Categories
Satsang

मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके

  • इस लेख में,
  • मन को नियंत्रण में करने के लिए,
  • 15 उपाय दिए गए हैं।
  • इस पोस्ट में,
  • जितने उपाय बताए गए हैं,
  • वे सभी,
  • संत, महात्मा पुरुष या ऊँचे साधक द्वारा,
  • बताई गई बातों से लिए गए हैं।
  • आध्यात्मिक जीवन हो या
  • सांसारिक जीवन,
  • दोनों ही स्थितियों में,
  • सफलता के लिए,
  • मन पर कंट्रोल, सबसे महत्वपूर्ण है।
  • यदि आपको लगता है कि,
  • मन पर नियंत्रण करना जरूरी है,
  • तो अपनी अवस्था के अनुकुल
  • नीचे दिए गए उपाय में से,
  • किसी एक उपाय से शुरू कर सकते हैं।

इस आर्टिकल में, मन को शांत करने के लिए, जो आनापान ध्यान साधना है उसके बारे में नहीं दिया गया है।

आनापान ध्यान और विपश्यना के बारे में, विस्तार से, दूसरे आर्टिकल में दिया गया है।


मन को वश में क्यों करें?

भगवान् ने, मन के बारे में, गीता में क्या कहा है?

  • श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –
  • जिसका मन वशमें नहीं है,
  • उसके लिये,
  • योगका प्राप्त करना,
  • अत्यन्त कठिन है,
  • परन्तु जिसका मन वशमें है,
  • ऐसा प्रयत्नशील व्यक्ति,
  • साधन द्वारा,
  • योग प्राप्त कर सकता है।’

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
(गीता ६ ॥३६)

  • भगवान् श्रीकृष्णके,
  • इन वचनोंके अनुसार,
  • यह सिद्ध होता है कि,
  • मनको वश में किये बिना,
  • परमात्माकी प्राप्ति के लिए,
  • योग, भक्ति या साधना
  • अत्यन्त कठिन है।

दुःखोंसे मुक्ति के लिए, मन को काबू में करने के अलावा, दुसरा उपाय नही

  • यदि कोई ऐसा चाहे कि,
  • मन तो अपनी इच्छानुसार,
  • निरंकुश होकर,
  • विषय वाटिकामे,
  • स्वच्छन्द विचरण किया करे और
  • परमात्माके दर्शन,
  • अपनेआप ही हो जायें,
  • तो यह उसकी भूल है।
  • आनन्दमय परमात्माकी प्राप्ति और
  • दुःखोंसे मुक्ति चाहनेवाले को,
  • मन को वशमें करना ही पड़ेगा,
  • इसके सिवा,
  • और कोई उपाय नहीं है।

आदि शंकराचार्य ने मन के बारे में कहा है –

  • भगवान् शङ्कराचार्यने कहा है –

जित जगत् केन, मनो हि येन।

  • अर्थात,
  • जगत को किसने जीता?
  • जिसने मनको जीत लिया।
  • अर्थात, मन पर विजय मिलते ही,
  • मानो विश्वपर विजय मिल जाती है।

किन्तु, मन बड़ा चंचल और बलवान है

  • परन्तु,
  • मन स्वभावसे ही बड़ा चञ्चल और
  • बलवान् है और
  • इसे वशमें करना,
  • साधारण बात नहीं।
  • सारे साधन,
  • इसीको कंट्रोल में करने के लिये,
  • किये जाते है,

अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण से कहा था, मन बड़ा चंचल है

  • अर्जुनने भी मनको वशमें करना,
  • कठिन समझकर,
  • भगवान् से यही कहा था –

चञ्चलं हि मनः कृष्ण
प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये
वायोरिव सुदुष्करम्॥ (गीता ६।३४)

  • हे भगवन्।
  • यह मन बड़ा ही चंचल,
  • हठीला, दृढ़ और बलवान है।
  • इसे रोकना मैं तो,
  • वायुके रोकनेके समान,
  • अत्यन्त दुष्कर समझता हूँ।

लेकिन, भगवान् कृष्ण ने, अर्जुन को, मन वश में करने का रास्ता बताया

  • भगवान् ने भी इस बातको स्वीकार किया,
  • पर साथ ही उपाय भी बतला दिया –

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
(गीता ६ । ३५)

  • भगवान् ने कहा, – अर्जुन!
  • इसमे कोई सन्देह नहीं कि,
  • इस चञ्चल मनका निग्रह करना,
  • बड़ा ही कठिन है,
  • परन्तु अभ्यास और वैराग्यसे,
  • यह वशमें हो सकता है।
  • इससे यह सिद्ध हो गया कि,
  • मनका वशमें करना कठिन भले ही हो,
  • पर असम्भव नहीं, और
  • इसके वश किये बिना,
  • दुःखोंकी निवृत्ति नहीं।
  • इसलिए मन को,
  • वश में करने का,
  • निरंतर प्रयास करना ही चाहिये।
  • इसके लिये,
  • सबसे पहले इसका साधारण स्वरुप और
  • स्वभाव जानने की आवश्यकता है।

मनका स्वरूप

मन क्या है?

  • यह आत्म और अनात्म पदार्थके,
  • बीचमे रहनेवाली एक विलक्षण वस्तु है।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

  • मन इतना बलवान है की,
  • यह व्यक्ति को,
  • बंधन या मोक्ष दोनों में से,
  • किसी एक रास्ते पर ले जा सकता है।
  • बस, मन ही जगत् है,
  • मन नहीं तो जगत् नहीं।

मन क्या करता है?

  • मन का कार्य है,
  • संकल्प-विकल्प करना,
  • जिसकी वजह से,
  • विकार उत्पन्न होते है।
  • यह जिस पदार्थको,
  • भलीभाँति ग्रहण करता है,
  • स्वयं भी तदाकार बन जाता है।
  • साधारणतया, यही मनका,
  • स्वरूप और स्वभाव है।
  • मन रागके अर्थात
  • आसक्ति के साथ ही चलता है।
  • सारे अनर्थों और दुःखो की उत्पत्ति,
  • रागसे ही होती है।
  • राग न हो तो,
  • मन प्रपञ्चोंकी ओर न जाय।

तो मन को कण्ट्रोल कैसे करें?

  • अब, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की,
  • यह वशमे कैसे हो।
  • इसके लिये उपाय भी,
  • भगवान् ने बतला ही दिया है –
  • अभ्यास और
  • वैराग्य।
  • यही उपाय योगदर्शनमे,
  • महर्षि पतञ्जलिने बतलाया है –

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध।
(समाधिपाद १२)

  • अर्थात,
  • अभ्यास और वैराग्यसे ही,
  • चित्तका निरोध होता है।
  • इसलिए,
  • इसी अभ्यास और,
  • वैराग्य पर,
  • विचार करना चाहिये।

वैराग्य और अभ्यास से मन का नियंत्रण

  • निचे मन को वश में करने के,
  • कुछ उपाय दिए गए है
  • जिसमे पहला उपाय,
  • वैराग्य से संबंधित है और
  • बाद के उपाय,
  • अभ्यास से सम्बंधित है।

1. वैराग्य से संबंधित तरीका – भोगों में वैराग्य

सांसारिक पदार्थों और भोगों की सच्चाई क्या है?

  • जबतक संसारकी वस्तुएँ,
  • सुन्दर और सुखप्रद मालूम होती है,
  • तभीतक मन उनमें जाता है।
  • लेकिन जब,
  • इन भौतिक पदार्थों और भोगों की,
  • असली सच्चाई समझ में आ जाये की,
  • ये सब पदार्थ,
  • दोषयुक्त और दुःखप्रद है,
  • तो मन कदापि इनमें नहीं लगेगा।
  • क्योंकि,
  • इन भोगों के अंत में दुःख ही है,
  • भले ही कुछ समय के लिए,
  • इनमे ख़ुशी मिलती हो,
  • किन्तु अंत में दोष ही है।

सांसारिक वस्तुओं में थोड़े समय के लिए ख़ुशी

  • जब मन को,
  • यह सच्चाई समझ में आ जायेगी,
  • तब मन,
  • कभी इन वस्तुओं के पीछे नहीं दौड़ेगा और
  • यदि कभी इनकी ओर गया भी,
  • तो उसी समय वापस लौट आवेगा।
  • इसलिये, संसारके सारे पदार्थोंमे,
  • चाहे वे इहलौकिक हो या पारलौकिक,
  • दुःख और दोषकी प्रत्यक्ष भावना करनी चाहिये।
  • ऐसा दृढ़ प्रत्यय करना चाहिये कि,
  • इन पदार्थोंमें,
  • केवल दोष और दुःख ही भरे हुए है।

अध्यात्म के रास्ते की सच्चाई क्या है?

  • रमणीय और सुखरूप दीखनेवाली,
  • वस्तुमे ही मन लगता है।
  • यदि यह रमणीयता और सुखरूपता,
  • विषयोंसे हटकर,
  • परमात्मा में दिखायी देने लगे,
    • जैसा कि वास्तवमे है,
  • तो यही मन,
  • तुरन्त विषयोंसे हटकर,
  • परमात्मामे लग जाय।
  • यही वैराग्यका साधन है,
  • और वैराग्य ही,
  • मन जीतनेका एक उत्तम उपाय है।
  • सच्चा वैराग्य तो,
  • संसारके इस दीखनेवाले स्वरूपका
    • सर्वथा अभाव और
  • उसकी जगह परमात्माका
    • नित्यभाव प्रतीत होनेमे है।
  • परन्तु आरम्भमे नये साधकको,
  • मन वश करनेके लिये,
  • इस लोक और परलोकके समस्त पदार्थोंमे,
  • दोष और दुःख देखना चाहिये,
  • जिससे मनका अनुराग उनसे हटे।

भगवान् कृष्ण ने, इस वैराग्य के तरीके के बारे में क्या कहा?

  • श्रीभगवान् ने कहा है –

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्यु जराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम्॥
(गीता १३ । ८)

  • इस लोक और परलोकके,
  • समस्त भोगोंमें
    • वैराग्य, अहंकारका त्याग,
  • इस शरीरमे,
    • जन्म, मृत्यु,
    • बुढ़ापा और रोग आदि
  • दुःख और दोष देखने चाहिये।
  • इस प्रकार वैराग्यकी भावनासे,
  • मन वशमे हो सकता है ।
  • यह तो वैराग्यका संक्षिप्त साधन हुआ,
  • अब कुछ अभ्यासोंपर विचार करें।

2. नियमसे रहना

सांसारिक हो या आध्यात्मिक जीवन, सफलता के लिए, नियम का बड़ा महत्व है

  • मनको वश करनेमें,
  • नियमानुवर्तितासे,
    • अर्थात नियमसे रहने से
  • बड़ी सहायता मिलती है।
  • सारे काम ठीक समयपर,
  • नियमानुसार होने चाहिये।
  • प्रातःकाल बिस्तरसे उठकर,
  • रातको सोने तक,
  • दिनभरके कार्योंकी,
  • एक ऐसी नियमित दिनचर्या बना लेनी चाहिये,
  • जिससे जिस समय जो कार्य करना हो,
  • मन अपने-आप स्वभावसे ही,
  • उस समय उसी कार्य में लग जाय।
  • संसार-साधनमे तो नियमानुवर्तितासे,
  • लाभ होता ही है,
  • परमार्थमे भी इससे बड़ा लाभ होता है।

ध्यान के समय का नियम

  • अपने जिस इष्ट स्वरूपके ध्यानके लिये,
  • प्रतिदिन जिस स्थानपर, जिस आसनपर,
  • जिस आसनसे, जिस समय और
  • जितने समय बैठा जाय,
  • उसमे किसी दिन भी,
  • आलस या व्यतिक्रम नहीं होना चाहिये।
  • पाँच मिनटका भी नियमित ध्यान,
  • अनियमित अधिक समयके ध्यानसे उत्तम है।
  • आज दस मिनट बैठे, कल आध घण्टे,
  • परसो बिल्कुल नहीं किया,
  • इस प्रकारके साधनसे,
  • साधक को मनको,
  • शांत और नियंत्रण करना,
  • अत्यंत कठिन होता है और
  • सिद्धि भी कठिनतासे मिलती है।
  • जब पाँच मिनटका ध्यान नियमसे होने लगे,
  • तब दस मिनटका करे,
  • परन्तु दस मिनटका करनेके बाद,
  • किसी दिन भी नौ मिनट न होना चाहिये।
  • इसी प्रकार स्थान, आसन, समय,
  • इष्ट और मन्त्रका,
  • बारबार परिवर्तन नहीं करना चाहिये।
  • इस तरह, नियम से रहने से भी,
  • मन स्थिर होता है।

सभी बातों में नियम

  • नियमोंका पालन,
  • खाने, पीने, पहनने,
  • सोने और व्यवहार करने,
  • सभी चीजों में होना चाहिये।
  • नियम अपनी अवस्था के अनुकुल,
  • शास्त्रसम्मत बना लेने चाहिये।

