श्री रामरक्षा स्तोत्र – अर्थसहित



रामरक्षास्तोत्र मंत्र के रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं, किन्तु उन्हें यह स्तोत्र भगवान् शंकर ने बताया था।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने बुधकौशिक ऋषि को स्वप्न में रामरक्षा स्तोत्र सुनाया था। सुबह उठने पर बुधकौशिक ऋषि ने पर इस स्तोत्र को लिख लिया।

श्री रामरक्षा स्तोत्र संस्कृत में है और इसमें 38 श्लोक है। स्तोत्र में पहले विनियोग और ध्यान के श्लोक है, और उसके बाद रक्षा स्तोत्र के 38 श्लोक है।


रामरक्षा स्तोत्रका शुभ प्रभाव

इस स्तोत्र में भगवान् राम से, हर प्रकार से रक्षा के लिए, प्रार्थना की गयी है। इसलिए, रक्षा स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले के चारों ओर एक सुरक्षा कवच जैसा बन जाता है, जो साधककी हर प्रकार की विपत्तियों से रक्षा करता है।

साथ ही साथ इस स्तोत्र में भगवान राम के स्वरुप का और उनकी महिमा का भी वर्णन किया गया है, और श्लोक के पाठ का महत्व भी बताया गया है।

आमतौर पर राम रक्षा स्तोत्र का पाठ नवरात्रमें प्रतिदिन नौ दिनों तक किया जाता है।  

किन्तु इस रक्षा स्तोत्र का पाठ निरंतर स्तुति के रूप में भी किया जा सकता है। क्योंकि इस स्तोत्र के पाठ से कई तरह के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, जैसा की इस स्तोत्र में बताया है, जैसे की सभी संकटों और विपत्तियों से रक्षा के लिए, दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए आदि।


राम रक्षा स्तोत्र के इस पोस्ट में –

  1. पहले स्तोत्र, शब्दों के अर्थ और भावार्थ के साथ दिया गया है।
  2. बाद में सम्पूर्ण स्तोत्र सिर्फ संस्कृत में और
  3. अंत में पूरा रामरक्षास्तोत्र सिर्फ हिंदी में दिया गया है।

स्तोत्र अर्थ सहित

स्तोत्र सिर्फ संस्कृत में

स्तोत्र सिर्फ हिन्दी में


राम रक्षा स्तोत्रम् – अर्थसहित

स्तोत्र सिर्फ संस्कृत में

स्तोत्र सिर्फ हिन्दी में

विनियोग

ऊँ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्र-मन्त्रस्य।
बुधकौशिक ऋषि:।
श्रीसीता रामचन्द्रो देवता।
अनुष्टुप् छन्द:।
सीता शक्ति:।
श्रीमान् हनुमान् कीलकं।
श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्र-जपे विनियोग:।

ऊँ अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्र-मन्त्रस्य – इस रामरक्षा स्तोत्र-मंत्र के

बुधकौशिक ऋषि: – बुधकौशिक ऋषि हैं,

श्रीसीता रामचन्द्रो देवता – सीता और रामचन्द्र देवता हैं,

अनुष्टुप् छन्द: – अनुष्टप् छन्द हैं

  • अनुष्टुप् छन्द में चार पद होते हैं।
    प्रत्येक पद में आठ अक्षर/वर्ण होते हैं

सीता शक्ति: – सीता शक्ति हैं,

श्रीमद हनुमान् कीलकं – श्रीमान हनुमानजी कीलक हैं तथा

श्रीरामचन्द्र प्रीत्यर्थे – श्री रामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए

रामरक्षास्तोत्र-जपे विनियोग: – रामरक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं

भावार्थः –
इस रामरक्षास्तोत्र-मंत्रके रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं,
सीता और रामचन्द्र देवता हैं, अनुष्टप् छन्द हैं,
सीता शक्ति हैं, श्रीमान हनुमानजी कीलक हैं, तथा
श्री रामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए रामरक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं।

  • कीलक का अर्थ है – कुंजी, चाबी, किसी के भी प्रभाव को नष्ट करने वाला मंत्र
  • और किलक का अर्थ है – हर्षध्वनि, आनंदसूचक शब्द, किलकार

श्री रामरक्षा स्त्रोत्र का ध्यान

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं
बद्धपद्मासनस्थं,
पीतं वासो वसानं
नव कमलदल स्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनं
नीरदाभं नानालंकारदीप्तं
दधतमुरुजटा-मण्डलं रामचन्द्रम्।

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं – जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,

बद्धपद्मासनस्थं – बद्ध पद्मासन से विराजमान हैं,

पीतं वासो वसानं – पीतांबर पहने हुए हैं,

नवकमल दलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् – जिनके प्रसन्न नयन नूतन कमल दल से स्पर्धा करते तथा

वामांकारूढ़ सीतामुखकमल मिलल्लोचनं – वामभागमें विराजमान श्री सीताजी के मुखकमलसे मिले हुए हैं,

  • वामभागमें अर्थात बायीं ओर

नीरदाभं नानालंकारदीप्तं – उन मेघश्याम, नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित

दधतमुरुजटा-मण्डलं रामचन्द्रम् – तथा विशाल जटाजूटधारी श्री रामचन्द्र जी का ध्यान करे

॥ इति ध्यानम्॥

भावार्थः –
जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,
बद्ध पद्मासनकी मुद्रामें विराजमान हैं और
पीतांबर पहने हुए हैं।

जिनके प्रसन्न नयन नए कमल दल से स्पर्धा करते तथा
बायें ओर स्थित श्री सीताजी के मुखकमलसे मिले हुए हैं।

उन मेघश्याम, नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित तथा
विशाल जटाधारी श्री रामचन्द्र जी का ध्यान करे।


श्री रामरक्षा स्तोत्र

1.

श्री राम का नाम और चरित्र – पापों को नष्ट करने वाला

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि-प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥1॥

चरितं रघुनाथस्य – श्री रघुनाथजीका चरित्र

शतकोटि-प्रविस्तरम् – सौ करोड़ विस्तारवाला हैं और

एकैकमक्षरं (एकैकम अक्षरं) पुंसां – उसका एक-एक अक्षर भी

महापातकनाशनम् – मनुष्यों के महान पापो को नष्ट करने वाला हैं

भावार्थः-
श्री रघुनाथजीका चरित्र सौ करोड़ विस्तारवाला हैं और
उसका एक-एक अक्षर भी मनुष्यों के महान पापो को नष्ट करने वाला हैं।


2.

