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गणेश मंत्र – गणेशजी के अत्यंत सरल मंत्र

सुखकर्ता, दुःखहर्ता, भगवान् श्री गणेश

  • भगवान श्री गणेश दुखहर्ता है,
  • अर्थात बाधाएं, चिंता और
  • दुःख दूर करने वाले देवता है।
  • गणपतिजी सुखकर्ता है,
  • अर्थात रिद्धी, सिद्धि और
  • बुद्धि के भी दाता हैं।
  • इसलिए गणेशजी के मंत्र,
  • सिद्धि मंत्र हैं और
  • प्रत्येक मंत्र में,
  • उनकी कुछ विशिष्ट शक्तियां समाहित हैं।
    • समाहित अर्थात
    • सम्मिलित, निहित या रहती हैं।
  • जब सच्ची भक्ति के साथ,
  • गणेश मंत्र का जाप किया जाता है,
  • तो अच्छे परिणाम मिलते हैं।

श्री गणेश मंत्र जाप के लाभ

  • सामान्य तौर पर,
  • गणेश मंत्र के जाप से,
  • सभी बुराईयां मिट जाती है और
  • भक्त को विवेक और सफलता का,
  • आशीर्वाद मिलता है।
  • जो मनुष्य सच्ची भक्ति से,
  • गणेशजी के मंत्र जाप करता है,
  • उस भक्त के मन में,
    • बुरे विचार प्रवेश नहीं करते और
  • जिस घर में श्री गणेश मंत्रो का जाप होता है,
  • उस घर में,
    • विपदाएं प्रवेश नहीं करती।
  • आध्यात्मिक लाभ के लिए,
  • कुछ ऐसे श्री गणेशजी के,
  • कुछ सरल मंत्र नीचे दिए गए हैं। (1)

गणेश मंत्र जाप से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातें –

  • मंत्र के जाप के लिए बैठने से पहले,
  • नहा लेना चाहिए।
  • मंत्र का जाप 108 बार या,
  • एक पूर्ण माला का होना चाहिए।
  • जब यह जाप नियमित रूप से,
  • 48 दिनों तक किया जाए,
  • तो यह एक – उपासना – बन जाता है।
  • जिसका अर्थ है,
  • गहन ध्यान,
  • जिससे सिद्धि या आध्यात्मिक शक्तियों का,
  • विकास होता है।
  • लेकिन इन शक्तियों का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
  • शक्तियों का उपयोग सिर्फ मानव जाति के लाभ के लिए और
  • निस्वार्थ कार्यों के लिए ही करना चाहिए।
  • शक्तियों का दुरुपयोग देवताओं के,
  • अभिशाप का कारण बन सकता है। (1)

ओम गं गणपतये नमः

(Om Gam Ganapataye Namaha)
ॐ गं गणपतये नमः

  • ओम गं गणपतये नमः,
  • गणपति उपनिषद का एक मंत्र है।
  • नया व्यवसाय, नया करियर या
  • नई नौकरी शुरू करने से पहले,
  • यात्रा शुरू करने से पहले या
  • स्कूल में नए कोर्स से पहले,
  • गणपतिजी के इस मंत्र को,
  • पढ़ा जाता है,
  • ताकि बाधाएं दूर हो जाएं और
  • प्रयासों में सफलता मिले। (1)

ॐ गं गणपतये नमः, ॐ गं गणपतये नमः
ॐ गं गणपतये नमः, ॐ गं गणपतये नमः


ओम नमो भगवते गजाननाय नमः

Om Namo Bhagavate Gajaananaaya Namaha
ॐ नमो भगवते गजाननाय नमः

  • ओम नमो भगवते गजाननाय नमः,
  • एक भक्ति मंत्र है।
  • यह मंत्र गणेश जी की,
  • सर्वव्यापी चेतना का प्रतिनिधित्व करता है,
  • अर्थात सर्वव्यापी चेतना को व्यक्त करता है।
  • यह मंत्र गणेशजी के दर्शन करने या,
  • एक व्यक्ति के रूप में,
  • उनकी तत्काल उपस्थिति को,
  • महसूस करने के लिए,
  • बहुत प्रभावशाली है। (1)

ओम नमो भगवते गजाननाय नमः,
ओम नमो भगवते गजाननाय नमः,
ओम नमो भगवते गजाननाय नमः,
ओम नमो भगवते गजाननाय नमः


ओम श्री गणेशाय नमः

Om Shri Ganeshaaya Namaha
ॐ श्री गणेशाय नमः

  • ओम श्री गणेशाय नमः मंत्र से
  • स्मरण शक्ति बढ़ती है,
  • जो छात्रों को पढ़ाई के लिए और
  • परीक्षामें सफल होने के लिए जरूरी हैं।
  • इसलिये यह मंत्र,
  • आमतौर पर सभी बच्चों को,
  • उनकी अच्छी शिक्षा के लिए सिखाया जाता है।
  • किसी भी उम्र के लोग,
  • स्कूल या विश्वविद्यालय में,
  • स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए और
  • सफलता के लिए इस मंत्र का,
  • उपयोग कर सकते हैं। (1)

ॐ श्री गणेशाय नमः, ॐ श्री गणेशाय नमः,
ॐ श्री गणेशाय नमः, ॐ श्री गणेशाय नमः


ॐ वक्रतुंडाय नम:

Om Vakratundaaya Namaha
ॐ वक्रतुंडाय नम:

  • यह एक बहुत शक्तिशाली मंत्र है,
  • जैसा कि गणेश पुराण में चर्चा की गई है।
  • जब व्यक्तिगत या सार्वभौमिक रूप से,
  • कुछ काम ठीक से नहीं हो रहा है,
  • या जब लोगों के दिमाग,
  • नकारात्मक हो जाते हैं,
  • तो गणेशजी का ध्यान,
  • इस मन्त्र से आकर्षित किया जा सकता है,
  • जिससे काम सरल हो जाते है।
  • गणेश पुराण में,
  • राक्षसों के अत्याचार को रोकने के लिए,
  • इस मंत्र का कई बार उपयोग किया गया है। (1)

ॐ वक्रतुंडाय नम:, ॐ वक्रतुंडाय नम:
ॐ वक्रतुंडाय नम:, ॐ वक्रतुंडाय नम:


ओम क्षिप्र प्रसादाय नमः

Om Kshipra Prasadaya Namaha
ॐ क्षिप्र प्रसादाय नमः

  • क्षिप्र अर्थात
    • तुरंत, तत्काल,
    • जल्दी, तेज़,
    • शीघ्रगामी,
    • instant
  • ओम क्षिप्र प्रसादाय नमः मंत्र में,
  • क्षिप्र का अर्थ है तुरंत।
  • अगर कुछ खतरा या कुछ मुश्किलें,
  • रास्ते में आ रही हैं और
  • नहीं जानते कि उस मुसीबत से,
  • कैसे छुटकारा पाया जाए,
  • तो भगवान श्री गणेश का,
  • त्वरित आशीर्वाद पाने के लिए,
  • सच्ची श्रद्धा के साथ,
  • इस मंत्र का अभ्यास करें।

ॐ क्षिप्र प्रसादाय नमः, ॐ क्षिप्र प्रसादाय नमः
ॐ क्षिप्र प्रसादाय नमः, ॐ क्षिप्र प्रसादाय नमः


ओम सुमुखाय नमः

Om Sumukhaaya Namaha
ॐ सुमुखाय नमः

  • ॐ सुमुखाय नमः
  • इस मंत्र के बहुत अर्थ है,
  • लेकिन इसे सरल बनाने के लिए,
  • इसका मतलब है कि
  • इस मंत्र के जाप और ध्यान से,
  • आप हमेशा आत्मा में,
  • चेहरे पर और हर चीज में,
  • बहुत सुंदर होंगे।
  • उस मंत्र का ध्यान करने से,
  • आप पर बहुत ही मनभावन और
  • सौंदर्य आ जाता है।
  • इसके साथ ही शांति मिलती है जो आपकी आँखों में लगातार नृत्य करती है, और जो शब्द आप बोलते हैं, वे सभी प्रेम की शक्ति से भरे होते हैं।

ॐ सुमुखाय नमः, ॐ सुमुखाय नमः
ॐ सुमुखाय नमः, ॐ सुमुखाय नमः


ओम एकदंताय नमः

Om Ekadantaaya Namaha
ॐ एकदंताय नमः

  • ॐ एकदंताय नमः,
  • एकदंत का तात्पर्य
  • गणपतिजी के एकदन्त से है।
  • इस मंत्र का अर्थ है कि,
  • भगवान ने मन में उठने वाले द्वंद्व को तोड़ा,
  • जिससे मन में एक स्पष्ट सोच आ जाती है।
  • जिसके पास मन की एकता और
  • एकल-मन की भक्ति है,
  • वह सब कुछ हासिल कर लेता है।

ॐ एकदंताय नमः, ॐ एकदंताय नमः
ॐ एकदंताय नमः, ॐ एकदंताय नमः


ओम कपिलाय नमः
Om Kapilaaya Namaha
ॐ कपिलाय नमः

ओम गजकर्णकाय नमः
Om Gajakarnakaaya Namaha
ॐ गजकर्णकाय नमः

ओम लम्बोदराय नमः
Om Lambodharaaya Namaha
ओम लम्बोदराय नमः

ओम विकटाय नमः
Om Vikataaya Namaha
ॐ विकटाय नमः

ओम विघ्न नाशनाया
Om Vighna Nashanaaya Namaha
ॐ विघ्न नाशनाया

ओम विनायकाय नमः
Om Vinayakaaya Namaha
ॐ विनायकाय नमः

ओम धूम्रकेतुवे नमः
Om Dhumraketuve Namaha
ॐ धूम्रकेतुवे नमः

ओम गणाध्याय नमः
Om Ganadhyakshaaya Namaha
ॐ गणाध्याय नमः

ओम भलाचंद्राय नमः
Om Bhalachandraaya Namaha
ऊँ भलाचंद्राय नमः

ओम गजाननाय नमः
Om Gajaananaaya Namaha
ॐ गजाननाय नमः

ओम श्रीं ह्रीं क्लीम ग्लौम गम गणपतये
वर वरदा सर्व जनमे वशमानय स्वाहा

सन्दर्भ – Reference – Source –

  1. Official website of Shree Siddhivinayak Ganapati Temple Trust, Prabhadevi, Mumbai – Mantra

श्री गणेश मंत्र

श्री वक्रतुण्ड महाकाय
सूर्य कोटी समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव
सर्व-कार्येशु सर्वदा॥

ॐ गं गणपतये नमो नमः
श्री सिद्धिविनायक नमो नमः।
अष्टविनायक नमो नमः
गणपति बाप्पा मोरया॥


श्री गणेश गायत्री मंत्र – (Shri Ganesh Gayatri Mantra)

ॐ एकदन्ताय विद्धमहे,
वक्रतुण्डाय धीमहि,
तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥

ॐ वक्रतुण्डाय विद्धमहे,
एकदन्ताय धीमहि,
तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥


गणेश स्तुति मंत्र (Vinayak Stuti Mantra)

गजाननं भूतगणादि सेवितं,
कपित्थ जम्बूफलचारू भक्षणम्,
उमासुतं शोक विनाशकारकं,
नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्॥
ॐ श्री गणेशाय नमः

Gajaa-nanam bhoot-ganaadi sevitam
Kapittha jambu-phal charu bhakshanam।
Uma-sutam shok vinaash-kaarakam
Namaami Vighneshwar paad-pankajam॥

(कपित्थ – Wood Apple – एक फल है जो बेल जैसा होता है। इसे कबिट या कठबेल भी कहते हैं)


गणेश शुभ लाभ मंत्र (Ganesh Mantra for Prosperity and Wealth)

ॐ श्रीम गम सौभाग्य गणपतये
वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नमः॥

Om Shreem Gam
Saubhagya Ganpataye
Varvarda Sarva-janma mein
Vash-maanya Namah॥

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ओम जय जगदीश हरे

1.

ओम जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


2.

जो ध्यावे फल पावे,
दुख बिनसे मन का,
स्वामी दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


3.

मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं मैं किसकी,
स्वामी शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं किसकी॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


4.

तुम पूरण परमात्मा,
तुम अंतरयामी,
स्वामी तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


5.

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता,
मैं मूरख खल कामी,
कृपा करो भर्ता॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


6.

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


7.

दीनबंधु दुखहर्ता,
तुम रक्षक मेरे,
स्वामी तुम रक्षक मेरे।
अपने हाथ बढाओ,
द्वार पडा तेरे॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


8.

विषय विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
संतन की सेवा॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


9.

तन मन धन सब कुछ है तेरा,
(तन मन धन जो कुछ है,
सब ही है तेरा।)
स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण,
क्या लागे मेरा॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥


10.

ओम जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥
॥ओम जय जगदीश हरे॥

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Om Jai Jagdish Hare
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जय गणेश, जय गणेश देवा – गणेश आरती

1.

जय गणेश, जय गणेश,
जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥


2.

एक दन्त दयावंत,
चार भुजा धारी।
माथे पर तिलक सोहे,
मुसे की सवारी॥


3.

पान चढ़े फुल चढ़े,
और चढ़े मेवा।
लडुवन का भोग लगे,
संत करे सेवा॥


1.

जय गणेश, जय गणेश,
जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥


4.

अंधन को आँख देत,
कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत,
निर्धन को माया॥


5.

सुर श्याम शरण आये,
सफल किजे सेवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥

(Or –
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥)


1.

जय गणेश, जय गणेश,
जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती,
पिता महादेवा॥


श्लोक:

व्रकतुंड महाकाय,
सूर्यकोटी समप्रभाः।
निर्वघ्नं कुरु मे देव,
सर्वकार्येषु सर्वदा॥


ॐ गं गणपतये नमो नमः
श्री सिद्धिविनायक नमो नमः।
अष्टविनायक नमो नमः
गणपति बाप्पा मोरया॥

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हनुमान चालीसा – जय हनुमान ज्ञान गुन सागर

दोहा:

श्रीगुरु चरण सरोज रज,
निज मनु मुकुर सुधार।
बरनउ रघुवर बिमल जसु,
जो दायकु फल चार॥

बुद्धिहीन तनु जानिके,
सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि,
हरहु कलेश विकार॥

हनुमान चालीसा

1.

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

2.

राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥॥


3.

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥

4.

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुँचित केसा॥॥


5.

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥

6.

शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जगवंदन॥॥


7.

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥

8.

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मनबसिया॥॥


9.

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा॥

10.

भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे॥॥


11.

लाय सजीवन लखन जियाए।
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥

12.

रघुपति कीन्ही बहुत बढाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥॥


13.

सहस बदन तुम्हरो जस गावै।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥

14.

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥॥


15.

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥

16.

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥॥


17.

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥

18.

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥॥


19.

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही।
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥

20.

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥॥


21.

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥

22.

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहु को डरना॥॥


23.

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तै कापै॥

24.

भूत पिशाच निकट नहि आवै।
महावीर जब नाम सुनावै॥॥


25.

नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

26.

संकट ते हनुमान छुडावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥॥


27.

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा॥

28.

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥॥


29.

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥

30.

साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥॥


31.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥

32.

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥॥


33.

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥

34.

अंतकाल रघुवरपुर जाई।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥॥


35.

और देवता चित्त ना धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥

36.

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥॥


37.

जै जै जै हनुमान गुसाईँ।
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥

38.

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥॥


39.

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा।
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥

40.

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥॥


दोहा

1.

पवन तनय संकट हरन,
मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित,
हृदय बसहु सुर भूप॥

2.

सियावर रामचंद्र की जय
जय बोलो बजरंग बली की जय
जय बोलो बजरंग बली की जय
जय बोलो बजरंग बली की जय

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गणपति की सेवा मंगल मेवा – गणपति आरती

1.

गणपति की सेवा मंगल मेवा,
सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैतिस देवता,
द्वार खड़े सब अर्ज करे॥
(Or – तीन लोक के सकल देवता,
द्वार खड़े नित अर्ज करें॥)


2.

ऋद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजे,
अरु आनन्द सों चवर करें।
धूप दीप और लिए आरती,
भक्त खड़े जयकार करें॥


3.

गुड़ के मोदक भोग लगत है,
मुषक वाहन चढ़ा करें।
सौम्यरुप सेवा गणपति की,
विध्न भागजा दूर परें॥


4.

भादों मास और शुक्ल चतुर्थी,
दिन दोपारा पूर परें ।
लियो जन्म गणपति प्रभुजी ने,
दुर्गा मन आनन्द भरें॥


5.

अद्भुत बाजा बजा इन्द्र का,
देव वधू जहँ गान करें।
श्री शंकर के आनन्द उपज्यो,
नाम सुन्या सब विघ्न टरें॥


6.

आन विधाता बैठे आसन,
इन्द्र अप्सरा नृत्य करें।
देख वेद ब्रह्माजी जाको,
विघ्न विनाशक नाम धरें॥


7.

एकदन्त गजवदन विनायक,
त्रिनयन रूप अनूप धरें।
पगथंभा सा उदर पुष्ट है,
देख चन्द्रमा हास्य करें॥


8.

दे श्राप श्री चंद्रदेव को,
कलाहीन तत्काल करें।
चौदह लोक मे फिरे गणपति,
तीन भुवन में राज्य करें॥


9.

गणपति की पूजा पहले करनी,
काम सभी निर्विघ्न सरें।
श्री प्रताप गणपतीजी को,
हाथ जोड स्तुति करें॥


1.

गणपति की सेवा मंगल मेवा,
सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैतिस देवता,
द्वार खड़े सब अर्ज करे॥
(तीन लोक के सकल देवता,
द्वार खड़े नित अर्ज करें॥)


श्लोक –

व्रकतुंड महाकाय, सूर्यकोटी समप्रभः।
निर्वघ्नं कुरु मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा॥


ॐ गं गणपतये नमो नमः
श्री सिद्धिविनायक नमो नमः।
अष्टविनायक नमो नमः
गणपति बाप्पा मोरया॥

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Ganpati Ki Seva, Mangal Meva – Shri Ganesh Aarti
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सुखकर्ता दुखहर्ता – जय देव, जय मंगलमूर्ती

1.

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची॥

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
जय देव, जय देव


जय देव, जय देव,
जय मंगलमूर्ती, हो श्री मंगलमूर्ती
दर्शनमात्रे मन कामनापु्र्ती
जय देव, जय देव


2.

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुम केशरा॥

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥
जय देव, जय देव


जय देव, जय देव,
जय मंगलमूर्ती, हो श्री मंगलमूर्ती
दर्शनमात्रे मन कामनापु्र्ती
जय देव, जय देव


3.

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना।
सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावें, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना॥
जय देव, जय देव


जय देव, जय देव,
जय मंगलमूर्ती, हो श्री मंगलमूर्ती
दर्शनमात्रे मन कामनापु्र्ती
जय देव, जय देव


4.

घालीन लोटांगण, वंदिन चरण।
डोळ्यांनी पाहिन रूप तुझे।
प्रेमे आलिंगीन आनंदे पुजिन।
भावें ओवाळिन म्हणे नामा॥


5.

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव॥
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्व मम देवदेव॥


6.

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा,
बुध्दात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयामि॥


7.

अच्युतं केशवं रामनारायणं,
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरि।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं,
जानकीनायकं रामचंद्रं भजे॥


8.

हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

Aarti

Chalisa

सुखकर्ता दुखहर्ता – जय देव, जय मंगलमूर्ती
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ओम जय शिव ओंकारा – शिव आरती

1.

ओम जय शिव ओंकारा।
प्रभु हर शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


2.

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
स्वामी (शिव) पंचानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


3.

दोभुज चार चतुर्भुज, दशभुज अति सोहे।
स्वामी दशभुज अति सोहे।
तीनो रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


4.

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी।
स्वामी मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी॥
Or
(चन्दन मृगमद सोहे, भाले शशि धारी॥)
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


5.

श्वेतांबर पीतांबर, बाघंबर अंगे।
स्वामी बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुडादिक, भूतादिक संगे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


6.

करमध्येन कमंडलु, चक्र त्रिशूलधारी।
स्वामी चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकर्ता दुखहर्ता, जग-पालन करता॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


7.

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।
स्वामी जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर ओम मध्ये, ये तीनों एका॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


8.

काशी में विश्वनाथ विराजत, नन्दो ब्रह्मचारी।
स्वामी नन्दो ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


9.

त्रिगुण स्वामीजी की आरती, जो कोइ नर गावे।
स्वामी जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी , मन वांछित फल पावे॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥


1.

