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अम्बे तू है जगदम्बे काली

1.

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गायें भारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


2.

तेरे भक्त जनों पे माता,
भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पडो माँ,
करके सिंह सवारी॥

सौ सौ सिंहों से तु बलशाली,
अष्ट भुजाओं वाली।
दुष्टों को पल में संहारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


3.

माँ बेटे का है इस जग में,
बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सूने हैं पर,
ना माता सुनी कुमाता॥

सब पे करुणा बरसाने वाली,
अमृत बरसाने वाली।
दुखियों के दुखडे निवारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


4.

नहीं मांगते धन और दौलत,
ना चाँदी, ना सोना।
हम तो मांगे माँ तेरे मन में,
इक छोटा सा कोना॥

सबकी बिगडी बनाने वाली,
लाज बचाने वाली।
सतियों के सत को संवारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


1.

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गायें भारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥

ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥

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Ambe Tu Hai Jagdambe Kali
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जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी

1.

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिव री॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


2.

मांग सिंदूर बिराजत,
टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना,
चंद्रवदन नीको॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


3.

कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजै।
रक्त-पुष्प गल माला,
कंठन पर साजै॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


4.

केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर मुनि-जन सेवत,
तिनके दुःखहारी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


5.

कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर,
राजत सम ज्योति॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


6.

शुम्भ निशुम्भ बिदारे,
महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना,
निशिदिन मदमाती॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


7.

चण्ड मुण्ड संहारे,
शोणितबीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे,
सुर भयहीन करे॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


8.

ब्रम्हाणी रुद्राणी,
तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


9.

चौंसठ योगिनि गावत,
नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा,
औ बाजत डमरू॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


10.

तुम ही जगकी माता,
तुम ही हो भरता।
भक्तनकी दुःख हरता,
सुख सम्पति करता॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


11.

भुजा चार अति शोभित,
खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत,
सेवत नर नारी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


12.

कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती।
(श्री) मालकेतुमें राजत,
कोटिरतन ज्योति॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


13.

(श्री) अम्बेजी की आरती,
जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी,
सुख सम्पत्ति पावै॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


1.

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिव री॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥

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Jai Ambe Gauri – Ambe Maa Ki Aarti
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ॐ जय लक्ष्मी माता – लक्ष्मी जी की आरती

1.

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम को निश दिन सेवत,
मैय्याजी को निस दिन सेवत,
हर-विष्णु-धाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


2.

उमा, रमा, ब्रह्माणी,
तुम ही जग-माता,
मैया, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता॥
॥ओम जय लक्ष्मी माता॥


3.

दुर्गा रूप निरंजनि,
सुख-सम्पति दाता,
मैया, सुख-सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्याता,
ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
॥ओम जय लक्ष्मी माता॥


4.

तुम पाताल निवासिनी,
तुम ही शुभ दाता,
मैया, तुम ही शुभ दाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी,
भव निधि की त्राता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


5.

जिस घर तुम रहती,
सब सद्‍गुण आता,
मैया, सब सद्‍गुण आता।
सब संभव हो जाता,
मन नहीं घबराता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


6.

तुम बिन यज्ञ न होवे (होते) ,
वस्त्र न कोई पाता,
मैया, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव,
सब तुमसे आता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


7.

शुभ गुण मंदिर सुंदर,
क्षीरोदधि जाता,
मैया, क्षीरोदधि जाता।
रत्न-चतुर्दश तुम बिन,
कोई नहीं पाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


8.

महालक्ष्मी(जी) की आरती,
जो कोई नर गाता,
मैया, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता,
पाप उतर जाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


1.

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम को निश दिन सेवत,
हर-विष्णु-धाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥

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Om Jai Laxmi Mata – Laxmi Aarti
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जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय

1.

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


2.

तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


3.

आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


4.

अविकारी, अघहारी, सकल कलाधारी।
कर्ता विधि भर्ता हरि हर संहारकारी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


5.

तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


6.

राम, कृष्ण, तू सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वाँछा कल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


7.

दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


8.

तू परधाम निवासिनि, महा-विलासिनि तू।
तू ही शमशान विहारिणि, ताण्डव लासिनि तू॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


9.

सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी धारा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


10.

तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


11.

मूलाधार निवासिनि, इहपर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वर दे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


12.

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले वेदत्रयी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


13.

हम अति दीन दुखी माँ, विपट जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


14.

निज स्वभाववश जननी, दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी, चरण शरण दीजै॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


15.

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

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Chalisa

Jag Janani Jai Jai Maa - Maa Durga Aarti
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दुर्गा चालीसा – नमो नमो दुर्गे सुख करनी

1.

