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जय गणेश, जय गणेश देवा – गणेश आरती

1.

जय गणेश, जय गणेश,
जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥


2.

एक दन्त दयावंत,
चार भुजा धारी।
माथे पर तिलक सोहे,
मुसे की सवारी॥


3.

पान चढ़े फुल चढ़े,
और चढ़े मेवा।
लडुवन का भोग लगे,
संत करे सेवा॥


1.

जय गणेश, जय गणेश,
जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥


4.

अंधन को आँख देत,
कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत,
निर्धन को माया॥


5.

सुर श्याम शरण आये,
सफल किजे सेवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥

(Or –
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥)


1.

जय गणेश, जय गणेश,
जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥


श्लोक:

व्रकतुंड महाकाय,
सूर्यकोटी समप्रभाः।
निर्वघ्नं कुरु मे देव,
सर्वकार्येषु सर्वदा॥


ॐ गं गणपतये नमो नमः
श्री सिद्धिविनायक नमो नमः।
अष्टविनायक नमो नमः
गणपति बाप्पा मोरया॥

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Jai Ganesh Jai Ganesh Deva – Ganesh Aarti
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गणपति की सेवा मंगल मेवा – गणपति आरती

1.

गणपति की सेवा मंगल मेवा,
सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैतिस देवता,
द्वार खड़े सब अर्ज करे॥
(Or – तीन लोक के सकल देवता,
द्वार खड़े नित अर्ज करें॥)


2.

ऋद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजे,
अरु आनन्द सों चवर करें।
धूप दीप और लिए आरती,
भक्त खड़े जयकार करें॥


3.

गुड़ के मोदक भोग लगत है,
मुषक वाहन चढ़ा करें।
सौम्यरुप सेवा गणपति की,
विध्न भागजा दूर परें॥


4.

भादों मास और शुक्ल चतुर्थी,
दिन दोपारा पूर परें ।
लियो जन्म गणपति प्रभुजी ने,
दुर्गा मन आनन्द भरें॥


5.

अद्भुत बाजा बजा इन्द्र का,
देव वधू जहँ गान करें।
श्री शंकर के आनन्द उपज्यो,
नाम सुन्या सब विघ्न टरें॥


6.

आन विधाता बैठे आसन,
इन्द्र अप्सरा नृत्य करें।
देख वेद ब्रह्माजी जाको,
विघ्न विनाशक नाम धरें॥


7.

एकदन्त गजवदन विनायक,
त्रिनयन रूप अनूप धरें।
पगथंभा सा उदर पुष्ट है,
देख चन्द्रमा हास्य करें॥


8.

दे श्राप श्री चंद्रदेव को,
कलाहीन तत्काल करें।
चौदह लोक मे फिरे गणपति,
तीन भुवन में राज्य करें॥


9.

गणपति की पूजा पहले करनी,
काम सभी निर्विघ्न सरें।
श्री प्रताप गणपतीजी को,
हाथ जोड स्तुति करें॥


1.

गणपति की सेवा मंगल मेवा,
सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैतिस देवता,
द्वार खड़े सब अर्ज करे॥
(तीन लोक के सकल देवता,
द्वार खड़े नित अर्ज करें॥)


श्लोक –

व्रकतुंड महाकाय, सूर्यकोटी समप्रभः।
निर्वघ्नं कुरु मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा॥


ॐ गं गणपतये नमो नमः
श्री सिद्धिविनायक नमो नमः।
अष्टविनायक नमो नमः
गणपति बाप्पा मोरया॥

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Ganpati Ki Seva, Mangal Meva – Shri Ganesh Aarti
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सुखकर्ता दुखहर्ता – जय देव, जय मंगलमूर्ती

1.

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची॥

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
जय देव, जय देव


जय देव, जय देव,
जय मंगलमूर्ती, हो श्री मंगलमूर्ती
दर्शनमात्रे मन कामनापु्र्ती
जय देव, जय देव


2.

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुम केशरा॥

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥
जय देव, जय देव


जय देव, जय देव,
जय मंगलमूर्ती, हो श्री मंगलमूर्ती
दर्शनमात्रे मन कामनापु्र्ती
जय देव, जय देव


3.