श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मणजी का स्मरण

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम।
जानकी लक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम॥2॥

ध्यात्वा – प्रभु श्री राम का स्मरण करे

नीलोत्पलश्याम – जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण

रामं राजीवलोचनम – कमलनयन

जानकी लक्ष्मणोपेतं – जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित

जटामुकुटमण्डितम – जटाओं के मुकुट से सुशोभित हैं

भावार्थः –
जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण,
कमलनयन, जटाओं के मुकुट से सुशोभित है,
ऐसे भगवान रामका, जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण करें।


3.

सर्वव्यापी भगवान् राम के अवतार का कारण

सासितूण धनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम॥3॥

सासितूण धनुर्बाणपाणिं – हाथों में खड्ग, तूणीर, धनुष और बाण धारण करने वाले

नक्तंचरान्तकम – राक्षसों के संहार के लिए तथा

स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं (जगत्त्रातुम आविर्भूतम अजं) – संसार की रक्षा के लिए अपनी लीला से ही अवतीर्ण हुए हैं,

(अजं) विभुम – उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करे

भावार्थः –
हाथों में खड्ग, तूणीर, धनुष और बाण धारण करने वाले,
राक्षसों के संहार के लिए तथा संसार की रक्षा के लिए
अपनी लीला से ही अवतीर्ण हुए हैं,
उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करें।


4.

रामरक्षा का पाठ – कामनाओं की पूर्ती और पापों का नाश

रामरक्षां पठेत प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम।
शिरो में राघवः पातु भालं दशरथात्मज:॥4॥

रामरक्षां पठेत प्राज्ञ: – मनुष्य (प्राज्ञ पुरुष) रामरक्षा का पाठ करे

पापघ्नीं सर्वकामदाम – इस पापविनाशिनी और सर्वकामप्रदा (रामरक्षा स्तोत्र का)

शिरो में राघवं पातु – मेरे सिर की राघव और

भालं दशरथात्मज: – ललाट की दशरथके पुत्र रक्षा करें

भावार्थः-
सर्वव्यापी भगवान रामका, जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण कर
मनुष्य इस पापविनाशिनी (सभी पापो का नाश करने वाले) और
सर्वकामप्रद (सभी कामनाओ की पूर्ति करने वाले) रामरक्षा का पाठ करें।

सिर और ललाट की रक्षा

मेरे सिर की राघव और
ललाट की दशरथके पुत्र रक्षा करे।


5.

आँखे, कान, नाक और मुँह की रक्षा

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल:॥5॥

कौसल्येयो दृशौ पातु – कौसल्या नन्दन नेत्रों की रक्षा करें,

विश्वामित्र प्रिय: श्रुती – विश्वामित्रके प्रिय कानों को सुरक्षित रखे तथा

घ्राणं पातु मखत्राता – यज्ञरक्षक घ्राण (नासिका, नाक) की और

मुखं सौमित्रि-वत्सल: – सुमित्राके वत्सल मुख की रक्षा करें

भावार्थः –
कौसल्यानन्दन नेत्रोंकी रक्षा करें,
विश्वामित्रके प्रिय कानोंको सुरक्षित रखे तथा
यज्ञरक्षक नासिकाकी और
सुमित्राके वत्सल मुखकी रक्षा करें


6.

जीभ, कंठ, कंधे और भुजाओंकी रक्षा

जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवन्दित:।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक:॥6॥

जिव्हां विद्यानिधि: पातु – मेरी जिव्हाकी विद्यानिधि,

कण्ठं भरतवन्दित: – कंठकी भरतवन्दित,

स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु – कंधोकी दिव्यायुध और

भुजौ भग्नेशकार्मुक: – भुजाओंकी भग्नेशकार्मुक (महादेवजीका धनुष तोडनेवाले भगवान् श्रीराम) रक्षा करें

भावार्थः –
मेरी जिव्हाकी विद्यानिधि,
कंठकी भरतवन्दित,
कंधोकी दिव्यायुध और
भुजाओंकी महादेवजीका धनुष तोडनेवाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें


7.

हाथ, ह्रदय, मध्यभाग और नाभि की रक्षा

करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय:॥7॥

करौ सीतापति: पातु – हाथोंकी सीतापति,

हृदयं जामदग्न्यजित – हृदयकी परशुरामजीको जीतने वालें,

मध्यं पातु खरध्वंसी – मध्यभागकी खरध्वंसी (खर नामक राक्षसका नाश करने वाले) और

नाभिं जाम्बवदाश्रय: – नाभिकी जाम्ब्वदाश्रय (जांबवानके आश्रयदाता) रक्षा करें

भावार्थः –
हाथोंकी सीतापति श्रीराम,
हृदयकी जमदग्नि ऋषिके पुत्रको (परशुराम) जीतनेवाले,
मध्यभागकी खर नामक राक्षस का नाश करने वाले और
नाभिकी जांबवानके आश्रयदाता रक्षा करें।


8.

कमर और जांघों की रक्षा

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुत्मप्रभु:।
ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत॥8॥

सुग्रीवेश: कटी पातु – कमरकी सुग्रीवके स्वामी,

सक्थिनी हनुत्मप्रभु: – हड्डियोंकी हनुमानके प्रभु और

ऊरू रघूत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत – उरुओंकी राक्षसकुल विनाशक रघुश्रेष्ठ रक्षा करें

भावार्थः –
कमर की सुग्रीवके स्वामी,
हड्डियोंकी हनुमानके प्रभु और
उरुओं की राक्षस कुलका विनाश करनेवाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें।


9.

