Categories
Satsang

मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके

  • इस लेख में,
  • मन को नियंत्रण में करने के लिए,
  • 15 उपाय दिए गए हैं।
  • इस पोस्ट में,
  • जितने उपाय बताए गए हैं,
  • वे सभी,
  • संत, महात्मा पुरुष या ऊँचे साधक द्वारा,
  • बताई गई बातों से लिए गए हैं।
  • आध्यात्मिक जीवन हो या
  • सांसारिक जीवन,
  • दोनों ही स्थितियों में,
  • सफलता के लिए,
  • मन पर कंट्रोल, सबसे महत्वपूर्ण है।
  • यदि आपको लगता है कि,
  • मन पर नियंत्रण करना जरूरी है,
  • तो अपनी अवस्था के अनुकुल
  • नीचे दिए गए उपाय में से,
  • किसी एक उपाय से शुरू कर सकते हैं।

इस आर्टिकल में, मन को शांत करने के लिए, जो आनापान ध्यान साधना है उसके बारे में नहीं दिया गया है।

आनापान ध्यान और विपश्यना के बारे में, विस्तार से, दूसरे आर्टिकल में दिया गया है।


मन को वश में क्यों करें?

भगवान् ने, मन के बारे में, गीता में क्या कहा है?

  • श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –
  • जिसका मन वशमें नहीं है,
  • उसके लिये,
  • योगका प्राप्त करना,
  • अत्यन्त कठिन है,
  • परन्तु जिसका मन वशमें है,
  • ऐसा प्रयत्नशील व्यक्ति,
  • साधन द्वारा,
  • योग प्राप्त कर सकता है।’

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
(गीता ६ ॥३६)

  • भगवान् श्रीकृष्णके,
  • इन वचनोंके अनुसार,
  • यह सिद्ध होता है कि,
  • मनको वश में किये बिना,
  • परमात्माकी प्राप्ति के लिए,
  • योग, भक्ति या साधना
  • अत्यन्त कठिन है।

दुःखोंसे मुक्ति के लिए, मन को काबू में करने के अलावा, दुसरा उपाय नही

  • यदि कोई ऐसा चाहे कि,
  • मन तो अपनी इच्छानुसार,
  • निरंकुश होकर,
  • विषय वाटिकामे,
  • स्वच्छन्द विचरण किया करे और
  • परमात्माके दर्शन,
  • अपनेआप ही हो जायें,
  • तो यह उसकी भूल है।
  • आनन्दमय परमात्माकी प्राप्ति और
  • दुःखोंसे मुक्ति चाहनेवाले को,
  • मन को वशमें करना ही पड़ेगा,
  • इसके सिवा,
  • और कोई उपाय नहीं है।

आदि शंकराचार्य ने मन के बारे में कहा है –

  • भगवान् शङ्कराचार्यने कहा है –

जित जगत् केन, मनो हि येन।

  • अर्थात,
  • जगत को किसने जीता?
  • जिसने मनको जीत लिया।
  • अर्थात, मन पर विजय मिलते ही,
  • मानो विश्वपर विजय मिल जाती है।

किन्तु, मन बड़ा चंचल और बलवान है

  • परन्तु,
  • मन स्वभावसे ही बड़ा चञ्चल और
  • बलवान् है और
  • इसे वशमें करना,
  • साधारण बात नहीं।
  • सारे साधन,
  • इसीको कंट्रोल में करने के लिये,
  • किये जाते है,

अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण से कहा था, मन बड़ा चंचल है

  • अर्जुनने भी मनको वशमें करना,
  • कठिन समझकर,
  • भगवान् से यही कहा था –

चञ्चलं हि मनः कृष्ण
प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये
वायोरिव सुदुष्करम्॥ (गीता ६।३४)

  • हे भगवन्।
  • यह मन बड़ा ही चंचल,
  • हठीला, दृढ़ और बलवान है।
  • इसे रोकना मैं तो,
  • वायुके रोकनेके समान,
  • अत्यन्त दुष्कर समझता हूँ।

लेकिन, भगवान् कृष्ण ने, अर्जुन को, मन वश में करने का रास्ता बताया

  • भगवान् ने भी इस बातको स्वीकार किया,
  • पर साथ ही उपाय भी बतला दिया –

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
(गीता ६ । ३५)

  • भगवान् ने कहा, – अर्जुन!
  • इसमे कोई सन्देह नहीं कि,
  • इस चञ्चल मनका निग्रह करना,
  • बड़ा ही कठिन है,
  • परन्तु अभ्यास और वैराग्यसे,
  • यह वशमें हो सकता है।
  • इससे यह सिद्ध हो गया कि,
  • मनका वशमें करना कठिन भले ही हो,
  • पर असम्भव नहीं, और
  • इसके वश किये बिना,
  • दुःखोंकी निवृत्ति नहीं।
  • इसलिए मन को,
  • वश में करने का,
  • निरंतर प्रयास करना ही चाहिये।
  • इसके लिये,
  • सबसे पहले इसका साधारण स्वरुप और
  • स्वभाव जानने की आवश्यकता है।

मनका स्वरूप

मन क्या है?

