Categories
Satsang

मन को काबू में करने के 15 तरीके – 11 से 15

<< मन को वश में करने के 15 तरीके – पहला पेज

<< मन को वश में करने के 15 तरीके – 5 से 10


11. मैत्री-करुणा-मुदिता-उपेक्षाका व्यवहार

  • योगदर्शनमें महर्षि पतञ्जलि एक उपाय यह भी बतलाते हैं –

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां
सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां
भावनातश्चित्तप्रसादनम्।
(समाधिपाद ३३ )

  • अर्थात,
  • सुखी मनुष्योसे प्रेम, दुखियोंके प्रति दया,
  • पुण्यात्माओंके प्रति प्रसन्नता ओर
  • पापियोके प्रति उदासीनताकी भावनासे,
  • चित्त प्रसन्न होता है।

  • जगत् के सारे सुखी जीवोंके साथ,
  • प्रेम करनेसे चित्तका ईर्ष्यामल दूर होता है,
  • द्वेषकी आग बुझ जाती है।
  • संसारमे लोग,
  • अपनेको और अपने आत्मीय स्वजनोंको,
  • सुखी देखकर प्रसन्न होते हैं,
  • क्योंकि वे उन लोगोंको,
  • अपने प्राणों के समान प्रिय समझते हैं।
  • यदि यही प्रिय भाव,
  • सारे ससारके सुखियोंके प्रति अर्पित कर दिया जाय,
  • तो कितने आनन्दका कारण हो !
  • दूसरेको सुखी देखकर,
  • जलन पैदा करनेवाली वृत्तिका,
  • नाश हो जाय।

  • दुखी प्राणियोंके प्रति,
  • दया करनेसे,
  • परअपकाररूप चित्त-मल नष्ट होता है।
  • मनुष्य अपने कष्टोंको दूर करनेके लिये,
  • किसीसे भी पूछनेकी आवश्यकता नहीं समझता,
  • भविष्यमे कष्ट होनेकी सम्भावना होते ही,
  • पहलेसे उसे निवारण करनेकी चेष्टा करने लगता है।
  • यदि ऐसा ही भाव,
  • जगत्के सारे दुखी जीवोंके साथ हो जाय तो,
  • अनेक लोगोंके दुःख दूर हो सकते हैं।
  • दुःखपीड़ित लोगोंके दुःख दूर करनेके लिये,
  • अपना सर्वस्व न्योछावर कर देनेकी प्रबल भावनासे,
  • मन सदा ही प्रफुल्लित रह सकता है।

  • धार्मिकोंको देखकर हर्षित होनेसे,
  • दोषारोप नामक मनका विकार नष्ट होता है,
  • साथ ही धार्मिक पुरुषकी भॉति,
  • चित्तमें धार्मिक वृत्ति जागृत हो उठती है।
  • विकारों के दूर होते ही,
  • चित्त शान्त होता है।

  • पापियोके प्रति उपेक्षा करनेसे,
  • चित्तका क्रोधरूप मल नष्ट होता है।
  • पापोंका चिन्तन न होनेसे,
  • उनके सस्कार अन्तःकरणपर नहीं पड़ते।
  • किसीसे भी घृणा नहीं होती।
  • इससे चित्त शांत रहता है।
  • इस प्रकार इन चारो भावोंके,
  • बारबार अनुशीलनसे,
  • चित्तकी राजस, तामस वृत्तियाँ नष्ट होकर,
  • सात्त्विक वृत्तिका उदय होता है और
  • उससे चित्त प्रसन्न होकर,
  • शीघ्र ही एकाग्रता लाभ कर सकता है।

12. सदग्रंथो का अध्ययन

  • भगवान के परम रहस्यसम्बन्धी,
  • परमार्थ-ग्रन्थोंके पठन पाठन से भी,
  • चित्त स्थिर होता है।
  • एकान्तमें बैठकर,
  • श्रीमद्भगवद्गीता,
  • उपनिषद्,
  • श्रीमद्भागवत,
  • रामायण आदि प्रन्थोंका अर्थसहित
  • पाठ करनेसे,
  • वृत्तियाँ तदाकार बन जाती हैं।
  • इससे मन स्थिर हो जाता है।

