं लम्बे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा
  • जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर,
  • प्रचण्ड ताण्डव करते हैं,
  • वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

2.

जटा कटाह सम्भ्रम
भ्रम न्निलिम्प निर्झरी
विलोल वीचि वल्लरी
विराज मान मूर्धनि।

धगद् धगद् धग
ज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके
(धगद्धगद्धगज्ज्वललललाटपट्टपावके)
किशोर चन्द्र शेखरे
रतिः प्रतिक्षणं मम॥

  • जिन शिव जी के जटाओं में,
  • अतिवेग से विलास पुर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे,
  • उनके शिश पर लहरा रहीं हैं,
  • जिनके मस्तक पर,
  • अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें,
  • धधक-धधक करके प्रज्वलित हो रहीं हैं,
  • उन बाल चंद्रमा से विभूषित,
  • शिवजी में,
  • मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।
    • शिवजी में मेरी भक्ति,
    • प्रतिक्षण बढ़ती रहे।

3.

धरा धरेन्द्र नंदिनी
विलास बन्धु बन्धुर
स्फुरद्दिगन्त सन्तति
प्रमोद मान मानसे।

कृपा कटाक्ष धोरणी
निरुद्ध दुर्ध रापदि
क्वचिद् दिगम्बरे
(क्वचिद्दिगम्बरे)
मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

  • जो पर्वतराजसुता (पार्वतीजी) के,
  • विलासमय रमणिय कटाक्षों में परम आनन्दित चित्त रहते हैं,
  • जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं
  • प्राणीगण वास करते हैं, तथा
  • जिनके कृपादृष्टि मात्र से,
  • भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं,
  • ऐसे दिगम्बर शिवजी की आराधना से,
  • मेरा चित्त सर्वदा आन्दित रहे।
    • दिगंबर अर्थात
    • आकाश को वस्त्र सामान धारण करने वाले

4.

जटा भुजंग पिंगल
स्फुरत्फणा मणिप्रभा
कदम्ब कुंकुम द्रव
प्रलिप्त दिग्व धूमुखे।

मदान्ध सिन्धुरस् फुरत्
त्वगुत्तरीयमे दुरे
(मदान्ध सिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे)
मनो विनोद मद्भुतं
बिभर्तु भूतभर्तरि॥

  • जिनके जटाओं में,
  • लिपटे सर्पों के फण की मणियों के प्रकाश,
  • पीले वर्ण प्रभा-समुहरूप केसर के कातिं से,
  • दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और
  • जो गजचर्म से विभुषित हैं
  • मैं उन शिवजी की भक्ति में आन्दित रहूँ जो
  • सभी प्राणियों की के आधार एवं रक्षक हैं,

5.

सहस्र लोचन
प्रभृत्य शेष लेख शेखर
प्रसून धूलि धोरणी
विधू सरांघ्रि पीठभूः।

भुजङ्ग राज मालया
निबद्ध जाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां
चकोर बन्धुशेखरः॥

  • जिन शिव जी का चरण,
  • इन्द्र-विष्णु आदि देवताओं के मस्तक के पुष्पों के धूल से रंजित हैं
    • (जिन्हे देवतागण अपने सर के पुष्प अर्पन करते हैं),
  • जिनकी जटा पर,
  • लाल सर्प विराजमान है,
  • वो चन्द्रशेखर,
  • हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

6.

ललाट चत्वर ज्वलद्
धनञ्जय स्फुलिङ्गभा
निपीत पञ्च सायकं
नमन्नि लिम्प नायकम्।

सुधा मयूख लेखया
विराजमान शेखरं
महाकपालि सम्पदे
शिरोजटालमस्तु नः॥

  • जिन शिव जी ने,
  • इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए,
  • कामदेव को,
  • अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से,
  • भस्म कर दिया, तथा
  • जो सभि देवों द्वारा पुज्य हैं, तथा
  • चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं,
  • वे मुझे सिद्दी प्रदान करें।

7.

कराल भाल पट्टिका
धगद् धगद् धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुती कृत
प्रचण्ड पञ्च सायके।

धरा धरेन्द्र नन्दिनी
कुचाग्र चित्रपत्रक
प्रकल्प नैक शिल्पिनि
त्रिलोचने रतिर्मम॥

  • जिनके मस्तक से,
  • धक-धक करती प्रचण्ड ज्वाला ने,
  • कामदेव को भस्म कर दिया तथा
  • जो शिव,
  • प्रकृति पर चित्रकारी करने में अति चतुर है,
  • उन शिव जी में,
  • मेरी प्रीति अटल हो।

8.

नवीन मेघ मण्डली
निरुद्ध दुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथि नीतमः
प्रबन्ध बद्ध कन्धरः।

निलिम्प निर्झरी
धरस्तनोतु कृत्ति सिन्धुरः
कलानिधान बन्धुरः
श्रियं जगद्धुरंधरः॥

  • जिनका कण्ठ,
  • नवीन मेंघों की घटाओं से,
  • परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के सामान काला है,
  • जो कि गज-चर्म, गंगा एवं
  • बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा
  • जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं,
  • वे शिवजी,
  • हमे सभी प्रकार की सम्पनता प्रदान करें।

9.

प्रफुल्ल नील पङ्कज
प्रपञ्च कालिमप्रभा
वलम्बि कण्ठ कन्दली
रुचि प्रबद्ध कन्धरम्।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं
भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांध कच्छिदं
तमन्त कच्छिदं भजे॥

  • जिनका कण्ठ और कन्धा,
  • पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई,
  • सुन्दर श्याम प्रभा से विभुषित है,
  • जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक,
  • संसार के दु:खो को काटने वाले,
  • दक्षयज्ञ विनाशक,
  • गजासुर एवं अन्धकासुर के संहारक हैं तथा
  • जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं,
  • मैं उन शिवजी को भजता हूँ

10.