जंघाओं, चरणों और शरीर की रक्षा

जानुनी सेतकृत्पातु जंघे दशमुखान्तक:।
पादौ विभीषणश्रीद: पातु रामोsखिलं वपु:॥9॥

जानुनी सेतकृत्पातु – जानुओंकी सेतुकृत्,

जंघे दशमुखान्तक: – जंघाओंकी दशानन वधकर्ता (रावणको मारने वाले),

पादौ विभीषणश्रीद: – चरणोंकी विभीषणको ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और

पातु रामो-खिलं वपु: – सम्पूर्ण शरीरकी श्रीराम रक्षा करें

भावार्थः –
जानुओंकी सेतुकृत्,
जंघाओंकी दशानन वधकर्ता (रावण को मारने वाले),
चरणोंकी विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और
सम्पूर्ण शरीरकी श्री राम रक्षा करें।


10.

राम रक्षा का पाठ – दीर्घायु और सुखी जीवन

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत॥10॥

एतां रामबलोपेतां – जो पुण्यवान् पुरुष रामबलसे सम्पन्न

रक्षां य: सुकृती पठेत – इस रक्षाका पाठ करता हैं,

स चिरायु: सुखी पुत्री – वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान,

विजयी विनयी भवेत – विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता हैं

भावार्थः –
जो पुण्यवान् पुरुष अर्थात
शुभ कार्य करनेवाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धाके साथ,
रामबलसे सम्पन्न
इस रक्षाका पाठ करता हैं,
वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान,
विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता हैं।


11.

बुरे जीवों से रक्षा

पातालभूतल व्योम चारिणशछदमचारिण :।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि:॥11॥

पातालभूतल – जो जीव पाताल, पृथ्वी

व्योमचारिणश – अथवा आकाशमें विचरते हैं और

छद्ममचारिण: – छद्मवेश से घूमते रहते हैं,

न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: – वे राम नाम से सुरक्षित पुरुष को देख भी नहीं सकते

भावार्थः –
जो जीव पाताल, पृथ्वी
अथवा आकाशमें विचरते हैं और
छद्मवेश से घूमते रहते हैं,
वे रामनामसे सुरक्षित मनुष्यको देख भी नहीं सकते।


12.

राम नाम स्मरण – पापों से मुक्ति और मोक्ष

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥12॥

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति – राम, रामभद्र, रामचन्द्र

वा स्मरन – आदि नामोंका स्मरण करनेवाला

नरो न लिप्यते – मनुष्य पापोंमें लिप्त नहीं होता तथा

पापै-भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति – भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं

भावार्थः –
राम, रामभद्र और रामचन्द्र
इन नामोंका स्मरण करने से
मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता तथा
भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं।


13.

राम नाम से सुरक्षित रक्षा स्तोत्र

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय:॥13॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण – जो पुरुष जगतको विजय करने वाले

रामनाम्नाभिरक्षितम (रामनाम नाभिरक्षितम) – एकमात्र मन्त्र राम नाम से सुरक्षित

य: कण्ठे धारयेत्तस्य – इस स्त्रोत को कंठ में धारण कर लेता हैं,

करस्था: सर्वसिद्धय: – सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं

भावार्थः –
जो पुरुष संसारपर विजय करने वाले
एकमात्र मन्त्र राम-नाम से सुरक्षित
इस स्तोत्र को कंठ में धारण कर लेता हैं,
उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

अर्थात यह राम रक्षा स्तोत्र, राम नाम मन्त्र से, जो की जगतको विजय करने वाला मंत्र है उससे, सुरक्षित हैं।


14.

रामकवच की महिमा

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम॥14॥

वज्रपंजर-नामेदं यो – जो मनुष्य वज्रपंजर नामक

रामकवचं स्मरेत – इस रामकवचका स्मरण करता हैं,

अव्याहताज्ञ: सर्वत्र – उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता और

लभते जयमंगलम – उसे सर्वत्र जय और मंगल की प्राप्ति होती हैं

भावार्थः –
जो मनुष्य वज्रपंजर नामक
इस रामकवचका स्मरण करता हैं,
उसकी आज्ञाका कहीं भी उल्लंघन नहीं होता और
उसे सर्वत्र जय और मंगलकी प्राप्ति होती हैं।


15.

शंकरजी ने बुधकौशिक ऋषि को राम रक्षा स्तोत्र सुनाया

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर:।
तथा लिखितवान्प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक:॥15॥

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने – श्री शंकरजी ने रात्रि के समय स्वप्न में

रामरक्षामिमां हर: – इस राम रक्षा का जिस प्रकार आदेश दिया था,

तथा लिखितवान् प्रातः – उसी प्रकार प्रातः काल जागनेपर

प्रबुद्धो बुधकौशिक: – बुधकौशिक जी ने इसे लिख दिया

भावार्थः –
श्री शंकरजी ने रात्रि के समय स्वप्न में
इस रामरक्षाका जिस प्रकार आदेश दिया था,
उसी प्रकार प्रातः काल जागने पर
बुधकौशिकजी ने इसे लिख दिया।

भगवान् शंकरने स्वप्नमें इस रामरक्षा स्तोत्रका आदेश बुध कौशिक ऋषिको दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागनेपर उसे वैसा ही लिख दिया।


16.

श्री राम – सभी दुखो का अंत करने वाले

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु:॥16॥

आराम: कल्पवृक्षाणां – जो मानो कल्पवृक्षोंके बगीचे हैं

विराम: सकलापदाम – तथा समस्त आपत्तियोंका अंत करने वाले हैं,

अभिराम: त्रिलोकानां राम: – जो तीनो लोकोंमें परम सुंदर हैं,

श्रीमान् स न: प्रभु: – वे श्री राम हमारे प्रभु हैं

भावार्थः –
जो कल्प वृक्षोंके बागके समान विश्राम देने वाले हैं,
तथा समस्त आपत्तियोंका अंत करने वाले हैं,
सभी विपत्तियोंको दूर करनेवाले हैं,
जो तीनो लोकोंमें परम सुंदर हैं,
वे श्रीराम हमारे प्रभु हैं।


17.

भगवान् राम का स्वरुप

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥17॥

तरुणौ – जो तरुण अवस्थावाले,

रूपसम्पन्नौ – रूपवान,

सुकुमारौ – सुकुमार,

महाबलौ – महाबली,

पुण्डरीक-विशालाक्षौ – कमलके (पुण्डरीक) समान विशाल नेत्रोंवाले,

चीरकृष्णा-जिनाम्बरौ – चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्मधारी,

भावार्थः –
जो तरुण अवस्थावाले, युवा,
रूपवान, सुकुमार, महाबली,
कमलके (पुण्डरीक) समान विशाल नेत्रोंवाले,
मुनियोंके समान वस्त्र एवं काले मृगका चर्म धारण करते हैं।


18.