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

2.

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥


3.

शशि ललाट, मुख महाविशाला।
नेत्र लाल, भृकुटि विकराला॥

4.

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥


5.

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥

6.

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥


7.

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

8.

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥


9.

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥


10.

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥

11.

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥


12.

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥

13.

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥


14.

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥

15.

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

16.

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥


17.

केहरि वाहन सोहे भवानी।
लंगुर वीर चलत अगवानी॥

18.

कर में खप्पर खड्ग विराजे।
जाको देख काल डर भाजे॥


19.

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

20.

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत॥


21.

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥

22.

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥


23.

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

24.

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥


25.

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥

26.

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥


27.

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

28.

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥


29.

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

30.

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥


31.

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

32.

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥


33.

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

34.

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥


35.

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

36.

आशा तृष्णा निपट सतावें।
मोह मदादिक सब बिनशावें॥


37.

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

38.

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥


39.

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥

40.

श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥


41.

देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥


1.

दुर्गति नाशिनि दुर्गा जय जय,
काल विनाशिनि काली जय जय।
उमा रमा ब्रह्माणि जय जय,
राधा-सीता-रुक्मिणि जय जय॥


2.

जय जय दुर्गा, जय माँ तारा।
जय गणेश, जय शुभ-आगारा॥
जयति शिवा-शिव जानकि-राम।
गौरी-शंकर सीताराम॥

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दुर्गा चालीसा – नमो नमो दुर्गे सुख करनी
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भोर भई दिन चढ़ गया – माँ वैष्णो देवी आरती

1.

भोर भई दिन चढ़ गया, मेरी अम्बे
हो रही जय जय कार मंदिर विच
आरती जय माँ
हे दरबारा वाली, आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली आरती जय माँ


2.

काहे दी मैया तेरी, आरती बनावा
काहे दी मैया तेरी, आरती बनावा
काहे दी पावां विच, बाती मंदिर विच
आरती जय माँ

सुहे चोलेयाँवाली आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली आरती जय माँ


3.

सर्व सोने दी तेरी, आरती बनावा
सर्व सोने दी तेरी, आरती बनावा
अगर कपूर पावां, बाती मंदिर विच
आरती जय माँ

हे माँ पिंडी रानी, आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली, आरती जय माँ


4.

कौन सुहागन दिवा, बालेया मेरी मैया
कौन सुहागन दिवा, बालेया मेरी मैया
कौन जागेगा सारी, रात मंदिर विच
आरती जय माँ

सच्चियाँ ज्योतां वाली, आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली, आरती जय माँ


5.

सर्व सुहागिन दिवा, बालेया मेरी मैया
सर्व सुहागिन दिवा, बालेया मेरी मैया
ज्योत जागेगी सारी रात मंदिर विच
आरती जय माँ

हे माँ त्रिकुटा रानी, आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली, आरती जय माँ


6.

जुग जुग जीवे तेरा, जम्मुए दा राजा
जुग जुग जीवे तेरा, जम्मुए दा राजा
जिस तेरा भवन बनाया मंदिर विच
आरती जय माँ

हे मेरी अम्बे रानी, आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली, आरती जय माँ


7.

सिमर चरण तेरा, ध्यानु यश गावें
जो ध्यावे सो, यो फल पावे
रख बाणे वाली, लाज मंदिर विच
आरती जय माँ

सोहनेया मंदिरां वाली आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली आरती जय माँ


1.

भोर भई दिन चढ़ गया, मेरी अम्बे
भोर भई दिन चढ़ गया, मेरी अम्बे
हो रही जय जयकार मंदिर विच
आरती जय माँ

हे दरबारा वाली, आरती जय माँ
हे पहाड़ा वाली आरती जय माँ

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भोर भई दिन चढ़ गया – माँ वैष्णो देवी आरती
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जय सन्तोषी माता – सन्तोषी माता आरती

1.

जय सन्तोषी माता,
मैया सन्तोषी माता।
अपने सेवक जन की,
सुख सम्पत्ति दाता॥
॥जय सन्तोषी माता॥


2.

सुन्दर चीर सुनहरी,
माँ धारण कीन्हों।
हीरा पन्ना दमके,
तन श्रृंगार कीन्हों॥
॥जय सन्तोषी माता॥


3.

गेरू लाल छटा छवि,
बदन कमल सोहे।
मन्द हंसत करुणामयी,
त्रिभुवन मन मोहे॥
॥जय सन्तोषी माता॥


4.

