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सत्यनारायण कथा – चौथा अध्याय

<< सत्यनारायण कथा अध्याय 3

  • श्री सूतजी ने आगे कहा –
  • वैश्य ने मंगलाचार करके यात्रा आरंभ की और
  • अपने नगर को चला।
  • उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर,
  • दंडी वेषधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने उससे पूछा – हे साधु!
  • तेरी नाव में क्या है?
  • अभिमानि वणिक हंसता हुआ बोला- हे दंडी!
  • आप क्यों पूछते हैं?
  • क्या धन लेने की इच्छा है?
  • मेरी नाव में तो बेल के पत्ते भरे हैं।
  • वैश्य का कठोर वचन सुनकर,
  • दंडी वेशधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने कहा – तुम्हारा वचन सत्य हो!
  • ऐसा कहकर,
  • वह वहां से चले गए और
  • कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए।

  • दंडी महाराज के जाने के पश्चात,
  • वैश्य ने,
  • नित्य-क्रिया से निवृत्त होने के बाद,
  • नाव को ऊंची उठी देखकर अचंभा किया तथा
  • नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर,
  • मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़ा।
  • मूर्च्छा खुलने पर,
  • अत्यंत शोक प्रकट करने लगा।
  • तब उसके जामाता ने कहा –
  • आप शोक न करें।
  • यह दंडी महाराज का श्राप है,
  • अतः उनकी शरण में ही चलना चाहिए,
  • तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी।

  • जामाता के वचन सुनकर,
  • वह साधु नामक वैश्य,
  • साधु महाराज के पास पहुंचा और
  • अत्यंत भक्तिभाव से प्रणाम करके बोला –
  • मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे,
  • उनके लिए मुझे क्षमा करें।
  • ऐसा कहकर,
  • महान शोकातुर हो रोने लगा।
  • तब दंडी भगवान बोले – हे वणिक पुत्र!
  • मेरी आज्ञा से बार-बार तुझे दुख प्राप्त हुआ है,
  • तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है।
  • साधु नामक वैश्य ने कहा – हे भगवन!
  • आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी,
  • आपके रूप को नहीं जान पाते,
  • तब मैं अज्ञानी भला कैसे जान सकता हूं।
  • आप प्रसन्न होइए,
  • मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार,
  • आपकी पूजा करूंगा।
  • मेरी रक्षा करो और
  • पहले के समान मेरी नौका को,
  • धन से पूर्ण कर दो।

  • उसके भक्तियुक्त वचन सुनकर,
  • श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और
  • उसकी इच्छानुसार वर देकर,
  • अंतर्धान हो गए।
  • तब श्वसुर व जामाता दोनों ने,
  • नाव पर आकर देखा कि
  • नाव धन से परिपूर्ण है।
  • फिर वह,
  • भगवान सत्यनारायण का पूजन कर,
  • साथियों सहित अपने नगर को चला।

  • जब वह अपने नगर के निकट पहुंचा,
  • तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा।
  • दूत ने साधु नामक वैश्य के घर जाकर,
  • उसकी पत्नीे को नमस्कार किया और कहा –
  • आपके पति अपने दामाद सहित,
  • इस नगर मे समीप आ गए हैं।
  • लीलावती और उसकी कन्या कलावती,
  • उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं।
  • दूत का वचन सुनकर,
  • साधु की पत्नी ने बड़े हर्ष के साथ,
  • सत्यदेव का पूजन पूर्ण किया और
  • अपनी पुत्री से कहा –
  • मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूं,
  • तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जाना।

  • परंतु कलावती पूजन एवं प्रसाद छोड़कर,
  • अपने पति के दर्शन के लिए चली गई।
  • प्रसाद की अवज्ञा के कारण सत्यदेव ने रुष्ट हो,
  • उसके पति को नाव सहित पानी में डुबा दिया।
  • लीलावती,
  • अपने पति को न देखकर,
  • रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी।
  • नौका को डूबा हुआ तथा
  • कन्या को रोती हुई देख,
  • साधु नामक वैश्य दुखित हो बोला –
  • हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से,
  • जो भूल हुई है,
  • उसे क्षमा करो।
  • उसके दीन वचन सुनकर,
  • सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गए।
  • आकाशवाणी हुई – हे वैश्य!
  • तेरी कन्या मेरा प्रसाद छोड़कर आई है,
  • इसलिए इसका पति अदृश्य हुआ है।
  • यदि वह घर जाकर,
  • प्रसाद खाकर लौटे,
  • तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा।
  • आकाशवाणी सुनकर,
  • कलावती ने घर पहुंचकर,
  • प्रसाद खाया और
  • फिर आकर अपने पति के दर्शन किए।
  • तत्पश्चात साधु वैश्य ने,
  • वहीं बंधु-बांधवों सहित,
  • सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया।
  • वह इस लोक का सुख भोगकर,
  • अंत में स्वर्गलोक को गया।
  • ॥इतिश्री श्रीसत्यनारायण व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय संपूर्ण॥

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