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मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके – 5 से 10

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5. मनको सत्कार्यमें संलग्न रखना

  • मन कभी निकम्मा नहीं रह सकता,
  • कुछ-न-कुछ काम,
  • इसको मिलना ही चाहिये;
  • इसलिए, इसे निरन्तर,
  • काममें लगाये रखना चाहिये।
  • निकम्मा रहनेसे ही,
  • इसे दूसरी बातें सूझा करती है।
  • इसलिए,
  • जबतक नींद न आये,
  • तब तक,
  • चुने हुए सुन्दर माङ्गलिक कार्योंमे,
  • इसे लगाये रखना चाहिये।
  • जाग्रत् समयके सत्कार्योंके चित्र ही,
  • स्वप्नमे भी दिखायी देंगे।

6. मनको परमात्मामें लगाना

श्रीकृष्ण ने, मन को, ईश्वर में लगाने के विषय में क्या कहा?

  • श्रीभगवान् ने कहा है –

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
(गीता ६ । २६)

  • यह चञ्चल और अस्थिर मन,
  • जहाँ-जहाँ दौड़कर जाय।
  • वहाँ-वहाँसे हटाकर वारंवार इसे,
  • परमात्मामें ही लगाना चाहिये।

  • मनको वशमें करनेका उपाय प्रारम्भ करनेपर,
  • पहलेपहले तो यह इतना जोर दिखलाता है,
  • अपनी चञ्चलता और शक्तिमत्तासे,
  • ऐसी पछाड़ लगाता है कि,
  • नया साधक घबड़ा उठता है।
  • उसके हृदयमें,
  • निराशा सी छा जाती है।
  • परन्तु ऐसी अवस्थामे,
  • धैर्य रखना चाहिये।
  • मनका तो ऐसा स्वभाव ही है,
  • लेकिन,
  • इसपर विजय पाना जरूरी है,
  • इसलिए घबड़ानेसे काम नहीं चलेगा।
  • मुस्तैदीसे सामना करना चाहिये।
  • आज न हुआ तो क्या,
  • कभी-न-कभी तो वशमें होगा ही।

भगवान् कृष्ण ने भी कहा है की, मन को नियंत्रण में करने का अभ्यास करते रहे

  • इसीलिये भगवान् ने कहा है –

शनैः शनैरुपरमेद बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थ मन कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत॥
(गीता ६ । २५)