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।
सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावें, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना॥
जय देव, जय देव


जय देव, जय देव,
जय मंगलमूर्ती, हो श्री मंगलमूर्ती
दर्शनमात्रे मन कामनापु्र्ती
जय देव, जय देव


4.

घालीन लोटांगण, वंदिन चरण।
डोळ्यांनी पाहिन रूप तुझे।
प्रेमे आलिंगीन आनंदे पुजिन।
भावें ओवाळिन म्हणे नामा॥


5.

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव॥
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्व मम देवदेव॥


6.

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा,
बुध्दात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि॥


7.

अच्युतं केशवं रामनारायणं,
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरि।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं,
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥


8.

हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

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सुखकर्ता दुखहर्ता – जय देव, जय मंगलमूर्ती
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गणेश जी की कथा – खीर

गणेश जी की खीर वाली कहानी

गणेशजी पृथ्वी लोक आते है

ॐ श्री गणेशाय नमः

  • एक बार गणेश जी,
  • भक्तों की परीक्षा लेने के लिए,
  • एक बालक का रूप धर कर,
  • पृथ्वी लोक आते हैं।

भक्तों की परीक्षा

भगवान गणेश, लोगो से, खीर बनाने के लिए कहते है

  • एक चम्मच दूध, और
  • एक चुटकी चावल लेकर,
  • लोगों के पास जाते है, और
  • उनसे दूध एवं चावल की,
  • खीर बनाने के लिए कहते हैं।
  • एक चुटकी चावल और थोडे से दूध की,
  • खीर बनाने की बात सुनकर,
  • लोग उन पर हंसने लगते हैं।
  • बहुत भटकने के बाद भी,
  • कोई खीर बनाने के लिए राज़ी नहीं होता है।

बुढ़िया खीर बनाने के लिए राजी होती है

  • आखिर एक गांव में,
  • एक बुढ़िया को उन पर दया आती है और
  • वह बोलती है –
  • ला बेटा, मैं बना देती हूं खीर।
  • ऐसा कह कर,
  • वह एक छोटी कटोरी ले कर आती हैं।
  • यह देख बालक बोला –
  • अरे मां, इस कटोरी से क्या होगा,
  • कोई बड़ा बर्तन लेकर आओ।
  • बच्चे का मन रखने के लिए,
  • बुढ़िया बड़ा बर्तन ले आती हैं।
  • अब बालक उसमें,
  • चावल और दूध उंडेलता हैं।

गांव वालों को खीर खाने का निमंत्रण

  • देखते ही देखते वह बर्तन भर जाता है और
  • उसके बाद भी चुटकी भर चावल और
  • चम्मच भर दूध खत्म नहीं होता।
  • बुढ़िया एक एक कर घर के सारे बर्तन ले आती हैं।
  • सब बर्तन भर जाते है,
  • लेकिन चुटकी भर चावल और
  • चम्मच भर दूध खत्म नहीं होता।
  • तब बालक बुढ़िया से कहता है कि,
  • वह खीर बनाने के लिए सामग्री को,
  • चूल्हे पर चढ़ा दें,
  • तथा गांव में जाए और
  • सबको खाना खाने का निमंत्रण देकर आए।
  • जब खीर बन जाए,
  • तो उसे भी बुला लेना।
  • बुढ़िया वैसा ही करती हैं।

फिर भी खीर बच जाती है

  • सारा गांव आता है और
  • खीर खाकर चला जाता है
  • लेकिन,
  • उसके बाद भी खीर बच जाती हैं।
  • बुढ़िया पूछती है कि,
  • वह इसका क्या करें?
  • तब बालक ने कहा कि,
  • इस खीर को घर के चारों कौनों में,
  • बर्तन सहित उलट कर ढक दें ,और
  • सुबह तक ऐसे ही रहने दे।

गणपतिजी की बुढ़िया पर कृपा

  • सुबह बुढ़िया बर्तन उठाकर देखती है तो,
  • हीरे जवाहरात नज़र आते हैं।
  • इस तरह,
  • जैसे भगवान गणेश ने,
  • बुढ़िया पर कृपा बनाई,
  • वैसे ही वह सब भक्तों पर कृपा बनाए रखें।

गणेश जी की कथाएं


Ganesh ji ki aarti

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Ganeshji ki Katha - Kheer | Ganesh ji ki Kheer Wali Kahani
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श्री गणेश चालीसा – जय जय गणपति गणराजू

दोहा:
जय गणपति सदगुणसदन,
कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण,
जय जय गिरिजालाल॥


1.

जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥

2.

जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व-विनायक बुद्घि विधाता॥


3.

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

4.

राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥


5.

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

6.

सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥


7.

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व-विख्याता॥

8.

ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥


9.

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥

10.

एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥


11.

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहूँच्यो तुम धरि द्विज रुपा॥

12.

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥


13.

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

14.

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला।
बिना गर्भ धारण, यहि काला॥


15.

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥

16.

अस कहि अन्तर्धान रुप है।
पलना पर बालक स्वरुप है॥


17.

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

18.

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥


19.

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥

20.

लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥


21.

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥

22.

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥


23.

कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥

24.

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥


25.

पडतहिं, शनि दृगकोण प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

26.

गिरिजा गिरीं विकल है धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥


27.

हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥

28.

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटि चक्र सो गजशिर लाये॥


29.

बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

30.

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वर दीन्हे॥


31.

बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

32.

चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥


33.

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

34.

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥


35.

तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥

36.

मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥


37.

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥

38.

अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥


39.

श्री गणेश यह चालीसा।
पाठ करै धर ध्यान॥

40.

नित नव मंगल गृह बसै।
लहै जगत सन्मान॥


दोहा:
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश,
ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो,
मंगल मूर्ति गणेश॥

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श्री गणेश चालीसा – जय जय गणपति गणराजू
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आरती गजवदन विनायक की

1.

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥


2.

एकदंत, शशिभाल, गजानन,
विघ्नविनाशक, शुभगुण कानन,
शिवसुत, वन्द्यमान-चतुरानन,
दु:खविनाशक, सुखदायक की॥

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥


3.

ऋद्धि-सिद्धि स्वामी समर्थ अति,
विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति,
अघ-वन-दहन, अमल अविगत गति,
विद्या, विनय-विभव दायक की॥

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥


4.

पिंगलनयन, विशाल शुंडधर,
धूम्रवर्ण, शुचि वज्रांकुश-कर,
लम्बोदर, बाधा-विपत्ति-हर,
सुर-वन्दित सब विधि लायक की॥

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥


5.

आरती गजवदन विनायक की।
सुर मुनि-पूजित गणनायक की॥

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Aarti Gajvadan Vinayak Ki - Ganesh Aarti
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गणेशजी की कथा – बुढ़िया और राजा

ॐ श्री गणेशाय नमः

  • बहुत पुरानी बात है।
  • एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी।
  • वह गणेश जी की भक्त थी।
  • लेकिन, उसकी बहु को यह पसंद नहीं था।

बुढ़िया, लोगो से, गणपतिजी की, मूर्ति बनाने को कहती है

  • एक दिन बहु ने पूजा स्थल पर रखी,
  • गणेश जी की प्रतिमा को उठाकर कुएं में फेंक दिया।
  • बुढ़िया बहुत दुखी हुई।
  • वह गांव छोड़ कर चली गई।
  • रास्ते में जो भी उसे मिला,
  • उससे वह गणेश जी की मूर्ति बनाने को कहती।
  • उसकी किसी ने नहीं सुनी।

कारीगर मूर्ति बनाने से इंकार कर देता है

  • वह चलते चलते राजा के महल के बाहर पहुंच जाती है।
  • वहां देखती है कि,
  • एक कारीगर,
  • महल बना रहा हैं।
  • बुढ़िया ने उस कारीगर से,
  • मूर्ति बनाने को कहा।
  • लेकिन, कारीगर ने भी मना कर दिया।
  • उसने बुढ़िया का अपमान कर उसे वहां से भगा दिया।

महल टेढ़ा हो जाता है

  • बुढ़िया वहां से चली जाती है,
  • लेकिन, महल टेढ़ा हो जाता है।
  • कारीगर यह देखकर परेशान हो जाता है।
  • वह इसकी वज़ह समझ नहीं पाता।
  • वह राजा के पास जाता है और
  • कहता है की बुढ़िया के जाने के बाद ही,
  • महल टेढ़ा हो गया।