  • यह आत्म और अनात्म पदार्थके,
  • बीचमे रहनेवाली एक विलक्षण वस्तु है।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

  • मन इतना बलवान है की,
  • यह व्यक्ति को,
  • बंधन या मोक्ष दोनों में से,
  • किसी एक रास्ते पर ले जा सकता है।
  • बस, मन ही जगत् है,
  • मन नहीं तो जगत् नहीं।

मन क्या करता है?

  • मन का कार्य है,
  • संकल्प-विकल्प करना,
  • जिसकी वजह से,
  • विकार उत्पन्न होते है।
  • यह जिस पदार्थको,
  • भलीभाँति ग्रहण करता है,
  • स्वयं भी तदाकार बन जाता है।
  • साधारणतया, यही मनका,
  • स्वरूप और स्वभाव है।
  • मन रागके अर्थात
  • आसक्ति के साथ ही चलता है।
  • सारे अनर्थों और दुःखो की उत्पत्ति,
  • रागसे ही होती है।
  • राग न हो तो,
  • मन प्रपञ्चोंकी ओर न जाय।

तो मन को कण्ट्रोल कैसे करें?

  • अब, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की,
  • यह वशमे कैसे हो।
  • इसके लिये उपाय भी,
  • भगवान् ने बतला ही दिया है –
  • अभ्यास और
  • वैराग्य।
  • यही उपाय योगदर्शनमे,
  • महर्षि पतञ्जलिने बतलाया है –

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध।
(समाधिपाद १२)

  • अर्थात,
  • अभ्यास और वैराग्यसे ही,
  • चित्तका निरोध होता है।
  • इसलिए,
  • इसी अभ्यास और,
  • वैराग्य पर,
  • विचार करना चाहिये।

वैराग्य और अभ्यास से मन का नियंत्रण

  • निचे मन को वश में करने के,
  • कुछ उपाय दिए गए है
  • जिसमे पहला उपाय,
  • वैराग्य से संबंधित है और
  • बाद के उपाय,
  • अभ्यास से सम्बंधित है।

1. वैराग्य से संबंधित तरीका – भोगों में वैराग्य

सांसारिक पदार्थों और भोगों की सच्चाई क्या है?

  • जबतक संसारकी वस्तुएँ,
  • सुन्दर और सुखप्रद मालूम होती है,
  • तभीतक मन उनमें जाता है।
  • लेकिन जब,
  • इन भौतिक पदार्थों और भोगों की,
  • असली सच्चाई समझ में आ जाये की,
  • ये सब पदार्थ,
  • दोषयुक्त और दुःखप्रद है,
  • तो मन कदापि इनमें नहीं लगेगा।
  • क्योंकि,
  • इन भोगों के अंत में दुःख ही है,
  • भले ही कुछ समय के लिए,
  • इनमे ख़ुशी मिलती हो,
  • किन्तु अंत में दोष ही है।

सांसारिक वस्तुओं में थोड़े समय के लिए ख़ुशी

  • जब मन को,
  • यह सच्चाई समझ में आ जायेगी,
  • तब मन,
  • कभी इन वस्तुओं के पीछे नहीं दौड़ेगा और
  • यदि कभी इनकी ओर गया भी,
  • तो उसी समय वापस लौट आवेगा।
  • इसलिये, संसारके सारे पदार्थोंमे,
  • चाहे वे इहलौकिक हो या पारलौकिक,
  • दुःख और दोषकी प्रत्यक्ष भावना करनी चाहिये।
  • ऐसा दृढ़ प्रत्यय करना चाहिये कि,
  • इन पदार्थोंमें,
  • केवल दोष और दुःख ही भरे हुए है।

अध्यात्म के रास्ते की सच्चाई क्या है?

  • रमणीय और सुखरूप दीखनेवाली,
  • वस्तुमे ही मन लगता है।
  • यदि यह रमणीयता और सुखरूपता,
  • विषयोंसे हटकर,
  • परमात्मा में दिखायी देने लगे,
    • जैसा कि वास्तवमे है,
  • तो यही मन,
  • तुरन्त विषयोंसे हटकर,
  • परमात्मामे लग जाय।
  • यही वैराग्यका साधन है,
  • और वैराग्य ही,
  • मन जीतनेका एक उत्तम उपाय है।
  • सच्चा वैराग्य तो,
  • संसारके इस दीखनेवाले स्वरूपका
    • सर्वथा अभाव और
  • उसकी जगह परमात्माका
    • नित्यभाव प्रतीत होनेमे है।
  • परन्तु आरम्भमे नये साधकको,
  • मन वश करनेके लिये,
  • इस लोक और परलोकके समस्त पदार्थोंमे,
  • दोष और दुःख देखना चाहिये,
  • जिससे मनका अनुराग उनसे हटे।

भगवान् कृष्ण ने, इस वैराग्य के तरीके के बारे में क्या कहा?