  • धीरे-धीरे अभ्यास करता हुआ,
  • उपरामताको प्राप्त हो।
  • धैर्ययुक्त बुद्धिसे,
  • मनको परमात्मामे स्थिर करके और
  • किसी भी विचारको मनमे न आने दे।
  • बड़ा धैर्य चाहिये।
  • घबड़ाने, ऊबने या
  • निराश होनेसे काम नहीं होगा।
  • झाडू से घर साफ कर लेने पर भी,
  • जैसे धूल जमी हुई सी दीख पड़ती है।
  • पर इससे डरकर कोई झाडू लगाना,
  • बन्द नहीं करता।
  • उसी प्रकार मनको,
  • सस्कारोंसे रहित करते समय,
  • यदि मन और भी अस्थिर दीखे,
  • तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
  • किन्तु मन को नियंत्रण में करने का प्रयत्न,
  • करते रहना चाहिए।
  • इस प्रकारकी दृढ प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि,
  • किसी प्रकारका भी वृथा चिन्तन या
  • मिथ्या संकल्पकों मनमें नहीं आने दिया जायगा।
  • बड़ी चेष्टा, बड़ी दृढता रखनेपर भी,
  • मन साधककी चेष्टाओंको,
  • कई बार व्यर्थ कर देता है।
  • साधक तो समझता है कि,
  • मैं ध्यान कर रहा हूँ,
  • पर मनदेवता,
  • सङ्कल्प-विकल्पोंकी पूजामें लग जाते है।
  • जब साधक मनकी ओर देखता है,
  • तो उसे आश्चर्य होता है कि,
  • यह क्या हुआ।
  • इतने नये-नये सङ्कल्प,
  • जिनकी भावना भी नहीं की गयी थी,
  • कहाँसे आ गये?
  • बात यह होती है कि,
  • साधक जब मनको निर्विषय करना चाहता है,
  • तब संसारके नित्य अभ्यस्त विषयोसे,
  • मनको फुरसत मिल जाती है,
  • उधर परमात्मामें लगनेका,
  • इस समय तक उसे पूरा अभ्यास नहीं होता।
  • इसलिये फुरसत पाते ही,
  • वह उन पुराने दृश्यों को,
  • जो संस्कार रूपसे उसपर अंकित हो रहे हैं,
  • सिनेमाके फिल्मकी भॉति,
  • क्षण-क्षणमें एकके बाद एक उलटने लग जाता है।
  • इसीसे उस समय,
  • ऐसे सङ्कल्प मनमे उठते हुए मालूम होते है,
  • जो संसारका काम करते समय,
  • याद भी नहीं आते थे।
  • मनकी ऐसी प्रबलता देखकर,
  • साधक स्तम्भित-सा रह जाता है,
  • पर कोई चिन्ता नहीं।
  • जब अभ्यासका बल बढेगा,
  • तब उसको संसारसे फुरसत मिलते ही,
  • तुरन्त परमात्मामे लग जायगा।
  • अभ्यास दृढ़ होनेपर तो,
  • यह परमात्माके ध्यानसे हटाये जानेपर भी न हटेगा।
  • मन चाहता है सुख।
  • जबतक इसे वहाँ सुख नहीं मिलता,
  • विषयोंमे सुख दीखता है,
  • तबतक यह विषयोंमे रमता है।
  • जब अभ्याससे विषयोमें दुःख और
  • परमात्मामें परम सुख प्रतीत होने लगेगा,
  • तब यह स्वयं ही विषयोंको छोड़कर,
  • परमात्माकी ओर दौड़ेगा,
  • परन्तु जबतक ऐसा न हो,
  • तबतक निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये।
  • यह मालूम होते ही कि,
  • मन अन्यत्र भागा है,
  • तत्काल इसे पकड़ना चाहिए।
  • इसको पक्के चोरकी भॉति,
  • भागनेका बड़ा अभ्यास है,
  • इसलिये ज्यों ही यह भागे,
  • त्यों ही इसे पकडना चाहिये।
  • जिस-जिस कारणसे मन मांसारिक पदार्थोंमें विचरे,
  • उस-उससे रोककर परमात्मामें स्थिर करे।
  • मनपर ऐसा पहरा बैठा दे कि,
  • यह भाग ही न सके।
  • यदि किसी प्रकार भी न माने,
  • तो फिर इसे भागनेकी पूरी स्वतन्त्रता दे दी जाय;
  • परन्तु यह जहाँ जाय,
  • वहींपर परमात्माकी भावना की जाय,
  • यहींपर इसे परमात्माके स्वरूपमे लगाया जाय ।
  • इस उपायसे भी मन स्थिर हो सकता है।

7. एक तत्त्वका अभ्यास करना

  • योगदर्शन महर्षि पतञ्जलि लिखते है –
  • तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः। (समाधिपाद ३२)
  • चित्तका विक्षेप दूर करनेके लिये,
  • पाँच तत्त्वोंमेसे किसी एक तत्त्वका,
  • अभ्यास करना चाहिये।
  • एक तत्त्वके अभ्यासका अर्थ ऐसा भी हो सकता है कि,
  • किसी एक वस्तुकी या किसी मूर्तिविशेषकी तरफ,
  • एकदृष्टि से देखते रहना।
  • जबतक आखोंकी पलक न पड़े,
  • तबतक उस एक ही चिह्नकी तरफ,
  • देखते रहना चाहिये।
  • चिह्न धीरे-धीरे छोटा करते रहना चाहिये।
  • अन्तमे उस चिह्नको,
  • बिल्कुल ही हटा देना चाहिये।