13. प्राणायाम

  • प्राणायाम से योग के सम्बन्धमें महत्वपूर्ण बात –
  • इस मार्ग में सद्गुरुकी सलाह के बिना
  • कोई कार्य नहीं करना चाहिये।
  • योगाभ्यासमें देखादेखी करनेमे,
  • उलटा फल हो सकता है।
  • समाधि से भी मन रुकता है।
  • समाधि अनेक तरहकी होती है।
  • प्राणायाम समाधिके साधनोका,
  • एक मुख्य अङ्ग है।
  • योगदर्शनमे कहा गया है –

प्रच्छईनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। ( समाधिपाद ३४)

  • नासिकाके छेदोंसे अन्तरकी वायुको बाहर निकालना,
  • प्रच्छर्दन कहलाता है, और
  • प्राणवायुकी गति रोक देनेको विधारण कहते हैं।
  • इन दोनों उपायोसे भी चित्त स्थिर होता है।
  • श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान् ने भी कहा है –

अपाने जुद्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा॥

  • कई अपानवायुमें प्राणवायुको हवन करते हैं,
  • कई प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करते हैं और
  • कई प्राण, और अपानकी गतिको रोककर,
  • प्राणायाम किया करते हैं।
  • इसी तरह योगसम्बन्धी ग्रन्थोंके अतिरिक्त,
  • महाभारत, श्रीमद्भागवत और उपनिषदोंमे भी,
  • प्राणायामका यथेष्ट वर्णन है।
  • श्वास-प्रश्वासकी गतिको रोकनेका नाम ही,
  • प्राणायाम है।
  • मनु महाराजने कहा है –

दद्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।
तयेन्द्रियाणां दद्यन्ते दोपाः प्राणस्य निग्रहात्।

  • अग्निमें तपाये जानेपर,
  • जैसे धातुका मल जल जाता है,
  • उसी प्रकार प्राणवायुके निग्रहसे,
  • इन्द्रियोंके सारे दोष नष्ट हो जाते है।
  • प्राणोंको रोकनेसे ही मन रुकता है।
  • इनका एक दूसरेके साथ घनिष्ट सम्बन्ध है।
  • मन सवार है,
  • तो प्राण वाहन है।
  • एकको रोकनेसे,
  • दोनों रुक जाते है।
  • प्राणायामके सम्बन्धमे, योगशान्त्रमे,
  • अनेक उपदेश मिलते हैं,
  • परन्तु वे बड़े ही कठिन हैं।
  • योगसाधनमे अनेक नियमोंका,
  • पालन करना पड़ता है।
  • योगाभ्यासके लिये बड़े ही कठोर,
  • आत्मसंयमकी आवश्यकता है।
  • आजकलके समयमें तो,
  • कई कारणोंसे योगका साधन,
  • एक प्रकारसे असाध्य ही समझना चाहिये।
  • यहा पर प्राणायामके सम्बन्धमें,
  • केवल इतना ही कहा जाता है कि,
  • बाई नासिकासे बाहरकी वायुको,
  • अन्तरमें ले जाकर स्थिर रखनेको,
  • पूरक कहते हैं,
  • दाहिनी नासिकासे अन्तरकी वायुको,
  • बाहर निकालकर बाहर स्थिर रखनेको,
  • रेचक कहते है और
  • जिसमें अन्तरकी वायु,
  • बाहर न जा सके और
  • बाहरकी वायु अन्तरमें प्रवेश न कर मके,
  • इस भावसे प्राणवायु रोक रखनेको कुंभक कहते हैं।
  • इसीका नाम प्राणायाम है।
  • सााधारणतः,
  • चार बार मन्त्र जपकर पूरक,
  • सोलह बाारके जपसे कुम्मक और
  • आठ बारके जपसे रेचककी विधि है।
  • परन्तु इस सम्बन्धमें उपयुक्त,
  • सद्गुरुकी आज्ञा बिना,
  • कोई कार्य नहीं करना चाहिये।
  • योगाभ्यासमें देखादेखी करनेमे,
  • उलटा फल हो सकता है।

देखा देसी साधै जोग।
छीजै काया बाढ़ै रोग।

  • पर यह स्मरण रहे कि,
  • प्राणायाम,
  • मनको रोकनेका,
  • एक बहुत ही उत्तम साधन है।