ओम जय शिव ओंकारा।
प्रभु हर शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
॥ओम जय शिव ओंकारा॥

Aarti

Chalisa

Om Jai Shiv Omkara – Shiv Aarti
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भगवद गीता अर्थसहित अध्याय लिस्ट

  • भगवद गीता
  • सात सौ श्वोकोंका संग्रह है, और
  • उन सात सौ श्लोकों को
  • अठारह अध्यायों में बांटा गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों की लिंक निचे दी गयी है –

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 01

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 02

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 03

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 04

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 05

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 06

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 07

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 08

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 09

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 10

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 11

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 12

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 13

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 14

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 15

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 16

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 17

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 18

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भगवद गीता अर्थसहित अध्याय लिस्ट
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श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंग में से श्री केदारनाथ का ज्योतिर्लिंग हिमाच्छादित प्रदेश का एक दिव्य ज्योतिर्लिंग है। पुराणों एवं शास्त्रोंमें श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमाका वर्णन बारम्बार किया गया है।

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के इस लेख में

  • श्री केदारनाथ की कथा – पांडवों को शिवजी के दर्शन,
  • नर और नारायण की तपस्या और उनको भगवान् शिव के दर्शन,
  • श्री केदारनाथ शिवलिंग का त्रिकोणीय आकार
  • केदारनाथ यात्रा का संक्षिप्त विवरण
  • श्री केदारनाथ की महिमा
  • आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ महिमा का वर्णन

यह ज्योतिर्लिंग पर्वतराज हिमालयकी केदार नामक चोटीपर स्थित है। यहाँकी प्राकृतिक शोभा देखते ही बनती है। इस चोटीके पश्चिम भागमें पुण्यमती मन्दाकिनी नदीके तटपर स्थित केदारेश्वर महादेवका मन्दिर अपने स्वरूपसे ही हमें धर्म और अध्यात्मकी ओर बढ़नेका सन्देश देता है।


हिमालय की देवभूमि में केदारनाथ

हिमालय की देवभूमि में बसे इस देवस्थान के दर्शन केवल छह माह के काल में ही होते हैं। वैशाख से लेकर अश्विन महीने तक के कालावधि में इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा लोग कर सकते हैं।

वर्ष के अन्य महीनों में कड़ी सर्दी होने से हिमालय पर्वत का प्रदेश बर्फ से ढका रहने के कारण श्रीकेदारनाथ का मंदिर भक्तों के लिए बंद रहता है।

कार्तिक महीने में बर्फ वृष्टि तेज होने पर इस मंदिर में घी का नंदा दीप जलाकर श्री केदारेश्वर का भोग सिंहासन बाहर लाया जाता है। और मंदिर के द्वार बंद किए जाते हैं।

कार्तिक से चैत्र तक श्री केदारेश्वर जी का निवास नीचे जोशीमठ में रहता है। वैशाख में जब बर्फ पिघल जाती है तब केदारधाम फिर से खोल दिया जाता है।


हरिद्वार से केदारनाथ तक यात्रा

हरिद्वार को मोक्षदायिनी मायापुरी मानते हैं। हरिद्वार के आगे ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, सोनप्रयाग और त्रियुगी नारायण, गौरीकुंड इस मार्ग से केदारनाथ जा सकते हैं। कुछ प्रवास मोटर से और कुछ पैदल से करना पड़ता है।

हिमालय का यह रास्ता काफी कठिन होता है। परंतु अटल श्रद्धा के कारण यह कठिन रास्ता भक्त यात्री पार करते हैं। श्रद्धा के बल पर इस प्रकार संकटों पर मात की जाती है।

चढान का मार्ग कुछ लोग घोड़े पर बैठकर, टोकरी में बैठ कर या झोली की सहायता से पार करते हैं। इस तरह का प्रबंध वहां किया जाता है।

विश्राम के लिए बीच-बीच में धर्मशालाएं, मठ तथा आश्रम खोले गए हैं। यात्री गौरीकुंड स्थान पर पहुंचने के बाद वहां के गर्म कुंड के पानी से स्नान करते हैं और मस्तकहीन गणेश जी के दर्शन करते हैं।


गौरीकुंड – श्री गणेशजी

गौरीकुंड का स्थान गणेश जी का जन्म स्थान माना गया है।

इस स्थान पर पार्वती पुत्र गणेश जी को शंकर जी ने त्रिशूल के प्रहार से मस्तकहीन बनाया था, और बाद में गजमुख लगा कर जिंदा किया था।


केदारनाथ का शिवलिंग

गौरीकुंड से दो चार कोस की दूरी पर ऊंची हिम शिखरों के परिसर में, मंदाकिनी नदी की घाटी में भगवान शंकर जी का दिव्य ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ का मंदिर दिखाई देता है। यही कैलाश है, जो भगवान शंकर जी का आद्य निवास स्थान है।

लेकिन यहां शंकर जी की मूर्ति और लिंग भी नहीं है। केवल एक त्रिकोण के आकार का ऊंचाई वाला स्थान है। कहते हैं वह महेश का, भैंसे का, पृष्ठ भाग है।


केदारनाथ की कथा – पांडवो को भगवान् शिव के दर्शन

इस ज्योतिर्लिंग का जो इस तरह का आकार बना है, उसकी अनोखी कथा इस प्रकार है –

कौरव और पांडव के युद्ध में अपने ही लोगों की हत्या हुई थी। इसलिए मोक्ष पाने के लिए पांडव तीर्थ स्थान काशी पहुंचे। परंतु भगवान शंकर जी उस समय हिमालय की कैलाश पर गए हुए हैं, यह समाचार मिला।

पांडव काशी से निकले और हरिद्वार होकर हिमालय की गोद में पहुंची। दूर से ही उन्हें भगवान शंकर जी के दर्शन हुए। लेकिन पांडव को देखकर शंकर भगवान लुप्त हो गए।

यह देखकर धर्मराज ने कहा –
हे देव, हम पापियों को देखकर आप लुप्त हो गए। ठीक है, हम आपको ढूंढ निकालेंगे। आपके दर्शन से हमारे सारे पाप धुल जाने वाले हैं। जहां आप लुप्त हुए हैं, वह स्थान अब गुप्तकाशी के रूप में पवित्र तीर्थ बनेगा।

गुप्तकाशी, रुद्रप्रयाग से पांडव आगे निकलकर हिमालय के कैलाश, गौरीकुंड के प्रदेश में घूमते रहे। शंकर भगवान को ढूंढते रहे।

इतने में नकुल और सहदेव को एक भैंसा दिखाई दिया। उसका अनोखा रूप देखकर धर्मराज ने कहा, भगवान शंकर जी ने ही यह भैंसे का अवतार धारण किया है। वह हमें परख रहे हैं।

फिर क्या। गदाधारी भीम उस भैंसे के पीछे लगे। भैंसा उछल पड़ा और भीम के हाथ नहीं आया। आखिर भीम थक गया। फिर भी भीम ने गदा प्रहार से भैंसे को घायल किया।

फिर वह भैंसा एक दर्रे के पास जमीन में मुंह दबा कर बैठ गया। भीम ने उसकी पूंछ पकड़कर खींचा। भैंसे का मुँह इस खिंचाव से सीधे नेपाल में जा पहुंचा। भैंसे का पार्श्व भाग केदार धाम में ही रहा। नेपाल में वह पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाने लगा।

महेश के उस पार्श्व भाग से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। दिव्य ज्योति में से शंकर भगवान प्रकट हुए। पांडवों को उन्होंने दर्शन दिए। शंकर भगवान के दर्शन से पांडवों के पाप नष्ट हो गए।

भगवान शंकर जी ने पांडव से कहा – मैं अभी यहां इसी त्रिकोण आकार में ज्योतिर्लिंग के रूप में हमेशा के लिए रहूंगा। केदारनाथ के दर्शन से भक्तगण पावन होंगे।

महेशरूप लिए हुए शिवजी को भीम ने गदा का प्रहार किया था। इसलिए भीम को बहुत पछतावा हुआ, बुरा लगा। वह महेश का शरीर घी से मलने लगा। उस बात की यादगार के रूप में आज भी उस त्रिकोण आकार दिव्य ज्योतिर्लिंग केदारनाथ को घी से मलते हैं। इस स्थान पर शंकर भगवान की इसी तरह से पूजा की जाती है।


केदारनाथ कथा – नर और नारायण की तपस्या

इस अतीव पवित्र पुण्यफलदायी ज्योतिर्लिक्की स्थापनाके विषयमें पुराणोंमें यह कथा दी गयी है –

अतिशय पवित्र, तपस्वियों, ऋषियों और देवताओंकी निवास-भूमि हिमालयके केदार नामक अत्यन्त शोभाशाली शिखरपर महातपस्वी श्रीनर और नारायणने बहुत वर्षों तक भगवान् शिवको प्रसन्न करनेके लिये बड़ी कठिन तपस्या की।

कई वर्षोंतक वे निराहार रहकर शिवनामका जप करते रहे।

इस तपस्यासे सारे लोकोंमें उनकी चर्चा होने लगी। देवता, ऋषि-मुनि, यक्ष, गन्धर्व सभी उनकी साधना और संयमकी प्रशंसा करने लगे। चराचरके पितामह ब्रह्माजी और सबका पालन-पोषण करनेवाले भगवान् विष्णु भी महातपस्वी नर-नारायणके तपकी प्रशंसा करने लगे।

अन्तमें भगवान् शंकरजी भी उनकी उस कठिन साधनासे प्रसत्र हो उठे। उन्होंने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन दोनों ऋषियोंको दर्शन दिया। नर और नारायणने भगवान् भोलेनाथके दर्शनसे भाव-विह्वल और आनन्द-विभोर होकर बहुत प्रकारकी पवित्र स्तुतियों और मन्त्रोंसे उनकी पूजा-अर्चना की।

भगवान् शिवजीने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेको कहा।

भगवान् शिवकी यह बात सुनकर उन दोनों ऋषियोंने उनसे कहा –
देवाधिदेव महादेव! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो भक्तोंके कल्याणहेतु आप सदा-सर्वदाके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी कृपा करें। आपके यहाँ निवास करनेसे यह स्थान सभी प्रकारसे अत्यन्त पवित्र हो उठेगा। यहाँ आकर आपका दर्शन-पूजन करनेवाले मनुष्योंको आपकी अविनाशिनी भक्ति प्राप्त हुआ करेगी। प्रभो! आप मनुष्योंके कल्याण और उनके उद्धारके लिये अपने स्वरूपको यहाँ स्थापित करनेकी हमारी प्रार्थना अवश्य ही स्वीकार करें।

उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शिवने ज्योतिर्लिंग के रूपमें वहाँ वास करना स्वीकार किया। केदार नामक हिमालय-शिखर पर स्थित होनेके कारण इस ज्योतिर्लिंग को श्रीकेदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूपमें जाना जाता है।

भगवान् शिवसे वर माँगते हुए नर और नारायणने इस ज्योतिर्लिङ्ग और इस पवित्र स्थानके विषयमें जो कुछ कहा है, वह अक्षरश: सत्य है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन तथा यहाँ स्नान करनेसे भक्तोंको लौकिक फलोंकी प्राप्ति होनेके साथ-साथ अचल शिवभक्ति तथा मोक्षकी प्राप्ति भी हो जाती है।


केदारनाथ में पांडवों की स्मृतियाँ

केदारनाथ के परिसर में पांडवों की कई स्मृतियां जागृत रही है। राजा पांडु इसी वन में माद्री के साथ विहार करते समय मर गए थे। वह स्थान पांडुकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। वहां आदिवासी लोग पांडव नृत्य प्रस्तुत करते रहते हैं।

जिस स्थान से पांडव स्वर्ग सिधारे ऊंची चोटी को स्वर्ग रोहिणी कहते हैं। धर्मराज जब स्वर्ग सिधार रहे थे, तब उनका एक अंगूठा निकल कर जमीन पर पड़ा था। उस स्थान पर धर्मराज ने अंगुष्ठमात्र शिवलिंग की स्थापना की।


केदारनाथ की महिमा

केदारेश्वर के दर्शन से स्वप्न में भी दुख प्राप्त नहीं होता। शंकर केदारेश्वर का पूजन कर पांडव का सब दुख जाता रहा।

बद्रीकेश्वर का दर्शन पूजन आवागमन के बंधन से मुक्ति दिलाता है। केदारेश्वर में दान करके शिवजी के समीप जाकर उनके रूप हो जाते हैं।

मुख्य केदारनाथ मंदिर के परिसर में अनेक पवित्र स्थान हैं। मंदिर के पिछवाड़े में आदि शंकराचार्य जी की समाधि है। दूर की ऊंचाई पर भृगुपतन नाम की एक कठिन कगार है।

मंदिर की आठ दिशाओं में अष्टतीर्थ हैं।

तात्पर्य है कि श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए अति कठिन और दुर्गम मार्ग से होकर जाना पड़ता है। लेकिन इरादे बुलंद हो और मन में श्रद्धा हो तो चलते समय थकान बिल्कुल नहीं आती। सबकी जुबान पर एक ही घोष रहता है – जय केदारनाथ, जय केदारनाथ।


आदि शंकराचार्यजी द्वारा केदारनाथ का वर्णन

आदि शंकराचार्यजी ने कहा है –

महाद्रिपार्श्वेच तटे रमन्तं,
सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै:,
केदारमीशं शिवमेकमीडे॥

अर्थात महान हिमालय के प्रदेश में रम जाने वाले, ऋषि मुनियों द्वारा और सुर, असुर, यक्ष तथा महानाग आदि के द्वारा जिन की निरंतर पूजा होती आई है, ऐसे श्री केदारेश्वर महादेव जी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

Temple

Shiv

श्री केदारनाथ ज्योतिर्लिंग
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अम्बे तू है जगदम्बे काली

1.

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गायें भारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


2.

तेरे भक्त जनों पे माता,
भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पडो माँ,
करके सिंह सवारी॥

सौ सौ सिंहों से तु बलशाली,
अष्ट भुजाओं वाली।
दुष्टों को पल में संहारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


3.

माँ बेटे का है इस जग में,
बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सूने हैं पर,
ना माता सुनी कुमाता॥

सब पे करुणा बरसाने वाली,
अमृत बरसाने वाली।
दुखियों के दुखडे निवारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


4.

नहीं मांगते धन और दौलत,
ना चाँदी, ना सोना।
हम तो मांगे माँ तेरे मन में,
इक छोटा सा कोना॥

सबकी बिगडी बनाने वाली,
लाज बचाने वाली।
सतियों के सत को संवारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥


1.

अम्बे तू है जगदम्बे काली,
जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गायें भारती,
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥

ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥
ओ मैया, हम सब उतारें तेरी आरती॥

Aarti

Chalisa

Ambe Tu Hai Jagdambe Kali
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जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी

1.

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिव री॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


2.

मांग सिंदूर बिराजत,
टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना,
चंद्रवदन नीको॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


3.

कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजै।
रक्त-पुष्प गल माला,
कंठन पर साजै॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


4.

केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर मुनि-जन सेवत,
तिनके दुःखहारी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


5.

कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर,
राजत सम ज्योति॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


6.

शुम्भ निशुम्भ बिदारे,
महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना,
निशिदिन मदमाती॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


7.

चण्ड मुण्ड संहारे,
शोणितबीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे,
सुर भयहीन करे॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


8.

ब्रम्हाणी रुद्राणी,
तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


9.

चौंसठ योगिनि गावत,
नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा,
औ बाजत डमरू॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


10.

तुम ही जगकी माता,
तुम ही हो भरता।
भक्तनकी दुःख हरता,
सुख सम्पति करता॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


11.

भुजा चार अति शोभित,
खड्ग खप्पर धारी।
मनवांछित फल पावत,
सेवत नर नारी॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


12.

कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती।
(श्री) मालकेतुमें राजत,
कोटिरतन ज्योति॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


13.

(श्री) अम्बेजी की आरती,
जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी,
सुख सम्पत्ति पावै॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥


1.

जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिव री॥
॥मैया जय अम्बे गौरी॥

Aarti

Chalisa

Jai Ambe Gauri – Ambe Maa Ki Aarti
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श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे
तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं
नमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥
जय मल्लिकार्जुन, जय मल्लिकार्जुन॥

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – द्वितीय ज्योतिर्लिंग

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग – द्वितीय ज्योतिर्लिंग

  • शिवपुराण के अनुसार,
  • श्रीमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग,
  • 12 ज्योतिर्लिंगों में से द्वितीय ज्योतिर्लिंग है।
  • मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग,
  • आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में,
  • कृष्णा नदी के तट पर,
  • श्री शैल पर्वत पर स्थित हैं।
  • इसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं।
  • प्राचीन समय में इसी प्रदेश में,
  • भगवान श्रीशंकर आते थे।
  • इसी स्थान पर उन्हानें,
  • दिव्य ज्योतिर्लिग के रूप में,
  • स्थायी निवास किया।
  • इस स्थान को,
  • कैलाश निवास कहते हैं।
Mallikarjuna Jyotirling Temple

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा – 1

  • शिव पार्वती के पुत्र,
  • स्वामी कार्तिकेय और गणेश,
  • दोनों भाई विवाह के लिए,
  • आपस में कलह करने लगे।
  • कार्तिकेय का कहना था कि वे बड़े हैं,
  • इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए,
  • किन्तु श्री गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे।
  • इस झगड़े पर फैसला देने के लिए,
  • दोनों अपने माता-पिता,
  • भवानी और शंकर के पास पहुँचे।
  • उनके माता-पिता ने कहा कि,
  • तुम दोनों में जो कोई,
  • इस पृथ्वी की परिक्रमा करके,
  • पहले यहाँ आ जाएगा,
  • उसी का विवाह पहले होगा।
  • शर्त सुनते ही,
  • कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए दौड़ पड़े।
  • इधर स्थूलकाय श्री गणेश जी और
  • उनका वाहन भी चूहा,
  • भला इतनी शीघ्रता से वे परिक्रमा कैसे कर सकते थे।
  • गणेश जी के सामने भारी समस्या उपस्थित थी।
  • श्रीगणेश जी, शरीर से ज़रूर स्थूल हैं,
  • किन्तु वे बुद्धि के सागर हैं।
  • उन्होंने कुछ सोच-विचार किया और
  • अपनी माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर से,
  • एक आसन पर बैठने का आग्रह किया।
  • उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद,
  • श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की,
  • फिर विधिवत् पूजन किया।
  • इस प्रकार श्रीगणेश,
  • माता-पिता की परिक्रमा करके,
  • पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये।
  • उनकी चतुर बुद्धि को देख कर,
  • शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और
  • उन्होंने श्रीगणेश का विवाह भी करा दिया।
  • कुमार कार्तिकेय,
  • पृथ्वी की परिक्रमा करके कैलाश पर लौटे,
  • तो नारदजी से,
  • गणेश के विवाह का,
  • वृतांत सुनकर रूष्ट हो गए,
  • और माता पिता के मना करने पर भी,
  • उन्हें प्रणाम कर क्रोच पर्वत पर चले गए।
  • पार्वती के दुखित होने पर, और
  • समझाने पर भी धैर्य न धारण करने पर,
  • शंकर जी ने देवर्षियो को,
  • कुमार को समझाने के लिए भेजा,
  • परंतु वे निराश हो लौट आए।
  • इस पर पुत्र वियोग से व्याकुल पार्वती के अनुरोध पर,
  • पार्वती के साथ, शिवजी स्वयं वहां गए।
  • पंरतु वह, अपने माता पिता का आगमन सुनकर,
  • क्रोच पर्वत को छोडकर,
  • तीन योजन और दूर चले गये।
  • वहा पुत्र के न मिलने पर,
  • वात्सल्य से व्याकुल शिव-पार्वती ने,
  • उसकी खोज में अन्य पर्वतों पर जाने से पहले,
  • उन्होनें वहां अपनी ज्योति स्थापित कर दी।
  • उसी दिन से मल्लिकार्जुन क्षेत्र के नाम से,
  • यह ज्योतिलिंग मल्लिकार्जुन कहलाया।
  • मल्लिकार्जुन – मल्लिका – माता पार्वती,
  • अर्जुन – भगवान शंकर
  • मल्लिका, माता पार्वती का नाम है, जबकि,
  • अर्जुन, भगवान शंकर को कहा जाता है।
  • इस प्रकार सम्मिलित रूप से,
  • मल्लिकार्जुन नाम जगत् में प्रसिद्ध हुआ।
  • अमावस्या के दिन शिवजी और
  • पूर्णिमा के दिन पार्वतीजी,
  • आज भी वहां आते रहते है।
  • इस ज्योतिर्लिग के दर्शन से,
  • धन-धान्य की वृद्धि के साथ,
  • प्रतिष्ठा आारोग्य और अन्य मनोरथों की भी प्राप्ति होती है।
मल्लिकार्जुन – मल्लिका – माता पार्वती, अर्जुन – भगवान शंकर

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा – 2

  • चंद्रावती नाम की एक राजकन्या,
  • वन-निवासी बनकर,
  • इस कदली वन में तप कर रही थी।
  • एक दिन उसने एक चमत्कार देखा की,
  • एक कपिला गाय,
  • बिल्व वृक्ष के नीचे खडी होकर,
  • अपने चारों स्तनों से दूध की धाराएँ,
  • जमीन पर गिरा रही है।
  • गाय का यह नित्यक्रम था।
  • चंद्रवती ने उस स्थान पर खोदा,
  • तो आश्चर्य से दंग रह गई।
  • वही एक स्वयंभू शिवलिंग दिखाई दिया।
  • वह सूर्य जैसा प्रकाशमान दिखाई दिया,
  • जिससे अग्निज्वालाएँ निकलती थी।
  • भगवान शंकर के उस दिव्य ज्योतिर्लिंग की,
  • चंद्रावती ने आराधना की।
  • उसने वहाँ अतिविशाल शिमंदिर का निर्माण किया।
श्री शैल मल्लिकार्जुन
  • भगवान शंकर चंद्रावती पर प्रसन्न हुए।
  • वायुयान में बैठकर,
  • वह कैलाश पहुंची और उसे मुक्ति मिली।
  • मंदिर की एक शिल्पपट्टी पर,
  • चंद्रावती की कथा खोदकर रखी है।
  • शैल मल्लिकार्जुन के,
  • इस पवित्र स्थान की तलहटी में,
  • कृष्णा नदी ने,
  • पाताल गंगा का रूप लिया है।
  • लाखों भक्तगण यहाँ पवित्र स्नान करके,
  • ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए जाते है।
  • अनेक धर्मग्रन्थों में,
  • इस स्थान की महिमा बतायी गई है।
  • महाभारत के अनुसार,
  • श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव का पूजन करने से,
  • अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है।
  • कुछ ग्रन्थों में तो यहाँ तक लिखा है कि,
  • श्रीशैल के शिखर के दर्शन मात्र करने से,
  • दर्शको के सभी प्रकार के कष्ट दूर भाग जाते हैं,
  • उसे अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है और
  • आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाता है।

Temple

Shiv

Shri Mallikarjuna Jyotirling
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Temples

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं
सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥
जय सोमनाथ, जय सोमनाथ॥


श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग – आद्य ज्योतिर्लिंग

शंकरजी के बारह ज्योतिर्लिंग में से सोमनाथ को आद्य ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह स्वयंभू देवस्थान होने के कारण और हमेशा जागृत होने के कारण लाखों भक्तगण यहाँ आकर पवित्र-पावन बन जाते है।

श्री सोमनाथ सौराष्ट्र (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है।

सौराष्ट्र के श्रीसोमनाथ का यह शिवतीर्थ, अग्नितीर्थ और सूर्यतीर्थ सर्वप्रथम चंद्रमा को प्रसन्न हुए। तब उसने भारत में सबसे पहले श्रीशंकरजी के दिव्य ज्योतिर्लिग की स्थापना करके उस पर अतिसुंदर स्वर्णमंदिर बाँधा।


श्रीसोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा

स्कंद-पुराण के प्रभासखंड में श्रीसोमनाथ की कथा का संदर्भ मिलता है। कथा इस प्रकार है:-

चन्द्र अर्थात् सोम ने, दक्षप्रजापति राजा की २७ पुत्रियों से विवाह किया था। किंतु एक मात्र रोहिणी में इतनी आसक्ति और इतना अनुराग दिखाया कि अन्य छब्बीस अपने को उपेक्षित और अपमानित अनुभव करने लगी।

उन्होंने अपने पति से निराश होकर अपने पिता से शिकायत की तो पुत्रियों की वेदना से पीड़ित दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को दो बार समझाने का प्रयास किया।

परन्तु विफल हो जाने पर उसने चन्द्रमा को “क्षयी” होने का शाप दिया और कहा की अब से हर दिन तुम्हारा तेज (काँति, चमक) क्षीण होता रहेगा।

फलस्वरूप हर दूसरे दिन चंद्र का तेज घटने लगा।

देवता लोग चन्द्रमा की व्यथा से व्यथित होकर ब्रह्माजी के पास जाकर उनसे शाप निवारण का उपाय पूछने लगे।

ब्रह्माजी ने प्रभासक्षेत्र में महामृत्युंजय से शंकरजी की उपासना करना एकमात्र उपाय बताया।

चन्द्रमा के छ: मास तक शिव पूजा करने पर शंकर जी प्रकट हुए और चन्द्रमा को एक पक्ष में प्रतिदिन उसकी एक-एक कला नष्ट होने और दूसरे पक्ष में प्रतिदिन बढने का उन्होने वर दिया।

देवताओं पर प्रसन्न होकर उस क्षेत्र की महिमा बढ़ाने के लिए और चन्द्रमा (सोम) के यश के लिए सोमेश्वर नाम से शिवजी वहां अवस्थित हो गए।

देवताओं ने उस स्थान पर सोमेश्वर कुण्ड की स्थापना की। इस कुण्ड में स्नान कर सोमेश्वर ज्योर्तिलिग के दर्शन पूजा से सब पापों से निस्तार और मुक्ति की प्राप्ति हो जातीं है।

चन्द्रमा को सोम नाम से भी पहचाना जाता है। इसलिए यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के नाम से मशहूर है।

चंद्रमा को इस स्थान पर तेज प्राप्त हुआ। अत: इस स्थान को प्रभासपट्टण इस नाम से भी जाना जाता है।

भारत का यह आद्य ज्योतिर्लिंग करोड़ों भक्तों का श्रद्धास्थान है। लाखों यात्रियों की भीड यहाँ सदा लगी रहती है। अनेक सिद्ध-सत्पुरुषों का सत्संग लोगों को प्राप्त होता है। समुद्रतटपर कठियावाड़ के प्रदेश में. प्रभासपट्टण के आसपास मंदिर. स्मारक और पौराणिक स्थान है।

Temple

Shiv

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
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Aarti

ॐ जय लक्ष्मी माता – लक्ष्मी जी की आरती

1.