दृष्टिः स्थिरा यत्र विनावलोकनम् –

  • अवलोकन न करनेपर भी दृष्टि स्थिर रहे।
  • ऐसा हो जाने पर चित्तविक्षेप नहीं रहता।
  • इस प्रकार प्रतिदिन,
  • आध-आध घण्टे भी अभ्यास किया जाय,
  • तो मनके स्थिर होनेमे,
  • अच्छी सफलता मिल सकती है।
  • इसी प्रकार दोनों भ्रुवोंके बीचमें दृष्टि जमाकर,
  • देखते रहनेका भी अभ्यास किया जाता है।
  • इससे भी मन निश्चल होता है,
  • इसीको त्राटक कहते है।
  • कहने की आवश्यकता नहीं कि,
  • इस प्रकारके अभ्यासमे,
  • नियमितरूपसे जो जितना अधिक समय दे सकेगा,
  • उसे उतना ही अधिक लाभ होगा।

8. नाभि या नासिकाग्रमें दृष्टि स्थापन करना

  • नित्य नियमपूर्वक पद्मासन या
  • सुखासनसे बैठकर,
  • सीधा बैठकर,
  • नाभिमे दृष्टि जमाकर,
  • जबतक पलक न पड़े,
  • तबतक एक-मनसे देखते रहना चाहिये।
  • ऐसा करनेसे,
  • शीघ्र ही मन स्थिर होता है।
  • इसी प्रकार,
  • नासिकाके अग्रभागपर,
  • दृष्टि जमाकर बैठनेसे भी,
  • चित्त निश्चल हो जाता है।
  • इससे ज्योतिके दर्शन भी होते है।

9. शब्द श्रवण करना

  • कानोमे अँगुली देकर,
  • शब्द सुननेका अभ्यास किया जाता है।
  • इसमे पहले भँवरोंके गुजार अथवा
  • प्रातःकालीन पक्षियोंके चह-चहाने जैसा शब्द सुनायी देता है।
  • फिर क्रमशः घुघुरू, शङ्ख, घण्टा,
  • ताल, मुरली, भेरी, मृदङ्ग,
  • नफीरी और सिंहगर्जनके सदृश,
  • शब्द सुनायी देते हैं।
  • इस प्रकार,
  • दस प्रकारके शब्द सुनायी देने लगनेके बाद,
  • दिव्य ॐ शब्द का श्रवण होता है,
  • जिससे साधक समाधिको प्राप्त हो जाता है।
  • यह भी मनके निश्चल करनेका,
  • उत्तम साधन है।

10. ध्यान या मानसपूजा

  • सब जगह,
  • भगवानके किसी नामको लिखा हुआ समझकर,
  • वारंवार उस नामके ध्यानमे,
  • मन लगाना चाहिये अथवा
  • भगवानके किसी स्वरूपविशेषकी,
  • अन्तरिक्ष में मनसे कल्पना कर,
  • उसकी पूजा करनी चाहिये।
  • पहले भगवान की मूर्तिके एक-एक अवयवका,
  • अलग-अलग ध्यान कर,
  • फिर दृढताके साथ,
  • सारी मूर्तिका ध्यान करना चाहिये।

(जैसे शिव पंचाक्षर मंत्र में शिव के गुणों का और उनके स्वरुप का वर्णन किया है)

  • उसीमे मनको अच्छी तरह,
  • स्थिर कर देना चाहिये।
  • मूर्तिके ध्यानमे इतना तन्मय हो जाना चाहिये कि,
  • संसारका भान ही न रहे।
  • फिर कल्पना-प्रसूत सामग्रियोंसे,
  • भगवान की मानसिक पूजा करनी चाहिये।

(जैसे शिव मानस पूजा मंत्र में भगवान् शिव की पूजा मनद्वारा, मन में ही, की जाती है)

  • प्रेमपूर्वक की हुई नियमित भगवद उपासनासे,
  • मनको निश्चल करनेमें,
  • बड़ी सहायता मिल सकती है।

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