अखर्व सर्व मङ्गला
कला कदम्ब मञ्जरी
रस प्रवाह माधुरी
विजृम्भणा मधुव्रतम्।

स्मरान्तकं पुरान्तकं
भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त कान्ध कान्तकं
तमन्त कान्तकं भजे॥

  • जो कल्यानमय, अविनाशि,
  • समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं,
  • जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं,
  • त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुर के सहांरक,
  • दक्षयज्ञविध्वसंक तथा
  • स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं,
  • मैं उन शिवजी को भजता हूँ।

11.

जयत् वद भ्रविभ्रम
भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस
(जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस)
द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत्
कराल भाल हव्यवाट्
(द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्)।

धिमि द्धिमि द्धिमि ध्वनन्
मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल
ध्वनि क्रम प्रवर्तित
प्रचण्ड ताण्डवः शिवः॥

  • अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे,
  • सर्पों के फूफकार से,
  • क्रमश: ललाट में बढी हूई प्रचंडअग्नि के मध्य
  • मृदंग की मंगलकारी,
  • धिम-धिम की ध्वनि के साथ
  • ताण्डव नृत्य में लीन,
  • शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं।

12.

स्पृषद्वि चित्र तल्पयो:
भुजङ्ग मौक्ति कस्रजोर्
गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः
सुहृद्वि पक्ष पक्षयोः।

तृणार विन्द चक्षुषोः
प्रजामही महेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा
सदाशिवं भजाम्यहम॥

  • कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या,
  • सर्प एवं मोतियों की मालाओं,
  • बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टूकडों,
  • शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं,
  • तिनकों तथा कमलों पर
  • समान दृष्टि रखने वाले,
  • शिव को मैं भजता हूँ।

13.

कदा निलिम्प निर्झरी
निकुञ्ज कोटरे वसन्
विमुक्त दुर्मतिः सदा
शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।

विलोल लोल लोचनो
ललाम भाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्
कदा सुखी भवाम्यहम्॥

  • कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ,
  • निष्कपट हो, सिर पर अंजली धारण कर
  • चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले,
  • शिवजी का मंत्रोच्चार करते हुए
  • अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा।

14.

इमं हि नित्यमेव मुक्त
मुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो
विशुद्धि मेति संततम्।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु
याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां
सुशङ्करस्य चिंतनम्॥

  • इस उत्त्मोत्त्म शिव ताण्डव स्त्रोत को
  • नित्य पढने या श्रवण करने मात्र से,
  • प्राणि पवित्र हो जाता है, और
  • परमगुरु शिव में स्थापित हो जाता है तथा
  • सभी प्रकार के भ्रमों से,
  • मुक्त हो जाता है।

15.

पूजावसान समये
दशवक्त्रगीतं
यः शम्भु पूजन परं
पठति प्रदोषे।

तस्य स्थिरां
रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं
प्रददाति शम्भुः॥

  • प्रात: शिवपुजन के अंत में
  • इस रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्र के गान से
  • लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा
  • भक्त रथ, गज, घोडा आदि सम्पदा से,
  • सर्वदा युक्त रहता है
  • इति श्रीरावण-कृतम् शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् सम्पूर्णम्

॥शिव ताण्डव स्तोत्रम्॥ – जटाटवीगलज्जल

1.

जटाटवीगलज्जल प्रवाह पावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥


2.

जटाकटाह सम्भ्रम भ्रमन्नि लिम्प निर्झरी
विलोल वीचि वल्लरी विराज मान मूर्धनि।
धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके
(धगद्धगद्धगज्ज्वललललाटपट्टपावके)
किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥


3.

धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुर
स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मान मानसे।
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि
क्वचिद् दिगम्बरे (क्वचिद्दिगम्बरे)
मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥


4.

जटा भुजङ्ग पिङ्गल स्फुरत्फणा मणिप्रभा
कदम्ब कुङ्कुमद्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे।
मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे
(मदान्ध सिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे)
मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥


5.

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर
प्रसून धूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रि पीठभूः।
भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः॥


6.

ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जय स्फुलिङ्गभा
निपीत पञ्चसायकं नमन्नि लिम्पनायकम्।
सुधा मयूख लेखया विराजमान शेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥


7.

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृत प्रचण्डपञ्चसायके।
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक
प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥


8.

नवीन मेघ मण्डली निरुद्ध दुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः।
निलिम्प निर्झरी धरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥


9.

प्रफुल्ल नील पङ्कज प्रपञ्च कालिमप्रभा
वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांध कच्छिदं तमन्त कच्छिदं भजे॥


10.

अखर्व सर्व मङ्गला कला कदम्ब मञ्जरी
रस प्रवाह माधुरी विजृम्भणा मधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त कान्ध कान्तकं तमन्त कान्तकं भजे॥


11.

जयत् वद भ्रविभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस
(जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस)
द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट्
(द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्)।
धिमिद्धिमिद्धिमि ध्वनन् मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल
ध्वनि क्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः॥


12.

स्पृषद्वि चित्रतल्पयो: भुजङ्ग मौक्ति कस्रजोर्
गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि पक्ष पक्षयोः।
तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम॥


13.

कदा निलिम्प निर्झरी निकुञ्ज कोटरे वसन्
विमुक्त दुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।
विलोल लोल लोचनो ललाम भाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥


14.

इमं हि नित्यमेव मुक्त मुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम्॥


15.

पूजावसान समये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः॥

Shiv Stotra

Stotra

शिव ताण्डव स्तोत्र – अर्थसहित