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम को निश दिन सेवत,
मैय्याजी को निस दिन सेवत,
हर-विष्णु-धाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


2.

उमा, रमा, ब्रह्माणी,
तुम ही जग-माता,
मैया, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत,
नारद ऋषि गाता॥
॥ओम जय लक्ष्मी माता॥


3.

दुर्गा रूप निरंजनि,
सुख-सम्पति दाता,
मैया, सुख-सम्पति दाता।
जो कोई तुमको ध्याता,
ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
॥ओम जय लक्ष्मी माता॥


4.

तुम पाताल निवासिनी,
तुम ही शुभ दाता,
मैया, तुम ही शुभ दाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी,
भव निधि की त्राता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


5.

जिस घर तुम रहती,
सब सद्‍गुण आता,
मैया, सब सद्‍गुण आता।
सब संभव हो जाता,
मन नहीं घबराता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


6.

तुम बिन यज्ञ न होवे (होते) ,
वस्त्र न कोई पाता,
मैया, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव,
सब तुमसे आता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


7.

शुभ गुण मंदिर सुंदर,
क्षीरोदधि जाता,
मैया, क्षीरोदधि जाता।
रत्न-चतुर्दश तुम बिन,
कोई नहीं पाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


8.

महालक्ष्मी(जी) की आरती,
जो कोई नर गाता,
मैया, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता,
पाप उतर जाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥


1.

ॐ जय लक्ष्मी माता,
मैया जय लक्ष्मी माता।
तुम को निश दिन सेवत,
हर-विष्णु-धाता॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥

Aarti

Chalisa

Om Jai Laxmi Mata – Laxmi Aarti
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Temples

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकालमहासुरेशम्॥


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग – महाकालमहासुरेशम्

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, मध्यप्रदेश के, मालवा क्षेत्र में, क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैन नगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।

महाभारत, पुराणों में और महाकवि कालिदास की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

स्वयंभू और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। ऐसी मान्यता है की इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा – 1

अवलीवासी एक ब्राह्मण के शिवोपासक चार पुत्र थे।

ब्रह्मा से वर प्राप्त दुष्ट दैत्यराज दूषण ने, अवंती मे आकर, वहां के निवासी वेदज्ञ ब्राह्मण को बडा कष्ट दिया। परन्तु शिवजी के ध्यान में लीन ब्राह्मण तनिक भी खिन्न नहीं हुए।

दैत्यराज ने अपने चारो अनुचर दैत्यों को नगरी मे घेर कर वैदिक धर्मानुष्ठान ने होने देने का आदेश दिया।

दैत्यों के उत्पात से पीडित प्रजा ब्राह्मणो के पास आई।

बाह्मण प्रजाजनो को धीरज बंधा कर शिवजी की पूजा में तत्पर हुए।

इसी समय ज्योहिं दूषण दैत्य अपनी सेना सहित उन ब्राह्मणों पर झपटा, त्योहि पार्थिव मूर्ति के स्थान पर एक भयानक शब्द के साथ धरती फटी और वहां पर गड्डा हो गया। उसी गर्त में शिवजी एक विराट रूपधारी महाकाल के रूप में प्रकट हुए।

शिवजी ने उस दुष्ट को ब्राह्मणो के निकट न आने को कहा, परन्तु उस दुष्ट दैत्य ने शिवजी की आज्ञा न मानी।

फलत: शिवजी ने अपनी एक ही हुंकार से उस दैत्य को भस्म कर दिया।

शिवजी को इस रूप मे प्रकट हुआ देखकर ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रादि देवों ने आकर भगवान शंकर की स्तुति वन्दना की।


श्री महाकालेश्वर की कथा – 2

राजा चन्द्रसेन और गोपीपुत्र
महाकालेश्वर की महिमा अवर्णनीय हे। उज्जयिनी नरेश चन्द्रसेन शास्त्रज्ञ होने के साथ साथ पक्का शिवभक्त भी था। उसके मित्र महेश्वरजी के गण मणिभद्र ने उसे एक सुन्दर चिंतामणि प्रदान की।

चन्द्रसेन जब उस मणि को कण्ठ में धारण करता तो इतना अधिक तेजस्वी दीखता कि देवताओं को भी ईर्ष्या होती।

कुछ राजाओं के मांगने पर मणि देने से इकार करने पर उन्होंने चन्द्रसेन पर चढाई कर दी।

अपने को घिरा देख चंद्रसेन महाकाल की शरण में आ गया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसकी रक्षा का उपाय किया।

संयोगवश अपने बालक को गोद में लिए हुए एक ब्राह्मणी भ्रमण करती हुए महाकाल के समीप पहुंची।

अबोध बालक ने महाकालेश्वर मंदिर में राजा को शिव पूजन करते देखा तो उसके मन में भी भक्ति भाव उत्पन्न हुआ।

उसने एक रमणीय पत्थर को लाकर अपने सूने घर में स्थापित किया और उसे शिवरूप मान उसकी पूजा करने लगा।

भजन में लीन बालक को भोजन की सुधि ही न रही।

उसकी माता उसे बुलाने गई, परन्तु माता के बार बार बुलाने पर भी बालक ध्यान मगन मौन बैठा रहा।

इस पर उसकी माया विमोहित माता ने, शिवलिंग को दूर फ़ेंक कर उसकी पूजा नष्ट कर दी।

माता के इस कृत्य पर दुखी होकर वह शिवजी का स्मरण करने लगा।

शिवजी की कृपा होते देर न लगी, और पुत्र द्वारा पूजित पाषाण रत्नजड़ित ज्योतिर्लिंग के रूप में आविर्भूत हो गया।

शिवजी की स्तुति वन्दना के उपरान्त जब बालक घर को गया तो उसने देखा कि उसकी कुटिया का स्थान सुविशाल भवन ने ले लिया है।

इस प्रकार शिवजी की कृपा से वह बालक विपुल धन धान्य से समृद्ध होकर सुखी जीवन बिताने लगा।

इधर विरोधी राजाओं ने जब चन्द्रसेन के नगर पर अभियान किया तो वे आपस में ही एक दूसरे से कहने लगे कि राजा चद्रसेन तो शिवभक्त है, और उज्जैयिनी महाकाल की नगरी हैं, जिसे जीतना असम्भव है।

यह विचार कर राजाओं ने चंद्रसेन से मित्रता कर ली और सबने मिलकर महाकाल का पूजा कि।

इस समय वहां वानराधीश हनुमान जी प्रकट हुए और उन्होनें राजाओं को बताया कि शिवजी के बिना मनुष्यों को गति देने वाला अन्य कोई नहीं है।

शिवजी तो बिना मंत्रों से की गई पूजा से भी प्रसन्न हो जाते है। गोपीपुत्र का उदाहरण तुम्हारे सामने ही है। इसके पश्चात् हनुमान जी चंद्रसेन को स्नेह और कृपा पूर्ण दृष्टि से देखकर वही अन्तर्धान हो गए।

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Shiv

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
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Gita

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 01

भगवद गीता अध्याय की लिस्ट

अथ प्रथमोऽध्यायः – अर्जुनविषादयोग

दुर्योधन द्वारा द्रोणाचार्य को सेना की जानकारी

1

धृतराष्ट्र, संजय से, कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडवों के बारे में पूछते है

धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥

  • धृतराष्ट्र बोले – हे संजय!
  • धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित,
  • युद्ध की इच्छावाले,
  • मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥

2

दुर्योधन, द्रोणाचार्य के पास जाता है

संजय उवाच:
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥

  • संजय बोले –
  • उस समय राजा दुर्योधन ने,
  • व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और
  • द्रोणाचार्य के पास जाकर,
  • यह वचन कहा॥2॥

3

दुर्योधन, द्रोणाचर्य को, पांडवो की सेना के बारे में बताता है

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥

  • हे आचार्य!
  • आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य,
  • द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा,
  • व्यूहाकार खड़ी की हुई,
  • पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए॥3॥

4-6

पांडवों की सेना के महारथी – अर्जुन, भीम, सात्यकि, अभिमन्यु ……

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥

  • इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा
  • युद्ध में भीम और अर्जुन के समान,
  • शूरवीर सात्यकि और
  • विराट तथा महारथी राजा द्रुपद,
  • धृष्टकेतु और चेकितान तथा
  • बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और
  • मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा
  • बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं
  • द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं॥4-6॥

7

दुर्योधन, कौरवों की सेना के बारें में बताता है

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥

  • हे ब्राह्मणश्रेष्ठ!
  • अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं,
  • उनको आप समझ लीजिए।
  • आपकी जानकारी के लिए,
  • मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं,
  • उनको बतलाता हूँ॥7॥

8

कौरवों की सेना के महारथी – द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण, अश्वत्थामा ……

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥

  • आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा
  • कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही
  • अश्वत्थामा, विकर्ण और
  • सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा॥8॥

9

दुर्योधन द्वारा, कौरवों की सेना की तारीफ़

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥

  • और भी मेरे लिए,
  • जीवन की आशा त्याग देने वाले,
  • बहुत-से शूरवीर
  • अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और
  • सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं॥9॥

10

भीष्म द्वारा रक्षित कौरव Vs भीम द्वारा रक्षित पांडव

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌॥

  • भीष्म पितामह द्वारा रक्षित,
  • हमारी वह सेना,
  • सब प्रकार से अजेय है और
  • भीम द्वारा रक्षित,
  • इन लोगों की यह सेना,
  • जीतने में सुगम है॥10॥

11

दुर्योधन, सेना को, भीष्म पितामह की, रक्षा का आदेश देता है

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥

  • इसलिए, सब मोर्चों पर,
  • अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए,
  • आप लोग सभी,
  • निःसंदेह भीष्म पितामह की ही,
  • सब ओर से रक्षा करें॥11॥

योद्धाओं का शंख बजाना

12

पितामह भीष्म ने शंख बजाया

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌॥

  • कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने,
  • उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए,
  • उच्च स्वर से,
  • सिंह की दहाड़ के समान गरजकर,
  • शंख बजाया॥12॥

13

शंख, नगाड़े, ढोल आदि बाजे एक साथ बज उठे

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥

  • इसके पश्चात,
  • शंख और नगाड़े तथा
  • ढोल, मृदंग और
  • नरसिंघे आदि बाजे,
  • एक साथ ही बज उठे।
  • उनका वह शब्द,
  • बड़ा भयंकर हुआ॥13॥

14

भगवान् कृष्ण ने शंख बजाया

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥

  • इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त,
  • उत्तम रथ में बैठे हुए,
  • श्रीकृष्ण महाराज और
  • अर्जुन ने भी,
  • अलौकिक शंख बजाए॥14॥

15

अर्जुन और भीम ने शंख बजाए

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥

  • श्रीकृष्ण महाराज ने
    • पाञ्चजन्य नामक,
  • अर्जुन ने
    • देवदत्त नामक और
  • भयानक कर्मवाले भीमसेन ने
    • पौण्ड्र नामक
  • महाशंख बजाया॥15॥

16

युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव ने शंख बजाये

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥

  • कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने,
    • अनन्तविजय नामक और
  • नकुल तथा सहदेव ने,
    • सुघोष और मणिपुष्पक,
  • नामक शंख बजाए॥16॥

17-18

सात्यकि, द्रुपद, विराट आदि महारथियों ने भी शंख बजाये

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥

  • श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और
  • महारथी शिखण्डी एवं
  • धृष्टद्युम्न तथा
  • राजा विराट और
  • अजेय सात्यकि,
  • राजा द्रुपद एवं
  • द्रौपदी के पाँचों पुत्र और
  • बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु –
  • इन सभी ने, हे राजन्‌!
  • सब ओर से,
  • अलग-अलग शंख बजाए॥17-18॥

19

शंखों के आवाज, सभी दिशाओं में गूंजने लगे

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥

  • और उस भयानक शब्द ने,
  • आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए,
  • धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के,
  • हृदय विदीर्ण कर दिए॥19॥

20-21

अर्जुन ने, श्रीकृष्ण से, रथ को, सेना के बीच में ले जाने के लिए कहा

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाचः
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥

  • हे राजन्‌!
  • इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने,
  • मोर्चा बाँधकर डटे हुए,
  • धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर,
  • शस्त्र चलने की तैयारी के समय,
  • धनुष उठाकर,
  • हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से,
  • यह वचन कहा –
  • हे अच्युत!
  • मेरे रथ को,
  • दोनों सेनाओं के,
  • बीच में खड़ा कीजिए॥20-21॥

22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥

  • और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए,
  • युद्ध के अभिलाषी,
  • इन विपक्षी योद्धाओं को,
  • भली प्रकार देख न लूँ कि
  • इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे,
  • किन-किन के साथ,
  • युद्ध करना योग्य है,
  • तब तक उसे खड़ा रखिए॥22॥

23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥

  • दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले,
  • जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं,
  • इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा॥23॥

24-25

संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥

  • संजय बोले –
  • हे धृतराष्ट्र!
  • अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने,
  • दोनों सेनाओं के बीच में,
  • भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा
  • सम्पूर्ण राजाओं के सामने
  • उत्तम रथ को खड़ा कर,
  • इस प्रकार कहा कि –
  • हे पार्थ!
  • युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख॥24-25॥

26 और 27वें का पूर्वार्ध

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।

  • इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने,
  • उन दोनों ही सेनाओं में स्थित,
  • ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को,
  • गुरुओं को, मामाओं को,
  • भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा
  • मित्रों को, ससुरों को और
  • सुहृदों को भी देखा॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥

27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌॥
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌ ।

  • उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं को देखकर,
  • वे कुंतीपुत्र अर्जुन,
  • अत्यन्त करुणा से युक्त होकर,
  • शोक करते हुए यह वचन बोले। ॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥

28वें का उत्तरार्ध और 29

अर्जुन उवाच:
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥

  • अर्जुन बोले –
  • हे कृष्ण!
  • युद्ध क्षेत्र में डटे हुए,
  • युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर,
  • मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और
  • मुख सूखा जा रहा है तथा
  • मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥

30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥

  • हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और
  • त्वचा भी बहुत जल रही है तथा
  • मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है,
  • इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ॥30॥

31

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥

  • हे केशव!
  • मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा
  • युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर,
  • कल्याण भी नहीं देखता॥31॥

32

न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥

  • हे कृष्ण!
  • मैं न तो विजय चाहता हूँ और
  • न राज्य तथा सुखों को ही।
  • हे गोविंद!
  • हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा
  • ऐसे भोगों से और
  • जीवन से भी क्या लाभ है?॥32॥

33

येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥

  • हमें जिनके लिए,
  • राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं,
  • वे ही ये सब,
  • धन और जीवन की आशा को त्यागकर,
  • युद्ध में खड़े हैं॥33॥

34

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥

  • गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और
  • उसी प्रकार दादे, मामे,
  • ससुर, पौत्र, साले तथा
  • और भी संबंधी लोग हैं ॥34॥

35

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

  • हे मधुसूदन!
  • मुझे मारने पर भी अथवा
  • तीनों लोकों के राज्य के लिए भी,
  • मैं इन सबको मारना नहीं चाहता,
  • फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?॥35॥

36

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥

  • हे जनार्दन!
  • धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर,
  • हमें क्या प्रसन्नता होगी?
  • इन आततायियों को मारकर तो,
  • हमें पाप ही लगेगा॥36॥

37

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥

  • अतएव हे माधव!
  • अपने ही बान्धव,
  • धृतराष्ट्र के पुत्रों को,
  • मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि
  • अपने ही कुटुम्ब को मारकर,
  • हम कैसे सुखी होंगे?॥37॥

38-39

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥

  • यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग,
  • कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और
  • मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते,
  • तो भी हे जनार्दन!
  • कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को,
  • इस पाप से हटने के लिए,
  • क्यों नहीं विचार करना चाहिए?॥38-39॥

40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥

  • कुल के नाश से,
  • सनातन कुल-धर्म,
  • नष्ट हो जाते हैं तथा
  • धर्म का नाश हो जाने पर,
  • सम्पूर्ण कुल में,
  • पाप भी बहुत फैल जाता है॥40॥

41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥

  • हे कृष्ण!
  • पाप के अधिक बढ़ जाने से,
  • कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और
  • हे वार्ष्णेय!
  • स्त्रियों के दूषित हो जाने पर,
  • वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥41॥

42

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥

  • वर्णसंकर कुलघातियों को और
  • कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है।
  • लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात
  • श्राद्ध और तर्पण से वंचित,
  • इनके पितर लोग भी,
  • अधोगति को प्राप्त होते हैं॥42॥

43

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥

  • इन वर्णसंकरकारक दोषों से,
  • कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और
  • जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं॥43॥

44

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥

  • हे जनार्दन!
  • जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है,
  • ऐसे मनुष्यों का,
  • अनिश्चितकाल तक,
  • नरक में वास होता है,
  • ऐसा हम सुनते आए हैं॥44॥

45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥

  • हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी,
  • महान पाप करने को तैयार हो गए हैं,
  • जो राज्य और सुख के लोभ से,
  • स्वजनों को मारने के लिए,
  • उद्यत हो गए हैं॥45॥

46

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥

  • यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को,
  • शस्त्र हाथ में लिए हुए, धृतराष्ट्र के पुत्र,
  • रण में मार डालें,
  • तो वह मारना भी मेरे लिए,
  • अधिक कल्याणकारक होगा॥46॥

47

संजय उवाच:
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥

  • संजय बोले-
  • रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन,
  • इस प्रकार कहकर,
  • बाणसहित धनुष को त्यागकर,
  • रथ के पिछले भाग में बैठ गए॥47॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो
नाम प्रथमोऽध्यायः।॥1॥


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भगवद गीता अध्याय – 2

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Bhagavad Gita Adhyay – 2

भगवद गीता अध्याय की लिस्ट

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भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 01
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आरती कीजै हनुमान लला की – हनुमान आरती

1.

आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥


2.

जाके बल से गिरिवर काँपै।
रोग-दोष निकट न झाँपै॥


3.

अंजनि पुत्र महा बलदाई।
संतन के प्रभु सदा सहाई॥


4.

दे बीरा रघुनाथ पठाये।
लंका जारि सीय सुधि लाये॥


5.

लंका सो कोट समुद्र सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥


6.

लंका जारि असुर सँहारे।
सियारामजी के काज सँवारे॥


7.

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।
आनि सजीवन प्रान उबारे॥


8.

पैठि पताल तोरि जम-कारे।
अहिरावन की भुजा उखारे॥


9.

बायें भुजा असुर दल मारे।
दहिने भुजा संतन जन तारे॥


10.

सुर नर मुनि आरती उतारे।
जै जै जै हनुमान उचारे॥


11.

कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरति करत अंजना माई॥


12.

जो हनुमान जी की आरती गावै।
बसि बैकुण्ठ परमपद पावै॥

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Aarti Kije Hanuman Lala Ki - Hanuman ji ki Aarti
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जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय

1.

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


2.

तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


3.

आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


4.

अविकारी, अघहारी, सकल कलाधारी।
कर्ता विधि भर्ता हरि हर संहारकारी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


5.

तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


6.

राम, कृष्ण, तू सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वाँछा कल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


7.

दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


8.

तू परधाम निवासिनि, महा-विलासिनि तू।
तू ही शमशान विहारिणि, ताण्डव लासिनि तू॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


9.

सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी धारा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


10.

तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


11.

मूलाधार निवासिनि, इहपर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वर दे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


12.

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले वेदत्रयी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


13.

हम अति दीन दुखी माँ, विपट जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


14.

निज स्वभाववश जननी, दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी, चरण शरण दीजै॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


15.