राम और लक्ष्मण

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥18॥

फलमूलाशिनौ – फल व मूल आहार वाले,

दान्तौ – संयमी,

तापसौ – तपस्वी,

ब्रह्मचारिणौ – ब्रह्मचारी,

पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ राम-लक्ष्मणौ – वे रघुश्रेष्ठ दसरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें

भावार्थः –
जो फल और कंदका आहार ग्रहण करते हैं,
जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं
वे रघुश्रेष्ठ दशरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें।


19.

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम।
रक्ष: कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥19॥

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां – सम्पूर्ण जीवो को शरण देने वाले,

श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम – समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और

रक्ष: कुलनिहन्तारौ – राक्षस कुल का नाश करने वाले हैं,

त्रायेतां नो रघूत्तमौ – वे रघुश्रेष्ठ दशरथकुमार राम हमारी रक्षा करें

भावार्थः –
जो सम्पूर्ण जीवोको शरण देने वाले,
समस्त प्राणियोंके शरणदाता,
समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और
राक्षसकुलका नाश करने वाले हैं,
वे रघुश्रेष्ठ, दशरथकुमार, मर्यादा पुरुषोत्तम राम हमारी रक्षा करे।


20.

मार्ग में रक्षा

आत्तसज्ज-धनुषा-विषुस्पृशा-वक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम॥20॥

आत्तसज्ज-धनुषा – जिन्होंने संधान किया हुआ धनुष ले रखा हैं,

विषुस्पृशा – जो बाण का स्पर्श कर रहे हैं तथा

वक्षयाशुग-निषंग-संगिनौ – अक्षय बाणों से युक्त तूणीर लिए हुए हैं,

रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: (रामलक्ष्मणा अग्रत:) – वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए

पथि सदैव गच्छताम – मार्ग में सदा ही मेरे आगे चले

भावार्थः –
जिन्होंने संधान किया हुआ धनुष ले रखा हैं,
जो बाणका स्पर्श कर रहे हैं तथा
अक्षय बाणोंसे युक्त तुणीर लिए हुए हैं,
वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए
मार्ग में सदा ही मेरे आगे चले।


21.

मनोरथोंकी रक्षा

सन्नद्ध: कवची खड़्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च राम: पातु सलक्ष्मण:॥21॥

सन्नद्ध: – सर्वदा उद्यत,

कवची – कवचधारी,

खड़्गी – हाथ में खड्ग लिए,

चापबाणधरो – धनुष बाण धारण किये तथा

युवा – युवा अवस्था वाले

गच्छन्मनोरथान्नश्च (गच्छन् मनोरथान नश्च) – हमारे मनोरथों की रक्षा करें

राम: पातु सलक्ष्मण: – भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे -आगे चलकर

भावार्थः –
हमेशा तत्पर, कवचधारी,
हाथ में खड्ग लिए,
धनुष-बाण धारण किये तथा
युवा अवस्थावाले
भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे-आगे चलकर
हमारे मनोरथोंकी रक्षा करें।


22 – 23 – 24.

राम नाम का जाप – अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्लेयो रघूत्तम:॥22॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम:।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम:॥23॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्त: श्रद्धयान्वित:।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशय:॥24॥

भावार्थः –
भगवान का कथन हैं कि –
राम, दशरथि, शूर,
लक्ष्मणानुचर, बलि, काकुत्स्थ,
पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुत्तम,
वेदान्तवेद्य, यज्ञेश,
पुराण-पुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ,
श्रीमान और अप्रमेयपराक्रम –
इन नाम का नित्य प्रति श्रद्धा पूर्वक जप करने से
मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त करता हैं,
इसमें कोई संदेह नहीं हैं।


25.

राम नाम का जाप – संसार चक्र से मुक्ति

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर:॥25॥

रामं दूर्वादल-श्यामं – जो लोग दूर्वादल के समान श्याम वर्ण,

पद्माक्षं – कमल नयन,

पीतवाससम – पीताम्बरधारी

स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न (नामभिर दिव्यै न) – भगवान राम का इन दिव्य नामों से स्तवन करते हैं,

ते संसारिणो नरा: – वे संसार चक्र में नहीं पड़ते

भावार्थः –
जो लोग दूर्वादल के समान श्यामवर्ण,
कमलनयन, पीताम्बरधारी
भगवान राम का इन दिव्य नामों से स्तुति करते हैं,
वे संसार चक्र में नहीं पड़ते।


26.

भगवान् राम को प्रणाम

रामं लक्ष्मण-पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरं।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम॥
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुल-तिलकं राघवं रावणारिम॥26॥

भावार्थः –
लक्ष्मणजी के पूर्वज, रघुकुल में श्रेष्ठ,
सीताजीके स्वामी, अतिसुन्दर,
काकुत्स्थ, कुलनन्दन, करुणासागर,
गुणनिधान, ब्राह्मणभक्त,
परम धार्मिक, राजराजेश्वर,
सत्यनिष्ठ, दशरथपुत्र,
श्याम और शांतिमूर्ति,
सम्पूर्ण लोकोंमें सुंदर, रघुकुलतिलक,
राघव और रावणके शत्रु
भगवान राम की मैं वंदना करता हूँ।


27.

श्रीरामचंद्रजी को प्रणाम

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथय नाथाय सीताया: पतये नम:॥27॥

रामाय रामभद्राय – राम, रामभद्र,

रामचन्द्राय वेधसे – रामचन्द्र, विधार्त स्वरूप,

रघुनाथय नाथाय – रघुनाथ,

सीताया: पतये नम: – प्रभु सीतापति को नमस्कार हैं

भावार्थः –
राम, रामभद्र,
रामचन्द्र, विधात स्वरूप,
रघुनाथ, प्रभु सीतापति को नमस्कार हैं।


28.

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥28॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम – हे रघुनन्दन श्रीराम!

श्रीराम राम भरताग्रज राम राम – हे भरताग्रज भगवान राम!

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम – हे रणधीर प्रभु राम!