3. मनकी क्रियाओंपर विचार

मन के अच्छे और बुरे विचार

  • मनके प्रत्येक कार्यपर,
  • विचार करना चाहिये।
  • प्रतिदिन रातको सोनेसे पूर्व,
  • दिनभरके मनके कार्योंपर,
  • विचार करना उचित है।
  • यद्यपि,
  • मनकी सारी उधेड़-बुनका,
  • स्मरण होना बड़ा कठिन है,
  • परन्तु,
  • जितनी याद रहे,
  • उतनी ही बातों पर विचार कर,
  • जो-जो संकल्प अर्थात विचार,
  • सात्त्विक मालूम दें,
  • उनके लिये,
  • मनकी सराहना करना और
  • जो-जो सङ्कल्प,
  • तामसिक अर्थात बुरे मालूम पड़ें,
  • उनको सुधारने का संकल्प करना चाहिए।

मन के बुरे संकल्प, धीरे धीरे समाप्त हो जाएंगे

  • प्रतिदिन इस प्रकारके अभ्याससे,
  • मनपर सत्कार्य करनेके और
  • बुरे कार्य छोड़नेके संस्कार जमने लगेंगे।
  • जिससे कुछ ही समयमें,
  • मन बुराइयों से बचकर,
  • भले भले कार्योंमे लग जायगा|
  • मन पहले भले कार्यवाला होगा,
  • तब उसे वश करनेमें सुगमता होगी।

बुरी संगति में, पड़ा हुआ बालक का उदाहरण

  • बुरी संगति में पड़ा हुआ बालक जबतक,
  • कुसंगति नहीं छोड़ता,
  • तबतक उसे बुरी संगति से,
  • दूर रहने की सलाह मिलती रहती है।
  • क्योंकि,
  • जबतक वह बालक,
  • बुरी सांगत में है,
  • तब तक उसे कुछ भी समझाना,
  • कठिन होता है।
  • पर जब कुसंग छूट जाता है,
  • तब उसे बुरी सलाह नहीं मिल सकती,
  • दिनरात घरमे उसको,
  • माता-पिताके सदुपदेश मिलते हैं,
  • वह भली-भली बातें सुनता है।
  • तब फिर उसके सुधरकर,
  • माता-पिताके आज्ञाकारी होनेमे,
  • विलम्ब नहीं होता।

मन में, बुरे विचारों की जगह, अच्छे विचार आना शुरू हो जाएंगे

  • इसी तरह,
  • यदि विषय-चिन्तन करनेवाले मनको,
  • कोई एक साथ ही,
  • सर्वथा विषयरहित करना चाहे,
  • तो वह नहीं कर सकता।
  • पहले मनको,
  • बुरे चिन्तनसे बचाना चाहिये,
  • जब वह परमात्म-सम्बन्धी,
  • शुभ चिन्तन करने लगेगा,
  • तब उसको वश करनेमें,
  • कोई कठिनाई नहीं होगी।

4. मनके कहनेमें न चलना

  • मनके कहने में,
  • नहीं चलना चाहिये।
  • जबतक यह मन,
  • वशमें नहीं हो जाता,
  • तबतक इसके कहने के अनुसार,
  • नहीं चलना चाहिये।
  • जैसे शत्रुके प्रत्येक कार्यपर,
  • निगरानी रखनी पड़ती है,
  • वैसे ही,
  • इसके भी प्रत्येक कार्यको,
  • सावधानीसे देखना चाहिये।

मन लोभी, मन लालची, मन चंचल, मन चोर।
मन के मते ना चालीये। मन पल पल में कहीं और॥

  • मनकी खातिर,
  • भूलकर भी नहीं करनी चाहिये।
  • जहाँ कहीं यह उलटा सीधा करने लगे,
  • वहीं इसे धिक्कारना और पछाड़ना चाहिये।

मन बड़ा बलवान, किन्तु धीरे धीरे काबू में आ ही जाता है

  • यद्यपि यह बड़ा बलवान् है,
  • कई बार इससे हारना होगा,
  • पर साहस नहीं छोड़ना चाहिये।
  • जो हिम्मत नहीं हारता,
  • वह एक दिन मनको,
  • अवश्य जीत लेता है।
  • इससे लड़नेमे एक विचित्रता है।
  • यदि दृढ़तासे लढा जाय तो,
  • लड़ने वाले का बल दिनोदिन बढ़ता है और
  • इसका क्रमशः घटने लगता है।
  • इसलिये,
  • इससे लड़नेवाला एक-न-एक दिन,
  • इसपर अवश्य ही विजयी होता है।
  • अतएव इसकी हाँ-में-हाँ न मिलाकर,
  • प्रत्येक कार्यमें खूब सावधानीसे बरतना चाहिये।
  • यह मन बड़ा ही चतुर है।
  • कभी डरावेगा, कभी फुसलावेगा,
  • कभी लालच देगा,
  • बड़े-बड़े अनोखे रंग दिखलावेगा,
  • परन्तु कभी इसके धोखेमे न आना चाहिये।
  • भूलकर भी इसका विश्वास नहीं करना चाहिये।

आज्ञाकारी मन

  • इस प्रकार करनेसे,
  • इसकी हिम्मत टूट जायगी,
  • और
  • लड़ने और धोखा देनेकी,
  • आदत छूट जायगी।
  • अंत में यह आज्ञा देनेवाला न रहकर,
  • सीधा-सादा आज्ञा पालन करनेवाला,
  • विश्वासी सेवक बन जायगा।

Next.. (आगे पढें ..) – मन को वश में करने के 15 तरीके – 5 से 15

मन को वश में करने के 15 तरीके – अगला पेज पढ़ने के लिए क्लिक करें >>

मन को वश में करने के 15 तरीके – 5 से 15

For next page of How to Control Mind, please visit >>

15 Ways to Control Mind – 5 to 15

Satsang

Dohe

मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके
Categories
Satsang

दुःख की परिस्थिति से लाभ

दुखी क्यों

  • तुम्हारे पास धन नहीं, बुद्धि नहीं,
  • स्वस्थ तन नहीं और
  • जगत्‌में अपमान मिल रहा है।
  • इसीलिये सुख नहीं हैं –
  • ऐसी तुम्हारी धारणा है।

  • यदि वस्तुत: तुम्हारी ऐसी ही परिस्थिति है,
  • तो तुम्हे प्रसन्न होना चाहिये।
  • क्योंकि, इसी अवस्थामें,
  • मनुष्य जगत्‌की ओरसे,
  • मोह ममता हटाकर,
  • भगवानकी ओर बढ़ता है।

ईश्वर चाहते है की –

  • भगवान् जिस पर बड़ी दया करते हैं,
  • उसीके सामने,
  • ऐसी परिस्थिति लाकर रखते हैं।
  • निश्चय ही भगवान् तुम पर,
  • कृपादृष्टि डाल रहे है, और
  • तुम्हे अपनी शरणमें लेनेको उत्सुक है।

दुःख की स्थिति से लाभ उठाये

  • अब तुम्हारा काम है कि,
  • इस परिस्थिति से लाभ उठाये।
  • संसारके मनुष्य,
  • यहाँ दुःख और अपमान पाकर भी,
  • ईसीमें रचे-पचे रहते हैं।
  • सोभाग्यकी बात है कि,
  • तुम्हे जगत्‌के स्वरूपका,
  • वास्तविक अनुभव हुआ।
  • अब तुम यह निश्चय करो कि,
  • दीनबंधु भगवान के सिवा,
  • कोई भी अपना नहीं।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम।

  • यह जगत्, यह शरीर,
  • अनित्य और दुःख-रूप है –
  • इसे पाकर भगवान का स्मरण करो।
  • ईश्वर के प्रति समर्पण ही जीवनका सार है।

भगवान का स्मरण

  • आप सुख, स्वास्थ, धन,
  • मान या अपना उद्धार,
  • जो कुछ भी चाहो,
  • उसकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय है,
  • भगवानका भजन।
  • भजन करने में,
  • कोई कठिनाई नही है।

ईश्वर का भजन कैसा हो

  • अपना तन, मन, धन –
  • जो कुछ भी अपना कहा जानेवाला हो,
  • सब कुछ मनसे भगवानको अर्पण कर दें।
  • आप भगवान के हो जाए।
  • सोयें भगवान‌ के लिये,
  • जागे भगवान के लिये।
  • सब कार्य, सारी चेष्टा,
  • भगवान्‌के लिये हो।
  • भगवान् ही अपने लक्ष्य,
  • अपने प्राणोंके आराध्य बन जायें।
  • ऐसी अवस्थामें जो सुख मिलेगा,
  • उसकी कहीं तुलना नहीं है ।

काम और घर छोड़ने की जरूरत नहीं

  • आप घर न छोड़ें,
  • काम न छोड़ें,
  • केवल भगवान्‌से नाता जोड़ लें।
  • उनके ही हो जाएं।
  • सब कार्य करते हुए,
  • भगवानका चिन्तन करें।
  • तो समझो बेड़ा पार है।
  • शेष प्रभुकी कृपा ।

Satsang

Dohe

दुःख की परिस्थिति से लाभ
Categories
Satsang

ईश्वर भक्त के दस गुण – ईश्वर भक्त की पहचान

सिर्फ वेश भूषा देखकर, किसी को ईश्वर भक्त ना माने

  • बहुत से लोग, 
  • छली, पाखण्डी और दुष्ट पुरुषोंको ही, 
  • उनके बाहरका भेष देखकर,
  • ईश्वरभक्त मान बैठते हैं। 
  • जैसे रावण एक अहंकारी पुरुष था, 
  • किंतु उसने कपटवेश धारण करके, 
  • सीताजी का हरण कर लिया था।
  • उसी प्रकार आज के युग में भी, 
  • कुछ पाखंडी, कपटवेश धारण कर लेते हैं, 
  • और अपने आप को ईश्वर का भक्त कहते हैं।
  • यदि लोग, इन दुष्ट पुरुषों का, 
  • कपट रूप पहले से जान लें, 
  • तो उनके माया जालसे बच सकते हैं।

ऐसे लोगों से बचें

  • कुछ पाखंडी मनुष्य
  • सिर्फ ऊपर से ईश्वर भक्ति का स्वांग दिखाया करते हैं।
  • लेकिन,
  • उनके मनके भीतर
  • छल और पाखंड के विचार भरे होते हैं। 
  • इसलिए उन्हें ईश्वर भक्त नहीं समझना चाहिए, और 
  • ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए।

तो ईश्वर भक्त की पहचान क्या है?

भगवान ने भगवद गीता के अध्याय 12 के श्लोक 13 और 14 में ईश्वर भक्त की पहचान बतलाई है –

अद्वेष्टा सर्वभूतानां, 
मैत्रः करुण एव च। 
निर्ममो निरहङ्‍कारः, 
समदुःखसुखः क्षमी॥ 

संतुष्टः सततं योगी, 
यतात्मा दृढ़निश्चयः। 
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो, 
मद्भक्तः स मे प्रियः॥

ईश्वर भक्त के दस महत्वपूर्ण गुण

1

  • ईश्वरभक्त किसी भी जीव से,
  • द्वेष या घृणा का भाव नहीं रखता है।
    • सब भूतों में द्वेष भाव से रहित होता है। 

2

  • बिना किसी इच्छा या स्वार्थ के,
  • सभी जीवों पर दया करता है।
    • अर्थात स्वार्थ रहित सबका प्रेमी, और
    • हेतु रहित दयालु होता है।

3

  • किसी भी व्यक्ति के प्रति,
  • राग या आसक्ति नहीं होती है।
    • अर्थात ममता से रहित है।

4

  • किसी भी बात में,
  • अहंकार की भावना नहीं रहती है।

5

  • सुख दुःखमें,
  • एक भावसे रहता है।
    • सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम रहता है।

6

  • हानि या लाभमें,
  • एकसा संतुष्ट रहता है।
    • निरन्तर संतुष्ट रहता है।

7

  • मनसहित इन्द्रियोंको,
  • अपने वशमें रखता है।

8

  • अपराध करने वाले को भी,
  • अभय देने वाला होता है।
    • क्षमावान होता है।

9

  • ईश्वरमें दृढ़ निश्चय वाला होता है, और 

10

  • मन और बुद्धि को,
  • ईश्वर के चरणों में अर्पण किए हुए रहता है।

  • जो लोग सादा चालचलन रखते हैं, 
  • मन और इंद्रियों को वश में रखते हैं,  
  • सच्चाई की राह पर चलते हैं, 
  • ऐसे लोगों में ईश्वर के लिए  प्रेम होता है, और 
  • वेही ईश्वर के सच्चे भक्त है।

ऐसा मनुष्य ईश्वर भक्त नहीं हो सकता

  • जिसने मन का अहंकार दूर नहीं किया, 
  • जिसका क्रोध नहीं गया है, 
  • जो अविद्या के अन्धकारमें फंसा हुआ है, 
  • जिसकी आशाएं,  इच्छाएं नहीं मिटी हैं, 
  • किसी भी वस्तु में या जीव से आसक्ति बनी हुई है, 
  • जो अच्छे पुरुषोंका संग नहीं करता है, 
  • उसे ईश्वरभक्त नहीं समझना चाहिये।

ईश्वर भक्त का सरल स्वभाव

  • ईश्वरभक्त उसे ही समझना चाहिये,
  • जो दूसरोंको दुःख न दे, 
  • सबकी भलाई करता रहे, 
  • किसीका माल न छिपा रक्खे, 
  • सब धर्मकथाओंको प्रेमसे सुने, 
  • ईश्वरकी उपासना, पाठ, पूजा, प्रणाम आदि समयानुसार करता रहे, 
  • उसे अवश्य ईश्वरभक्त समझना चाहिये ।