स्वर्ण सिंहासन बैठी,
चंवर ढुरें प्यारे।
धूप दीप मधुमेवा,
भोग धरें न्यारे॥
॥जय सन्तोषी माता॥


5.

गुड़ अरु चना परमप्रिय,
ता मे संतोष कियो।
सन्तोषी कहलाई,
भक्तन वैभव दियो॥
॥जय सन्तोषी माता॥


6.

शुक्रवार प्रिय मानत,
आज दिवस सोही।
भक्त मण्डली छाई,
कथा सुनत मोही॥
॥जय सन्तोषी माता॥


7.

मंदिर जगमग ज्योति,
मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम सेवक,
चरनन सिर नाई॥
॥जय सन्तोषी माता॥


8.

भक्ति भावमय पूजा,
अंगीकृत कीजै।
जो मन बसै हमारे,
इच्छा फल दीजै॥
॥जय सन्तोषी माता॥


9.

दुखी, दरिद्री, रोगी,
संकट मुक्त किये।
बहु धन-धान्य भरे घर,
सुख सौभाग्य दिये॥
॥जय सन्तोषी माता॥


10.

ध्यान धर्यो जिस जन ने,
मनवांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर,
घर आनन्द आयो॥
॥जय सन्तोषी माता॥


11.

शरण गहे की लज्जा,
रखियो जगदम्बे।
संकट तू ही निवारे,
दयामयी अम्बे॥
॥जय सन्तोषी माता॥


12.

सन्तोषी माता की आरती,
जो कोई जन गावे।
ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति,
जी भरकर पावे॥
॥जय सन्तोषी माता॥


1.

जय सन्तोषी माता,
मैया सन्तोषी माता।
अपने सेवक जन की,
सुख सम्पत्ति दाता॥
॥जय सन्तोषी माता॥

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Jai Santoshi Mata - Santoshi Mata ki Aarti
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दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी

1.

दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी।
अनाथ नाथे अम्बे करुणा विस्तारी।
वारी वारी जन्म मरणांते वारी।
हारी पडलो आता संकट निवारी॥
॥जय देवी जय देवी॥


2.

जय देवी, जय देवी, महिषासुरमथिनी।
सुरवर ईश्वर वरदे तारक संजीवनी॥
॥जय देवी, जय देवी॥


3.

त्रिभुवन-भुवनी पाहता तुज ऐसी नाही।
चारी श्रमले परन्तु न बोलवे काही।
साही विवाद करिता पडले प्रवाही।
ते तू भक्तालागी पावसि लवलाही॥
॥जय देवी, जय देवी॥


4.

जय देवी, जय देवी, महिषासुर-मथिनी।
सुरवर ईश्वर वरदे तारक संजीवनी॥
॥जय देवी, जय देवी॥


5.


प्रसन्न वदने प्रसन्न होसी निजदासा।
क्लेशांपासुनि सोडवि तोडी भवपाशा।
अम्बे तुजवाचून कोण पुरविल आशा।
नरहरी तल्लिन झाला पदपंकजलेशा॥
॥जय देवी जय देवी॥


6.

जय देवी, जय देवी, महिषासुरमथिनी।
सुरवर ईश्वर वरदे तारक संजीवनी॥
॥जय देवी, जय देवी॥


7.

दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी।
अनाथ नाथे अम्बे करुणा विस्तारी।
॥जय देवी जय देवी॥

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दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी
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मंगल की सेवा सुन मेरी देवा – कालीमाता की आरती

1.

मंगल की सेवा सुन मेरी देवा,
हाथ जोड तेरे द्वार खडे।
पान सुपारी ध्वजा नारियल
ले ज्वाला तेरी भेट धरे॥


2.

सुन जगदम्बे न कर विलम्बे,
संतन के भडांर भरे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥


3.

बुद्धि विधाता तू जग माता,
मेरा कारज सिद्व करे।
चरण कमल का लिया आसरा,
शरण तुम्हारी आन पडे॥


4.

जब जब भीड पडी भक्तन पर,
तब तब आप सहाय करे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशाली,
जय काली कल्याण करे॥


5.

गुरु के वार सकल जग मोहयो,
तरुणी रूप अनूप धरे।
माता होकर पुत्र खिलावे,
कही भार्या भोग करे॥


6.

शुक्र सुखदाई सदा सहाई,
संत खडे जयकार करे।
सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥


7.

ब्रह्मा विष्णु महेश फल लिये,
भेट देन तेरे द्वार खडे।
अटल सिहांसन बैठी मेरी माता,
सिर सोने का छत्र फिरे॥


8.

वार शनिचर कुकम बरणो,
जब लुंकड़ पर हुकुम करे।
सन्तन प्रतिपाली सदा खुशाली,
जै काली कल्याण करे॥


9.