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

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Jag Janani Jai Jai Maa - Maa Durga Aarti
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भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 02

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भगवद गीता अध्याय की लिस्ट

अथ द्वितीयोऽध्यायः – सांख्ययोग

1

संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

  • संजय बोले –
  • उस प्रकार करुणा से व्याप्त और
  • आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले,
  • शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति,
  • भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा॥1॥

2

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

  • श्रीभगवान बोले – हे अर्जुन!
  • तुझे इस असमय में,
  • यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ?
  • क्योंकि,
  • न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है,
  • न स्वर्ग को देने वाला है और
  • न कीर्ति को करने वाला ही है॥2॥

3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

  • इसलिए, हे अर्जुन!
  • नपुंसकता को मत प्राप्त हो,
  • तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती।
  • हे परंतप!
  • हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर,
  • युद्ध के लिए खड़ा हो जा॥3॥

4

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

  • अर्जुन बोले – हे मधुसूदन!
  • मैं रणभूमि में,
  • किस प्रकार बाणों से,
  • भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा?
  • क्योंकि हे अरिसूदन!
  • वे दोनों ही पूजनीय हैं॥4॥

5

गुरूनहत्वा हि महानुभावा- ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

  • इसलिए,
  • इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर,
  • मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना,
  • कल्याणकारक समझता हूँ,
  • क्योंकि,
  • गुरुजनों को मारकर भी,
  • इस लोक में रुधिर से सने हुए,
  • अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा॥5॥

6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो- यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

  • हम यह भी नहीं जानते कि,
  • हमारे लिए युद्ध करना और न करना-
  • इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है,
  • अथवा यह भी नहीं जानते कि,
  • उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे।
  • और जिनको मारकर,
  • हम जीना भी नहीं चाहते,
  • वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र,
  • हमारे मुकाबले में खड़े हैं॥6॥

7

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

  • इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा
  • धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ,
  • मैं आपसे पूछता हूँ कि,
  • जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो,
  • वह मेरे लिए कहिए,
  • क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ,
  • इसलिए,
  • आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए॥7॥

8

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या- द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं- राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

  • क्योंकि,
  • भूमि में निष्कण्टक,
  • धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और
  • देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी,
  • मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ,
  • जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले,
  • शोक को दूर कर सके॥8॥

9

संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

  • संजय बोले – हे राजन्‌!
  • निद्रा को जीतने वाले अर्जुन
  • अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति,
  • इस प्रकार कहकर,
  • फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से,
  • ‘युद्ध नहीं करूँगा’,
  • यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए॥9॥

10

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

  • हे भरतवंशी धृतराष्ट्र!
  • अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज,
  • दोनों सेनाओं के बीच में,
  • शोक करते हुए उस अर्जुन को,
  • हँसते हुए से यह वचन बोले॥10॥

श्री भगवानुवाच

11

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

  • श्री भगवान बोले, हे अर्जुन!
  • तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए,
  • शोक करता है और
  • पण्डितों के से वचनों को कहता है,
  • परन्तु,
  • जिनके प्राण चले गए हैं,
  • उनके लिए और
  • जिनके प्राण नहीं गए हैं,
  • उनके लिए भी,
  • पण्डितजन शोक नहीं करते॥11॥

12

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

  • न तो ऐसा ही है कि,
  • मैं किसी काल में नहीं था,
  • तू नहीं था अथवा
  • ये राजा लोग नहीं थे और
  • न ऐसा ही है कि,
  • इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे॥12॥

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

  • जैसे,
  • जीवात्मा की,
  • इस देह में,
  • बालकपन, जवानी और
  • वृद्धावस्था होती है,
  • वैसे ही,
  • अन्य शरीर की,
  • प्राप्ति होती है।
  • उस विषय में,
  • धीर पुरुष,
  • मोहित नहीं होता।13॥

14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

  • हे कुंतीपुत्र!
  • सर्दी-गर्मी और
  • सुख-दुःख को देने वाले,
  • इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो,
  • उत्पत्ति-विनाशशील और
  • अनित्य हैं।
  • इसलिए हे भारत!
  • उनको तू सहन कर॥14॥

15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

  • क्योंकि, हे पुरुषश्रेष्ठ!
  • दुःख-सुख को,
  • समान समझने वाले,
  • जिस धीर पुरुष को,
  • ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग,
  • व्याकुल नहीं करते,
  • वह मोक्ष के योग्य होता है॥15॥

16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥

  • असत्‌ वस्तु की तो,
  • सत्ता नहीं है और
  • सत्‌ का अभाव नहीं है।
  • इस प्रकार,
  • इन दोनों का ही तत्व,
  • तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है॥16॥

17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

  • नाशरहित तो तू उसको जान,
  • जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है।
  • इस अविनाशी का,
  • विनाश करने में,
  • कोई भी समर्थ नहीं है॥17॥

18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

  • इस नाशरहित, अप्रमेय,
  • नित्यस्वरूप जीवात्मा के,
  • ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं,
  • इसलिए,
  • हे भरतवंशी अर्जुन!
  • तू युद्ध कर॥18॥

19

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

  • जो इस आत्मा को,
  • मारने वाला समझता है तथा
  • जो इसको मरा मानता है,
  • वे दोनों ही नहीं जानते,
  • क्योंकि,
  • यह आत्मा वास्तव में,
  • न तो किसी को मारता है और
  • न किसी द्वारा मारा जाता है॥19॥

20

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

  • यह आत्मा,
  • किसी काल में भी,
  • न तो जन्मता है और
  • न मरता ही है तथा
  • न यह उत्पन्न होकर,
  • फिर होने वाला ही है,
  • क्योंकि,
  • यह अजन्मा,
  • नित्य, सनातन और
  • पुरातन है।
  • शरीर के मारे जाने पर भी,
  • यह आत्मा नहीं मारा जाता॥20॥

21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

  • हे पृथापुत्र अर्जुन!
  • जो पुरुष,
  • इस आत्मा को नाशरहित,
  • नित्य, अजन्मा और
  • अव्यय जानता है,
  • वह पुरुष,
  • कैसे किसको मरवाता है और
  • कैसे किसको मारता है?॥21॥

22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

  • जैसे मनुष्य,
  • पुराने वस्त्रों को त्यागकर,
  • दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है,
  • वैसे ही,
  • जीवात्मा,
  • पुराने शरीरों को त्यागकर,
  • दूसरे नए शरीरों को,
  • प्राप्त होता है॥22॥

23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

  • इस आत्मा को,
  • शस्त्र नहीं काट सकते,
  • इसको आग नहीं जला सकती,
  • इसको जल नहीं गला सकता और
  • वायु नहीं सुखा सकता॥23॥

24

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

  • क्योंकि,
  • यह आत्मा,
  • अच्छेद्य है,
  • यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और
  • निःसंदेह अशोष्य है तथा
  • यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी,
  • अचल, स्थिर रहने वाला और
  • सनातन है॥24॥

25

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

  • यह आत्मा,
  • अव्यक्त है,
  • यह आत्मा अचिन्त्य है और
  • यह आत्मा विकाररहित,
  • कहा जाता है।
  • इससे हे अर्जुन!
  • इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर,
  • तू शोक करने के योग्य नहीं है,
  • अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है॥25॥

26

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

  • किन्तु,
  • यदि तू इस आत्मा को,
  • सदा जन्मने वाला तथा
  • सदा मरने वाला मानता हो,
  • तो भी हे महाबाहो!
  • तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है॥26॥

27

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

  • क्योंकि,
  • इस मान्यता के अनुसार,
  • जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और
  • मरे हुए का जन्म निश्चित है।
  • इससे भी,
  • इस बिना उपाय वाले विषय में,
  • तू शोक करने योग्य नहीं है॥27॥

28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

  • हे अर्जुन!
  • सम्पूर्ण प्राणी,
  • जन्म से पहले अप्रकट थे और
  • मरने के बाद भी,
  • अप्रकट हो जाने वाले हैं,
  • केवल बीच में ही प्रकट हैं,
  • फिर ऐसी स्थिति में,
  • क्या शोक करना है?॥28॥

29

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

  • कोई एक महापुरुष ही,
  • इस आत्मा को,
  • आश्चर्य की भाँति देखता है और
  • वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही,
  • इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा
  • दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही,
  • इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और
  • कोई-कोई तो सुनकर भी,
  • इसको नहीं जानता॥29॥

30

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

  • हे अर्जुन!
  • यह आत्मा,
  • सबके शरीर में,
  • सदा ही अवध्य है।
    • (जिसका वध नहीं किया जा सकता)
  • इस कारण,
  • सम्पूर्ण प्राणियों के लिए,
  • तू शोक करने योग्य नहीं है॥30॥

31

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

  • तथा अपने धर्म को देखकर भी,
  • तू भय करने योग्य नहीं है,
  • अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए,
  • क्योंकि,
  • क्षत्रिय के लिए,
  • धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर,
  • दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है॥31॥

32

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

  • हे पार्थ!
  • अपने-आप प्राप्त हुए और
  • खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप,
  • इस प्रकार के युद्ध को,
  • भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं॥32॥

33

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

  • किन्तु,
  • यदि तू,
  • इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा,
  • तो,
  • स्वधर्म और कीर्ति को खोकर,
  • पाप को प्राप्त होगा ॥33॥

34

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
सम्भावितस्य चाकीर्ति- र्मरणादतिरिच्यते॥

  • तथा सब लोग,
  • तेरी बहुत काल तक रहने वाली,
  • अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और
  • माननीय पुरुष के लिए,
  • अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है॥34॥

35

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

  • और जिनकी दृष्टि में,
  • तू पहले बहुत सम्मानित होकर,
  • अब लघुता को प्राप्त होगा,
  • वे महारथी लोग,
  • तुझे भय के कारण,
  • युद्ध से हटा हुआ मानेंगे॥35॥

36

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

  • तेरे वैरी लोग,
  • तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए,
  • तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे,
  • उससे अधिक दुःख और क्या होगा?॥36॥

37

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

  • या तो तू युद्ध में मारा जाकर,
  • स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा
  • संग्राम में जीतकर,
  • पृथ्वी का राज्य भोगेगा।
  • इस कारण हे अर्जुन!
  • तू युद्ध के लिए,
  • निश्चय करके खड़ा हो जा॥37॥

38

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

  • जय-पराजय,
  • लाभ-हानि और
  • सुख-दुख को समान समझकर,
  • उसके बाद,
  • युद्ध के लिए तैयार हो जा,
  • इस प्रकार,
  • युद्ध करने से,
  • तू पाप को नहीं प्राप्त होगा॥38॥

39

एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

  • हे पार्थ!
  • यह बुद्धि तेरे लिए,
  • ज्ञानयोग के विषय में कही गई और
  • अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन –
  • जिस बुद्धि से युक्त हुआ,
  • तू कर्मों के बंधन को,
  • भली-भाँति त्याग देगा,
  • अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा॥39॥

40

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

  • इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है॥40॥

41

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥

  • हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं॥41॥

42-44

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥ कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

  • हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात्‌ दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती॥42-44॥

45

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥

  • हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम ‘क्षेम’ है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो॥45॥

46

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

  • सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है॥46॥

47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

  • तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं।
  • इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥47॥

48

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

  • हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम ‘समत्व’ है।) ही योग कहलाता है॥48॥

49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

  • इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है।
  • इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं॥49॥

50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

  • समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है।
  • इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है॥50॥

51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥

  • क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं॥51॥

52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

  • जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा॥52॥

53

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

  • भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा॥53॥

अर्जुन उवाच

54

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

  • अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?॥54॥

श्रीभगवानुवाच

55

प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

  • श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है॥55॥

56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

  • दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥56॥

57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

  • जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥57॥

58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

  • और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)॥58॥

59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

  • इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती।
  • इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है॥59॥

60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

  • हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं॥60॥

61

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

  • इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है॥61॥

62

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

  • विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥

63

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

  • क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है॥63॥

64

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

  • परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥

65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

  • अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥

66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

  • न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?॥66॥

67

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

  • क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है॥67॥

68

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

  • इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है॥68॥

69

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

  • सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥69॥

70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं- समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

  • जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं॥70॥

71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥

  • जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है॥71॥

72

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

  • हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है॥72॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥2॥


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भगवद गीता अध्याय – 3

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Bhagavad Gita Adhyay – 3

भगवद गीता अध्याय की लिस्ट

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Satsang

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 02
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आरती कुंज बिहारी की – श्री कृष्ण आरती

1.

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।


2.

गले में बैजंती माला,
बजावे मुरली मधुर बाला,
श्रवण में कुंडल झलकाला।

नन्द के नन्द, श्री आनंद कंद,
मोहन बृज चंद,
राधिका रमण बिहारी की,
श्री गिरीधर कृष्ण मुरारी की॥


आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की


3.

गगन सम अंग कांति काली
राधिका चमक रही आली,
लतन में ठाढ़े बनमाली।

भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥


आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की


4.

कनकमय मोर मुकुट बिलसे,
देवता दर्शन को तरसे,
गगन सों सुमन रसी बरसे।

बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥


आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की


5.


जहां ते प्रकट भई गंगा
कलुष कलि हारिणि श्री गंगा
(Or – सकल मल हारिणि श्री गंगा)
स्मरन ते होत मोह भंगा।

बसी शिव शीष, जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्री बनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥


आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की


6.


चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू,
चहुं दिशी गोपि ग्वाल धेनू।

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन भिखारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥


आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की


7.

आरती कुंज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की

Aarti

Chalisa

Aarti Kunj Bihari Ki - Krishna Aarti
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Katha

सत्यनारायण कथा – प्रथम अध्याय

1. सूतजी और ऋषियों का संवाद

ऋषियों ने, सूतजी से, मनुष्यों के उद्धार के लिए सरल मार्ग पूछा

  • व्यास जी ने कहा –
  • एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में,
  • शौनकादिक अट्ठासी हजार ऋषियो ने,
  • पुराणवेत्ता श्री सूतजी से पूछा –
  • हे सूतजी!,
  • इस कलियुग में,
  • वेद -विद्या-रहित मनुष्यों को,
  • प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा
  • उनका उद्धार कैसे होगा?
  • हे मुनिश्रेष्ठ!
  • कोई ऐसा व्रत अथवा तप कहिए,
  • जिसके करने से,
  • थोड़े ही समय में,
  • पुण्य प्राप्त हो तथा
  • मनवांछित फल भी मिले।
  • ऐसी कथा सुनने की,
  • हमारी प्रबल इच्छा है।

सूतजी, नारदजी और भगवान् विष्णु की कथा बताते है

  • सर्वशास्त्रज्ञाता श्री सूतजी ने कहा-
  • हे वैष्णवों में पूज्य!
  • आप सबने,
  • प्राणियों के हित की बात पूछी है।
  • अब मैं श्रेष्ठ व्रत को,
  • आप लोगों से कहूंगा,
  • जिसे नारद जी ने,
  • श्री लक्ष्मीनारायण भगवान से पूछा था और
  • श्री लक्ष्मीपति ने,
  • मुनिश्रेष्ठ नारद जी को बताया था।

2. नारदजी, मनुष्यों के दुःख दूर करने का उपाय ढूंढते है

नारदजी पृथ्वी पर आते है

  • एक समय योगिराज नारद,
  • दुसरों के हित की इच्छा से,
  • सभी लोकों में घूमते हुए,
  • मृत्युलोक में आ पहुंचे।

नारदजी, पृथ्वी पर, मनुष्यों को दुखी देखते है

  • यहां अनेक योनियों में जन्मे,
  • प्रायः सभी मनुष्यों को,
  • अपने कर्मों के अनुसार,
  • अनेक दुखों से पीड़ित देख कर,
  • उन्होंने विचार किया कि
  • किस यत्न के करने से,
  • निश्चय ही प्राणियों के दुखो का,
  • नाश हो सकेगा।

नारद मुनि, विष्णु भगवान् के पास जाते है

  • ऐसा मन में विचारकर,
  • श्री नारद विष्णुलोक गए।

नारदजी, भगवान् विष्णु की स्तुति करते है

  • वहां श्वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले,
  • देवों के ईश भगवान नारायण को,
  • जिनके हाथों में शंख, चक्र,
  • गदा और पद्म थे तथा
  • वरमाला पहने हुए थे,
  • देखकर स्तुति करने लगे।
  • नारदजी ने कहा – हे भगवन!
  • आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं,
  • मन तथा वाणी भी,
    • आपको नहीं पा सकती,
  • आपका आदि-मध्य-अंत भी नहीं है।
  • आप निर्गुण स्वरूप,
  • सृष्टि के कारण,
  • भक्तों के दुखों को नष्ट करने वाले हो।
  • आपको मेरा नमस्कार है।

3. भगवान विष्णु, सत्यनारायण व्रत के बारे में बताते है

भगवान्, नारदजी से, उनके आने का कारण पूछते है

  • नारदजी से इस प्रकार की स्तुति सुनकर,
  • विष्णु भगवान बोले-
  • हे मुनिश्रेष्ठ!
  • आपके मन में क्या है?
  • आपका किस काम के लिए,
  • यहां आगमन हुआ है?
  • निःसंकोच कहें।

नारदजी, भगवान् विष्णु से, मनुष्यों के दुःख कम करने का उपाय पूछते है

  • तब नारद मुनि ने कहा –
  • मृत्युलोक में,
  • सब मनुष्य,
  • जो अनेक योनियों में पैदा हुए हैं,
  • अपने-अपने कर्मों द्वारा,
  • अनेक प्रकार के दुखों से दुखी हो रहे हैं।
  • हे नाथ!
  • यदि आप मुझ पर दया रखते हैं,
  • तो बताइए कि,
  • उन मनुष्यों के सब दुख,
  • थोड़े से ही प्रयत्न से,
  • कैसे दूर हो सकते हैं।

सत्यनारायण भगवान की पूजा और व्रत का महत्व

  • श्री विष्णु भगवान ने कहा –
  • हे नारद!
  • मनुष्यों की भलाई के लिए,
  • तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न किया है।
  • जिस व्रत के करने से,
  • मनुष्य मोह से छूट जाता है,
  • वह व्रत मैं तुमसे कहता हूं सुनो।
  • बहुत पुण्य देने वाला,
  • स्वर्ग तथा मृत्युलोक दोनो में दुर्लभ,
  • एक उत्तम व्रत है,
  • जो आज मैं प्रेमवश होकर तुमसे कहता हूं।
  • श्री सत्यनारायण भगवान का यह व्रत,
  • विधि-विधानपूर्वक संपन्न करके,
  • मनुष्य इस धरतीपर सुख भोगकर,
  • मरने पर मोक्ष को प्राप्त होता है।

नारद मुनि, भगवान से, व्रत के बारे में, विस्तार से बताने के लिए कहते है

  • श्री विष्णु भगवान के वचन सुनकर,
  • नारद मुनि बोले –
  • हे भगवन!
  • उस व्रत का फल क्या है?
  • क्या विधान है?
  • इससे पूर्व किसने यह व्रत किया है और
  • किस दिन यह व्रत करना चाहिए?
  • कृपया मुझे विस्तार से बताएं।

सत्यनारायण व्रत कब और कैसे करें

  • श्रीविष्णु भगवान ने कहा –
  • हे नारद!
  • दुख-शोक आदि दूर करने वाला यह व्रत,
  • सब स्थानों पर विजयी करने वाला है।
  • भक्ति और श्रद्धा के साथ,
  • किसी भी दिन,
  • मनुष्य श्री सत्यनारायण भगवान की,
  • संध्या के समय,
  • ब्राह्मणों और बंधुओं के साथ,
  • धर्मपरायण होकर पूजा करे।
  • भक्तिभाव से नैवेद्य,
  • केले का फल, शहद,
  • घी, शक्कर अथवा गुड़,
  • दूध और गेहूं का आटा सवाया लेवे
    • (गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण भी ले सकते हैं)।
  • इन सबको भक्तिभाव से,
  • भगवान को अर्पण करे।
  • बंधु-बांधवो सहित,
  • ब्राह्मणों को भोजन कराए।
  • इसके पश्चाघत स्वयं भोजन करे।
  • रात्रि में,
  • नाम संकीर्तन आदि का आयोजन कर,
  • श्री सत्यनारायण भगवान का,
  • स्मरण करता हुआ,
  • समय व्यतीत करे।
  • इस तरह,
  • जो मनुष्य व्रत करेंगे,
  • उनका मनोरथ,
  • निश्चणय ही पूर्ण होगा।

4. सत्यनारायण व्रत की महिमा

  • हे भक्तराज!
  • तुमसे तो,
  • विकराल कलिकाल के कर्म,
  • छिपे नहीं हैं।
  • खान-पान और आचार-विचार को चाहते हुए भी,
  • पवित्रता न रख पाने के कारण,
  • क्योंकि जीव मेरा नामस्मरण करके ही,
  • अपना लोक-परलोक संवार सकेंगे,
  • इसलिए विशेषरूप से,
  • कलिकाल में, मृत्युलोक में,
  • यही एक लघु और आसान उपाय है,
  • जिससे,
  • अल्प समय और अल्प धन में,
  • प्रत्येक जीव को,
  • महान पुण्य प्राप्त हो सकता है।
  • ॥ इतिश्री श्रीसत्यनारायण व्रत कथा का प्रथम अध्याय संपूर्ण॥

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सत्यनारायण कथा अध्याय – 2

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Satyanarayan Katha – 2

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Satyanarayan Katha - Adhyay 1
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भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 03

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भगवद गीता अध्याय की लिस्ट

अथ तृतीयोऽध्यायः- कर्मयोग

1

अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

  • अर्जुन बोले – हे जनार्दन!
  • यदि आपको कर्म की अपेक्षा,
  • ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है,
  • तो फिर हे केशव!
  • मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?॥1॥

2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥

  • आप मिले हुए-से वचनों से,
  • मेरी बुद्धि को मानो,
  • मोहित कर रहे हैं।
  • इसलिए,
  • उस एक बात को निश्चित करके कहिए,
  • जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ॥2॥॥

3

श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌॥

  • श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप!
  • इस लोक में,
  • दो प्रकार की निष्ठा,
  • मेरे द्वारा पहले कही गई है।

(साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम ‘निष्ठा’ है।)

  • उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो
  • ज्ञान योग से और
  • योगियों की निष्ठा,
  • कर्मयोग से होती है॥3॥
  • ज्ञानयोग, सांख्ययोग अर्थात
  • माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं,
  • ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में,
  • कर्तापन के अभिमान से रहित होकर,
  • सर्वव्यापी सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहने का नाम,
  • ‘ज्ञान योग’ है,
  • इसी को ‘संन्यास’, ‘सांख्ययोग’ आदि नामों से कहा गया है।
  • कर्मयोग अर्थात
  • फल और आसक्ति को त्यागकर,
  • भगवदाज्ञानुसार केवल भगवदर्थ समत्व बुद्धि से कर्म करने का नाम,
  • ‘निष्काम कर्मयोग’ है,
  • इसी को ‘समत्वयोग’, ‘बुद्धियोग’, ‘कर्मयोग’, ‘तदर्थकर्म’, ‘मदर्थकर्म’, ‘मत्कर्म’ आदि नामों से कहा गया है।

4

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

  • मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना,
  • निष्कर्मता को,
  • यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और
  • न कर्मों के केवल त्यागमात्र से,
  • सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है॥4॥
  • निष्कर्मता अर्थात
  • जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात
  • फल उत्पन्न नहीं कर सकते,
  • उस अवस्था का नाम ‘निष्कर्मता’ है।

5

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

  • निःसंदेह कोई भी मनुष्य,
  • किसी भी काल में क्षणमात्र भी,
  • बिना कर्म किए नहीं रहता,
  • क्योंकि,
  • सारा मनुष्य समुदाय,
  • प्रकृति जनित गुणों द्वारा,
  • परवश हुआ कर्म करने के लिए,
  • बाध्य किया जाता है॥5॥