गणेश भक्त राजा

  • राजा भी गणेश जी के भक्त थे।
  • वह अपने सेवकों से,
  • बुढ़िया को,
  • महल में बुलवाते है, और
  • कहते हैं कि
  • मैं तुम्हारे लिए,
  • गणेश जी का मन्दिर बनवाउंगा।
  • राजा ने गणेश जी का मन्दिर बनवा दिया।

भगवान् गणेशजी की, राजा और बुढ़िया पर कृपा

  • मंदिर के बनते ही राजा का महल सीधा हो गया।
  • इस तरह, जैसे भगवान गणेश ने,
  • राजा और बुढ़िया पर कृपा बनाई,
  • वैसे ही वह सब भक्तों पर कृपा बनाए रखें।

गणेश जी की कथाएं


Ganesh ji ki aarti


व्रत और त्यौहार कथा

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Ganeshji ki Katha - Budhiya aur Raja
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करवा चौथ व्रत कथा

करवा चौथ व्रत कथा -1

  • बहुत समय पहले की बात है,
  • एक साहूकार के सात बेटे और
  • उनकी एक बहन करवा थी।
  • सभी सातों भाई,
  • अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे।
  • यहां तक कि,
  • वे पहले उसे खाना खिलाते और
  • बाद में स्वयं खाते थे।

  • एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।
  • शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए,
  • तो देखा,
  • उनकी बहन बहुत व्याकुल थी।
  • सभी भाई खाना खाने बैठे, और
  • अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे।
  • लेकिन बहन ने बताया कि,
  • उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है, और
  • वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर,
  • उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है।
  • चूंकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है,
  • इसलिए,
  • वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

  • सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती, और
  • वह दूर पीपल के पेड़ पर,
  • एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है।
  • दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि
  • जैसे चतुर्थी का चांद उदित हो रहा हो।
  • इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि
  • चांद निकल आया है,
  • तुम उसे अर्घ्य देने के बाद,
  • भोजन कर सकती हो।
  • बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर,
  • चांद को देखती है,
  • उसे अर्घ्‍य देकर,
  • खाना खाने बैठ जाती है।

  • वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है तो
  • उसे छींक आ जाती है।
  • दूसरा टुकड़ा डालती है तो
  • उसमें बाल निकल आता है, और
  • जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश करती है,
  • तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है।
  • वह बौखला जाती है।

  • उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि,
  • उसके साथ ऐसा क्यों हुआ।
  • करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण,
  • देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
  • सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि,
  • वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी, और
  • अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी।
  • वह पूरे एक साल तक,
  • अपने पति के शव के पास बैठी रहती है।
  • उसकी देखभाल करती है।
  • उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को,
  • वह एकत्रित करती जाती है।

  • एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है।
  • उसकी सभी भाभियां करवा चौथ का व्रत रखती हैं।
  • जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से –
  • ‘यम सूई ले लो,
  • पिय सूई दे दो,
  • मुझे भी अपनी जैसी,
  • सुहागिन बना दो’
  • ऐसा आग्रह करती है,
  • लेकिन हर बार, भाभी,
  • उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
  • इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है,
  • तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है।
  • यह भाभी उसे बताती है कि,
  • चूंकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था।
  • अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि,
  • वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है,
  • इसलिए जब वह आए,
  • तो तुम उसे पकड़ लेना, और
  • जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे,
  • उसे नहीं छोड़ना।
  • ऐसा कह कर वह चली जाती है।

  • सबसे अंत में छोटी भाभी आती है।
  • करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है,
  • लेकिन वह टालमटोली करने लगती है।
  • इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है, और
  • अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है।
  • भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है,
  • खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।
  • अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है, और
  • अपनी छोटी अंगुली को चीरकर,
  • उसमें से अमृत उसके पति के मुंह में डाल देती है।
  • करवा का पति तुरंत,
  • श्रीगणेश – श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है।

  • इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से,
  • करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है।
  • हे श्री गणेश- मां गौरी,
  • जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है,
  • वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

गणेशजी की कथा

  • करवा चौथ में इस कथा के बाद पढ़े जाने वाली श्री गणेश जी की कथा के लिए क्लिक करें –