खड्ग खप्पर त्रिशुल हाथ लिये,
रक्त बीज को भस्म करे।
शुम्भ निशुम्भ को क्षण में मारे,
महिषासुर को पकड दले॥
(रक्त बीज, शुम्भ निशुम्भ और महिषासुर वध के बारे में विस्तार से जानने के लिए – दुर्गा सप्तशती अर्थसहित पढ़े – दुर्गा सप्तशती)


10.

आदित वारी आदि भवानी,
जन अपने को कष्ट हरे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥


11.

कुपित होकर दानव मारे,
चण्डमुण्ड सब चूर करे।
जब तुम देखी दया रूप हो,
पल में सकंट दूर करे॥


12.

सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता,
जन की अर्ज कबूल करे।
सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥


13.

सात बार की महिमा बरनी,
सब गुण कौन बखान करे।
सिंह पीठ पर चढी भवानी,
अटल भवन में राज्य करे॥


14.

दर्शन पावे मंगल गावे,
सिद्ध साधक तेरी भेट धरे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥


15.

ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे,
शिव शंकर हरी ध्यान धरे।
इन्द्र कृष्ण तेरी करे आरती,
चंवर कुबेर डुलाय रहे॥


16.

जय जननी जय मातु भवानी,
अटल भवन में राज्य करे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥


1.

मंगल की सेवा सुन मेरी देवा,
हाथ जोड तेरे द्वार खडे।
पान सुपारी ध्वजा नारियल
ले ज्वाला तेरी भेट धरे॥


2.

सुन जगदम्बे न कर विलम्बे,
संतन के भडांर भरे।
संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली,
जय काली कल्याण करे॥

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मंगल की सेवा सुन मेरी देवा – कालीमाता की आरती
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श्री लक्ष्मी चालीसा

॥दोहा॥

1.


मातु लक्ष्मी करि कृपा,
करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि,
पुरवहु मेरी आस॥

2.

यही मोर अरदास,
हाथ जोड़ विनती करूँ।
सब विधि करौ सुवास,
जय जननि जगदंबिका॥

ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः


श्री लक्ष्मी चालीसा

1.

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।
ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥

2.

तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरबहु आस हमारी॥


3.

जय जय जय जननि जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥

4.

तुम ही हो सब घट घट की वासी।
विनती यही हमारी खासी॥


5.

जग जननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥

6.

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥


7.

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

8.

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी।
जगजननी विनती सुन मोरी॥


9.

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥

10.

क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिंधु में पायो॥


11.

चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥

12.

जब जब जन्म प्रभु जहां लीन्हा।
रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥


13.

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

14.

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥


15.

अपनाया तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

16.

तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥


17.

मन क्रम वचन करै सेवकाई।
मन- इच्छित वांछित फल पाई॥

18.

तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भांति मन लाई॥


19.

और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करे मन लाई॥

20.

ताको कोई कष्ट न होई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥


21.

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

22.

जो यह पढ़े और पढ़ावे।
ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥


23.

ताको कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥

24.

पुत्रहीन अरु सम्पति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥


25.

विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥

26.

पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीशा॥


27.

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥

28.

बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥


29.

प्रतिदिन पाठ करै मन माही।
उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥

30.

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥


31.

करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

32.

जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी ॥


33.

तुम्हारो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥

34.

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥


35.

भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दीजै दशा निहारी॥

36.

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अक्षत दुःख सहते भारी॥


37.

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥

38.

रुप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥


39.

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई ॥

40.

रामदास अब कहाई पुकारी।
करो दूर तुम विपति हमारी॥


॥दोहा॥

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी,
हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी,
करो दुश्मन का नाश॥

रामदास धरि ध्यान नित,
विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर,
करहु दया की कोर॥

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श्री लक्ष्मी चालीसा
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जय जय सरस्वती माता – माँ सरस्वती आरती

1.

जय सरस्वती माता,
जय जय सरस्वती माता।
सद्दग़ुण वैभव शालिनि,
त्रिभुवन विख्याता॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


2.

चंद्रवदनि पद्मासिनि,
द्युति (छवि) मंगलकारी,
मैया द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी,
अतुल तेजधारी॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


3.

बाएं कर में वीणा,
दाएं कर माला,
मैया दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे,
गल मोतियन माला॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


4.

देवी शरण जो आए,
उनका उद्धार किया,
मैया उनका उद्धार किया।
पैठि मंथरा दासी,
रावण संहार किया॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


5.