14. श्वासके द्वारा नाम-जप

  • मनको रोककर परमात्मामें लगानेका,
  • एक अत्यन्त सुलभ और आशंका रहित उपाय और है,
  • जिसका अनुष्ठान सभी कर सकते है।
  • वह है,
  • आने-जानेवाले श्वास – प्रश्वास की गतिपर,
  • ध्यान रखकर,
  • श्वासके द्वारा,
  • श्रीभगवान के नामका जप करना।
  • यह अभ्यास बैठते-उठते,
  • चलते-फिरते,
  • सोते-खाते हर समय,
  • प्रत्येक अवस्थामे किया जा सकता है।
  • इसमे श्वास,
  • जोर-जोर से लेनेकी भी,
  • कोई आवश्यकता नहीं।
  • श्वासकी साधारण चालके साथ-ही-साथ,
  • नामका जप किया जा सकता है।
  • इसमे लक्ष्य रखनेसे ही,
  • मन रुककर नामका जप हो सकता है।
  • श्वासके द्वारा नामका जप करते समय,
  • चित्तमें इतनी प्रसन्नता होनी चाहिये कि,
  • मानो मन आनन्दसे उछला पड़ता हो।
  • आनन्द रससे भरा हुआ,
  • अन्तःकरणरूपी पात्र मानो,
  • छलका पडता हो।
  • यदि इतने आनन्दका अनुभव न हो तो,
  • आनन्दकी भावना ही करनी चाहिये।
  • इसीके साथ भगवान को,
  • अपने अत्यन्त समीप जानकर,
  • उनके स्वरूपका ध्यान करना चाहिये,
  • मानो उनके समीप होनेका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है।
  • इस भावसे संसारकी सुध भुलाकर,
  • मनको परमात्मामे लगाना चाहिये।

15. ईश्वर-शरणागति

  • ईश्वर-प्रणिधानसे भी मन वशमें होता है,
  • अनन्य भक्तिसे परमात्माके शरण होना,
  • ईश्वर-प्रणिधान कहलाता है।
  • ईश्वर शब्दसे यहाँ पर,
  • परमात्मा और उनके भक्त,
  • दोनों ही समझे जा सकते हैं।
  • ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’,
  • ‘तस्मिस्तजने भेदाभावात्’,
  • ‘तन्मयाः’ –
  • इन श्रुति और भक्तिशास्त्रके सिद्धान्त-वचनोंसे,
  • भगवान्, ज्ञानी और भक्तोंकी एकता सिद्ध होती है।
  • श्रीभगवान् और उनके भक्तोंके प्रभाव और
  • चरित्रके चिन्तनमात्रसे,
  • चित्त आनन्दसे भर जाता है।
  • संसारका बन्धन मानो,
  • अपने-आप टूटने लगता है।
  • अतएव भक्तोंका सङ्ग करने,
  • उनके उपदेशोंके अनुसार चलने और
  • भक्तोंकी कृपाको ही,
  • भगवत्प्राप्तिका प्रधान उपाय समझनेसे भी,
  • मनपर विजय प्राप्त की जा सकती है।
  • भगवान् और सच्चे भक्तोंकी कृपासे,
  • सब कुछ हो सकता है।

16. मनके कार्योंको देखना

  • मनको वशमें करनेका,
  • एक बड़ा उत्तम साधन है,
  • मनसे अलग होकर,
  • निरन्तर,
  • मनके कार्योको,
  • देखते रहना।
  • जबतक हम,
  • मनके साथ मिले हुए है,
  • तभीतक,
  • मनमें इतनी चञ्चलता है।
  • जिस समय हम,
  • मनके द्रष्टा बन जाते हैं,
  • उसी समय,
  • मनकी चञ्चलता मिट जाती है।
  • वास्तवमें तो
  • मनसे,
  • हम सर्वथा भिन्न ही है।
  • किस समय मनमे क्या सकल्प होता है,
  • इसका पूरा पता हमें रहता है।
  • मुंबईमे बैठे हुए एक मनुष्यके मनमे,
  • दिल्ली किसी दृश्यका सङ्कल्प होता है,
  • इस बाातको यह अच्छी तरह जानता है।
  • यह निर्विवाद बात है कि,
  • जानने या देखनेवाला,
  • जाननेकी वा देखनेकी वस्तुसे,
  • सदा अलग होता है।
  • ऑखको आँख नहीं देख सकती।
  • इस न्यायसे मनकी बातोंको,
  • जो जानता या देखता है,
  • वह मनसे सर्वथा भिन्न है,
  • भिन्न होते हुए भी,
  • वह अपनेको मनके साथ मिला लेता है,
  • इसीसे उसका जोर पाकर मनकी
  • उद्दण्डता बढ़ जाती है।
  • यदि साधक अपनेको निरन्तर
  • अलग रखकर,
  • मनकी क्रियाओंका,
  • द्रष्टा बनकर देखनेका अभ्यास करे,
  • तो मन बहुत ही शीघ्र,
  • सङ्कल्परहित हो सकता है।