श्रीराम राम शरणं भव राम राम – आप मेरे आश्रय होइये

भावार्थः –
हे रघुनन्दन श्रीराम!
हे भरतके अग्रज भगवान राम!
हे रणधीर प्रभु राम!
आप मुझे शरण दीजिए।


29.

श्रीरामचंद्रजी का मन से स्मरण

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥29॥

श्रीरामचन्द्र-चरणौ मनसा स्मरामि – मैं श्री रामचन्द्र के चरणों का मन से स्मरण करता हूँ,

श्रीरामचन्द्र-चरणौ वचसा गृणामि – श्री रामचन्द्र के चरणों का वाणी से कीर्तन करता हूँ,

श्रीरामचन्द्र-चरणौ शिरसा नमामि – श्री रामचन्द्र के चरणों को सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ तथा

श्रीरामचन्द्र-चरणौ शरणं प्रपद्ये – श्री रामचन्द्र के चरणों की शरण लेता हूँ

भावार्थः –
मैं श्रीरामचन्द्रके चरणोंका मन से स्मरण करता हूँ,
श्रीरामचन्द्रके चरणोंका वाणी से कीर्तन करता हूँ,
श्रीरामचन्द्रके चरणोंको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ तथा
पूरी श्रद्धाके साथ भगवान् रामचन्द्रके चरणोंको प्रणाम करता हुआ
उनके चरणोंकी शरण लेता हूँ।


30.

श्रीराम – माता, पिता, स्वामी, सखा – सर्वस्व

माता रामो मत्पिता रामचन्द्र:,
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र:।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,
जाने नैव जाने न जाने॥30॥

माता रामो – राम मेरी माता हैं,

मत्पिता रामचन्द्र:, – राम मेरे पिता हैं,

स्वामी रामो – राम स्वामी हैं और

मत्सखा रामचन्द्र: – राम ही मेरे सखा हैं,

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं (दयालु: नान्यं) – दयामय राम ही मेरे सर्वस्व हैं,

जाने नैव जाने न जाने – उनके सिवा और किसी को मैं नहीं जानता

भावार्थः –
राम मेरी माता हैं,
राम मेरे पिता हैं,
राम स्वामी हैं और
राम ही मेरे सखा हैं,
इस प्रकार दयालु श्रीराम, दयामय राम ही मेरे सर्वस्व हैं,
उनके सिवा और किसी को मैं नहीं जानता।


31.

राम, लक्ष्मण, जानकी और रामभक्त हनुमानजी

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य
वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य
तं वन्दे रघुनंदनम॥31॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य – जिनकी दायीं ओर लक्ष्मणजी,

वामे च जनकात्मजा – बायीं ओर जानकीजी और

पुरतो मारुतिर्यस्य – सामने हनुमानजी विराजमान हैं,

तं वन्दे रघुनंदनम – उन रघुनाथजी की मैं वंदना करता हूँ

भावार्थः –
जिनकी दायीं ओर लक्ष्मणजी,
बायीं ओर जानकीजी और
सामने हनुमानजी विराजमान हैं,
उन रघुनाथजीकी मैं वंदना करता हूँ।


32.

करूणामूर्ति श्री राम

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं
राजीवनेत्र रघुवंशनाथम।
कारुण्यरुपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥32॥

लोकाभिरामं – जो सम्पूर्ण लोकों में सुंदर,

रनरङ्‌गधीरं – रणक्रीडामें धीर,

राजीवनेत्र – कमलनयन,

रघुवंश-नाथम – रघुवंश नायक,

कारुण्यरुपं – करुणामूर्ति और

करुणाकरं तं – करुणा के भंडार हैं,

श्रीरामचन्द्रं – उन श्री रामचन्द्रजी की

शरणं प्रपद्ये – मैं शरण लेता हूँ

भावार्थः –
जो सम्पूर्ण लोकों में सुंदर,
रणक्रीडामें धीर,
कमलनयन, रघुवंश नायक,
करुणाकी मूर्ति और करुणाके भंडार हैं,
उन श्री रामचन्द्रजीकी मैं शरण लेता हूँ,
उन श्रीरामकी मैं शरण में हूँ।


33.

पवनपुत्र रामभक्त हनुमान

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥33॥

मनोजवं – जिनकी मन के सामान गति और

मारुत-तुल्यवेगं – वायु के सामान वेग हैं,

जितेन्द्रियं – जो परम जितेन्द्रिय और

बुद्धिमतां वरिष्ठम – बुद्धिमानो में श्रेष्ठ हैं।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं – उन पवननन्दन वानराग्रगण्य

श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये – श्री रामदूत की मैं शरण लेता हूँ

भावार्थः –
जिनकी मन के समान गति और
वायु के समान वेग हैं,
(जिनकी गति मनके समान और वेग वायुके समान है)

जो परम जितेन्द्रिय और
बुद्धिमानोमें श्रेष्ठ हैं।
उन पवननन्दन वानराग्रगण्य
श्रीराम दूत की मैं शरण लेता हूँ।


34.

राम नाम का जाप करने वाले वाल्मीकिजी को प्रणाम

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम॥34॥

कूजन्तं रामरामेति – राम-राम इस मधुर नाम को कहने वाले

मधुरं मधुराक्षरम – मधुर अक्षरो वाले राम, राम मधुर नाम को कहने वाले

आरुह्य कविता-शाखां – कवितामयी डाली पर बैठकर

वन्दे वाल्मीकि-कोकिलम – वाल्मीकिरूप कोकिल को मैं वंदना करता हूँ

भावार्थः –
कवितामयी डालीपर बैठकर
मधुर अक्षरो वाले राम – राम इस मधुर नाम को कूजते हुए
वाल्मीकिरूप कोयलकी मैं वंदना करता हूँ।


35.

संकट हरने वाले श्री राम को प्रणाम

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम॥35॥

आपदाम-पहर्तारं – आपत्तियों को हरने वाले तथा

दातारं सर्वसम्पदाम – सब प्रकार की संपत्ति प्रदान करने वाले

लोकाभिरामं श्रीरामं – लोकाभिराम भगवान राम को

भूयो भूयो नमाम्यहम – मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ

भावार्थः –
आपत्तियों को हरने वाले,
सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा
सब प्रकार की संपत्ति प्रदान करनेवाले
लोकाभिराम, इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर,
भगवान राम को
मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।


36.