6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

  • जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य,
  • समस्त इन्द्रियों को,
  • हठपूर्वक ऊपर से रोककर,
  • मन से उन इन्द्रियों के विषयों का,
  • चिन्तन करता रहता है,
  • वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥6॥

7

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

  • किन्तु हे अर्जुन!
  • जो पुरुष,
  • मन से इन्द्रियों को वश में करके,
  • अनासक्त हुआ,
  • समस्त इन्द्रियों द्वारा,
  • कर्मयोग का आचरण करता है,
  • वही श्रेष्ठ है॥7॥॥

8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥

  • तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर,
  • क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा,
  • कर्म करना श्रेष्ठ है तथा
  • कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा॥8॥

9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

  • यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त,
  • दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही,
  • यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है।
  • इसलिए हे अर्जुन!
  • तू आसक्ति से रहित होकर,
  • उस यज्ञ के निमित्त ही,
  • भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर॥9॥

10

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌॥

  • प्रजापति ब्रह्मा ने,
  • कल्प के आदि में यज्ञ सहित,
  • प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि
  • तुम लोग इस यज्ञ द्वारा,
  • वृद्धि को प्राप्त होओ और
  • यह यज्ञ,
  • तुम लोगों को,
  • इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो॥10॥

11

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

  • तुम लोग इस यज्ञ द्वारा,
  • देवताओं को उन्नत करो और
  • वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें।
  • इस प्रकार,
  • निःस्वार्थ भाव से,
  • एक-दूसरे को उन्नत करते हुए,
  • तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे॥11॥

12

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥

  • यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता,
  • तुम लोगों को बिना माँगे ही,
  • इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे।
  • इस प्रकार,
  • उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को,
  • जो पुरुष उनको बिना दिए,
  • स्वयं भोगता है,
  • वह चोर ही है॥12॥

13

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌॥

  • यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं॥13॥

14-15

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

  • सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है।
  • कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान।
  • इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है॥14-15॥

16

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

  • हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है॥16॥

17

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

  • परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है॥17॥

संजय उवाच

18

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

  • उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता॥18॥

19

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥

  • इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है॥19॥

20

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

  • जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है॥20॥

21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

  • श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं।
  • वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)॥21॥

22

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

  • हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ॥22॥

23

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

  • क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥23॥

24

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥

  • इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ॥24॥

25

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌॥

  • हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे॥25॥

26

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌॥

  • परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए॥26॥

27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

  • वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है॥27॥

28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

  • परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम ‘गुण विभाग’ है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम ‘कर्म विभाग’ है।) के तत्व (उपर्युक्त ‘गुण विभाग’ और ‘कर्म विभाग’ से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
  • ॥28॥

29

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

  • प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे॥29॥

30

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

  • मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर॥30॥

31

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥

  • जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं॥31॥

32

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

  • परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ॥32॥

33

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥

  • सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं।
  • ज्ञानवान्‌ भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है।
  • फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा॥33॥

34

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

  • इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं।
  • मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं॥34॥

35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

  • अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है।
  • अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है॥35॥

अर्जुन उवाचः

36

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

  • अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है॥36॥॥

श्रीभगवानुवाच

37

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌॥

  • श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है।
  • यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है।
  • इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥37॥

38

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌॥

  • जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है॥38॥

39

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

  • और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है॥39॥

40

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌॥

  • इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं।
  • यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
  • ॥40॥

41

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌॥

  • इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल॥41॥

42

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

  • इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं।
  • इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है॥42॥

43

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌॥

  • इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल॥43॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः॥3॥


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भगवद गीता अध्याय – 4

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Bhagavad Gita Adhyay – 4

भगवद गीता अध्याय की लिस्ट

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Satsang

भगवद गीता अर्थसहित अध्याय – 03
Categories
Devi Mahatmya

दुर्गा सप्तशती अध्याय लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती के अध्याय की लिस्ट

  • दुर्गा सप्तशती
  • सात सौ श्वोकोंका संग्रह है, और
  • उन सात सौ श्लोकों को
  • तेरह अध्यायों में बांटा गया है।

दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों की लिंक निचे दी गयी है –


देवी माहात्म्य



देवी माँ की आरती


दुर्गा सप्तशती में कितने अध्याय और चरित है?

  • शक्तिकी उपासनाके सम्बन्धमें जितने ग्रन्थ प्रचलित है,
  • उनमे सप्तशतीका बहुत विशेष महत्त्व है।
  • आस्तिक हिन्दू बड़ी श्रद्धासे इसका पाठ किया करते है, और
  • उनमेंसे अधिकांशका यह विश्वास है कि,
  • सप्तशतीका पाठ प्रत्यक्ष फलदायक हुआ करता है।
  • कुछ लोगोंका कहना है –
  • कली चण्डिविनायकौ अथवा कली चण्डिमहेश्वरौ।
  • इस कथनसे भी विदित होता है कि,
  • कलियुगमें चण्डीजीका विशेष महत्व है।
  • और चण्डीजीके कृत्योंका उल्लेख,
  • सप्तशती में विशेष सुन्दरताके साथ मिलता है।
  • इस दृष्टिसे भी इस ग्रन्थकी महत्ता सिद्ध होती है।
  • यह तीन भागोंमें अथवा चरितोंमें विभक्त है।
  • प्रथम चरितमें
  • ब्रम्हाने योगनिद्राकी स्तुति करके विष्णुको जाग्रत कराया है और
  • इस प्रकार जागृत होनेपर उनके द्वारा
  • मधु-कैटभका नाश हुआ है।
  • द्वितीय चरितमें
  • महिषासुर वधके लिये सब देवताओंकी शक्ति एकत्र हुई है और
  • उस एकत्रित शक्तिके द्वारा महिषासुरका वध हुआ है।
  • तृतीय चरितमें
  • शुम्भ-निशुम्भ वधके लिये देवताओंने प्रार्थना की, तब पार्वतीजीके शरीरसे शक्तिका प्रादुर्भाव हुआ अरि
  • क्रमश: धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीजका वध होकर
  • शुम्भ-निशुम्भका संहार हुआ है।

Saptashati

Durga

दुर्गा सप्तशती अध्याय लिस्ट – Index
Categories
Devi Mahatmya

दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 – अर्थ सहित

दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index


दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 के मुख्य प्रसंग

  1. विनियोग और ध्यान
  2. राजा सुरथ का प्रसंग
  3. वैश्य समाधि (धनी व्यापारी) का प्रसंग
  4. राजा और वैश्य का,
    • समस्या के समाधान के लिए,
    • मेधा मुनि के पास जाना
  5. मेधा मुनि द्वारा राजा को,
    • माया, बंधन और
    • मोक्ष का कारण बताना
  6. भगवती महामाया की महिमा
  7. मधु और कैटभ से बचने के लिए,
    • ब्रम्हाजी का,
    • भगवान् विष्णु के पास जाना
  8. ब्रम्हाजी का माँ भगवती की स्तुति करना
  9. देवी भगवती की महिमा,
    • और उनके स्वरुप
  10. राक्षसों के संहार के लिए,
    • देवी का प्रादुर्भाव
    • अर्थात, प्रकट होना
  11. मधु और कैटभ का,
    • भगवान् विष्णु के साथ युद्ध
  12. मधु और कैटभ का संहार

1. दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 का, विनियोग और ध्यान

श्रीमहाकाली देवी की प्रसत्रताके लिये, पहले अध्याय का विनियोग

॥विनियोगः॥
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,
नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्,
ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – प्रथम चरित्रके
  • ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता,
  • गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति,
  • रक्तदन्तिका बीज, अग्रि तत्त्व और
  • ऋग्वेद स्वरूप है।
  • श्रीमहाकाली देवताकी प्रसत्रताके लिये,
  • प्रथम चरित्रके जपमें,
  • विनियोग किया जाता है ।

महाकाली देवी का, पहले अध्याय का, ध्यान मन्त्र

॥ध्यानम्॥
ॐ खड्‌गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्‍तुं मधुं कैटभम्॥१॥
ॐ नमश्चण्डिकायै

ध्यान

  • भगवान् विष्णुके सो जानेपर,
  • मधु और कैटभको मारनेके लिये,
  • कमलजन्मा ब्रह्माजीने,
  • जिनका स्तवन किया था,
  • उन महाकाली देवीका,
  • मैं ध्यान करता (करती) हूँ ।
  • वे अपने दस हाथोंमें,
  • खड़ग, चक्र, गदा, बाण,
  • धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि,
  • मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं।
  • उनके तीन नेत्र हैं।
  • वे समस्त अंगो मे,
  • दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं।
  • उनके शरीरकी कान्ति,
  • नीलमणिके समान है तथा
  • वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।
  • ॐ चण्डीदेवीको नमस्कार है।

2. मार्कण्डेयजी, राजा सुरथ और समाधि की कथा बताते है

मार्कण्डेयजी, पहले, राजा सुरथ की कथा सुनाते है

ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच॥१॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम॥२॥

  • मार्कण्डेय जी बोले –
  • सूर्य के पुत्र साविर्णि,
  • जो आठवें मनु कहे जाते हैं,
  • उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो।

इस कथा में, भगवती महामाया की कृपा का प्रसंग

महामायानुभावेन यथा मन्वन्‍तराधिपः।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः॥३॥

  • सूर्यकुमार महाभाग सवर्णि,
  • भगवती महामाया के अनुग्रह से,
  • जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए,
  • वही प्रसंग सुनाता हूँ।

राजा सुरथ धार्मिक राजा थे

स्वारोचिषेऽन्‍तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥४॥

  • पूर्वकाल की बात है,
  • सुरथ नाम के एक राजा थे,
  • जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे।
  • उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था ।

राजा सुरथ, धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥५॥

  • वे प्रजा का अपने पुत्रों की भाँति,
  • धर्मपूर्वक पालन करते थे।
  • फिर भी उस समय,
  • कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय,
  • उनके शत्रु हो गये।

राजा सुरथ की एक बार, युद्ध में हार हुई

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥६॥

  • राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी।
  • उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ।
  • यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे,
  • तो भी राजा सुरथ,
  • युद्ध में उनसे परास्त हो गये।

राजा सुरथ का राज्य, सीमित हो गया

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्।
आक्रान्‍तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः॥७॥

  • तब वे युद्ध भूमि से,
  • अपने नगर को लौट आये, और
  • केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे।
  • समूची पृथ्वी से,
  • अब उनका अधिकार जाता रहा।
  • किंतु वहाँ भी, उन प्रबल शत्रुओं ने,
  • महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।

मंत्रियों ने, सेना और खजाने को, हथिया लिया

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८॥

  • राजा का बल क्षीण हो चला था,
  • इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मंत्रियों ने,
  • वहाँ उनकी राजधानी में भी,
  • राजकीय सेना और खजाने को वहाँ से हथिया लिया।

राजा सुरथ, अकेले जंगल की ओर चले गए

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्॥९॥

  • सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था।
  • इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने,
  • घोड़े पर सवार हो,
  • वहाँ से अकेले ही,
  • एक घने जंगल में चले गये।

राजा सुरथ, मेधा मुनि के आश्रम पहुंचे

स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः।
प्रशान्‍तश्‍वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्॥१०॥

  • वहाँ उन्होंने,
  • विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा।
  • जहाँ कितने ही हिंसक जीव,
  • अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर,
  • परम शान्त भाव से रह रहे थे।

मेधा मुनि के आश्रम का शांत वातावरण

तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः।
इतश्‍चेतश्‍च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥११॥

  • मुनि के बहुत से शिष्य,
  • उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे।
  • वहां जाने पर मुनि ने,
  • उनका सत्कार किया।
  • उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर राजा सुरथ,
  • इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक वहां रहे।

राजा सुरथ को, राज्य के बारे में चिंता होने लगी

सोऽचिन्‍तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्॥१२॥

  • फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर,
  • उस आश्रम में इस प्रकार चिंता करने लगे –
  • पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने,
  • जिसका पालन किया था,
  • वहीं नगर आज मुझसे रहित है।
  • पता नहीं, मेरे दुराचारी मंत्रीगण ,
  • उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं।

राजा सुरथ को, हाथी की चिंता

मद्‌भृत्यैस्तैरसद्‌वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः॥१३॥

  • जो सदा मद की वर्षा करने वाला और
  • शूरवीर था,
  • वह मेरा प्रधान हाथी,
  • अब शत्रुओं के अधीन होकर,
  • न जाने किन भोगों को भोगता होगा?

राजा सुरथ को, लोगों की चिंता

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः॥१४॥

  • जो लोग,
  • मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से,
  • सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे,
  • वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं को,
  • अनुसरण करते होंगे।

राजा सुरथ को, धन की चिंता

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम्।
असम्यग्व्यशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्॥१५॥
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः॥१६॥

  • उन अपव्ययी लोगों के द्वारा,
  • खर्च होते रहने के कारण,
  • अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ,
  • मेरा वह खजाना भी खाली हो जायेगा।
  • ये तथा और भी कई बातें,
  • राजा सुरथ निरंतर सोचते रहते थे।

अब, वैश्य समाधि (धनी व्यापारी) का प्रसंग

राजा सुरथ की, वैश्य समाधि से भेंट

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्‍चागमनेऽत्र कः॥१७॥

  • एक दिन उन्होंने वहाँ
  • मेधा मुनि के आश्रम के निकट
  • एक वैश्य को देखा, और
  • उससे पूछा –
  • भाई, तुम कौन हो?
    • वैश्य अर्थात –
    • व्यापारी समुदाय, व्यापार करनेवाला

राजा सुरथ, वैश्य से, उसके दु:ख का कारण पूछते है

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥१८॥
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥१९॥

  • यहां तुम्हारे आने का क्या कारण है?
  • तुम क्यों शोकग्रस्त और
  • अनमने से दिखायी देते हो?
  • राजा सुरथ का,
  • यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर,
  • वैश्य ने विनीत भाव से,
  • उन्हें प्रणाम करके कहा –

समाधि, एक धनि वैश्य, अर्थात व्यापारी था

वैश्‍य उवाच॥२०॥
समाधिर्नाम वैश्‍योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले॥२१॥

  • वैश्य बोला – राजन्!
  • मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ।
  • मेरा नाम समाधि है।

वैश्य समाधि, अपने दुःख का कारण बताते है

लोभी पत्नी और पुत्रों ने, वैश्य को, घर से निकाल दिया

पुत्रदारैर्निरस्तश्‍च धनलोभादसाधुभिः।
विहीनश्‍च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥२२॥

  • मेरे दुष्ट स्त्री और पुत्रों ने,
  • धन के लोभ से,
  • मुझे घर से बाहर निकाल दिया है।
  • मैं इस समय,
  • धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हूँ।
  • मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा ही धन लेकर,
  • मुझे दूर कर दिया है,

दुःखी वैश्य, आश्रम में आ गया

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्॥२३॥

  • इसलिये दुखी होकर,
  • मैं वन में चला आया हँ।
  • यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि,
  • मेरे पुत्रों की, स्त्री की और
  • स्वजनों का कुशल है या नहीं।

वैश्य को, पत्नी और पुत्रों की चिंता

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्॥२४॥

  • इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं,
  • अथवा उन्हें कोई कष्ट है?

क्या पुत्र सदाचारी है या नहीं?

कथं ते किं नु सद्‌वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥२५॥

  • वे मेरे पुत्र कैसे हैं?
  • क्या वे सदाचारी हैं,
  • अथवा दुराचारी हो गये हैं?

वैश्य को, लोभी रिश्तेदारों की चिंता करते देख, राजा को अचम्भा हुआ

राजोवाच॥२६॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः॥२७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्॥२८॥

  • राजा ने पूछा –
  • जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण,
  • तुम्हें घर से निकाल दिया,
  • उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह क्यों है?

वैश्य भी, राजा की बात से, सहमत होता है

वैश्य उवाच॥२९॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्‌गतं वचः॥३०॥

  • वैश्य बोला –
  • आप मेरे विषय में जो बात कहते हैं,
  • वह सब ठीक है।
  • अर्थात,
  • जिन लोभी रिश्तेदारों ने,
  • वैश्य को,
  • धन के लोभ में,
  • घर से निकाल दिया,
  • उनके प्रति,
  • मन में स्नेह के विचार,
  • क्यों आ रहे है।

वैश्य के, धन के लोभी पुत्र, पत्नी और रिश्तेदार

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः॥३१॥
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते॥३२॥

  • किंतु क्या करूँ,
  • मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता।
  • जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर,
  • पिता के प्रति स्नेह,
  • पति के प्रति प्रेम तथा
  • आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे,
  • मुझे घर से निकाल दिया है,
  • उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है।

लोभी परिजनों के लिए, मन में, स्नेह के विचार आते देख, वैश्य को भी हैरानी

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।
तेषां कृते मे निःश्‍वासो दौर्मनस्यं च जायते॥३३॥

  • महामते,
  • गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी,
  • जो मेरा चित्त,
  • इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है,
  • यह क्या है –
  • इस बात को,
  • मैं जानकर भी नहीं जान पाता।
  • उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हँ और
  • मेरा हृदय अत्यन्त दु:खित हो रहा है।

लोभी स्वजनों के लिए स्नेह क्यों?

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्॥३४॥

  • उन लोगों में,
  • प्रेम का सर्वथा अभाव है,
  • तो भी,
  • उनके प्रति,
  • जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता,
  • इसके लिये क्या करुँ।

राजा और वैश्य द्वारा, मेधा मुनि से, मोह का कारण पूछना

राजा सुरथ और समाधि, मेधा मुनि के पास गए

मार्कण्डेय उवाच॥३५॥
तस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ॥३६॥

  • मार्कण्डेयजी कहते हैं –
  • तदन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और
  • वह समाधि नामक वैश्य,
  • दोनों साथ-साथ,
  • मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए, और

राजा और वैश्य मुनि को प्रणाम करते है

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्॥३७॥
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्‍यपार्थिवौ॥३८॥

  • उन्हें प्रणाम करके उनके सामने बैठ गए।
  • तत्पश्चात वैश्य और राजा ने,
  • कुछ वार्तालाप आरंभ किया।

राजा और वैश्य, अपनी चिंता, मेधा मुनि को बताते है

राजोवाच॥३९॥
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्॥४०॥

  • राजा ने कहा –
  • भगवन् मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ,
  • उसे बताइये।

राजा पूछते है – जो राज्य चला गया, उसके प्रति चिंता क्यों हो रही है?

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि॥४१॥

  • मेरा चित्त,
  • अपने अधीन न होने के कारण,
  • वह बात,
  • मेरे मन को बहुत दु:ख देती है।
  • मुनिश्रेष्ठ,
  • जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है,
  • उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में,
  • मेरी ममता बनी हुई है।

और, वैश्य को, लोभी रिश्तेदारों के लिए, स्नेह क्यों?

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः॥४२॥

  • यह जानते हुए भी कि
  • वह अब मेरा नहीं है,
  • अज्ञानी की भाँति,
  • मुझे उसके लिये दु:ख होता है,
  • यह क्या है?
  • इधर यह वैश्य भी,
  • घर से अपमानित होकर आया है।
  • इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने,
  • इसको छोड़ दिया है।

लोभी परिजनों के लिए, मन में चिंता क्यों?

स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥४३॥

  • स्वजनों ने भी,
  • इसका परित्याग कर दिया है,
  • तो भी इसके हृदय में,
  • उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है।
  • इस प्रकार,
  • यह तथा मैं,
  • दोनों ही बहुत दुखी हैं।

राजा और वैश्य, मुनि से, मोह का कारण पूछते है

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥४४॥

  • जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है,
  • उस विषय के लिये भी,
  • हमारे मन में,
  • ममता जनित आकर्षण,
  • पैदा हो रहा है।
  • महाभाग, हम दोनों समझदार है,
  • तो भी,
  • हममें जो मोह पैदा हुआ है,
  • यह क्या है?

लोभी स्वजनों के प्रति स्नेह, अर्थात विवेकशून्य मनुष्य

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥४५॥

  • विवेकशून्य पुरुष की भाँति,
  • मुझमें और इसमें भी
  • यह मूढ़ता,
  • प्रत्यक्ष दिखायी देती है।

3. भगवती महामाया की महिमा

मेधा मुनि, राजा को, मनुष्यों और प्राणियों के मोह के बारे में बताते है

ऋषिरुवाच॥४६॥
ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥४७॥

  • ऋषि बोले – महाभाग,
  • विषय मार्ग का ज्ञान,
  • सब जीवों को है।

प्राणियों के विषय अलग अलग

विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥४८॥

  • इसी प्रकार विषय भी,
  • सबके लिये अलग-अलग हैं।
  • कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और
  • दूसरे रात में ही नहीं देखते।

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥४९॥

  • तथा कुछ जीव ऐसे हैं,
  • जो दिन और रात्रि में भी,
  • बराबर ही देखते हैं।
  • यह ठीक है कि,
  • मनुष्य समझदार होते हैं,
  • किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते।

प्राणी भी, मनुष्य की तरह समझदार होते है

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥५०॥

  • पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी,
  • समझदार होते हैं।
  • मनुष्यों की समझ भी,
  • वैसी ही होती है,
  • जैसी,
  • उन मृग और पक्षियों की होती है

प्राणियों की भी समझ, मनुष्यों जैसी होती है

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥५१॥

  • तथा जैसी मनुष्यों की होती है,
  • वैसी ही,
  • उन मृग-पक्षी आदि की होती है।
  • यह तथा अन्य बातें भी,
  • प्राय: दोनों में समान ही हैं।

प्राणी और मनुष्य, दोनों में, बच्चों के लिए मोह होता है

कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥५२॥

  • समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो,
  • यह स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी,
  • मोहवश बच्चों की चोंच में,
  • कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं।
  • नरश्रेष्ठ, क्या तुम नहीं देखते कि,
  • ये मनुष्य समझदार होते हुए भी,
  • लोभवश,
  • अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये,
  • पुत्रों की अभिलाषा करते हैं?