17. भगवन्नामकीर्तन

  • मग्न होकर उच्च स्वरसे,
  • परमात्माका नाम और गुणकीर्तन,
  • करनेसे भी मन परमात्मामें,
  • स्थिर हो सकता है।
  • भगयान् चैतन्यदेवने तो मनको निरुद्धकर,
  • परमात्मामे लगानेका,
  • यही परम साधन बतलाया है।
  • भक्त जब अपने प्रभुका,
  • नाम-कीर्तन करते-करते,
  • गद्गदकण्ठ, रोमाञ्चित और
  • अश्रुपूर्णलोचन होकर,
  • प्रेमावेशमें अपने आपको सर्वथा भुलाकर,
  • केवल परमात्माके रूपमें,
  • तन्मयता प्राप्त कर लेता है,
  • तब भला,
  • मनको जीतने में,
  • और कौन-सी बात बच रहती है ?
  • अतएव,
  • प्रेमपूर्वक परमात्माका नामकीर्तन करना,
  • मनपर विजय पानेका एक अत्युत्तम साधन है।
  • इस प्रकारसे मनको रोककर,
  • परमात्मामें लगानेके अनेक साधन और युक्तियाँ हैं।
  • इनमेंसे या अन्य किसी भी युक्तिसे,
  • किसी प्रकारसे भी,
  • मनको विषयोंसे हटाकर,
  • परमात्मामे लगानेकी चेष्टा करनी चाहिये।
  • मनके स्थिर किये बिना,
  • अन्य कोई भी अवलम्बन नहीं।
  • जैसे चञ्चल जलमें,
  • रूप विकृत दीख पड़ता है,
  • उसी प्रकार चञ्चल चित्तमें,
  • आत्माका यथार्थ स्वरूप,
  • प्रतिबिम्बित नहीं होता।
  • परन्तु जैसे स्थिर जलमें,
  • प्रतिबिम्ब जैसा होता है,
  • वैसा ही दीखता है,
  • इसी प्रकार केवल स्थिर मनसे ही,
  • आत्माका यथार्थ स्वरूप,
  • स्पष्ट प्रत्यक्ष होता है।
  • अतएव प्राणपणसे,
  • मनको स्थिर करनेका,
  • प्रयत्न करना चाहिये।
  • अबतक जो इस मनको स्थिर कर सके है,
  • वे ही उस श्यामसुन्दरके,
  • नित्यप्रसन्न नवीन-नील-नीरद,
  • प्रफुल्ल मुखारविन्दका दर्शन कर,
  • अपना जन्म और जीवन सफल कर सके है।
  • जिसने एक बार भी,
  • उस ‘अनूपरूपशिरोमणि’ के दर्शनका सयोग प्राप्त कर लिया,
  • वही धन्य हो गया।
  • उसके लिये उस सुखके सामने,
  • और सारे सुख फीके पड़ गये।
  • उस लाभके सामने,
  • और सारे लाभ नीचे हो गये!

यं लब्ध्वा चापरं लामं मन्यते नाधिकं ततः।

  • जिस लाभको पा लेनेपर,
  • उससे अधिक और कोई-सा लाभ भी नहीं जंचता।
  • यही योगसाधनका चरम फल है,
  • अथवा यही परम योग है।

Satsang

Dohe

मन को काबू में करने के 15 तरीके – 11 से 15