  • श्रीभगवान् ने कहा है –

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्यु जराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम्॥
(गीता १३ । ८)

  • इस लोक और परलोकके,
  • समस्त भोगोंमें
    • वैराग्य, अहंकारका त्याग,
  • इस शरीरमे,
    • जन्म, मृत्यु,
    • बुढ़ापा और रोग आदि
  • दुःख और दोष देखने चाहिये।
  • इस प्रकार वैराग्यकी भावनासे,
  • मन वशमे हो सकता है ।
  • यह तो वैराग्यका संक्षिप्त साधन हुआ,
  • अब कुछ अभ्यासोंपर विचार करें।

2. नियमसे रहना

सांसारिक हो या आध्यात्मिक जीवन, सफलता के लिए, नियम का बड़ा महत्व है

  • मनको वश करनेमें,
  • नियमानुवर्तितासे,
    • अर्थात नियमसे रहने से
  • बड़ी सहायता मिलती है।
  • सारे काम ठीक समयपर,
  • नियमानुसार होने चाहिये।
  • प्रातःकाल बिस्तरसे उठकर,
  • रातको सोने तक,
  • दिनभरके कार्योंकी,
  • एक ऐसी नियमित दिनचर्या बना लेनी चाहिये,
  • जिससे जिस समय जो कार्य करना हो,
  • मन अपने-आप स्वभावसे ही,
  • उस समय उसी कार्य में लग जाय।
  • संसार-साधनमे तो नियमानुवर्तितासे,
  • लाभ होता ही है,
  • परमार्थमे भी इससे बड़ा लाभ होता है।

ध्यान के समय का नियम

  • अपने जिस इष्ट स्वरूपके ध्यानके लिये,
  • प्रतिदिन जिस स्थानपर, जिस आसनपर,
  • जिस आसनसे, जिस समय और
  • जितने समय बैठा जाय,
  • उसमे किसी दिन भी,
  • आलस या व्यतिक्रम नहीं होना चाहिये।
  • पाँच मिनटका भी नियमित ध्यान,
  • अनियमित अधिक समयके ध्यानसे उत्तम है।
  • आज दस मिनट बैठे, कल आध घण्टे,
  • परसो बिल्कुल नहीं किया,
  • इस प्रकारके साधनसे,
  • साधक को मनको,
  • शांत और नियंत्रण करना,
  • अत्यंत कठिन होता है और
  • सिद्धि भी कठिनतासे मिलती है।
  • जब पाँच मिनटका ध्यान नियमसे होने लगे,
  • तब दस मिनटका करे,
  • परन्तु दस मिनटका करनेके बाद,
  • किसी दिन भी नौ मिनट न होना चाहिये।
  • इसी प्रकार स्थान, आसन, समय,
  • इष्ट और मन्त्रका,
  • बारबार परिवर्तन नहीं करना चाहिये।
  • इस तरह, नियम से रहने से भी,
  • मन स्थिर होता है।

सभी बातों में नियम

  • नियमोंका पालन,
  • खाने, पीने, पहनने,
  • सोने और व्यवहार करने,
  • सभी चीजों में होना चाहिये।
  • नियम अपनी अवस्था के अनुकुल,
  • शास्त्रसम्मत बना लेने चाहिये।

3. मनकी क्रियाओंपर विचार

मन के अच्छे और बुरे विचार

  • मनके प्रत्येक कार्यपर,
  • विचार करना चाहिये।
  • प्रतिदिन रातको सोनेसे पूर्व,
  • दिनभरके मनके कार्योंपर,
  • विचार करना उचित है।
  • यद्यपि,
  • मनकी सारी उधेड़-बुनका,
  • स्मरण होना बड़ा कठिन है,
  • परन्तु,
  • जितनी याद रहे,
  • उतनी ही बातों पर विचार कर,
  • जो-जो संकल्प अर्थात विचार,
  • सात्त्विक मालूम दें,
  • उनके लिये,
  • मनकी सराहना करना और
  • जो-जो सङ्कल्प,
  • तामसिक अर्थात बुरे मालूम पड़ें,
  • उनको सुधारने का संकल्प करना चाहिए।