जग में मोह माया का कारण – भगवती महामाया का प्रभाव

लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्‍यसि।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥५३॥
महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥५४॥

  • यद्यपि, उन सबमें,
  • समझ की कमी नहीं है,
  • तथापि वे संसार की स्थिति,
    • अर्थात जन्म-मरण की परम्परा,
  • बनाये रखने वाले,
  • भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा,
  • ममतामय भँवर से युक्त,
  • मोह के गहरे गर्त में,
  • गिराये जाते हैं।
  • इसलिये,
  • इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये।

विष्णु भगवान की भगवती महामाया

महामाया हरेश्‍चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥५५॥

  • जगदीश्वर भगवान विष्णु की,
  • योगनिद्रारूपा,
  • जो भगवती महामाया हैं,
  • उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है।

भगवती देवी से ही – मोह के बंधन और बंधनो से मुक्ति, दोनों बातें

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
तया विसृज्यते विश्‍वं जगदेतच्चराचरम्॥५६॥

  • वे भगवती महामाया देवी,
  • ज्ञानियों के भी चित्त को,
  • बलपूर्वक खींचकर,
  • मोह में डाल देती हैं।
  • वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की,
  • सृष्टि करती हैं, तथा
  • वे ही प्रसन्न होने पर,
  • मनुष्यों को मुक्ति के लिये,
  • वरदान देती हैं।

संसार बंधन और मोक्ष, दोनों अवस्थाएं, भगवती महामाया के कारण

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥५७॥
संसारबन्धहेतुश्‍च सैव सर्वेश्‍वरेश्‍वरी॥५८॥

  • वे ही पराविद्या,
  • संसार-बंधन और
  • मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी, तथा
  • संपूर्ण ईश्वरों की भी,
  • अधीश्वरी हैं।

राजा, मेधा मुनि को, देवी महामाया के बारे में विस्तार से बताने के लिए कहते है

राजोवाच॥५९॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥६०॥

  • राजा ने पूछा –
  • भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं,
  • वे देवी कौन हैं?

देवी महामाया का स्वरुप, प्रभाव और प्रादुर्भाव कैसे हुआ?

ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा॥६१॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर॥६२॥

  • ब्रह्मन्! उनका अविर्भाव कैसे हुआ?
  • तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं।
  • ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे,
  • उन देवी का जैसा प्रभाव हो,
  • जैसा स्वरूप हो और
  • जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो,
  • वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।

भगवती महामाया का स्वरुप – नित्यस्वरूपा है

ऋषिरुवाच॥६३॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥६४॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा॥६५॥

  • ऋषि बोले – राजन्!
  • वास्तव मे तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं।
  • सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा,
  • उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है,
  • तथापि उनका प्राकटय,
  • अनेक प्रकार से होता है।
  • वह मुझ से सुनो।
  • यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं,
  • तथापि जब देवताओं को,
  • कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं,
  • उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं।

4. मधु और कैटभ के संहार का प्रसंग

ब्रह्माजी, मधु और कैटभ से बचने के लिए, भगवान् विष्णु के पास जाते है

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥६६॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्‍ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ॥६७॥

  • कल्प (प्रलय) के अन्त में,
  • सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।
  • सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर,
  • योगनिद्रा का आश्रय ले शयन कर रहे थे।
  • उस समय उनके कानों की मैल से,
  • दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए,
  • जो मुध और कैटभ के नाम से विख्यात थे।

ब्रह्माजी, विष्णु भगवान् को, सोया हुआ देखते है

विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्‍तुं ब्रह्माणमुद्यतौ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥

  • वे दोनों,
  • ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गये।
  • प्रजापति ब्रह्माजी ने,
  • जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया, और
  • भगवान को सोया हुआ देखा,
  • तो सोचा की,
  • मुझे कौन बचाएगा।

भगवान् विष्णु को जगाने के लिए, ब्रम्हाजी, देवी महामाया की स्तुति करने लगते है

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥६९॥

  • एकाग्रचित्त होकर ब्रम्हाजी,
  • भगवान विष्णु को जगाने के लिए,
  • उनके नेत्रों में निवास करने वाली,
  • योगनिद्रा की स्तुति करने लगे,
  • जो विष्णु भगवान को सुला रही थी।

5. देवी भगवती की महिमा, उनका प्रभाव और उनके स्वरुप

ब्रह्माजी, भगवती की स्तुति करते है

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम्।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्॥७०॥

  • जो इस विश्व की अधीश्वरी,
  • जगत को धारण करने वाली,
  • संसार का पालन और संहार करने वाली, तथा
  • तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं,
  • उन्हीं भगवती निद्रादेवी की,
  • भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।

स्वाहा, स्वधा और स्वर – देवी के स्वरुप

ब्रह्मोवाच॥७२॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधां त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥७३॥

  • ब्रह्मा जी ने कहा –
  • देवि तुम्हीं स्वाहा,
  • तुम्हीं स्वधा और
  • तम्ही वषट्कार हो।
  • स्वर भी,
  • तुम्हारे ही स्वरूप हैं।

ॐ कार की, तीनो मात्राओं में, देवी का स्वरुप

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥७४॥

  • तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो।
  • नित्य अक्षर प्रणव में,
  • अकार, उकार, मकार –
  • इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो, तथा
  • इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त
  • जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है,
  • जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता,
  • वह भी तुम्हीं हो।

देवी भगवती – जगत जननी और सृष्टि की रचना

त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥७५॥

  • देवि!
  • तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा
  • परम जननी हो।
  • देवि!
  • तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्ड को,
  • धारण करती हो।
  • तुम से ही इस जगत की,
  • सृष्टि होती है।

देवी माँ – जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार

त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्‍ते च सर्वदा।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥७६॥

  • तुम्हीं से इसका पालन होता है और
  • सदा तुम्ही कल्प के अंत में,
  • सबको अपना ग्रास बना लेती हो।
  • जगन्मयी देवि!
  • इस जगत की उत्पप्ति के समय तुम,
    • सृष्टिरूपा हो,
  • पालन-काल में,
    • स्थितिरूपा हो तथा
  • कल्पान्त के समय,
    • संहाररूप
  • धारण करने वाली हो।

तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली – माँ भगवती

तथा संहृतिरूपान्‍ते जगतोऽस्य जगन्मये।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥७७॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी॥७८॥

  • तुम्हीं महाविद्या, महामाया,
  • महामेधा, महास्मृति,
  • महामोह रूपा, महादेवी और महासुरी हो।
  • तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली,
  • सबकी प्रकृति हो।

श्री, ईश्वरी, ह्रीं और बुद्धि स्वरुप

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्‍च दारुणा।
त्वं श्रीस्त्वमीश्‍वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥७९॥

  • भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और
  • मोहरात्रि भी तुम्हीं हो।
  • तुम्हीं श्री,
  • तुम्हीं ईश्वरी,
  • तुम्हीं ह्रीं और
  • तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो।

शांति, क्षमा, तुष्टि स्वरुप

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा॥८०॥

  • लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और
  • क्षमा भी तुम्हीं हो।
  • तुम खङ्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा
  • गदा, चक्र, शंख और
  • धनुष धारण करने वाली हो।

देवी के अस्त्र और सौम्य स्वरुप

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी॥८१॥

  • बाण, भुशुण्डी और परिघ –
  • ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं।
  • तुम सौम्य और सौम्यतर हो –
  • इतना ही नहीं,
    • सौम्य अर्थात विनम्रता, शीतलता,
    • सुशीलता, कोमलता
  • जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं,
  • उन सबकी अपेक्षा,
  • तुम अत्याधिक सुन्दरी हो।

सत-असत सभी चीजों की शक्ति

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्‍वरी।
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥८२॥

  • पर और अपर – सबसे परे रहने वाली
  • परमेश्वरी तुम्हीं हो।
  • सर्वस्वरूपे देवि!
  • कहीं भी सत्-असत् रूप,
  • जो कुछ वस्तुएँ हैं और
  • उन सबकी जो शक्ति है,
  • वह तुम्हीं हो।

देवी की माया की शक्ति – भगवान् भी निद्रा में

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्॥८३॥

  • ऐसी अवस्था में,
  • तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है।
  • जो इस जगत की सृष्टि, पालन और
  • संहार करते हैं,
  • उन भगवान को भी,
  • जब तुमने,
  • निद्रा के अधीन कर दिया है,
  • तो तुम्हारी स्तुति करने में,
  • यहाँ कौन समर्थ हो सकता है।

देवी की, सृष्टि की रचना की शक्ति

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्‍वरः।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥

  • मुझको, भगवान शंकर को तथा
  • भगवान विष्णु को भी,
  • तुमने ही शरीर धारण कराया है।

देवी का उदार प्रभाव

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता॥८५॥

  • अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है।
  • देवि!
  • तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो।

देवता, भगवान् विष्णु को जगाने के लिए, माँ भगवती से, विनती करते है

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
बोधश्‍च क्रियतामस्य हन्‍तुमेतौ महासुरौ॥८७॥

  • ये जो दोनों दुर्घर्ष असुर मधु और कैटभ हैं,
  • इनको मोह में डाल दो, और
  • जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो।
  • साथ ही इनके भीतर,
  • इन दोनों असुरों को
    • मधु और कैटभ को
  • मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।

मधु और कैटभ के संहार के लिए, देवी महामाया का प्रादुर्भाव

ऋषिरुवाच॥८८॥
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा॥८९॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः॥९०॥

  • ऋषि कहते हैं – राजन्!
  • जब ब्रह्मा जी ने वहाँ,
  • मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से,
  • भगवान विष्णु को जगाने के लिए
  • तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी, योगनिद्रा की,
  • इस प्रकार स्तुति की,
  • तब वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका,
  • बाहु, हृदय और वक्ष स्थल से निकलकर,
  • अव्यक्तजन्मा
  • ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खडी हो गयी।

भगवान् विष्णु, योगनिद्रा से जागते है

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥

  • योगनिद्रा से मुक्त होने पर,
  • जगत के स्वामी भगवान जनार्दन,
  • उस एकार्णव के जल में,
  • शेषनाग की शय्या से जाग उठे।

भगवान् विष्णु, असुरों को देखते है

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ।
मधुकैटभो दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥९२॥

  • फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा।
  • वे दुरात्मा मधु और कैटभ,
  • अत्यन्त बलवान तथा परक्रमी थे और

क्रोधरक्‍तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः॥९३॥

  • क्रोध से ऑंखें लाल किये,
  • ब्रह्माजी को खा जाने के लिये,
  • उद्योग कर रहे थे।

मधु और कैटभ का, भगवान् विष्णु के साथ युद्ध

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ॥९४॥
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥९५॥

  • तब भगवान श्री हरि ने उठकर,
  • उन दोनों के साथ,
  • पाँच हजार वर्षों तक,
  • केवल बाहु युद्ध किया।
  • वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण,
  • उन्मत्त हो रहे थे।
  • तब महामाया ने उन्हें मोह में डाल दिया।
  • और वे भगवान विष्णु से कहने लगे –
  • हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं।
  • तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।

भगवती महामाया का, मधु और कैटभ पर, माया का प्रभाव

श्रीभगवानुवाच॥९६॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥९७॥

  • श्री भगवान् बोले –
  • यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो,
  • तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ।

भगवान् विष्णु, दैत्यों को, उनके हाथ से मरने के लिए कहते है

किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम॥९८॥

  • बस, इतना सा ही मैंने वर माँगा है।
  • यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।

असुरों को, गलती का अहसास होता है

ऋषिरुवाच॥९९॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्॥१००॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इस दैत्योको को,
  • अब अपनी भूल मालूम पड़ी।
  • उन्होंने देखा की,
  • सब जगह पानी ही पानी है, और
  • कही भी,
  • सुखा स्थान नहीं दिखाई दे रहा है।
  • कल्प –
    • प्रलय के अन्त में,
    • सम्पूर्ण जगत् जल में डूबा हुआ था।

मधु और कैटभ का संहार, कौन सी जगह पर

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता॥१०१॥

  • तब कमलनयन भगवान से कहा –
  • जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो,
  • जहाँ सूखा स्थान हो,
  • वही हमारा वध करो।

भगवान्, मधु और कैटभ का वध करते है

ऋषिरुवाच॥१०२॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः॥१०३॥

  • ऋषि कहते हैं-
  • तब तथास्तु कहकर,
  • शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने,
  • उन दोनों के मस्तक, अपनी जाँघ पर रखकर,
  • चक्रसे काट डाले।

असुरों के संहार के लिए, देवी महामाया प्रकट हुई थी

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥१०४॥

  • इस प्रकार,
  • ये देवी महामाया,
  • ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं।
  • अब पुनः तुम से,
  • उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ,
  • सो सुनो।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥


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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 2

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Durga Saptashati – 2

दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

Saptashati

Durga

दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 – अर्थ सहित
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Devi Mahatmya

दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 में –

  • देवताओं के तेज से,
  • देवी दुर्गा का प्रादुर्भाव, और
  • महिषासुर की सेना का वध

दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 का विनियोग और ध्यान

॥विनियोगः॥

ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः,
शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्,
श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – मध्यम चरित्रके विष्णु ऋषि,
  • महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द,
  • शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज,
  • वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है।
  • श्रीमहालक्ष्मीकी प्रसत्रताके लिये,
  • मध्यम चरित्रके पाठमें इसका विनियोग है।

॥ध्यानम्॥

महिषासुर-मर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका का ध्यान मन्त्र इस प्रकार है:
ॐ अक्षस्रक्‌परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥

ध्यान

  • मैं कमलके आसनपर बैठी हुई,
  • प्रसत्र मुखवाली महिषासुर-मर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका,
  • भजन करता ( करती) हूँ,
  • जो अपने हाथोंमें अक्षमाला,
  • फरसा, गदा, बाण, वज्र,
  • पद्य, धनुष, कुण्डिका, दण्ड,
  • शक्ति, खड़ग, ढाल, शुद्ध,
  • घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और
  • चक्र धारण करती हैं।

ऊँ नमश्चंडिकायैः नमः


दुर्गा सप्तशती अध्याय 2

महिषासुर युद्ध में देवताओं से जीत जाता है

ॐ ह्रीं ऋषिरुवाच॥१॥
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे॥२॥

  • मार्केंडेय ऋषि कहते हैं –
  • पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में,
  • सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था।
  • उसमें असुरोंका स्वामी महिषासुर था, और
  • देवताओंके नायक इंद्र थे।

तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम्।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः॥३॥

  • उस युद्धमें देवताओं की सेना
  • महाबली असुरों से परास्त हो गयी।
  • सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर,
  • महिषासुर इंद्र बन बैठा।

देवता, भगवान विष्णु और शंकरजी के पास जाते है

ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ॥४॥

  • तब पराजित देवता
  • प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके
  • उस स्थान पर गये,
  • जहाँ भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान थे।

यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम्।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्॥५॥

  • देवताओं ने महिषासुर के पराक्रम तथा
  • अपनी पराजय का पूरा वृतांत
  • उन दोनों देवेश्वरों से कह सुनाया।

देवता भगवान् को महिषासुर के आतंक के बताते है

सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च।
अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति॥६॥

  • वे बोले – भगवन्!
  • महिषासुर
  • सूर्य, इद्र, अग्रि, वायु,
  • चद्रमा, यम, वरुण तथा
  • अन्य देवताओं के भी अधिकार छीनकर,
  • स्वयं ही सबका अधिष्ठाता बना बैठा है।

स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना॥७॥

  • उस दुरात्मा महिष ने
  • समस्त देवताओं को
  • स्वर्ग से निकाल दिया है।
  • अब वे मनुष्यों की भाँति
  • पृथ्वी पर विचरते हैं।

एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम्।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम्॥८॥

  • दैत्यों की यह सारी करतूत
  • हमने आपसे कह सुनाई।
  • अब हम आपकी ही शरण में हैं।
  • उसके वध का कोई उपाय सोचिए।

इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ॥९॥

  • देवताओं के वचन सुनकर,
  • भगवान विष्णु और शिव,
  • अत्यंत क्रोध से भर गये।

भगवान और देवताओं के तेज से देवी का प्रगट होना

ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः।
निश्‍चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च॥१०॥
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥११॥

  • कोप में भरे चक्रपाणि श्रीविष्णु के मुख से,
  • एक महान तेज प्रकट हुआ।
  • इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर तथा
  • इंद्र आदि अन्य देवताओं के शरीर से भी,
  • बड़ा भारी तेज निकला।
  • वह सब तेज़ मिलकर एक हो गया।

अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्॥१२॥

  • वह तेज पुंज
  • जलते पर्वत सा जान पड़ा।
  • उसकी ज्वालाएं,
  • सभी दिशाओं में व्याप्त हो रही थीं।
  • समस्त देवताओं के शरीर से प्रकट हुए,
  • उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी।

अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥१३॥

  • एकत्रित होने पर,
  • वह नारीरूप में परिणत हो गया और
  • अपने प्रकाश से
  • तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा।

यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम्।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा॥१४॥

  • भगवान शंकर का जो तेज़ था,
  • उससे देवी का मुख प्रकट हुआ।
  • यमराज के तेज से,
  • सिर के बाल निकल आए।
  • श्रीविष्णु के तेज से,
  • भुजाएं उत्पन्न हुईं।

सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्।
वारुणेन च जङ्‍घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः॥१५॥

  • चंद्रमा के तेज़ से,
  • वक्षस्थल का और
  • इंद्र के तेज़ से,
  • मध्यभाग (कटिप्रदेश) का प्रादुर्भाव हुआ।
  • वरुण के तेज से,
  • जंघा और पिंडली तथा
  • पृथ्वी के तेज से,
  • नितम्ब भाग प्रकट हुआ।

ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्‌गुल्योऽर्कतेजसा।
वसूनां च कराङ्‌गुल्यः कौबेरेण च नासिका॥१६॥

  • ब्रह्मा के तेज से,
  • दोनों चरण और
  • सूर्य के तेज से,
  • उनकी अंगुलियां हुईं।
  • वसुओं के तेज से,
  • हाथों की अँगुलियां और
  • कुबेर के तेज से,
  • नासिका प्रकट हुई।

तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा॥१७॥

  • उस देवी के दाँत,
  • प्रजापति के तेज से और
  • तीनों नेत्र,
  • अग्नि के तेज़ से प्रकट हुए।

भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा॥१८॥

  • उनकी भौंहें,
  • संध्या के और
  • कान,
  • वायु के तेज से उत्पन्न हुए थे।
  • उसी प्रकार,
  • अन्यान्य देवताओं के तेज से भी,
  • उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ।

ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः॥१९॥

  • समस्त देवताओं के तेजपुंज से,
  • प्रकट हुई देवी को देखकर,
  • महिषासुर के सताए देवता बहुत प्रसन्न हुए।

शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक्।
चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः॥२०॥

  • पिनाकधारी भगवान शंकर ने,
  • अपने शूल से एक शूल निकालकर उन्हें दिया।
  • फिर भगवान विष्णु ने भी,
  • अपने चक्रसे चक्र उत्पन्न करके,
  • भगवती को अर्पण किया।

शङ्‌खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः।
मारुतो दत्तवांश्‍चापं बाणपूर्णे तथेषुधी॥२१॥

  • वरुण ने शंख भेंट किया,
  • अग्नि ने शक्ति दी और
  • वायु ने धनुष तथा बाण से भरे हुए दो तरकस प्रदान किए।

वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात्॥२२॥

  • सहस्र नेत्रों वाले देवराज इंद्र ने,
  • अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और
  • ऐरावत हाथी से उतारकर एक घंटा भी प्रदान किया।

कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ।
प्रजापतिश्‍चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम्॥२३॥

  • यमराज ने कालदंड से दंड,
  • वरूण ने पाश,
  • प्रजापति ने स्फटिक की माला दी।
  • ब्रह्माजी ने कमंडलु भेंट किया।

समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः।
कालश्‍च दत्तवान् खड्‌गं तस्याश्‍चर्म च निर्मलम्॥२४॥

  • सूर्य ने देवी के समस्त रोम-कूपों में,
  • अपनी किरणों का तेज भर दिया।
  • काल ने चमकती ढाल और तलवार दी।

क्षीरोदश्‍चामलं हारमजरे च तथाम्बरे।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च॥२५॥

  • क्षीरसागर ने
  • धवल हार तथा
  • कभी जीर्ण न होने वाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये।

अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम्॥२६॥
अङ्‌गुलीयकरत्‍नानि समस्तास्वङ्‌गुलीषु च।
विश्‍वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम्॥२७॥

  • साथ ही उन्होंने,
  • दिव्य चूडामणि, दो कुंडल,
  • कड़े, उज्जवल अर्धचंद्र,
  • सब बाहुओं के लिए केयूर, दोनों चरणों के लिए निर्मल नूपुर,
  • गले की हंसली और सब अंगुलियों के लिए रत्नों की अंगूठियां भी दीं।
  • विश्वकर्मा ने उन्हें फरसा भेंट किया।

अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।
अम्लानपङ्‌कजां मालां शिरस्युरसि चापराम्॥२८॥

  • साथ ही अनेक प्रकार के,
  • अस्त्र और अभेद्य कवच दिए।
  • इनके अलावा,
  • मस्तक और वक्ष:स्थल पर धारण करने के लिए,
  • कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की मालाएं दीं।

अददज्जलधिस्तस्यै पङ्‌कजं चातिशोभनम्।
हिमवा‍न् वाहनं सिंहं रत्‍नानि विविधानि च॥२९॥

  • जलधि ने
  • उन्हें सुंदर कमल का फूल भेंट किया।
  • हिमालय ने
  • सवारी के लिए सिंह तथा
  • भांति-भांति के रत्न समर्पित किए।

ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः।
शेषश्‍च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम्॥३०॥
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्॥

  • धनाध्यक्ष कुबेर ने,
  • मधु से भरा पानपात्र दिया तथा
  • सम्पूर्ण नागों के राजा शेष ने,
  • जो इस पृथ्वी का धारण करते हैं,
  • उन्हें बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट किया।

अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा॥३१॥

  • इसी प्रकार,
  • अन्य देवताओं ने भी,
  • आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर,
  • देवी का सम्मान किया।

सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः॥३२॥

  • इसके पश्चात देवी ने,
  • अट्ठासपूर्वक उच्च स्वर से गर्जना की।
  • उस भयंकर नाद से,
  • संपूर्ण आकाश गूंज उठा।

अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत्।
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्‍च चकम्पिरे॥३३॥

  • देवी का वह अत्यंत उच्च स्वरसे किया हुआ सिंहनाद,
  • कहीं समा ना सका,
  • आकाश में बड़ी ज़ोर की प्रतिध्वनि हुई,
  • जिससे सम्पूर्ण विश्व में हलचल मच गयी और
  • समुद्र क़ांप उठे।

चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्‍च महीधराः।
जयेति देवाश्‍च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्॥३४॥

  • पृथ्वी डोलने लगी और
  • समस्त पर्वत हिलने लगे।
  • उस समय देवताओं ने,
  • अत्यंत प्रसन्नता के साथ,
  • सिंहवाहिनी भवानी से कहा-
  • देवि! तुम्हारी जय हो।

तुष्टुवुर्मुनयश्‍चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः।
दृष्ट्‌वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः॥३५॥

  • महर्षियों ने
  • भक्तिभाव से विनम्र होकर,
  • उन्हे नमस्कार किया।

सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः।
आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः॥३६॥

  • संपूर्ण त्रिलोकी को,
  • क्षोभग्रस्त देख,
  • दैत्य अपनी समस्त सेना को,
  • कवच आदि से सुसज्जित कर,
  • हाथों में हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो गए।
  • महिषासुर ने बड़े क्रोध में आकर कहा –
  • यह क्या हो रहा है?

अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः।
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा॥३७॥

  • फिर वह (महिषासुर),
  • असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की ओर लक्ष्य करके दौड़ा और
  • आगे पहुंचकर उसने देवी को देखा,
  • जो अपनी प्रभा से,
  • तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं।

पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम्।
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम्॥३८॥

  • उनके चरणों के भार से,
  • पृथ्वी दबी जा रही थी।
  • माथे के मुकुट से,
  • आकाश में रेखा सी खिंच रही थी।
  • अपने धनुष की टंकार से,
  • वह सातों पातालों को क्षुब्ध कर देती थीं।

दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्।
ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम्॥३९॥

  • देवी अपनी हजारों भुजाओं से,
  • सभी दिशाओं को आच्छादित करके खड़ी थीं।
  • उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया।

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम्।
महिषासुरसेनानीश्‍चिक्षुराख्यो महासुरः॥४०॥

  • नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से,
  • दिशाएं उद्भासित होने लगीं।
  • चिक्षुर नामक असुर,
  • महिषासुर का सेनानायक था।

युयुधे चामरश्‍चान्यैश्‍चतुरङ्‌गबलान्वितः।
रथानामयुतैः षड्‌भिरुदग्राख्यो महासुरः॥४१॥

  • वह देवी के साथ युद्ध करने लगा।
  • चतुरंगिनी सेना लेकर चामर भी लडऩे लगा।
  • साठ हजार रथियों के साथ आकर,
  • उदग्र नामक महादैत्य ने लोहा लिया।

अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः।
पञ्चाशद्‌भिश्‍च नियुतैरसिलोमा महासुरः॥४२॥

  • एक करोड़ रथियों को साथ लेकर,
  • महाहनु नामक दैत्य युद्ध करने लगा।
  • तलवार के समान तीखे रोएं वाला,
  • असिलोमा नामक असुर,
  • पाँच करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा।
  • साठ लाख रथियों से घिरा,
  • बाष्कल नामक दैत्य भी,
  • उस युद्धभूमि में लडऩे लगा।

अयुतानां शतैः षड्‌भिर्बाष्कलो युयुधे रणे।
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः॥४३॥

  • परिवारित नामक राक्षस,
  • हाथीसवार और घुड़सवारों के अनेक दलों तथा
  • एक करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा।
  • बिडाल नामक दैत्य,
  • पांच अरब रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा।
  • इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य,
  • रथ, हाथी और करोड़ों की सेना साथ लेकर,
  • देवी के साथ युद्ध करने लगे।

वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत।
बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः॥४४॥
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः।
अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः॥४५॥
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा॥४६॥
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः।
तोमरैर्भिन्दिपालैश्‍च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा॥४७॥
युयुधुः संयुगे देव्या खड्‌गैः परशुपट्टिशैः।
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे॥४८॥
देवीं खड्‍गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः।
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका॥४९॥

  • स्वयं महिषासुर रणभूमि में,
  • सहस्र रथ, हाथी और करोड़ों की सेना से घिरा हुआ खड़ा था।
  • वे दैत्य देवी के साथ
  • तोमर, भिदिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और
  • पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए,
  • युद्ध कर रहे थे।

लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी।
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः॥५०॥

  • देवी ने क्रोध में भरकर,
  • खेल-खेलमें ही अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करके,
  • दैत्यों के समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले।
  • उनके मुख पर परिश्रम या
  • थकावट का लेशमात्र भी चिह्न नहीं था।

मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्‍वरी।
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी॥५१॥

  • देवता और ऋषि,
  • उनकी स्तुति करते थे और
  • वे भगवती परमेश्वरी,
  • दैत्यों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करती रहीं।
  • देवी का वाहन सिंह भी क्रोध में भरकर,
  • गर्दन के बालों को हिलाता हुआ,
  • असुरों की सेना में इस प्रकार विचरने लगा,
  • मानो वनों में दावानल फैल रहा हो।

चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः।
निःश्‍वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका॥५२॥

  • रणभूमि में दैत्यों के साथ युद्ध करती हुई अम्बिका देवी ने,
  • जितने नि:श्वास छोड़े,
  • वे तत्काल सैकड़ों-हजारों गणों के रूप में प्रकट हो गए और
  • परशु, भिदिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रों द्वारा,
  • सुरों का सामना करने लगे।

त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः॥५३॥
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्‍त्युपबृंहिताः।
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्‌खांस्तथापरे॥५४॥

  • देवी की शक्ति से बढ़े हुए वे गण,
  • असुरों का नाश करते हुए,
  • नगाड़ा और शंख आदि बाजे बजाने लगे।

मृदङ्‌गांश्‍च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे।
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः॥५५॥

  • उस संग्राम-महोत्सव में,
  • कितने ही गण मृदंग बजा रहे थे।
  • तदंतर देवी ने,
  • त्रिशूल से, गदा से,
  • शक्ति की वर्षासे और खड्ग आदि से,
  • सैकड़ों महादैत्यों का संहार कर डाला।

खड्‌गादिभिश्‍च शतशो निजघान महासुरान्।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्॥५६॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्‌ध्वा चान्यानकर्षयत्।
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्‌गपातैस्तथापरे॥५७॥

  • कितनों को कांटे के भयंकर नाद से,
  • मूर्च्छित करके मारा।
  • बहुतेरो को पाश से बांधकर धरती पर घसीटा।
  • अनगिनत दैत्य उनकी तलवार की मार से टुकड़े हो गए।

विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते।
वेमुश्‍च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः॥५८॥

  • कितने ही गदा की चोट से घायल हो धरती पर सो गए।
  • कितने ही मूसल की मार से रक्त वमन करने लगे।

केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि।
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे॥५९॥
श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः।
केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे॥६०॥

  • बाज की तरह झपटने वाले दैत्य,
  • अपने प्राणों से हाथ धोने लगे।
  • कुछ की बांहें छिन्न-भिन्न हो गईं।
  • कितनों के गर्दन, मस्तक कटकर गिरे।

शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः।
विच्छिन्नजङ्‌घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः॥६१॥
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः।
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः॥६२॥
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः।
ननृतुश्‍चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः॥६३॥

  • मस्तक कट जाने पर भी फिर उठ जाते और
  • केवल धड़ के ही रूप में ही युद्ध करने लगते।
  • दूसरे कबध युद्ध के बाजों की लय पर नाचते।

कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्‌गशक्त्यृष्टिपाणयः।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः॥६४॥

  • कितने ही बिना सिर के धड़,
  • हाथों में खड्ग और शक्ति लिए,
  • दौड़ते थे तथा
  • दूसरे-दूसरे महादैत्य ‘ठहरो! ठहरो!! यह कहते हुए देवी को,
  • युद्ध के लिये ललकारते थे।

पातितै रथनागाश्‍वैरसुरैश्‍च वसुन्धरा।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः॥६५॥

  • जहां संग्राम हुआ, वहां की धरती,
  • देवी के गिराए हुए,
  • रथ, हाथी, धोड़े और असुरों की लाशों से ऐसी पट गयी थी कि,
  • वहां चलना-फिरना असम्भव हो गया था।

शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम्॥६६॥

  • दैत्यों की सेना में,
  • हाथी, घोड़े और असुरों के शरीरों से,
  • इतनी अधिक मात्रा में रक्तपात हुआ था कि,
  • थोड़ी ही देर में वहां खून की बड़ी-बड़ी नदियां बहने लगीं।

क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम्॥६७॥

  • जगदम्बा ने,
  • असुरों की विशाल सेना को,
  • क्षणभर में नष्ट कर दिया।
  • ठीक उसी तरह,
  • जैसे तृण और काठ के भारी ढेर को
  • आग कुछ ही क्षणों में भस्म कर देती है।

स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति॥६८॥

  • वह सिंह भी गर्दन के बालों को हिला-हिलाकर,
  • जोर-जोर से गर्जना करता हुआ,
  • दैत्यों के शरीरों से मानों उनके प्राण चुन लेता था।

देव्या गणैश्‍च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः।
यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि॥ॐ॥६९॥

  • वहां देवीके गणों ने भी,
  • उन महादैत्यों के साथ ऐसा युद्ध किया,
  • जिससे आकाश में खड़े देवतागण,
  • उन पर बहुत संतुष्ट हुए और
  • फूल बरसाने लगे।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णक मन्वतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवीमाहाम्य में महिषासुर की सेना का वध,
  • नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 3

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Durga Saptashati – 3

Saptashati

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 2 – अर्थ सहित
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Devi Mahatmya

दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 में –

  • सेनापतियोंसहित महिषासुर का वध

दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 का ध्यान

॥ध्यानम्॥

ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्‍नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥

ध्यान

  • जगदम्बाके श्रीअंगोकी कान्ति उदयकालके सहस्रों सूर्योंके समान है।
  • वे लाल रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए हैं।
  • उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही है।
  • दोनों स्तनोंपर रक्त चन्दनका लेप लगा है।
  • वे अपने कर-कमलोंमें,
  • जपमालिका, विद्या और अभय तथा
  • वर नामक मुद्राएँ धारण किये हुए हैं।
  • तीन नेत्रोंसे सुशोभित,
  • मुखार विन्दकी बड़ी शोभा हो रही है।
  • उनके मस्तकपर,
  • चन्द्रमाके साथ ही,
  • रत्नमय मुकुट बँधा है तथा
  • वे कमलके आसन पर विराजमान हैं।
  • ऐसी देवीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता (करती) हूँ।

सेनापति चिक्षुर का संहार

सेनापति चिक्षुर, अम्बिका देवी से युद्ध करने के लिए आया

ॐ ऋषिररुवाच॥१॥
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः।
सेनानीश्‍चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्‍धुमथाम्बिकाम्॥२॥

  • ऋषि कहते है –
  • दैत्यों की सेना को इस प्रकार तहस-नहस होते देख,
  • महादैत्य सेनापति चिक्षुर क्रोध में भरकर,
  • अम्बिका देवीसे युद्ध करने के लिये आगे बढ़ा।

स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः।
यथा मेरुगिरेः श्रृङ्‌गं तोयवर्षेण तोयदः॥३॥

  • वह असुर,
  • रणभूमि में देवी के ऊपर,
  • इस प्रकार बाणवर्षा करने लगा,
  • जैसे बादल,
  • मेरुगिरि के शिखर पर,
  • पानी की धार बरसा रहा हो।

अम्बिका देवी ने, सेनापति चिक्षुर के, बाणों को और शस्त्रों को काट डाला

तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्।
जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम्॥४॥
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः॥५॥

  • तब देवी ने,
  • अपने बाणों से उसके बाण समूह को,
  • अनायास ही काटकर,
  • उसके घोड़ों और सारथि को भी मार डाला।
  • साथ ही उसके धनुष तथा
  • अत्यंत ऊंची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया।
  • धनुष कट जाने पर,
  • उसके अंगों को,
  • अपने बाणों से बींध डाला।

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्‍वो हतसारथिः।
अभ्यधावत तां देवीं खड्‌गचर्मधरोऽसुरः॥६॥

  • धनुष, रथ, घोड़े और सारथि के नष्ट हो जाने पर,
  • वह असुर,
  • ढाल और तलवार लेकर,
  • देवी की ऒर दौड़ा।

सिंहमाहत्य खड्‌गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान्॥७॥

  • उसने तीखी धार वाली तलवार से,
  • सिंह के मस्तक पर चोट करके,
  • देवी की भी बायीं भुजा में,
  • बड़े वेग से प्रहार किया।

तस्याः खड्‌गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः॥८॥

  • राजन्! देवी की बांह पर पहुंचते ही,
  • वह तलवार टूट गयी।
  • फिर तो क्रोध से लाल आंखें करके,
  • उस राक्षस ने शूल हाथ में लिया।

माँ अम्बिका ने, सेनापति चिक्षुर का संहार किया

चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात्॥९॥

  • उसे, उस महादैत्य ने,
  • भगवती भद्रकाली के ऊपर चलाया।
  • वह शूल आकाश से गिरते हुए,
  • सूर्यमंडल की भाँति,
  • अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा।

दृष्ट्‍वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत।
तच्छूलं* शतधा तेन नीतं स च महासुरः॥१०॥

  • उस शूल को,
  • अपनी ऒर आते देख,
  • देवी ने भी शूल का प्रहार किया।
  • उससे राक्षस के शूल के,
  • सैकड़ों टुकड़े हो गए,
  • साथ ही महादैत्य चिक्षुर की भी धज्जियां उड़ गईं।
  • वह प्राणों से हाथ धो बैठा।

चामर का वध

चामर, माँ जगदम्बा से युद्ध करने के लिए आया

हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्‍चामरस्त्रिदशार्दनः॥११॥

  • महिषासुर के सेनापति,
  • उस महापराक्रमी चिक्षुर के मारे जाने पर,
  • देवताऒं को पीड़ा देनेवाला चामर,
  • हाथी पर चढ़कर आया।

सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।
हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम्॥१२॥

  • उसने भी देवी के ऊपर शक्ति का प्रहार किया,
  • किंतु जगदम्बा ने उसे,
  • अपने हुंकार से ही,
  • आहत एवं निष्प्रभ करके,
  • पृथ्वी पर गिरा दिया।

भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्‌वा क्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत्॥१३॥

  • शक्ति टूटकर गिरी हुई देख,
  • चामर को बड़ा क्रोध हुआ।
  • अब उसने शूल चलाया,
  • किंतु देवी ने उसे भी,
  • अपने बाणों द्वारा काट डाला।

देवी माँ के सिंह ने, चामर का वध किया

ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा॥१४॥

  • इतने में ही देवी का सिंह उछलकर,
  • हाथी के मस्तकपर चढ़ बैठा और
  • उस दैत्य के साथ,
  • खूब जोर लगाकर बाहुयुद्ध करने लगा।

युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः॥१५॥

  • वे दोनों लड़ते-लड़ते,
  • हाथी से पृथ्वीपर आ गए और
  • क्रोध में भरकर एक-दूसरे पर,
  • बड़े भयंकर प्रहार करते हुए लडऩे लगे।

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्‍चामरस्य पृथक्कृतम्॥१६॥

  • उसके बाद सिंह,
  • बड़े वेग से आकाश की ऒर उछला और
  • उधर से गिरते समय उसने पंजों की मार से,
  • चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।

माँ जगदम्बा ने, उदग्र, कराल आदि दूसरे राक्षसों का संहार किया

उदग्रश्‍च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।
दन्तमुष्टितलैश्‍चैव करालश्‍च निपातितः॥१७॥

  • इसी प्रकार उदग्र भी,
  • शिला और वृक्ष आदि की मार खाकर,
  • रणभूमि में देवी के हाथसे मारा गया तथा
  • कराल भी,
  • दाँतों, मुक्कों और थपड़ों की चोट से धराशायी हो गया।

देवी क्रुद्धा गदापातैश्‍चूर्णयामास चोद्धतम्।
बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम्॥१८॥

  • क्रोध में भरी हुई देवी ने,
  • गदा की चोट से,
  • उद्धत का कचूमर निकाल डाला।
  • भिदिपाल से वाष्कल को तथा
  • बाणों से ताम्र और अधक को,
  • मौत के घाट उतार दिया।

उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी॥१९॥

  • तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने,
  • त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा
  • महाहनु नामक दैत्य को मार डाला।

बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्*॥२०॥

  • तलवार की चोट से,
  • विडाल के मस्तक को धड़ से काट गिराया।
  • दुर्धर और दुर्मुख इन दोनों को भी,
  • अपने बाणों से यमलोक भेज दिया।

महिषासुर का वध

महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण किया

एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान्॥२१॥

  • इस प्रकार अपनी सेना का संहार होता देख,
  • महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके,
  • देवी के गणों पर प्रहार आरम्भ किया।

कांश्‍चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।
लाङ्‌गूलताडितांश्‍चान्याञ्छृङ्‌गाभ्यां च विदारितान्॥२२॥
वेगेन कांश्‍चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।
निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले॥२३॥

  • महिषासुर थूथुन से मारकर, खुरों का प्रहार करके,
  • पूंछ से चोट पहुंचाकर, सींगों से विदीर्ण करके,
  • कुछ को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और
  • नि:श्वास-वायु के झोंके से,
  • देवी के गणों को धराशायी कर दिया।

निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका॥२४॥

  • इस प्रकार गणों की सेना को गिराकर,
  • वह असुर,
  • महादेवी के सिंह को मारने के लिए झपटा।
  • इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ।

सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।
श्रृङ्‌गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च॥२५॥

  • उधर महापराक्रमी महिषासुर भी,
  • क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा।
  • अपने सींगों से ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को,
  • उठाकर फेंकने और गर्जने लगा।

वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।
लाङ्‌गूलेनाहतश्‍चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः॥२६॥

  • उसके वेग से चक्कर देने के कारण,
  • पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी।
  • उसकी पूंछ से टकराकर समुद्र,
  • सब ऒर से धरती को डुबोने लगा।

धुतश्रृङ्‌गविभिन्नाश्‍च खण्डं* खण्डं ययुर्घनाः।
श्‍वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः॥२७॥

  • हिलते हुए सींगों के आघात से विदीर्ण होकर,
  • बादलों के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
  • उसके श्वास की प्रचंड वायु के वेग से,
  • उड़े हुए सैकड़ों पर्वत,
  • आकाश से गिरने लगे।

महिषासुर ने सिंह का रूप धारण किया

इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।
दृष्ट्‌वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत्॥२८॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे॥२९॥

  • इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य को,
  • अपनी ऒर आते देख,
  • चंडिका ने,
  • उसका वध करने के लिए,
  • महान क्रोध किया।
  • उन्होंने पाश फेंककर,
  • उस महान असुर को बांध लिया।
  • उस महासंग्राम में बँध जाने पर,
  • उसने भैंसे का रूप त्यागकर,
  • तत्काल सिंह के रूप में प्रकट हो गया।

महिषासुर खड्गधारी पुरुष के रूप में

ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।
छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्‌गपाणिरदृश्यत॥३०॥

  • उस अवस्था में जगदम्बा,
  • ज्योंही उसका मस्तक काटने के लिए उद्दत हुईं,
  • त्योंही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखायी देने लगा।

महिषासुर हाथी के रूप में

तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।
तं खड्‌गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः॥३१॥

  • तब देवी ने तुरंत ही बाणों की वर्षा करके,
  • ढाल और तलवार के साथ,
  • उस पुरुष को भी बींध डाला।
  • इतने में ही वह महान गजराज के रूप में परिणत हो गया।

करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।
कर्षतस्तु करं देवी खड्‌गेन निरकृन्तत॥३२॥

  • वह अपनी सूंड़ से,
  • देवी के विशाल सिंह को खींचने और गर्जने लगा।
  • खींचते समय देवी ने तलवार से,
  • उसकी सूँड़ काट डाली।

महिषासुर फिर से भैंसे के रूप में

ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम्॥३३॥

  • तब उस महादैत्य ने,
  • पुन: भैंसे का शरीर धारण कर लिया और
  • पहले की ही भांति,
  • चराचर प्राणियों सहित,
  • तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा।

ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।
पपौ पुनः पुनश्‍चैव जहासारुणलोचना॥३४॥

  • तब क्रोध में भरी हुई जगत माता चंडिका,
  • बारंबार उत्तम मधु का पान करने और
  • लाल आंखें करके हंसने लगीं।

ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्‌धतः।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान्॥३५॥

  • उधर वह बल और पराक्रम के मद से,
  • उमड़ा हुआ राक्षस गर्जने लगा और
  • अपने सींगों से,
  • चंडी के ऊपर,
  • पर्वतों को फेंकने लगा।

सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।
उवाच तं मदोद्‌धूतमुखरागाकुलाक्षरम्॥३६॥

  • उस समय देवी अपने बाणों के समूहों से,
  • उसके फेंके हुए पर्वतों को,
  • चूर्ण करती हुई बोलीं।
  • बोलते समय उनका मुख,
  • मधु के मद से लाल हो रहा था और
  • वाणी लडख़ड़ा रही थी।

देव्युवाच॥३७॥
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥३८॥

  • देवीने कहा –
  • ऒ मूढ़! मैं जब तक मधु पीती हं,
  • तब तक तू क्षणभर के लिए खूब गर्जना कर ले।
  • मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर
  • अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे।

ऋषिरुवाच॥३९॥
एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्॥४०॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इतना कहकर देवी उछलीं और
  • उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गईं।
  • फिर अपने पैर से उसे दबाकर,
  • उन्होंने शूल से उसके कंठ में आघात किया।

ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्* देव्या वीर्येण संवृतः॥४१॥

  • उनके पैर से दबा होने पर भी,
  • महिषासुर अपने मुख से,
  • दूसरे रूपमें बाहर होने लगा।
  • अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकलने पाया था कि,
  • देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया।

अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः*॥४२॥

  • आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य,
  • देवी से युद्ध करने लगा।
  • तब देवी ने बहुत बड़ी तलवार से,
  • उसका मस्तक काट गिराया।

ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्।
प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः॥४३॥

  • फिर तो हाहाकार करती हुई,
  • दैत्यों की सारी सेना भाग गई तथा
  • देवता अत्यंत प्रसन्न हो गए।

तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्‍चाप्सरोगणाः॥ॐ॥४४॥

  • देवताऒंने दिव्य महर्षियों के साथ,
  • दुर्गा देवी की स्तुति की।
  • गंधर्वराज गाने लगे तथा
  • असराएं नृत्य करने लगीं।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवी माहाम्य में, – महिषासुरवध नामक,
  • तीसरा अध्याय संपन्न हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 4

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Durga Saptashati – 4

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 3 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 में –

  • इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 का ध्यान

॥ध्यानम्॥

ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शड्‌खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥

ध्यान

  • सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले पुरुष,
  • जिनकी सेवा करते हैं तथा
  • देवता जिन्हें सब ओरसे घेरे रहते हैं,
  • उन – जया – नामवाली दुर्गा देवीका ध्यान करे।
  • उनके श्रीअंगोकी आभा,
  • काले मेघके समान श्याम है।
  • वे अपने कटाक्षोंसे,
  • शत्रुसमूहको भय प्रदान करती हैं।
  • उनके मस्तकपर,
  • आबद्ध चन्द्रमाकी रेखा शोभा पाती है।
  • वे अपने हाथोंमें,
  • शुद्ध, चक्र, कृपाण और
  • त्रिशूल धारण करती हैं।
  • उनके तीन नेत्र हैं।
  • वे सिंहके कंधेपर चढ़ी हुई हैं और
  • अपने तेजसे,
  • तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं।