  • ईश्वरभक्तके भाव बहुत ही शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं।
  • ईश्वरभक्तका स्वभाव सरल होता है। 
  • वह सबका हितैषी होता है। 
  • शरीरके श्रृंगार में उसकी रूचि नहीं रहती है और 
  • सादगी से प्रेम होता है।

भक्तियोग – List

Satsang

Dohe

ईश्वर भक्त के दस गुण - ईश्वर भक्त की पहचान
Categories
Satsang

ध्यान कैसे करना चाहिये? जप, साकार और निराकार ध्यान

  • कुछ लोग निराकार शुद्ध ब्रह्मका ध्यान करते हैं,
  • कुछ साकार दो भुजावाले और
  • कुछ चतुर्भुजधारी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हैं।
  • वास्तवमें,
  • भगवान् विष्णु, राम और कृष्ण जैसे एक हैं,
  • वैसे ही देवी, शिव, गणेश और सूर्य भी, उनसे कोई भिन्न नहीं।

अठारह पुराणों में ईश्वर

  • एक ही परमात्माका निरूपण करनेके लिये,
  • श्रीवेदव्यासजीने अठारह पुराणोंकी रचना की है।
  • जिस देवके नामसे जो पुराण बना,
  • उसमें उसीको सर्वोपरि, सृष्टिकर्ता,
  • सर्वगुणसम्पन्न ईश्वर बतलाया गया।
  • वास्तवमें नाम-रूपके भेदसे,
  • सबमें उस एक ही परमात्माकी बात कही गयी है।
  • नाम-रूपकी भावना, साधक अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं।
  • यदि कोई एक स्तम्भको ही परमात्मा मानकर उसका ध्यान करे,
  • तो वह भी परमात्माका ही ध्यान होता है।
  • किन्तु उसके लक्ष्यमें ईश्वरका पूर्ण भाव होना चाहिये।

साकार और निराकार ध्यान

  • साकार और निराकार ध्यान,
  • दोनोंका फल एक ही है।
  • फर्क केवल साधन में है,
  • अर्थात ध्यान करने की क्रिया है।
  • साकारकी अपेक्षा,
  • निराकारका ध्यान कुछ कठिन है।
  • किन्तु अपनी–अपनी प्रीतिके अनुसार साधक,
  • निराकार या साकारका ध्यान कर सकते हैं।

निराकार के उपासक को साकारका तत्व जानना चाहिए

  • निराकार का ध्यान करने वाले,
  • यदि साकारका तत्त्व समझकर,
  • परमात्माको सर्वदेशी, विश्वरूप मानते हुए,
  • निराकारका ध्यान करें तो फल शीघ्र होता है।
  • साकारका तत्त्व न समझनेसे,
  • कुछ विलम्बसे सफलता होती है।

साकारके उपासक को भी निराकार ब्रह्म का तत्व जानना चाहिए

  • इसी प्रकार,
  • साकारके ध्यान करनेवालो को,
  • निराकार, व्यापक ब्रह्मका तत्त्व जाननेकी आवश्यकता है।
  • इसीसे वह सुगमतापूर्वक,
  • शीघ्र सफलता प्राप्त कर सकता है।

साकार या निराकार में सुलभ मार्ग

  • वास्तवमें निराकारके प्रभावको जानकर,
  • जो साकारका ध्यान किया जाता है,
  • वही ईश्वरकी शीघ्र प्राप्तिके लिये,
  • उत्तम और सुलभ साधन है।
  • परन्तु परमात्माका असली स्वरूप,
  • इन दोनोंसे ही विलक्षण है,
  • जिसका ध्यान नहीं किया जा सकता।

भगवद गीता में ध्यान का महत्व

  • भगवान्‌ने गीतामें, ध्यान का प्रभाव समझाकर,
  • ध्यान करनेकी ही बड़ाई की है।

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता:॥ (१२।२)

  • हे अर्जुन!
  • मेरेमें मनको एकाग्र करके,
  • निरन्तर मेरे भजन, ध्यानमें लगे हुए,
  • जो भक्तजन, अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासे युक्त हुए,
  • मुझ सगुणरूप परमेश्वरको भजते हैं,
  • वे मुझे योगियोंमें भी अति उत्तम योगी मान्य हैं,
  • अर्थात् उनको मैं अति श्रेष्ठ मानता हूँ।

निराकार का ध्यान

  • निराकारके ध्यान करनेकी कई युक्तियाँ हैं।
  • जिसको जो सुगम मालूम हो,
  • वह उसीका अभ्यास करे।
  • सबका फल एक ही है।
  • कुछ युक्तियाँ निचे दी गयी है –

गीता के अनुसार ध्यान कैसे करें?

  • साधकको
  • भगवद गीताके अध्याय ६ – श्लोक ११ से १३ के अनुसार,
  • एकान्त स्थानमें बैठकर,
  • नेत्रोंकी दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखकर,
  • या आँखें बंदकर (अपनी इच्छानुसार),
  • ध्यान करना चाहिए।

ध्यान कितने समय करें?

  • नियमपूर्वक प्रतिदिन कम से कम तीन घण्टे का समय,
  • ध्यानके अभ्यासमें बिताना चाहिये।
  • तीन घण्टे कोई न कर सके तो,
  • दो करे, दो नहीं तो एक घण्टे,
  • अवश्य ध्यान करना चाहिये।
  • शुरू शुरू में मन न लगे,
  • तो पंद्रह–बीस मिनटसे आरम्भ कर,
  • धीरे–धीरे ध्यानका समय बढ़ाते रहे।
  • बहुत शीघ्र प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले साधकोंके लिये,
  • तीन घण्टेका अभ्यास आवश्यक है।

निराकार ध्यान में ॐ कार जाप

  • ध्यानमें नाम जपसे बड़ी सहायता मिलती है।
  • ईश्वरके सभी नाम समान हैं,
  • परंतु निराकारकी उपासनामें ॐ कार प्रधान है।
  • योगदर्शनमें भी महर्षि पतंजलिने कहा है –
  • तस्य वाचक: प्रणव:॥
  • तज्जपस्तदर्थभावनम्॥
  • उसका वाचक प्रणव (ॐ) है,
  • उस प्रणवका जप करना और
  • उसके अर्थ (परमात्मा) का ध्यान करना चाहिये,
  • स्वरूपका ध्यान करना चाहिये।

ध्यान में नाम का जप

  • ध्यानका लक्ष्य ठीक करनेके लिये,
  • पतंजलिजीके कथनानुसार,
  • स्वरूपका ध्यान करते हुए,
  • नामका जप करना चाहिये।
  • ॐ की जगह कोई,
  • आनन्दमय ब्रह्मका जप करे,
  • तो भी कोई आपत्ति नहीं है।
  • भेद नामोंमें है,
  • फलमें कोई फर्क नहीं है।

ध्यान के समय जप कैसे करें? मन से, वाणी से या श्वास में?

मन और बुद्धि से जप

  • जप सबसे उत्तम वह होता है,
  • जो मनसे होता है,
  • जिसमें जीभ हिलाने और होठोंसे उच्चारण करनेकी,
  • कोई आवश्यकता नहीं होती।
  • ऐसे जपमें,
  • ध्यान और जप दोनों साथ ही हो सकते हैं।
  • अन्तःकरणके चार पदार्थोंमेंसे,
  • मन और बुद्धि दो प्रधान हैं।
  • बुद्धिसे पहले परमात्माका स्वरूप निश्चय करके,
  • उसमें बुद्धि स्थिर कर ले,
  • फिर मन से,
  • उसी सर्वत्र परिपूर्ण आनन्दमयकी पुन:–पुन: आवृत्ति करते रहे।
  • यह जप भी है, और ध्यान भी।
  • वास्तवमें आनन्दमयके जप और ध्यानमें,
  • कोई खास अन्तर नहीं है।
  • दोनों काम एक साथ किये जा सकते हैं।

श्वास के द्वारा जप

  • दूसरी युक्ति श्वासके द्वारा जप करनेकी है।
  • श्वासोंके आते और जाते समय,
  • कण्ठसे नामका जप करे।
  • जीभ और होठोंको बंदकर,
  • श्वासके साथ नामकी आवृत्ति (नामका जप) करते रहे,
  • यही प्राणजप है,
  • इसको प्राणद्वारा उपासना कहते हैं।
  • यह जप भी उच्च श्रेणीका है।

वाणी से जप

  • यह न हो सके तो,
  • मनमें ध्यान करे और,
  • जीभसे उच्चारण करे,
  • परन्तु इनमें साधकके लिये अधिक सुगम और लाभप्रद,
  • श्वासके द्वारा किया जानेवाला जप है।
  • यह तो जपकी बात हुई,
  • असलमें जप तो निराकार और साकार,
  • दोनों प्रकारके ध्यानमें ही होना चाहिये।

निराकार ध्यान – नेति, नेति

अब निराकारके ध्यानके सम्बन्धमें –

  • एकान्त स्थानमें,
  • स्थिर आसनसे बैठकर,
  • एकाग्रचित्तसे इस प्रकार अभ्यास करे।
  • जो कोई भी वस्तु,
  • इन्द्रिय और मनसे प्रतीत हो,
  • उसीको कल्पित समझकर,
  • उसका त्याग करते रहे।
  • जो कुछ प्रतीत होता है,
  • सो है नहीं।
  • स्थूल शरीर, ज्ञानेन्द्रियाँ,
  • मन, बुद्धि,
  • आदि कुछ भी नहीं हैं।
  • इस प्रकार,
  • सबका अभाव करते करते,
  • अभाव करनेवाले पुरुषकी वह वृत्ति,
  • अर्थात् दृश्यको अभाव करनेवाली वृत्ति,
  • भी शान्त हो जाती है।
  • उस वृत्तिका त्याग करना नहीं पड़ता,
  • स्वयमेव हो जाता है।
  • कौन सी वृत्ति शांत हो जाती है?
    • – जिसे ज्ञान, विवेक और प्रत्यय भी कहते हैं,
    • यह सब शुद्ध बुद्धिके कार्य हैं,
    • यहाँपर बुद्धि ही इनका अधिकरण है,
    • जिसके द्वारा परमात्माके स्वरूपका मनन होता है और प्रतीत होनेवाली प्रत्येक वस्तुमें यह नहीं है,
    • यह नहीं है, ऐसा अभाव हो जाता है।
  • इसीको वेदोंमें –
  • नेति – नेति अर्थात ऐसा भी नहीं, ऐसा भी नहीं, कहा है।

त्याग स्वयं हो जाता है, वृत्तियाँ शांत हो जाती है

  • त्याग करनेमें तो
  • त्याग करनेवाला, त्याज्य वस्तु और त्याग,
  • यह त्रिपुटी आ जाती है।
  • इसलिये,
  • त्याग करना नहीं पड़ता,
  • त्याग हो जाता है।
  • जैसे, ईंधनके अभावमें
  • अग्नि स्वयमेव शान्त हो जाती है,
  • इसी प्रकार विषयोंके सर्वथा अभावसे,
  • वृत्तियाँ भी सर्वथा शान्त हो जाती हैं।
  • शेषमें जो बचा रहता है,
  • वही परमात्माका स्वरूप है।
  • इसीको निर्बीज समाधि कहते हैं।

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीज: समाधि:॥

  • संसारको जड़से उखाड़कर फेंक देनेपर,
  • परमात्मा आप ही रह जाते हैं।
  • उपाधियोंका नाश होते ही,
  • सारा भेद मिटकर,
  • अपार एकरूप परमात्माका स्वरूप रह जाता है।
  • वही सब जगह परिपूर्ण, और
  • सभी देश–कालमें व्याप्त है।
  • जब चिन्तनका सर्वथा त्याग हो जाता है,
  • तभी उस अचिन्त्य ब्रह्मका खजाना निकल पड़ता है, और
  • साधक उसमें जाकर मिल जाता है।

अज्ञान मिट जाता है, विकार दूर हो जाते है

  • जबतक,
  • अज्ञानकी आड़से दूसरे पदार्थ भरे हुए थे,
  • तबतक वह खजाना अदृश्य था।
  • अज्ञान मिटनेपर,
  • एक ही वस्तु रह जाती है,
  • तब उसमें मिल जाना,
  • यानी सम्पूर्ण वृत्तियोंका शान्त होकर,
  • एक ही वस्तुका रह जाना निश्चित है।
  • सब वस्तुओंका अभाव होनेपर,
  • प्राप्त होनेवाली चीज कैसी है,
  • उसका स्वरूप कोई नहीं कह सकता,
  • वह तो अत्यन्त विलक्षण है।
  • सूक्ष्मभावके तत्त्वज्ञ सूक्ष्मदर्शी महात्मागण उसे,
    • – सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म –
    • कहते हैं।
  • वह अपार है, असीम है,
  • चेतन है, ज्ञाता है,
  • घन है, आनन्दमय है,
  • सुखरूप है, सत् है, नित्य है।
  • इस प्रकारके विशेषणोंसे,
  • वे विलक्षण वस्तुका निर्देश करते हैं।
  • उसकी प्राप्ति हो जानेपर,
  • फिर कभी पतन नहीं होता।
  • दुःख, क्लेश, दुर्गुण,
  • शोक, अल्पता, विक्षेप,
  • अज्ञान और पाप आदि,
  • सब विकारोंकी सदाके लिये,
  • आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है।
  • एक सत्य, ज्ञान, बोध और
  • आनन्दरूप ब्रह्मके बाहुल्यकी जागृति रहती है।
  • यह जागृति भी केवल समझानेके लिये ही है।
  • वास्तवमें तो कुछ कहा नहीं जा सकता।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्येते॥ (गीता १३ । १२)