राम राम राम के जाप की महिमा

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम॥36॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं (भवबीजानाम अर्जनं) – सम्पूर्ण संसार बीजों को भून डालनेवाला,

सुखसम्पदाम – समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति कराने वाला तथा

तर्जनं यमदूतानां – यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं

रामरामेति गर्जनम – “राम-राम” ऐसा घोष करना

भावार्थः –
‘राम-राम’ का जप करनेसे
मनुष्यके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं।
वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं।
राम-रामकी गर्जनासे यमदूत सदा भयभीत रहते हैं।

“राम-राम” ऐसा घोष करना
सम्पूर्ण संसारबीजोंको भून डालनेवाला,
समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति करानेवाला तथा
यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं।


37.

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे,
रामेणाभिहता निशाचरचमू, रामाय तस्मै नम:।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं,
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥37॥

रामो राजमणि: – राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी

सदा विजयते – सदा विजय को प्राप्त होते हैं

रामं रमेशं भजे – मैं लक्ष्मीपति भगवान राम का भजन करता हूँ

रामेणाभिहता निशाचरचमू – जिन रामचन्द्रजी ने सम्पूर्ण राक्षस सेना का ध्वंस कर दिया था,

रामाय तस्मै नम: – मैं उनको प्रणाम करता हूँ।

रामान्नास्ति परायणं – राम से बड़ा और कोई आश्रय नहीं हैं।

परतरं रामस्य दासोsस्म्यहं – मैं उन रामचन्द्रजी का दास हूँ।

रामे चित्तलय: सदा भवतु – मेरा चित्त सदा राम में ही लीन रहें;

मे भो राम मामुद्धर – हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये

भावार्थः –
राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी
सदा विजयको प्राप्त करते हैं।

मैं लक्ष्मीपति भगवान राम का भजन करता हूँ
जिन रामचन्द्रजी ने सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश कर दिया था,
मैं उनको प्रणाम करता हूँ।

श्रीरामके समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं।
राम से बड़ा और कोई आश्रय नहीं हैं।
मैं उन शरणागत वत्सल रामचन्द्रजी का दास हूँ।
मेरा चित्त सदा राममें ही लीन रहें;
हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये।


38.

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्र नाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥38॥

राम रामेति रामेति – (श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं -) मैं सर्वदा “राम राम, राम”

रमे रामे मनोरमे – इस प्रकार मनोरम रामनाम में ही रमण करता हूँ

सहस्त्र नाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने – रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के तुल्य हैं

भावार्थः –
श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं – हे सुमुखि!
रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के समान हैं।

मैं सदा रामका स्तवन करता हूं।
मैं सर्वदा “राम, राम, राम” इस प्रकार मनोरम रामनाममें ही रमण करता हूँ।

इति श्री बुधकौशिक-मुनि-विरचितं श्री राम रक्षास्तोत्रं सम्पुर्णम्।

इस प्रकार बुधकौशिकद्वारा रचित श्रीराम रक्षा स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।



Stotra – List

Ram Aarti – Ram Chalisa


सम्पूर्ण श्री रामरक्षा स्तोत्र – संस्कृत में

स्तोत्र अर्थ सहित

स्तोत्र सिर्फ हिन्दी में

विनियोग:

अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य
बुधकौशिक ऋषिः।
श्री सीतारामचंद्रो देवता।
अनुष्टुप छंदः।
सीता शक्तिः।
श्रीमान हनुमान कीलकम।
श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः।


अथ ध्यानम

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम।
वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्
नीरदाभम् नानालंकारदीप्तं
दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम॥


राम रक्षा स्त्रोत:

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं॥2॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥3॥

रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥4॥

कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥5॥


जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥6॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥7॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः॥8॥

जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः॥9॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥10॥


पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन।
नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥13॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत।
अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम्॥14॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥15॥


आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः॥16॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥17॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥18॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥19॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम॥20॥


सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः॥21॥

रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥22॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥23॥

इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥24॥

रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः॥25॥


रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम॥26॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥27॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥28॥

श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥29॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः,
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,
जाने नैव जाने न जाने॥30॥


दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥31॥

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥32॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये॥33॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥35॥


भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥36॥

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे,
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहं,
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः॥37॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥38॥


श्री रामरक्षा स्तोत्र – हिंदी में

स्तोत्र अर्थ सहित

स्तोत्र सिर्फ संस्कृत में

विनियोग

भावार्थः –
इस रामरक्षास्तोत्र-मंत्रके रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं,
सीता और रामचन्द्र देवता हैं, अनुष्टप् छन्द हैं,
सीता शक्ति हैं, श्रीमान हनुमानजी कीलक हैं, तथा
श्री रामचन्द्रजी की प्रसन्नता के लिए रामरक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं।

  • कीलक का अर्थ है – कुंजी, चाबी, किसी के भी प्रभाव को नष्ट करने वाला मंत्र
  • और किलक का अर्थ है – हर्षध्वनि, आनंदसूचक शब्द, किलकार

श्री रामरक्षा स्त्रोत्र का ध्यान

भावार्थः –
जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,
बद्ध पद्मासनकी मुद्रामें विराजमान हैं और
पीतांबर पहने हुए हैं।

जिनके प्रसन्न नयन नए कमल दल से स्पर्धा करते तथा
बायें ओर स्थित श्री सीताजी के मुखकमलसे मिले हुए हैं।

उन मेघश्याम, नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित तथा
विशाल जटाधारी श्री रामचन्द्र जी का ध्यान करे।


श्री रामरक्षा स्तोत्र

1.

श्री राम का नाम और चरित्र – पापों को नष्ट करने वाला

श्री रघुनाथजीका चरित्र सौ करोड़ विस्तारवाला हैं और
उसका एक-एक अक्षर भी मनुष्यों के महान पापो को नष्ट करने वाला हैं।


2.

श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मणजी का स्मरण

जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण,
कमलनयन, जटाओं के मुकुट से सुशोभित है,
ऐसे भगवान रामका, जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण करें।


3.