दुर्गा सप्तशती अध्याय 4

ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये
तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्‌गमचारुदेहाः॥२॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • अत्यन्त पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा
  • उसकी दैत्य-सेनाके,
  • देवीके हाथसे मारे जानेपर,
  • इन्द्र आदि देवता प्रणामके लिये,
  • गर्दन तथा कंधे झुकाकर,
  • उन भगवती दुर्गा की उत्तम वचनोंद्वारा,
  • स्तुति करने लगे।
  • उस समय उनके सुन्दर अंगोमे,
  • अत्यन्त हर्षके कारण रोमांच हो आया था।

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निश्‍शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥३॥

  • देवता बोले –
  • संपूर्ण देवताओंकी शक्तिका समुदाय ही,
  • जिनका स्वरूप है तथा
  • जिन देवीने अपनी शक्तिसे,
  • संपूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है,
  • समस्त देवताओं और महर्षियोंकी पूजनीया
  • उन जगदम्बाको,
  • हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं।
  • वे हम लोगोंका कल्याण करें।।३।।

यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्‍च न हि वक्तुमलं बलं च।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥४॥

  • जिनके अनुपम प्रभाव और
  • बलका वर्णन करनेमें,
  • भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा
  • महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं,
  • वे भगवती चण्डिका,
  • सम्पूर्ण जगत्‌का पालन एवं
  • अशुभ भयका नाश,
  • करनेका विचार करें।

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्‍वम्॥५॥

  • जो पुण्यात्माओंके घरोंमें,
    • स्वयं ही लक्ष्मीरूपसे,
  • पापियोंके यहाँ,
    • दरिद्रतारूपसे,
  • शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरूषोंके हृदयमें,
    • बुद्धिरूपसे,
  • सतपुरुषोंमें
    • श्रद्धारूपसे तथा
  • कुलीन मनुष्यमें,
    • लज्जारूपसे निवास करती हैं,
  • उन आप भगवती दुर्गाको,
  • हम नमस्कार करते हैं।
  • देवि! आप संपूर्ण विश्वका पालन कीजिये।

किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत्
किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि।
किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि
सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु॥६॥

  • देवि! आपके इस अचिन्त्य रूपका,
  • असुरोंका नाश करनेवाले भारी पराक्रमका तथा
  • समस्त देवताओं और दैत्योंके समक्ष,
  • युद्धमें प्रकट किये हुए,
  • आपके अद्भुत चरित्रोंका,
  • हम किस प्रकार वर्णन करें।

हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषैर्न
ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा।
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-
मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या॥७॥

  • आप संपूर्ण जगत्‌की उत्पत्तिमें कारण हैं।
  • आपमें सत्त्वगुण, रजोगुण और
  • तमोगुण – ये तीनों गुण मौजूद हैं;
  • तो भी दोषोंके साथ,
  • आपका संसर्ग नहीं जान पड़ता।
  • भगवान् विष्णु और महादेवजी आदि देवता भी,
  • आपका पार नहीं पाते।
  • आप ही सबका आश्रय हैं।
  • यह समस्त जगत् आपका अंशभूत है;
  • क्योंकि आप सबकी आदिभूत अव्याकृता परा प्रकृति हैं।

यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन
तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि।
स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-
रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च॥८॥

  • देवि! संपूर्ण यज्ञोंमें जिसके उच्चारणसे,
  • सब देवता तृप्ति लाभ करते हैं,
  • वह स्वाहा आप ही हैं।
  • इसके अतिरिक्त आप पितरोंकी भी,
  • तृप्तिका कारण हैं,
  • अतएव सब लोग आपको,
  • स्वधा भी कहते हैं।

या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्व*-
मभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः।
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-
र्विर्द्यासि सा भगवती परमा हि देवि॥९॥

  • देवि! जो मोक्षकी प्राप्तिका साधन है,
  • अचित्य महाव्रत स्वरूपा है,
  • समस्त दोषोंसे रहित, जितेन्द्रिय,
  • तत्त्वको ही सार वस्तु माननेवाले तथा
  • मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मुनिजन,
  • जिसका अभ्यास करते हैं,
  • वह भगवती परा विद्या आप ही हैं।

शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान-
मुद्‌गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम्।
देवी त्रयी भगवती भवभावनाय
वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री॥१०॥

  • आप शब्दस्वरूपा हैं,
  • अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा
  • उद्‌गीथके मनोहर पदोंके पाठसे युक्त,
  • सामवेदका भी आधार आप ही हैं।
  • आप देवी, त्रयी (तीनों वेद) और
  • भगवती (छहों ऐश्वर्योंसे युक्त) हैं।
  • इस विश्वकी उत्पत्ति एवं पालनके लिये,
  • आप ही वार्ता (खेती एवं आजीविका) के रूप में,
  • प्रकट हुई हैं।
  • आप सम्यूर्ण जगत्‌की घोर पीड़ाका,
  • नाश करनेवाली हैं।

मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा
दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्‌गा।
श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा
गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा॥११॥

  • देवि! जिससे समस्त शास्त्रोंके सारका ज्ञान होता है,
  • वह मेधाशक्ति आप ही हैं।
  • दुर्गम भवसागरसे पार उतारनेवाली,
  • नौकारूप दुर्गादेवी भी आप ही हैं।
  • आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है।
  • कैटभके शत्रु,
  • भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें,
  • एकमात्र निवास करनेवाली भगवती लक्ष्मी तथा
  • भगवान् चन्द्रशेखर द्वारा सम्मानित,
  • गौरी देवी भी आप ही हैं।

ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र-
बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम्।
अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि
वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण॥१२॥

  • आपका मुख,
  • मन्द मुसकानसे सुशोभित,
  • निर्मल, पूर्ण चन्द्रमाके बिम्बका अनुकरण करनेवाला और
  • उत्तम सुवर्णकी मनोहर कान्तिसे कमनीय है;
  • तो भी उसे देखकर महिषासुरको क्रोध हुआ और
  • सहसा उसने उसपर प्रहार कर दिया,
  • यह बड़े आश्चर्यकी बात है।

दृष्ट्‌वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल-
मुद्यच्छशाङ्‌कसदृशच्छवि यन्न सद्यः।
प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं
कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन॥१३॥

  • देवि! वही मुख जब क्रोधसे युक्त होनेपर,
  • उदयकालके चन्द्रमाकी भांति लाल और
  • तनी हुई भौंहोंके कारण विकराल हो उठा,
  • तब उसे देखकर,
  • जो महिषासुरके प्राण,
  • तुरंत नहीं निकल गये,
  • यह उससे भी बढ़कर आश्चर्यकी बात है;
  • क्योंकि क्रोधमें भरे हुए यमराजको देखकर
  • भला कौन जीवित रह सकता है?।

देवि प्रसीद परमा भवती भवाय
सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि।
विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत-
न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य॥१४॥

  • देवि! आप प्रसन्न हों।
  • परमात्मस्वरूपा, आपके प्रसत्र होनेपर,
  • जगत्‌का अभुदय होता है और
  • क्रोधमें भर जानेपर आप,
  • तत्काल ही कितने कुलोंका,
  • सर्वनाश कर डालती हैं,
  • यह बात अभी अनुभवमें आयी है;
  • क्योंकि महिषासुरकी यह विशाल सेना,
  • क्षणभरमें आपके कोपसे नष्ट हो गयी है।

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां
तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥१५॥

  • सदा अभ्युदय प्रदान करनेवाली,
  • आप जिनपर प्रसन्न रहती हैं,
  • वे ही देशमें सम्मानित हैं,
  • उन्हींको धन और यशकी प्राप्ति होती है,
  • उन्हींका धर्म कभी शिथिल नहीं होता तथा
  • वे ही अपने हृष्ट-पुष्ट स्त्री, पुत्र और
  • भाईयोके साथ धन्य माने जाते हैं।

धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा-
ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति।
स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा-
ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन॥१६॥

  • देवि! आपकी ही कृपासे पुण्यात्मा पुरुष,
  • प्रतिदिन अत्यन्त श्रद्धापूर्वक,
  • सदा सब प्रकारके धर्मानुकूल कर्म करता है और
  • उसके प्रभावसे स्वर्गलोकमें जाता है;
  • इसलिये,
  • आप तीनों लोकोंमें,
  • निश्चय ही मनोवांछित फल देनेवाली हैं।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥१७॥

  • माँ दुर्गे! आप स्मरण करनेपर,
  • सब प्राणियोंका भय हर लेती हैं और
  • स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन करनेपर,
  • उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं।
  • दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि!
  • आपके सिवा दूसरी कौन है,
  • जिसका चित्त सबका उपकार करनेके लिये,
  • सदा ही दयार्द्र रहता हो।

एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते
कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम्।
संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु
मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि॥१८॥

  • देवि! इन राक्षसोंके मारनेसे,
  • संसारको सुख मिले तथा
  • ये राक्षस चिरकालतक नरकमें रहनेके लिये भले ही पाप करते रहे हों,
  • इस समय संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर,
  • स्वर्गलोकमें जाये –
  • निश्चय ही यही सोचकर,
  • आप शत्रुओंका वध करती हैं।

दृष्ट्‌वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म
सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम्।
लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता
इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी॥१९॥

  • आप शत्रुओंपर शस्त्रोंका प्रहार क्यों करती हैं?
  • समस्त असुरोंको,
  • दृष्टिपात मात्रसे ही भस्म क्यों नहीं कर देतीं?
  • इसमें एक रहस्य है।
  • ये शत्रु भी हमारे शस्त्रोंसे पवित्र होकर,
  • उत्तम लोकोंमें जाये,
  • इस प्रकार उनके प्रति भी आपका विचार अत्यन्त उत्तम रहता है।

खड्‌गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः
शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम्।
यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड-
योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत्॥२०॥

  • खड्‌गके तेज-पूंजकी भयंकर दीप्तिसे तथा
  • आपके त्रिशूलके अग्रभागकी घनीभूत प्रभासे चौंधियाकर,
  • जो असुरोंकी आँखे फूट नहीं गयीं,
  • उसमें कारण यही था कि
  • वे मनोहर रश्मियोंसे युक्त,
  • चन्द्रमाके समान आनन्द प्रदान करनेवाले,
  • आपके इस सुन्दर मुखका दर्शन करते थे।

दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं
रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः।
वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां
वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम्॥२१॥

  • देवि! आपका शील,
  • दुराचारियोंके बुरे बर्तावको दूर करनेवाला है।
  • साथ ही यह रूप ऐसा है,
  • जो कभी चिन्तनमें भी नहीं आ सकता और
  • जिसकी कभी दूसरोंसे तुलना भी नहीं हो सकती;
  • तथा आपका बल और पराक्रम तो,
  • उन दैत्योंका भी नाश करनेवाला है,
  • जो कभी देवताओंके पराक्रमको भी नष्ट कर चुके थे।
  • इस प्रकार आपने शत्रुओंपर भी,
  • अपनी दया ही प्रकट की है।

केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य
रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र।
चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा
त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि॥२२॥

  • वरदायिनी देवि!
  • आपके इस पराक्रमकी,
  • किसके साथ तुलना हो सकती है तथा
  • शत्रुओंको भय देनेवाला एवं
  • अत्यन्त मनोहर ऐसा रूप भी,
  • आपके सिवा और कहाँ है?
  • हृदयमें कृपा और
  • युद्धमें निष्ठुरता,
  • ये दोनों बातें, तीनों लोकोंके भीतर,
  • केवल आपमें ही देखी गयी हैं।

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन
त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त-
मस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते॥२३॥

  • मात:! आपने शत्रुओंका नाश करके,
  • इस समस्त त्रिलोकीकी रक्षा की है।
  • उन शत्रुओंको भी युद्धभूमिमें मारकर,
  • स्वर्गलोकमें पहुँचाया है तथा
  • उन्मत्त दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले,
  • हम लोगोंके भयको भी दूर कर दिया है,
  • आपको हमारा नमस्कार है।

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्‌गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥२४॥

  • देवि!
  • आप शूलसे हमारी रक्षा करें।
  • अम्बिके!
  • आप खड़गसे भी हमारी रक्षा करें तथा
  • घण्टाकी ध्वनि और धनुषकी टंकारसे भी,
  • हम लोगोंकी रक्षा करें।

प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥२५॥

  • चण्डिके!
  • पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशामें,
  • आप हमारी रक्षा करें तथा
  • ईश्वरि!
  • अपने त्रिशूलको घुमाकर,
  • आप उत्तर दिशामें भी हमारी रक्षा करें।

सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥२६॥

  • तीनों लोकोंमें आपके जो परम सुन्दर एवं
  • अत्यन्त भयंकर रूप विचरते रहते हैं,
  • उनके द्वारा भी आप,
  • हमारी तथा इस भूलोककी रक्षा करें।

खड्‌गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणी तेऽम्बिके।
करपल्लवसङ्‌गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥२७॥

  • अम्बिके!
  • आपके करमें शोभा पानेवाले,
  • खड़ग, शूल और गदा आदि जो-जो अस्त्र हों,
  • उन सबके द्वारा आप,
  • सब ओरसे हमलोगोंकी रक्षा करें।

ऋषिरुवाच॥२८॥
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः।
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः॥२९॥

  • ऋषि कहते हैं –
  • इस प्रकार जब देवताओंने,
  • जगन्माता दुर्गाकी स्तुति की और
  • नन्दनवनके दिव्य पुष्पों एवं गन्ध-चन्दन आदिके द्वारा
  • उनका पूजन किया,

भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु* धूपिता।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान्॥३०॥

  • फिर सबने मिलकर जब भक्तिपूर्वक,
  • दिव्य धूपोंकी सुगन्ध निवेदन की,
  • तब देवीने प्रसत्रवदन होकर,
  • प्रणाम करते हुए सब देवताओंसे कहा।

देव्युवाच॥३१॥
व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम्*॥३२॥

  • देवी बोलीं – देवताओ!
  • तुम सब लोग,
  • मुझसे जिस वस्तुकी अभिलाषा रखते हो, उसे माँगो।

देवा ऊचुः॥३३॥
भगवत्या कृतं सर्वं न किंचिदवशिष्यते॥३४॥

  • देवता बोले –
  • भगवतीने हमारी सब इच्छा पूर्ण कर दी,
  • अब कुछ भी बाकी नहीं है।

यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः।
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्‍वरि॥३५॥

  • क्योंकि हमारा यह शत्रु,
  • महिषासुर मारा गया।
  • महेश्वरि!
  • इतनेपर भी यदि आप हमें और वर देना चाहती हैं।

संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः।
यश्‍च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने॥३६॥

  • तो हम जब-जब आपका स्मरण करें,
  • तब-तब आप दर्शन देकर,
  • हम लोगोंके महान् संकट दूर कर दिया करें तथा

तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्।
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके॥३७॥

  • प्रसत्रमुखी अम्बिके!
  • जो मनुष्य इन स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति करे,
  • उसे वित्त, समृद्धि और वैभव देनेके साथ ही,
  • उसकी धन आदि सम्पत्तिको भी बढ़ानेके लिये,
  • आप सदा हमपर प्रसत्र रहें।

ऋषिरुवाच॥३८॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः।
तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप॥३९॥

  • ऋषि कहते हैं – राजन्!
  • देवताओंने जब अपने तथा जगत्‌के कल्याणके लिये,
  • भद्रकाली देवीको इस प्रकार प्रसन्न किया,
  • तब वे “तथास्तु” कहकर वहीं अन्तर्धान हो गयीं।

इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा।
देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी॥४०॥

  • भूपाल! इस प्रकार पूर्वकालमें,
  • तीनों लोकोंका हित चाहनेवाली देवी,
  • जिस प्रकार देवताओंके शरीरोंसे प्रकट हुई थीं,
  • वह सब कथा मैंने कह सुनायी।

पुनश्‍च गौरीदेहात्सा* समुद्भूता यथाभवत्।
वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः॥४१॥

  • अब पुन: देवताओंका उपकार करनेवाली वे देवी,
  • दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध करने एवं

रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी।
तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते॥ह्रीं ॐ॥४२॥

  • सब लोकोंकी रक्षा करनेके लिये,
  • गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट हुई थीं,
  • वह सब प्रसंग मेरे मुँहसे सुनो।
  • मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता हूँ।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

  • इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में,
  • सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत,
  • देवी-महात्म्य में चौथा अध्याय पूरा हुआ।

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दुर्गा सप्तशती अध्याय – 5

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दुर्गा सप्तशती अध्याय 4 – अर्थ सहित
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दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 – अर्थ सहित

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दुर्गा सप्तशती अध्याय की लिस्ट – Index

दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 में –

  • देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति,
  • या देवी सर्वभूतेषु मंत्र
  • चण्ड-मुण्डके मुखसे अम्बिकाके रूपकी प्रशंसा सुनकर,
    • शुम्भका उनके पास दूत भेजना और
  • दूतका निराश लौटना

दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 का विनियोग और ध्यान

॥विनियोगः॥

ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रूद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्
छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्,
महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।

विनियोग

  • ॐ – इस उत्तर चरित्रके रुद्र ऋषि हैं,
  • महासरस्वती देवता हैं,
  • अनुष्टप छन्द है,
  • भीमा शक्ति है,
  • भ्रामरी बीज है,
  • सूर्य तत्त्व है और
  • सामवेद स्वरूप है।
  • महासरस्वतीकी प्रसत्रताके लिये,
  • उत्तर चरित्रके पाठमें,
  • इसका विनियोग किया जाता है।

॥ध्यानम्॥

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

ध्यान

  • जो अपने करकमलोंमें,
  • घण्टा, शूल, हल, शंख,
  • मूसल, चक्र, धनुष और
  • बाण धारण करती हैं।
  • शरद-ऋतुके शोभासम्पत्र चन्द्रमाके समान,
  • जिनकी मनोहर कान्ति है,
  • जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा
  • गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है,
  • उन महासरस्वती देवीका,
  • मैं निरन्तर भजन करता (करती) हूँ।

ऊं नमश्चंडिकायैः नमो नमः


दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 – देवीकी स्तुति – या देवी सर्वभूतेषु

शुम्भ और निशुम्भ असुरों को बल का घमंड

ॐ क्लीं ऋषिरुवाच॥१॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्‍च हृता मदबलाश्रयात्॥२॥

  • महर्षि मेधा कहते हैं –
  • पूर्वकाल में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने,
  • अपने बल के घमंड में आकर,
  • शचीपति इंद्र के हाथ से,
  • तीनों लोकों का राज्य और
  • यज्ञभाग छीन लिए।

तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥३॥

  • वे दोनों,
  • सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, यम और
  • वरुण के अधिकार का भी,
  • उपयोग करने लगे।
  • वायु और अग्नि का कार्य भी,
  • वे ही करने लगे।

तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः॥४॥

  • उन दोनों ने सब देवताऒं को,
  • अपमानित, राज्यभ्रष्ट,
  • पराजित तथा अधिकारहीन करके,
  • स्वर्ग से निकाल दिया।

इंद्र आदि देवता, माँ जगदम्बा की शरण में जाते है

हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥५॥

  • उन दोनों असुरों से,
  • तिरस्कृत देवताऒं ने,
  • अपराजिता देवी का स्मरण किया और सोचा –

तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः॥६॥

  • “जगदम्बा ने वर दिया था कि
  • आपत्ति काल में स्मरण करने पर,
  • मैं तुम्हारी आपत्तियों का नाश कर दूंगी।”

देवताओं द्वारा माँ भगवती की स्तुति

इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्‍वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः॥७॥

  • यह विचारकर देवता गिरिराज हिमालयपर गए और
  • वहां भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे।

जगदम्बा देवी को नमस्कार

देवा ऊचुः॥८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्॥९॥

  • देवता बोले – देवी को नमस्कार है,
  • महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है।
  • प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है।
  • हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बाको
  • नमस्कार करते हैं।

माँ गौरी को नमस्कार

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्ये धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥१०॥

  • रौद्रा को
  • नमस्कार है।
  • नित्या, गौरी एवं धात्री को
  • बारम्बार नमस्कार है।
  • ज्योत्सनामयी, चद्ररूपिणी एवं
  • सुख स्वरूपा देवी को
  • सतत प्रणाम है।

लक्ष्मी माता को नमस्कार

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥११॥

  • शरणागतों का कल्याण करने वाली,
  • वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवी को
  • हम बारम्बार नमस्कार करते हैं।
  • नैर्ऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाऒं की लक्ष्मी तथा
  • शर्वाणी (शिवपत्नी)-स्वरूपा,
  • आप जगदम्बा को
  • बार-बार नमस्कार है।

माँ दुर्गा को नमस्कार

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥१२॥

  • दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकट से पार उतारनेवाली),
  • सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी,
  • ख्याति, कृष्णा और धूम्रा देवी को
  • सर्वदा नमस्कार है।

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥१३॥

  • अत्यंत सौम्य तथा
  • अत्यंत रौद्ररूपा देवी को
  • हम नमस्कार करते हैं,
  • उन्हें हमारा बारम्बार प्रणाम है।

जगत की आधार, विष्णु माया को नमस्कार

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै॥१४॥
नमस्तस्यै॥१५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१६॥

  • जगत की आधारभूता कृति देवी को
  • बारम्बार नमस्कार है।
  • जो देवी सब प्राणियों में,
  • विष्णु माया के नाम से कही जाती हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

सब प्राणियों में चेतना स्वरूप

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै॥१७॥
नमस्तस्यै॥१८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१९॥

  • जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

बुद्धिरूप

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२०॥
नमस्तस्यै॥२१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२२॥

  • जो देवी सब प्राणियों में बुद्धिरूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

निद्रा रूप

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२३॥
नमस्तस्यै॥२४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२५॥

  • जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

क्षुधा रूप

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२६॥
नमस्तस्यै॥२७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२८॥

  • जो देवी सब प्राणियों में क्षुधा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।
  • क्षुधा अर्थात
    • भूख,
    • भोजन करने की इच्छा

छाया रूप

या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥२९॥
नमस्तस्यै॥३०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३१॥

  • जो देवी सब प्राणियों में छाया रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

शक्ति रूप

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३२॥
नमस्तस्यै॥३३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३४॥

  • जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

तृष्णा रूप

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३५॥
नमस्तस्यै॥३६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३७॥

  • जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं,
  • उनको नमस्कार, उनको नमस्कार,
  • उनको बारम्बार नमस्कार है।

क्षान्ति, क्षमा