  • वह आदिरहित परब्रह्म,
  • अकथनीय होनेसे न सत् कहा जाता है, और
  • न असत् ही कहा जाता है।
  • यदि ज्ञानका भोक्ता कहें,
  • तो कोई भोग नहीं है।
  • यदि ज्ञानरूप या सुखरूप कहें,
  • तो कोई भोक्ता नहीं है।
  • भोक्ता, भोग और भोग्य,
  • सब कुछ एक ही रह जाता है।
  • वह एक ऐसी चीज है,
  • जिसमें त्रिपुटी रहती ही नहीं।
  • एक तो यह निराकारके ध्यानकी विधि है।

साकार ध्यान

  • अब साकारके ध्यानके सम्बन्धमें –
  • साकारकी उपासनाके फल दोनों प्रकारके होते हैं।
  • साधक यदि सद्योमुक्ति चाहता है,
  • शुद्ध ब्रह्ममें एकरूपसे मिलना चाहता है,
  • तो उसमें मिल जाता है,
  • उसकी मुक्ति हो जाती है।
  • परन्तु यदि वह ऐसी इच्छा करता है कि,
  • मैं दास, सेवक या सखा बनकर,
  • भगवान्‌के समीप निवास कर प्रेमानन्दका भोग करूँ,
  • या अलग रहकर संसारमें भगवत्प्रेम प्रचाररूप परम सेवा करूँ,
  • तो उसको सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य आदि मुक्तियों में से यथारुचि कोई सी मुक्ति मिल जाती है,
  • और वह मृत्युके बाद भगवान्‌के परम नित्यधाममें चला जाता है।
  • महाप्रलयतक नित्यधाममें रहकर,
  • अन्तमें परमात्मामें मिल जाता है,
  • या संसारका उद्धार करनेके लिये,
  • कारक पुरुष बनकर जन्म भी ले सकता है।
  • परन्तु जन्म लेनेपर भी,
  • वह किसी मोह माया में नहीं फँसता।
  • माया उसे किंचित् भी दुःख–कष्ट नहीं पहुँचा सकती,
  • वह नित्य मुक्त ही रहता है।
  • जिस नित्यधाममें ऐसा साधक जाता है,
  • वह परमधाम सर्वोपरि है,
  • सबसे श्रेष्ठ है।
  • उससे परे एक सच्चिदानन्दघन निराकार शुद्ध ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
  • वह सदासे है, सब लोक नाश होनेपर भी वह बना रहता है।
  • उसका स्वरूप कैसा है?
  • इस बातको वही जानता है,
  • जो वहाँ पहुँच जाता है।
  • वहाँ जानेपर सारी भूलें मिट जाती हैं।
  • उसके सम्बन्धकी सम्पूर्ण भिन्न–भिन्न कल्पनाएँ,
  • वहाँ पहुँचनेपर एक यथार्थ सत्यस्वरूपमें परिणत हो जाती हैं।
  • महात्मागण कहते हैं कि,
  • वहाँ पहुँचे हुए भक्तोंको,
  • प्राय: वह सब शक्तियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं,
  • जो भगवान्‌में हैं,
  • परन्तु वे भक्त,
  • भगवान्‌के सृष्टिकार्यके विरुद्ध उनका उपयोग कभी नहीं करते।
  • उस महामहिम प्रभुके दास,
  • सखा या सेवक बनकर,
  • जो उस परमधाममें सदा समीप निवास करते हैं,
  • वे सर्वदा उसकी आज्ञामें ही चलते हैं।
  • गीताके अ० ८ । २४ का श्लोक,
  • इस परमधाममें जानेवाले साधकके लिये ही है।
  • बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद्‌में भी इस अर्चिमार्गका विस्तृत वर्णन है।
  • इस नित्यधामको ही, सम्भवत:
  • भगवान् श्रीकृष्णके उपासक गोलोक,
  • भगवान् श्रीरामके उपासक साकेतलोक कहते हैं।
  • वेदमें इसीको,
  • सत्यलोक और ब्रह्मलोक कहा है।
  • (वह ब्रह्मलोक नहीं जिसमें ब्रह्माजी निवास करते हैं,
  • जिसका वर्णन गीता अध्याय ८ के १६वें श्लोकके पूर्वार्धमें है।)
  • भगवान् साकाररूपसे,
  • अपने इसी नित्यधाममें विराजते हैं।
  • साकाररूप मानकर,
  • नित्य परमधाम न मानना बड़ी भूलकी बात है।

भक्तियोग – List

Satsang

Dohe

ध्यान कैसे करना चाहिये? जप, साकार और निराकार ध्यान
Categories
Satsang

भक्ति के सुमन – 1

1

भगवान ही रक्षक है, पालनहार हैं

  • जो विश्वास कर लेता है कि,
    • एकमात्र भगवान ही मेरे रक्षक है,
    • एकमात्र भगवान ही मेरे पालनहार हैं,
  • तो वह मनुष्य शीघ्र ही साधु बन जाता है।
  • ऐसा निश्चय होते ही,
  • भगवान का आश्रय मिल जाता है,
  • क्योंकि उसका यह निश्चय यथार्थ है, सच्चा है।
  • भगवान का आश्रय मिलते ही,
  • सारी अच्छाइयां अपने आप वैसे ही आ जाती है,
  • जैसे हिमालय में ठंडक आ जाती है,
    • क्योंकि ठंडक वहां हिमालय ही है।

2

ईश्वर पर विश्वास और उनकी कृपा का बल

  • भगवान का विश्वास ही एकमात्र ऐसी चीज है,
  • जो सब अच्छाइयोंको ला देती है।
  • भगवान का बल,
  • उनकी कृपा का बल, भगवान की दया का बल,
  • ऐसी शक्ति है कि,
    • जिसके सामने सब प्रकार के बल परास्त हो जाते हैं।
    • हो क्या जाते हैं, सब परास्त ही हैं।

3

ईश्वर से प्रार्थना कैसी हो?

  • प्रार्थना का स्वरुप है –
  • भगवान के साथ, विश्वास पूर्वक,
  • अपने चित्तका अनन्य संयोग कर देना।
  • अपने मन को पूर्ण रूप से ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना।
  • ऐसा हुए बिना, भगवान से प्रार्थना होती ही नहीं।

4

अध्यात्म ज्ञान ही उत्तम ज्ञान है

  • सब कर्मों की अपेक्षा, 
  • अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करना ही, सबसे लाभदायक है, 
  • क्योंकि, 
  • ज्ञान की प्राप्ति, ईश्वर कृपा की प्राप्ति के समान हैं।
  • इसलिए, 
  • उत्तम मनुष्य, 
  • जहां अध्यात्म विद्या के सुख सागर में डूबा रहता है, 
  • वहां साधारण मनुष्य, 
  • मूर्ख की तरह, आलस्य और अज्ञान के कंटीले जंगलोंमें भटका करता है।

5

ईश्वर का चिंतन, कल्याण का साधन

  • विषयों का चिंतन,
  • सर्वनाश का कारण है,
  • और भगवान का चिंतन,
  • सर्वनाश से बचाकर सर्व कल्याण का साधन है।
  • क्योंकि,
  • जहां हमने भगवान का आश्रय लिया,
  • वही स्वाभाविक रूप से,
  • दैवी संपत्ति हमारे जीवन में आ जाएगी।
  • ठीक उसी प्रकार,
  • जैसे सूर्योदय के साथ ही प्रकाश आ जाता है।

6

श्रद्धा युक्त मन से ईश्वर का स्मरण

  • सावधानी के साथ, 
  • मन को विषयों से हटाकर, 
  • भगवान के चिंतन में न लगाना ही, 
  • साधना की सबसे बड़ी कमी है।
  • जब तक मन, श्रद्धा युक्त होकर, 
  • भगवान का स्मरण नहीं करता, 
  • तब तक कमी ही कमी है। 
  • इसलिए, 
  • भगवान में अनुराग बढ़ा कर, 
  • बार-बार भगवान का स्मरण करने की चेष्टा करनी चाहिए।
  • भगवान के गुण, नाम, लीला आदि 
  • जिसमें ही मन लगे, अनुराग हो, भक्ति जागृत हो, 
  • उसी का चिंतन करना चाहिए।

7

सुख शांति की आधारभूमि – ईश्वर के साथ नित्य युक्त रहना

  • भगवान के साथ नित्य युक्त रहना, 
  • सारी व्यवस्थाओंकी और सुख शांति की आधारभूमि है।
  • और भगवान से वियुक्त हो जाना, 
  • उनको भूल जाना, 
  • यही सारे दुखों, पापों और चिंताओं की जड़ है।
  • भगवान सबके प्रति समान भाव से प्रेम करते हैं, 
  • समान भाव से सब पर उनकी कृपा बरसती है, 
  • सबको समान भाव से अपने कल्याणमय गुणों का आस्वाद कराना चाहते हैं।
  • कोई भी उसका अनधिकारी नहीं है।
  • पर जो भगवान के सामने नहीं आना चाहता, 
  • जो उनसे लाभ उठाना नहीं चाहता, 
  • वह अवश्य वंचित रह जाता है।
  • सूर्य सबको समान भाव से प्रकाश और ताप देता है, 
  • पर जो व्यक्ति किसी अंधेरी कोठरी में बैठे, और 
  • दरवाजा बंद करके उस पर काला पर्दा डाल दे, 
  • तो उसे सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता।
  • इसमें सूर्य का पक्षपात नहीं, 
  • वह मनुष्य स्वयं ही सूर्य से प्रकाश नहीं लेना चाहता।

8

मन अखंड सुख चाहता है, जो सिर्फ ईश्वर में है

  • मनुष्य का मन किसी भी स्थिति में तृप्त नहीं होता है, और 
  • यह इसी बात को सिद्ध करता है कि, 
  • वह किसी पूर्णता की स्थिति को प्राप्त करना चाहता है।
  • भगवान, सुख और शांति के स्वरूप है।
  • पूर्ण सुख, अखंड सुख, नित्य सुख, भगवान में ही है।
  • हम ऐसे ही सुख को चाहते हैं, 
  • और ऐसा सुख जगत में कहीं नहीं है।
  • इसलिए हम कहीं भी किसी भी स्थिति में पहुंच जाएं, 
  • हमें और अतृप्ति का, अभाव का ही बोध होता है।
  • हमारी इस स्थिति से ज्ञात होता है कि, 
  • हम परिपूर्णतम भगवानको चाहते हैं।

भक्तियोग – List

Satsang

Dohe

भक्ति के सुमन – 1
Categories
Satsang

दु:ख का कारण, अहंकार, को समाप्त करने का सरल उपाय

मनुष्य के दुःख के कारण

  • मनुष्य के दु:ख के मुख्य कारण हैं –
  • अहंकार, इच्छा, कामना, आसक्ति अर्थात किसी भी वस्तु में लगाव।
  • इनमें सब की जड़ अहंकार है।
  • जितना ही जिसका अहंकार बढ़ा है,
  • उतनी ही इच्छाएं, कामना और आसक्ति बढ़ी है, और
  • उतनी ही मात्रा में वह अधिक से अधिक,
  • संतप्त, अशांत और बंधन ग्रस्त रहता है।

अहंकारी मनुष्य, अशांत और संतप्त क्यों रहता है?