मन के बुरे संकल्प, धीरे धीरे समाप्त हो जाएंगे

  • प्रतिदिन इस प्रकारके अभ्याससे,
  • मनपर सत्कार्य करनेके और
  • बुरे कार्य छोड़नेके संस्कार जमने लगेंगे।
  • जिससे कुछ ही समयमें,
  • मन बुराइयों से बचकर,
  • भले भले कार्योंमे लग जायगा|
  • मन पहले भले कार्यवाला होगा,
  • तब उसे वश करनेमें सुगमता होगी।

बुरी संगति में, पड़ा हुआ बालक का उदाहरण

  • बुरी संगति में पड़ा हुआ बालक जबतक,
  • कुसंगति नहीं छोड़ता,
  • तबतक उसे बुरी संगति से,
  • दूर रहने की सलाह मिलती रहती है।
  • क्योंकि,
  • जबतक वह बालक,
  • बुरी सांगत में है,
  • तब तक उसे कुछ भी समझाना,
  • कठिन होता है।
  • पर जब कुसंग छूट जाता है,
  • तब उसे बुरी सलाह नहीं मिल सकती,
  • दिनरात घरमे उसको,
  • माता-पिताके सदुपदेश मिलते हैं,
  • वह भली-भली बातें सुनता है।
  • तब फिर उसके सुधरकर,
  • माता-पिताके आज्ञाकारी होनेमे,
  • विलम्ब नहीं होता।

मन में, बुरे विचारों की जगह, अच्छे विचार आना शुरू हो जाएंगे

  • इसी तरह,
  • यदि विषय-चिन्तन करनेवाले मनको,
  • कोई एक साथ ही,
  • सर्वथा विषयरहित करना चाहे,
  • तो वह नहीं कर सकता।
  • पहले मनको,
  • बुरे चिन्तनसे बचाना चाहिये,
  • जब वह परमात्म-सम्बन्धी,
  • शुभ चिन्तन करने लगेगा,
  • तब उसको वश करनेमें,
  • कोई कठिनाई नहीं होगी।

4. मनके कहनेमें न चलना

  • मनके कहने में,
  • नहीं चलना चाहिये।
  • जबतक यह मन,
  • वशमें नहीं हो जाता,
  • तबतक इसके कहने के अनुसार,
  • नहीं चलना चाहिये।
  • जैसे शत्रुके प्रत्येक कार्यपर,
  • निगरानी रखनी पड़ती है,
  • वैसे ही,
  • इसके भी प्रत्येक कार्यको,
  • सावधानीसे देखना चाहिये।

मन लोभी, मन लालची, मन चंचल, मन चोर।
मन के मते ना चालीये। मन पल पल में कहीं और॥

  • मनकी खातिर,
  • भूलकर भी नहीं करनी चाहिये।
  • जहाँ कहीं यह उलटा सीधा करने लगे,
  • वहीं इसे धिक्कारना और पछाड़ना चाहिये।

मन बड़ा बलवान, किन्तु धीरे धीरे काबू में आ ही जाता है

  • यद्यपि यह बड़ा बलवान् है,
  • कई बार इससे हारना होगा,
  • पर साहस नहीं छोड़ना चाहिये।
  • जो हिम्मत नहीं हारता,
  • वह एक दिन मनको,
  • अवश्य जीत लेता है।
  • इससे लड़नेमे एक विचित्रता है।
  • यदि दृढ़तासे लढा जाय तो,
  • लड़ने वाले का बल दिनोदिन बढ़ता है और
  • इसका क्रमशः घटने लगता है।
  • इसलिये,
  • इससे लड़नेवाला एक-न-एक दिन,
  • इसपर अवश्य ही विजयी होता है।
  • अतएव इसकी हाँ-में-हाँ न मिलाकर,
  • प्रत्येक कार्यमें खूब सावधानीसे बरतना चाहिये।
  • यह मन बड़ा ही चतुर है।
  • कभी डरावेगा, कभी फुसलावेगा,
  • कभी लालच देगा,
  • बड़े-बड़े अनोखे रंग दिखलावेगा,
  • परन्तु कभी इसके धोखेमे न आना चाहिये।
  • भूलकर भी इसका विश्वास नहीं करना चाहिये।

आज्ञाकारी मन

  • इस प्रकार करनेसे,
  • इसकी हिम्मत टूट जायगी,
  • और
  • लड़ने और धोखा देनेकी,
  • आदत छूट जायगी।
  • अंत में यह आज्ञा देनेवाला न रहकर,
  • सीधा-सादा आज्ञा पालन करनेवाला,
  • विश्वासी सेवक बन जायगा।

Next.. (आगे पढें ..) – मन को वश में करने के 15 तरीके – 5 से 15

मन को वश में करने के 15 तरीके – अगला पेज पढ़ने के लिए क्लिक करें >>

मन को वश में करने के 15 तरीके – 5 से 15

For next page of How to Control Mind, please visit >>

15 Ways to Control Mind – 5 to 15

Satsang

Dohe

मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके