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दु:ख का कारण, अहंकार, को समाप्त करने का सरल उपाय

जो पुरुष अहंकार-रहित, सारी कामनाओं को त्यागकर, ममता रहित, निस्पृह होकर, संसार में आचरण करता है, वह शांति को प्राप्त होता है।

मनुष्य के दुःख के कारण

  • मनुष्य के दु:ख के मुख्य कारण हैं –
  • अहंकार, इच्छा, कामना, आसक्ति अर्थात किसी भी वस्तु में लगाव।
  • इनमें सब की जड़ अहंकार है।
  • जितना ही जिसका अहंकार बढ़ा है,
  • उतनी ही इच्छाएं, कामना और आसक्ति बढ़ी है, और
  • उतनी ही मात्रा में वह अधिक से अधिक,
  • संतप्त, अशांत और बंधन ग्रस्त रहता है।

अहंकारी मनुष्य, अशांत और संतप्त क्यों रहता है?

  • अहंकारी मनुष्य को बात बात में अपमान का बोध होता है, और
  • वह कदम कदम पर अनेकों शत्रु पैदा कर लेता है।
  • किसी से सीधी बात करने में भी उसे पीड़ा सी होती है।
  • वह अपने हठ के सामने,
  • किसी की भली बात भी नहीं सुनना चाहता।
  • वह अपने ही हाथों नित्य बड़े गर्व के साथ,
  • अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है,
  • और उन्मत्त नशेबाज की भांति उसी में गौरव मानकर,
  • निर्लज्जताके साथ नाचता है।

भगवद गीता के अनुसार

भगवान ने गीता में कहा है –

विहाय कामान यः सर्वान पुमांश चरति निःस्पृहः
निर्ममॊ निरहंकारः स शान्तिम अधिगच्छति

  • अर्थात
  • जो पुरुष सारी कामनाओं को त्यागकर,
  • ममता रहित, अहंकार-रहित, निस्पृह होकर,
  • संसार में आचरण करता है,
  • वह शांति को प्राप्त होता है।
  • भगवान की माया बहुत प्रबल है।
  • और माया का आवरण हटे बिना,
  • अहंकार आदि से छुटकारा पाना,
  • बहुत कठिन है।

अहंकार से छुटकारा पाने का सरल उपाय

  • माया के महासागर से वही पार हो सकता है,
  • जो भगवान के शरण में जाकर,
  • उनका भजन करता है।
  • भगवान कहते हैं –
  • जो मेरा भजन करते हैं,
  • वे इस माया से तर जाते हैं।
  • इसके लिए मनुष्य को,
  • भगवान का भजन करना चाहिए।
  • भजन करने वाले व्यक्ति में,
  • जैसे जैसे भक्ति का विकास होता है,
  • वैसे वैसे उसकी बुरी प्रवृत्तियां नष्ट होते जाती है, और
  • उसका अपने पुरुषार्थ और बल का गर्व गल जाता है।
  • वह सभी बातों में,
  • सर्वसमर्थ प्रभु का ही कर्तृत्व देखता है।
  • उसकी आसक्ति सभी जगहों से हटकर,
  • प्रभु के चरणों में स्थिर हो जाती है।
  • एकमात्र प्रभु के चरणों में समर्पण ही,
  • उसकी इच्छा का विषय बन जाता है।
  • और प्रभु के नाम, रूप और गुण आदि में ही,
  • उसका अनन्य अनुराग हो जाता है।
  • और धीरे धीरे प्रपंच से उसका अहंकार,
  • उसकी इच्छा और आसक्ति,
  • अपने आप ही कम हो जाती है।
  • वह प्रभु का प्यारा बन जाता है, और
  • प्रभु, उसे अपने ह्रदयमें बिठाकर, निहाल कर देते हैं।
  • इसलिए,
  • जैसे लोभी के लिए धन सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है,
  • उसी प्रकार,
  • भगवान को ही एकमात्र मानकर,
  • उनके ह्रदय में बसने का सौभाग्य प्राप्त करें।

इस प्रकार मनुष्य के दुख का जो एक मुख्य कारण है, अहंकार, उसे समाप्त किया जा सकता है, और शांति और सुख का अनुभव किया जा सकता है।

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दु:ख का कारण, अहंकार, को समाप्त करने का सरल उपाय