  • अहंकारी मनुष्य को बात बात में अपमान का बोध होता है, और
  • वह कदम कदम पर अनेकों शत्रु पैदा कर लेता है।
  • किसी से सीधी बात करने में भी उसे पीड़ा सी होती है।
  • वह अपने हठ के सामने,
  • किसी की भली बात भी नहीं सुनना चाहता।
  • वह अपने ही हाथों नित्य बड़े गर्व के साथ,
  • अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है,
  • और उन्मत्त नशेबाज की भांति उसी में गौरव मानकर,
  • निर्लज्जताके साथ नाचता है।

भगवद गीता के अनुसार

भगवान ने गीता में कहा है –

विहाय कामान यः सर्वान पुमांश चरति निःस्पृहः
निर्ममॊ निरहंकारः स शान्तिम अधिगच्छति

  • अर्थात
  • जो पुरुष सारी कामनाओं को त्यागकर,
  • ममता रहित, अहंकार-रहित, निस्पृह होकर,
  • संसार में आचरण करता है,
  • वह शांति को प्राप्त होता है।
  • भगवान की माया बहुत प्रबल है।
  • और माया का आवरण हटे बिना,
  • अहंकार आदि से छुटकारा पाना,
  • बहुत कठिन है।

अहंकार से छुटकारा पाने का सरल उपाय

  • माया के महासागर से वही पार हो सकता है,
  • जो भगवान के शरण में जाकर,
  • उनका भजन करता है।
  • भगवान कहते हैं –
  • जो मेरा भजन करते हैं,
  • वे इस माया से तर जाते हैं।
  • इसके लिए मनुष्य को,
  • भगवान का भजन करना चाहिए।
  • भजन करने वाले व्यक्ति में,
  • जैसे जैसे भक्ति का विकास होता है,
  • वैसे वैसे उसकी बुरी प्रवृत्तियां नष्ट होते जाती है, और
  • उसका अपने पुरुषार्थ और बल का गर्व गल जाता है।
  • वह सभी बातों में,
  • सर्वसमर्थ प्रभु का ही कर्तृत्व देखता है।
  • उसकी आसक्ति सभी जगहों से हटकर,
  • प्रभु के चरणों में स्थिर हो जाती है।
  • एकमात्र प्रभु के चरणों में समर्पण ही,
  • उसकी इच्छा का विषय बन जाता है।
  • और प्रभु के नाम, रूप और गुण आदि में ही,
  • उसका अनन्य अनुराग हो जाता है।
  • और धीरे धीरे प्रपंच से उसका अहंकार,
  • उसकी इच्छा और आसक्ति,
  • अपने आप ही कम हो जाती है।
  • वह प्रभु का प्यारा बन जाता है, और
  • प्रभु, उसे अपने ह्रदयमें बिठाकर, निहाल कर देते हैं।
  • इसलिए,
  • जैसे लोभी के लिए धन सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है,
  • उसी प्रकार,
  • भगवान को ही एकमात्र मानकर,
  • उनके ह्रदय में बसने का सौभाग्य प्राप्त करें।

इस प्रकार मनुष्य के दुख का जो एक मुख्य कारण है, अहंकार, उसे समाप्त किया जा सकता है, और शांति और सुख का अनुभव किया जा सकता है।

Satsang

Dohe

दु:ख का कारण, अहंकार, को समाप्त करने का सरल उपाय
Categories
Satsang

प्रार्थना की शक्ति

  • प्रार्थना से बुद्धि शुद्ध होती है और
  • देवताओंकी प्रार्थनासे दैवीशक्ति प्राप्त होती है।

प्रार्थना की शक्ति के कुछ उदाहरण

  • नल-नीलको प्रार्थनासे
    • पत्थर तैरानेकी शक्ति प्राप्त हुई थी।
  • तुलसीदासजीको श्रीपवनसुत हनुमानजीसे प्रार्थना करनेपर
    • भगवान् रामके दर्शन हुए।
  • भगवान्‌से प्रार्थना करनेपर डाकू रत्नाकर की बुद्धि
    • अत्यन्त शुद्ध हो गयी।
  • वे वाल्मीकि ऋषिके नामसे प्रसिद्ध हुए और
  • भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया।
  • द्रौपदीकी प्रार्थनासे
    • सूर्य-भगवान्‌ने दिव्य बटलोई दी थी।

वर्तमान समयमें भी प्रार्थनासे लाभ उठानेवाले बहुत लोग हो चुके है और अब भी है।


प्रार्थना से शारीरिक दुःखों का शमन

  • प्रार्थना करनेसे
    • शारीरिक क्लेशोका भी शमन होता है।
  • प्रातःस्मरणीय गोस्वामी तुलसीदासजीकी बाँहमें असहनीय पीड़ा हो रही थी, श्रीहनुमान्‌जीसे प्रार्थना करनेपर अर्थात् उन्हें – हनुमान-बाहुक – सुनाते ही सारी पीड़ा शान्त हो गयी।

प्रार्थना से इच्छाओं की पूर्ति

  • प्रार्थनासे कामना की पूर्ती होती है।
  • राजा मनुकी प्रार्थनापर,
  • भगवान्‌ने पुत्ररूपसे उनके गृहमें अवतार लेनेकी स्वीकृति दी।
  • सत्यनारायणकी कथामें लिखा है कि,
  • दरिद्र लकड़हारेकी प्रार्थनापर,
  • भगवान्‌ने उसे संपत्तिशाली बना दिया।

प्रार्थना और एकता

  • प्रार्थनाके द्वारा मनुष्यमें परस्पर प्रेम उत्पन्न होता है।
  • प्रार्थना एकताके लिये सुदृढ़ सूत्र है।
  • इंट के टुकड़ों तथा बालूसे मन्दिर बनाना असम्भव-सा है।
  • पर यदि उसमें सीमेंट मिला दी जाय,
  • तो सभी बालुके कण एवं इंटे एक शिलाके समान जुड़ जाती हैं।
  • वर्तमान समयमें देखा गया है कि,
  • मनुष्यके जिन समुदायोंमें निश्वित प्रार्थना निश्चित समय और निश्वित स्थानपर होती है,
  • ऐसे समुदायोंको तोड़नेके लिये बड़ी-बड़ी प्रबल शक्तियाँ जुटी,
  • परंतु उन्हें भिन्न करनेमें असमर्थ सिद्ध हुइँ।
  • वर्तमान युगमें भी ऐसी घटनाएँ हो चुकी है, प्राचीनकालमें भी हुई हैं।
  • एक समय रावाणादी सक्षसोंके घोर उपद्रवसे त्रस्त होकर,
  • दैवी स्वभावके प्राणी, सुर, मुनि; गन्धर्व आदि हिमालयकी कन्दराओंमें छिप गए और
  • उन्होंने एक सभाका आयोजन किया,
  • जिसमें आशुतोष भगवान् शंकर भी पधारे थे।
  • देवता सोचने लगे, –
  • आसुरी समुदाय दैवीसमुदायको नष्ट करनेपर तुला हुआ है।
  • उससे मुक्ति पानेके लिये किस साधन को अपनाया जाय?
  • हम सब दीन, हीन, असहाय दीनबंधु भगवान्‌को कहा द्वँढें?
  • परिणाम यह हुआ कि,
  • सभामें कई भिन्न मत हो गये।
  • इस विघटनकी दशाको देरवकर भगवान् शंकर बोले –
  • ऐसे विकट समयमें भगवानको ढूंढने कोई कहीं न जाय।
  • सब सम्मिलित होकर आर्त हृदय-से भावपूर्ण एक ही प्रार्थना एक साथ करें।
  • भक्तवत्सल भगवान् तुरंतही आश्वासन देंगे।
  • यह मत सभीको अच्छा लगा और
  • सभी करबद्ध होकर – जय जय सुरनायक – आदि प्रार्थना करने लगे।
  • प्रार्थना समाप्त हुई कि तुरत आकाशवाणी हुई।
  • ब्रह्माजी सबको शिक्षा तथा आश्वासन देकर तथा
  • देवताओं से यह कहकर ब्रह्मलोकको चले गये कि –
  • तुमलोग वानररूप धारणकर सुसंगठित हो,
  • भगवान्‌का भजन करते हुए पृथ्वीपर रहो।
  • प्रार्थना सफल हुई,
  • मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्री-रामचन्द्रजीका अवतार हुआ।
  • देवता, गौएँ, ऋषि; मुनि, पृथ्वी, भक्त समाज-सब सुखी और परमधामके अधिकारी हुए।

प्रार्थना में अपार शक्ति है

  • प्रार्थनासे कितना लाभ हो सकता है अथवा
  • प्रार्थनाका कितना महत्त्व है – यह लिखा नही जा सकता।
  • प्रार्थनाके द्वारा मृत आत्माओंको शान्ति मिलती है; जिसकी प्रथा आज भी बड़ी-बड़ी सभाओंमें देख पड़ती है।
  • किसी महापुरुषके देहावसान हो जानेपर दो-चार मिनट मृतात्माकी शान्तिके लिये सभाओंमें सामूहिक प्रार्थना की जाती है।
  • प्रार्थनाके उपासक महात्मा गांधी, महामना मालवीयजी आदि धार्मिक-राजनीतिक नेताओंका अधिक स्वास्थ्य बिगड़नेपर जब-जब समाजमें प्रार्थना की गयी, तब तब लाभ प्रतीत हुआ। और भी अनेकों उदाहरण हैं।
  • प्रार्थनामें विश्वासकी प्रधानता है।
  • प्रार्थना हृदयसे होनी चाहिये।
  • निरन्तर, आदरपूर्वक, दीर्घकालतक होनेसे वह सफल होती है।
  • इष्टदेवको सुनानेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये,
  • जनताको सुनानेकी दृष्टिसे नहीं।
  • प्रार्थनासे आस्तिकता बढती है।
  • आस्तिकतासे मनुष्योंकी पापमें प्रवृत्ति नही होती।
  • दुराचार- के नाश और सदाचारकी वृद्धिसे समाजमें दरिद्रता, कलह, शारीरिक रोग, चरित्र-पतन समाप्त होकर परस्पर प्रेम, आरोग्य, सुख सम्पत्तिकी वृद्धि होती।
  • अतएव मनुष्य को अपना जीवन सुव्यवस्थित बनाने के लिये,
  • प्रार्थनाको मुख्य स्थान देना ही चाहिए।

ईश्वर से प्रार्थना

  • हे ईश्वर, मुझे सद्‌बुद्धि दो।
  • हे प्रभु, मेरे मन को शुद्ध कर दो, पवित्र कर दो।
  • हे ईश्वर, मेरे मन को शांत कर दो।
  • हे प्रभु, मुझे पवित्र कर दो।
  • हे ईश्वर, हमें सद्‌बुद्धि दो।
  • हे प्रभु, सब सुखी हों।
  • हे ईश्वर, सब ओर शान्ति ही शान्ति हो।
  • हे प्रभु, हमें सब बन्धनों से मुक्त कर दो।
  • हे ईश्वर, हमारे सब दु:ख और दुर्गुण दूर कर दो।

Satsang

Dohe

प्रार्थना की शक्ति
Categories
Satsang

नाम जाप की महिमा

(महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित पद्म पुराण – उत्तरखण्ड अध्याय से)

  • ऋषियों ने कहा – सूतजी!
  • श्रीमहादेवजी और देवर्षि नारदका जो अद्भुत संवाद हुआ था,
  • उसे आपने हम लोगों से कहा।
  • हम लोग श्रद्धापूर्वक सुन रहे हैं।
  • अब आप कृपापूर्वक यह बताइये कि,
  • ब्रह्माजीने,
  • नारदमुनि को,
  • भगवान के नाम की महिमा किस प्रकार बताई थी।

नारदजी ने ब्रम्हाजी से नाम की महिमा के लिए प्रार्थना की

  • सूतजी बोले – हें मुनियो!
  • इस विषयमें मैं पुराना इतिहास सुनाता हूँ।
  • आप सब लोग ध्यान देकर सुनें।
  • इसके श्रवणसे, भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति बढ़ती है।
  • एक समयकी बात है,
  • चित्तको पूर्ण एकाग्र रखनेवाले नारदजी,
  • अपने पिता ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये,
  • मेरु पर्वतके शिखरपर गये।
  • वहाँ आसनपर बैठे हुए जगत्पति ब्रह्माजी को प्रणाम करके,
  • मुनिश्रेष्ठ नारदजीने इस प्रकार कहा।
  • नारदजी बोले – हे विश्वेश्वर!
  • भगवान्‌के नामकी जितनी शक्ति है, उसे बताइये।
  • प्रभो! ये जो समूर्ण विश्वके स्वामी साक्षात् श्रीनारायण हरि हैं,
  • इन अविनाशी परमात्माके नामकी कैसी महिमा है?

  • ब्रह्माजी वोले – नारद!
  • इस कलियुगमें, विशेषत: नाम और कीर्तन से,
  • भगवानकी भक्ति जिस प्रकार करनी चाहिये,
  • वह सुनो।

श्री हरि के नाम का स्मरण

  • जिनके लिये शास्त्रोमें कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया है,
  • उन सभी पापोंकी शुद्धिके लिये,
  • एकमात्र भगवान् विष्णुका प्रयत्नपूर्वक स्मरण ही,
  • सर्वोत्तम साधन देखा गया है।
  • वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
  • अत: श्रीहरिके नामका कीर्तन और जप करना चाहिये।
  • जो ऐसा करता है,
  • वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णु-के परमपदको प्राप्त होता है।

ये वदन्ति नरा नित्यं, हरिरित्यक्षरद्वयम
(हरी इति अक्षर द्वयं)।
तस्योच्चारण मात्रेण, विमुक्तास्ते न संशय:॥

  • जो मनुष्य – हरि – इस दो अक्षरोंवाले नामका सदा उच्चारण करते है,
  • वे उसके उच्चारण मात्रसे मुक्त हो जाते हैं,
  • इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
  • तपस्याके रूप में किये जानेवाले जो सम्पूर्ण प्रायश्रित्त है,
  • उन सबकी अपेक्षा,
  • श्रीकृष्ण का निरन्तर स्मरण श्रेष्ठ है।
  • जो मनुष्य प्रातः, मध्यान्ह, सायं तथा रात्रि आदिके समय,
  • नारायण – नामका स्मरण करता है,
  • उसके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते है।
  • उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद!
  • मेरा कथन सत्य है, सत्य है, सत्य है।
  • भगवान्‌के नामोंका उच्चारण करने मात्र से,
  • मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है।

राम नाम का जप

राम रामेति रामेति, रामेति च पुनर्जपन।
स चाण्डालोपि पूतात्मा, जायते नात्र संशय:॥

  • राम राम राम राम, – इस प्रकार वारंवार जप करनेवाला मनुष्य,
  • यदि बुरे कर्म करनेवाला हो तो भी,
  • वह पवित्रात्मा हो जाता है।
  • इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
  • उसने नामकीर्तन मात्रसे
  • कुरुक्षेत्र, काशी, गया और द्वारका आदि संपूर्ण तीर्थोंका सेवन कर लिया।