गणेशजी की आरती


करवा चौथ व्रत कथा -2

  • एक समय की बात है कि,
  • एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री,
  • अपने पति के साथ,
  • नदी के किनारे के गाँव में रहती थी।
  • एक दिन उसका पति,
  • नदी में स्नान करने गया।
  • स्नान करते समय,
  • वहाँ एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया।
  • वह मनुष्य करवा-करवा कह के अपनी पत्नी को पुकारने लगा।
  • उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी चली आई, और
  • आकर मगर को कच्चे धागे से बाँध दिया।
  • मगर को बाँधकर यमराज के यहाँ पहुँची, और
  • यमराज से कहने लगी –
  • हे भगवन!
  • मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है।
  • उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में,
  • आप अपने बल से नरक में ले जाओ।
  • यमराज बोले –
  • अभी मगर की आयु शेष है,
  • अतः मैं उसे नहीं मार सकता।
  • इस पर करवा बोली –
  • अगर आप ऐसा नहीं करोगे,
  • तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी।
  • सुनकर यमराज डर गए, और
  • उस पतिव्रता करवा के साथ आकर,
  • मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु दी।
  • हे करवा माता!
  • जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

करवा चौथ व्रत कथा – 3

  • एक बार पांडु पुत्र अर्जुन,
  • तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए।
  • इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं।
  • उनकी कोई खबर न मिलने पर,
  • उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया, और
  • अपनी चिंता व्यक्त की।
  • कृष्ण भगवान ने कहा –
  • बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार,
  • माता पार्वती ने शंकरजी से किया था।
  • तब शंकरजी ने माता पार्वती को,
  • करवा चौथ का व्रत बतलाया।
  • इस व्रत को करने से,
  • स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा,
  • हर आने वाले संकट से,
  • वैसे ही कर सकती हैं,
  • जैसे एक ब्राह्मण ने की थी।
  • प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था।
  • उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
  • एक बार लड़की मायके में थी,
  • तब करवा चौथ का व्रत पड़ा।
  • उसने व्रत को विधिपूर्वक किया।
  • पूरे दिन निर्जला रही।
  • कुछ खाया-पीया नहीं।
  • पर उसके चारों भाई परेशान थे कि,
  • बहन को प्यास लगी होगी,
  • भूख लगी होगी, और
  • बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।
  • भाइयों से न रहा गया।
  • उन्होंने शाम होते ही, बहन को,
  • बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया।
  • एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया, और
  • दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी।
  • तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी –
  • देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है,
  • पूजन कर भोजन ग्रहण करो।
  • बहन ने भोजन ग्रहण किया।
  • भोजन ग्रहण करते ही,
  • उसके पति की मृत्यु हो गई।
  • अब वह दुःखी हो,
  • विलाप करने लगी।
  • तभी वहाँ से रानी इंद्राणी जा रही थीं।
  • उनसे उसका दुःख न देखा गया।
  • ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए, और
  • अपने दुःख का कारण पूछा।
  • तब इंद्राणी ने बताया –
  • तूने बिना चंद्र दर्शन किए,
  • करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
  • अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत,
  • नियमपूर्वक करना,
  • तो तेरा पति जीवित हो जाएगा।
  • उसने इंद्राणी के कहे अनुसार,
  • चौथ व्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई।
  • इसलिए प्रत्येक स्त्री को,
  • अपने पति की दीर्घायु के लिए,
  • यह व्रत करना चाहिए।
  • द्रोपदी ने यह व्रत किया, और
  • अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए।
  • तभी से हिन्दू महिलाएँ,
  • अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं।

करवा चौथ व्रत कथा – 4

  • इस कथा का सार यह है कि
  • शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने,
  • करवा चौथ का व्रत किया था।
  • नियमानुसार, उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था,
  • परंतु उससे भूख नहीं सही गई और
  • वह व्याकुल हो उठी।
  • उसके भाइयों से,
  • अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई, और
  • उन्होंने पीपल की आड़ में,
  • आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर,
  • चंद्रोदय दिखा दिया,
  • और वीरवती को भोजन करा दिया।
  • परिणाम यह हुआ कि
  • उसका पति तत्काल अदृश्य हो गया।
  • अधीर वीरवती ने,
  • बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा, और
  • करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से,
  • उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।

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Karwa Chauth Vrat Katha - 4 कथाएं