सर्वव्यापी भगवान् राम के अवतार का कारण

हाथों में खड्ग, तूणीर, धनुष और बाण धारण करने वाले,
राक्षसों के संहार के लिए तथा संसार की रक्षा के लिए
अपनी लीला से ही अवतीर्ण हुए हैं,
उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान रामजी का स्मरण करें।


4.

रामरक्षा का पाठ – कामनाओं की पूर्ती और पापों का नाश

सर्वव्यापी भगवान रामका, जानकीजी और लक्ष्मणजी के सहित स्मरण कर
मनुष्य इस पापविनाशिनी (सभी पापो का नाश करने वाले) और
सर्वकामप्रद (सभी कामनाओ की पूर्ति करने वाले) रामरक्षा का पाठ करें।

सिर और ललाट की रक्षा

मेरे सिर की राघव और
ललाट की दशरथके पुत्र रक्षा करे।


5.

आँखे, कान, नाक और मुँह की रक्षा

कौसल्यानन्दन नेत्रोंकी रक्षा करें,
विश्वामित्रके प्रिय कानोंको सुरक्षित रखे तथा
यज्ञरक्षक नासिकाकी और
सुमित्राके वत्सल मुखकी रक्षा करें


6.

जीभ, कंठ, कंधे और भुजाओंकी रक्षा

मेरी जिव्हाकी विद्यानिधि,
कंठकी भरतवन्दित,
कंधोकी दिव्यायुध और
भुजाओंकी महादेवजीका धनुष तोडनेवाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें


7.

हाथ, ह्रदय, मध्यभाग और नाभि की रक्षा

हाथोंकी सीतापति श्रीराम,
हृदयकी जमदग्नि ऋषिके पुत्रको (परशुराम) जीतनेवाले,
मध्यभागकी खर नामक राक्षस का नाश करने वाले और
नाभिकी जांबवानके आश्रयदाता रक्षा करें।


8.

कमर और जांघों की रक्षा

कमर की सुग्रीवके स्वामी,
हड्डियोंकी हनुमानके प्रभु और
उरुओं की राक्षस कुलका विनाश करनेवाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें।


9.

जंघाओं, चरणों और शरीर की रक्षा

जानुओंकी सेतुकृत्,
जंघाओंकी दशानन वधकर्ता (रावण को मारने वाले),
चरणोंकी विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और
सम्पूर्ण शरीरकी श्री राम रक्षा करें।


10.

राम रक्षा का पाठ – दीर्घायु और सुखी जीवन

जो पुण्यवान् पुरुष अर्थात
शुभ कार्य करनेवाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धाके साथ,
रामबलसे सम्पन्न
इस रक्षाका पाठ करता हैं,
वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान,
विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता हैं।


11.

बुरे जीवों से रक्षा

जो जीव पाताल, पृथ्वी
अथवा आकाशमें विचरते हैं और
छद्मवेश से घूमते रहते हैं,
वे रामनामसे सुरक्षित मनुष्यको देख भी नहीं सकते।


12.

राम नाम स्मरण – पापों से मुक्ति और मोक्ष

राम, रामभद्र और रामचन्द्र
इन नामोंका स्मरण करने से
मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता तथा
भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं।


13.

राम नाम से सुरक्षित रक्षा स्तोत्र

जो पुरुष संसारपर विजय करने वाले
एकमात्र मन्त्र राम-नाम से सुरक्षित
इस स्तोत्र को कंठ में धारण कर लेता हैं,
उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

अर्थात यह राम रक्षा स्तोत्र, राम नाम मन्त्र से, जो की जगतको विजय करने वाला मंत्र है उससे, सुरक्षित हैं।


14.

रामकवच की महिमा

जो मनुष्य वज्रपंजर नामक
इस रामकवचका स्मरण करता हैं,
उसकी आज्ञाका कहीं भी उल्लंघन नहीं होता और
उसे सर्वत्र जय और मंगलकी प्राप्ति होती हैं।


15.

शंकरजी ने बुधकौशिक ऋषि को राम रक्षा स्तोत्र सुनाया

श्री शंकरजी ने रात्रि के समय स्वप्न में
इस रामरक्षाका जिस प्रकार आदेश दिया था,
उसी प्रकार प्रातः काल जागने पर
बुधकौशिकजी ने इसे लिख दिया।

भगवान् शंकरने स्वप्नमें इस रामरक्षा स्तोत्रका आदेश बुध कौशिक ऋषिको दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागनेपर उसे वैसा ही लिख दिया।


16.

श्री राम – सभी दुखो का अंत करने वाले

जो कल्प वृक्षोंके बागके समान विश्राम देने वाले हैं,
तथा समस्त आपत्तियोंका अंत करने वाले हैं,
सभी विपत्तियोंको दूर करनेवाले हैं,
जो तीनो लोकोंमें परम सुंदर हैं,
वे श्रीराम हमारे प्रभु हैं।


17.

भगवान् राम का स्वरुप

जो तरुण अवस्थावाले, युवा,
रूपवान, सुकुमार, महाबली,
कमलके (पुण्डरीक) समान विशाल नेत्रोंवाले,
मुनियोंके समान वस्त्र एवं काले मृगका चर्म धारण करते हैं।


18.

राम और लक्ष्मण

जो फल और कंदका आहार ग्रहण करते हैं,
जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं
वे रघुश्रेष्ठ दशरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें।


19.

जो सम्पूर्ण जीवोको शरण देने वाले,
समस्त प्राणियोंके शरणदाता,
समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और
राक्षसकुलका नाश करने वाले हैं,
वे रघुश्रेष्ठ, दशरथकुमार, मर्यादा पुरुषोत्तम राम हमारी रक्षा करे।


20.

मार्ग में रक्षा

जिन्होंने संधान किया हुआ धनुष ले रखा हैं,
जो बाणका स्पर्श कर रहे हैं तथा
अक्षय बाणोंसे युक्त तुणीर लिए हुए हैं,
वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए
मार्ग में सदा ही मेरे आगे चले।


21.

मनोरथोंकी रक्षा

हमेशा तत्पर, कवचधारी,
हाथ में खड्ग लिए,
धनुष-बाण धारण किये तथा
युवा अवस्थावाले
भगवान राम लक्ष्मण जी सहित आगे-आगे चलकर
हमारे मनोरथोंकी रक्षा करें।


22 – 23 – 24.