कृष्ण नाम का जप और निरंतर स्मरण

कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति, इति वा यो जपन पठन।
इहलोकं परित्यज्य, मोदते विष्णु-संनिधौ॥

  • जो – कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण – इस प्रकार जप और कीर्तन करता है,
  • वह इस संसारका परित्याग करनेपर
  • भगवान् विष्णुके समीप आनन्द भोगता है।
  • ब्रह्मन्! जो कलियुगमें प्रसन्नता पूर्वक हरिके नामका जप और कीर्तन करता है,
  • वह मनुष्य महान् पापसे छुटकारा पा जाता है।
  • सतयुगमें ध्यान,
  • त्रेतामें यज्ञ तथा
  • द्वापरमें पूजन करके मनुष्यजो कुछ पाता है,
  • वही कलियुगमें
  • केवल भगवान् केशवका नाम जप और कीर्तन करनेसे पा लेता है।
  • जो लोग इस बातको जानकर,
  • जगदात्मा केशवके भजनमें लीन होते है,
  • वे सब पापोंसे मुक्त हो,
  • श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं।

भगवान् विष्णु के दस अवतार

  • मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि –
  • – ये दस अवतार इस पृथ्वीपर बताये गये हैं।
  • इनके नामोच्चारण मात्रसे सदा पापी मनुष्य भी शुद्ध होता है।
  • जो मनुष्य प्रातःकाल, जिस किसी तरह,
  • श्री विष्णु नामका कीर्तन, जप तथा ध्यान करता है,
  • वह निस्सन्देह मुक्त होता है,
  • निश्चय ही नरसे नारायण बन जाता है।

ईश्वर का स्वरुप

  • भगवान् विष्णु, सर्वत्र-व्यापक सनातन परमात्मा है।
  • इनका न आदि है, न अन्त हैं।
  • ये सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा,
  • समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले और लक्ष्मीसे युक्त हैं।
  • वही कालके भी काल है।
  • उनका कभी विनाश नहीं होता है।
  • भगवान-जनार्दन साक्षात् विश्वरूप है।
  • वे ही व्यापक होनेके कारण विष्णु और धारण-पोषण करनेके कारण जगदीश्वर हैं।
  • इसलिए जिनके नामका ऐसा महात्म्य है कि,
  • उसे सुनने मात्रसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है,
  • उन भगवान्‌का ही स्मरण करना चाहिये।
  • जिस मुखमें – राम राम – का जप होता रहता वही महान् तीर्थ है,
  • वही प्रधान क्षेत्र है,
  • तथा वही समस्त कामनाआको पूर्ण करनेवाला हैं।

भक्तियोग – List

Satsang

Dohe

नाम जाप की महिमा
Categories
Satsang

मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके – 5 से 10

<< मन को वश में करने के 15 तरीके – पहला पेज


5. मनको सत्कार्यमें संलग्न रखना

  • मन कभी निकम्मा नहीं रह सकता,
  • कुछ-न-कुछ काम,
  • इसको मिलना ही चाहिये;
  • इसलिए, इसे निरन्तर,
  • काममें लगाये रखना चाहिये।
  • निकम्मा रहनेसे ही,
  • इसे दूसरी बातें सूझा करती है।
  • इसलिए,
  • जबतक नींद न आये,
  • तब तक,
  • चुने हुए सुन्दर माङ्गलिक कार्योंमे,
  • इसे लगाये रखना चाहिये।
  • जाग्रत् समयके सत्कार्योंके चित्र ही,
  • स्वप्नमे भी दिखायी देंगे।

6. मनको परमात्मामें लगाना

श्रीकृष्ण ने, मन को, ईश्वर में लगाने के विषय में क्या कहा?

  • श्रीभगवान् ने कहा है –

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
(गीता ६ । २६)

  • यह चञ्चल और अस्थिर मन,
  • जहाँ-जहाँ दौड़कर जाय।
  • वहाँ-वहाँसे हटाकर वारंवार इसे,
  • परमात्मामें ही लगाना चाहिये।

  • मनको वशमें करनेका उपाय प्रारम्भ करनेपर,
  • पहलेपहले तो यह इतना जोर दिखलाता है,
  • अपनी चञ्चलता और शक्तिमत्तासे,
  • ऐसी पछाड़ लगाता है कि,
  • नया साधक घबड़ा उठता है।
  • उसके हृदयमें,
  • निराशा सी छा जाती है।
  • परन्तु ऐसी अवस्थामे,
  • धैर्य रखना चाहिये।
  • मनका तो ऐसा स्वभाव ही है,
  • लेकिन,
  • इसपर विजय पाना जरूरी है,
  • इसलिए घबड़ानेसे काम नहीं चलेगा।
  • मुस्तैदीसे सामना करना चाहिये।
  • आज न हुआ तो क्या,
  • कभी-न-कभी तो वशमें होगा ही।

भगवान् कृष्ण ने भी कहा है की, मन को नियंत्रण में करने का अभ्यास करते रहे

  • इसीलिये भगवान् ने कहा है –

शनैः शनैरुपरमेद बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थ मन कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत॥
(गीता ६ । २५)

  • धीरे-धीरे अभ्यास करता हुआ,
  • उपरामताको प्राप्त हो।
  • धैर्ययुक्त बुद्धिसे,
  • मनको परमात्मामे स्थिर करके और
  • किसी भी विचारको मनमे न आने दे।
  • बड़ा धैर्य चाहिये।
  • घबड़ाने, ऊबने या
  • निराश होनेसे काम नहीं होगा।
  • झाडू से घर साफ कर लेने पर भी,
  • जैसे धूल जमी हुई सी दीख पड़ती है।
  • पर इससे डरकर कोई झाडू लगाना,
  • बन्द नहीं करता।
  • उसी प्रकार मनको,
  • सस्कारोंसे रहित करते समय,
  • यदि मन और भी अस्थिर दीखे,
  • तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
  • किन्तु मन को नियंत्रण में करने का प्रयत्न,
  • करते रहना चाहिए।
  • इस प्रकारकी दृढ प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि,
  • किसी प्रकारका भी वृथा चिन्तन या
  • मिथ्या संकल्पकों मनमें नहीं आने दिया जायगा।
  • बड़ी चेष्टा, बड़ी दृढता रखनेपर भी,
  • मन साधककी चेष्टाओंको,
  • कई बार व्यर्थ कर देता है।
  • साधक तो समझता है कि,
  • मैं ध्यान कर रहा हूँ,
  • पर मनदेवता,
  • सङ्कल्प-विकल्पोंकी पूजामें लग जाते है।
  • जब साधक मनकी ओर देखता है,
  • तो उसे आश्चर्य होता है कि,
  • यह क्या हुआ।
  • इतने नये-नये सङ्कल्प,
  • जिनकी भावना भी नहीं की गयी थी,
  • कहाँसे आ गये?
  • बात यह होती है कि,
  • साधक जब मनको निर्विषय करना चाहता है,
  • तब संसारके नित्य अभ्यस्त विषयोसे,
  • मनको फुरसत मिल जाती है,
  • उधर परमात्मामें लगनेका,
  • इस समय तक उसे पूरा अभ्यास नहीं होता।
  • इसलिये फुरसत पाते ही,
  • वह उन पुराने दृश्यों को,
  • जो संस्कार रूपसे उसपर अंकित हो रहे हैं,
  • सिनेमाके फिल्मकी भॉति,
  • क्षण-क्षणमें एकके बाद एक उलटने लग जाता है।
  • इसीसे उस समय,
  • ऐसे सङ्कल्प मनमे उठते हुए मालूम होते है,
  • जो संसारका काम करते समय,
  • याद भी नहीं आते थे।
  • मनकी ऐसी प्रबलता देखकर,
  • साधक स्तम्भित-सा रह जाता है,
  • पर कोई चिन्ता नहीं।
  • जब अभ्यासका बल बढेगा,
  • तब उसको संसारसे फुरसत मिलते ही,
  • तुरन्त परमात्मामे लग जायगा।
  • अभ्यास दृढ़ होनेपर तो,
  • यह परमात्माके ध्यानसे हटाये जानेपर भी न हटेगा।
  • मन चाहता है सुख।
  • जबतक इसे वहाँ सुख नहीं मिलता,
  • विषयोंमे सुख दीखता है,
  • तबतक यह विषयोंमे रमता है।
  • जब अभ्याससे विषयोमें दुःख और
  • परमात्मामें परम सुख प्रतीत होने लगेगा,
  • तब यह स्वयं ही विषयोंको छोड़कर,
  • परमात्माकी ओर दौड़ेगा,
  • परन्तु जबतक ऐसा न हो,
  • तबतक निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये।
  • यह मालूम होते ही कि,
  • मन अन्यत्र भागा है,
  • तत्काल इसे पकड़ना चाहिए।
  • इसको पक्के चोरकी भॉति,
  • भागनेका बड़ा अभ्यास है,
  • इसलिये ज्यों ही यह भागे,
  • त्यों ही इसे पकडना चाहिये।
  • जिस-जिस कारणसे मन मांसारिक पदार्थोंमें विचरे,
  • उस-उससे रोककर परमात्मामें स्थिर करे।
  • मनपर ऐसा पहरा बैठा दे कि,
  • यह भाग ही न सके।
  • यदि किसी प्रकार भी न माने,
  • तो फिर इसे भागनेकी पूरी स्वतन्त्रता दे दी जाय;
  • परन्तु यह जहाँ जाय,
  • वहींपर परमात्माकी भावना की जाय,
  • यहींपर इसे परमात्माके स्वरूपमे लगाया जाय ।
  • इस उपायसे भी मन स्थिर हो सकता है।

7. एक तत्त्वका अभ्यास करना

  • योगदर्शन महर्षि पतञ्जलि लिखते है –
  • तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः। (समाधिपाद ३२)
  • चित्तका विक्षेप दूर करनेके लिये,
  • पाँच तत्त्वोंमेसे किसी एक तत्त्वका,
  • अभ्यास करना चाहिये।
  • एक तत्त्वके अभ्यासका अर्थ ऐसा भी हो सकता है कि,
  • किसी एक वस्तुकी या किसी मूर्तिविशेषकी तरफ,
  • एकदृष्टि से देखते रहना।
  • जबतक आखोंकी पलक न पड़े,
  • तबतक उस एक ही चिह्नकी तरफ,
  • देखते रहना चाहिये।
  • चिह्न धीरे-धीरे छोटा करते रहना चाहिये।
  • अन्तमे उस चिह्नको,
  • बिल्कुल ही हटा देना चाहिये।

दृष्टिः स्थिरा यत्र विनावलोकनम् –

  • अवलोकन न करनेपर भी दृष्टि स्थिर रहे।
  • ऐसा हो जाने पर चित्तविक्षेप नहीं रहता।
  • इस प्रकार प्रतिदिन,
  • आध-आध घण्टे भी अभ्यास किया जाय,
  • तो मनके स्थिर होनेमे,
  • अच्छी सफलता मिल सकती है।
  • इसी प्रकार दोनों भ्रुवोंके बीचमें दृष्टि जमाकर,
  • देखते रहनेका भी अभ्यास किया जाता है।
  • इससे भी मन निश्चल होता है,
  • इसीको त्राटक कहते है।
  • कहने की आवश्यकता नहीं कि,
  • इस प्रकारके अभ्यासमे,
  • नियमितरूपसे जो जितना अधिक समय दे सकेगा,
  • उसे उतना ही अधिक लाभ होगा।

8. नाभि या नासिकाग्रमें दृष्टि स्थापन करना

  • नित्य नियमपूर्वक पद्मासन या
  • सुखासनसे बैठकर,
  • सीधा बैठकर,
  • नाभिमे दृष्टि जमाकर,
  • जबतक पलक न पड़े,
  • तबतक एक-मनसे देखते रहना चाहिये।
  • ऐसा करनेसे,
  • शीघ्र ही मन स्थिर होता है।
  • इसी प्रकार,
  • नासिकाके अग्रभागपर,
  • दृष्टि जमाकर बैठनेसे भी,
  • चित्त निश्चल हो जाता है।
  • इससे ज्योतिके दर्शन भी होते है।

9. शब्द श्रवण करना

  • कानोमे अँगुली देकर,
  • शब्द सुननेका अभ्यास किया जाता है।
  • इसमे पहले भँवरोंके गुजार अथवा
  • प्रातःकालीन पक्षियोंके चह-चहाने जैसा शब्द सुनायी देता है।
  • फिर क्रमशः घुघुरू, शङ्ख, घण्टा,
  • ताल, मुरली, भेरी, मृदङ्ग,
  • नफीरी और सिंहगर्जनके सदृश,
  • शब्द सुनायी देते हैं।
  • इस प्रकार,
  • दस प्रकारके शब्द सुनायी देने लगनेके बाद,
  • दिव्य ॐ शब्द का श्रवण होता है,
  • जिससे साधक समाधिको प्राप्त हो जाता है।
  • यह भी मनके निश्चल करनेका,
  • उत्तम साधन है।

10. ध्यान या मानसपूजा

  • सब जगह,
  • भगवानके किसी नामको लिखा हुआ समझकर,
  • वारंवार उस नामके ध्यानमे,
  • मन लगाना चाहिये अथवा
  • भगवानके किसी स्वरूपविशेषकी,
  • अन्तरिक्ष में मनसे कल्पना कर,
  • उसकी पूजा करनी चाहिये।
  • पहले भगवान की मूर्तिके एक-एक अवयवका,
  • अलग-अलग ध्यान कर,
  • फिर दृढताके साथ,
  • सारी मूर्तिका ध्यान करना चाहिये।