विद्या ज्ञान प्रदायिनि,
ज्ञान प्रकाश भरो।
मैया ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह, अज्ञान और तिमिर का,
जग से नाश करो॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


6.

धूप दीप फल मेवा,
मां स्वीकार करो,
मैया स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता,
जग निस्तार करो॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


7.

मां सरस्वती की आरती,
जो कोई जन गावे,
मैया जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी,
ज्ञान भक्ति पावे॥
॥जय जय सरस्वती माता॥


8.

जय सरस्वती माता,
जय जय सरस्वती माता।
सद्दग़ुण वैभव शालिनि,
त्रिभुवन विख्याता॥
॥जय जय सरस्वती माता॥

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Jai Jai Saraswati Mata - Maa Saraswati ki Aarti
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गंगा जी की आरती – गंगा आरती

1.

ओम जय गंगे माता,
मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता,
मनवांछित फल पाता॥
॥ओम जय गंगे माता॥


2.

चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी,
जल निर्मल आता,
मैया जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी,
सो नर तर जाता॥

॥ओम जय गंगे माता॥


3.

पुत्र सगर के तारे,
सब जग को ज्ञाता,
मैया सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि हो तुम्हारी,
त्रिभुवन सुख दाता॥

॥ओम जय गंगे माता॥


4.

एक ही बार जो तेरी,
शरणागति आता,
मैया शरणागति आता।
यम की त्रास मिटाकर,
परमगति पाता॥

॥ओम जय गंगे माता॥


5.

आरती माता तुम्हारी,
जो जन नित गाता,
मैया जो जन नित गाता।
दास वही सहज में,
मुक्ति को पाता॥

॥ओम जय गंगे माता॥


6.

ओम जय गंगे माता,
मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता,
मनवांछित फल पाता॥

॥ओम जय गंगे माता॥

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Ganga Aarti - Ganga Ji Ki Aarti
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गायत्री चालीसा

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥


दोहा

ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा प्रभा,
जीवन ज्योति प्रचण्ड।
शान्ति कान्ति, जागृति, प्रगति,
रचना शक्ति अखण्ड॥

जगत जननी, मङ्गल करनि,
गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री, स्वधा,
स्वाहा पूरन काम॥


गायत्री चालीसा

1.

भूर्भुवः स्वः युत जननी।
गायत्री नित कलिमल दहनी॥

2.

अक्षर चौविस परम पुनीता।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति, गीता॥


3.

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा।
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥

4.

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी।
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन बिहारी||


5.

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥

6.

ध्यान धरत पुलकित हित होई।
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥


7.

कामधेनु तुम सुर तरु छाया।
निराकार की अद्भुत माया॥

8.

तुम्हरी शरण गहै जो कोई।
तरै सकल संकट सों सोई॥


9.

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥

10.

तुम्हरी महिमा पार न पावैं।
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥


11.

चार वेद की मात पुनीता।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥

12.

महामन्त्र जितने जग माहीं।
कोउ गायत्री सम नाहीं॥


13.

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।
आलस पाप अविद्या नासै॥

14.

सृष्टि बीज जग जननि भवानी।
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥


15.

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।
तुम सों पावें सुरता तेते॥

16.

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥


17.

महिमा अपरम्पार तुम्हारी।
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥

18.

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।
तुम सम अधिक न जगमे आना॥


19.

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥

20.

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥


21.

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।
माता तुम सब ठौर समाई॥

22.

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥


23.

सकल सृष्टि की प्राण विधाता।
पालक पोषक नाशक त्राता॥

24.

मातेश्वरी दया व्रत धारी।
तुम सन तरे पातकी भारी॥


25.

जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सब कोई॥

26.

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें।
रोगी रोग रहित हो जावें॥


27.

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥

28.

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।
नासै गायत्री भय हारी॥


29.

सन्तति हीन सुसन्तति पावें।
सुख संपति युत मोद मनावें॥

30.

भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकट नहिं आवें॥


31.

जो सधवा सुमिरें चित लाई।
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥

32.

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥


33.

जयति जयति जगदंब भवानी।
तुम सम और दयालु न दानी॥

34.

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे।
सो साधन को सफल बनावे॥


35.

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी।
लहै मनोरथ गृही विरागी॥

36.

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।
सब समर्थ गायत्री माता॥


37.

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥

38.

जो जो शरण तुम्हारी आवें।
सो सो मन वांछित फल पावें॥


39.

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।
धन वैभव यश तेज उछाउ॥

40.

सकल बढें उपजें सुख नाना।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥


यह चालीसा भक्तियुत
पाठ करै जो कोई।
तापर कृपा प्रसन्नता
गायत्री की होय॥

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