राम नाम का जाप – अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल

भगवान का कथन हैं कि –
राम, दशरथि, शूर,
लक्ष्मणानुचर, बलि, काकुत्स्थ,
पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुत्तम,
वेदान्तवेद्य, यज्ञेश,
पुराण-पुरुषोत्तम, जानकीवल्लभ,
श्रीमान और अप्रमेयपराक्रम –
इन नाम का नित्य प्रति श्रद्धा पूर्वक जप करने से
मेरा भक्त अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त करता हैं,
इसमें कोई संदेह नहीं हैं।


25.

राम नाम का जाप – संसार चक्र से मुक्ति

जो लोग दूर्वादल के समान श्यामवर्ण,
कमलनयन, पीताम्बरधारी
भगवान राम का इन दिव्य नामों से स्तुति करते हैं,
वे संसार चक्र में नहीं पड़ते।


26.

भगवान् राम को प्रणाम

लक्ष्मणजी के पूर्वज, रघुकुल में श्रेष्ठ,
सीताजीके स्वामी, अतिसुन्दर,
काकुत्स्थ, कुलनन्दन, करुणासागर,
गुणनिधान, ब्राह्मणभक्त,
परम धार्मिक, राजराजेश्वर,
सत्यनिष्ठ, दशरथपुत्र,
श्याम और शांतिमूर्ति,
सम्पूर्ण लोकोंमें सुंदर, रघुकुलतिलक,
राघव और रावणके शत्रु
भगवान राम की मैं वंदना करता हूँ।


27.

श्रीरामचंद्रजी को प्रणाम

राम, रामभद्र,
रामचन्द्र, विधात स्वरूप,
रघुनाथ, प्रभु सीतापति को नमस्कार हैं।


28.

हे रघुनन्दन श्रीराम!
हे भरतके अग्रज भगवान राम!
हे रणधीर प्रभु राम!
आप मुझे शरण दीजिए।


29.

श्रीरामचंद्रजी का मन से स्मरण

मैं श्रीरामचन्द्रके चरणोंका मन से स्मरण करता हूँ,
श्रीरामचन्द्रके चरणोंका वाणी से कीर्तन करता हूँ,
श्रीरामचन्द्रके चरणोंको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ तथा
पूरी श्रद्धाके साथ भगवान् रामचन्द्रके चरणोंको प्रणाम करता हुआ
उनके चरणोंकी शरण लेता हूँ।


30.

श्रीराम – माता, पिता, स्वामी, सखा – सर्वस्व

राम मेरी माता हैं,
राम मेरे पिता हैं,
राम स्वामी हैं और
राम ही मेरे सखा हैं,
इस प्रकार दयालु श्रीराम, दयामय राम ही मेरे सर्वस्व हैं,
उनके सिवा और किसी को मैं नहीं जानता।


31.

राम, लक्ष्मण, जानकी और रामभक्त हनुमानजी

जिनकी दायीं ओर लक्ष्मणजी,
बायीं ओर जानकीजी और
सामने हनुमानजी विराजमान हैं,
उन रघुनाथजीकी मैं वंदना करता हूँ।


32.

करूणामूर्ति श्री राम

जो सम्पूर्ण लोकों में सुंदर,
रणक्रीडामें धीर,
कमलनयन, रघुवंश नायक,
करुणाकी मूर्ति और करुणाके भंडार हैं,
उन श्री रामचन्द्रजीकी मैं शरण लेता हूँ,
उन श्रीरामकी मैं शरण में हूँ।


33.

पवनपुत्र रामभक्त हनुमान

जिनकी मन के समान गति और
वायु के समान वेग हैं,
(जिनकी गति मनके समान और वेग वायुके समान है)

जो परम जितेन्द्रिय और
बुद्धिमानोमें श्रेष्ठ हैं।
उन पवननन्दन वानराग्रगण्य
श्रीराम दूत की मैं शरण लेता हूँ।


34.

राम नाम का जाप करने वाले वाल्मीकिजी को प्रणाम

कवितामयी डालीपर बैठकर
मधुर अक्षरो वाले राम – राम इस मधुर नाम को कूजते हुए
वाल्मीकिरूप कोयलकी मैं वंदना करता हूँ।


35.

संकट हरने वाले श्री राम को प्रणाम

आपत्तियों को हरने वाले,
सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा
सब प्रकार की संपत्ति प्रदान करनेवाले
लोकाभिराम, इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर,
भगवान राम को
मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।


36.

राम राम राम के जाप की महिमा

‘राम-राम’ का जप करनेसे
मनुष्यके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं।
वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं।
राम-रामकी गर्जनासे यमदूत सदा भयभीत रहते हैं।

“राम-राम” ऐसा घोष करना
सम्पूर्ण संसारबीजोंको भून डालनेवाला,
समस्त सुख-सम्पति की प्राप्ति करानेवाला तथा
यमदूतों को भयभीत करनेवाला हैं।


37.

राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी
सदा विजयको प्राप्त करते हैं।

मैं लक्ष्मीपति भगवान राम का भजन करता हूँ
जिन रामचन्द्रजी ने सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश कर दिया था,
मैं उनको प्रणाम करता हूँ।

श्रीरामके समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं।
राम से बड़ा और कोई आश्रय नहीं हैं।
मैं उन शरणागत वत्सल रामचन्द्रजी का दास हूँ।
मेरा चित्त सदा राममें ही लीन रहें;
हे राम! आप मेरा उद्धार कीजिये।


38.

श्री महादेवजी पार्वतीजी से कहते हैं – हे सुमुखि!
रामनाम विष्णु सहस्त्रनाम के समान हैं।

मैं सदा रामका स्तवन करता हूं।
मैं सर्वदा “राम, राम, राम” इस प्रकार मनोरम रामनाममें ही रमण करता हूँ।

इति श्री बुधकौशिक-मुनि-विरचितं श्री राम रक्षास्तोत्रं सम्पुर्णम्।

इस प्रकार बुधकौशिकद्वारा रचित श्रीराम रक्षा स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।


Stotra – List

Aarti – Chalisa