(जैसे शिव पंचाक्षर मंत्र में शिव के गुणों का और उनके स्वरुप का वर्णन किया है)

  • उसीमे मनको अच्छी तरह,
  • स्थिर कर देना चाहिये।
  • मूर्तिके ध्यानमे इतना तन्मय हो जाना चाहिये कि,
  • संसारका भान ही न रहे।
  • फिर कल्पना-प्रसूत सामग्रियोंसे,
  • भगवान की मानसिक पूजा करनी चाहिये।

(जैसे शिव मानस पूजा मंत्र में भगवान् शिव की पूजा मनद्वारा, मन में ही, की जाती है)

  • प्रेमपूर्वक की हुई नियमित भगवद उपासनासे,
  • मनको निश्चल करनेमें,
  • बड़ी सहायता मिल सकती है।

Next.. (आगे पढें ..) – मन को वश में करने के 15 तरीके – 11 से 15

मन को वश में करने के 15 तरीके – अगला पेज पढ़ने के लिए क्लिक करें >>

मन को वश में करने के 15 तरीके – 11 से 15

For next page of How to Control Mind, please visit >>

15 Ways to Control Mind – 11 to 15

Satsang

Dohe

मन को नियंत्रण में करने के 15 तरीके – 5 से 10
Categories
Satsang

मन को काबू में करने के 15 तरीके – 11 से 15

<< मन को वश में करने के 15 तरीके – पहला पेज

<< मन को वश में करने के 15 तरीके – 5 से 10


11. मैत्री-करुणा-मुदिता-उपेक्षाका व्यवहार

  • योगदर्शनमें महर्षि पतञ्जलि एक उपाय यह भी बतलाते हैं –

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां
सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां
भावनातश्चित्तप्रसादनम्।
(समाधिपाद ३३ )

  • अर्थात,
  • सुखी मनुष्योसे प्रेम, दुखियोंके प्रति दया,
  • पुण्यात्माओंके प्रति प्रसन्नता ओर
  • पापियोके प्रति उदासीनताकी भावनासे,
  • चित्त प्रसन्न होता है।

  • जगत् के सारे सुखी जीवोंके साथ,
  • प्रेम करनेसे चित्तका ईर्ष्यामल दूर होता है,
  • द्वेषकी आग बुझ जाती है।
  • संसारमे लोग,
  • अपनेको और अपने आत्मीय स्वजनोंको,
  • सुखी देखकर प्रसन्न होते हैं,
  • क्योंकि वे उन लोगोंको,
  • अपने प्राणों के समान प्रिय समझते हैं।
  • यदि यही प्रिय भाव,
  • सारे ससारके सुखियोंके प्रति अर्पित कर दिया जाय,
  • तो कितने आनन्दका कारण हो !
  • दूसरेको सुखी देखकर,
  • जलन पैदा करनेवाली वृत्तिका,
  • नाश हो जाय।

  • दुखी प्राणियोंके प्रति,
  • दया करनेसे,
  • परअपकाररूप चित्त-मल नष्ट होता है।
  • मनुष्य अपने कष्टोंको दूर करनेके लिये,
  • किसीसे भी पूछनेकी आवश्यकता नहीं समझता,
  • भविष्यमे कष्ट होनेकी सम्भावना होते ही,
  • पहलेसे उसे निवारण करनेकी चेष्टा करने लगता है।
  • यदि ऐसा ही भाव,
  • जगत्के सारे दुखी जीवोंके साथ हो जाय तो,
  • अनेक लोगोंके दुःख दूर हो सकते हैं।
  • दुःखपीड़ित लोगोंके दुःख दूर करनेके लिये,
  • अपना सर्वस्व न्योछावर कर देनेकी प्रबल भावनासे,
  • मन सदा ही प्रफुल्लित रह सकता है।

  • धार्मिकोंको देखकर हर्षित होनेसे,
  • दोषारोप नामक मनका विकार नष्ट होता है,
  • साथ ही धार्मिक पुरुषकी भॉति,
  • चित्तमें धार्मिक वृत्ति जागृत हो उठती है।
  • विकारों के दूर होते ही,
  • चित्त शान्त होता है।

  • पापियोके प्रति उपेक्षा करनेसे,
  • चित्तका क्रोधरूप मल नष्ट होता है।
  • पापोंका चिन्तन न होनेसे,
  • उनके सस्कार अन्तःकरणपर नहीं पड़ते।
  • किसीसे भी घृणा नहीं होती।
  • इससे चित्त शांत रहता है।
  • इस प्रकार इन चारो भावोंके,
  • बारबार अनुशीलनसे,
  • चित्तकी राजस, तामस वृत्तियाँ नष्ट होकर,
  • सात्त्विक वृत्तिका उदय होता है और
  • उससे चित्त प्रसन्न होकर,
  • शीघ्र ही एकाग्रता लाभ कर सकता है।

12. सदग्रंथो का अध्ययन

  • भगवान के परम रहस्यसम्बन्धी,
  • परमार्थ-ग्रन्थोंके पठन पाठन से भी,
  • चित्त स्थिर होता है।
  • एकान्तमें बैठकर,
  • श्रीमद्भगवद्गीता,
  • उपनिषद्,
  • श्रीमद्भागवत,
  • रामायण आदि प्रन्थोंका अर्थसहित
  • पाठ करनेसे,
  • वृत्तियाँ तदाकार बन जाती हैं।
  • इससे मन स्थिर हो जाता है।

13. प्राणायाम

  • प्राणायाम से योग के सम्बन्धमें महत्वपूर्ण बात –
  • इस मार्ग में सद्गुरुकी सलाह के बिना
  • कोई कार्य नहीं करना चाहिये।
  • योगाभ्यासमें देखादेखी करनेमे,
  • उलटा फल हो सकता है।
  • समाधि से भी मन रुकता है।
  • समाधि अनेक तरहकी होती है।
  • प्राणायाम समाधिके साधनोका,
  • एक मुख्य अङ्ग है।
  • योगदर्शनमे कहा गया है –

प्रच्छईनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। ( समाधिपाद ३४)

  • नासिकाके छेदोंसे अन्तरकी वायुको बाहर निकालना,
  • प्रच्छर्दन कहलाता है, और
  • प्राणवायुकी गति रोक देनेको विधारण कहते हैं।
  • इन दोनों उपायोसे भी चित्त स्थिर होता है।
  • श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान् ने भी कहा है –

अपाने जुद्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा॥

  • कई अपानवायुमें प्राणवायुको हवन करते हैं,
  • कई प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करते हैं और
  • कई प्राण, और अपानकी गतिको रोककर,
  • प्राणायाम किया करते हैं।
  • इसी तरह योगसम्बन्धी ग्रन्थोंके अतिरिक्त,
  • महाभारत, श्रीमद्भागवत और उपनिषदोंमे भी,
  • प्राणायामका यथेष्ट वर्णन है।
  • श्वास-प्रश्वासकी गतिको रोकनेका नाम ही,
  • प्राणायाम है।
  • मनु महाराजने कहा है –

दद्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।
तयेन्द्रियाणां दद्यन्ते दोपाः प्राणस्य निग्रहात्।

  • अग्निमें तपाये जानेपर,
  • जैसे धातुका मल जल जाता है,
  • उसी प्रकार प्राणवायुके निग्रहसे,
  • इन्द्रियोंके सारे दोष नष्ट हो जाते है।
  • प्राणोंको रोकनेसे ही मन रुकता है।
  • इनका एक दूसरेके साथ घनिष्ट सम्बन्ध है।
  • मन सवार है,
  • तो प्राण वाहन है।
  • एकको रोकनेसे,
  • दोनों रुक जाते है।
  • प्राणायामके सम्बन्धमे, योगशान्त्रमे,
  • अनेक उपदेश मिलते हैं,
  • परन्तु वे बड़े ही कठिन हैं।
  • योगसाधनमे अनेक नियमोंका,
  • पालन करना पड़ता है।
  • योगाभ्यासके लिये बड़े ही कठोर,
  • आत्मसंयमकी आवश्यकता है।
  • आजकलके समयमें तो,
  • कई कारणोंसे योगका साधन,
  • एक प्रकारसे असाध्य ही समझना चाहिये।
  • यहा पर प्राणायामके सम्बन्धमें,
  • केवल इतना ही कहा जाता है कि,
  • बाई नासिकासे बाहरकी वायुको,
  • अन्तरमें ले जाकर स्थिर रखनेको,
  • पूरक कहते हैं,
  • दाहिनी नासिकासे अन्तरकी वायुको,
  • बाहर निकालकर बाहर स्थिर रखनेको,
  • रेचक कहते है और
  • जिसमें अन्तरकी वायु,
  • बाहर न जा सके और
  • बाहरकी वायु अन्तरमें प्रवेश न कर मके,
  • इस भावसे प्राणवायु रोक रखनेको कुंभक कहते हैं।
  • इसीका नाम प्राणायाम है।
  • सााधारणतः,
  • चार बार मन्त्र जपकर पूरक,
  • सोलह बाारके जपसे कुम्मक और
  • आठ बारके जपसे रेचककी विधि है।
  • परन्तु इस सम्बन्धमें उपयुक्त,
  • सद्गुरुकी आज्ञा बिना,
  • कोई कार्य नहीं करना चाहिये।
  • योगाभ्यासमें देखादेखी करनेमे,
  • उलटा फल हो सकता है।

देखा देसी साधै जोग।
छीजै काया बाढ़ै रोग।

  • पर यह स्मरण रहे कि,
  • प्राणायाम,
  • मनको रोकनेका,
  • एक बहुत ही उत्तम साधन है।

14. श्वासके द्वारा नाम-जप

  • मनको रोककर परमात्मामें लगानेका,
  • एक अत्यन्त सुलभ और आशंका रहित उपाय और है,
  • जिसका अनुष्ठान सभी कर सकते है।
  • वह है,
  • आने-जानेवाले श्वास – प्रश्वास की गतिपर,
  • ध्यान रखकर,
  • श्वासके द्वारा,
  • श्रीभगवान के नामका जप करना।
  • यह अभ्यास बैठते-उठते,
  • चलते-फिरते,
  • सोते-खाते हर समय,
  • प्रत्येक अवस्थामे किया जा सकता है।
  • इसमे श्वास,
  • जोर-जोर से लेनेकी भी,
  • कोई आवश्यकता नहीं।
  • श्वासकी साधारण चालके साथ-ही-साथ,
  • नामका जप किया जा सकता है।
  • इसमे लक्ष्य रखनेसे ही,
  • मन रुककर नामका जप हो सकता है।
  • श्वासके द्वारा नामका जप करते समय,
  • चित्तमें इतनी प्रसन्नता होनी चाहिये कि,
  • मानो मन आनन्दसे उछला पड़ता हो।
  • आनन्द रससे भरा हुआ,
  • अन्तःकरणरूपी पात्र मानो,
  • छलका पडता हो।
  • यदि इतने आनन्दका अनुभव न हो तो,
  • आनन्दकी भावना ही करनी चाहिये।
  • इसीके साथ भगवान को,
  • अपने अत्यन्त समीप जानकर,
  • उनके स्वरूपका ध्यान करना चाहिये,
  • मानो उनके समीप होनेका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है।
  • इस भावसे संसारकी सुध भुलाकर,
  • मनको परमात्मामे लगाना चाहिये।

15. ईश्वर-शरणागति

  • ईश्वर-प्रणिधानसे भी मन वशमें होता है,
  • अनन्य भक्तिसे परमात्माके शरण होना,
  • ईश्वर-प्रणिधान कहलाता है।
  • ईश्वर शब्दसे यहाँ पर,
  • परमात्मा और उनके भक्त,
  • दोनों ही समझे जा सकते हैं।
  • ‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’,
  • ‘तस्मिस्तजने भेदाभावात्’,
  • ‘तन्मयाः’ –
  • इन श्रुति और भक्तिशास्त्रके सिद्धान्त-वचनोंसे,
  • भगवान्, ज्ञानी और भक्तोंकी एकता सिद्ध होती है।
  • श्रीभगवान् और उनके भक्तोंके प्रभाव और
  • चरित्रके चिन्तनमात्रसे,
  • चित्त आनन्दसे भर जाता है।
  • संसारका बन्धन मानो,
  • अपने-आप टूटने लगता है।
  • अतएव भक्तोंका सङ्ग करने,
  • उनके उपदेशोंके अनुसार चलने और
  • भक्तोंकी कृपाको ही,
  • भगवत्प्राप्तिका प्रधान उपाय समझनेसे भी,
  • मनपर विजय प्राप्त की जा सकती है।
  • भगवान् और सच्चे भक्तोंकी कृपासे,
  • सब कुछ हो सकता है।

16. मनके कार्योंको देखना

  • मनको वशमें करनेका,
  • एक बड़ा उत्तम साधन है,
  • मनसे अलग होकर,
  • निरन्तर,
  • मनके कार्योको,
  • देखते रहना।
  • जबतक हम,
  • मनके साथ मिले हुए है,
  • तभीतक,
  • मनमें इतनी चञ्चलता है।
  • जिस समय हम,
  • मनके द्रष्टा बन जाते हैं,
  • उसी समय,
  • मनकी चञ्चलता मिट जाती है।
  • वास्तवमें तो
  • मनसे,
  • हम सर्वथा भिन्न ही है।
  • किस समय मनमे क्या सकल्प होता है,
  • इसका पूरा पता हमें रहता है।
  • मुंबईमे बैठे हुए एक मनुष्यके मनमे,
  • दिल्ली किसी दृश्यका सङ्कल्प होता है,
  • इस बाातको यह अच्छी तरह जानता है।
  • यह निर्विवाद बात है कि,
  • जानने या देखनेवाला,
  • जाननेकी वा देखनेकी वस्तुसे,
  • सदा अलग होता है।
  • ऑखको आँख नहीं देख सकती।
  • इस न्यायसे मनकी बातोंको,
  • जो जानता या देखता है,
  • वह मनसे सर्वथा भिन्न है,
  • भिन्न होते हुए भी,
  • वह अपनेको मनके साथ मिला लेता है,
  • इसीसे उसका जोर पाकर मनकी
  • उद्दण्डता बढ़ जाती है।
  • यदि साधक अपनेको निरन्तर
  • अलग रखकर,
  • मनकी क्रियाओंका,
  • द्रष्टा बनकर देखनेका अभ्यास करे,
  • तो मन बहुत ही शीघ्र,
  • सङ्कल्परहित हो सकता है।

17. भगवन्नामकीर्तन

  • मग्न होकर उच्च स्वरसे,
  • परमात्माका नाम और गुणकीर्तन,
  • करनेसे भी मन परमात्मामें,
  • स्थिर हो सकता है।
  • भगयान् चैतन्यदेवने तो मनको निरुद्धकर,
  • परमात्मामे लगानेका,
  • यही परम साधन बतलाया है।
  • भक्त जब अपने प्रभुका,
  • नाम-कीर्तन करते-करते,
  • गद्गदकण्ठ, रोमाञ्चित और
  • अश्रुपूर्णलोचन होकर,
  • प्रेमावेशमें अपने आपको सर्वथा भुलाकर,
  • केवल परमात्माके रूपमें,
  • तन्मयता प्राप्त कर लेता है,
  • तब भला,
  • मनको जीतने में,
  • और कौन-सी बात बच रहती है ?
  • अतएव,
  • प्रेमपूर्वक परमात्माका नामकीर्तन करना,
  • मनपर विजय पानेका एक अत्युत्तम साधन है।
  • इस प्रकारसे मनको रोककर,
  • परमात्मामें लगानेके अनेक साधन और युक्तियाँ हैं।
  • इनमेंसे या अन्य किसी भी युक्तिसे,
  • किसी प्रकारसे भी,
  • मनको विषयोंसे हटाकर,
  • परमात्मामे लगानेकी चेष्टा करनी चाहिये।
  • मनके स्थिर किये बिना,
  • अन्य कोई भी अवलम्बन नहीं।
  • जैसे चञ्चल जलमें,
  • रूप विकृत दीख पड़ता है,
  • उसी प्रकार चञ्चल चित्तमें,
  • आत्माका यथार्थ स्वरूप,
  • प्रतिबिम्बित नहीं होता।
  • परन्तु जैसे स्थिर जलमें,
  • प्रतिबिम्ब जैसा होता है,
  • वैसा ही दीखता है,
  • इसी प्रकार केवल स्थिर मनसे ही,
  • आत्माका यथार्थ स्वरूप,
  • स्पष्ट प्रत्यक्ष होता है।
  • अतएव प्राणपणसे,
  • मनको स्थिर करनेका,
  • प्रयत्न करना चाहिये।
  • अबतक जो इस मनको स्थिर कर सके है,
  • वे ही उस श्यामसुन्दरके,
  • नित्यप्रसन्न नवीन-नील-नीरद,
  • प्रफुल्ल मुखारविन्दका दर्शन कर,
  • अपना जन्म और जीवन सफल कर सके है।
  • जिसने एक बार भी,
  • उस ‘अनूपरूपशिरोमणि’ के दर्शनका सयोग प्राप्त कर लिया,
  • वही धन्य हो गया।
  • उसके लिये उस सुखके सामने,
  • और सारे सुख फीके पड़ गये।
  • उस लाभके सामने,
  • और सारे लाभ नीचे हो गये!

यं लब्ध्वा चापरं लामं मन्यते नाधिकं ततः।

  • जिस लाभको पा लेनेपर,
  • उससे अधिक और कोई-सा लाभ भी नहीं जंचता।
  • यही योगसाधनका चरम फल है,
  • अथवा यही परम योग है।

Satsang

Dohe

मन को काबू में करने के 15 तरीके – 11 से 15
Categories
Satsang

मन को भगवान् में कैसे लगाएं

मन, संसार की बातें और भगवान् का चिंतन

मन की इच्छाओं के अनुरूप फल मिलता है

  • मन जिसकी लालसा करता है,
  • उसे पाता है।
  • जगतमें दो बातें है –
  • एक सांसारिक वस्तुएं अर्थात
    • मोह-माया, भोग पदार्थ और
  • दूसरे भगवान।
  • मन सांसारिक चीजों का चिंतन करता है,
  • तो भोग मिलता है और
  • भगवान का चिंतन करता है,
  • तो भगवान मिलते हैं।

मन, सांसारिक चीजों का या भगवान का, चिंतन क्यों करता है?

  • मन,
  • संसार की बातों का या
  • कभी कभी ईश्वर का,
  • चिंतन क्यों करता है?
  • इसका उत्तर यह है कि,
  • आनंद के लिए,
  • शाश्वत सुख के लिए।
  • बीच-बीच में जब मन को यह लगने लगता है कि,
  • सांसारिक बातों से,
  • मिलने वाला सुख या आनंद,
  • अखंड नहीं है,
  • बल्कि उसके परिणाम में
  • क्लेश, भय, चिंता और दु:ख मिलता है,
  • तब उसमें अर्थात मनमे,
  • भगवान की इच्छा जाग उठती है।
  • मन जिसके लिए उत्सुक होता है,
  • उसे पाता है।
  • इस प्रकार,
  • मन, भगवान के लिए उत्सुक होकर,
  • भगवान में लीन हो जाता है।
  • और आत्मा तो परमात्मा स्वरुप है,
  • इसलिए कह सकते हैं कि,
  • मन आत्मा में लीन हो जाता है।
  • इस मार्ग के साधक का,
  • जब मन व्याकुल होता है,
    • या उसे कोई इच्छा होती है,
  • तब उसके लिए,
  • वह अपने भगवान की शरण लेता है।
  • और परमात्मा तो कल्पतरु है।
  • उन का आश्रय लेकर,
  • मनुष्य जो इच्छा करता है, वह पाता है।
  • इसलिए,
  • इस प्रकार भक्तियोग वाला,
  • अस्त-व्यस्त होकर काम करता हुआ भी,
  • आखिर भगवान को प्राप्त करता है।

योग अर्थात मन को ईश्वर से जोड़ना

  • चित्तको,
  • भगवानमें जोड़नेका नाम,
  • योग है।
  • यहां जो कुछ है,
  • सब परमात्मा से उत्पन्न हुआ है।
  • परमात्मा सर्वत्र, अव्यक्त रूप में व्यापक,
  • सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, अविनाशी,
  • दयालु और भक्त वत्सल है।
  • उनको भज कर,
  • मैं उन्हें प्राप्त करूंगा।
  • वह मेरे सर्वस्व है,
  • मुझे वे तारेंगे
  • – इस भावना से मन को,
  • भगवान में जोड़ने का नाम योग है।

मन का गड़बड़ घोटाला

  • जगत के अनेकों संस्कार,
  • मन को भुलावे में डालते हैं,
  • उनसे कभी मन में,
  • भोग की इच्छा जागृत होती है,
  • और फिर कभी,
  • भोग के प्रति इच्छा का अभाव होकर,
  • भगवान की इच्छा जाग उठती है।
  • इस प्रकार,
  • मन का गड़बड़ घोटाला चला ही करता है।
  • मन का यह भ्रम चिरकाल से है,
  • इसलिए, यह सहज ही दूर नहीं होता।
  • मन एक बार सोचता है कि,
  • भोग की इच्छा नहीं करना चाहिए,
  • मोह माया में नहीं फंसना चाहिए,
  • भोग का चिंतन भी नहीं करना चाहिए,
  • केवल भगवान की ही चाह करना चाहिए।
  • इस प्रयत्न में,
  • उसकी अनेक परीक्षाएं होती है।
  • उसके सामने,
  • अनेकों भोग आकर खड़े हो जाते हैं।
  • उसी की इंद्रियां,
  • उनको भोगने के लिए,
  • उसे ललचाती है।
  • इस अवस्था में,
  • यदि उसकी बुद्धि,
  • परिपक्व नहीं हुई होती है,
  • तो वह मन,
  • भगवान की भक्ति को छोड़कर,
  • भोग में फंस जाता है,
  • और, एक बार भोग में पड़ा हुआ मन,
  • सहज ही नहीं निकलता।

हठपूर्वक मन को रोके, या भगवान् की शरण जाएं?

  • हठपूर्वक सांसारिक चीजों से,
  • हटाया हुआ मन,
  • उन चीजों के लिए प्रबल आकर्षण होने पर,
  • तुरंत ही उसमें फंस जाता है।
  • इसलिए,
  • मोह माया के बंधनों से छूटने के लिए,
  • भोग का त्याग करने के लिए,
  • भगवान की शरण लेनी चाहिए।
  • भगवान की प्राप्ति करने के लिए और
  • भोग की इच्छा का त्याग करने के लिए,
    • जो भगवान की शरण लेते हैं,
  • उनकी रक्षा भगवान स्वयं करते हैं।
  • इसी कारण,
  • भगवान का भक्त,
  • भोग का सहज ही त्याग करके
  • आसानी से भगवान को पा लेता है।
  • क्योंकि ऐसे भक्तों का चित्त,
  • मोह माया का त्याग करने के लिए,
  • अपने बल का भरोसा नहीं करता है।
  • बल्कि उन भगवान का बल ही,
  • उसका आधार होता है,
  • जिसका बल अपार है।
  • और जो भगवान की शरण न लेने वाले साधक,
  • अपने ही अल्प बल का भरोसा करते हैं,
  • उनकी चेष्टा निष्फल हो जाने की,
  • अधिक संभावना होती है।
  • इसलिए,
  • भक्ति की कामना करने वालों को चाहिए कि,
  • भगवान जो सर्वत्र, व्यापक, सर्वशक्तिमान,
  • सर्वज्ञ, सबके आधार और दयालु और भक्त वत्सल है,
  • उनकी शरण लेकर, उनकी प्रार्थना करके,
  • उन्हीं के दया के द्वारा मुक्ति पाने के लिए यत्न करें।

भगवद गीता की सहायता से मन को ईश्वर में कैसे लगाएं ?

  • गीता किसी संप्रदाय का ग्रंथ नहीं है।
  • जगत के मनुष्य मात्र के ऊपर लागू होने वाला ग्रंथ है।
  • इसमें कही हुई बातें स्वाभाविक है।
  • शरीर में रहकर,
  • क्रिया करने वाले मन का,
  • निदान ठीक-ठीक समझाकर,
  • गीता ने यह बतलाया है कि,
    • मन को स्थाई शांति कैसे प्राप्त हो सकती है।
  • गीता को,
  • सदा श्लोक और अर्थ के साथ पढ़ना चाहिए,
  • उसका नियमित पाठ करना चाहिए और
  • उनपर विचार करना चाहिए।
  • पाठ करने से,
  • मुख्य श्लोक कंठस्थ हो जाएंगे,
  • अर्थात याद हो जाएंगे।
  • और जब,
  • मन कभी शांत बैठा होगा,
  • चित्त फुर्सत में होगा,
  • तब मन में,
  • उन श्लोकों का अर्थ स्फुरित होगा।
  • उसमें कहे हुए साधनके प्रति,
  • श्रद्धा होगी, और
  • उस साधनके लिए,
  • प्रयत्न करने में उत्साह होगा।
  • गीता में बतलाए हुए साधनों के करने से ही,
  • कर्मो को निष्काम भाव से किया जा सकता है और
  • मन को शांति मिल सकती है।
  • साधन के बिना कुछ नहीं मिलता।
  • दूसरे अध्याय में बतलाये हुए
    • स्थितप्रज्ञ के लक्षण,
  • तीसरे अध्याय में बताया हुआ,
    • काम क्रोध के नाश करने का आग्रह,
  • बारहवें अध्याय में बतलाये हुए,
    • भक्तों के लक्षण,
  • तरहवें अध्याय में बतलाए हुए,
    • ज्ञान के लक्षण,
  • चौदहवें अध्याय में बताए हुए,
    • गुनातीत के लक्षण,
  • सोलहवे अध्याय में बतलाए हुए,
    • दैवी-सम्पदा के लक्षण
  • तथा इनके अतिरिक्त सारी गीता में,
  • यत्र तत्र कहे गए साधनों को,
  • यदि साधक करें,
    • तो जरूर शांति प्राप्त होती है।
  • छठे अध्याय में बतलाया हुआ,
  • मन के निरोध का उपाय भी,
  • आग्रह पूर्वक करने योग्य है।

सत्संग और भक्तियोग – List

Satsang

Dohe

मन को भगवान् में कैसे लगाएं